5806. || षष्ठ कहानी || सूर्यप्रभ-चरित; गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा; गुणशर्मा का जन्म-वृत्तान्त
5806. || षष्ठ कहानी || सूर्यप्रभ-चरित; गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा; गुणशर्मा का जन्म-वृत्तान्त
षष्ठ तरंग
सूर्यप्रभ-चरित
तदनन्तर, रात्रि में पत्नियों के विना सोया हुआ और युद्ध के लिए उत्साहित सूर्यप्रभ, शय्या पर लेटे-लेटें अपने मन्त्री वीतमीति से बोला- 'मित्र, मुझे नींद नहीं जा रही है, इसलिए सात्विक वीरता से भरी कोई कहानी सुनाओ ।॥१-२॥
उस वीतमीति ने सूर्यप्रभ की बात सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर यह कहानी आरंभ की ॥३॥
गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा
उज्जयिनी नाम की एक नगरी इस पृथ्वी का श्रृंगारस्वरूप है। वह निर्मल गुणों¹ से गूंथी गई रत्नावली के समान है।।४।।
उस नगरी में गुणियों का प्यारा महासेन नाम का एक राजा था। वह कलाओं का प्रधान आधार था और प्रताप में सूर्य तथा शील में चन्द्रमा के समान था ।॥५॥
उस राजा की प्राणों के समान प्यारी अशोकवती नाम की रानी थी, जिसके समान सुन्दरी स्त्री तीनों लोकों में नही थी ॥६॥
उस महारानी के साथ राज्य का शासन करते हुए उस राजा का गुणशर्मा नामक आदरणीय और प्यारा मित्र या ।।७।।
वह गुणशर्मा शूर, बीर और अति रूपवान्, वेद-विद्याओं का पारगामी, युवक और कलाबों तथा शस्त्र-विद्याओं का ज्ञाता था ॥८॥
एक बार, रनिवास में नृत्य-कला की चर्चा के प्रसंग में राजा और रानी ने पास में बैठे हुए गुणशर्मा से कहा- ॥९॥
तुम सर्वज्ञ हो, इसमें सन्देह नहीं; किन्तु हम लोगों के मन में एक कौतुक उत्पन्न हो रहा है कि यदि तुम नाचना जानते हो, तो कृपा करो और अपना नृत्य दिखाओ ॥१०॥
यह सुनकर मुस्कराते हुए गुणशर्मा ने राजा और रानी से कहा-'जानता हूँ, किन्तु राज-सभा में नाचना उचित नहीं। ऐसा नाच, मूखौं का होता है, और वह हँसी का कारण होता है। शास्त्र से भी निन्दित है। फिर, वह भी राजा और रानी के सामने। यह लज्जा का विषय है। धिक्कार है! रानी के कौतूहल से प्रेरित राजा इस प्रकार कहते हुए गुणशर्मा से फिर बोला ॥११-१३॥
यह रंगमंच का नाच नहीं है कि पुरुष के लिए लज्जा का विषय हो। यह तो एक गुप्त मित्र-मंडली है, इसमें केवल अपनी विद्वता का प्रदर्शन मात्र करना है। ।।१४।।
मैं तुम्हारा राजा नहीं हूँ, मित्र हूँ। बाज मैं तुम्हारा नृत्य वैले विना भोजन ग्रहण न करूंगा ।। १५॥
राजा के इस प्रकार आग्रह करने पर गुणशर्मा ने नाचना स्वीकार किया। हठी राजा की आज्ञा का उल्लंघन उसके अनुजीवी कैसे कर सकते हैं।॥१६॥
तदनन्तर, उस युवा गुणशर्मा ने इतना सुन्दर आगिक नृत्य किया कि उसे देखकर राजा और रानी दोनों का चित्त नाचने लगा ॥१७॥
नृत्य कर लेने के पश्चात् राजा ने उसे बजाने के लिए वीणा दी। उमने कहा- 'महाराज, दूसरी वीणा दीजिए, यह वीणा अच्छी नहीं है। कहीं कुत्ते का बाल है।।१८-१९॥ उस पर झंकार देते ही इस वीणा के भीतर
तार के अंनकार से ही मैंने यह जान लिया है।' इतना कहकर गुणशर्मा ने गोद से वीणा उतार दी ॥२०॥
जब राजा ने उस वीणा को खूंटी को उमेठकर देखा, तब उसमें सचमुच कुत्ते का बाल उसे मिला ॥२१॥
तब राजा महासेन ने अत्यन्त आश्चर्य से उसको सर्वज्ञता की प्रशंसा करते हुए दूसरी बीणा मंगवाई ॥ २२॥
तब गुणशर्मा ने गंगा के प्रवाह के समान सुन्दर, तीन मार्गों से चलनेवाली और कानों को पवित्र करनेवाली उस वीणा को बजाकर राजा को चकित कर दिया ॥२३॥
तब गुणशर्मा ने चकित होते हुए रानी के साथ राजा को क्रमशः शस्त्रास्त्र-विद्या मी दिखलाई ॥२४।।
तब राजा ने कहा- 'यदि तू युद्ध-विद्या जानता है, तो विना शस्त्र हाथ में लिये ही मुझ पास्त्रधारी को पराजित कर दे ॥२५॥
तब गुणशर्मा ब्राह्मण ने कहा- 'महाराज, आप शस्त्र लेकर मुझ पर प्रहार कीजिए। मैं आपको अपना कौशल दिखाता हूँ ॥२६॥
तदनन्तर, राजा ने तलवार आदि अस्त्रों से उस पर प्रहार करना प्रारम्भ किया। राजा जिस-जिस अस्त्र का उस पर प्रहार करता था, गुणशर्मा खेल के समान अपनी युक्ति से, उसे छीन लेता था ॥२७॥
इस प्रकार, राजा के हाथ से अस्त्र छीनकर स्वयं अक्षत रहते हुए गुणशर्मा ने राजा के हाथों को और राजा को जाँष दिया ॥२८॥
तब राजा ने उस गुणी कलाकार को राज्य की सहायता के योग्य समझकर उसकी प्रशंसा करते हुए उसे सबसे अधिक मान दिया ॥२९।।
उघर रानी अशोकवती भी उस ब्राह्मण के यौवन, सौन्दर्य और उम-उन कलात्मक गुणों को देखकर सर्वात्मना उस पर आसक्त हो गई ॥३०॥
और सोचने लगी कि यदि मैं इसे न पा सकी, तो मेरा जीवन ही निष्फल है। इस पर मेरा अनिर्वचनीय और प्राणों से भी अधिक प्रेम हो गया है। ऐसा सोचकर उसने युक्ति से राजा को यह कहा- 'प्रियतम, आज इस गुणशर्मा की बीगा-वादन में निपुणता देखकर मुझे उसमें प्राणों से भी अधिक रम (आनन्द) प्राप्त हुआ' ॥३१-३३॥
