51009.10 || दशम कहानी || नरवाहन दत्त और शक्तियसा का विवाह।

51009.10 || दशम कहानी || नरवाहन दत्त और शक्तियसा का विवाह।

दशम तरंग

तब दूसरे दिन फिर रात में, मनोरंजन के लिए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त के लिए यह कथा सुनाई ।।।१॥

प्राचीन समय में धारेश्वर नामक शिव-क्षेत्र में बहुत-से शिष्यों द्वारा सेवित एक महामुनि रहता था ।॥२॥

किसी समय उस मुनि ने, अपने शिष्यों से कहा- 'तुम लोगों में से किसी ने कोई अपूर्व कुछ देखा या सुना हो, तो बताओ' ॥३॥

मुनि के ऐसा कहने पर एक शिष्य बोला- 'मैने जो कुछ नया सुना है, उसे कहता हूँ, सुनिए' ॥४॥

कश्मीर देश में विजय नाम का विशाल शिव-क्षेत्र है। उस क्षेत्र में एक विद्याभिमानी संन्यासी था ।।५।।

एकबार वह संन्यासी 'मैं सब स्थानों पर विजयी होऊँ, ऐसी कामना करता हुआ शिवजी को प्रणाम करके शास्त्र-वाद (शास्त्रार्थ) के लिए पाटलिपुत्र की ओर चला ॥६॥

रास्ते में जंगलों, नदियों और पहाडों को लांघता हुआ वह एक सुनसान वन में पहुंचकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥७॥

कुछ ही समय के पश्चात् बावली से शीतल उस स्थान पर उसने लम्बी यात्रा के कारण धूल से भरे, सोंटा और कुंडी हाथ में लिये हुए एक धार्मिक पुरुष को देखा ।।८।।

उसके वहाँ बैठ जाने पर उस संन्यासी ने उससे पूछा- तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो?' तब उस धार्मिक ने उत्तर दिया- ॥९॥

'भाई, मैं विद्या के केन्द्र पाटलिपुत्र से आ रहा हूँ और कश्मीर के विद्वानों को शास्त्रार्थ में जीतने के लिए वहाँ जा रहा हूँ' ।॥१०॥

उस धार्मिक की बात सुनकर वह साधु सोचने लगा कि यहीं पर मैंने यदि इसी एक पाटलिपुत्रवाले को शास्त्रार्थ में न जीत लिया, तो पाटलिपुत्र जाकर अन्य बहुतों को कैसे जीतूंगा ऐसा सोचकर उस साधु ने, उस धार्मिक पर आक्षेप करते हुए कहा-॥११-१२॥

'है धर्मशील, तुम्हारा यह विपरीत विचार कैसे हुआ? कहाँ तो तू मुक्ति चाहनेवाला धर्मशील व्यक्ति और कहाँ रागद्वेष आदि व्यसनों से युक्त शास्त्रार्थी ॥१३॥

शास्त्रार्थ के अभिमान-रूपी बन्धन से तू संसार से मुक्ति चाहता है। तेरी यह युक्ति अग्नि से गरमी को और हिम से सरदी को शान्त करने के प्रयत्न के समान है। इस प्रकार अरे मूर्ख, तू पत्थर की नाव से समुद्र पार करना चाहता है और जल की अग्नि को, वायु से शान्त करना चाहता है ।।१४-१५।।

ब्राह्मण का स्वाभाविक धर्म क्षमा है और क्षत्रिय का धर्म शरणागत की रक्षा करना। मुमुक्षु (मोक्ष चाहनेवाले) का धर्म शान्ति है और राक्षसों का घर्म कलह है ।।१६।।

इसलिए, मोक्षार्थी को शान्त और दान्त (संयमी) होना चाहिए। रागद्वेष के दुःख को दूर करना चाहिए और सांसारिक क्लेशों से डरना चाहिए ॥१७॥

इसलिए, श्रम-रूपी कुठार से, इस संसार-रूपी वृक्ष को काटो। उसे विपरीत विवाद-रूपी अभिमान के जल का सिंचन न दो ॥१८॥

उस साधु से इस प्रकार कहा गया वह धार्मिक सन्तुष्ट हुआ। उसे प्रणाम करके 'आप मेरे उपदेष्टा गुरु हैं, ऐसा कहकर पीछे की ओर लौट गया ।॥१९॥

और वह हँसता हुआ संन्यासी उसी, वृक्ष के नीचे बैठा रहा और उसने वृक्ष के अन्दर से अपनी स्त्री के साथ विनोद करते हुए उस वृक्ष-निवासी यक्ष की बातचीत सुनी ॥२०॥

साधु ने कान लगाकर सुना कि यक्ष ने हँसी-हँसी में माला से स्त्री को मारा। इतने में ही उस धूर्त्ता स्त्री ने, अपने को झूठे ही मृतवत् बना लिया और उसके परिवार के व्यक्ति, रोते-चिल्लाते हुए स्तब्ध हो गये ॥२१-२२॥

बहुत समय के पश्चात् मानों फिर से जीवन आने पर उसने आँखें खोलीं, तब उसके पति ने उससे पूछा कि तूने इतने समय तक आँखें बन्द करके क्या देखा? ॥२३॥

