20. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 20 || आप मेरे पापा बनोगे

 20. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 20 || आप मेरे पापा बनोगे


अनाथ बच्चों की देखभाल करने वाली एक संस्था जिसमें कुछ लोग शामिल है। ये लोग आश्रम में आए अनाथ बच्चों का अपने बच्चों की तरह ही लालन पालन करते हैं। वे किसी भी बच्चे से खुद को अंकल नहीं, पापा कहलवाते हैं। ताकि बच्चों को उनसे अपनापन मिल सके।

इसलिए संस्था में रहने वाले सभी बच्चे वहां के प्रबंधकों को पापा कहकर पुकारते हैं। इस संस्था में 6 या 7 वर्ष की एक बच्ची और है। जिसका नाम संस्था ने स्नेहा रखा हुआ है। वह बच्चे इतनी प्यारी है कि उसने अनाथ आश्रम के सभी कार्यकर्ताओं का दिल जीत रखा है। संस्था के सभी लोग स्नेहा को बहुत प्यार करते हैं। 

बच्ची बड़ी ही सुंदर और शांत स्वभाव की है लेकिन जब वह बोलती है तो ऐसा लगता है जैसे उसके मुख से मोती झड़ रहे हो। इसलिए कोई भी उससे बातें किए बिना नहीं रहता।

जैसा कि मैंने बताया कि यह एक संस्था है इसका अर्थ यह हुआ कि यहां केवल अनाथ बच्चे ही हैं। जो लावारिस मिलने पर इस संस्था में लाए गए हैं। स्नेहा भी इन्हीं बच्चों में से एक है।
 
स्नेहा गली की बच्चों के साथ भी घुली मिली हुई है। वह उन बच्चों के साथ भी खूब खेलती है। उसका एक रूटीन है कि वह कुछ समय के लिए अनाथ आश्रम के बाहर बने हुए चबूतरे पर बैठ जाती है। और लोगों को बड़े ध्यान से देखती रहती है।

एक दिन वहां से गुजर रहे रमेश नाम के एक व्यक्ति को उसने रोका। वह बोली, "अंकल, अंकल ! यहां आओ, न ।"

बच्ची की आवाज को सुनकर रमेश रुक गया और उस बच्ची की ओर देखने लगा। उस बच्ची की आवाज की मिठास से वह अपने आप को रोक नहीं सका और वह अनायास ही बच्ची की तरफ खिंचता चला गया। और जैसे ही वह उस बच्ची के पास जाकर खड़ा हुआ तो वह बच्ची फिर से बोली, "अंकल, अंकल ! कुछ बोलूं।"

"हां, बेटा ! बोलो।" रमेश ने कहा

"आप मेरे पापा बनेंगे ?"

बच्ची का प्रश्न सुनकर रमेश ठगा सा रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस बच्ची को क्या जवाब दें। फिर भी वह मुस्कुराया। उसने प्यार से बच्ची के सिर पर हाथ फैराया और चला गया।

रमेश का भरा पूरा परिवार है, जिसमें उसके अपने तीन बच्चे हैं। वह चौथे बच्चे को कैसे शामिल करें? वह इस कथन को बच्ची का मजाक समझ कर हंसते हुए और बाय-बाय करते हुए चला गया।

बच्चे ने भी मुस्कुराकर, "बाय-बाय अंकल" कहकर अपना हाथ हिला दिया।

अगले दिन फिर से रमेश ने बच्ची को अपने अंकल अर्थात रमेश का इंतजार करते पाया। वह बच्ची रमेश का इंतजार कर रही थी।

बच्ची के मुख पर प्रसन्नता की लहर दिखाई दौड़ गई जैसे उसे कुछ मिल गया हो। अरे हां, उसे मिल जो गया था उसके अंकल सामने से आ रहे थे। 

अंकल भी उसे देख कर मुस्कुरा दिए। बच्ची ने हाथ के इशारे से अंकल को फिर पास बुलाया। अंकल उसके आग्रह को टालकर मुस्कुराते हुए बिना रुके आगे चले गए। 