यह सुनकर राजा ने गुणनर्मा से कहा कि तुम रानी को वीणा-वादन भली भाँति सिखा दो ॥३४॥
'आपकी जैसी आज्ञा, किन्तु किनी शुभ दिन उसका प्रारम्भ करूंगा' गुणशर्मा, राजा को इस प्रकार उत्तर देकर अपने घर चला गदा ॥३५॥
और, रानी की दृष्टि भेद-भरी जानकर गुणशर्मा ने वीणा मिलाने का प्रारम्भ टाल दिवा ॥३६॥
एक बार, गुणवर्मा, भोजन करते हुए राजा के समीप बैठा था। उस समय राजा के आगे व्यंजन परोसते हुए रसोइये को उसने, 'मत दो, मत दो' ऐसा कहकर परोसने से रोक दिया ॥ ३७॥
'यह क्या बात है'- राजा के इस प्रकार पूछने पर वह बुद्धिमान् गुणशर्मा कहने लगा कि 'यह व्यंजन विषाक्त है, यह मैंने रसोइये के लक्षणों से जाना; क्योंकि इसने व्यंजन देते समय भव से काँपते हुए तथा शंका से चंचल दृष्टि से मेरा मुँह देला ॥३८-३९॥
और, अभी देखा जाता है। यह व्यंजन किसी को खिलाया जाय। मैं उसका विष दूर कर दूंगा' ॥४०॥
गुणशर्मा के ऐसा कहने पर राजा ने वही व्यंजन उसी रसोइये को खिलाया और वह उसे खाकर तुरन्तु मूच्छित हो गया। गुणशर्मा के मन्त्र-प्रयोग द्वारा विष दूर हो जाने पर स्वस्थ रसोइये ने राजा के पूछने पर सच्ची बात कही-॥४१-४२॥
'राजन्, तुम्हारे शत्रु गौडदेशाधिपति विक्रमशक्ति ने मुझे तुम्हें विष खिलाकर मार डालने के लिए भेजा था ॥४३॥
अंतः, मैं विदेशी बनकर आवा और आपसे 'भोजन-निर्माण में दक्ष हूँ ऐसा कह कर आपके रसोईघर में प्रविष्ट हुना ॥४४॥
हे राजन्, आज ही भोजन में विष देते हुए इस बुद्धिमान् ने मुझे पकड़ लिया। इसके आगे जो कुछ हुआ, आप जानते हैं' ॥४५॥
ऐसा सुनकर राजा ने उस पाचक को दंडित. करके प्राण देनेवाले उस गुणशर्मा को एक हजार ग्राम पुरस्कार में दिये ॥४६॥
किसी दूसरे दिन, रानी के बार-बार आग्रह किये जाने पर राजा के प्रयत्न से, गुणशर्मा द्वारा रानी को वीणा सिखाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया ।॥४७॥
वीणा-वादन सित्त्राते हुए गुणशर्मा के सामने रानी अशोकवती सदा कामचेष्टाएँ किया करती थी ॥४८॥
एक बार एकान्त में नाखूनों को गड़ाती हुई कामातुरा रानी गुणशर्मा द्वारा रोके जाने पर बोली- 'हे सुन्दर, वीणा बजाने के बहाने से मैंने तुम्हें पावा है। तुम्हारे प्रति मेरा घनिष्ठ प्रेम हो गया है। अतः मेरा उपभोग करो' ।॥४९-५०।।
इस प्रकार कहती हुई रानी से गुणशर्मा ने कहा-'ऐसा न कहो। तुम मेरे स्वामी की स्त्री हो, मुझ जैसा व्यक्ति इस प्रकार का स्वामिद्रोह नहीं कर सकता। ऐसा कहते हुए गुणशर्मा से रानी ने फिर कहा- हे नीरस, तुम्हारे इस सुन्दर रूप और कला-कौशल का क्या महत्त्व, जब तुम मुझ जैसी कामातुरा प्रेयसी की उपेक्षा कर रहे हो' ।॥५१-५३॥
यह सुनकर गुणशर्मा हँसी करता हुआ उससे बोला- 'ठीक कहा, उस चातुर्य का क्या फल, जो परदारा के अपहरण से निन्दित और मलिन हो और जो इस लोक तथा परलोक में भी नरक में पतन का कारण बने' ।॥५४-५५।।
गुणशर्मा के ऐसा कहने पर वह रानी कोष के साथ उससे बोली- 'यदि तुम मेरी बात न मानोगे, तो अवश्य ही मेरी मृत्यु हो जायगी; किन्तु अपमानिता मैं पहले तुम्हें मारकर मरूंगी। मेरी बात न मानने पर तुम अपना भी मरण निश्चित समझो।' गुणगर्मा ने उत्तर में कहा- 'भले ही मृत्यु हो जाय। धर्म के बन्धन से बँधकर एक क्षण का भी जीवन उत्तम है, किन्तु अधर्म के साथ प्रलयकाल तक का भी जीवन अच्छा नहीं ।॥५६-५८।।
विना पाप किये मेरी प्रशंसनीय मृत्यु श्रेष्ठ है। किन्तु, पाप करके निन्दित राजशासन भोगना बच्छा नहीं' ।॥५९॥
ऐसा सुनकर वह रानी फिर बोली- 'तू मेरी और अपनी आत्मा के साथ विद्रोह मत कर। मैं कहती हूँ, सुन ॥६०॥
यह राजा मेरी असंभव बात को भी नहीं टालता। इसलिए, मैं उससे निवेदन करके तुझे किसी देश का राज्य दिला दूंगी। और, सभी सामन्तों को तुम्हारा अनुयायी बना दूंगी। इससे तुम गुणों से उज्ज्वल राजा बन जाओगे ।।६१-६२॥
तब तुझे भय कहाँ रहेगा। तुझे कौन और कैसे अपमानित करेगा। इसलिए, शंका छोड़ कर मेरा उपभोग कर। नहीं तो जीवित न रहेगा' ।॥६३॥
गुणशर्मा ने रानी को इतना आग्रह करती हुई देलकर उस समय को टालने के लिए युक्ति-पूर्वक कहा- ।।६४।।
'यदि तेरा अत्यन्त आग्रह ही है, तो तेरी बात सफल करूंगा; किन्तु रहस्य खुलने के भय से सहसा ऐसा करना उचित नहीं। इसलिए कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करो। मेरी बात सच जानो। तेरा विरोध करके मैं सर्वनाश नहीं मोल ले सकता ॥६५-६६॥
इस प्रकार भविष्य की आशा से उसे सन्तुष्ट करके और उससे पुनर्मिलन का वचन लेकर लम्बी साँस लेता हुआ गुणशर्मा किसी प्रकार वहां से बाहर निकला ॥६७।।