तब वह झूठ ही कहने लगी कि 'जब तूने माला से मुझे मारा, तब मैं चेतना-हीन हो गई और मैंने एक काले पुरुष को आये हुए देखा ॥२४॥

वह पुरुष डरावना और लम्बा था, उसके शिर के केश खड़े थे। वह इतना काला था कि उसकी छाया से चारों ओर अंधेरा हो रहा था। उसके हाथ में पाश था और आंखें उसकी जल रही थी ॥२५॥

उस दुष्ट द्वारा मैं यम के घर ले जाई गई। किन्तु, वहाँ जाने पर उसके अधिकारियों से मैं छुड़ा दी गई ॥२६॥

यक्षिणी के ऐसा कहने पर यक्ष हंसता हुआ बोला- आश्चर्य है कि माया के बिना स्त्री की कोई भी चेष्टा नहीं होती ॥२७॥

भला, पुष्पों की मार से कैसी मृत्यु और यम-मन्दिर से लौटना कैसा? अरी मूखें, तूने तो पाटलिपुत्र की स्त्रियों का अनुकरण किया ॥२८॥

उस (पाटलिपुत्र) में सिंहाक्ष नाम का जो राजा है, उसकी रानी किसी समय मन्त्री, सेनापति, पुरोहित और वैद्य की पत्नियों के साथ शुक्लपक्ष की त्रयोदशी के दिन, पाटलिपुत्र को अनुगृहीत करनेवाली सरस्वती के दर्शन को गई ।॥२९-३०।।

उस यात्रा के मार्ग में बहुत-से, कुबड़े, अन्धे, कोढ़ी और पंगु रोगी भीख माँग रहे थे। उन्होंने उन स्त्रियों से प्रार्थना की कि 'हम रोग से पीड़ित अनाथों को ओषधि दो, जिससे हमलोग इन रोगों से छूट सकें। पीड़ितों और दीनों पर दया करो। हमारी रक्षा करो।॥ ३१-३२॥

यह संसार, बिजली की चमक के समान, क्षण-भर में नष्ट होनेवाला है और यात्रा, मेला आदि उत्सव भी, क्षण-भर के लिए ही सुन्दर हैं ।॥३३॥

इसलिए, संसार में सार यही है कि दीनों पर दया करना और दरिद्रों को दान देना। गुण-वान् व्यक्ति कहाँ नहीं सुख भोगता ? ॥३४।।

धनवाले को दान देने से क्या लाभ ? तृप्त को भोजन देने से क्या फल ? शीत से काँपते हुए को चन्दन से क्या लाभ और शीतकाल में वर्षा की क्या आवश्यकता ? ॥३५॥

अतः, हम इन दुःखियों का उद्धार करो। हमारी रोग-रूपी आपत्ति को दूर करो।' उन दुःखियों से इस प्रकार कही गई उन स्त्रियों ने, आपस में कहा-'ये दुःखी ठीक और उचित कह रहे हैं। इसलिए, हम लोगों को अपना सर्वस्व त्याग कर भी इनकी चिकित्सा करनी चाहिए' ।।३६-३७।।

आपस में इस प्रकार विचार कर और सरस्वती देवी की पूजा करके वे स्त्रियाँ उन रोगियों को, अलग-अलग अपने-अपने घरों में ले गई ॥३८॥

और, सर्वसमर्थ अपने-अपने पतियों को प्रेरित करके उनकी चिकित्सा कराती हुई सदा उनके पास बैठी रहती थीं ।॥३९॥

दिन-रात सहवास के कारण उत्पन्न काम-वासना से वे ऐसी हो गई कि सारे संसार को तन्मय देखने लगीं ।॥ ४० ॥

कहाँ ये दरिद्र रोगी, और कहाँ मन्त्री, सेनापति आदि उनके पति, काम-वासना से अन्धा किये हुए उनके मन ने, यह विचार नहीं किया ॥४१॥

तदनन्तर, रोगियों के लिए असंभव संभोग से चिह्नित उन स्त्रियों के शरीरों में, नखक्षत और दन्तक्षत आदि उनके निजी पतियों ने देखे ॥४२॥

तब वे राजा मन्त्री, पुरोहित, वैद्य आदि परस्पर मिलकर बड़ी सावधानी से सन्देह के साथ चर्चा करने लगे ॥४३॥

तब राजा ने दूसरों से कहा-'अभी आपलोग ठहरिए। आज मैं युक्ति से अपनी स्त्री से पूछता हूँ ॥४

ऐसा कह‌कर उन सब को विदा करके, अपने वास-भवन में जाकर स्नेह और भय दिला-कर राजा ने रानी से पूछा- ॥४५॥

'यह तुम्हारे ओठ को किसने काटा। तुम्हारे स्तनों को नखों से किसने क्षत किया। यदि सच कहती है, तो ठीक है, अन्यथा तेरा कल्याण नहीं' ॥४६॥

राजा से इस प्रकार कही गई रानी ने झूठी बात बनाकर कहा- बात तो कहने योग्य नहीं है, फिर भी मैं धन्य हूँ कि तुम्हें आश्चर्य की बात कहती हूँ, सुनो ॥४७॥