बच्ची फिर से जोर से बोली, बाय-बाय अंकल"

अब यह रोजाना का काम हो गया था। स्नेहा अपने अंकल का इंतजार करती उन्हें अपने पास बुलाने का इशारा करती और फिर अंकल मुस्कुरा कर अपना हाथ हिला कर आगे बढ़ जाते।

एक दिन न जाने क्यों उसके अंकल उसके आग्रह को नहीं टाल सके और बच्ची के पास खिंचे चले गए। जैसे उसके साथ कोई रिश्ता हो। 

वह बच्ची पुनः बोली, "अंकल, अंकल ! आप मेरे पापा बनेंगे ?  प्लीज ।"

रमेश ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरा और बोला, "बिटिया, मैं तुम्हारा पापा नहीं बन सकता। मेरे घर पर मुझे पापा कहने वाले हैं।"

"तो मेरे भी बन जाओ ना, प्लीज।" 

"नहीं बेटा ! मेरी मजबूरी समझो।"

"अंकल! आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं आप मेरे पापा बनिए न। बहुत अच्छा लगेगा ।" लड़की ने कहा। इस बात पर वह उसे अनसुना करते हुए आगे निकल गया।

लेकिन आने जाने का वह एक मार्ग था। अब यह प्रक्रिया पुनः शुरू हो गई। वह बच्ची रोजाना पुकारती, " अंकल अंकल।" और अंकल उसे अनदेखा कर के चला जाते। 

एक दिन अंकल अर्थात रमेश का स्नेह जागा और उसके पास आकर बैठ गया बोला, "बिटिया ! मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि मैं तुम्हारा पापा नहीं बन सकता क्योंकि मेरे तीन बच्चे पहले ही हैं। मैं उनका पापा पहले हूं।" 

"तो क्या? आप मेरी भी पापा बन जाओ।"

"नहीं, मैं उन बच्चों के प्यार को बांट नहीं सकता। इसलिए मैं तुम्हारा पापा नहीं बन सकता।"

वह बच्ची रोने लगी। उसने कहा, "उनके साथ आप मेरे भी पापा बनो, न अंकल।" बच्ची का रोना देखकर उसका दिल पिघल गया। उसकी आंखें खुद भर आई। इनके चारों तरफ लोग इकट्ठे हो गए और उसे बच्चे उठाने वाला समझने लगे। 

इस पर वह बोला, "बिटिया ! मैं तुम्हारा पापा नहीं बन सकता।" कह कर वह जाने लगा। यह सुनकर बच्ची ने रमेश का पैर पकड़ लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, तो लोगों ने उसे पकड़ लिया। 

शोर-शराबा सुनकर संस्था के लोग बाहर आ गए रमेश बच्ची को समझाने में लगा हुआ था " ये लोग मुझे गलत समझ रहे हैं। मुझे जाने दो । "

संस्था के लोग उसे अपने साथ अंदर ले गए और और सारा मामला पूछने लगे। "भाई साहब ! आपका शुभ नाम क्या है ?"

"रमेश " रमेश ने उत्तर दिया।

"रमेश भाई ! आप तो जानते ही हैं कि यह रास्ता मुख्य रास्ता है और यहां से सैकड़ों की संख्या में लोग आते जाते हैं, लेकिन इस बच्ची ने आप ही को पापा बनाने के लिए क्यों चुना। समझ नहीं आता।" 

तभी एक अन्य बोला, "लगता है पूर्व जन्म का कोई रिश्ता है।" सुनकर सभी ठहाका लगाकर हंस दिए, लेकिन रमेश कुछ गंभीर हो गया।

तभी तीसरा व्यक्ति बोला, " रमेश भाई ! आप समझदार हैं ‌। यह तो बच्ची है मात्र 6 या 7 साल की है। इसकी इच्छा है कि यह हम सब को पापा बोले, तो यह हम सबको पापा बोलती है।" उसने एक लंबी सांस ली।

"अब हम सब इसके पापा हैं। कितनी सुंदर और प्यारी बच्ची है परंतु इस दुनिया में इसका कोई नहीं है, इसे थोड़ी सी खुशी मिल जाए। बस, हम यही प्रयास करते हैं।" 

तभी एक व्यक्ति ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उससे आग्रह किया, "आप भी बन जाइए । क्या फर्क पड़ता है?" 

