5607. || सप्तम कहानी || वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा; राजा श्रुतसेन की कथा; किसान की कथा; विद्युद्धोता और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू); उन्माविनी और राजा देवसेन की कथा; मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू); उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा;
5607. || सप्तम कहानी || वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा; राजा श्रुतसेन की कथा; किसान की कथा; विद्युद्धोता और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू); उन्माविनी और राजा देवसेन की कथा; मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू); उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा;
सातवाँ तरंग
वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा (चालू)
अपने देश और बन्धु-बान्धव आदि को छोड़कर आई हुई कलिंगसेना, गई हुई सखी सोमप्रभा को स्मरण करती हुई उदास होकर बैठी रही ॥१॥
नरेन्द्रकम्या कलिंगसेना, कौशाम्बी में वत्सराज के पाणिग्रहण महोत्सव में, विलम्ब होने के कारण जंगल से बाहर आकर व्याकुल हरिणी के समान हो रही थी ॥२॥
इधर कलिंगसेना के विवाह में विलम्ब करनेवाले वत्सराज भी ज्योतिषियों के प्रति कुछ रुष्ट-से रहे ।।३।।
उस दिन, उत्त्सुकता से व्याकुल राजा उदयन, मनोविनोद के लिए महारानी बासवदत्ता के महल में गया ।॥४١١
वहाँ पर मन्त्री यौगन्धरायण द्वारा शिक्षित महारानी ने, किसी भी प्रकार का विकार न प्रकट करते हुए, सदा की भाँति उचित उपचारों से राजा का स्वागत-सत्कार किया ।।५।।
'कलिंगसेना का वृत्तान्त प्रसिद्ध हो जाने पर भी, महारानी पूर्व की ही भाँति कैसे प्रकृतिस्थ है?' - ऐसा सोते हुए राजा ने जानने के लिए रानी से कहा- 'देवि, मेरे स्वयंवर के विषय में तुम्हें कुछ ज्ञात है। जिसलिए कि राजपुत्री कलिगसेना यहाँ आई हुई है?' ॥६-७॥
यह सुनकर मुंह के भाव को तनिक भी विकृत किये बिना, रानी बोली- 'मुझे ज्ञात है, यह अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है। वह तो हमारे यहाँ साक्षात् लक्ष्मी आई है ।।८।
उसकी प्राप्ति से उसके पिता महाराज कलिंगदत्त के भी वश में आजाने पर, सारी पृथ्वी तुम्हारे वश में है। क्या मैं भी धन्य नहीं हूँ कि जिसके पति तुम समान हो, जिसे अन्य राजाओं से चाही जाती हुई राजकन्याएँ स्वयं चाहती हैं' ।।९-११।।
यौगन्धरायण से शिक्षित महारानी द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।।१२।।
और वही वासवदत्ता के साथ भोजन, आसव-पान आदि करके सो गया। किन्तु बीच में ही उठकर सोचने लगा ।।१३।।
क्या सचमुच महारानी इतनी उदार है कि वह मेरी बात का और सपत्नी (सोत) कलिंगसेना का भी उतना समर्थन करती है। यह बेचारी उस कलिगसेना को कैसे सहन कर सकती है, जिसने पद्मावती के विवाह पर दैवयोग से प्राणों का ही त्याग नहीं किया ? ॥१४-१५॥
यदि इसका कुछ भी अनिष्ट हुआ, तो अनर्थ हो जायगा; क्योंकि मेरे पुत्र, श्वसुर, साले आदि सब इसी के सहारे हैं ।॥१६॥