तदनन्तर, कुछ दिनों के बीतने पर राजा महासेन ने किले में बैठे हुए राजा सोमकेश्वर को चढ़ाई करके घेर लिया ॥६८॥
महासेन को उधर फंसा हुआ देखकर गौड़देश के राजा विक्रमशक्ति ने चढ़ाई करके उसे (महासेन को) पेर लिया ।॥६९॥
तब महासेन ने गुणवार्मा से कहा- 'जब कि हम एक राजा को घेरकर पड़े हैं, तभी दूसरे शत्रुद्वारा घेर लिये गये। तब दोनों से एक साथ युद्ध करने में असमर्थ हम कैसे लड़ सकते हैं। और, बिना युद्ध किये भी कब तक घेरे में घिरे रहेंगे ॥७०-७१॥
अब इस संकट काल में हमें क्या करना चाहिए ?' राजा के इस प्रकार पूछने पर गुणशर्मा ने उससे कहा-॥७२॥
'स्वामी, धैवं घरो। मैं इसका उपाय करूँगा, जिससे कि आप इस संकट को पार कर लेंगे' ॥७३।।
गुणशर्मा राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर और आँखों में अन्तर्धान होने का अंजन लगाकर रात्रि के समय अदृश्य होकर विक्रमयाक्ति के शिविर में गया ।॥७४।॥
वह उसके निजी भवन में जाकर और सोये हुए विक्रमशक्ति को जगाकर बोला- 'मैं देव-दूत हूँ और तुम्हारे पास आया हूँ ॥७५॥
तुम महासेन के साथ सन्धि करके शीघ्र ही यहाँ से हट जाओ, महीं तो निश्चित रूप से तुम्हारा नाथ होगा। तुम्हारे दूत भेजने पर वह सन्धि स्वीकार कर लेगा, ऐसा सन्देश देकर विष्णु ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।॥७६-७७॥
क्योंकि, तू विष्णु का भक्त है और वे भक्तों से प्यार करते हैं तथा उनके योग-क्षेम का ध्यान रखते हैं।' यह सुनकर राजा विक्रमशक्ति ने सोचा-॥७८॥
इस देवदूत का कयन अवश्य ही सत्य है। अन्यथा कठिनता से भी यहाँ किसी का प्रवेश असम्भव है। उसका स्वरूप भी मनुष्यों का-सा नहीं है ॥७९॥
ऐसा सोचकर राजा बोला- मैं धन्य हूँ, जिसे भगवान् विष्णु ने ऐसा सन्देश दिया है। मैं उनके आदेश का पालन करता हूँ' ।॥८०॥
ऐसा कहते हुए राजा पर विश्वास करके गुणपार्मा अंजन के प्रभाव से अदृश्य हो गया ।॥८१॥
और, उसने जो कुछ किया था, वह महासेन से आकर कह सुनाया। महासेन ने, प्राण और राज्य देनेवाले गुणशर्मा को गले से लगा लिया ॥८२॥
प्रातःकाल ही विक्रमशक्ति दूत भेजकर और महासेन के साथ सन्धि करके सेना के साथ शीघ्र ही लौट गया ।॥८३॥
महासेन भी राजा सोमक को जीतकर गुणशर्मा के प्रभाव से हाथी और घोड़े प्राप्त करके अपनी राजधानी में लौट आया ॥८४॥ा
उज्जयिनी में रहते हुए महासेन को नदी में स्नान करते समय ग्राह से और उद्यान में भ्रमण करते समय सर्प के काटने से गुणशर्मा ने बचाया ॥८५॥
कुछ दिनों के बीतने पर, अपनी सेना को प्रबल बनाकर महासेन ने राजा, विक्रमशक्ति पर आक्रमण कर दिया ॥८६॥
विक्रमवशक्ति भी उसे आया जानकर युद्ध के लिए बाहर निकल आया और दोनों में परस्पर घमासान युद्ध हुआ ॥८७॥
यद्ध में वे दोनों राजा रथहीन होकर पैदल ही इन्द्र-युद्ध करने लगे ॥८८॥
क्रोध से सड्ग लेकर दौड़ते हुए उन दोनों में महासेन व्याकुल होकर भूमि में फिसलने के कारण गिर गया ।॥८९॥
गिरे हुए राजा पर राजा विक्रमशक्ति के खड्ग-सहित हाथ को गुणशर्मा ने चक्र से काट डाला और तदनन्तर लोहे के डंडे से उसे मार डाला। महासेन उठकर और यह देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ और बोला- हे विप्रवीर, 'क्या कहूँ, यह पांचवीं बार तुमने मेरी प्राण-रक्षा की ॥९०-९२॥
गुणशर्मा से विक्रमशिक्त के मारे जाने पर, महासेन ने विक्रमशक्ति की सेनाओं और उसके राष्ट्र पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की ॥९३॥
गुणशर्मा की सहायता से उमने अन्धान्य राजाओं पर भी आक्रमण करके और उन्हें अधीन करके महासेन उज्जयिनी लौट आया ॥९४।॥
उधर उत्कंठिता रार्नी, अशोकवती गुणशर्मा से बार-बार आग्रहपूर्वक प्रार्थना करने से रुकती न थी ॥९५।।
किन्तु, गुणशर्मा ने उसकी प्रार्थना किसी प्रकार स्वीकार न की। सच है, सज्जन व्यक्ति मरना स्वीकार करते हैं, किन्तु दुराचार नहीं ॥९६॥
अशोकवती ने भी गुणशर्मा के दृढ निश्चय को देखकर उससे शत्रुता ठान ली। वह एकबार बनावटी लेद का-सा मुँह बनाकर और रोने का-सा मुंह लेकर पड़ी थी ।॥९७॥
महासेन ने आकर यह देला और पूछा- 'प्रिये, का बात है, तुम्हें किसने कुद्ध किया है, मुझे बत भो, मैं अभी उसके धन और प्राणों का विनाश करता हूँ, ॥९८-९९।।
इस प्रकार कहते हुए राजा से रानी ने बड़े ही कष्ट से कहा- 'यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसके प्रकट करने से कोई लाभ हो ॥१००॥
जिसने मेरा अपकार किया है, तुम उसे दंड देने में समर्थ नहीं हो। तथापि आर्यपुत्र, यदि तुम्हारा आग्रह ही है, तो सुनो, कहती हूँ, ॥१०१।
गुणशर्मा, गौडेश्वर से धन लेने की इच्छा से उसके साथ षड्यन्त्र करके छल से भीतर ही भीतर तुमसे द्रोह करता था। इस नीच ब्राह्मण ने गौडेश्वर को राजा बनाने के लिए गुप्त दूत भेजा था ।।१०२-१०३।।
४०१
...