रमेश को अपनी लाडो की याद आ गई। कितने कष्ट में थी लाडो। वह आज जिंदा भी होगी या नहीं। सोचते हुए उसकी आंखें भर आई। "वह भी इतनी ही बड़ी होती।" कहकर बड़बड़ाया।

रमेश घुटनों के बल बैठ गया और उसने अपने दोनों हाथ खोल दिए, बच्ची को इसी बात का इंतजार था वह दौड़ कर आई और रमेश के गले लग गई। 

इसके बाद बच्ची रमेश को पापा कहने लगी और रमेश लाडो। 

रमेश अब लाडो के लिए खेल खिलौने और चीजें लाने लगा। यह रोज का कार्य हो गया। संस्था के अन्य बच्चों में इससे हीन भावना पैदा होने लगी। यह बात संस्था वालों को अब ठीक नहीं लगी। 

उन्होंने रमेश से कहा, " रमेश भाई ! कभी कभी तो ठीक है लेकिन रोज-रोज ऐसा अच्छा नहीं है। दूसरे बच्चे भी हैं। उनमें हीन भावना पनपने लगी है। दूसरी बात, अगर यह आपके साथ जाने की जिद करने लगी तो हमें इसे यहां रखना मुश्किल हो जाएगा। लड़की जात है।" 

रमेश उनकी बात को ध्यान से सुन रहा था। " तुम इसे गोद क्यों नहीं ले लेते। पता नहीं इसका तुमसे क्या नाता है, शायद पूर्व जन्म में तुम इसके पिता रहे हो। इसीलिए यह तुम्हारे पीछे पड़ी हुई है। "

रमेश बोला, "भाई जी ! मैं इसे गोद नहीं ले सकता। मेरे तीन बच्चे और हैं। मुझे नहीं मालूम कि यह बच्ची कौन है? शायद आप में से ही किसी की है?"

"नहीं, यह हमारी बच्ची नहीं है।" 

तभी पास से गुजर रही रमेश की पत्नी ने अचानक अनाथ आश्रम के अंदर झांका तो पाया अंदर रमेश खड़े हुए हैं और एक बच्ची उनकी पेंट को कसकर पकड़े हुए हैं।

वह सीधे रमेश की तरफ चल दी। उसने सुना कि बच्ची बोल रही है, "पापा, पापा ! मुझे अपने साथ ले चलो। न "

यह सुनते ही रमेश की पत्नी को लगा कि उसकी तो दुनिया ही लुट गई। वह जोर जोर से रोने लगी। संस्था के लोग पहले ही परेशान थे । 

रमेश अपनी पत्नी को सामने देखकर हक्का-बक्का रह गया। उसके समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

"तो तुम्हारा एक रूप यह भी है।", रमेश की पत्नी बोली। 

"नहीं, मेरी बात समझने की कोशिश करो।" 

"मुझे कुछ नहीं समझना है और अब मुझे तुम्हारे साथ भी नहीं रहना है, रखो अपने तीनों बच्चों को अपने पास। अब मैं यहां से सीधे अपने मायके जाऊंगी।" रमेश की पत्नी बोली।

रमेश ने अपना सिर पकड़ लिया। संस्था के सभी लोग रमेश की पत्नी को समझाने के लिए दौड़े लेकिन वह एक भी बात मानने के लिए तैयार नहीं हुई।