साथ ही, पद्मावती और सारा राज्य इसी के सहारे है। अधिक क्या कहूँ। इसलिए, मैं कलिंगसेना से विवाह करूँ, तो कैसे ? ।।१७।।
ऐसा सोचकर वत्सराज प्रातःकाल वासवदत्ता के भवन से निकला और उसी दिन अपराह्न में रानी पद्मावती के महल में गया ॥ १८॥
वासवदत्ता से पूर्वशिक्षित रानी पद्मावती ने भी, उसी प्रकार विना कोई विकार प्रकट किये राजा का स्वागत किया और पूछने पर उसी प्रकार का उत्तर दिया ।।१९।।
तब आगामी दिन दोनों रानियों के एक समान व्यवहार, एक समान हृदय और वचनों पर विचार करते हुए राजाने सब कुछ मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२०॥
यौगन्धरायण ने भी राजा को धीरे-धीरे विचार में पड़े हुए देखकर और अवसर समझ कर इस प्रकार कहा- ॥२१॥
'मैं समझता हूँ कि यह इतना ही नहीं है। दोनों रानियों ने जो इस प्रकार कहा है, उसका आधार प्राणत्याग की दृढ़ भावना है।॥ २२॥
सच्चरित्र स्त्रियाँ, पति के दूसरी स्त्री पर आसक्त हो जाने पर या उसके स्वर्ग चले जाने पर, मरने का निश्चय करके दैन्यरहित एवं स्पृहाहीन हो जाती है ॥२३॥
सती स्त्रियो को गहरे प्रेम का टूटना असह्य हो जाता है। हे राजन्, इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ, मुनो' ।॥२४॥
राजा श्रुतसेन की कथा
प्राचीनकाल में दक्षिण भूमि के गोकर्ण नामक नगर में कुल का भूषण और विद्वान् श्रुतसेन नामक राजा था ।।२५।।
सभी प्रकार के वैभवों से परिपूर्ण उस राजा को बस एक ही चिन्ता थी कि उसे अपने अनुरूप भार्या नही मिली थी ॥ २६।।
एकबार राजा किसी विषय की चर्चा कर रहा था कि उसी समय अग्निशर्मा नामक ब्राह्मण ने उससे कहा- ॥२७॥
'महाराज, मैंने अपने जीवन मे दो आश्चर्य देखे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो- मैं तीर्थ-यात्रा के प्रसंग में उस पंचतीर्थों में गया, जिसमें पांच अप्सराएँ ऋषि के शाप से ग्राह (मगर) बनकर रहती थी; वहाँ पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से आये हुए अर्जुन (पांडव) ने उन अप्सराओं का उद्धार किया था ।।२८-२९।।
उस तीर्थ में स्नान करके पाँच रातों तक उपवास करनेवाले मनुष्य नारायण के पार्षद (अनुचर) बन जाते हैं ।॥३०॥
किसान की कथा
जब मैं उस तीर्थ की ओर गया तब मैंने हल से जोती हुई भूमि को देखा और एक खेत के बीच में बैठे हुए किसान को गाते हुए देखा ॥३१॥
उस मार्ग में चलते हुए किसी संन्यासी ने उससे मार्ग पूछा; किन्तु गाने में तल्लीन कृषक ने उसे सुना नहीं ॥३२॥
तब व्यर्थ अपशब्द का प्रयोग करते हुए उस साधु ने उस किसान पर क्रोध किया। यह देखकर वह किसान गाना बन्द करके संन्यासी से कहने लगा ॥३३॥
'आश्चर्य है कि तुम संन्यासी हो, धर्म को नहीं जानते और मूर्ख होकर भी मैंने धर्म का सार जान लिया है' ।।३४।।
यह सुनकर साधु कौतुक से बोला- 'तुमने क्या जाना ?' उत्तर देते हुए किसान ने कहा- 'यहाँ छाया में बैठो और सुनो। मैं तुम्हें बताता हूँ इस प्रदेश में तीन ब्राह्मण भाई थे। ब्रह्मदत्त, सोमदत्त और पुण्यात्मा विष्णुदत्त। उनमें दो बड़े विवाहित थे और तीसरा अविवाहित था ।।३५-३७।।