यह सामने दीखती हुई चित्र की दीवार से रात को हाथ में गदा लिये हुए एक पुरुष निकल कर मेरा उपभोग करता है और प्रातःकाल उसी दीवार में विलीन हो जाता है। मेरे जिस अंग को कभी सूर्य और चन्द्र ने भी नहीं देखा, वहाँ वह पुरुष, तुम्हारे रहते हुए भी, मेरे साथ ऐसा कार्य करता है ।॥४८-४९॥

इस प्रकार मानों दुःख से कहती हुई रानी की बात सुनकर उस मूर्ख राजा ने उसे विष्णु भगवान् की माया मानकर विश्वास कर लिया ॥५०॥

और मन्त्री, सेनापित आदि की स्त्रियों ने भी, अपने-अपने पतियों से इसी प्रकार कहा और उन लोगों ने भी उन्हें भगवान् की भोगी हुई जानकर शान्ति प्राप्त की ॥५१॥

'इस प्रकार वे दुष्ट स्त्रियाँ, झूठी बात बनाने में चतुर होती हैं और अपने-अपने पुरुषों को ठग लेती हैं; किन्तु मैं ऐसा मूर्ख नहीं' ।॥५२॥

यक्ष ने, इस प्रकार अपनी पत्नी कहकर उसे हतप्रभ कर दिया। उस संन्यासी ने वृक्ष के नीचे बैठे हुए उनकी सभी बातें सुन लीं। तब संन्यासी ने हाथ जोड़कर यक्ष से निवेदन किया कि 'हे भगवन् ! मैं सन्यासी आपकी शरण में हूँ। आपकी बात मैंने (चुपके-से) सुनली, इसके लिए क्षमा करें।' सन्यासी के ऐसा कहने पर सच बोलने के कारण यक्ष उस पर प्रसन्न हो गया ॥५३-५५।।

और बोला- 'मैं सर्वस्थानगत नाम का यक्ष हूँ, तुम्हारे लिए प्रसन्न हूँ। तू मुझसे वर माँग' ॥५६॥

उस साधु ने भी कहा-'तुम अपनी पत्नी पर व्यर्थ क्रोध न करना, यही मेरा वर हैं' ।॥५७॥

तब वह यक्ष बोला- 'मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिए, मैंने तुम्हें यह वर दिया और दूसरा वर फिर माँगों ॥५८॥

तब प्रव्राजक (साधु) बोला- 'आज से तुम दोनों स्त्री-पुरुष, मुझे अपना पुत्र मानो' ।॥५९।।

यह सुनकर वह यक्ष स्त्री के साथ प्रत्यक्ष हुआा और बोला- 'पुत्र, तुम हम दोनों के पुत्र हो ॥६०॥

हमारी कृपा से तुझे कहीं भी और कभी कष्ट न होगा। शास्त्रार्थ में, झगड़े में और जूए में तू सदा विजयी रहेगा' ॥६१॥

ऐसा कहकर अन्तर्धान हुए यक्ष को प्रणाम करके और रात्रि व्यतीत करके वह संन्यासी पाटलिपुत्र को गया ।॥६२॥

वहाँ जाकर उसने द्वारपाल द्वारा राजा सिंहाक्ष को कश्मीर से आया हुआ शास्त्रार्थी बताकर सूचित करा दिया ॥६३॥

तब राजा के द्वारा बुलाये जाने पर सभा में जाकर उसने वहाँ के राजपंडितों को शास्त्र-चर्चा के लिए ललकारा ॥६४।।

वहाँ यक्ष के वर के प्रभाव से उसने, पंडितों को जीतकर राजा के सामने फिर यह प्रश्न किया--।।६५।।

'चित्रवाली दीवार से निकलकर गदा और चक्र लिये हुए पुरुष दाँतों से अधरोष्ठ में और नखों से स्तनों में क्षत करके स्त्रियों का उपभोग करता है और फिर उसी दीवार में लीन हो जाता है, यह क्या है? इसका उत्तर दीजिए ॥६६-६७।।

उसके इस वचन को सुनकर पंडित इसका उत्तर न दे सके और वास्तविक रहस्य को न जानते हुए एक दूसरे का मुँह ताकने लगे ॥६८॥

तब राजा सिंहाल ने संन्यासी से कहा- 'आपने यह जो भी कुछ कहा है, इसका स्पष्टी-करण आप ही करें' ॥६९॥

यह सुनकर, उस परिव्राजक ने, रानी के सभी कपट-चरित्र को, राजा से कह सुनाया, जो उसने यक्ष से सुना था ।।७०।।

और राजा से कहा कि पापों के प्रचार के मूल कारण स्त्रियों पर कभी विश्वास न करना चाहिए। तब प्रसन्न होकर राजा ने, उस साधु को अपना राज्य देना चाहा। परन्तु, अपने देश से प्रेम करनेवाले साधु ने राज्य नहीं लिया ॥७१-७२।।

तब राजा ने, उसे रत्नों से सम्मानित किया। वह साघु भी रत्नों को लेकर अपने देश कश्मीर आ गया ।॥७३॥