सब अपनी अपनी उलझन में उलझे हुए थे। रमेश की पत्नी रमेश पर ब्लेम लगा रही थी। रमेश और संस्था के लोग उसे समझाने का प्रयास कर रहे थे, जबकि इस झगड़े से दूर वह छोटी बच्ची रमेश की पत्नी को ध्यान से देख रही थी। शायद उसे पहचानने की कोशिश कर रही थी। 

रमेश की पत्नी रोए जा रही थी और रमेश को कोसती भी जा रही थी। वह संस्था के लोगों की बात सुनने के लिए तैयार नहीं थी। तभी रमेश ने एक निर्णय लिया।

"ठीक है, यदि मेरी पत्नी भी मुझे गलत समझ रही है तो मैं इस बच्ची को गोद लेने के लिए तैयार हूं। आज से यह लाडो मेरे साथ रहेगी जिसे जहां जाना है वह चला जाए।"

"खबरदार, जो उसका नाम लिया तो, यह हमारी लाडो नहीं है। वह तो बहुत बीमार थी अब तक मर भी गई होगी।"

"वह बच्ची सीधे रमेश की पत्नी के पास पहुंची और उसके आंसू पौछने लगी बोली, "मां ! मुझे फिर से मत छुड़वाना। मां मुझे घर ले चलो। मुझे भैया से मिलना है। उनके साथ खेलना है। मां मुझे फिर मत छुड़वाना, प्लीज़।" 

बच्ची के शब्द सुनकर रमेश की पत्नी रोना भूल गई और वह बच्चे को ध्यान से देखने लगी जो उसकी साड़ी खींच रही थी।

"बेटा! तुम यह क्या कह रही हो?"

"मां ! मैं आपकी बेटी, लाडो हूं । जिसे पापा घुमाने ले गए थे और गुम हो गए। फिर न जाने कहां चले गए थे। मैं बहुत रोई थी मां, अब मिल गए हो तो अब और मत रुलाओ।" 

वह बच्ची रोने लगी, " पता है, मैं कितना रोई थी, उस दिन । कई दिन तक खाना भी अच्छा नहीं लगा था । तब ये पापा आए और उन्होंने मुझे समझाया और खाना खिलाया।"

उसने दौडकर पास खड़े हुए संस्था के दो तीन लोगों के पैर अपने दोनों हाथों के बीच कौली में भर लिए।

" मेरे ये पापा ना होते तो पता नहीं मेरा क्या होता? पापा आप सब बहुत अच्छे हो। मेरे लिए ऐसे ही बने रहना। अगर पापा मुझे फिर छोड़ेंगे तो मैं यहीं आ जाऊंगी। आप सबके पास, आप सब मुझे फिर भी प्यार करोगे न।"

"हां बिटिया, तुम तो हमारी सबसे प्यारी बिटिया हो।" उन सब ने नीचे बैठकर उसे अपने गले लगाते हुए।

"रमेश जी, तो यह आपकी बेटी है। इसने आपको पहचान ही लिया इसीलिए आपको पापा बनाना चाह रही थी।"

रमेश ने हाथ जोड़ लिए। " हमें माफ कर दो साहब। हम डर गए थे । हमसे इसका कष्ट देखा नहीं जा रहा था। इसलिए ऐसा कदम उठाया।"

"जानते हो, आपने क्राइम किया है । आपने एक ऐसी बच्ची को मरने के लिए छोड़ दिया जो उस समय बहुत अधिक परेशान थी । और उसे आपकी बहुत जरूरत थी। इसके लिए आप दोनों को सजा भी हो सकती है।"

रमेश भी टूट गया । वह घुटनों के बल बैठ गया। उसने बच्ची की तरफ देखते हुए, अपने दोनों हाथ हवा में फैला दिए। बच्ची दौड़ कर आई और रमेश के गले से लिपट गई।