वह तीसरा छोटा भाई, राजाओं के समान दोनों बड़े भाइयो का काम, नौकरी के समान, करता था। मैं उन्हीं लोगों का किसान हूँ ।॥३८॥
अत्यन्त मृदु, सीधे-सादे, सन्मार्गगामी, सरल-हृदय और श्रम-रहित उस छोटे भाई को वे दोनों बड़े भाई मूर्ख और बुद्धिहीन समझते थे ॥ ३९॥
एक बार, उसकी दोनों बड़ी भाभियाँ उस पर आसक्त हो गई और उन्होंने उससे प्रार्थना की. किन्तु छोटे भाई विष्णुदत्त ने उन्हें माता के समान समझते हुए छोड़ दिया ॥४०॥
तब उन दोनों ने अपने पतियों के पास जाकर मिथ्या भाषण करते हुए कहा कि 'तुम दोनों का छोटा भाई हमलोगों को एकान्त में चाहता है' ।॥४१॥
यह सुनकर वे दोनों बड़े भाई, छोटे भाई के प्रति मन-ही-मन जल-भुन गये। सच है, दुष्टा स्त्री के वचन से मोहित व्यक्ति, सच और झूठ पर विचार नहीं करते ॥४२॥
एक बार वे दोनों भाई विष्णुदन्न से बोले- 'तुम जाओ। खेत के बीच वल्मीक (बाँबी) को खोदकर बराबर करो' ।।४३।।
'अच्छा', कहकर वह जाकर हथियार से मिट्टी के ढेर को बराबर करने लगा, तो मैंने उसे रोका कि 'इसमें काला साँप है' ।॥४४॥
यह सुनकर भी वह खोदने से न हटा; क्योंकि वह उन पापी बड़े भाइयों की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहता था ।।४५।।
खोदे जाते हुए वल्मीक से उसने सोने के मुक्ताहारों से भरा हुआ घड़ा प्राप्त किया। किन्तु काला साँप नहीं मिला; क्योंकि धर्म, सद्व्यक्तियों का साथ देता है।॥४६॥
मेरे रोकने पर भी उसने गहरी भक्ति (प्रेम) के कारण उस घड़े को ले जाकर बड़े भाइयों को सौंप दिया ॥४७॥
उन दोनों ने उस घन को लेकर और कुछ भाग उसे देकर, कुछ गुंडों को उभाड़ा और उस धन को भी लेने की इच्छा से उसके हाथ-पैर कटवा दिये ॥४८।।
इतने अत्याचार करने पर भी वह अपने बड़े भाइयों पर क्रुद्ध नहीं हुआ। फलतः, इस सत्य-भावना के प्रभाव से उसके हाथ-पैर ठीक हो गये ॥४९॥
उसे देखकर तब से मैंने सारा क्रोध छोड़ दिया। पर तुमने तपस्वी होकर भी अभी तक क्रोध नही छोड़ा ॥५०॥
इस अक्रोध के कारण ही मैंने स्वर्ग पर विजय पाई है। अभी देखो'- ऐसा कहकर वह किसान अपना चोला (शरीर) त्यागकर उसी समय स्वर्ग को चला गया ।॥५१॥
एक आश्चर्य तो मैंने यह देखा- 'हे राजन्, अब दूसरा सुनो'- ऐसा कहकर वह ब्राह्मण राजा भुनसेन से यह कहने लगा ।।॥५२॥
वहाँ से मैं तीर्थयात्रा के लिए समुद्र तट पर भ्रमण करते हुए राजा वसन्तसेन के राज्य में गया ।।५३।।
विद्युद्धोता और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू)
वहाँ पर राजा के भोजन-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ब्राह्मण लोग मुझसे कहने लगे, 'ब्राह्मण, इस मार्ग से न जाओ। आगे मार्ग में राजा की कन्या बैठी है ।॥५४।।
उसका नाम विद्युद्योता है। उसे यदि कोई संयमी मुनि भी देख ले तो, वह कामबाण से आहत होकर बच नहीं सकता' ।।५५।।
