5608. || अष्टम कहानी || वत्सराज की कथा; पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा; मदनमञ्चुका के जन्म की कथा; नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास; नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक; शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा; राजनीति का सार

5608. || अष्टम कहानी || वत्सराज की कथा; पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा; मदनमञ्चुका के जन्म की कथा; नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास; नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक; शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा; राजनीति का सार

अष्टम तरंग

वत्सराज की कथा (अनुक्रमशः)

एक बार रात के समय वत्सराज उदयन, कलिंगसेना के अनुपम सौन्दर्य का स्मरण करके कामावेश से क्षुब्ध (उत्तेजित) हो गया ।।१।।

और उठकर हाथ में नंगी तलवार लिये अकेले ही उसके भवन में गया। कलिंगसेना ने आदर-सत्कार के साथ उसका स्वागत किया ॥२॥

तब राजा ने उससे पत्नी बनने की प्रार्थना की। उत्तर में कलिंगसेना ने कहा- 'अब मैं दूसरे की पत्नी हो गई हैं'- ऐसा कहकर उसे रोक दिया ॥३॥

'तू तीसरे पुरुष के पास चली गई, इसलिए व्यभिचारिणी हो गई। अत. तेरा समागम करने में कोई दोष नहीं', वत्सराज ने कहा ।।४।।

राजा के इस प्रकार कहने पर कलिंगसेना ने कहा- 'हे राजन् ! मैं तुम्हारे लिए यहाँ आ गई, किन्तु तुम्हारा रूप धारण करनेवाले मदनवेग नामक विद्याधर ने गुप्त रूप से मेरे साथ विवाह कर लिया। वही मेरा एक पति है, अब मैं व्यभिचारिणी कैसे हुई ॥५-६।॥

अपने सम्बन्धियो का परित्याग कर स्वेच्छाचार से आत्मपतन करनेवाली स्त्रियों के लिए यदि ये विपत्तियाँ है, तो कुमारी कन्याओं की तो बात ही क्या ? ॥७॥

अशकुन को जाननेवाली सहेली द्वारा रोके जाने पर भी मैंने तुम्हारे पास जो दूत भेजा, उसी का यह परिणाम है ॥८॥

इसलिए यदि बलपूर्वक मेरा स्पर्श करोगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी। कौन कुलीन स्त्री पति के साथ द्रोह (विश्वासघात) करेगी' ।॥९॥

पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा

इस विषय में तुमसे एक कथा कहती हूँ, सुनो- पहले समय में चेदि-देश का राजा इन्द्रदत्त था ।।१०।।

उस राजा ने शरीर को क्षणभंगुर समझकर यश रूपी शरीर की रक्षा के लिए पापशोधन नामक तीर्थ में बहुत बड़ा एक देव-मन्दिर बनवाया ।।११।।

एक बार वह राजा भक्ति से प्रेरित हो, उस मन्दिर को देखने के लिए वहाँ गया। वहाँ पर तीर्थस्नान के लिए प्रायः सभी मनुष्य आये हुए थे ।॥१२॥

एक बार राजा ने तीर्थस्तान के लिए आई हुई एक वैश्यवधू को देखा; जिसका पति व्यापार के निमित्त प्रवास (यात्रा) में था ॥१३॥ 

स्वच्छ लावण्यमय सुधा से सींची हुई आश्चर्यमय रूपराशि, आभूषणों से अलंकृत और मन को आकृष्ट करनेवाली कामदेव की राजधानी के समान वह स्त्री थी। और, वह स्त्री 'तेरे द्वारा मैं विश्व-बिजय करूँगा' - मानों इस प्रकार कामदेव के तरकस-रूपी दोनों पैरों (पिंडलियों) से युक्त थी ।।१४-१५।।

देखते ही उस स्त्री ने राजा के मन को ऐसा हर लिया कि विवश होकर वह राजा उसके घर का पता लगाकर रात में वहाँ गया ।॥१६॥

प्रार्थना करते हुए राजा से उसने कहा- 'तुम तो प्रजा के रक्षक हो। तुम्हें परस्त्री का धर्म नहीं बिगाड़ना चाहिए' ।॥१७॥

यदि बलपूर्वक मुझे छुओगे, तो तुम्हे पाप लगेगा। मैं भी तुरन्त मर जाऊँगी। इस कलंक का कदापि सहन न करूँगी ॥१८॥

ऐसा कहने पर भी राजा के बलात्कार करने की चेष्टा करने पर शील नाश होने के भय से उस वैश्य-वधू का हृदय तुरन्त फट गया। यह देखकर लज्जित राजा लौट गया और उसी पश्चात्ताप से वह भी मर गया ।।१९-२०॥

इस प्रकार इस कथा को कहकर भय और नम्रता से भरी हुई कलिंगसेना ने वत्सराज से कहा- 'इसलिए मेरे प्राण हरण करनेवाले अधर्म में मन को न लगाओ। मैं तुम्हारी आश्रित हूँ। तुम मुझे यहाँ रहने दो अथवा में यहाँ से चली जाऊँ ॥२१-२२॥

कलिंगसेना की ऐसी बातें सुनकर धर्मात्मा वत्सराज पारकर्म से विरत होकर उससे कहने लगा-'हे राजकुमारी तुम अपने पति के साथ अपनी इच्छा से यहाँ रहो। मैं तुम्हें कुछ न कहूँगा। अब भय न करो' ।॥२३-२४।।

ऐसा कहकर राजा के अपने भवन में चले जाने पर, यह सब समाचार सुनकर मदनवेग आकाश से उतरा ॥२५॥

आकर अपनी पत्नी कलिंगसेना से बोला- 'तूने बहुत अच्छा किया। यदि इसके अन्यथा करती, तो मैं कदापि सहन न करता' ।॥ २६॥

ऐसा कहकर कलिंगमेना को धीरज बँधाकर और उसके साथ रात बिताकर मदनवेग, उसी भवन में आना-जाना करने लगा ।। २७।।

वह कलिंगसेना भी अपने पति विद्याधरराज के साथ मनुष्य-शरीर से भी दिव्य भोगों का उपभोग करती हुई वहाँ रहने लगी ॥२८॥

वत्सराज भी कलिंगसेना की चिन्ता छोड़कर मन्त्री यौगन्धरायण की बात सोचता हुआ महारानी, राज्य और पुत्र को मानों पुनः प्राप्त कर प्रसन्न रहने लगा ॥ २९॥

नीति-रूपी कल्पलता के फलने-पकने पर रानी वासवदत्ता और मन्त्री यौगन्धरायण भी निश्चिन्त हो गये ॥३०॥

मदनमञ्चुका के जन्म की कथा

कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कुछ पीले और पतले मुँहवाली तथा विविध प्रकार की इच्छाएँ रखनेवाली कलिंगसेना ने गर्भ धारण किया ॥३१॥

कालिमा लिये हुए उसके उत्तुंग स्तनों के अग्रभाग, कामदेव की मद-मुद्रा से अंकित उसके कोष (खजाने) के घड़ों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥३२॥

तब उसके पति मदनवेग ने एक बार उससे कहा- 'हे कलिंगसेना, दिव्य व्यक्तियों का यह नियम है कि मनुध्य-योनि मे उत्पन्न अपने गर्भ को छोड़कर दूर चले जाते हैं। क्या मेनका ने कण्व के आश्रम में शकुन्तला को नहीं छोड़ दिया था ? ॥३३-३४।।

