51009 || नवम कहानी || 

नवम तरंग

गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कयाएँ

दूसरे दिन रात में, फिर पहले के ही समान मनोविनोद करते हुए गोमुख मन्त्री ने नरवाहनदत्त के लिए कथा सुनाई ॥१॥

बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन बनिये को कथा

किसी नगर में बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न किसी धनी बनिये (सेठ) का लड़का था, जिसकी माँ मर गई थी ॥२॥

दूसरी स्त्री (सौतेली माँ) के वशीभूत और उसी के द्वारा प्रेरित पिता से वनवास के लिए निर्वासित वह पुत्र, अपनी पत्नी के साथ घर से निकल गया ।॥३॥

अपने साथ आते हुए अपने अशान्तचित्त छोटे भाई को लौटाकर वह दूसरे ही मार्ग से गया ॥४॥

चलते-चलते मार्ग में भोजन-रहित वह क्रमशः प्रचंड सूर्य की किरणों से संतप्त महान् मरुस्थल में जा पहुँचा ॥५॥

उस मरुस्थल में, सात दिनों तक थकी-माँदी और भूखी-प्यासी स्त्री को वह अपने मांस और रक्त से जिलाता रहा। वह पापिनी भी उसे खाती-पीती रही। ॥६॥

आठवे दिन, वह एक पहाड़ी जंगल में पहुंचा, जो पहाड़ी नदी की तरंगों से मुखरित, फल-बाले सघन वृक्षों की छायाबाला और हरी घासों के मैदानों से रमणीय था ॥७॥

वहाँ पर थकी-मांदी अपनी पत्नी को कन्द, मूल, फल, जल आदि से स्वस्थ करके वह स्वयं तरंगों से सुशोभित पहाड़ी नदी में स्नान करने के लिए उतरा ॥८॥

उसने नदी की धार में बहते हुए अपना बचाव चाहते हुए कटे हुए हाथपैर बाले एक पुरुष को देखकर, अनेक उपवासों से थके और दुर्बल होते हुए भी उस दयालु महापुरुष ने, नदी की धार में जाकर उसे निकाला ॥९-१०।।

और, उस दयालु राजकुमार ने उस रुंड पुरुष को अपनी पीठ पर उठाकर सूखे स्थान पर रखा और पूछा कि 'भाई, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की' ॥११॥

तब उस पुरुष ने कहा- 'मेरे शत्रुओं ने मुझे कष्टपूर्वक मरने के लिए मेरे हाथ-पैर काट कर मुझे नदी में फेंक दिया ॥१२॥

ऐसा कहते हुए उस पुरुष के घावों पर पट्टियाँ बाँधकर और उसे भोजन आदि से सन्तुष्ट करके उस महापुरुष ने, स्नान जादि क्रिया समाप्त की ।।१३।।

तब कन्द और फल आदि का आहार करते हुए उस वैश्यपुत्र ने, पत्नी के साथ तपस्या करते हुए उसी वन में निवास किया ॥१४॥

एक बार उस बोधिसत्व के अंवा वैश्यपुत्र के कन्द, फल आदि लेने के लिए दूर निकल जाने पर, काम-वासना से पीड़ित उसकी स्त्री, उस रुंड पर आसक्त हो गई और उसके साथ रमण करने लगी ।।१५।।

उसके सम्पर्क में आकर और उससे सम्मति करके अपने पति का वध करने की इच्छा से वह पापिन दुराचारिणी बीमारी का बहाना बनाकर पड़ गई ।।१६।।

दुस्तर नदी के करारे में नीचे की ओर उगी हुई किसी ओषधि को दिखाकर, वह, अपने पति से बोली कि 'यदि तुम उस ओषधि को ला दो, तो मैं जी सकती हूँ, ऐसा मुझे स्वप्न में देवता ने कहा है' ।।१७-१८॥

यह सुनकर साधु स्वभाव उसका पति उस ओषधि को लेने के लिए घास की रस्सी बनाकर, उसे वृक्ष से बाँधकर और उसमें लटककर नदी की ओर लटका। रस्सी के सहारे उसके लटकने पर उस कामिनी ने, रस्सी को खोलकर फेंक दिया। इस कारण उसका पति नदी में गिरकर तेज धारा में बह गया ॥१९-२०।।

पूर्व पुण्यों से रक्षित उस वैश्यपुत्र को नदी ने दूर तक बहाकर एक किनारे पर ले जाकर पटक दिया ॥२१॥

उस तट से ऊपर को चढ़ता हुआ, अपनी स्त्री के कुकर्म को सोचता हुआ और पानी के बहाव से थका-हारा वह वैश्यपुत्र, एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥२२॥

उसी समय उस नगर का राजा मर गया। उस देश में, प्राचीन समय से यह प्रथा चली आ रही थी कि राजा के मरने पर, पुरवासी नागरिक, मंगल-गज को घुमाते थे। बह घूमते हुए सूंड़ से उठाकर जिसे अपनी पीठ पर बैठा लेता था, वही राजग‌द्दी पर बैठाया जाता था ।। २३-२४।।

उसी नियमानुसार धैर्य से सन्तुष्ट विधाता के समान वह हाथी, वृक्ष के तले बैठे हुए वैश्यपुत्र के पास आया और उसने उसे उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया ॥२५॥

तब राजा के मन्त्रियों तथा अधिकारियों ने उस वैश्यपुत्र को नगर में ले जाकर उसका राज्याभिषेक कर दिया ।। २६।।

बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न वह वैश्यपुत्र राज्य पाकर मैत्री, करुणा, मुदिता, क्षमा आदि गुणों के साथ राजशासन करने लगा। चंचल वृत्तिवाली पापिनी स्त्रियों को उसने दूर ही रखा ॥ २७।।