तब मैंने उन्हें कहा 'कि यह कोई आश्चर्य नहीं है। मैं दूसरे कामदेव के समान श्रुतसेन राजा को प्रतिदिन देखता हूँ। जिस राजा के बाहर निकलने पर सैनिक गण, कुलस्त्रियों को, उनका सती चरित्र भंग होने के भय से मार्ग से हटा देते हैं' ।।५६-५७।।
ऐसा कहते हुए मुझे आपका कृपापात्र समझकर क्षेत्र के व्यवस्थापक और पुरोहित राजा के समीप ले गये ।।५८।।
वहाँ मैंने राजपुत्री विद्युद्योता को देखा है। वह मानों काम की शरीरघारिणी जगन्मोहिनी मन्त्रविद्या है। उसके दर्शन से होनेवाले क्षोभ को बहुत विलम्ब के पश्चात् नियन्त्रित करके मैंने यह सोचा- 'यदि यह हमारे स्वामी की पत्नी हो जाय, तो वह सारा राज्यकार्य भूल जाय' ।।५९-६०।।
फिर भी मुझे यह समाचार तो प्रभु (आप) से कहना ही चाहिए, अन्यथा देवसेम और उन्मादिनी की-सी गति हो जायगी ॥६१।।
उन्माविनी और राजा देवसेन की कथा
प्राचीन काल में राजा देवसेन के राष्ट्र में समस्त संसार की उन्मत्त बनाने वाली उन्मादिनी नाम की एक वैश्य-कन्या थी ।॥ ६२।।
उसके पिता की प्रार्थना पर भी राजा ने, ब्राह्मणों के उसे कुलक्षणा बताने के कारण, ग्रहण नहीं किया ॥६३।।
उस कन्या को राजा के प्रधान मन्त्री ने ब्याह लिया। किसी समय उन्मादिनी ने खिड़की से अपना स्वरूप राजा को दिखा दिया। उसकी दृष्टि के विष से राजा बार-बार मूच्छित होने लगा और उसका मन भोजन, पान तथा शयन आदि किसी कार्य में नहीं लगा ।।६४-६५।।
तदनंतर उन्मादिनी के पति प्रधान मन्त्री द्वारा, राजा से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना किये जाने पर भी, राजा ने धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उसे स्वीकार न किया और उसकी आसक्ति में अपने प्राण दे दिये ।।६६।।
इस प्रकार के प्रमाद के यहाँ होने पर स्वामी-द्रोह हो सकता है, यही सोचकर यह आश्चर्य मैंने आपसे कह दिया ॥६७॥
वह राजा श्रुतसेन, कामदेव की आज्ञा के समान उस ब्राह्मण से यह वृत्तान्त सुनकर विद्युद्धोता पर हृदय से आसक्त हो गया ।॥६८॥
तदनन्तर उस राजा ने, उसी क्षण ब्राह्मण को विदा करके ऐसा प्रबन्ध किया कि विद्युद्योता से उसका विवाह हो गया। विवाह हो जाने पर वह राजपुत्री विद्युद्योता, राजा श्रुतसेन से उसी प्रकार अभिन्न थी, जैसे सूर्य की प्रभा, सूर्य से अभिन्न होती है ॥६९-७०।।
कुछ समय के पश्चात् राजा श्रुतसेन के पास किसी महाधनी वैश्य की रूपर्गावता कन्या मातृदत्ता स्वयंवर के लिए आई ॥७१॥
अधर्म के भय से राजा ने वैश्यकन्या को ग्रहण कर लिया। यह जानकर राजा की पहली रानी विद्युद्योता का हृदय विदीर्ण हो गया और वह मर गई ॥७२।।
राजा ने आकर जब अपनी पहली रानी को मरा हुआ देखा, तब उसने उसे अपनी गोद में रख लिया और शोक में रोता हुआ वह भी उसी क्षण मर गया। उसके बाद वैश्य कन्या मातृदत्ता भी आग में कूद कर जल मरी। इस प्रकार, सारे राज्य का ही सत्यानाश हो गया ।॥७३-७४।।
इसलिए महाराज, उच्चकोटि के गहरे प्रेम खासकर मानिनी रानी वासवदत्ता के प्रेम का भंग अत्यन्त असह्य है' ।॥७५॥
मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू)