यद्यपि तू भी पूर्वजन्म की अप्सरा है, किन्तु अपने ही अविनय (उद्दंडता) के कारण इन्द्र के शाप से मानव-योनि को प्राप्त हुई है ॥ ३५॥

इसी कारण पतिव्रता होने पर भी तूने बन्धकी (व्यभिचारिणी) यह विशेषण प्राप्त किया। इसलिए तू अपनी सन्तान की रक्षा करना और मैं अपने स्थान को चला जाऊँगा ।। ३६॥

जब तू मुझे स्मरण करेगी, तभी तेरे समीप आ जाऊँगा।' विद्याधर ने आँसू बहाती हुई कलिगसेना से इस प्रकार कहा ॥ ३७।।

और, उसे धीरज बँधाकर तथा अच्छे-अच्छे रत्न उसे देकर, उसी में मन लगाया हुआ और समय हो जाने के कारण खिचा हुआ विद्याधर-राज चला गया ॥ ३८॥

कलिंगसेना भी सखी के समान सन्तान की आशा को लिये हुई वत्सराज की छत्रछाया के सहारे बहीं रहने लगी ।॥३९।।

इसी बीच कामदेव की पत्नी रति ने सम्पूर्ण शरीरयुक्त पति (कामदेव) की प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की और शिवजी ने उसे आज्ञा दी कि 'मेरे द्वारा पहले भस्म किया गया वह तेरा पति (कामदेव) वत्सराज के घर में उत्पन्न हुआ है? उसका नाम नरवाहनदत्त है। मेरे साथ उद्दंडता करने के कारण वह देवता होकर भी योनिज है। मेरी आराधना के फलस्वरूप तू भी मत्र्यलोक में अयोनिज होकर सम्पूर्ण शरीरबाले पति से मिलेगी' ।॥४०-४२॥

रति से ऐसा कह‌कर शिवजी ने प्रजापति से कहा- 'कलिंगसेना दिव्य वीर्य से उत्पन्न पुत्र का प्रसव करेगी ॥४३॥

तुम उसका अपहरण करके उसके स्थान पर इस रति को मनुष्य बनाकर रख देना' ।॥४४॥

इस प्रकार ईश्वर (शिव) की आशा को शिर से स्वीकार करके ब्रह्मा के चले जाने के पश्चात् समय आने पर कलिंगसेना ने प्रसव किया ॥४५॥

इतने में ही प्रजापति ने अपनी माया के प्रभाव से उसके पुत्र का अपहरण करके रति को मानुषी कन्या बनाकर अलक्षित रूप से उसके समीप रख दिया ॥४६॥

दिन में भी अचानक प्रतिपदा की चन्द्रलेखा के समान उदित उस कन्या को उत्पत्ति को वहाँ रहनेवाले सभी लोगों ने सत्य समझा ॥४७॥

वह कन्या, अपने शरीर की कान्ति मे, रत्नों की प्रभा को निस्तेज करती हुई प्रसूति गृह को आलोकित कर रही थी ॥४८॥

कलिंगसेना ने अनन्यसदृशी (अद्भूत) कन्या को देखकर पुत्रजन्म से भी अधिक हर्ष और प्रसन्नता के साथ व्यापक उत्सव मनाया ।॥४९।।

तदनन्तर वत्सराज उदयन ने अपनी रानियों और मन्त्रियो के साथ कलिगसेना द्वारा उत्पन्न हुई अनुपम कन्या का वृत्तान्त सुना ।॥५०॥

सुनते ही भगवत्प्रेरित राजा ने रानी और यौगन्धरायण के सामने ही इस प्रकार कहा- 'मैं समझता हूँ कि यह कलिगसेना शाप से पतित कोई स्वर्गीय स्त्री है। इससे उत्पन्न हुई यह कन्या भी दिव्य ही है; क्योकि इसका रूप आश्चर्यमय है।॥५१-५२।।

इसलिए यह कन्या रूप से मेरे बालक के समान है। यह नरवाहनदत्त की महारानी होने के लायक है ।।५३॥

राजा के ऐसा कहने पर वासवदत्ता ने राजा से कहा, महाराज, आज तुम यह क्या कह रहे हो ? कहाँ मातृकुल और पितृकुल दोनों से शुद्ध यह तुम्हारा पुत्र और कहाँ व्यभिचारिणी से उत्पन्न कलिंगसेना की कन्या ? ।।५४-५५।।

यह सुनकर सोचते हुए राजा ने कहा, यह मै स्वयं नही कह रहा हूं, बल्कि मेरे अन्तर में बैठा हुआ कोई मुझसे कहलवा रहा है ।।५६।।

और, ऐसी आकाशवाणी भी सुन रहा हूँ कि यह कन्या नरवाहनदत्त की पूर्वजन्म की पत्नी है। साथ ही, उच्च्चकुलप्रसूता कलिंगसेना भी एक पतिव्रता स्त्री है। पूर्व-जन्मकृत कर्म के कारण उसके लिए बन्धकी शब्द का प्रयोग हुआ है ।।५७-५८।।

राजा के इस प्रकार कहने पर मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा- 'महाराज, सुना जाता है कि कामदेव के दग्ध हो जाने पर उसकी पत्नी रति ने तपम्या की कि मत्त्यंलोक में अवतीर्ण सशरीर कामदेव से मेरा समागम हो। तपस्या से प्रसन्न होकर अपने पति को चाहती हुई रति को वर मिला कि तू भी मनुष्य-योनि में जन्म लेकर अपने पनि ने मिलेगी ।।५९-६०।।

पहले ही दिव्यबाणी ने तुम्हारे पुत्र को कामदेव का अवतार घोषित किया है। यह कन्या भी शिवजी की आज्ञा से रति के अवतार-रूप में उत्पन्न हुई है। यह बात प्रसव करानेवाली धात्री ने एकान्त में मुझसे कही है ।॥६१-६२॥

उसने बताया कि मैंने कलिगगेना के गर्भ को पहले गय्या पर देखा था, उसी समय उसे परित्तित रूप में देखा ॥६३।।

उस आश्चर्य को देखकर ही मैं तुम्हें कहने आई हूँ। इस प्रकार, उस स्त्री ने मुझसे कहा और मेरी बुद्धि भी यही कहती है। अतः, मैं समझता हूं कि देवताओं ने अपनी माया के प्रभाव से उस अयोनिजा रति को कन्या बनाकर वहाँ रख दिया और वास्तविक गर्भ को तिरोहित कर दिया है ।।६४-६५।।

यही कन्या, कामदेव के अवतार तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की पत्नी है। इस सम्बन्ध में मैं एक यक्ष की कथा कहता हूँ, सुनो' ।।६६।।

विरूपाक्ष नामक एक यक्ष, कुबेर का भृत्य था। वह लाग्यो खजानों का प्रधानाध्यक्ष बन गया ।। ६७।।

उसने मथुरा नगरी के बाहरी भाग में स्थित एक खजाने की रक्षा के लिए पत्थर के स्तम्भ के समान एक यक्ष को नियुक्त किया ॥६८॥