उधर, उसकी पत्नी, निःशंक होकर पति को नदी में डूबकर मरा हुआ जानकर, अपने उस जार को पीठ पर चढ़ाकर इधर-उधर घूमने लगी ॥२८॥

वह कहती थी- 'यह मेरा पति है और शत्रुओं ने इसके हाथ-पैर काट दिये हैं। मैं पतिव्रता हूँ, इसलिए भीख मांगकर भी पति को जिलाती हूँ। इसलिए, मुझे भिक्षा दो' ॥२९॥

इस प्रकार, गाँव-गाँव और नगर-नगर में भीख मांगती हुई वह दुष्टा स्त्री उस नगर में, पहुंची, जहाँ उसका पहला पति, राज्य करता था ॥३०॥

इसी प्रकार वहाँ भीख माँगती हुई वह पतिव्रता होने के कारण जनता में खूब मानी जाने लगी। धीरे-धीरे राजा के कानों में भी उसकी प्रशंसा पहुंची ॥३१॥

राजा ने भी, पीठ पर रुंड को चढ़ाई हुई उसे बुलवाया और भली भांति उसे पहचान कर पूछा कि 'क्या तू ही वह पतिव्रता है?' ॥३२॥

उस पापिनी ने भी राजलक्ष्मी के तेज से परिवर्तित स्वरूपवाले अपने उस पति को न पहचान कर कहा-'हाँ, महाराज, मैं वही पतिव्रता हूँ' ।॥३३॥

तब बोधिसत्त्व का अंश वह राजा, हँसकर बोला- 'इस परिणाम से मैं ने भी तेरा पातिव्रत्य देख लिया। तू वह मनुष्य-रूपी राक्षसी है, जिसे तेरा पति अपना रक्त और मांस देकर भी वश में न कर सका और शरीरहीन रुंड ने, तुझे अपना वाहन बनाया। क्या यह वही तेरा निष्पाप पति है; जिसे तूने नदी में फेंक दिया था। उसी कर्म से तू इस रुंड को ढो रही है और पाल रही है?" ।।३४-३७॥

इस प्रकार, गुप्त रहस्य को खोलनेवाले उस अपने पति को पहचानकर वह स्त्री भय से मूर्च्छित-सी, चित्र-लिखित और मृत-सी हो गई ॥३८॥

तदनन्तर, कौतुक-भरे मन्त्रियों से 'महाराज, यह क्या बात है?' इस प्रकार पूछे गये राजा, ने, सब सत्य समाचार उन्हें सुना दिया ।॥३९॥

तब मन्त्रियों ने, उसे पति-विरोधिनी जानकर उसके नाक-कान कटवा दिये और उस रूंड के साथ उसे उस नगर से बाहर निकलवा दिया ।॥४०॥

नकटी को रूंड के साथ और राजलक्ष्मी को बोधिसत्त्व के साथ मिलाते हुए दैव ने, समान संयोग का उदाहरण प्रदर्शित किया ॥४१॥

इस प्रकार विवेकहीन और निम्न चित्तवृत्तिवाली स्त्रियों की चितवृत्ति दैव-गति के समान नहीं जानी जा सकती ॥४२॥

इसी प्रकार, अपने स्वभाव और चरित्र के रक्षक विशाल हृदयवाले और क्रोध पर विजय करनेवाले व्यक्तियों को सम्पत्तियाँ मानों प्रसन्न होकर विना सोचे ही प्राप्त हो जाती हैं ।॥४३॥

मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा। कहकर नरवाहह्नदत्त के लिए फिर यह दूसरी कथा कहने लगा ॥४४॥

बोधिसत्त्व का अंशावतार कोई व्यक्ति किसी वन में, पर्णकुटी बनाकर करुणा में सदा एकाग्रचित्त होकर तपस्या करता हुआ रहता था ।॥४५॥

यह उस वन में विपदाग्रस्त प्राणियों और पिशाचों का उद्धार करता हुआ अन्यान्य प्राणियों की जल और अन्न से सेवा करता था ॥४६॥

एक-बार, दूसरे के उपकार के लिए, जंगलों में घूमते हुए उसने एक भारी कुँआँ देखा और उसके भीतर झाँका ॥४७॥

तब उसके भीतर पड़ी हुए एक स्त्री, उसे देखकर जोर से बोली- 'हे महात्मन्, मैं (स्त्री), सिंह, स्वर्णचूड पक्षी और सर्प इस प्रकार हम चार व्यक्ति रात को इस कुएँ में गिर पड़े हैं। अतः, कृपाकर हम लोगों को निकालो ॥४८-४९।।

यह सुनकर वह भद्रात्मा उस स्त्री से बोला- 'तुम तीनों यदि अँधेरे में न दीख पड़ने के कारण गिर पड़े हो, तो ठीक है, परन्तु यह पक्षी कैसे गिरा ?' ॥५०॥

'बहेलिये के जाल से बँधा हुआ यह पक्षी भी इसी तरह गिरा' इस प्रकार उस स्त्री ने उत्तर दिया ॥५१॥

तब उस महात्मा ने अपनी तपस्या के बल से उन्हें ऊपर लाना चाहा, किन्तु वह ऐसा न कर सका। उसकी वह सिद्धि नष्ट हो गई ॥५२॥

'यह स्त्री पापिनी, है, अवश्य ही इससे बात करने से मेरी सिद्धि नष्ट हुई है, अतः दूसरी युक्ति करता हूँ'- यह सोचकर उस महात्मा ने, घासों से रस्सी बटकर, उसके द्वारा, अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उन सबको कुएं से बाहर निकाला ।।५३-५४।।