वहाँ वह यक्ष की कृपा से दीनता-रहित होकर सुखपूर्वक रहने लगा। वह शिष्य इस प्रकार अपनी सुनी कथा सुनाकर उस महामुनि से बोला--॥७४॥

मैंने उसी परिव्राजक (साघु) से यह नई कथा सुनी है। तब वह मुनि अन्य शिष्यों के साथ चिरकाल तक आश्चयं चकित रहा ।।७५।।

गोमुख ने ऐसा कहकर वत्सराज के पुत्र से फिर कहा- 'महाराज, इस प्रकार स्त्रियों के, विधाता के और संसार के चरित्र विचित्र होते हैं' अब ग्यारह पतियों को मारनेवाली एक स्त्री की कथा सुनो। ॥७६-७७॥

मालवा देश में, ग्राम का रहनेवाला एक गृहस्थ था। उसे दो-तीन पुत्रों के बाद एक कन्या उत्पन्न हुई। उस कन्या के उत्पन्न होते ही उस गृहस्य की पत्नी (कन्या की माँ) मर गई। उसके कुछ ही दिनों बाद उसका एक पुत्र मर गया ।।७८-७९।।

उस पुत्र के मरने के बाद ही उसका और एक भाई बैल के सींग के आघात से मारा गया। तब पिता ने उस कन्या का नाम 'त्रिमारिका' रख दिया ॥८०॥

इसलिए कि उस कुलक्षणा ने, उत्पन्न होते ही घर के तीन व्यक्ति मार दिये। क्रमशः युवावस्था में आने पर उसी गाँव में उत्पन्न हुए किसी धनवान् ने उसके पिता से त्रिमारिका को माँगा। पिता ने भी विधिपूर्वक विवाहोत्सव करके कन्या उसे दे दी ॥ ८१-८२॥

वह कन्या कुछ दिनों तक उस पति के साथ रही। तदनन्तर, कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति मर गया ।॥८३॥

उसके कुछ ही दिनों के उपरान्त उस चंचला ने दूसरा पति कर लिया। किन्तु कुछ ही समय बाद वह भी मर गया ।॥८४॥

तब जवानी से उन्मत्त उसने, तीसरा पति कर लिया; किन्तु उस पति-पातिनी का बह पति भी, पहले पतियों के समान ही मर गया ॥८५॥

इस प्रकार उसके क्रमशः दस पति मर गये। तब लोगों ने हँसी-हँसी में उसका नाम 'दश-मारिका' रख दिया और इसी नाम से प्रसिद्ध कर दिया ॥८६॥

तदनन्तर, नया पति करने के लिए लज्जित पिता ने, उसे रोक दिया। तब अन्यान्य लोगों से भी इसी प्रकार मना की गई वह अपने पिता के घर पर ही रहने लगी ॥८७॥

एक बार उस घर में उसके पिता की अनुमति से एक युवा पथिक आकर एक रात्रि के लिए ठहर गया ।॥८८॥

उसे देखकर वह दशमारिका उस पर मुग्ध हो गई और वह पथिक भी उस युवती को देखकर उसे चाहने लगा ।।८९।।

तब कामदेव से नष्ट लज्जावाली वह कन्या, अपने पिता से बोली- 'पिता, में एक और इसको अपने लिए पति के रूप में वर लेती हूँ ॥९०॥

यदि यह भी मर गया, तो मैं व्रत ले लूंगी।' पथिक के सुनते रहने पर इस प्रकार कहती हुई कन्या से उसका पिता बोला ॥९१॥

'बेटी, ऐसा न करें।। यह बहुत लज्जा की बात है। तेरे दस पति मर चुके हैं। अब इसके भी मरने पर लोग अत्यधिक हँसी करेंगे' ।॥९२॥

यह सुनकर पथिक भी लाज छोड़कर बोला- 'मैं नहीं मरूंगा। कम से मेरी भी दस स्त्रियाँ मर चुकी हैं। हम दोनों बराबर हैं। मैं शिवजी के चरणों की शपथ लेता हूँ।' उस पथिक के इस प्रकार कहने पर कौन आश्चर्य चकित नहीं हुआ ? ॥९३-९४॥

यह जानकर गाँव के पंचों ने मिलकर सम्मति प्रदान की और दशमारिका ने उस पयिक को ग्यारहवाँ पति बना लिया ॥९५।।

जब वह स्त्री, कुछ समय तक ही उस पति के साथ रही थी कि उसे शीतज्वर का आक्रमण हो गया और वह उसका ग्यारहवाँ पति भी मर गया ।॥९६॥

तब पत्थरों को भी हँसानेवाली उस एकादशमारिका ने गंगातट पर जाकर संन्यास ले लिया ॥९७॥

यह कथा सुनकर हँसते हुए नरवाहनदत्त ने गोमुख ने फिर कहा-'अब बैल से जीवन-निर्वाह करनेवाले की कथा सुनो।।९८।।

किसी गाँव में एक निर्धन कुटुम्बी पुरुष रहता था। उसके घर में एकमात्र एक बैल ही उसका धन या ॥९९।।

धनहीन वह सारे कुटुम्ब के और स्वयं भी भोजन विना उपवास करने पर भी लोभ से उस बैल को बेचता न था ॥१००॥