किसी समय उस नगरी का निवामी. खजाने को जाननेवाला एक ब्राह्मण खजाना खोजने के लिए वहाँ आकर भूमि की परीक्षा करने लगा। परीक्षा करते हुए, उसके हाथ की मनुष्य की चर्बी से जलती हुई बत्ती एक स्थान पर गिर पड़ी ।॥६९-७०॥

इस लक्षण से ब्राह्मण ने उसी स्थान पर खजाने का होना निश्चित करके अपने अन्य ब्राह्मण-मित्रों के साथ खजाना खोदना आरम्भ किया ।।७१॥

तब उस यक्ष ने, जो उसकी रक्षा के लिए नियुक्त था, अपने अधिकारी विरूपाक्ष से यह समाचार कहा ।।७२।।

क्रोषी विरूपाक्ष ने उस यक्ष को आदेश दिया- 'जाओ, उन खजाना खोदनेवाले दुष्टों को खजाना मिलने के पहले ही मार डालो' ॥७३।।

उस यक्ष ने आकर अपनी युक्ति से उन निधानवादी असफल मनोरथ ब्राह्मणों को मार डाला ॥७४।।

यह सब जानकर, कुबेर विरूपाक्ष पर क्रोध करके बोले- 'अरे पापी, तूने सहसा यह ब्रह्महत्या क्यों करा दी। खजाना खोजनेवाले दरिद्र क्या नहीं करते ? उन्हें विघ्न करके और त्रास आदि दिखाकर दूर किया जाता है, जान से नही मारा जाता' ।।७५-७६।।

ऐसा कहकर कुबेर ने उस यक्ष को शाप दिया कि तू इस पाप को करने से मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगा ॥७७।।

तदनन्तर वह शापित विरूपाक्ष मनुष्य-योनि मे किसी ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुआ।

तब उस यक्ष विरूपाक्ष की पतिव्रता पत्नी ने कुवेर से प्रार्थना की- 'हे स्वामी ! मुझे भी वहीं फेंक दो, जहाँ तुमने मेरे पति को फेंका है। मैं उसमे वियुक्त होकर जीवित नहीं रह सकती'।

उस पतिव्रता की प्रार्थना पर कुबेर ने कहा- ॥७८-८०॥

'तेरा पति जिस ब्राह्मण के घर मे उत्पन्न हुआ है; तू उसी ब्राह्मण की दासी के घर में गिरेगी और योनि से उत्पन्न नही होगी। वहाँ पर पनि के साथ तेरा समागम होगा और तेरी कृपा से वह शाप से मुक्त होकर पुनः मेरे पास आ जायगा' ॥८१-८२॥

इस प्रकार, कुबेर के आदेश से वह सती यक्षिणी मानुषी कन्या बनकर उसी ब्राह्मण की दासी के द्वार पर जा गिरी ॥८३॥

दासी ने उस अद्भुत कन्या को अकस्मात् देखा और उसे अपने स्वामी उस ब्राह्मण के पास ले गई ।।८४।।

'यह कन्या कोई दिव्य स्त्री है और इसीलिए अवश्य अयोनिजा है। मेरी आत्मा ऐसा कहती है। तू इसे बिना किसी शंका के ले आ ।।८'५।।

यह मेरे पुत्र की पत्नी होने योग्य है'। ब्राह्मण, अपनी दासी को ऐसा कहकर प्रसन्न हुमा ॥८६॥

क्रमशः वह कन्या और ब्राह्मणकुमार दोनों बड़े हो गये और परस्पर देखने से ही घनिष्ठ प्रेमी बन गये ॥८७।।

तदनन्तर ब्राह्मण ने उन दोनों का विवाह करके उन्हे दम्पती बना दिया। वे दोनों पूर्व-जन्म का स्मरण न करते हुए भी ऐसा अनुभव करते थे, मानों वे परस्पर चिरकालीन वियोग के पश्चात् मिले हों ।॥८८॥

कुछ समय के अनन्तर उस यक्ष पति के मरने पर वह स्त्री भी सती हो गई और उसी के तप के प्रभाव से वह यक्ष पुनः विरूपाक्ष होकर अपने पूर्व पद को प्राप्त कर सका ।।८९।।

इस प्रकार, निरपराध देवता, अयोनिज होकर कारणवश दैवमाया से भूतल में अवतार लेते हैं ।॥९०।।

नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास

'हे राजन् ! तेरा और इसका कुल क्या। कलिंगसेना की यह देवताओं द्वारा निर्मित पुत्री तेरे पुत्र की पत्नी है।' यौगन्धरायण के ऐसा कहने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने इस बात को हृदय में स्थान दिया ।।९१-९२।।

तदनन्तर मुख्यमन्त्री के चले जाने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने पान (मद्यपान) आदि मनोविनोदों से उस दिन को सुखपूर्वक व्यतीत किया ॥९३॥

कुछ दिनों के व्यतीत होने पर मोह से अपने पूर्वजन्म की म्मृति को भूली हुई कलिंगसेन। की कन्या अपनी रूप-सम्पत्ति के साथ बडी होने लगी ।।९४।।

मदनवेग नामक विद्याधर की कन्या होने के कारण माता तथा अन्य लोगो ने उसका नाम मदनमंचुका रख दिया ॥९५॥

उस कन्या ने संसार की सभी सुन्दरी कन्याओं के रूप को ले लिया था; अन्यथा उसके सामने वे सब विरूप कैसे हो जाती ? ॥९६॥

उसे अत्यन्त रूपवती सुनकर कौतुक के कारण रानी वासवदत्ता ने एक बार अपने पास बुलवाया। वहाँ पर घात्री (दाई) के मुँह से चिपकी हुई उसे राजा और यौगन्धरायण आदि ने भी जललेदीपक की बत्ती की शिखा (लौ) के समान देखा ॥९७-९८।।

उसके अपूर्व रूप और आँखों में अमृत-वर्षा करनेवाले शरीर को देखकर, यह रति ही अवतीर्ण हुई है, ऐसा सभी ने माना ॥९९॥

तब रानी ने संसार के नेत्रों के उत्सव देनेवाले अपने पुत्र नरवाहनदत्त को बुलवाया ।।१००۱۱

खिले हुए मुख-कमलवाले बालक नरवाहनदत्त ने उस कन्या को इस प्रकार देखा, जैसे सरोवर, प्रातःकालीन नवीन सूर्य-रश्मियों को निहारता है ।।१०१॥

वह कन्या मदनमंचुका भी आँखों को आनन्द देनेवाले नरवाहनदत्त को देखती हुई उसी प्रकार अतृप्त रह गई, जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखते रहने पर भी तृप्त नही होती ॥१०२॥

परस्पर दर्शन के अनन्तर वे दोनों बालक होने पर भी स्थिर न रह सके। यद्यपि वे दोनों अलग-अलग थे, किन्तु दृष्टिपाश से बंधे हुए, अतएव एक थे ।॥१०३॥

यह देखकर बत्सराज ने उन दोनों के सम्बन्ध को देवताओं द्वारा निश्चित किया हुआ समझकर बिवाह करने की इच्छा की ।।१०४।।

कलिंगसेना यह जानकर प्रसन्न हुई और नरवाहनदत्त को जामाता के प्रेम से देखने लगी ।।१०५।।

तब वत्सराज ने मन्त्रियों से सम्मति करके अपने पुत्र के लिए अपने ही राजभवन के समान भवन का निर्माण कराया ।।१०६।।

नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक

समयज्ञ राजा ने सब सामान एकत्र करके प्रशंसनीय गुणोंवाले कुमार नरवाहनदत्त का यौवराज्य (युवराज) पद पर अभिषेक कर दिया ॥१०७॥

अभिषेक के समय उस युवराज के शिर पर पहले माता-पिता के आनन्दाश्रु गिरे, तदनन्तर वेद-मन्त्रों से पवित्र तीर्थों का जल गिरा ॥ १०८॥

अभिषेक के जल से उसके मुख-कमल के घुल जाने पर, दिशाओं के मुँह भी घुल गये, यह आश्चर्य है ! ॥१०९।।

माताओं द्वारा उसके गले में मंगल-मालाएँ पहनाने पर, आकाश ने भी उसी क्षण दिव्य पुष्पों और मालाओं की वर्षा की ।॥११०।।

हर्ष से बजनेवाले देवताओं के वाद्यों की स्पर्धा में मानों आनन्द-वाद्यो के शब्द आकाश में गूंजने लगे ॥१११।।

अभिषेक किये हुए उस युवराज को किसने प्रणाम नही किया ? फलतः, अपने प्रभाव के अतिरिक्त इसी कारण वह ऊँचा उठा ॥११२॥

तब बत्सराज उदयन ने, युवराज के बालमित्र अपने मन्त्रियों के पुत्रो को बुलाकर उन्हें युवराज के मन्त्रियों का पद दे दिया ॥११३॥

यौगन्धरायण के पुत्र मरुभूति को मुख्य मंत्री, रुमण्वान् के पुत्र हरिशिख को प्रधान सेनापति, वसन्तक के पुत्र तपन्तक को विनोद-मन्त्री और इत्यक के पुत्र गोमुख को प्रधान द्वारपाल बना दिया ।।११४-११५।।

और-पिगलिका के पुत्र तथा पुरोहित के भतीजे वैश्वानर तथा शान्तिसोम को युवराज पुरोहित नियुक्त किया ।।११६॥

राजा द्वारा इस प्रकार युवराज के मन्त्रियों के नियुक्त किये जाने पर आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ दिव्यवाणी हुई कि 'ये सभी मन्त्री इसके अभिन्नहृदय मित्र होंगे, किन्तु गोमुख इसके शरीर से भो भिन्न न होगा' ।।।११७-११८॥

इस प्रकार दिव्यवाणी से कहा गया वत्सराज अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वस्त्र-आभूषण आदि से उसने सबका सम्मान किया ।।११९॥

उस राजा उदयन के, सेवको पर धन की वर्षा करने पर दरिद्र शब्द के केवल अर्थ की ही संगति नहीं रही¹ ।॥१२०॥

वायु द्वारा आन्दोलित अतएव फडफडाती हुई पताकाओं के वस्त्रों की पंक्ति से मानों वह नगरी निमन्त्रित नर्त्तकियो और चारणो से भर गई थी ॥१२१॥

होनेवाले कलिंगसेना के जामाता के इस महोत्सव मे मानो विद्याधरों की राजलक्ष्मी स्वयं आ गई ॥१२२॥

तदनन्तर रानी वासवदत्ता, प‌द्मावती तथा कलिगसेना ये तीनो मिलकर सम्मिलित शक्तियों के समान नाचने लगी ।।१२३॥

वायु द्वारा आन्दोलित लताएँ चारों ओर नृत्य कर रही थी और उद्यानों के वृक्ष इस नृत्य में भाग ले रहे थे। चेतन प्राणियो की तो बात ही क्या है ? ॥१२४।।

अभिषिक्त युवराज नरवाहनदत्त जयकुंजर पर चढ़कर बाहर निकला और नागरिक स्त्रियों के नीलकमल रूपी-लावे (धान के खीलों) की अजुलियों के समान नील, श्वेत और लाल नेत्रों से छा दिया गया ।।१२५-१२६॥

युवराज सवारी से नगर-देवता का दर्शन करता हुआ एवं बन्दियो और सूतों से स्तुति किया जाता हुआ अपने मन्त्रियों के साथ युवराज-भवन में गया ।।१२७॥

वहाँ पर सबसे पहले कलिंगसेना ने अपने वैभव से भी बढ़कर भोजन-पान की दिव्य वस्तुओं से उसका स्वागत किया और जामाता के स्नेह से गद्गद होकर विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण मन्त्रियों सहित युवराज को दिये ॥१२८-१२९॥

इस प्रकार, अमृतास्वाद के समान सुन्दर महोत्सव का यह दिवस, वत्सराज आदि सबने मुख के साथ व्यतीत किया ।॥ १३०॥

रात होने पर कन्या के विवाह के लिए विचार-विमर्श करने के लिए कलिंगसेना ने अपनी प्राणप्यारी सखी सोमप्रभा का स्मरण किया ॥१३१॥

कलिंगसेना द्वारा स्मरण की गई मयासुर की कन्या सोमप्रभा को उसके महाज्ञानी पति नलकूबर ने कहा-॥१३२॥

'प्यारी, आज कलिंगसेना अत्यन्त उत्कंठा से तेरा स्मरण कर रही है, इसलिए जाओ और उसके लिए दिव्य उद्यान बनाओ' ।। १३३।।

ऐसा कहकर और कलिंगसेना के सम्बन्ध में भूत और भविष्य का वर्णन करके सोमप्रभा को उसके पति ने तुरन्त भेज दिया ।। १३४।।

वह सोमप्रभा भी आकर चिर-उत्कंठा से गले मिलती हुई कलिंगसेना से कुशल-समाचार पूछने के उपरान्त कहने लगी- ।।१३५।।

'तू अत्यन्त धनी विद्याधर के साथ विवाहित हुई है और शिवजी की कृपा से तेरे यहाँ रति ने अवतार लिया है ।।१३६।।

तेरी यह कन्या, वत्सराज के यहाँ उत्पन्न हुए कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त की पूर्व-जन्म की पत्नी है ।।१३७॥

वह नरवाहनदत्त. दिव्य कल्प वर्षों तक, विद्याधरो पर राज्य करेगा और तुम्हारी कन्या उसके यहाँ के स्त्री-समाज में सर्वमान्य और सम्राज्ञी बनी रहेगी ॥१३८॥

तू भी इन्द्र के शाप से भूलोक में पतित पूर्व-जन्म की अप्सरा है और कुछ शेष कार्यों को समाप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगी ॥१३९।।

हे सखि, यह सब मेरे ज्ञानी पति ने मुझे बताया है। और, में तुम्हारी कन्या के लिए एक उद्यान बना देती हूँ। ऐसा उद्यान पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग में कही भी नही होगा' ।।१४०-१४१॥

ऐसा कहकर और अपनी माया में दिव्य उद्यान का निर्माण करके उत्कंठित कलिंगसेना से पूछकर सोमप्रभा चली गई ॥१४२॥

तदनन्तर प्रातःकाल होते ही लोगों ने उस उद्यान को इम प्रकार देखा, मानों स्वर्ग का नन्दन-वन अकस्मात् वहाँ उतर पडा हो ।॥ १४३॥

इस समाचार को सुनकर वत्सराज अपनी पत्नियों और मन्त्रियों सहित वहाँ आया। युवराज नरवाहनदत्त भी अपने साथियों के साथ वहाँ गया ।॥१४४।।