यह सुनकर राजा के विश्वस्त रसोईदार ने कहा- 'यह काम मैं कर दूंगा। द्वब्य का बपव्यय न करो' ॥१०४।।
ऐसा कहकर गुणशर्मा के दूत को बाँधकर कैद में डाल दिया और रसोईदार गुप्त रूप से तुम्हें विष देने के लिए यहाँ आया ॥१०५॥
इसी बीच गुणशर्मा का दूत किसी प्रकार जेल से भागकर यहाँ आ गया और उसने रसोईदार का समस्त समाचार गुणदार्मा से सुनाया। पाचक हमारे भोजनालय में था, इसलिए उस दुष्ट ब्राह्मण ने विष देते हुए तुम्हें बताकर उसे मरवा डाला ॥१०६-१०८॥
आज उस रसोईदार का समाचार जानने के लिए आये हुए उसकी माता, स्त्री तथा भाइयों को जानकर उस बुद्धिमान् गुणशर्मा ने उन सबको मार डाला; किन्तु उसका भाई भागकर दैवयोग से मेरे घर आ गया ।।१०९-११०।।
उम शरणार्थी ने मुझे सब समाचार सुनाया और इतने में गुणशर्मा भी मेरे वासगृह में आया ॥१११॥
उसे देखकर और मुझसे उसका नाम जानकर वह रसोइये का भाई भय से न जाने कहाँ भाग गया ॥११२॥
गुणशर्मा भी अपने सेवकों से बताये हुए उसे मेरे पास देखकर कुछ सोचते-सोचते तुरन्त मलिन हो गया ।॥११३॥
'गुणसमंन्, आज तुम कुछ दूसरे से क्यों मालूम हो रहे हो?' मैंने उसका भाव जानने के लिए एकान्त में उससे पूछा ॥११४०।।
गुणवार्मा रहस्य खुलने के भय से मुझे स्वीकार करने की इच्छा से बोला- 'रानी, मैं तुम्हारी प्रेमाग्नि से जल रहा हूँ। अतः, तुम मुझे स्वीकार करो। अन्यथा मैं नहीं जिऊँगा। मुझे प्राणों की भिक्षा दो।' इस प्रकार कहकर वह सूने घर में मेरे पैरों पर गिर पड़ा ।। ११५-११६॥
तब में पैर छुड़ाकर जब उठी, तब उसने मुझे अबला को बलपूर्वक अपने से लिपटा लिया ॥११७॥
उसी समय मेरी सेविका पल्लविका अन्दर आई। उसे देखकर यह गुणशर्मा भय से बाहर चला गया ।। ११८।
यदि उस समय मेरी सेविका वहाँ न आती तो, बह पापी अवश्य ही मेरा चरित्र भ्रष्ट कर देता ! ॥११९॥"
इस प्रकार की मिथ्या बातें बनाकर रानी चुप हो गई और रोने लगी सच, है पहले झूठ की उत्पत्ति हुई और उसके उपरान्त दुष्ट स्त्रियों की। यह सुनते ही राजा क्रोष से जल उठा; क्योंकि स्त्रियों की बातों पर विश्वास करने पर बड़े-बड़े विवेकियों का विवेक नष्ट हो जाता है ॥१२०-१२१॥
और, राजा रानी से कहने लगा-सुन्दरि, वैर्य रखो। मैं उस ब्रोही का नव अवश्य करूंगा ॥१२२॥
किन्तु, उसे युक्ति से मारना होगा, नहीं तो निन्दा होगी। यह बात प्रसिद्ध है कि उसने पाँच बार मुझे जीवन-दान दिया है ।॥ १२३॥
इसका यह अपराध जन-समाज में घोषित नहीं किया जा सकता।' राजा द्वारा इस रकार कहे जाने पर रानी ने राजा से फिर कहा- 'यदि यह दोष अघोषधीय² है, तो क्या यह नहीं पोषित किया जा सकता कि वह 'गौडेश्वर से मित्रता करके राजद्रोह करता था' ।।१२४-१२५॥
रानी के इस सुझाव पर 'हाँ, ठीक कहा' इस प्रकार कहकर राजा, सभा-भवन में चला आया ॥१२६॥
राजा के सभा में आने पर उसके दर्शन के लिए सामन्त राजा, राजकुमार, मन्त्री तथा सचिव आदि सब वहाँ आये ॥ १२७॥
उधर गुणशर्मा भी अपने घर से सभा में उपस्थित होने के लिए चला। उसने आते हुए मार्ग में अनेक तरह के अपशकुन देखे ॥ १२८॥
उसकी बाई ओर कोबा उड़ रहा था और कुत्ता बाई जोर से दाहिनी ओर गया। सौप दाँयें से बाई ओर गया और कन्धे के साथ उसकी बाई भुजा भी फड़कने लगी ॥ १२९॥
'सचमुच अपशकुन हो रहे हैं, इनका जो भी अशुभ फल होना है, मुझे हो, किन्तु मेरे स्वामी (राजा) का भला हो ॥१३०॥
मन में ऐसा सोचता हुआ गुणशर्मा दरवार में जा पहुंचा। उसके हृदय में यह शंका थी कि राजगृह में कहीं अनिष्ट न हो ॥१३१॥
प्रणाम करके बैठे हुए गुणशर्मा की बोर राजा ने अच्छी दृष्टि से नहीं देखा और न उसका मौखिक स्वागत ही किया। प्रत्युत, कोष के कारण तिरछी और पैनी दृष्टि से राजा उसे देखता था ॥१३२॥
'आज यह क्या बात है', इस प्रकार अपने मन में गुणशर्मा जब सोच ही रहा था, कि वह राजा अपने आसन से उठकर गुणशर्मा के कन्धे पर जा बैठा ।।१३३।।
राजा ने सभासदों से कहा- 'गुणशर्मा के लिए मेरा न्याय सुनो।' यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा-'मैं सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हूँ, अतः मेरा और आपका व्यवहार समान नहीं हो सकता। पहले आप अपने आसन पर बैठें, फिर जो इच्छा हो, आज्ञा करें ।॥१३४-१३५।।