अन्त में दुःखी होकर वह विन्ध्यवासिनी देवी के सामने जाकर, कुश के आसन पर बैठ-कर घन की कामना से निराहार तप करने लगा ॥१०१॥

'उठ, तेरे भाग्य में सदा एक बैल ही धन है। इसलिए, उसे बेचकर तू सदा सुख से जीवन व्यतीत करेगा' ।॥१०२॥

देवी से स्वप्न में इस प्रकार आदेश दिया गया वह प्रातःकाल ही उठकर व्रत का पारण करके अपने घर चला गया ॥१०३॥

घर आकर भी, वह अधीर, उस बैल को इसलिए न बेच सका कि इसे बेच देने पर सर्वथा निर्धन होकर मैं कैसे जी सकूंगा ॥१०४।

तदनन्तर, बातचीत के प्रसंग में स्वप्न में दिये हुए देवी के आदेश को अपने बुद्धिमान् मित्र से कहा। तब उपवास से दुर्बल उससे उसके मित्र ने कहा-॥१०५॥

'अरे मूर्ख, तेरे भाग्य में एक ही बैल है। उसे बेचकर तू सदा जीवित रहेगा। देवी के इस आदेश को तूने नहीं समझा ॥१०६।।

तू इस बैल को बेचकर अपने कुटुम्ब का पालन कर। तब दूसरा बैल होगा। उसे बेचने पर तीसरा ॥१०७।।

उस मित्र से इस प्रकार कहे गये उस गँवार ने वैसा ही किया। तदनन्तर, एक-एक बैल को बेच-वेचकर वह सुखपूर्वक रहने लगा ॥१०८।।

इस प्रकार, व्यक्तित्व के अनुसार दैव सबको फल देता है। इसलिए, मनुष्य में अच्छा व्यक्तित्व होना चाहिए। सत्त्वहीन पुरुष को लक्ष्मी वरण नहीं करती ॥१०९।।

एक धूर्त और झूठे मन्त्री की कथा सुनो। दक्षिणापथ के एक नगर में पृथ्वीपति नाम का एक राजा था। उसके राष्ट्र में दूसरों को ठगने की जीविका करनेवाला कोई धूर्त रहता था। वह बहुत महत्त्वाकांक्षी होने के कारण एक बार असन्तुष्ट होकर सोचने लगा कि मेरी ऐसी घूर्तता से क्या लाभ कि जिससे केवल भोजन आदि का ही काम चल सके, जिससे अधिक-से-अधिक धन न कमाया जाय ? ॥११०-११२॥

ऐसा सोचकर और बहुत उत्तम वणिक्-वेष धारण करके वह र्भूत्त राजा के द्वार पर जाकर द्वारपाल से मिला। उसके द्वारा अन्दर प्रवेश पाकर और राजा से भेंट करके वह बोला-'महाराज, मैं एकान्त में आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। उसके बहुमूल्य वेष से प्रभावित और भेंट से आकृष्ट राजा ने, सबको हटाकर एकान्त किया। तब उस धूर्त ने राजा से इस प्रकार कहा ॥११३-११५॥

'आप प्रतिदिन, सभा में एकान्त करके एक क्षण के लिए गुप्त बातचीत किया कीजिए ॥ ११६॥

इसके लिए मैं आपको प्रतिदिन पांच सौ दीनार भेंट किया करूंगा। बस, इतनी ही प्रार्थना है। बौर कुछ नहीं ॥११७॥

यह सुनकर उस राजा ने सोचा- 'इसमें क्या हानि है? यह मेरा कुछ ले तो जायगा नहीं, बल्कि प्रतिदिन पांच सौ दीनार ही देगा ॥११८॥

इस बड़े धनी बनिये के साथ वार्तालाप करने में लाज भी क्या ?' इसलिए, राजा ने उसे स्वीकार कर वैसा ही करना प्रारम्भ कर दिया ॥११९॥

वह धूत्तं भी, अपने कथनानुसार पांच सौ दीनार राजा को प्रति दिन देने लगा और राज्य के लोगों ने, उसे राज्य के महामन्त्री पद पर प्रतिष्ठित समझ लिया ॥१२०॥

एक दिन, उस धूर्त ने किसी अधिकारी की ओर भेद-भरी दृष्टि डालकर राजा से बातचीत करनी प्रारम्भ की ॥१२१॥

बाहर निकलने पर उस अधिकारी से उससे अपने मुँह की ओर देखने का कारण पूछा, तो उसने उससे सरासर झूठी बातें कह दीं ॥१२२॥

'इसने मेरे राज्य को लूट लिया, यह समझकर राजा तुझ पर क्रुद्ध है। इसलिए, मैंने तेरा मुँह देखा। अब मैं राजा को समझाकर शान्त कर दूंगा' ।॥१२३॥

उस झूठे मन्त्री से इस प्रकार छले गये और डरे हुए अधिकारी ने, उसके घर पर आकर एक हजार दीनार उसे भेंट किये (घूस में दिये) ॥१२४॥