राजा ने वहाँ उस उद्यान को देखा, जिसमें सदा फल और फूल देनेवाले वृक्ष लगे हुए थे। विविध प्रकार के माणिक्य-स्तम्भों, दीवारों, चबूतरो और बावलियों से वह शोभित था। उसमें स्वर्णिम पक्षी विहार कर रहे थे। दिव्य मुगन्धिवाली वायु बह रही थी। यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानों देवताओं की आज्ञा मे पृथ्वी पर दूसरे स्वर्ग का निर्माण किया गया हो ।।१४५-१४६।।

उस अद्भुत उद्यान को देखकर वत्सराज ने स्वायतातिथ्य में व्यग्र कलिंगसेना से पूछा कि 'यह सब क्या है?' ॥१४७॥

तब कलिगसेना सबके सामने राजा से बोली- 'महाराज ! विश्वकर्मा का अवतार मयासुर नाम का एक महान् असुर है, जिसने इन्द्र की आज्ञा से युधिष्ठर का सुन्दर नगर बनाया था। सोमप्रभा नाम की उसी की कन्या मेरी सखी है। उसने रात में मेरे पास आकर अपनी माया से और अपने ही प्रेम से मेरी कन्या के लिए यह उद्यान बनाया है' ।।१४८-१५०।।

ऐसा कहकर, और भी सहेली ने भूत एवं भविष्य की जो बातें बताई थी, राजा को उसी प्रकार सुना दी ।॥१५१॥

तब सभी ने कलिंगसेना की बात को प्रामाणिक मानकर, संशय-रहित होकर परम हर्ष और विश्वास प्रकट किया ।।१५२॥

वत्सराज ने वह समस्त दिन अपनी स्त्री और पुत्र आदि के साथ कलिगसेना के स्वागत में ही व्यतीत किया ।। १५३।।

दूसरे दिन, देव-मन्दिर में दर्शन के लिए गये राजा ने सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्राभरणों से अलंकृत स्त्रियों को देखा ॥ १५४॥

'तुम सब कौन हो'- राजा के इस प्रकार पूछने पर वे स्त्रियाँ कहने लगीं- 'हम सब विद्याएँ और कलाएं हैं और तुम्हारे पुत्र के लिए यहाँ आई है' ।॥१५५।।

अब जाकर उसी में प्रवेश करती हैं, इतना कहने के उपरान्त वे सब अन्तर्धान हो गई और आश्चर्यचकित राजा भी मन्दिर के भीतर गया ।। १५६।।

उसने वहाँ जाकर यह वृत्तान्त अपनी रानियों और मन्त्रियो को सुनाया। सब उसे देवता का अनुग्रह समझकर उसका अभिनन्दन करने लगे ॥ १५७॥

तदनन्तर राजा की आज्ञा से वासवदत्ता ने भी वीणा उठाई और राजकुमार नरवाहनदत्त ने मन्दिर में प्रवेश किया ॥ १५८॥

वीणा बजाती हुई माता से राजकुमार ने नम्रतापूर्वक कहा- 'तुम्हारी वीणा स्थान (स्वर-स्पन्दन की मात्रा) से भ्रष्ट हो रही है ॥१५९॥

तदनन्तर 'तू इसे ले और बजा', पिता की आज्ञा पाकर वीणा बजाते हुए राजकुमार ने गन्धवों को भी बिस्मित कर दिया ।। १६०।।

इस प्रकार, सभी बिद्याओं और कलाओं में पिता द्वारा परीक्षित राजकुमार ने उत्तीर्णता प्राप्त की। वह स्वयं सब कुछ जान गया था ।। १६१।।

राजकुमार को सभी विद्याओं और कलाओं में प्रवीण जानकर वत्सराज ने कलिंगसेना की कन्या मदनमंचुका को नृत्त-विद्या (वह नाच, जिसमें केवल अंगों का विक्षेप किया जाता है) सिखा दी ॥ १६२॥

जैसे-जैसे चन्द्रमा के समान शरीरवाली वह मदनमंचुका कलापूर्ण होने लगी, वैसे ही वैसे नरवाहनदत्त-रूपी समुद्र क्षुब्ध और उद्वेलित होने लगा ।॥ १६३॥

वह (नरवाहनदत्त) उस (मदनमंचुका) को नाचती और गाती देखकर प्रसन्न होता था; क्योंकि वह मदनमंचुका अपने अंग आदि के अभिनय से मानों कामदेव की आज्ञा का पाठ करती थी ।॥ १६४॥

वह मदनमंचुका भी अमृतमय उस सुन्दर पति को न देखकर रोने लगती, तो ऐसा प्रतीत होता था, जैसे प्रभातकालीन तुषार-बिन्दुओं से परिपूर्ण कुमुद्वती हो ।॥१६५।।

उसे देखे बिना बेचैन नरवाहनदत्त निरन्तर और बार-बार उसके उद्यान में घूमता रहता था ।।१६६।।

वहाँ पर कर्कालगसेना, अपनी कन्या मदनमंचुका द्वारा सन्तुष्ट किये जाते हुए नरवाहनदत्त को देखकर अन्यन्त प्रसन्न होती थी ।। १६७।।

नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाला उसका नम्र सचिव गोमुख, उस स्थान पर दीर्घकालीन स्थिति की कामना से कलिगसेना को विविध प्रकार की कथाएँ सुनाया करता था ।।१६८।।

इस प्रकार, उसके हृदय को आकृष्ट करने से वह राजकुमार सन्तुष्ट होता था। सच है, स्वामी के हृदय में प्रवेश करना, अर्थात् उसके हृदय को समझकर कार्य करना ही स्वामी की सबसे बड़ी सेवा है ।।१६९।।

उस उद्यान की रंगशाला में नरवाहनदत्त, मदनमंचुका को स्वयं ही समुचित शिक्षा दिया करता था ।। १७०।।

नरवाहनदत्त मदनमंचुका के गाने पर सभी प्रकार के वाद्यों को स्वयं बजाया करता था, जिससे वादक चारण भी देखकर लज्जित होते थे ॥१७१॥

उस नरवाहनदत्त ने बाहर के देशों से आनेवाले विविध शास्त्रों और कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों और कलाकारों को प्रतियोगिता में जीत लिया था ।।१७२॥

स्वयं ही विद्याओं द्वारा वरण किये गये नरवाहनदत्त के बाल्यकाल के दिन इसी प्रकार से बिनोद में व्यतीत हुए ॥१७३॥

एक बार नरवाहनदत्त ने अपनी पत्नी मदनमंचुका के साथ विहार (भ्रमण) करने की इच्छा से मित्रों और मन्त्रियों को साथ लेकर नागवन की यात्रा की ॥१७४।॥

वहाँ पर किसी बनिये की कामुकी स्त्री को गोमुख ने तिरस्कृत कर दिया था, फलतः उस स्त्री ने क्रोध में आकर विष मिला हुआ शर्बत पिलाकर गोमुख को मार डालना चाहा ।। १७५।।

गोमुख ने उस स्त्री की सहेली से यह सब जान लिया और उसने उसका दिया हुआ शर्बत नहीं लिया, प्रत्युत स्त्रियों की निन्दा की ॥१७६।।

