18. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 18 || मां किसकी ? (एक अनोखा मुकदमा)

18. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 18 || मां किसकी ? (एक अनोखा मुकदमा)


मां किसकी ?
💢एकअनोखा मुकदमा💢

यह कलयुग है। इसमें क्या कुछ देखने को नहीं मिलता परंतु सतयुग की कुछ मर्यादाएं आज भी जीवित हैं। उन्हीं में से एक मैं आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं। 

अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग था। न्यायालय में एक मुकद्दमा आया जिसने सभी को झकझोर कर दिया। 
       
एक 60 साल के  व्यक्ति ने, अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा कर दिया था। मुकदमा नाम आते ही आप चौंक गए होओगे।
    
मुकदमा का मजमून कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई, अब बूढ़ा हो चला है, इसलिए वह खुद अपना ख्याल तो ठीक से रख नहीं सकता । मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है।

मैं अभी भी ठीक ठाक हूंँ, सक्ष्म हूँ। इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।
        
न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि,  "आप लोग ! माता जी को अपने साथ 15 -15 दिन के लिए रख लो।"
    
मगर बड़ा भाई टस से मस नहीं हुआ । उसने न्यायाधीश महोदय को जो दलील दी वह इस प्रकार थी। , " जज साहब ! मैं ! अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ ? अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो उन्हें आप अवश्य ही छोटे को दे सकते हैं।?
      
छोटा भाई की दलील थी कि,  " जज साहब ! माता जी पिछले 35 साल से, बड़े भाई जी के पास हैं। जब से मैं नौकरी के लिए बाहर गया तब मां ने मेरे साथ वहां जाना उचित नहीं समझा।" 

छोटा भाई चुप रहा और फिर बोला, " और भाई हैं कि अकेले ही सेवा किये जा रहे हैं, जज साहब आप ही बताइए की आखिर मैं अपना  कर्तव्य कब पूरा करूँगा? जबकि आज मैं स्थायी हूं, बेटा बहू सब है, तो मां भी तो चाहिए।"
          
परेशान  न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये, मगर कोई हल नहीं निकला। आखिर में उन्होंने बुजुर्ग मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया।मां अब महा कहां रह गई थी वह तो केवल कुल मिलाकर 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी काया वाली औरत थी ।  

जज साहब ने पूछा, " मां जी ! मैं तो इस अनोखे मुकदमे का निर्णय लिखने में असमर्थ हो गया हूं अब आप ही इसके निर्णय में मेरी सहायता कीजिए।" मां चुपचाप जज साहब की बात सुनती रही।

न्यायधीश जज साहब बोले, "मां ! आप ही निर्णय करें कि आप किसके साथ रहना चाहती है।"
      
उसने दुखी दिल से कहा, " जज साहब ! "

जज साहब ने हाथ जोड़कर मां से प्रार्थना की, "मां ! आप मुझे भी बेटा ही कह कर बुला सकती हैं । यदि आप मुझे बेटा कह कर पुकारेंगी तो मैं खुद को सौभाग्यशाली समझुंगा।" 

" बेटा ! मेरे लिए दोनों संतान  बराबर हैं। मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर, दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती।" मां ने एक निगाह जज साहब पर डाली। 

और पुनः बोली, "साहब ! आप तो न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है। जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।"

न्यायधीश महोदय कहने लगे, " मां ! अगर भाई भाई में विवाद हो तो, इस स्तर का हो। परंतु यहां तो विवाद भी दूसरे तरीके के आते हैं कि 'माँ तेरी है या बाप तेरा है। इन्हें मैं नहीं रखूंगा, तू नहीं रखेगा तो इन्हें मैं भी नहीं रखूंगा की लड़ाई होती है। और जब फैसला हुआ तो पता चलता है कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं । मेरे विचार से यह पाप है। '
   
धन, दौलत, गाडी, बंगला आदि सब होकर भी यदि माँ बाप सुखी नही तो आप से बडा पापी भी कोई नहीं, आपका पुण्य जीरो (0) है जीरो ।'
             
आखिर में न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से  कुछ लिखा और फिर भारी मन से अपना निर्णय दिया कि न्यायालय दोनों भाइयों की भावनाओं का सम्मान करता है । परंतु हम छोटे भाई की भावनाओं से अधिक सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।
   
फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा ।

"जज साहब ! इसी में एक और आदेश जुड़वाना चाहूंगा। जहां मां रहेगी वहीं बड़ा भाई भी रहेगा ताकि मुझे इन दोनों की सेवा करने का मौका मिल सके।  

यह सब देख अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी गदगद हो गए।
        
लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
20/3/18/8/2021

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