तदनन्तर, आश्चर्य के साथ उसने सिंह पक्षी और सर्प से पूछा- 'तुम्हारी वाणी मनुष्यों के समान क्यों स्पष्ट है और तुम्हारी यह स्थिति क्यों है ? बताओ।' तब उनमें पहले सिंह बोला-पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाले तथा एक-दूसरे के बाधक हम लोगों की बात क्रमसे सुनं । ।॥५५-५६॥

सिह की आत्म कथा

यह कहकर सिंह ने अपनी कथा शुरू की। हिमालय पर्वत पर वैदूर्यश्रृंग नाम का एक उत्तम नगर है। वहाँ पद्मवेग नाम का विद्याधरों का राजा है। उसको वज्रवेग नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७-५८।।

वह वज्रवेग, उस विद्याधरनगर में रहता हुआ अपने बल के घमंड से, जिस किसी के साथ वैर-विरोध कर लेता था।।५९।।

पिता के बार-बार मना करने पर भी जब उसने उसकी बात नहीं मानी, तब उसके पिता ने उसे शाप दिया कि 'तू मृत्युलोक में जाकर गिर' ।॥६०॥

तब वह मदहीन और विद्या-रहित होकर रोता हुआ वज्रवेग, अपने पिता से शाप का अन्त करने के लिए प्रार्थना करने लगा ।॥६१॥

तब उसके पिता ने, क्षणभर सोचकर कहा- पृथ्वी पर, ब्राह्मण का पुत्र बनकर और वहाँ भी इसी प्रकार मद करने के कारण पुनः पिता के शाप से सिह बनकर कुएं में गिरेगा। तब आकर जो महात्मा, तुझे निकालेगा, उसका प्रत्युपकार करके तू शापमुक्त हो जायेगा, ऐसा कह कर पिता ने, उसके शाप का अन्त बतलाया ॥६२-६४।।

तदनन्तर, वह वज्रवेग मालव देश में हरघोष नामक ब्राह्मण के घर में देवघोष इस नाम से उत्पन्न हुआ। वहाँ भी उसने, अपने बल के घंमड से बहुतों के साथ विरोध किया। उसके पिता ने रोका कि 'बहुतों के साथ विरोध न करो' ।॥६५-६६॥

किन्तु, उसकी बात न माननेवाले पुत्र को पिता ने, शाप दिया कि है बल के घमंडी, दुष्टबुद्धि, जा, अब तू सिंह बन जा' ।॥६७॥

तब पिता के शाप से वह देवघोष जो विद्याधर का अवतार था, इस वन में सिह बन गया ।॥६८॥

मुझे वही सिंह समझो। दैवयोग से वन में घूमता हुआ मैं रात को इस कूप में गिरा और आज तुझ महात्मा से उबारा गया ।॥६९॥

इसलिए, अब मैं जाता हूँ। तुम्हें कहीं पर भी कोई विपत्ति आवे, तो मुझे स्मरण कर लेना। उस समय तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शापमुक्त हो जाऊँगा ॥७०॥

ऐसा कहकर सिह के चले जाने पर उस बोधिसत्त्व से पूछा गया सुवर्णचूड पक्षी अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥७१॥

स्वर्णचूड पक्षी की आत्म कथा

हिमालय पर वज्रदंष्ट्र नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी से लगातार पाँच कन्याएँ उत्पन्न हुई ॥७२॥

तब उसने शिवजी की तपस्या करके एक बालक प्राप्त किया। राजा ने जीवन से भी अधिक प्यारे उस बालक का नाम रजतदंष्ट्र रख दिया ॥७३॥

पिता ने, बालकपन में ही, स्नेह के कारण, उसे सभी विद्याएँ सिखा दीं और बन्धुओं की आंखों का तारा वह रजतदंष्ट्र क्रमशः बड़ा हुआ ॥७४॥

एक बार, उसने अपनी बड़ी बहन सोमप्रभा को गौरी के सामने पिंजरक नाम का बाजा बजाते हुए देखा ॥७५।।

'बहन, यह पिंजरक मुझे दो, मैं भी बजाऊँ' इस प्रकार बाल-हठ के कारण बाजा माँगते हुए उसे जब बहन ने बाजा नहीं दिया, तब वह चंचलता के कारण, उसकी बीन छीनकर पक्षी के समान आकाश में उड़ गया ॥७६-७७॥

तब उसकी बहन ने, उसे शाप दिया कि 'तू मेरे पिंजरक को हठपूर्वक लेकर पक्षी के समान उड़ा, इसलिए तू स्वर्णचूड पक्षी बनेगा' ॥७८॥

यह सुनकर उसके चरणों पर गिरे हुए भाई रजतदंष्ट्र द्वारा प्रार्थना की गई सोमप्रभा ने उसके शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥७९॥

'मूर्ख, तू पक्षी बनकर जब अंधेरे कुएं में गिरेगा, तब तुझे जो भी दयालु उससे बाहर निकालेगा, उसका उपकार करने पर तेरे शाप का अन्त होगा बहन से इस प्रकार कहा गया वह भाई रजतदंष्ट्र, स्वर्णचूड पक्षी के रूप में उत्पन्न हुआ ॥८०-८१॥

यह वहीं मैं स्वर्णचूड पक्षी, रात को इस कूप में गिरा हुआ आज तुझ महात्मा द्वारा निकाला गया हूँ, तो अब में जाता हूं ॥८२॥

'संकट के समय, तुम मुझे स्मरण करना। तब तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शाप से मुक्त हो जाऊँगा' ऐसा कहकर वह पक्षी चला गया ।॥८३॥

तदनन्तर, बोधिसत्त्व से पूछे गये सर्प ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार सुनाया ॥८४॥