आश्चर्य है कि ब्रह्मा ने पहले साहस को उत्पन्न किया और उसके पश्चात् ही स्त्रियों को। इन स्त्रियों के लिए स्वभावतः कुछ भी कर डालना कठिन नहीं है। स्त्री की सृष्टि अवश्य ही अमृत और विष दोनों से की गई है। क्योंकि वही स्त्री अनुरक्त होने पर अमृत के समान और विरक्त होने पर विष के समान हो जाती है ।।१७७-१७८।।

बाहर से देखने में सुन्दर और गुप्त रूप से पाप करनेवाली स्त्री उस बावली के समान है, जिसमे जल के ऊपर तो कमल खिले हों और भीतर भीषण मगर तथा हिंस्रक जन्तुओ से पूर्ण हो ॥१७९॥

कोई ही गुणवती और सुस्त्री सूर्य की निर्मल प्रभा के समान स्वर्ग से आती है, जो पति का गुणगान करनेवाली होती है ।॥१८०॥

पति के प्रति विरक्त और पर-पुरुषो पर आसक्त एवं वैराग्य-रूपी विष से भरी हुई स्त्री नागिन के समान अपने पति का विनाश कर देती है ॥१८१॥

शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा

इसी प्रकार, किमी गाँव में शत्रुघ्न नाम का एक पुरुष रहता था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी ।॥१८२॥

उसने एक बार सन्ध्या के समय अपनी स्त्री को उसके प्रेमी से मिलते देखा और देखकर उसने घर के भीतर बैठे हुए उस स्त्री के यार को तलवार से मार दिया और रात की प्रतीक्षा में वह अपनी पत्नी को रोककर बैठा रहा। इतने ही मे निवास स्थान का इच्छुक कोई बटोही वहाँ उसके पास आया ।।१८३-१८४।।

शत्रुघ्न उस पथिक को स्थान देकर और युक्तिपूर्वक उसे भी मारकर, उस व्यभिचारिणी को लेकर जंगल में चला गया ।। १८५॥

जंगल में जाकर जब वह उस शव को एक अँधेरे कुए मे फेंकने लगा, इतने ही में पीछे से आती हुई उसकी स्त्री ने उसे भी उसी कुंए में ढकेल दिया ।।१८६।।

इस प्रकार दुष्टा स्त्री कौन-सा साहसिक कार्य नही कर सकती। गोमुख ने बालक होते हुए भी इस प्रकार स्त्री-चरित्र की निन्दा की ।।१८७॥

तदनन्तर वह नरवाहनदत्त वहाँ पर नागो की पूजा करके अपने परिवार और साथियों-सहित अपने निवास स्थान पर लौट आया ॥१८८॥

राजनीति का सार²

एक दिन जिज्ञासु नरवाहनदत्त ने जानते हुए भी, अपने मन्त्रियों से राजनीति का सार पूछा ॥१८९॥

आप तो सब कुछ जानते हैं, फिर भी आपके पूछने पर हमलोग कहते हैं'- इस प्रकार कहकर मन्त्रियों ने परस्पर निर्णय करके कहा-॥१९०।।

"युवराज, राजा को चाहिए कि वह सबसे पहले इन्द्रिय-रूपी घोड़ों पर चड़कर काम, क्रोष, लोभ आदि भीतरी शत्रुओं को जीतकर, अन्य बाहरी शत्रुओं को जीतने के पहले इस प्रकार अपनी आत्मा पर ही विजय प्राप्त करे ।।१९१॥

जो आत्मविजय ही नहीं कर पाया, वह स्वयं विवश या पराधीन दूसरों पर क्या विजय प्राप्त कर सकेगा ? ॥१९२॥

आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जनपद, देश आदि की उन्नति करनेवाले मन्त्रियों तथा अथर्ववेद को जाननेवाले चतुर एवं तपस्वी पुरोहित की नियुक्ति करे। तदनन्तर राजा को मय में, क्रोध में, लोभ में और धर्म में उन लोगों की कपट-परीक्षा करके उनके हृदयों को भली भांति जानकर उन्हें योग्य कार्यों पर नियुक्त करे ।।१९३-१९४।।

इस प्रकार, उनकी बातों की भी परीक्षा करनी चाहिए कि वे आन्तरिक स्नेह से बातें करते हैं या स्त्रार्थ अथवा द्वेषपूर्ण होकर। पारस्परिक वार्तालाप से उनकी यह परीक्षा करनी चाहिए। सत्य बात पर प्रसन्न होना और असत्य वात पर दंड देना चाहिए। उनके चरित्रों का पता भी अलग-अलग गुप्तचरो द्वारा लगाना चाहिए। इस प्रकार, आँखे खोले रहकर चौकन्ने राज्य के कार्यों को देखते हुए, विरोधियो को उखाडकर, कोष और सेना का बल संग्रह करके अपनी जड़ सुदृढ कर लेनी चाहिए ।।१९५-१९७॥

तदनन्तर प्रभाव, उत्साह और मन्त्र इन तीनों शक्तियों से युक्त होकर अपने और शत्रु के बलाबल को भली भाँति समझकर दूसरे देशों को जीतने की इच्छा करनी चाहिए ।।१९८।।

अत्यन्त विश्वासी, नीति आदि शास्त्रों को जाननेवाले प्रतिभाशाली मंत्रियों से मन्त्रणा करनी चाहिए। उनके निर्णयो को अपनी बुद्धि द्वारा कार्यान्वित करके राज्य के सभी अंगों को शुद्ध करना चाहिए ॥१९९॥

साम, दाम आदि उपायों से योग और क्षेम की साधना करनी चाहिए और सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों का प्रयोग करना चाहिए ॥२००।।

इस प्रकार आलस्य और प्रमाद-रहित होकर जो राजा अपने और पराये देश की चिन्ता करता है, वह सदा विजयी रहता है और किसी से जीता नहीं जा सकता ।।२०१॥

मूर्ख, कामान्ध और लोभी राजा, झूठे और अनुचित मार्ग प्रदर्शित करनेवाले धूत्तों और दलालों द्वारा गड्ढे में गिरा-गिराकर नष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्वार्थियों से घिरे हुए मूर्ख राजा के पास बुद्धिमान् और श्रेष्ठ व्यक्ति उसी प्रकार नहीं जा सकते, जिस प्रकार निपुण किसान द्वारा लगाई गई बाड़ को पारकर धान के खेत तक नहीं पहुँचा जा सकता ।।२०२-२०३।।

ऐसा राजा धूर्तों का अन्तरंग बन जाता है और अपना रहस्य प्रकट कर बैठता है। फलतः, वह उनके वश में हो जाता है। और, ऐसे मूर्ख अनभिज्ञ राजा से खिन्न होकर राज्यलक्ष्मी भाग जाती है ॥२०४।॥

इसलिए राजा को आत्मविजयी, उचित दंड देनेवाला और राजनीति आदि में विशेषज्ञ होना चाहिए। ऐसा होने पर प्रजा के प्रेम से वह राजा, लक्ष्मी का निवास स्थान का पात्र बन जाता है ।।२०५।।

राजा शूरसेन और उसके मन्त्रियों की कया

प्राचीन समय में शूरसेन नाम का एक राजा था, जो एकमात्र सेवकों पर विश्वास किया करता था। वे सेवक एक दल बनाकर राजा को वश में करके उसे चूसा करते थे ।।२०६।।

