06. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 06 || दही का इन्तजाम
06. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 06 || दही का इन्तजाम जब हरीश लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पत्नी की दी हुई भेंट पुत्र के रूप में मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी। पुत्र जब वयस्क हुआ तो हरीश ने अपना पूरा का पूरा कारोबार पुत्र के शोंप दिया और समय मिलने पर बेटे की काम में हाथ बटाते। वे अपना बचा हुआ समय कभी पूजा पाठ में तो कभी अपने दोस्तों के ऑफिस में बैठकर व्यतीत करने लगे। हरीश ने अपने पुत्र की शादी एक गरीब किंतु सुशील लड़की से कर दी । शादी के बाद हरीश और अधिक निश्चिंत हो गये। इसके बाद पूरा का पूरा घर बहू के सुपुर्द कर दिया। पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद हरीश दोहपर में खाना खा रहे थे, इसी समय पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। "बहू ! आज तुमने खाने के साथ दही नहीं दी।" हरीश ने बहु से पूछा। "पिताजी ! वह खत्म हो गया है।" बहू ने जवाब दिया। "चलो , कोई बात नहीं।" कहकर हरीश खाना खाने लग ...