दूसरे दिन, उसी प्रकार राजा से बातचीत करके और बाहर निकलकर वहाँ आये हुए उस अधिकारी से धूर्त ने कहा- 'मैंने युक्तिपूर्ण बातों से राजा को तुम पर प्रसन्न कर दिया है। अब घबराओ नहीं, धीरज रखो। अब मैं तुम्हारी त्रुटियों (अपराधों) का रक्षक हूँ' ।।१२५-१२६।।

इस प्रकार स्वीकार कर उसे विदा किया और उस अधिकारी ने भी विविध प्रकार से उसकी सेवा की ॥ १२७।।

इस प्रकार, उस चतुर घूर्त ने, सभी अधिकारियों, सामन्तों, राजपुत्रों और सेवकों से भिन्न-भिन्न युक्तियों द्वारा सभी ओर से राजा से बातें करते हुए पाँच करोड़ दीनार कमा लिये ॥१२८-१२९॥

तब एकबार एकान्त में वह धूर्त मन्त्री राजा से बोला- 'स्वामिन् ! आपको पांच सौ दीनार प्रतिदिन देकर भी मैंने तुम्हारी कृपा से पाँच करोड़ दीनार कमा लिये। इसलिए, यह सोना आप ले लो। इसमें मेरा क्या है? ऐसा कहकर उसने सोना, राजा के सामने रख दिया। राजा ने भी बड़ी कठिनाई से उसमें से आधा ही घन लिया ॥१३०-१३२॥

और, उससे प्रसन्न होकर उसे महामन्त्री बना दिया। उस धूर्त ने भी धन पाकर दान और भोग में उसका उपयोग किया। १३३।।

इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति अधिक पाप किये बिना भी, घन प्राप्त कर लेते हैं। जिस प्रकार, कुंआ खोदनेवाले को फल की प्राप्ति (जल-लाभ) भी होती है और उसे दोष भी नहीं लगता है ॥१३४।।

मंत्री गोमुख राजकुमार को इस प्रकार कथा सुनाकर बोला- 'अब विवाह के लिए उत्सुक दूसरी कथा सुनो ॥१३५॥

रत्नाकर नाम के नगर में बुद्धिप्रभ नाम का एक राजा था, जो मदोन्मत्त शत्रु-रूपी हाथियों के लिए सिंह के समान था ।।१३६।।

उसकी रत्नरेखा नाम की रानी में हेमप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। वह कन्या, सारे संसार में एकमात्र सुन्दरी थी और शाप के कारण मृत्युलोक में अवतीर्ण विद्याधरी थी। वह आकाश में बिहार करने के पूर्व-संस्कार के कारण झूला झूलने में बहुत रुचि रखती थी ।।१३७-१३८॥

पिता ने गिर जाने के भय से उसे अनेक बार मना किया, किन्तु वह न मानी। तब उसके पिता राजा ने, उसे एक बार एक चांटा मार दिया ॥१३९॥

इस कारण कन्या ने, अपना अपमान समझा और जंगल में जाने की सोचने लगी। एकबार वह भ्रमण के बहाने नगर के बाहर उद्यान में गई। वहाँ सेवकों के मद्य-पान से उन्मत्त हो जाने पर वह वृक्ष की झुरमुट में घुसकर उनकी आँखों से ओझल हो गई। ॥१४०-१४१।।।

अकेली ही जंगल में जाती हुई वह बहुत दूर निकल गई और वहां एक पर्णकुटी बनाकर फल-मूल खाती हुई वह शंकर की आराधना में तन्मय हो गई ॥१४२॥

उसके पिता उस राजा ने अपनी पुत्री को कहीं चली गई समझकर उसे बहुत ढुंडवाया और उसके न मिलने पर राजा को बहुत कष्ट हुआ ॥१४३॥

बहुत दिनों के पश्चात्, कष्ट के कुछ शान्त हो जाने पर मनोरंजन करने के निमित्त वह राजा बुद्धिप्रभ शिकार खेलने के लिए निकला ॥१४४॥

और, जंगल में भटकता हुआ वह दैवयोग से बहुत दूर उस दूसरे जंगल में पहुँच गया, जहाँ उसकी कन्या हेमप्रभा तपस्या करती हुई रहती थी। राजा को वहां कुटी दिखाई पड़ी, उसके भीतर निःशंक भाव से प्रवेश करने पर राजा ने देखा कि उसी की पुत्री हेमप्रभा तपस्या करती हुई सूखकर कांटा हो गई है। कन्या ने भी एकाएक अपने पिता को देखा और उठकर उसके चरण पकड़ लिये। अनुसिक्त पिता ने भी स्नेहपूर्वक उसका आलिंगन कर उसे भली-भाँति गोद में बैठा लिया ॥१४५-१४७॥

बहुत दिनों के वाद देखादेखी होने के कारण दोनों एक दूसरे को देखकर ऐसे रोये कि उनसे प्रभावित वन के मृग भी आंसू बहाने लगे ॥१४८॥