सर्प की आत्मकथा

मैं पूर्वजन्म में कश्यप ऋषि के आश्रम में मुनिकुमार था। वहाँ एक मुनिकुमार मेरा मित्र या ।।८५।।

एक बार स्नान के लिए सरोवर में उतरने पर मैंने तीर (किनारे) पर आये हुए तीन फनों वाले एक सर्प को देखा ॥८६॥

तब मैंने, स्नान करनेवाले अपने मित्र को हास्य-विनोद से डराने के लिए उस सर्प को मन्त्र के बल से किनारे पर बाँध लिया ॥८७॥

स्नान करके तुरन्त किनारे पर आया हुआ मित्र निश्चल बैठे हुए उस सर्प को सह‌सा देखकर मूच्छित हो गया ।॥८८॥

मैंने ध्यान से यह जानकर चिरकाल के पश्चात् मित्र को चेतन किया। तब मेरे द्वारा डराये गये उसने, मित्र होने पर भी क्रोध से मुझे शाप दिया ।॥८९॥

'जा, तू भी ऐसा ही तीन फनोंवाला साँप हो जा।' मेरे अनुनय-विनय पर उस मित्र ने, मेरे शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥९०।।

सांप बनकर कुएं में गिरे हुए तुझे जो उबारेगा, समय पर उसी का उपकार करके तू शाप मुक्त होगा' ॥९१।।

इस प्रकार सर्प बने और कुएं में गिरे हुए मुझे तुमने निकाला है। अब मैं जाता हूँ। तुम्हारे स्मरण करने पर प्रत्युपकार करके मैं शाप से छूट जाऊँगा' ऐसा कहकर सर्प के चले जाने पर उस स्त्री ने, अपना वृत्तान्त सुनाया ॥९२-९३।।

दुष्टा स्त्री की आत्मकथा

मैं राजा के सेवक एक क्षत्रिय-पुत्र की भार्या हूँ। मेरा पति शूरवीर और त्यागी है। युवा, सुन्दर और आत्माभिमानी है ॥९४॥

तो भी पापिनी मैं ने, दूसरे पुरुष का प्रसंग कर लिया। यह जानकर मेरे पति ने मुझे मारने का विचार किया ॥९५॥

अपनी एक सहेली से यह जानकर उसी समय मैं घर से भागी और रात को इस वन में प्रवेश करके इस कुएँ में गिरी और तुमसे उबारी गई ॥९६॥

अब तुम्हारी ही कृपा से कहीं जाकर जीवन बिताती हूँ और वह दिन भी आये कि मैं आपका प्रत्युपकार कर सकूं।' बोधिसत्त्व से ऐसा कहकर वह कुल्टा वहाँ से गोत्रवर्द्धन नामक राजा के नगर को गई और उसके परिवारवालों से मित्रता करके राजा की महारानी के पास सेविका बनकर रहने लगी ॥९७-९९॥

उस स्त्री के साथ भाषण करने से उस बोधिसत्त्व की सिद्धि नष्ट हो जाने के कारण उस वन में फल-मूलों की भी उत्पत्ति नष्ट हो गई ॥१००॥

तब (फल मूल, आदि के अभाव में) भूख से दुःखित बोधिसत्त्व ने, सबसे पहले सिंह का स्मरण किया। स्मरण करते ही आये हुए सिंह ने मृगों का मांस, लाकर बोधिसत्त्व का जीवन-निर्वाह किया ॥१०१॥

कुछ समय तक मांस खिलाकर उस महात्मा को स्वस्थ बनाकर सिह ने कहा- 'अब मेरा शाप नष्ट हो गया, मैं जाता हूँ' ॥१०२॥

ऐसा कहकर वह सिंह शरीर का त्यागकर विद्याधर हो गया और महात्मा से आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को गया ।॥१०३।।

उसके चले जाने पर भोजन के अभाव से मलिन उस बोधिसत्त्व ने, स्वर्णचूड का स्मरण किया और स्मरण करते ही वह उसके पास उपस्थित हो गया ।॥१०४॥

महात्मा द्वारा उसे अपनी पीड़ा बताने पर, उस पक्षी ने, तुरन्त जाकर रत्नों से जड़े आभूषणों से भरी एक पिटारी लाकर उसे दी ॥१०५।।

और बोला- 'इतने घन से सदा के लिए तुम्हारा जीवन-निर्वाह चलेगा। अब मेरे शाप का अन्त हो गया, तुम्हारा कल्याण हो। अब में जाता हूँ' ।॥१०६।॥

ऐसा कहकर और विद्याधरकुमार बनकर वह अपने लोक को चला गया और जाने पर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया ॥१०७।।

वह बोधिसत्त्व भी, उन रत्नों को बेचने के लिए घूमता हुआ उसी नगर में जा पहुँचा, जहाँ वह कुएँ से निकाली हुई स्त्री रानी की दासी के रूप में काम कर रही थी ॥१०८॥

उस नगर में, जाकर बोधिसत्त्व ने एकान्त में एक वृद्धा के घर में उन आभूषणों को रख दिया और उनमें से कुछ लेकर वह बाजार में बेचने के लिए गया ॥१०९॥

उसने बाजार में जाते हुए सामने से आती हुई उस स्त्री को देखा, जिसे उसने कूप से निकाला था। परस्पर बात होने पर उस स्त्री ने, अपने को महारानी की दासी बतलाया ॥११०-१११।।