वैर्वशाली गुणशर्मा द्वारा इस प्रकार कहा गया और सभ्यों द्वारा समझाया गया राजा अपने आसन पर बैठ गया और सम्यों से बोला- ॥१३६॥
'आपलोगों को विदित है कि कुलक्रम से आये हुए मन्त्रियों को छोड़कर मैंने इस गुणशर्मा को अपने सनान बना डाला। अब आप लोग सुनिए कि इसने दूतों के यातायात द्वारा गौडदेश के राजा से मिलकर राजद्रोह करने की सोची। ऐसा कहकर राजा ने रानी अशोकवती की बनावटी बातें सभा में सुना दी। इसके अतिरिक्त उसने अन्य लोगों को हटाकर अत्यन्त आत्मीय व्यक्तियों से रानी अशोकवती के सतीत्व-नाश करने की उसकी चेष्टा भी स्पष्ट कर दी ।।१३७- १४०।।
तब गुणशर्मा ने कहा-'राजन्, आपको यह झूठी बात किसने कह दी। और, यह आकाश-चित्र किसने बनाया ॥१४१॥
यह सुनते ही राजा ने कहा, 'हे पापी, यदि यह सब नहीं है, तो भोजन-पात्र के अन्दर पड़े हुए विष का पता तुम्हें कैसे चला ? ॥१४२॥
'वृद्धि से सब कुछ जाना जा सकता है', गुणशर्मा के इस प्रकार कहने पर उसके शत्रु अन्य मन्त्री बोले-'यह असम्भव है महाराज!' 'तत्व की खोज किये विना आपको ऐसा न कहना चाहिए। राजा और वह भी विवेक-हीन हो, तो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता' ।।१४३-१४४॥
गुणशर्मा जब यह कह ही रहा था कि राजा ने उठकर उस पर छुरे का प्रहार करते हुए कहा कि 'तू बड़ा ढीठ हैं' ॥१४५॥
गुणशर्मा ने करण-प्रयोग³ (कलाबाजी) से उस प्रहार को बचा लिया, यह देखकर अन्य दरबारियों ने भी उस पर हुरे से प्रहार कर दिया ॥१४६॥
आश्चर्यजनक कलाबाज गुणशर्मा ने अपनी विचित्र कला से उन सबकी छुरिर्या छीन लीं और उन्हें ही शिर के बालों से आपस में बाँध दिया ॥१४७-१४८॥
तदनन्तर गुणशर्मा बलपूर्वक सबको विवश करके राजसमा से निकल गया और उसका पीछा करते हुए एक सौ सवार सिपाहियों को भी उसने मार डाला ॥१४९।।
तब आँचल में बँधे हुए अंजन को लगाकर वह अन्तर्धान होकर उसी क्षण उस देश से बाहर चला गया ।।१५०।।
दक्षिणा-पथ की ओर जाते हुए उसने मार्ग में सोचा कि 'रानी अशोकवती ने अवश्य उस मूर्ख को उसकाया है ॥१५१॥
प्रेमी द्वारा अपमानित स्त्रियाँ विष से भी अविक भीषण होती हैं और अतत्तत्वदर्शी (अविवेकी) राजा भी सज्जनों के लिए सेवनीय नहीं होते ॥ १५२॥
ऐसा सोचता हुआ गुणगर्मा एक गाँव में पहुंचा और वहाँ उमने वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए एक ब्राह्मण को देखा, जो शिव्यों को पढ़ा रहा था। उसके पास जाकर गुणशर्मा ने प्रणाम किया। उस ब्राह्मण ने भी उनका स्वागत सत्कार करके पूछा- 'हे ब्राह्मण देवता ! कौन-सी शाखा का अध्ययन करते हो, बताओ।' तब गुणगर्मा उस बाह्मण से कहने लगा- हे विद्वान्' मैं बारह शाखाओं का अध्ययन करता हूँ। दो सामवेद से, दो ऋग्वेद से, सात यजुर्वेद से और एक अवयवं से ।।१५३-१५६ ॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला तब तो तुम देवता-स्वरूप हो।' प्रभावशाली आकृति से उत्कृष्ट प्रतीत होते हुए गुणशर्मा से ब्राह्मण ने पुनः नम्रतापूर्वक कहा- 'यह तो बताओ कि तुम अपने जन्म से कौन-सा देश और कौन-सा कुल अलंकृत करते हो? और तुम्हारा नाम क्या है। तुमने कहाँ पड़ा ? ॥१५७-१५८॥
गुणशर्मा का जन्म-वृत्तान्त
यह सुनकर गुणशर्मा कहने लगा- "उज्जयिनी नगरी में आदित्यशर्मा नाम का एक ब्राह्मण-कुमार रहता था ॥१५९॥
बाल्यकाल में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई और उसकी माता उसी के साथ सती हो गई ।।१६०।।
तब वह आदित्यशर्मा वेदों और कलाओं का अध्ययन करता हुआ उसी नगरी में अपने मामा के घर पर रहने लगा ॥१६१॥
विद्याध्ययन के अनन्तर जप-हंगरी व्रत करनेवाले आदित्यशर्मा की मित्रता एक संन्यासी के साथ हो गई ॥ १६२॥
वह संन्यासी उस मित्र आदित्यशर्मा के साथ यक्षिणी की सिद्धि के लिए श्मशान में जाकर इवन करता था ॥१६३॥
श्मशान भूमि में सोने के विमान में बैठी हुई और सुन्दरी कन्याओं से घिरी हुई एक दिव्य कन्या प्रकट हुई ।।१६४॥
वह कन्या मधुर वाणी द्वारा उस संन्यासी से बोली हे संन्यासी में विद्युन्माला नाम की यक्षिणी हूँ और ये भी दूसरी यक्षिणियाँ हैं ।॥१६५।।
सो, तुम मेरे परिवार में इच्छानुसार एक यक्षिणी को ले लो। तुम्हारी मन्त्र-साधना से इतनी ही सिद्धि हुई है।।१६६।।
तुमने मेरे मन्त्र की सिद्धि पूर्ण रूप से नहीं जानी। इसलिए, मैं तुम्हें सिद्ध नहीं हो सकी। अब तुम दूसरा कष्ट व्यर्थ न उठाओं ॥१६७।।