जिस योग्य सेवक को राजा कुछ देना भी चाहता था, मन्त्रिगण उसे एक तिनका भी नही देने देते और जो उनके निजी चापलूस नौकर थे, उन्हें वे स्वयं भी देते और राजा द्वारा भी दिलाते थे ।।२०७-२०८॥

यह सब देखकर और उन धूर्तों के दल को समझकर राजा ने अपनी बुद्धि से उनमें परस्पर फूट उत्पन्न करा दी ॥२०९॥

फूट के कारण उन चुगलखोर सेवकों के पृथक् हो जाने पर अन्य अच्छे और गुणी व्यक्तियो से युक्त वह राजा भली भाँति शासन करने लगा ॥२१०।।

हरिसिंह नाम का एक नीतिज्ञ और साधारण राजा था, उसने अपने भवत मन्त्री रखे थे। सुदृढ़ किले और धन का संग्रह भी पर्याप्त किया था। वह प्रजा को अपने प्रति अनुरक्त करके जैसा चाहता था, वैसा करता था। इसी कारण वह एक चक्रवर्ती राजा के आक्रमण करने पर भी पराजित न हो सका ।।२११-२१२॥

इसलिए विचार और चिन्तन के अतिरिक्त राज्य का सार और क्या हो सकता है?" इतना कहकर अपनी-अपनी सम्मति देकर गोमुख आदि मन्त्री चुप हो गये ॥२१३॥

नरवाहनदत्त ने उनके विचारों पर श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा- 'पुरुष का कर्त्तव्य चिन्तनीय होने पर भी देवगति अचिन्तनीय है' ।॥२१४।॥

तब नरवाहह्नदत्त अपने उन साथियों के साथ चिरकाल से उत्कंठित प्रिया मदनमंचुका को देखने के लिए गया ।॥२१५॥

उसके निवास स्थान पर पहुँचते ही आसन पर बैठाकर स्वागद-सत्कार करती हुई विस्मित कलिंगसेना गोमुख से कहने लगी ।।२१६।।

"गोमुख, राजकुमार नरवाहनदत्त के यहाँ न आने पर, अर्थात् उसके आने के पूर्व, उसके आने की प्रतीक्षा में उत्कंठिता मदनमं चुका, भवन के ऊपर की छत पर चढ़ी और उसके पीछे मैं भी गई। इतने में ही एक दिव्य मुकुटधारी पुरुष आकाश से उतरा ॥२१७-२१८॥

उसके हाथ में तलवार थी और सिर पर किरीट था। उस दिव्य पुरुष ने मुझसे कहा-'मैं सानसवेग नामक विद्याधरों का राजा हूँ।॥२१९॥

तू शाप से पतित सुरभिदत्ता नाम की स्वर्गीय स्त्री है। तुम्हारी कन्या भी दिव्य स्त्री है। यह मुझे ज्ञात है ॥२२०॥

इसलिए तू इस कन्या को मुझे दे दे।' उसका और मेरा यह सम्बन्ध योग्य है। उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसकर कहा- ॥२२१॥

देवताओं द्वारा पहले से ही निश्चित किया गया नरवाहनदत्त, इसका पति हो चुका है। वह तुम सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ।। २२२॥

मेरी कन्या को ले जाने के लिए आकस्मिक उद्वेग-रूपी बिजली के समान मुझसे इस प्रकार कहकर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया" ।।२२३।।

यह सुनकर गोमुख बोला- 'हमारा राजा राजकुमार नरवाहह्नदत्त, जब उत्पन्न हुआ था, तभी आकाशवाणी ने सूचना दी थी कि वह विद्याधरों का चक्रवत्ती राजा होगा। इसलिए, उसे अपना भावी राजा समझकर विद्याधरगण उसे नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु कोई भी दुष्ट, बलवान् विधि के विधान के विरुद्ध कुछ नही कर सकता। भगवान् शंकर ने उसकी रक्षा के लिए गण को नियुक्त किया है, ऐसा नारद मुनि ने मेरे पिता से कहा है और उनसे मैंने सुना है ।।२२४-२२६॥

इसीलिए, ये विद्याधर इस समय हमारे विरोधी बने हुए है।' इतना सुनकर कलिंगसेना अपने देखे हुए वृत्तान्न के भय से बोली- 'यदि मेरे ही समान मदनमंचुका वंचित नहीं की जाती या ठगी नहीं जाती है, तो पहले ही राजपुत्र द्वारा उसके साथ विवाह क्यों नहीं कर लिया जाता' ।।२२७-२२८।।

कलिंगसेना की बातें सुनकर गोमुख आदि कहने लगे कि 'इस कार्य के लिए तुम ही वत्सराज को प्रेरित करो' ।॥ २२९॥

तब नरवाहनदत्त, उस दिन, मन्दारगुच्छ के समान स्तनोंवाली, शिरीष सुमन के समान सुकोमल, विकसित कमल के समान मुखवाली और प्रफुल्ल कुमुदों के समान नेत्रोंवाली, दुपहरिया फूल की भाँति लाल होठों वाली, मानों जगद्विजय के लिए निर्मित कामदेव के एक बाण के समान उस मदनमंचुका के साथ, उद्यान में विहार करता रहा ।।२३०-२३२॥

दूसरे दिन, कलिंगसेना ने भी स्वयं वत्सराज के पास जाकर अपना अभिलषित प्रस्ताव निवेदित किया, जो कन्या-विवाह के सम्बन्ध में था ।। २३३।।

वत्सराज ने भी कलिंगसेना को विदा करके अपने मन्त्रियों को बुलाकर रानी वासवदत्ता की उपस्थिति में उनसे कहा- ।।२३४।।

'कलिंगसेना कन्या के विवाह के लिए शीघ्रता कर रही है। अतः, हम यह विवाह कैसे करें; क्योंकि उस साध्वी को भी लोग व्यभिचारिणी कहते हैं ।।२३५।।

जनापबाद से तो सदा बचना ही चाहिए। प्राचीनकाल में श्रीरामचन्द्रजी ने जनापवाद के ही कारण क्या जानकी को नहीं त्याग दिया था ? ॥२३६।।

भीष्म ने अपने भाई के लिए अपहरण की गई पूर्व-विवाहित अम्बा को क्या नही छोड़ दिया था ? ॥२३७।।

इसी प्रकार कलिंगसेना स्वयंवर द्वारा मेरा वरण कर लेने पर भी मदनवेग से विवाहित हुई। यही कारण है कि लोग इसकी निन्दा करते हैं ।॥ २३८।।

इसलिए नरवाहनदत्त अपने अनुरूप इसकी कन्या को गान्धर्व-विधि से विवाहित कर लेता, ।।२३९।।

वत्सराज के ऐसा कहने पर यौगन्धरायण ने कहा- 'स्वामिन् ! यदि कलिंगसेना ऐसा चाहती है तो यह अनुचित कैसे हो सकता है? वह साधारण नही, दिव्य स्त्री है। इसलिए इसकी कन्या भी दिव्य है। यह बात मेरे मित्र ब्रह्मराक्षस ने मुझसे बार-बार कही है, ।॥२४०-२४१॥

इस प्रकार जब वे परस्पर विचार कर ही रहे थे, इतने ही में आकाश से दिव्यवाणी सुनाई पड़ी-॥२४२।