तदनन्तर, धीरे-धीरे आश्वस्त होकर राजा ने उस कन्या से कहा- बेटी, राजलक्ष्मी के सुख को छोड़ कर तूने यह क्या किया ? बनवास छोड़कर माँ के पास चलो।' इस प्रकार कहते हुए पिता से हेमप्रभ ने कहा- 'पिता जी, भाग्य ने ही ऐसी आयोजना कर दी। इसमें मेरी शक्ति ही क्या है। अब मैं सुख भोगने के लिए घर न आऊँगी और तप के सुख को भी न छोड़ दूंगी' ।॥१४९-१५१।।

इस प्रकार कहती हुई कन्या जब अपने दृढ निश्चय से विचलित न हुई, तब राजा ने वन में ही उसके लिए मन्दिर (निवास-स्थान) बनवा दिया ॥१५२॥

और, अपनी राजधानी में लौटकर राजा, अतिथि सत्कार के निमित्त उसे प्रति दिन पकवान्न, मिष्टान्त्र, धन आदि भेजने लगा ॥१५३॥

वह हेमप्रभा, उस अन्न और धन से सदा अतिथियों का सत्कार करने लगी और स्वयं फल मल खाकर रहने लगी ।॥१५४॥

एकबार उस राजपुत्री के आश्रम में, एक आजन्म ब्रह्मचारिणी सन्यासिनी, विचरण करती हुई आ पहुँची ॥१५५॥

हेमप्रभा से समुचित आतिथ्य सत्कार प्राप्त कर अपनी कथा के मध्य में, सन्यास का कारण पूछे जाने पर वह बाल-सन्यासिनी बोली-॥१५६॥

मैं अपने कन्यापन में अपने पिता के पैर दबा रही थी। आँखों में निद्रा भर जाने के कारण मेरे दोनों हाथ शिथिल हो गये ॥१५७॥

'क्या सो रही है?', ऐसा कहकर पिता ने पैर से मुझे ठोकर मारी। उसी क्रोध से मैं घर से निकलकर सन्यासिनी हो गई ॥ १५८॥

इस प्रकार कहती हुई सन्यासिनी से हेमप्रभा ने अपने समान स्वभाव और चरित्र से प्रसन्न होकर उसे अपनी वनवास की सखी बना लिया ॥१५९॥

एकबार हेमप्रभा ने, प्रातःकाल उस सन्यासिनी सखी से कहा- 'सखि, आज मैंने स्वप्न में देखा कि 'मैं एक विशाल नदी को पार कर गई। उसे पार कर श्वेत हाथी पर चढ़ी और उसके पश्चात् पर्वत पर। उस पर्वत पर एक आश्रम में भगवान् अम्बिकापति शिव को देखा। उनके सामने गाती हुई मैंने बीणा बजाई। तब एक दिव्य पुरुष को अपने पास आया हुआ देखा। उसे देखने पर मैं तेरे साथ आकाश में उड़ गई। इतना देखकर मेरी नींद खुल गई और रात्रि भी व्यतीत हो गई' ।।१६०-१६३।।

यह सुनकर वह सखी हेमप्रभा से बोली- 'हे कल्याणी, यह निश्चय है कि तू शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण कोई दिव्य स्त्री है और तेरे शाप का अन्त भी समीप है। यह स्वप्न यही कहता है।' यह सुनकर राजपुत्री ने उसकी बात का समर्थन किया ॥१६४-१६५।।

तदनन्तर, जगत् के दीपक भगवान् भास्कर के पर्याप्त ऊपर आ जाने पर घोड़े पर चढ़ा हुआ कोई राजकुमार उस आश्रम में आया ।।१६६॥

वहाँ तपस्विनी के वेष में राजपुत्री को देखकर उसे उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई। और उसने बाहन को छोड़कर उसे प्रणाम किया ॥१६७॥

राजपुत्री ने भी, उसका आतिथ्य सत्कार किया और उसे आसन दिया। आसन पर बैठे हुए उसकी ओर आकृष्ट होकर प्रेम से उसने पूछा कि 'आप कौन हैं?' ।।१६८॥

तदनन्तर, उस राजपुत्र ने कहा- 'हे महाभाग्यशालिनी, शुभ नाम और चरित्रवाला प्रतापसेन नाम का एक राजा है ।॥१६९॥

उसने पुत्र के लिए शिवाराधन-तप किया। तब प्रसन्न शिवजी ने, उसके आगे प्रकट होकर आदेश दिया कि 'तुझे एक पुत्र उत्पन्न होगा और वह विद्याधर का अवतार होगा। अन्त में शाप का क्षय होने पर वह अपने लोक को चला जायगा ॥१७०-१७१॥

दूसरा पुत्र तेरे वंश और राज्य को चलानेवाला होगा।' गम्भु के इस प्रकार आदेश से प्रसन्न राजा ने उठकर व्रत की पारणा की ॥१७२॥

समय आने पर उसके यहाँ लक्ष्मीसेन नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ और क्रम से दूसरा पुत्र शूरसेन नाम का हुआ ॥१७३॥

इसलिए, तुम मुझे उस राजा का ज्येष्ठ पुत्र लक्ष्मीसेन समझो। मेरा यह वेगवान् घोड़ा आखेट के लिए निकले मुझे यहाँ ले आया है ॥१७४।॥