उसके द्वारा अपना हाल-समाचार पूछने पर उस सरल महात्मा ने, स्वर्णचूड पक्षी से रत्नों से मंडित आभूषणों का प्राप्त होना बताया और उसे बूढ़ी के घर में ले जाकर आभूषण भी दिखा दिये उस दुष्टा ने जाकर अपनी स्वामिनी से सब कह दिया। स्वर्णचूड पक्षी ने उस रानी के घर के भीतर से उसके देखते-ही-देखते गहनों की पेटी छल से उठा ली थी। उस पिटारी को फिर उस स्त्री के द्वारा अपने नगर में आई हुई जानकर रानी ने, राजा से कह दिया ॥११२-११५।।

राजा ने भी, उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिलाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बंधवाकर बुलवाया ॥११६।॥

उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे इभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११७।।

कारगार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने, ऋषिपुत्र के अवतार उस सर्प का स्मरण किया । स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११८॥

उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- 'मैं जाता हूँ और पैर से शिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९॥

जबतक तुम आकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो, तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२०॥

तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर में राजा को छोड़ दूंगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा ॥१२१॥

ऐसा कहकर सर्प ने, जाकर राजा को लपेट लिया और उसके शिर पर तीनों फन फैला दिये ॥ १२२॥

तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि सत्त्व ने कहा- 'मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ' ।॥ १२३॥

उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही, तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा--।।१२४।।

'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा लेगा, तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूंगा। वे मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं ॥१२५॥

यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा- 'राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥ १२६॥

तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने, उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥ १२७॥

सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी, शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ।॥ १२८॥

इस प्रकार, शुभ विचारवालों को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार-वाले महान् व्यक्तियों को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२९॥

अविश्वास की खान स्त्रियों के हृदय में, प्राण देने पर भी, उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता, अधिक क्या कहा जाय ॥१३०।।

गोमुख ने वत्सराज को इस प्रकार कथा सुनाकर कहा- 'अब फिर और कुछ मूर्खों की कथाएँ सुनो' ॥१३१॥

कहीं पर किसी बौद्धमठ (विहार) में एक मूर्ख भिक्षु रहता था। गलियों में भिक्षार्थ घूमते हुए किसी समय एक कुत्ते ने घुटने में काट लिया या ।॥१३२॥

कुत्ते का काटा हुआ वह मूर्ख अपने मठ में आकर सोचने लगा कि मेरे घुटने में पट्टी बंधी देखकर प्रत्येक भिक्षु मुझसे पूछेगा कि 'तेरे घुटने में क्या हो गया ?' ॥ १३३॥

इस प्रकार में कितनों को कितने समय तक बताता रहूँगा। इसलिए, सब को एक बार ही अपना हाल बताने का उपाय करता हूँ ॥१३४॥

ऐसा सोचकर और मठ की छत पर चढ़कर घड़ियाल बजाने का मूसल लेकर उसने उसे बजा दिया। बिना कारण, असमय में, यह घड़ियाल क्यों बजाता है, यह सुनकर सभी भिक्षु आश्चर्य के साथ वहाँ एकत्र हो गये और उससे घंटा बजाने का कारण पूछने लगे ॥१३५-१३६॥

'मेरे घुटने में कुत्ते ने काट लिया है', इस बात को एक-एक करके मैं, कबतक और कितनों को बताता रहता। यही एक बार बताने के लिए मैंने आपलोगों को यहां एकत्र किया है' ।।१३७॥

इस बात को आप सब लोग जान ले और मेरे घुटने को देख लें भिक्षुओं को ऐसा कहकर उसने अपना घुटना सबको दिखा दिया। तब वे सब भिक्षु पेट पकड़कर हँसने लगे कि इतनी-सी बात के लिए इसने कितना प्रपंच रचा ॥ १३८-॥१३९।।

मूर्ख टक्क की कथा

मूर्ख श्रमण की कथा सुनी, अब एक मूर्ख टक्क की कथा सुनो। किसी स्थान पर एक अत्यन्त कंजूस टक्क रहता था, जो बहुत धनी था ॥१४०॥

वह अपनी पत्नी के साथ सदा बिना नमक का सत्तू खाता था, उसने सत्तू के सिवाय दूसरे अन्न का कभी स्वाद भी नहीं जाना ॥१४१॥

एक बार ईश्वर की प्रेरणा से उसने अपनी पत्नी से कहा- 'आज मेरा मन, खीर खाने को है। इसलिए आज तुम खीर पकाओ' ॥ १४२॥

'ठीक है' कहकर उसकी पत्नी खीर पकाने लगी और वह मूर्ख घर के भीतर खाट पर जाकर पड़ गया कि मुझे बाहर बैठा देखकर कोई मेहमान न आ जाय। इतने में ही उसका एक मित्र धूर्त टक्क आ गया ।॥१४३॥-१४४।॥

उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ।॥१४५॥

पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा- 'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहों' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेगे' ।।१४६-१४७७॥

पति की यह आशा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआा ?' ॥१४८॥

'देखो, मेरा पति मर गया', उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा-कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति, बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देलकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०।।

इसलिए, मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए, ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र, हाय मित्र, इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥

उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख टक्क को शमशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥

तब उसकी स्त्री ने, एकान्त में उसके कान में कहा- 'उठो। नहीं तो ये सारे भाई-बन्धु तुझे श्मशान में ले जाकर भून डालेंगे' ।॥१५३॥

उसने कहा-'ऐसा न होगा। यह धूर्त टक्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः, मैं जब मर गया हूँ, तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूंगा ॥१५४।॥

मेरे जैसे लोगों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राणों से अधिक है।' उस मूर्ख ने, एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥

तब उस दुष्ट मित्र ने, बन्धु बान्धुवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया, किन्तु वह मरते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुख से ही कुछ बोला ।॥१५६॥

इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरों ने भोगा ॥१५७॥

मार्जार-मूर्ख की कथा

कंजूस की कथा सुनी, अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो- 'उज्जयिनी के किसी मठ में एक मूर्ख अध्यापक रहता था ॥१५८॥

चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी, इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९॥

'यहाँ एक बिल्ली लाकर रखो, वह चूहों को खा जाती है' ऐसा उत्तर अध्यापक के मित्र ने दिया ॥१६०।।

'बिल्ली कैसी होती है और कहाँ रहती है, उसे मैंने पहले कभी नहीं देखा', अध्यापक के इस प्रकार कहने पर उसके मित्र ने फिर कहा-॥१६१।।

'उसकी आँखें चमकीली होती हैं, उसका रंग काला और भूरा होता है और पीठ पर रोएंदार चमड़ी होती है। वह यहाँ गलियों में घूमती-फिरती रहती है ॥ १६२॥

मित्र, इन चिह्नों से उसे ढूंढ़कर शीघ्र ही मँगा लो।' ऐसा अध्यापक के मित्र ने उससे कहा और कहकर वह अपने घर चला गया ॥ १६३॥

तब उस मूर्ख अध्यापक ने अपने शिष्यों से कहा- यहाँ बैठे हुए 'तुमलोगों ने बिल्ली के चिह्न तो सुन ही लिये है, अतः गलियों में जाकर इन चिन्हों के अनुसार बिल्ली को ढूँढ़ लाओ' गुरु की आज्ञा से बिल्ली की खोज में, गये हुए वे शिष्य, गलियों में, इधर-उधर घूमने लगे। फिर भी, उन्होंने उन लक्षणोंवाली बिल्ली कहीं नहीं देली। कुछ समय के पश्चात् उन्होंने गली के मुहाने से निकलते हुए एक ब्रह्मचारी बटु को देखा। उसके दोनों नेत्र चमकीले ये, रंग काला और भूरा था और उसने अपनी पीठ पर रोएँदार मृगचर्म ओढ़ रखा या ।।१६४-१६७।।

उसे देखकर उन लोगों ने कहा- 'यही वह बिल्ली है, जिसे हमने सुना था।' अतः, उसे रोककर वे अपने गुरु के समीप ले गये ॥१६८।।

गुरु ने भी मित्र से बताये हुए उन लक्षणों से युक्त उस बटु को देखकर और उसे बिल्ली समझकर अपने मठ में रख लिया ॥ १६९।।

उन्हें 'बिल्ली, बिल्ली' कहते सुनकर उस मूर्ख बटु ने भी, अपने को बिल्ली ही समझ लिया। क्योंकि, वह मूखौँ से अपना यही नाम सुनता था ।।१७०।।

वह बटु (बालक) भी उस अध्यापक के उसी मित्र का पुत्र था, जिसने उसे बिल्ली की पहचान बताई थी ।।१७१।।

प्रातःकाल ही उस मठ में आये उस ब्राह्मण ने वहाँ पर उस बटु (ब्रह्मचारी बालक) को देखा और 'इसे यहाँ कौन लाया ?' इस प्रकार उसने उन मूखों से पूछा ॥१७२॥

तब गुरु के शिष्य बोले- 'हमलोगों ने तुमसे ही बिल्ली का लक्षण सुनकर इसे पकड़-कर यहाँ ला रखा है ॥१७३।।


यह सुनकर वह ब्राह्मण हँसकर बोला- 'अरे मूत्रों, कहाँ यह मनुष्य और कहाँ वह पशु ? बिल्ली के चार पैर होते हैं और उसकी पूंछ भी होती है।' यह सुनकर वे मूलं शिष्य, उस बालक को छोड़कर बोले-'तब वैसे ही ढूंढ़कर लाते हैं ।॥ १७५।।'

ऐसा कहते हुए उन्होंने सभी को हँसा दिया। सच है, मूर्खता किसके हास्य का कारण नहीं होती ॥१७६॥

मार्जार-मूर्ख की कथा सुनी, अब कुछ और मूत्रों की कथाएँ सुनो। किसी एक मठ में मूखों का मुखिया एक महामूर्ख था ।।१७७।।

उसने किसी कथावाचक से सुन लिया कि 'तालाब बनवानेवाले को इस लोक में बहुत पुष्य मिलता है।' वह मठाधीश धनी था। उसने अपने मठ के पास ही पानी से भरा एक विशाल तालाब बनवाया ॥ १७८-१७९॥

एक बार वह मूर्खराज, उस तालाब को देखने के लिए गया। उसने तालाब के किनारों को किसी के द्वारा उखाड़े हुए देखा ॥१८०॥

इसी प्रकार दूसरे दिन उसने दूसरी ओर देखा और वह सोचने लगा कि 'यह कौन इसके किनारों को तोड़ता है। कल प्रातःकाल ही आकर यहां सारा दिन रहकर देखूंगा कि कौन ऐसा करता है-ऐसा सोचकर वह दूसरे दिन प्रातः काल ही ज्यों ही वहाँ आया, उसने आकाश से उतरकर सींग से किनारों को तोड़ते हुए एक बैल को देखा। 'ओह! यह तो दिव्य बैल है, इसलिए मैं भी इसके साथ ही सीधे स्वर्ग क्यों न चला जाऊँ?' - ऐसा सोचकर और उसके पास जाकर उसने हायों से उस बैल की पूंछ पकड़ ली ।।१८१--१८४।॥