'मेरे नेत्रानल से दग्ध कामदेव के अवतार नरवाहह्नदत्त के लिए मैंने ही, कामदेव की भार्या रति के तप से सन्तुष्ट होकर इस मदनमंचुका की सृष्टि की है। यह नरवाहनदत्त की प्रधान महिषी होकर, मेरी कृपा से शत्रुओं को जीतकर दिव्य कल्प-पर्यन्त विद्याघरों की साम्राज्ञी बनी रहेणी' इतना कहकर दिष्यवाणी मौन हो गई ।।२४३-२४५।।

नरवाहनवल और मदनमंबुका का विवाह

वत्सराज ने अपने साथियों सहित इस प्रकार भगवद्वाणी को सुनकर उसे प्रणाम किया और पुत्र के विवाह के लिए आनन्द के साथ निर्णय किया ।।२४६।।

तदनन्तर वत्सराज ने सारी वास्तविक स्थिति को समझनेवाले मुख्यमंत्री यौगन्धरायण का अभिनन्दन करके और ज्योतिषियों को बुलाकर शुभफल देनेवाला विवाह-लग्न पूछा और समुचित दक्षिणा आदि से पुरस्कृत ज्योतिषियों ने कुछ ही दिनों में विवाह-लग्न निश्चित कर दिया ।।२४७।।

ज्योतिषियों ने कहा- 'महाराज, आपका यह पुत्र कुछ दिनों तक इस पत्नी के वियोग का कष्ट झेलेगा, यह हमलोग शास्त्र की दृष्टि से जानते है ॥ २४८॥

तदनन्तर राजा ने अपने वैभव के अनुसार पुत्र के विवाह की तैयारी आरम्भ की। उसकी तैयारी के उद्योग से केवल कौशाम्बी नगरी में ही नही, प्रत्युत सारी पृथ्वी में हलचल मच गई ।। २४९।।

विवाह का दिन आने पर कन्या के पिता मदनवेग द्वारा दिये गये वस्त्र और अलंकारों से माता कलिगसेना ने और पति की आज्ञा से आई हुई कलिगसेना की सखी सोमप्रभा ने कन्या मदनमंचुका को विवाहोचित वेष में सुसज्जित कर दिया ।।२५०॥

दिव्य सामग्री से अलंकृत मदनमंचुका इतनी सुन्दर लग रही थी, जैसे कात्तिक मास (शरऋतु) मे चन्द्रमा शोभित होता है ।। २५१।।

शिवजी की आज्ञा से गाती हुई दिव्य स्त्रियों, मदनमंचुका के रूप से पराजित होकर अतएव लाज से छिपकर मानों मंगल-गान कर रही थीं ।॥ २५२।।

भक्तों पर दया करनेवाली हे पार्वती ! तुम्हारी जय हो। तुमने आज स्वयं उपस्थित होकर रति के तप को सफल किया' - इत्यादि वाक्यो से वे देवी की स्तुति करने लगी और गन्धर्व-गण वाद्य-ध्वनि करने लगे ।॥ २५३॥

वर के बेष में सुसज्जित, अतएव शोभित, नरवाहनदत्त वाद्यों की ध्वनि से मुखरित और मदनमंचुका से अलंकृत विवाह-मंडप में प्रविष्ट हुआ ।॥ २५४।।

बड़े-बड़े विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा विवाह-विधि को सम्पन्न करके वर और वधू राजा के किरीट-स्थित निर्मल रत्नदीपों के समान देदीप्यमान अग्नि की प्रदक्षिणा के लिए वेदी के निकट गये ॥२५५।।

अग्नि-प्रदक्षिणा के समय वर और वधू की शोभा कुछ इस प्रकार थी कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक साथ मिलकर सुमेरु पर्वत के चारों ओर भ्रमण करें, तो उस समय की शोभा की उपमा दी जा सकती है ।॥ २५६॥

आकाश में विवाहोत्सव में बजनेवाले वाद्यों के शब्द गूंजने लने और नगरी में बधू द्वारा अग्नि में हवन किये गये धान के लावों का धुआँ और देवताओं द्वारा बरसाये गये पुष्प फैल गये ॥२५७॥

उदार चित्तवाली कलिंगसेना ने रत्नों, मणियों और सुर्वण की राशि से जामाता नरवाहनदत्त को इस प्रकार सम्पन्न कर दिया, जिससे प्रजा ने उसके आगे कुबेर को भी तुच्छ समझा। अन्यान्य बेचारे राजाओं की तो गणना ही क्या ? ॥२५८॥

इस प्रकार चिरकाल से अभिलषित इस योग्य पाणिग्रहण-संस्कार के भली भाँति सम्पन्न हो जाने पर वे वर और वधू दोनों निर्मल लोक-हृदय में चित्रित भक्ति के समान सुन्दरी रमणियों से भरे हुए कौतुकागार में गये ॥ २५९॥

इस अवसर पर कौशाम्बी नगरी, विशाल वाहिनियों (सेना और नदियों) के पति, विश्ववन्द्य वीरताशाली, पहले पराजित होने के कारण नम्र हुए और विविध प्रकार की बहुमूल्य भेंटों को उपहार-स्वरूप हाथों में लिये हुए राजाओं से इस प्रकार भर गई थी, मानों चारों ओर रत्नाकर (समुद्र) ही लहा रहा हो ॥२६०॥

पुत्र-विवाह के इस अवसर पर वत्सराज उदयन ने प्रसन्नता के कारण इतना सोना और घन वितरित किया कि केवल माताओं के गर्भ में स्थित कन्याएँ ही अलंकार-हीन रह गई ।।२६१॥

इस अवसर पर भिन्न-भिन्न और दूर-दूर देशों से आई हुई वेश्याओं और नर्त्तकियों, बन्दियों और भाटों के गीतो और स्तुतियों से उस नगरी का समस्त वातावरण मानों संगीत और उत्सव-मय हो रहा था। नागरिक स्त्रियों द्वारा सजाई-सँवारी गई, अतएव अलंकार-युक्त एवं वायु से आन्दोलित पताकाओं-रूपी हाथोंवाली कौशाम्बी नगरी, नृत्य करती हुई रमणी के समान लग रही थी ।। २६२-२६३॥


इस नगरी के महोत्सव दिन-प्रतिदन बढ़ने लगे और अनेक दिनों तक उत्सव निरन्तर चलते रहने पर समाप्त हुए। सभी कुटुम्बी और मित्र परस्पर प्रेम और आनन्दपूर्वक रहने लगे, उनके मनोरथ सफल और पूर्ण हुए ॥ २६४।॥

विवाह के पश्चात् युवराज नरवाहनदत्त, अभ्युदय की आशा रखता हुआ, चिर अभि लषित सांसारिक भोगों को मदनमंचुका के साथ आनन्दपूर्वक भोगने लगा ॥२६५।।

आठवाँ तरंग समाप्त

मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक भी समाप्त

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1. अर्थात् राज्य में कोई दरिद्र न रह गया। अनु०

2. यह नीति-वर्णन कामन्दकनीति, शुक्रनीति, मनु और याज्ञवल्क्य आवि ग्रन्थों के अनुसार है। विशेष विवरण संस्कृत-टिप्पणी में देखिए ।--अनु०

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