उसके द्वारा इस प्रकार कही गई राजपुत्री अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके उससे अपना वृत्तान्त कहकर इस प्रकार बोली- ।।१७५।।

'तुम्हारे देखने पर मैंने भी विद्याओं के साथ अपनी जाति का स्मरण कर लिया। मैं इस सखी के साथ शापच्युता विद्यावरी हूँ ॥ १७६।।

तू अपने मन्त्री के साथ शापच्युत विद्याधर मेरा पति है। और, तेरा वह मन्त्री इस मेरी सखी का पति है ।।१७७।।

सहेली के साथ मेरा वह शाप अब क्षीण हो गया है। अब हम सब का विद्याधर-लोक में फिर समागम होगा' ।॥१७८॥

इस प्रकार कहकर और अपने दिव्य विद्याधर-रूप को प्राप्त कर, हेमप्रभा अपनी सखी के साथ, आकाश में उड़कर, अपने लोक को चली गई ॥ १७९।।

लक्ष्मीसेन वहां बैठकर जब इन सब घटनाओं को आश्चर्य के साथ देख रहा था कि तभी उसे ढूंढ़ता हुआ उसका मन्त्री, उसी मार्ग से वहाँ आ गया ।॥१८०॥

राजपुत्र लक्ष्मीसेन, जब अपने मित्र मन्त्री को वहाँ का समाचार सुना ही रहा था; इतने में ही अपनी कन्या को देखने के लिए उत्सुक राजा बुद्धिप्रभ भी वहाँ आ गया ॥१८१॥

उसने भी अपनी कन्या हेमप्रभा को वहाँ न देखकर लक्ष्मीसेन से उसका समाचार पूछा। लक्ष्मीसेन ने जो कुछ देखा सुना था, वह सब उससे कह सुनाया ॥१८२॥

तब बुद्धिप्रभ के व्याकुल होने पर, और लक्ष्मीसेन अपने मन्त्री के साथ शाप-मुक्त होने तथा पूर्वजाति का स्मरण करने पर, आकाश से अपने विद्याघर-लोक को गया ॥१८३॥

और, वहाँ जाकर पूर्वजन्म की पत्नी हेमप्रभा को पाकर उसे अपने पिता बुद्धिप्रभ से मिलाया उसके बाद बुद्धिप्रभ अपने नगर को लौट गया ।॥१८४।।

तब पत्नी-सहित उस मित्र के साथ प्रतापसेन (पिता) के पास जाकर अपना सारा वृत्तान्त लक्ष्मीसेन ने सुनाया ॥१८५॥

और, उससे दिये हुए क्रम से प्राप्त राज्य को अपने छोटे भाई शूरसेन को देकर वह विद्याधर-लोक को गया ॥ १८६॥

वहाँ जाकर हेमप्रभा से युक्त लक्ष्मीसेन, अपने सपत्नीक मित्र मन्त्री के साथ चिरकाल तक दिव्य आनन्द का उपभोग करता रहा ॥१८७॥

गोमुख द्वारा इस प्रकार कही गई कथाओं को सुनकर, शक्तियशा के आसन्नवर्ती नवीन विवाह के लिए उत्सुक होने पर भी नरवाहह्नदत्त ने, उस रात्रि को क्षण के समान बिता दिया ॥१८८॥

इस प्रकार, विवाह-दिवस की अवधि को विनोदपूर्वक व्यतीत करके उस राजकुमार नरवाहनवत्त ने विवाह का दिन आने पर पिता वत्सेश्वर के पास रहते हुए, सहसा आकाश से उत्तरते हुए और सूर्य के समान चमकते हुए विद्याघरों के दल को देखा ॥१८९॥

उस दल के मध्य, दान की इच्छा से अपनी कन्या को लेकर, प्रेम से आये हुए विद्याघरों के राजा स्फटिकयश को देखकर, श्वशुर की अगवानी करके नरवाहनदत्त ने, उसकी अभ्यर्थना की और समधी बत्सराज उदयन ने भी, अर्घ्य-पाद्य आदि से उसका समुचित सत्कार किया ।॥ १९०॥

विद्याधरों के उस राजा ने भी, वत्सराज से यथार्थ बात निवेदित करके, अपनी सिद्धि के प्रभाव से अपने स्वरूप के अनुसार विवाह की दिव्य सामग्री एकत्र करके, रत्नों के समूह से भर दिये गये वत्सराज के पुत्र नरवाहनवत्त के लिए पहले से ही कही गई शक्तियशा नाम की अपनी कन्या विधि-पूर्वक प्रदान कर दी ॥१९१॥

वह नरवाहनदत्त भी, विद्याधरराज की कन्या उस शक्तियशा को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त करके इस प्रकार खिल उठा, जैसे रश्मियों को पाकर कमल खिल उठता है ।।१९२॥

विवाह-संस्कार समाप्त करके स्फटिकयश के अपने लोक को चले जाने पर, नरवाहनदत्त, अपनी नगरी कौशाम्बी में शक्तियशा के मुख-कमल का भ्रमर बनकर रहने लगा ॥१९३॥

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का दशम तरंग समाप्त

शक्तियश नामक दाम लम्बक समाप्त


Comments

Popular posts from this blog

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.101. || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा