51008 || अष्टम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ; ब्राह्मण और नेवले की कथा; मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा; मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा; घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा;

51008 || अष्टम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ; ब्राह्मण और नेवले की कथा; मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा; मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा; घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा।

अष्टम तरंग

गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ

दूसरे दिन रात को अपने वास-गृह में बैठे हुए और नई वधू को पाने के लिए उत्सुक वत्सराज के पुत्र का मनोरंजन करते हुए मन्त्री गोमुख ने, उसी की आज्ञा से फिर क्रमशः इस प्रकार कथाएँ कहना प्रारम्भ किया ॥ १-२॥

ब्राह्मण और नेवले की कथा¹

किसी नगर में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण था। उसको देवदत्ता नाम की स्त्री उसी के समान अच्छे कुल की थी ॥३॥

उसकी पत्नी ने गर्भ धारण करके यथासमय एक पुत्र उत्पन्न किया। वह ब्राह्मण निर्धन होने पर भी उस पुत्र को एक महती सम्पत्ति के लाभ के समान समझता था ॥४।।

सूतक के अन्त में, उसकी स्त्री नदी में स्नान करने गई और देवशर्मा उस नवजात शिशु की देख-भाल करता हुआ घर में ही रहा ॥५॥

इतने में ही राजा के रनिवास से स्वस्ति-वाचन के लिए उसे बुलाने एक दासी वहाँ आई ।।६।।

तब वह ब्राह्मण दक्षिणा के लोभ से शिशु की रक्षा के लिए अपने पालतू नेवले को वहाँ रखकर चला गया ।॥७॥

उस ब्राह्मण के चले जाने पर अकस्मात् शिशु के पास आये हुए सर्प को देखकर उस नेवले ने, मालिक के प्रेम से, उसे मार डाला ॥८॥

तदनन्तर, देवशर्मा को दूर से ही वापस आते हुए देखकर साँप के रक्त से सना हुआ, नेवला प्रसन्नतापूर्वक उसके सामने गया ॥९॥

रक्त से सने हुए नेवले को देखकर, अवश्य ही इसने मेरे बच्चे को मार डाला, इस भ्रम से देवशर्मा ने नेवले को पत्थर से मार डाला ॥१०॥

तदनन्तर, भीतर जाकर साँप को नेवले से मारा हुआ और बालक को जीता हुआ देखकर ब्राह्मण मन ही-मन, पश्चात्ताप करने लगा ॥११॥

'बिना विचारे ही, उपकार करनेवाले नेवले को तूने क्यों मार डाला', इस प्रकार सब समाचार जानने पर उस ब्राह्मण की पत्नी ने भी स्नान करके लौटने पर उसे उलाहना दिया ॥१२॥

इसलिए, हे देव, बुद्धिमान् व्यक्ति सहसा कोई काम न करे। सहसा कोई कार्य कर डालने से, मानव दोनों लोकों से मारा जाता है ॥१३॥

मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा

बेढंगा कार्य करनेवाला व्यक्ति भी उलटा परिणाम (फल) पाता है, इस प्रसंग में एक कथा सुनो। कोई पुरुष वायु के रोग से पीड़ित था। उसे किसी वैद्य ने बस्तिकर्म (एनेमा) के लिए औषध देकर कहा-'तू अपने घर जाकर इसे पीस ले, तबतक मैं आता हूँ ॥१४-१५॥।

वैद्य के आने में विलम्ब हो जाने पर उस मूर्ख ने, उस औषध को पीसकर पानी के साथ पी लिया ॥१६।।

तब उसके विपरीत परिणाम के कारण मरते हुए उस रोगी को वमन कराकर वैद्य ने, उसे किसी प्रकार स्वस्थ किया ।॥ १७॥

मूर्ख, बस्ति की औषधि गुदा में दी जाती है। वह पी नहीं जाती। तूने मेरी प्रतीक्षा क्यों नहीं की ?' इस प्रकार कहते हुए वैद्य ने उसे उलाहना दिया ॥१८॥

इस तरह, उलटे प्रकार से किया गया कार्य अच्छा होने पर भी, हानिकारक हो जाता है। इसलिए, बुद्धिमान् व्यक्ति उचित प्रकार को छोड़कर कोई काम अनुचित ढंग से न करे ॥१९॥

मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा

बिना विचारे निन्दनीय काम करनेवाला पुरुष क्षण में ही हास्य और निन्दा का पात्र बन जाता है। कहीं पर कोई जडबुद्धि पुरुष था। दूसरे देश को जाते हुए उसके पीछे उसका पुत्र भी वहां गया। यात्रियों के दल के जंगल में डेरा डालने पर वह बालक घूमता-फिरता वन में कहीं दूर निकल गया ।॥२०-२१॥

वहाँ पर बन्दरों ने उसे काट लिया और बन्दरों को न जानता हुआ वह लड़का कठिनाई से जीवित रहकर वहाँ वापस आया और पिता के पूछने पर उससे बोला- 'जंगल में कुछ बड़े-बड़े बालोंवाले और फल खानेवालों ने मुझे काट लिया।' यह सुनकर क्रोध से तलवार खींचकर उसका पिता उस वन में गया ।॥२२-२३॥

वहाँ उसने फल खाते हुए जटाधारी तपस्वियों को देखा और उन्हें देखकर 'इन्हीं लोगों ने मेरे पुत्र को काटा' सोचकर उन पर ही टूट पड़ा ॥ २४॥

तब किसी पथिक ने उससे कहा- "मैंने देखा है। तेरे पुत्र को बन्दरों ने काटा है। इन मुनियों को मत मार।' यह सुनकर वह उस हत्याकांड से रुका ॥२५॥

तब वह दैवयोग से मुनियों के वध के पाप से बचकर अपने दल में आ गया। इसलिए, बिना समझे-बूझे विद्वान् को कोई काम नहीं करना चाहिए ।॥२६॥

अधिक क्या कहा जाय। प्राणी को सदा तर्कबुद्धि होना चाहिए। मूर्ख तो संसार में हँसे जाते हैं और दुःख भोगते हैं ।॥२७॥

किसी निर्धन व्यक्ति ने, मार्ग में जाते हुए, किसी व्यापारी की गिरी हुई रुपयों से भरी चमड़े की थैली पाई ॥२८॥

बह मूर्ख, उसे पाकर इधर-उधर न जाकर वहीं बैठकर उसमें रखे हुए सोने के सिक्कों को गिनने लगा ॥ २९॥

इतने में ही, स्मरण आने पर वह व्यापारी, घोड़े पर सवार होकर वहाँ आया और उसे पाकर प्रसन्न होते हुए उस गरीब से अपनी थैली छीन ले गया ।॥३०।।

इतना धन पाकर भी उसे गंवाकर वह गंवार पश्चात्ताप करता हुआ मुँह लटकाये हुए चला गया। इस प्रकार, मूर्ख पाये धन को भी गंवा बैठते हैं ।॥३१॥

कोई मूर्ख दूज का चाँद देखना चाहता था। उसे किसी ने अंगुली से दिखाते हुए कहा--'वह है, देखो, वह है।' वह मूर्ख आकाश को न देखकर उसकी अंगुली को ही देखता रह गया। उसे देखनेवाले देखकर हँसते ही रह गये ॥३२-३३।।

असाध्य कार्य भी बुद्धि से सिद्ध होते हैं। इस पर कथा सुनो। एक स्त्री किसी दूसरे गाँव को अकेली जा रहा थी। मार्ग में उसे पकड़ने के लिए आते हुए एक बन्दर को देखकर अपने को उससे बार-बार बचाती हुई वह स्त्री एक पेड़ पकड़कर उसके चारों ओर घूमने लगी। उस मूर्ख बन्दर ने उस वृक्ष को दोनों हाथों से पकड़ लिया। स्त्री ने भी उसके दोनों हाथों को पकड़कर उसी वृक्ष में उसे दवा दिया ॥३४-३६॥

जब बन्दर निश्चल होकर क्रोध से भर गया, तब मार्ग में जाते हुए किसी अहीर से उस स्त्री ने कहा- 'हे भाग्यवान्, तुम इस बन्दर को इसी प्रकार हाथ से पकड़ लो, तो मैं खिसकी हुई चादर और खुली हुई अपनी चोटी ठीक कर लें ॥३७-३८॥

उसने कहा- 'यदि मेरे साथ तू रमण करे, तो मैं ऐसा करूँ।' उस स्त्री ने स्वीकार कर लिया और उसने भी बन्दर को पकड़ लिया ॥३९॥

तब उस स्त्री ने, उस पुरुष की कटार खींचकर और उससे बन्दर को मार डाला। तदनन्तर वह उस पुरुष से कहने लगी- 'आओ, कहीं एकान्त में चले' ऐसा कहकर वह स्त्री उस अहीर को दूर ले जाकर छोड़ दिया और स्वयं यात्रियों के एक झुंड में मिलकर अपने गाँव को चली गई। इसप्रकार उसने बुद्धिबल से अपने चरित्र की रक्षा कर ली ॥४०-४१॥

'इसलिए बुद्धि ही संसार का जीवन है। धन से हीन व्यक्ति जी सकता है, किन्तु बुद्धिहीन व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता' ॥४२॥

घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा

स्वामी, अब एक और विचित्र कथा सुनो। किसी नगर में घट और कर्पर नाम के दो चोर थे। उनमें कर्पर किसी समय घट को बाहर रखकर और सेंध लगाकर राजा की कन्या के घर में घुस गया। वहाँ पर एक कोने में बैठे हुए उसे, जागती हुई राज्यकन्या ने देख लिया और काम के वश में होकर उसने उसे अपने पास बुलाया ।।४३-४५।।

उसके साथ रमण करके और उसे घन देकर वह बोली- 'यदि फिर कभी आयेगा, तो तुझे इससे भी अधिक धन दूंगी' ।॥४६॥

तब वहाँ से निकलकर, वहाँ का वृत्तान्त सुनाकर और पाया हुआ राज-धन घट को देकर उसे घर भेज दिया और स्वयं फिर राजकन्या के भवन में जा घुसा। काम और लोभ से खिचा हुआ कौन पुरुष हानि की चिन्ता करता है ॥४७-४८॥

वहाँ वह कर्पर, रतिकर्म से थका हुआ और नशे में उन्मत्त होकर राजकुमारी के साथ ऐसा सो गया कि बीती हुई रात को भी वह न जान सका। प्रातःकाल अन्तःपुर के रक्षकों द्वारा पकड़ा जाकर राजा के सामने वह उपस्थित किया गया। राजा ने भी, क्रोध से उसके वध की आज्ञा दे दी ॥४९-५०।।

जब वधिक उसे फाँसी देने के लिए ले जा रहे थे, उसी समय रात को न आये हुए उसकी खोज करता हुआ घट वहाँ आ पहुँचा ॥५१॥

फांसी पर लटकने के लिए जाते हुए कर्पर ने अपने मित्र घट को आया हुआ देखकर अपने इंगित से कहा कि तुम राजकन्या को यहाँ से ले जाकर उसकी रक्षा करना ॥५२॥

घट ने भी अपने इंगित से उसे स्वीकृति दे दी। तब वधिकों ने उस बेचारे को, शीघ्र ही फाँसी के स्थान पर ले जाकर और पेड़ पर लटकाकर मार डाला ॥५३॥

तब घट भी, घर जाकर दिन-भर सोचता रहा और रात आने पर सुरंग फोड़कर राजकुमारी के भवन में घुसा ॥५४।।

वहाँ अकेली और बंधी हुई राजकुमारी को देखकर वह बोला- 'मैं मारे गये कर्पर का मित्र घट हूँ। उसी के प्रेम से तुझे भगा ले जाने के लिए यहाँ आया हूँ। इसलिए, आओ। जबतक तुम्हारा पिता तुम्हारा कुछ अनिष्ट नहीं करता, तबतक भाग चलें ।॥५५-५६।।

उस (घट) के ऐसा कहने पर प्रसन्न वह राजकन्या, उसकी बात को मानकर भागने के लिए तैयार हो गई। घट ने भी उसके बन्धन खोल दिये ॥५७॥

तब अपना शरीर समर्पण किये हुई राजकन्या के साथ वह चोर, सुरंग के मार्ग से निकलकर अपने घर आ गया ।॥५८॥

प्रातःकाल गड्‌ढे में छिपी सुरंग के मार्ग से भगाई गई अपनी कन्या का समाचार जानकर राजा ने सोचा- ॥५९॥

'अवश्य ही फाँसी पर लटकाये गये उस पापी का कोई साहसी बन्धु है, जिसने इस प्रकार मेरी कन्या का अपहरण कर लिया है' ।॥६०॥

ऐसा सोचकर राजा ने फाँसी पर लटकाये गये कर्पर के शव की रक्षा के लिए अपने सिपाही नियुक्त कर दिये और उनसे कहा- ॥६११।

'जो भी कोई इस मुर्दे के लिए शोक करता हुआ इसका शव लेकर दाह आदि क्रिया करने के लिए आये, उसे पकड़ लेना। उससे मैं उस दुष्टा और कुल-कलंकिनी कन्या को प्राप्त कर लूंगा ॥६२॥

राजा की आज्ञा पाये हुए सेवक, उस कर्पर के शव की रक्षा करते हुए रात-दिन वहाँ पहरा देने लगे ॥६३॥

इस बात का पता लगाकर घट ने, राजपुत्री से कहा- 'प्यारी, वह कर्पर, मेरा बन्धु और परम मित्र था। जिसकी कृपा से मैंने रत्नों और धन के साथ तुझे पाया है। उसके प्रेम से उऋण हुए बिना मेरे हृदय को शान्ति न मिलेगी ।।६४-६५।।

इसलिए, मैं जाकर उसका शोक मनाता हूँ और अपनी युक्ति से उसका अग्नि-संस्कार करके उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करता हूँ ॥६६॥

तुझे डरना न चाहिए। मैं कर्पर के समान मूर्ख नहीं हूँ।' उस (राजकन्या) से इस प्रकार कहकर उसने पाशुपत योगी का वेष बनाया और एक खप्पर में दही और भात रखकर मार्ग चलते हुए भटकता-सा कर्पर के शव के पास आ गया। वहाँ आकर उसने हाथ से खप्पर को गिरा दिया और 'हाय अमृत-भरे कर्पर, हाय अमृत-भरे कर्पर' कहकर चिल्लाकर शोक करने लगा। रक्षकों ने, उसे टूटे हुए खप्पर के लिए शोक करके रोते हुए समझा। उसी समय उसने घर वापस आकर राजपुत्री से सब कहा ॥६७-७०।।

दूसरे दिन, स्त्री (बहू) का वेष धारण किये हुए एक सेवक के शिर पर धतूरा मिले हुए भोजन का बरतन रखकर, दूसरे सेवक को पीछे किये हुए और स्वयं नशे में उन्मत्त ग्रामीण का वेष बनाकर सायंकाल के समय गिरता पड़ता तथा लड़खड़ाता हुजा घट, कर्पर के शव की रक्षा करते हुए सिपाहियों के पास आ गया ॥७१-७२॥

वहाँ पर 'तू कौन है, यह स्त्री कौन है? और भाई, तू कहाँ जा रहा है?' - पहरेदारों द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर वह घूर्त बोला- 'मैं गाँव का रहनेवाला हूँ। यह मेरी पत्नी है। यहाँ से मैं ससुराल जा रहा हूँ। यह भोजन का सामान, मैं उनके लिए ही लाया था, किन्तु वार्तालाप होने के कारण आप लोग भी मेरे मित्र हो गए हैं। अतः, आधा ही अब वहाँ ले जाऊँगा और आधा आपलोगों के लिए रहेगा। ऐसा कह‌कर उसने यह वस्तु निकालकर उन लोगों को खाने के लिए दी। वे भी सभी हँसते हुए उसे खाने लगे ॥७३-७६।।

उस भोजन में पड़े हुए धतूरे के कारण उन पहरेदारों के बेहोश हो जाने पर, घट ने, रात्रि के समय लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग लगा दी और कर्पर का अग्नि-संस्कार पूरा कर दिया ॥७७॥

प्रातःकाल, इस घटना को जानकर राजा ने, उन पहरेदारों को हटाकर दूसरे पहरेदार नियुक्त किये। और उनसे कहा- 'अब भी उसकी अस्थियों की रक्षा करनी है। जो भी उन्हें लेने आये, उसे पकड़ लेना और किसी का दिया हुआ कुछ नहीं खाना ।।७८-७९।।

राजा की इस आज्ञा से, वे नये प्रहरी दिन-रात सावधानी से, उसकी रक्षा करते थे। यह समाचार घट को मालूम हुआ ॥८०॥

तब उसने चंडिका से प्राप्त मोहन-मन्त्र को जाननेवाले किसी साघु को अपना विश्वासी मित्र बनाया ॥८१॥

घट, उसी संन्यासी मित्र के साथ वहाँ गया और पहरेदारों को उस साधु से मोहित कराकर कर्पर की अस्थियाँ बीनकर बहाँ से ले गया ॥८२॥

तदनन्तर घट, उन अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर, राजकुमारी को अपना सारा वृत्तान्त सुनाकर और उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥८३॥

राजा ने भी, पहरेदारों के मोहित होने और कन्या के अपहरण आदि के कार्य को किसी योगी के योग की माया समझा ॥८४॥

'जिस योगी ने मेरी कन्या का हरण किया है, वह यदि प्रकट हो जाय, तो मैं अपना आधा राज्य उसे दे दूंगा।' राजा ने, अपने नगर में ऐसी घोषणा करा दी। यह सुनकर जब घट अपने को प्रकट करने के लिए तैयार हुआ, तब राजपुत्री ने यह कहकर उसे रोक दिया कि 'कपट से बात करनेवाले राजा पर विश्वास मत करो' ।।८५-८७।।

तब भेद खुलने के भय से घट, उस साधु और राजपुत्री को लेकर दूसरे देश को चला गया ।।।८८।।।

मार्ग में, उस राजपुत्री ने, उस साधु से एकान्त में कहा- 'एक कर्पर ने तो मेरा चरित्र नष्ट किया और दूसरे ने, मुझे राजकुमारी-पद से गिरा दिया। वह कर्पर चोर तो मर गया, किन्तु यह घट मरा नहीं। तुम मुझे अत्यन्त प्यारे लगते हो।' ऐसा कहकर उससे संगति करके राजकन्या ने, विष देकर घट को मार डाला ॥८९-९०॥

तब उस साधु के साथ जाती हुई वह पापिन राजकुमारी मार्ग में धनदेव नामक एक बनिये से मिल गई और बोली- 'यह कपाल धारण करनेवाला कहाँ? तुम मेरे प्यारे हो।' इस प्रकार सोये हुए साधु को छोड़कर, वह बनिये के साथ चुपके से भाग गई ।।९१-९२॥

प्रातःकाल जगे हुए साधु ने देखा कि स्त्रियों में चंचलता (व्यभिचार) के सिवा न स्नेह है, न सज्जनता है। इसलिए, वह दुष्टा मुझे विश्वास दिलाकर भी माल लेकर भाग गई। इतना ही लाभ हुआ कि उसने मुझे भी घट के समान मार नहीं डाला ॥९३-९४।।

ऐसा सोचकर साधु अपने स्थान पर चला गया, राजपुत्री भी बनिये के साथ उसके देश जा पहुंची ॥९५॥

अपने देश पहुँचकर धनदेव सोचने लगा कि 'मैं इस दुराचारिणी दुष्टा को एकाएक अपने घर में कैसे ले जाऊँ?' ॥९६॥

तब वह बनिया अपने नगर में सायंकाल के समय उस राजकुमारी के साथ एक वृद्धा स्त्री के घर में चला गया और वहीं ठहर गया ।॥९७॥

वहाँ पर उस राजकुमारी ने, उस जानकार वृद्धा से पूछा कि 'क्या तुम धनदेव के घर का हाल जानती हो ?' ॥९८॥

यह सुनकर वृद्धा बोली- 'उसके घर की क्या बात है। उसकी पत्नी, जहां-तहाँ सदा नये पुरुष के साथ रमण करती है ॥९९॥

उसकी खिड़की में रस्सी से बंधी चमड़े की पिटारी लटकती रहती है। रात में जो भी उस पिटारी में घुसता है, उसे ही वह अन्दर बुला लेती है ॥१००॥

रात के अन्त में उसे उसी प्रकार बाहर निकाल देती है। मद्यपान से उन्मत्त वह कहीं कुछ देखती नहीं ।॥१०१।।

उसकी यह स्थिति इस सारे नगर में प्रसिद्ध हो गई है। बहुत समय हो गया, उसका पति अब भी नहीं आया ॥१०२॥

उस वृद्धा की बात सुनकर मन-ही-मन दुःखी और सन्देह में पड़ा हुआ घनदेव, किसी बहाने अपने घर गया। वहाँ पर उसने दासियों द्वारा रस्सी में बाँधी हुई पिटारी देखी। वह उसमें बैठ गया और वासियों ने उसे ऊपर खींचकर भीतर कर लिया ॥१०३-१०४।।

उसके भीतर जाते ही नशे में चूर और काम में अन्धी स्त्री ने, उसका आलिंगन करके उसे खाट पर पटक दिया। नशे में मस्त रहने के कारण उसकी स्त्री ने, उसे पहचाना भी नहीं ॥१०५॥

अपनी पत्नी की यह दुरावस्था देख उस धनदेव की रमणेच्छा नहीं रह गई और तब तक नशे की तीव्रता के कारण उसकी पत्नी भी सो गई ॥१०६।॥

रात का अन्त होने पर उसकी दासियों ने उसे उसी प्रकार पिटारी में भरकर बाहर फेंक दिया। बाहर निकाला हुआ धनदेव, बनिया सोचने लगा- ॥१०७॥

'घर का मोह व्यर्थ है। क्योंकि, घर में स्त्री ही एक बन्धन हैं। उन स्त्रियों की भी जब यह दशा है, तब घर से अच्छा एकान्त जंगल ही है' ।॥१०८॥

ऐसा निश्चय करके और उस राजकन्या को भी उसी वृद्धा के घर पर ही, छोड़कर धनदेव बनिया, कहीं दूर वन के लिए चल पड़ा ।।१०९।।

मार्ग में जाते हुए उसे रुद्रसोम नाम का एक ब्राह्मण मिला; जो उसका मित्र बन गया। वह भी बहुत दिनों बाद लम्बे प्रवास से घर आ रहा था ॥११०॥

बनिये से उसकी स्त्री के वृत्तान्त को सुनकर वह ब्राह्मण भी, अपनी स्त्री पर शंका करता हुआ उसी बनिये के साथ सायंकाल अपने गांव पहुंचा ॥१११॥

अपने घर के पास नदी में एक ग्वाले को गाते हुए देखकर उसने हँसी-हँसी में उससे पूछा- ॥११२॥

'ग्वाले, क्या कोई युवती स्त्री, तुमसे प्रेम करती है, जिस कारण संसार को तृण के समान समझकर इस प्रकार की मस्ती में तुम गा रहे हो?' ॥११३॥

यह सुनकर वह ग्वाला हँसा और बोला- 'मैं कहाँ तक छिपाऊँ। लम्बे समय से विदेश गये हुए गाँव के चौधरी रुद्रसोम नामक ब्राह्मण की युवती भार्या है, मैं उसी का सेवन करता हूँ उसकी दासी, स्त्री का वेष पहनाकर मुझे उसके घर ले जाती है।' ग्वाले से यह सुनकर और क्रोध को भीतर-ही-भीतर पीकर सचाई को जानने की इच्छा से रुद्रसोम ने ग्वाले से कहा- ।।११४-११६।।

'यदि ऐसी बात है, तो आज मैं तेरा मेह‌मान हूँ। अतः, अपना वेष, मुझे दे दो, तो तुम्हारी तरह आज मैं वहाँ जाऊं। मुझे बहुत कौतुक हो रहा है' ॥११७॥

'ऐसा करो, यह मेरा काला कम्बल ले लो। लाठी भी ले लो और तबतक यहाँ बैठो, जबतक दासी यहाँ आती है।' ग्वाले ने उससे इस प्रकार कहा ॥११८॥

और कहा कि 'मेरे भ्रम से दासी तुझे स्त्री के कपड़े पहनने को देगी। स्त्री वेष धारण कर रात में तू वहाँ जाना और मैं आज की रात विश्राम करूंगा ॥११९॥

इस प्रकार कहते हुए ग्वाले से लाठी और कम्बल लेकर वह रुद्रसोम उसी वेष में बैठा रहा ॥१२०॥

'वह ग्वाला, धनदेव बनिया के साथ, कुछ दूर पर जा बैठा और इतने में ही वहाँ दासी आ पहुँची ॥१२१॥

उसने चुपचाप आकर अंधेरे में चुप बैठे रुद्रसोम को गोपाल (ग्वाला) समझकर उसे स्त्री वेष धारण कराकर कहा- 'आओ' ॥१२२॥

ग्वाले के भ्रम से ले जाये गये रुद्रसोम ने अपनी पत्नी को देखा और उसकी पत्नी ने उठकर उसका आलिंगन किया। तब रुद्रसोम सोचने लगा-॥ १२३॥

'अत्यन्त खेद की बात है कि पास रहनेवाले नीच व्यक्ति से भी दुष्ट स्त्रियाँ प्रेम करने लगती हैं। इसीलिए, यह पापिन ग्वाले से ही मिल गई ।॥ १२४॥

ऐसा सोचता हुआ और अस्पष्ट वाणी से कुछ बहाना बताकर वह घर से निकला और विरक्त होकर धनदेव के समीप आया ॥१२५॥

तदनन्तर, अपनी पत्नी का वृत्तान्त सुनाकर उस बनिये से बोला- 'मैं भी तुम्हारे साथ जंगल को चलता हूँ। घर चूल्हे में जाय' ।॥१२६॥

ऐसा कहता हुआ रुद्रसोम और वह बनिया दोनों, साथ ही बन को चले ॥ १२७॥

बन को जाते हुए मार्ग में घनदेव का मित्र शशी, उन्हें मिला। बातचीत के प्रसंग में उन्होंने अपना-अपना वृत्तान्त शशी को सुनाया ॥१२८॥

यह सुनकर ईर्ष्यालु शशी, जो बहुत दिनों के अनन्तर दूसरे देश से आया था, भूगर्भ-गृह (तहखाने) में रखी हुई भी अपनी पत्नी के प्रति शंकित हो गया ॥ १२९॥

उन दोनों के साथ जाता हुआ वह शशी, सायंकाल अपने पर पहुंचा। और, उसने घर में उन दोनों मित्रों का आतिथ्य सत्कार करना चाहा ॥१३०।।

तभी उसने अपने घर के पास कोढ़ से गले हुए हाथों और पैरोंवाले होने पर भी सजे हुए और गाते हुए एक पुरुष को बैठे देखा ॥१३१।।

शशी ने, आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा- 'ऐसे तुम कौन हो ?' तब उस कोढ़ी ने उससे कहा-'मैं कामदेव हूँ ॥१३२॥

'इसमें सन्देह ही क्या ? तुम्हारी रूप-सम्पत्ति ही कह रही है कि तुम कामदेव हो।' शशी से इस प्रकार कहा गया वह कोड़ी फिर बोला- 'सुनो, तुम्हें कहता हूँ। यहाँ धूर्त शशी, अपनी पत्नी के लिए एक दासी छोड़कर ईर्ष्या के साथ अपनी स्त्री को भूगर्भ गृह में रखकर दूसरे देश को चला गया । ॥१३३-१३४।।

दैवयोग से उसकी स्त्री ने, मुझे यहाँ देखकर और काम से विवश होकर अपने को मुझे समर्पित कर दिया ॥१३५॥

प्रत्येक रात मैं उसके साथ रमण करता हूँ। उसकी दासी, मुझे पीठ पर चढ़ाकर उसके पास ले जाती है ॥१३६॥

तब तुम्हीं बताओ कि मैं कामदेव क्यों नहीं हूँ। जहाँ दूसरी स्त्री की प्राप्ति नहीं हो सकती, वहाँ मैं अद्भुत रूपवाली शशी की स्त्री का प्यारा हूँ' ॥१३७॥

वज्र के समान कठोर कोढ़ी के वचन सुनकर अपनी व्याकुलता को छिपाकर वास्तविक तत्त्व जानने की इच्छा से वह कोढ़ी से बोला-॥१३८॥

'तू सचमुच कामदेव है। इसलिए, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुमसे सुनकर मुझे उस स्त्री के प्रति अत्यन्त कौतूहल उत्पन्न हो गया है जो आज की रात मैं तुम्हारे वेष में उसके घर जाऊँ। इसलिए कृपा करो। प्रतिदिन मिलने वाली वस्तु यदि एक बार न भी मिले, तो तुम्हारी क्या हानि है ?' शशी के इस प्रकार कहने पर, कोड़ी ने उससे कहा- 'ऐसा ही करो। मेरा वेष ले लो और अपना वेष मुझे दे दो ॥ १३९- १४१।।

और, हाथ-पैरों को कपड़े से ढंककर यहाँ तबतक बैठो, जबतक अँधेरा बढ़ने पर दासी आती है ॥१४२॥

मेरे भ्रम से उसके पीठ पर उठा लेने पर (अर्थात् सहारा देने पर) तू मेरे ही समान चलना। मैं पैर से रोगी होने से सदा जैसे जाता हूँ, उसी तरह तुम भी जाना ॥१४३॥

कोड़ी से इस प्रकार कहा गया शशी, उसी के समान वेष में हो गया। वहाँ पर उसके दोनों साथी और कोड़ी कुछ दूर पर जा बैठे ॥१४४॥

तदनन्तर, दासी ने आकर कोढ़ी के वेष में शशी को देखा और उसी कोढ़ी के भ्रम से 'आओ'- ऐसा कहकर उसने उसे अपनी पीठ का सहारा दिया ॥१४५।।

तब वह दासी, रात अँधेरे में उसे उसी की पत्नी के पास ले गई, जो अपने कोड़ी जार की प्रतीक्षा अँधेरे तहखाने में कर रही थी ।॥१४६॥

यहाँ अन्धकार में सोचती हुई उसके शरीर के स्पर्श से उसे पहचान कर और वही उसकी स्त्री है, इस प्रकार निश्चय करके शशी विरक्त हो गया ।॥१४७॥।

तब उसके सो जाने पर, शशी, चुपचाप बाहर निकलकर धनदेव और रुद्रसोम के पास आ गया और उन दोनों को अपना वृत्तान्त सुनाकर खेद के साथ बोला- 'नीचों की ओर जाने-बाली चंचल स्त्रियों को धिक्कार है, जो दूर से ही मनोरम प्रतीत होती है ॥१४८-१४९॥

गड्ढे में गिरनेवाली नदियों के समान स्त्रियों की रक्षा करना सम्भव नहीं है। देखो, तहखाने में रखी हुई भी मेरी पत्नी कोड़ी के साथ रमण करने लगी ।।१५०।।

अतः मेरे लिए भी वन ही ठीक है, घर को धिक्कार है।' ऐसा कहते हुए शशी ने, समान दुःख से दुःखी बनिया और ब्राह्मण के साथ यह रात बिताई ॥१५१॥

प्रातः ही वे तीनों मिलकर वन की ओर चले। सायंकाल उन्हें मार्ग में एक बावली के साथ छायादार पेड़ मिला ॥१५२।।

वहाँ वे खा-पीकर रात में, वृक्ष पर चढ़ गये। इतने में ही उन्होंने आकर सोये हुए एक पथिक को वृक्ष के नीचे देखा ॥१५३॥

क्षण-भर में ही उन्होंने बावली के बीच से ऊपर की ओर निकले हुए एक पुरुष को देखा, जिसने अपने मुख से स्त्री के साथ एक शैय्या को उगल दिया था ।। १५४।।

तब वह स्त्री के साथ समागम करके उसी शैय्या पर सो गया। और, वह स्त्री सोये हुए उस पथिक के पास जाकर सो गई ॥१५५॥

रति-कार्य के अनन्तर उस पगिक से 'तुम दोनों कौन हों', इस प्रकार पूछी गई वह स्त्री, बोली- 'मैं नागकन्या हूँ और इसकी भार्या हूँ ।॥१५६॥

तुम्हें डरना न चाहिए क्योंकि मैं निन्यानब्बे पथिकों के साथ समागम कर चुकी हूँ। अब तूने सो पूरा कर दिया' ॥१५७॥

ऐसा कहती हुई उस स्त्री को और उसके नये जार को सोये हुए नाग ने उठकर डंस लिया। डँसने के उपरान्त मुँह से अग्नि की ज्वाला फेंककर उन दोनों को भस्म कर दिया ॥ १५८॥

'जहाँ शरीर के भीतर रखी हुई भी स्त्री रक्षित नहीं हो सकती, वहाँ घर में तो उनकी बात ही क्या है ? ऐसी स्त्रियों को बार-बार धिक्कार है!' उस नाग के चले जाने पर इस प्रकार कहते हुए शशी आदि वे तीनों रात बिताकर वन को चले गये ॥१५९-१६०।।

वन में जाकर मैत्री आदि की चार भावनाओं को सिद्ध करके और उनके द्वारा अन्तःकरण की प्रवृत्तियों को स्थिर करके सब प्राणियों पर समान भावना रखनेवाले वे तीनों साधक, अनुपम और परमानन्ददायक समाधि में मग्न होकर पूर्णसिद्धि को प्राप्त हुए और पापों का क्षय हो जाने पर मोक्ष-सिद्धि भी क्रमशः उन्होंने प्राप्त की ॥१६१॥

अपने पापों के फलस्वरूप उत्पन्न विविध कष्टों को भोगती हुई उनकी वे दुष्टा स्त्रियाँ भी, दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर शीघ्र ही नष्ट हो गई ॥१६२॥

इस प्रकार स्त्रियों में मोह (अज्ञान) के कारण होनेवाले राग (प्रेम) किसके लिए दुःख-दायक नहीं होता। और, सारासार का विवेक रखनेवाले महापुरुपों का स्त्रियों के प्रति विराग, मोक्ष के लिए ही होता है ।।।१६३॥

शक्तियशा के समागम के लिए उत्सुक वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त, मन्त्रिप्रवर गोमुख द्वारा इस प्रकार चिरकाल तक मनोरंजन करनेवाली कथा को सुनकर धीरे-धीरे सो गया ॥१६४।।

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त 

1. इस तरंग की पहली कथा, पंचतन्त्र के लब्धप्रणाश नामक चौचे तन्त्र की प्रथम कथा है। इन दोनों में कुछ अन्तर है। इसमें जहाँ शिशुमार की चर्चा है, वहाँ पंचतन्त्र में मगर का नाम आया है। इस कथा के गूलर वृक्ष के स्थान पर पंचतन्त्र में जामुन का वृक्ष लिखा है। पंचपंत्र के ये परिवर्तन, उपयुक्त और प्रासंगिक जंचते हैं।-- अनु०

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