उसने बच्ची को अपने बाहों में भर कर गले से लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगा, बिटिया, हमें माफ कर देना। हम तुम्हारा इलाज नहीं करवा पा रहे थे। डॉक्टरों ने भी बोल दिया था कि सारी जिंदगी तुम अपाहिज बन कर रहोगी, तो हम डर गए थे। इसलिए हमने ऐसा कदम उठाया। हमें माफ कर देना। 

इसी के साथ रमेश की पत्नी भी झुककर बच्ची के पैर पकड़ लिए।

" लाडो, मेरी लाडो, मुझे माफ कर दो। मैंने मां होकर भी अपने जिगर के टुकड़े को अलग कर दिया। मैं उसी दिन मर क्यों नहीं गई। मुझसे बड़ी डायन कोई और नहीं हो सकती। मुझे माफ कर दे बेटा।"

हर कोई जो इस मेल मिलाप को देख रहा था उनकी आंखें नम थी।

संस्था के लोग बोले, "रमेश जी ! अब आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब आपकी लाडो बिल्कुल ठीक है। अब इसे कोई बीमारी नहीं है। इस संसार में अच्छे लोग भी हैं, उनमें से कुछ लोगों के सहयोग ने इसका इलाज करवा दिया है। अब आप चाहें तो इसे गोद ले सकते हैं।

"नहीं ! यह कहीं नहीं जाएगी। लाडो हमारी बिटिया है और हमारे साथ ही रहेगी।" बाहर एक गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक व्यक्ति उतरा जो डॉक्टर की तरह गले में स्टैथोस्कोप डाले हुए था। 

"आ बेटा स्नेहा ! हमारे साथ चल।"

"डॉक्टर अंकल" बोलते हुए स्नेहा उसकी ओर दौड़ गई और पास पहुंचते ही अपने गोदी में ले लिया।

"जो लोग, अपनी ही बच्ची को ही गोद लेने के लिए कह रहे हैं।उनका क्या भरोसा कि कल यदि बीमारी फिर से लौट आई तो उसे फिर से मरने के लिए नहीं छोड़ देंगे।"

"रमेश जी ! इस बच्ची को ठीक करने में इनका बहुत बड़ा हाथ है। और ये इसके दूसरे पिता है। जिन्होंने इसे दूसरा जन्म दिया है।"

स्नेहा बेटा तुम ही बताओ तुम किसके साथ जाना चाहोगे। मेरे साथ या अपने माता पिता के साथ।

"हां, मैं इसे गोद अवश्य लुंगा।" दोनों के मुख उतर गए ।

आप सब हमारे लिए भगवान बन कर आए हैं। आपने हमारी बिटिया को नया जीवन दिया है। हम आपका एहसान कभी नहीं भूलेंगे। अगर डॉक्टर साहब इसे ले जाना चाहते हैं तो हमें खुशी होगी। वही इसके वास्तविक पिता है। हमने तो पिता होने का हक उसी दिन खो दिया था जिस दिन हमने उसे मरने के छोड़ दिया था।"

बस आज का दिन हमारी लाडो के नाम दें दो। जानते हो आज क्या है ? आज हमारी लाडो का जन्मदिन है। इसने, आज से 6 साल पहले, इसी दिन, इसी समय जन्म लिया था और आज इसी समय यह हमें पुनः मिली है। यह इसका पुनर्जन्म है।"

संस्था के लोगों ने रमेश की पीठ थपथपाई। वह बोला आज शाम को हमारी बिटिया का जन्मदिन है और इसी संस्था में धूमधाम से मनाया जाएगा । आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

तभी उन्हें बच्ची की आवाज सुनाई दी, "अंकल अंकल अब तो मां भी मान गई। अब तो आप मेरे पापा बनोगे न।"

कहकर बच्ची घुटनों के बल हाथ जोड़ कर बैठ गई।

रमेश और उसकी पत्नी दोनों उसे गोद में उठाने के लिए दौड़े। डॉक्टर के सबकी आंखों में आंसू थे।


लेखक

ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
11.30/7/17/10/2021

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