पूछ पकड़े हुए उसे लेकर नन्दी भगवान् क्षण-भर में अपने कैलासधाम जा पहुँचे ॥१८५॥

वह मूर्ख मठाधीश, दिव्य भोजन, लड्डू आदि खाकर, कुछ दिनों तक वहीं सुलपूर्वक रहा। नन्दी को प्रतिदिन पृथ्वी पर यातायात करते हुए देखकर वह मूर्खराज, सोचने लगा कि बैल की पूंछ पकड़कर नीचे जाऊँ और अपने बन्बु-मित्रों से मिलूं। उन्हें यह आश्चर्यजनक घटना सुनाकर फिर बा जाऊँगा। ऐसा सोचकर एकबार वह मूर्खराज उस नन्दी के पास जाकर उसकी पूंछ पकड़कर भूमि पर आ गया ।।१८६-१८९।।

तब उसके मठ में पहुंचते ही अन्य मूर्ख, उसे घेरकर बैठ गये और 'कहाँ गये थे ?' उनके ऐसा पूछने पर मूर्ख ने, कैलास-यात्रा का सारा वृत्तान्त उन्हें सुना दिया ॥१९०

सुनकर आश्चर्य चकित वे सभी मूर्ख, उससे प्रार्थना करने लगे कि 'हम लोगों पर भी कृपा करो, हमें भी वहाँ ले चलो। हम लोगों को भी दिव्य लड्‌डू खिलाओ' ॥१९१॥

उनकी बातें सुनकर और वहाँ जाने की मुक्ति बताकर दूसरे दिन तालाब के पास वह उन्हें ले गया और बैल भी वहां आया ॥१९२॥

तब उन मूत्रों के मुखिया महन्त ने, दोनों हाथों से उसकी पूंछ पकड़ ली। उसके पैर दूसरे ने पकड़े और उसके तीसरे ने। इस प्रकार सभी मूों ने एक-दूसरे के पैर पकड़-पकड़कर एक लम्बी पंक्ति-सी बना ली। तब वह बैल वेग से आकाश में उड़ा। पूंछ में लटके हुए अनेक मूखों-बाले बैल के आकाश में जाते समय, दैवयोग से उनमें से एक ने मुखिया से पूछा- मन के अनुकूल फल देनेवाले स्वर्गलोक के प्रति हमारी उत्सुकता बढ़ाओं और यह बताअ कि तुमने कितने बड़े-बड़े लड्डू वहाँ खाये थे ?' ॥१९३-१९६॥

तब अपने सिलसिले को भूलकर उस मूर्ख महन्त ने बैल की पूंछ छोड़ दी और दोनों हाथों को कमल की तरह मिलाकर कहा- 'इतने-इतने बड़े' ।॥१९७॥

जब वह उन्हें हाथ के इंगित से बता ही रहा था कि तबतक वे सब-के-सब मूर्ख लुंड-मुंड होकर आकाश से नीचे गिर गये और बैल अपनी तीव्र गति से कैलास को चला गया। यह देखकर जनता पेट पकड़कर हँसने लगी मूलों की प्रश्नोत्तर-क्रिया भी विवेक-रहित होती है ॥१९८-१९९॥

महाराज, तुमने आकाश में जानेवाले मूर्ख सुने। अब दूसरों को सुनिए एक मूर्ख मार्ग में चलते हुए सही मार्ग भूलकर विपरीत मार्ग पर जा रहा था। लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा कि 'नदी के किनारे जो पेड़ है, उसके ऊपर के मार्ग से जाओ।' वह मूर्ख, पेड़ के पीछे जाकर उस पर चढ़ गया। डाल पर चलते हुए उस पेड़ की बगली पतली डालियाँ नीचे झुक गई। किन्तु, उसने अगली डाल को जोर से पकड़ लिया और नदी के ऊपर झूलने लगा। क्योंकि, लोगों ने उसे पेड़ के पीछे से मार्ग बतलाया था ।।२००-२०३॥

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दाम लम्बक

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जब वह मूर्ख, डाल पकड़कर झूल ही रहा था कि इतने में उस मार्ग से नदी में पानी पीकर एक हाथी लौट रहा था। उस पर महावत भी बैठा था। उसे देखकर पेड़ की डाल में लटकता हुआ मूर्ख दीनतापूर्वक हाथीबान से बोला, 'महात्मा, मुझे पकड़ लो ॥२०४-२०५।।

महावत ने भी, उसे वृक्ष से उतारने के लिए, अंकुश को रखकर, दोनों हाथों से उसके दोनों पैर पकड़ लिये ॥ २०६॥

इतने में ही हाथी के आगे निकल जाने पर महावत भी, पेड़ की डाल में झूलते हुए उस मूर्ख के पैरों में लटक गया ।॥२०७॥

तब डाल में लटका हुआ वह मूर्ख, शीघ्रतापूर्वक महावत से बोला कि 'यदि तू गाना जानता है, तो गा' ॥२०८॥

इसलिए यह सम्भव है कि कोई गाना सुनकर यहाँ आवे और हम दोनों को उतार ले ॥ २०९॥

इस प्रकार, उसके कहने पर महावत ने, इतना अच्छा गीत गाया कि वह लटका हुआ मूर्ख अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया ।॥२१०।।

और उसे वाहवाही देता हुआ यह भूल गया कि मैं लटका हूँ, इसलिए उस मूर्ख ने, अपने दोनों हाथों से चुटकी बजाना प्रारम्भ किया ॥२११॥

इस प्रकार चुटकी बजाने के चक्कर में डाल छूट जाने के कारण वह मूर्ख महावत के साथ ही गिरकर नदी में डूब गया। सच है कि मूखों का साथ किसके लिए हानिकारक नहीं होता ॥२१२॥

नरवाहनदत्त को यह कथा सुनाकर गोमुख ने उसे हिरण्याक्ष की कथा सुनाई ॥२१३॥

हिरण्याक्ष की कथा

हिमालय के मध्य में पृथ्वी का शिरोमणि कश्मीर नाम का देश है, जो विया एवं धर्म का घर है। उस देश में हिरण्यपुर नाम का एक राज्य था, जिसका राजा कनकाक्ष नाम से प्रसिद्ध था। रत्नप्रभा नाम की उसकी रानी से, शिवजी की आराधना के फलस्वरूप एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम हिरण्याक्ष रखा गया। ॥२१४-२१६।।

वह बालक कभी गोलियाँ खेल रहा था। उसने किसी बहाने से मार्ग में आती हुई एक तपस्विनी को गोली से मारा। क्रोष न करनेवाली क्षमाशील तपस्विनी योगीश्वरी ने मुँह बिगाड़ विचकाकर राजकुमार से कहा- 'यदि तुझे अपने यौवन आदि पर इतना घंमड है, तो मृगांक-लेखा को अपनी पत्नी बना लेने पर तुम्हारा पंमड कितना न बढ़ जाय' ।॥२१७--२१९।।

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यह सुनकर उस राजकुमार ने, तपस्विनी से क्षमा-प्रार्थनापूर्वक पूछा कि 'भगवति, वह कौन-सी मुगांकलेखा है? कृपया बताइए' ।॥२२०॥

तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी- 'पर्वतराज हिमालय पर शशितेज नाम का विद्याधरों का राजा है। मृगांकलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है, जो अपने सौन्दर्य से, रात में विद्य। घरों को सोने नहीं देती (अर्थात्, सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१-२२२॥

वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष उससे बोला- 'भगवति, तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ? यह मुनकर योगीश्वरी हिरण्याक्ष से बोली- 'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय (अभिप्राय) समझेंगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥ २२३-२२५॥

यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है, वहीं में प्रातःकाल तुझे मिलूंगी। मैं वहाँ नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ' ।।२२६॥

ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगांकलेखा के पास हिमालय पर गई ।। २२७।।

वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगांकलेखा, अत्यन्त उत्कंठित होकर उससे बोली- ॥२२८॥

'भगवति, यदि वैसे पति को मैंने न पाया, तो इस विफल जीवन से मुझे क्या लाभ है?' इस प्रकार के भावावेश से आक्रान्त मृगांकलेखा ने, हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥ २२९-२३०॥

इधर हिरण्याक्ष भी, मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा- 'तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१-२३२॥

तब तू उस मृगांकलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी पूर्वजन्म की पत्नी है' ।॥२३३॥

इस प्रकार आदेश देकर देवी पार्वती अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल उठकर हिरण्याक्ष ने स्नान, सन्ध्या आदि मंगल-कार्य किये ॥२३४।।

तब अमरेश्वर के सम्मुख जाकर और प्रणाम करके वह बैठ गया, जहाँ पर कि उस तपस्विनी ने मिलने का संकेत दिया था।॥ २३५॥

इसी बीच अपने घर में किसी प्रकार सोई हुई मृगांकलेखा को भी नींद आई और गौरी ने स्वप्न में उसे भी यह आदेश दिया ।।२३६।।

'शापमुक्त और तापसी के हस्त-स्पर्श से पुनः विद्याधर-योनि को प्राप्त हिरण्याक्ष को तू पति के रूप में प्राप्त करेगी। सोच न कर' ॥ २३७॥

ऐसा कहकर देवी के अन्तर्धान हो जाने पर वह प्रातः काल उठी और उस तपत्विनी को, मृगांकलेग्या ने, रात का स्वप्न मुनाया ॥२३८॥

यह सुनकर वह तपस्विनी, मत्र्यलोका में आकर अमरनाथ शिव के मन्दिर में उसकी प्रतीक्षा में बैठे हुए, हिरण्याक्ष से बोली ॥२३९॥

'बेटा, आओ।' विद्याधर-लोक में चले। ऐसा कहकर वे प्रणाम करते हुए हिरण्याक्ष को अपने हाथ से अपना बाहु पर बिठाकर तपस्विनो आकाश में उड़ गई ॥२४०॥

इतने में ही वह हिरण्याक्ष विद्यापुर-राजा होकर शाप के क्षय होने से अपनी पिछली जाति को स्मरण करके उस तपस्विनी से बोला- ॥२४१॥

'हिमालय के वज्रकूट नाम के नगर का अमृततेज नामक राजा मुझे तुम जानो ॥ २४२॥

में पूर्वजन्म में अपमान-जन्य क्रोध के कारण मुनि से शाप प्राप्त करके मत्त्र्यलोक में उत्पन्न हुआ था। तेरे हाथ के स्पर्श तक ही मेरा शाप था ॥ २४३॥

मुनि से शापित मुझे देखकर मेरी पत्नी ने दुःस से अपना शरीर छोड़ दिया। वही मेरी पहली पत्नी इस समय मृगांकलेखा के रूप में है ॥२४४॥

अब मैं तेरे साथ जाकर उसे प्राप्त करूंगा। तेरे पवित्र हाथ के स्पर्श से मेरा वह शाप समाप्त होगया' ।॥ २४५॥

ऐसा कहता हुआ वह विद्याधरेन्द्र अमृततेज आकाश-मार्ग से हिमालय पर गया और वहाँ उसने उद्यान में बैठी हुई मृगांकलेला को देखा और मृगांकलेखा ने भी उसे, जैसा तपस्विनी ने बताया था, उसी रूप में देखा ॥२४६-२४७।।

आश्चर्य की बात है कि पहले कानों के मार्ग से दोनों, परस्पर दोनों के हृदयों में घुसकर फिर बिना निकले ही, वे दोनों आँखों के मार्ग से भी उसी प्रकार, फिर दोनों एक दूसरे के हृदय में घुस गये ॥२४८॥





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