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Showing posts from April, 2023

27. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 27 || लेनदार

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27. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 27 || लेनदार  नई दिल्ली, 25 अप्रैल (नवोदय टाइम्स) लापता दो मासूम बच्चों को बुराड़ी पुलिस ने बरामद कर लिया है। जांच में पता चला कि दूसरी शादी करने के लिए महिला ने अपने दो छोटे छोटे बच्चों को लावारिस सिविल लाइंस स्थित बस स्टैंड पर छोड़ दिया था। साथ ही महिला की काउंसलिंग भी कराई जा रही है। उत्तरी जिला डीसीपी सागर सिंह ■ दोनों बच्चों को एक एनजीओ के गेट पर छोड़कर चली आई घर कलसी ने बताया कि बुराड़ी पुलिस को 20 अप्रैल को संत नगर स्थित एक घर से बदबू आने की सूचना मिली थी। पड़ोसियों ने बताया था कि इस घर में महिला अपने दो बच्चों के साथ रहती है। लेकिन दोनों बच्चे कई दिनों से दिखाई नहीं दे रहे हैं और आशंका है कि बच्चों के साथ कुछ गलत हुआ है। एसएचओ राजेंद्र प्रसाद, इंस्पेक्टर जसपाल एवं अन्य राजेंद्र प्रसाद, इंस्पेक्टर जसपाल एवं अन्य पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे। फ्लैट में महिला मिली। कमरे की हालत ऐसी थी कि लग रहा था कि काफी समय से सफाई नहीं हुई है। घर से बदबू आ रही थी। किसी तरह घर की जांच की गई तो कोई शव नहीं मिला। जैसे जैसे इनपुट मिलते गए, कई थानों की...

26. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 26 || लेनदार

  26. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 26 || लेनदार  *एक धर्मशाला में पति-पत्नी अपने छोटे-से नन्हें-मुन्ने बच्चे के साथ रुके। धर्मशाला कच्ची थी।*  *दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे-से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये।* *वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा नाग कुण्डली मारकर फन फैलाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के-बक्के रह गये।*  *बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग के फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है।* *माँ चीख उठी,* *बाप चिल्लाया* *"बचाओ... बचाओ... हमारे लाड़ले को बचाओ।"* *लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँट गाड़ी पर बोझा ढोने का धंधा करता था।* *वह बोलाः "मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाय और बच्चे को चोट लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ?"* *पुत्र के आगे विषधर बैठा है ! ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ-बाप इनकार करेगे?* *वह सहमत हो गये और माँ बोलीः "भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो,अगर गलती स...

25. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 25 || पिता का अंतिम पत्र

  25. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 25 || पिता का  अंतिम पत्र  माता पिता और मृत्यु पर विशेष पत्र हमारे भारतीय समाज के अंदर आजकल अक्सर यह देखा जा रहा है कि जो अभिभावक अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए अपना कीमती समय के साथ साथ तन मन धन सब न्योछावर कर पूरा जीवन लगा देते हैं लेकिन जब वही बच्चे माता पिता की मृत्यु के समय भी नहीं पहुंचते तो फिर उनकी उच्च शिक्षा पाने और अच्छी सर्विस होने के बावजूद यदि सामाजिक सरोकारों से उनका कोई लेना देना नहीं है तो फिर इस शिक्षा से से बदतर और कोई शिक्षा नहीं हो सकती है?  यह घटना पिछले वर्ष लखनऊ में घटी थी और यह घटनाएं मुझे बार-बार इसलिए याद आती है क्योंकि यह घटना  हमारे भारतीय सैन्य अधिकारी सेवानिवृत्त एक कर्नल साहब के परिवार से संबंधित है ! पूरा घटना का विवरण आप स्वयं आगे पढ़ें? उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली।  चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है। पिता सेना में कर्नल के पद से...

24. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 24 || अलग कमरा

  24. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 24 ||  अलग कमरा  *बुजुर्ग पिताजी जिद कर रहे थे कि, उनकी चारपाई  बाहर बरामदे में डाल दी जाये।*  *बेटा परेशान था।*  *बहू बड़बड़ा रही थी..... कोई बुजुर्गों को अलग कमरा नही देता। हमने दूसरी मंजिल पर कमरा दिया.... AC  TV FRIDGE सब सुविधाएं हैं, नौकरानी भी दे रखी है। पता नहीं, सत्तर की उम्र में सठिया गए हैं..?* *पिता कमजोर और बीमार हैं....*  *जिद कर रहे हैं, तो उनकी चारपाई गैलरी में डलवा ही देता हूँ।  निकित ने सोचा।...    पिता की इच्छा की पू्री करना उसका स्वभाव था।* *अब पिता की एक चारपाई बरामदे में भी आ गई थी।*  *हर समय चारपाई पर पडे रहने वाले पिता।*  *अब टहलते टहलते गेट तक पहुंच जाते ।*  *कुछ देर लान में टहलते लान में  नाती - पोतों से खेलते,  बातें करते,*  *हंसते , बोलते और मुस्कुराते ।*  *कभी-कभी बेटे से मनपसंद खाने की चीजें भी लाने की फरमाईश भी करते ।*  *खुद खाते , बहू - बेटे और बच्चों को भी खिलाते ....* *धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा था।* *दादा !...

21. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 21 || आधुनिक नरसी और उसका भात

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  21. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 21 ||  आधुनिक नरसी और उसका भात उत्तर प्रदेश के शिवपुरी-बदरवास जनपद में एक गांव है एजवारा। आखिर एजवारा इतना खास क्यों है जिसका वर्णन हम इस कहानी में कर रहे हैं तो आपको याद दिला दें कि एजवारा में एक शादी हुई और इस शादी ने हमें नरसी के भात के प्रसंग की याद दिला दी।  नरसी का भात, कहानियां और किस्सों तक ही सीमित नहीं है। वह भारतीय जन जीवन में आज भी विद्यमान है, कलयुग में 23 नवंबर 2021 को घटित इस घटना ने पुराग्रंथों में वर्णित नरसी के भात की याद को बिल्कुल ताजा कर दिया और उन लोगों के मुंह बंद कर दिए है। जो इसे एक कोरी कथा बताते हैं। हुआ यूं कि उत्तर प्रदेश के शिवपुरी-बदरवास जनपद के एक गांव एजवारा में निवास करने वाले थान सिंह यादव की पुत्री के विवाह 23 नवंबर 2021 को होना था।  हिंदू विवाह रीति रिवाज में  भात भरना  एक महत्वपूर्ण रस्म होती है। लड़के या लड़की का मामा विवाह में लड़की के परिवार के लोगों को भात पहनाता है। थान सिंह के परिवार में पहली शादी होने से खुशी का माहौल तो था, लेकिन दुल्हन के सगे मामा नहीं होने से मंडप के नीचे भ...

20. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 20 || आप मेरे पापा बनोगे

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  20. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 20 ||   आप मेरे पापा बनोगे अनाथ बच्चों की देखभाल करने वाली एक संस्था जिसमें कुछ लोग शामिल है। ये लोग आश्रम में आए अनाथ बच्चों का अपने बच्चों की तरह ही लालन पालन करते हैं। वे किसी भी बच्चे से खुद को अंकल नहीं, पापा कहलवाते हैं। ताकि बच्चों को उनसे अपनापन मिल सके। इसलिए संस्था में रहने वाले सभी बच्चे वहां के प्रबंधकों को पापा कहकर पुकारते हैं। इस संस्था में 6 या 7 वर्ष की एक बच्ची और है। जिसका नाम संस्था ने स्नेहा रखा हुआ है। वह बच्चे इतनी प्यारी है कि उसने अनाथ आश्रम के सभी कार्यकर्ताओं का दिल जीत रखा है। संस्था के सभी लोग स्नेहा को बहुत प्यार करते हैं।  बच्ची बड़ी ही सुंदर और शांत स्वभाव की है लेकिन जब वह बोलती है तो ऐसा लगता है जैसे उसके मुख से मोती झड़ रहे हो। इसलिए कोई भी उससे बातें किए बिना नहीं रहता। जैसा कि मैंने बताया कि यह एक संस्था है इसका अर्थ यह हुआ कि यहां केवल अनाथ बच्चे ही हैं। जो लावारिस मिलने पर इस संस्था में लाए गए हैं। स्नेहा भी इन्हीं बच्चों में से एक है।   स्नेहा गली की बच्चों के साथ भी घुली मिली हुई है। व...

19. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 19 || फल वाली बुढ़िया माई

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19. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 19 ||   फल वाली बुढ़िया माई  फल वाली बुढ़िया माई, रमेश और उसके सभी साथियों को अच्छी तरह पहचानती है। जब भी वे लोग उसकी दुकान से फल खरीदने पहुंचते हैं तो वह उनको दुआ देती नही थकती। "आखिर क्यों?" बात उस दिन की है जब ऑफिस से निकल कर रमेश ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि तभी उसे याद आया कि पत्नी ने कहा था कि लौटते वक़्त एक दर्ज़न केले लेते आना। तभी उसे सड़क किनारे बड़े, साफ और ताज़ा केले बेचते हुए एक कमजोर और बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया माई दिखाई दी थी। तो उसने अपना स्कूटर उस फल वाली बुढ़िया के पास रोक दिया। वैसे तो रमेश फल हमेशा "फ्रेश फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज रमेश को लगा कि क्यों न बुढ़िया माई से ही खरीद लूँ ? वह बुढ़िया माई के पास गया और बोला, "माई, केले कैसे दिए" बुढ़िया माई बोली, "बाबूजी ! 20 रूपये दर्जन।"  रमेश जानता था कि केले 20 रूपये दर्जन हीं मिलेंगे फिर भी उसने बुढ़िया माई से कहा, " माई ! 15 रूपये दूंगा। बुढ़िया माई ने कहा, " 15 नहीं बाबू जी, 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी। रम...

18. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 18 || मां किसकी ? (एक अनोखा मुकदमा)

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18. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 18 || मां किसकी ? (एक अनोखा मुकदमा) मां किसकी ? 💢एकअनोखा मुकदमा💢 यह कलयुग है। इसमें क्या कुछ देखने को नहीं मिलता परंतु सतयुग की कुछ मर्यादाएं आज भी जीवित हैं। उन्हीं में से एक मैं आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं।  अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग था। न्यायालय में एक मुकद्दमा आया जिसने सभी को झकझोर कर दिया।          एक 60 साल के  व्यक्ति ने, अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा कर दिया था। मुकदमा नाम आते ही आप चौंक गए होओगे।      मुकदमा का मजमून कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई, अब बूढ़ा हो चला है, इसलिए वह खुद अपना ख्याल तो ठीक से रख नहीं सकता । मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है। मैं अभी भी ठीक ठाक हूंँ, सक्ष्म हूँ। इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।          न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्याया...

17. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 17 || *वाह रे बाबा तेरी पुंजी।* (एक लघु कथा संस्मरण)

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  17. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 17 ||   *वाह रे बाबा तेरी पुंजी।* (एक लघु कथा संस्मरण) परिक्रमा मार्ग पर अचानक तेज बारिश होने लगी। मैंने बारिश से बचने के लिए आसपास देखा तो बरसते आसमान और टपकते वृक्षों के सिवा ऐसा कोई स्थान नहीं मिला जहाँ मैं खुद को भीगने से बचा सकूँ। तभी मेरी नजर संत की एक सचल-कुटिया या चल-घर पर गई। यह चल-घर क्या है ? तो हम आपको बता दें कि आपने परिक्रमा मार्ग पर अधिकतर देखा होगा कि कुछ संतों ने अपने रहने के लिए लोहे की चादर से कुटिया या घर बनवा रखा होते हैं। जिसके नीचे पहिये भी लगें होते हैं। पहियों पर चलने के कारण ही इन्हें चल-घर नाम दिया गया है। बस ऐसी ही एक सचल-कुटिया या चल-घर के आगें तिरपाल लगी थी। मैं भीगने से बचने के लिए उसी के नीचे जाकर खड़ा हो गया। मेरी नजर कुटिया में विराजमान संत पर गई। वे ठाकुर जी के लिए प्रशाद आदि की व्यवस्था के लिए आटा गूंथ रहे थे। मैंने देखा की एक छोटे से स्थान पर एक सिंहसन रखा है। उसी के पास ₹10, ₹20, ₹50 और ₹100 के नोटों से भरी एक थाली तथा एक प्लेट में कुछ फल फ्रूट और मिठाइयां रखी थीं। उनकी नजर मुझ पर पडी तो मैंने उन्हें र...