उस यक्षिणी विद्युन्माला द्वारा इस प्रकार कहे गय संन्यासी ने उसकी बात मान ली और उसके परिवार से एक यक्षिणी ले ली ॥ १६८॥
तदनन्तर, विद्युन्माला अदृश्य हो गई। तब आदित्यशर्मा ने उस यक्षिणी से, जो उस संन्यासी को सिद्ध हुई थी, पूछा--॥१६९॥
क्या विद्युन्माला से भी बढ़कर और कोई उत्तम यक्षिणी है? तब वह बोली- 'सुन्दर ! उत्तम यक्षिणियों में विद्युन्माला, चन्द्रलेखा और सुलोचना तीन हैं। इन तीनों में भी सुलोचना अत्युत्तम है।॥ १७०-१७१॥
इस प्रकार कहकर वह यक्षिणी यथासमय आने के लिए चली गई और वह संन्यासी आदित्यशर्मा के साथ उसके घर गया ॥ १७२॥
तदनन्तर, प्रतिदिन नियत समय पर आनेवाली वह यक्षिणी प्रसन्न होकर उस परिव्राजक को अभीष्ट भोगों का प्रदान करती थी ।। १७३॥
एक बार आदित्यशर्मा ने परित्राजक के द्वारा उस यक्षिणी से पूछा कि 'सुलोचना को सिद्ध करने की मन्त्रविधि को कौन जानता हैं ।॥ १७४।।
उस यक्षिणी ने बादित्यशर्मा के सामने ही कहा-'दक्षिण दिशा की भूमि में तुम्बवन नाम का स्थान है। वहां पर वेणा नदो के किनारे स्थान बनाकर विष्णुगुप्त नाम का भदन्त (बौद्ध संन्यासी) रहता है। वह उसकी विधि को विस्तारपूर्वक जानता है' ।॥१७५-१७६ ॥
यक्षिणी के मुँह से यह सुनकर उत्सुक आदित्यशर्मा प्रव्राजक के साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर, और भदन्त को ढूंढकर वह उसके समीप ही रहने लगा। तत्पश्चात्, उसने तीन वर्षों तक भक्ति-पूर्वक उसकी सेवा की ।।१७७-१७८॥
उस समय पहले संन्यासी की सिद्ध की गई यक्षिणी ही दिव्य उपचारों से उसकी सेवा करती रही ।॥ १७९॥
तब सेवा से सन्तुष्ट भदन्त ने बादित्यशर्मा को सुलोचना की सिद्धि का मन्त्र और उसका विधान बता दिया ॥१८०॥
बादित्यशर्मा ने भी मंत्र प्राप्त करके और उसका नियमित जप समाप्त करके एकान्त में आकर विधिपूर्वक हवन किया ॥१८१।।
तदनन्तर, जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली सुलोचना यक्षिणी विमान पर बैठकर उसके सामने प्रकट हुई ॥१८२॥
और उससे बोली-'बाबो, आओ। मैं तुम्हें सिद्ध हो गई हूँ, किन्तु छह महीनों तक तू मेरा कन्याभाव नष्ट न करना, ॥१८३॥
यदि तुम मुझसे महावीर, सम्पत्तिशाली, सुन्दर लक्षणवाला, सर्वज्ञ और अजेय पुत्र प्राप्त करना चाहते हो' ।॥ १८४॥
'ऐसा ही करूंगा' कहते हुए उस जादित्यशर्मा को वह यक्षिणी विमान द्वारा अलका नगरी को ले गई ॥१८५॥
तदनन्तर, वह आदित्यशर्मा छह महीनों तक पास में बैठी हुई उसको देखते हुए नियमा-नुसार असिधारा-व्रत करता रहा ॥१८६॥
उसके ब्रह्मचर्य व्रत से सन्तुष्ट होकर कुबेर ने विधिपूर्वक वह सुलोचना यक्षिणी आदित्यशर्मा को दान कर दी ॥१८७।।
तब उसी सुलोचना यक्षिणी के गर्भ में उस ब्राह्मण द्वारा मैं उत्पन्न हुआ और मेरे पिता ने मेरे सद्गुणों के कारण मेरा नाम गुणशर्मा रख दिया ॥१८८॥
तब बड़ा होकर मैंने अलका नगरी में ही यक्षों के सरदार मणिघर से क्रमशः वेदों, अन्यान्य विद्यानों और कलाओं का अध्ययन किया ॥१८९॥
एकबार किसी कार्य के लिए इन्द्र, कुबेर के पास आया। उसे देखकर जो भी बैठे थे, उठ खड़े हुए ॥१९०।।
किन्तु वहाँ बैठे हुए मेरे पिता आदित्यशर्मा, अन्यमनस्कता के कारण कुछ सोचते रह गये, वे सम्मान के समय उठे नहीं ॥१९१॥
इस कारण क्रोध करके इन्द्र ने कहा- 'रे जड़, तू अपने मत्स्यंलोक में ही जा। तू यहाँ रहने योग्य नहीं है' ।॥ १९२॥
तब माता सुलोचना की करुण प्रार्थना करने पर इन्द्र ने कहा-'यदि ऐसा है, तो यह न जाये, इसका पुत्र ही जाय ।॥ १९३॥
क्योंकि, पुत्र बात्मा ही होता है। मेरा वचन व्यर्थ न जाय।' इतना कहकर इन्द्र शान्त होगया, ॥१९४।।
तब पिता ने मुझे उज्जयिनी में लाकर मामा के घर रख दिया, जिसका जैसा भवितव्य है, वैसा होता ही है।॥ १९५॥
उज्जयिनी में रहते हुए दैवयोग से वहाँ के राजा के साथ मेरी मित्रता हो गई। गुणशर्मा ने इस प्रकार अपना मूल समाचार कहकर रानी अश्चोकवती और राजा द्वारा किये गये युद्ध पर्यन्त की कथा उस ब्राह्मण से कह दी ॥१९६-१९७।।
और फिर बोला हे ब्राह्मण देवता, इस प्रकार मैंने उज्जयिनी से भागते हुए मार्ग में आपके दर्शन किये' ।॥१९८॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण गुणशर्मा से बोला हि प्रभो, यदि ऐसा है, तो तुम्हारे आगमन से मैं धन्य हो गया ! ॥ १९९॥
आप मेरे घर पधारें। मेरा नाम अग्निदत्त है। यह गाँव भी मेरे ही नाम से है। अब आप निश्चिन्त हो जायें' ॥२००।।
इतना कहकर अग्निदत्त, धन-धान्य, गौ-भैंस और घोड़ों आदि से भरे हुए बपने घर में गुणशर्मा को ले गया ।॥२०१।।
वहाँ ले जाकर उसने उबटन, मालिश, स्नान तथा सुन्दर वस्त्राभरणों एवं इत्र से गुणशर्मा का स्नेह-पूर्ण सम्मान किया और विविध प्रकार के भोजन कराये ॥ २०२॥
तदनन्तर, लक्षण दिखाने के बहाने उसने देदताओं से भी चाही जानेवाली अपनी सुन्दरी कन्या उसको दिखा दी ॥ २०३॥
अनुपम सुन्दरी उस कन्या के लक्षणों को देखकर गुणशर्मा ने कहा-इसकी बहुत-सी सपलियाँ (सौतें) होंगी ॥२०४॥
इसकी नाक पर तिल है, इस कारण में ऐसा कह रहा हूँ और इसकी छाती में भी तिल है। यह फल उसी का है' ॥२०५।।
गुणशर्मा के ऐसा कहने पर उसके भाई ने पिता की आज्ञा से उसकी छाती खोलकर देखी, तो वहाँ तिल दिलाई दिया ॥२०६।।
तब चकित अग्निदत्त ने गुणदत्त से कहा-'तुम सचमुच सर्वज्ञ हो; किन्तु इसके में दोनों तिल अशुभ फल देनेवाले नहीं हैं॥२०७॥
पति के धनवान् होने पर ही सौतें होती हैं। दरिद्र तो एक स्त्री का भरण-पोषण भी कष्ट से करता है। बहुत-सी स्त्रियों की तो बात ही क्या' ॥२०८॥
यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा ठीक है, ऐसी सुन्दर लक्षणोंवाली कन्या का अशुभ ही क्यों होगा ?' ॥२०९॥
इसी प्रसंग में अग्निदत्त के पूछने पर गुणशर्मा ने स्त्रियों और पुरुषों के भिन्न-भिन्न अंगों पर होनेवाले तिल आदि चिह्नों का पृथक् पृथक् फल उसे बताया ॥२१०।।
इबर वह सुन्दरी कन्या, गुणसर्मा को देखकर चन्द्रमा को चकोरी जैसी ऑलंसि पी जाना चाहती थी ॥२११॥
तब अग्निदत्त ने एकान्त में गुणशर्मा से कहा-'हे भाग्यशालिन्, मैं इस सुन्दरी नाम की कन्या को तुझे देता हूँ ॥२१२॥
विदेश न जाओ और यहीं मेरे घर में अपनी स्वतन्त्रता से रहो।' उसकी यह बात सुनकर गुणशर्मा बोला-'सच है, ऐसा करने पर मुझे कौन-मा सुख प्राप्त नहीं हो सकता, किन्तु राजा द्वारा किये गये झूठे अपमान की आग से जले हुए मुझे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है।॥ २१३-२१४।।
सुन्दरी स्त्री, चन्द्रमा का उदय (चाँदनी) और बोगा की पंचम ध्वनि ये सब सुखी जनों को आनन्द देते हैं।॥२१५।।
स्वयं (अपने से) आसक्त और अनुरागिणी स्त्री, व्यभिचारिणी नहीं होती, जैसे अशोक-वती ॥२१६॥
और भी बात है कि उज्जयिनी नगरी यहाँ से समीप है। इसलिए, मुझे यहाँ जानकर वह (राजा) किती समय भी उपद्रव कर सकना है।॥ २१७॥
अतः, तीयों का भ्रमण करके और अपने पापों का प्रक्षालन कर इस शरीर को छोडूंगा, तब सुली रहूँगा ॥२१८॥
यह सुनकर अग्निदत्त हंसकर बोला 'शुद्ध हृदयवाले तुम्हारे, एक मूर्ख के द्वारा अपभानित होने में क्या हानि है? आकाश में फेंका हुआ कीचड़ फेकनेवाले के शिर पर ही गिरता है। यह राजा शीघ्र ही अपनी मूर्खता का फल पायेगा। मोह से अन्धे और विवेक से विहीन व्यक्ति के पास लक्ष्मी अधिक दिन नहीं रहती ॥२१९-२२१॥
यदि तुम दुष्टा अशोकवती को देखकर स्त्रियों से विरक्त हो गये हो, तो सती स्त्री को देखकर श्रद्धा भी उन पर क्यों नहीं करते?' तुम तो सती और असती के लक्षणों को जानते हो ।। २२२॥
उज्जयिनी यदि समीप है, तो तुम्हारा ऐसा प्रबन्ध करूंगा कि तुम्हें यहाँ रहते कोई जान न सकेगा ॥२२३॥
तीर्थ-यात्रा तुम्हें अभीष्ट है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार, तीर्थ-यात्रा उसके लिए उचित है, जिसके पास वैदिक कर्म करने के लिए प्रचूर सम्पत्ति नहीं है।॥ २२४॥
अन्यथा, देवता, पितर, अग्नि की सेवा, व्रत एवं जप आदि से घर बैठे जो पुण्य की प्राप्ति हो सकती है, वह मार्ग में भटकनेवाले तीर्थयात्रियों को नहीं ।॥२२५॥
मुजाओं की तकिया लगाये, भूमि पर सोनेवाला, भिक्षात्रों से भोजन प्राप्त करनेवाला अकेला और दीन यात्री, मुनियों की समता पाकर भी, कष्टों से छुटकारा नहीं पाता ॥२२६।॥
देह-त्याग से तुम जो सूख चाहते हो, वह तुम्हारी मूल है। आत्मघाती को परलोक में भी अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं ।॥ २२७॥
अतः, युवा और विद्वान् तुम्हारा यह निरा मोह है। स्वयं सोचो और मेरी बात मानो ॥ २२८॥
मैं तुम्हारे लिए विशाल विस्तृत भू-गृह बनवा देता हूँ। तुम सुन्दरी से विवाह करके वहाँ अज्ञात रूप से रहो, जैसा तुम चाहते हो' ।।२२९॥
अग्निदत्त द्वारा इस प्रकार समझाये गये गुणशर्मा ने, उसकी बात मान ली और उससे कहा, कि मैंने तुम्हारी बात मान ली। सुन्दरी जैसी पत्नी को कौन छोड़ सकता है। किन्तु, असफल अवस्था में मैं तुम्हारी कन्या से विवाह न करूंगा। तबतक संपत स्थिति में रहकर किसी देवता की आराधना करता हूँ। जिससे उस कृतष्न राजा से बदला से सकूं ॥२३०-२३२॥
प्रसन्न चित अग्निदत्त ने उसकी बात मान ली और गुणशर्मा ने भी उसके घर में रात्रि को सुलपूर्वक विधाम किया ।॥२३३॥
दूसरे ही दिन अग्निदत्त ने गुणणर्मा की सुविधा के लिए रक्षायुक्त और आवश्यकताओं से परिपूर्ण 'पाताल-वसति' नामक भू-गृह बनवाया ॥२३४॥
उस गृह में रहते हुए एक बार गुणशर्मा ने अग्निदत्त से एकान्त में कहा-'यह बताइए कि मैं यहाँ रहकर किस देवता की भक्ति और व्रत विधानपूर्वक आराधना करूं' ऐसा कहते हुए धैर्यशाली गुणशर्मा से अग्निदत्त ने कहा-'में गुरु द्वारा दीक्षा में प्राप्त स्वामी कात्तिक का मन्त्र जानता हूँ। उस मन्त्र से तुम तारक (तारकासुर) निहन्ता देवसेनापति (कात्तिकेय) की आराधना करो ।। २३५-२३७॥
जिस कात्तिकेय के जन्म को चाहनेवाले, शत्रुओं से पीड़ित देवताओं द्वारा भेजे गये कामदेव को शिव ने दग्ध करके भी संकल्पजन्मा बना दिया ॥२३८॥
महेश्वर से, अग्निकुंड से, अग्नि से, शर के वन से और कृत्तिकाओं से जिस स्वामी कात्तिकेय का विचित्र जन्म हुजा है, जिसने उत्पन्न होते ही अपने प्रचंड तेज से समस्त संसार को आनन्दित करके दुर्जय तारकासुर को मारा, उस कात्तिकेय का मन्त्र मुझसे लो।' इस प्रकार कहकर अग्निदत्त ने गुणशर्मा को मन्त्र-दीक्षा दी ॥ २३९-२४१॥
उस गुणशर्मा ने सुन्दरी से सेवित होकर नियमित रूप से उस भू-गृह में उस मन्त्र द्वारा स्वामी कात्तिकेय की आराधना की ।। २४२॥
कुछ दिनों के उपरान्त भगवान् षडानन ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष होते हुए आज्ञा दी 'बेटा, तुम पर मैं प्रसन्न हूँ, वर मांगों ॥ २४३॥
२४४वां श्लोक त्रुटित है।
गुणशर्मा द्वारा अभीष्ट वर मांगने पर षडानन ने कहा-'पुत्र ! तू अनन्त धन का स्वामी होकर और महासेन को जीतकर निःशंक पृथ्वी का राज्य करेगा' ।।२४५।।
इस प्रकार, माँग से भी अधिक वर प्रदान कर स्वामी कात्तिकेय अन्तहित हो गये बौर तदनन्तर गुणशर्मा को भी अक्षय घन की प्राप्ति हुई ।।२४६०।
अनुष्ठान की सिद्धि होने पर गुणधर्मा ने अपने महत्व और प्रभाव के अनुकूल समझकर चिरकालीन सेवा-सहवास से आसक्त अग्निदत्त की रूपवती कन्या सुन्दरी का मानों साक्षात् भावी कार्यसिद्धि के समान विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर लिया ॥२४७॥
अक्षय धन-कोष की प्राप्ति के प्रभाव से प्रचुर हाथी, घोड़े और पदातियों की सेना से युक्त गुणवशर्मा ने, दान के प्रभाव से मिलाये हुए दूसरे राजाबों की सेनाओं से भी उज्जयिनी नगरी को घेरते हुए उस पर आक्रमण कर दिया ॥२४८॥
उसने उज्जयिनी में जाकर रानी अशोकवती के दुराचार की घोषणा करके और युद्ध में राजा महासेन को जीतकर राज्य का अधिकार प्राप्त किया ।॥२४९।।
राज्य प्राप्त कर और अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह करके समुद्र के तट तक राज्य का विस्तार करके सम्राट् गुणशर्मा उस सुन्दरी के साथ चिरकाल तक सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने लगा ॥२५०।।
इस प्रकार, पुरुषविशेष के अज्ञान से मूर्खबुद्धि महासेन ने विपत्ति प्राप्त की और गुणवार्मा ने बैयं धारण कर पूर्ण सफलता और सर्वोच्च राज्यलक्ष्मी प्राप्त की ।। २५१।।
अपने मन्त्री वीतभीति से इस प्रकार की उदार कथा को सुनकर समर-रूपी महासागर को पार करने की इच्छा से सूर्यप्रभ ने अधिक उत्साह प्राप्त किया और धीरे-धीरे सो गया ।॥ २५२॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विः चित कथासरित्सागर के सूर्यत्रभ लम्बक का षष्ठ तरंग समप्त
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1. गुण डोरा या सूत ।
2. प्रकट न करने के योग्य।
3. करण-प्रयोग, एक प्रकार की पंतरेबाजी।
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