अतः यदि तुमने कलिंगसेना का परिणय किया, तो वासवदत्ता, अवश्य प्राण-त्याग क्रमशः कर देगी, इसमें संदेह नहीं ।॥७६॥
रानी पद्मावती भी इसी प्रकार प्राण त्याग देगी; क्योंकि दोनों एक प्राण हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हारे पुत्र नरवाहह्नदत्त की क्या स्थिति होगी ? ॥७७॥
यह सब अनर्थ आपका हृदय सहन कर सकेगा या नहीं, यह मैं नहीं जानता; किन्तु यह सब एक बार में ही नष्ट हो जायगा ।॥ ७८।।
दोनों रानियों की बातों में जो गम्भीरता है, वही इस बात की ओर स्पष्ट इंगित करती है कि उनका जीवन प्राण त्याग के दृढ़ निश्चय से निःस्पृह है। जो भी हो, तुम्हें अपने स्वार्थ की रक्षा करनी चाहिए, यह बात तो पशु-पक्षी भी जानते हैं; फिर आपके ऐसे बुद्धिमात्तों की बात ही क्या है ।।७०-८०।।
मन्त्रि श्रेष्ठ यौगन्धरायण से इस प्रकार सुनकर, भली-भाँति विचार-विमर्श करके वत्सेश्वर ने कहा- ।।८१।।
'ठीक है, इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकार मेरा सारा संसार ही नष्ट हो जायगा। इसलिए अब कलिंगसेना के परिणय से मेरा कोई प्रयोजन नही ।॥८२॥
गणकों (ज्योतिषियों) ने भी लग्न का दूर समय देकर अच्छा ही किया। स्वयंवरा स्त्री का त्याग करने से ही कितना अधर्म होगा' ।॥८३॥
वत्सराज के इस प्रकार कहने पर प्रसन्न हुए यौगन्धरायण ने सोचा कि कार्य तो जैसा हम चाहते थे, वैसा सिद्ध हो गया। उपाय-रूपी जल से सींची हुई और देश-काल के अनुसार बढ़ी हुई नीति-रूपी यह लता समय पर फल क्यों न देगी ? ॥८४-८५॥
ऐसा सोचकर और देश-काल का ध्यान करता हुआ मन्त्री राजा को प्रणाम करता हुआ घर चला गया ।॥८६।।
राजा भी, कृत्रिम शिष्टाचार से अपने भाव को छिपाई हुई रानी वासवदत्ता को सान्त्वना देता हुआ कहने लगा-॥८७॥
'हे मृगनयने, मैं किसलिए कह रहा हूँ, यह तुम जानती हो ? कमल के लिए जल के समान तुम्हारा प्रेम ही मेरा जीवन है ।॥८८॥
मैं किसी दूसरी स्त्री का नाम लेने का भी साहस नहीं करता। किन्तु कलिगसेना तो हठ-पूर्वक मेरे घर आ गई ।॥८९॥
यह बात प्रसिद्ध है कि तपस्या में बैठे हुए अर्जुन ने हठपूर्वक आई हुई रम्भा को दूर कर दिया था और उसने अर्जुन को षष्ठ (नपुंसक) होने का शाप दिया था ।॥९०॥
उस शाप के समय को अर्जुन ने आश्चर्यमय रूप से स्त्रीवेष धारण करके विराट् के भवन में व्यतीत किया था ।।९१।।
इसीलिए मैंने उसी समय कलिङ्गसेना का निषेध नहीं किया; क्योंकि तुम्हारी इच्छा के विना कुछ भी कहने का साहस नहीं कर सकता' ।॥९२॥
इस प्रकार आश्वासन देकर मानों प्रेमपूर्ण हृदय के समान उसके मुँह में लगाये हुए मद्य से उसके रुष्ट भाव को समझकर, मुख्यमन्त्री की प्रौढ़ बुद्धि से सन्तुष्ट राजा, उस दिन, रात को वासवदत्ता के साथ वही रह गया ।।९३-९४।।
इसी बीच यौगन्धरायण ने कलिंगसेना का समाचार जानने के लिए जिसे दिन-रात के लिए नियुक्त किया था, वह योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस, उसी रात को यौगन्धरायण के पास आया और कहने लगा- 'मैं कलिंगसेना के भवन में बाहर और भीतर सदा उपस्थित रहता हूँ किन्तु वहाँ दिव्य या मानव किसी भी व्यक्ति का आगमन, मैंने नहीं देखा ।॥९५-९७।।
आज छिपे हुए मैंने भवन की ऊपरी छत के पास सायंकाल के समय आकाश में अकस्मात् शब्द सुना ॥९८॥
उस शब्द की उत्पत्ति का स्थान जानने के लिए मैंने अपनी विद्या का प्रयोग भी किया, किन्तु विद्या का कुछ प्रभाव न देखकर मैंने सोचा कि निश्चय ही कलिंगसेना के लावण्यलोभी किसी दिव्य प्रभाववाले आकाशचारी व्यक्ति का यह शब्द है ।॥९९-१००।।
इसीलिए मेरी विद्या काम नही कर रही है; क्योंकि सावधान और चतुर व्यक्ति के लिए दूसरे का छिद्र दुष्प्राप्य नहीं होता ॥१०१॥
यह कलिंगसेना, दिव्य व्यक्तियों से चाही जा रही है, यह बात (मन्त्रिवर) आपने भी कही थी और मैंने भी उसकी सखी सोमप्रभा को ऐसा कहते हुए सुना है ॥१०२॥
ऐसा निश्चय करके मैं आपको कहने के लिए यहाँ आया हूँ और प्रसंगवश मैं यह पूछता हूँ, बताइए ।॥१०३॥
आपको राजा से यह कहते हुए मैंने छिपकर सुन लिया कि पशुपक्षी भी अपनी रक्षा करते हैं ।॥१०४।।
इस विषय में कोई उदाहरण है, तो मुझे बताइए।' योगेश्वर के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा- 'मित्र, इसका उदाहरण है। सुनो, इस विषय की एक कथा कहता हूँ' ।।१०५॥
उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा
प्राचीन समय में विदिशा नगरी के बाहर बहुत विशाल एक वटवृक्ष था ।।१०६।।
उस वृक्ष मे नेवला, उल्लू, बिल्ली और चूहा ये चार प्राणी, अपना पृथक् पृथक् स्थान बनाकर रहते थे। वृक्ष की जड़ में पृथक् पृथ्क बिलो में चूहा और नेवला रहा करते तथा बिल्ली वृक्ष के बीच के एक कोटर (खोखले) मे और उल्लू सबसे ऊपर लता से घिरी हुई डाली में रहता था, जहाँ किसी की पहुँच न थी। इनमें चूहा तीनों के लिए वध्य था और शेष तीनों बिल्ली के लिए वघ्य थे ॥१०७-१०९।।
उनमें चूहा और नेवला बिल्ली से भयभीत होकर अन्न के लिए तथा उल्लू स्वभाव से भोजन के लिए, ये तीनों ही रात में घूमा करते थे ॥११०।।
और बिल्ली, निर्भय होकर दिन-रात चूहे की खोज में जौ के खेत में चक्कर लगाया करती थी ॥१११॥
एक वार जबकि भोजन की खोज में अन्य जानवर भी इधर-उधर गये हुए थे, तब इसी पर वहाँ एक बहेलिया चांडाल आ गया ।। ११२।।
वह वहाँ पर बिलाव (बिल्ली) के पैरों के चिह्नों को खेत की ओर जाते देखकर, खेत मे चारों ओर जाल बाँधकर चला गया ।। ११३।।
उम खेत मे रात को बिलाव, चूहे को मारने की इच्छा से घुसा और वही वह जाल में फंस गया ।।११४।।
अन्न खाने के लालच से धीरे-धीरे और चुपचाप चूहा भी उस खेत में आया और वहाँ बिलाव को बँधा देखकर प्रमन्न होकर नाचने लगा ।। ११५।।
जब चूहा, एक मार्ग से उस खेत में घुसा, तभी नेवला और उल्लू भी दूसरे मार्ग से उसी स्थान पर आ गये ॥११६॥
बिलाव को बँधा देखकर वे दोनों चूहे को ढूंढने लगे। चूहा दूर से ही उनकी गतिविधि को देखकर घबराकर सोचने लगा ।।११७॥
'यदि मैं नेवले और उल्लू को भय देनेवाला बिलाव का आश्रय (शरण) लूं, तो जाल में बँधा हुआ भी यह शत्रु मुझे एक ही प्रहार में मार देगा ॥११८॥
बिलाव से दूर रहने पर तो उल्लू और नेवला दोनों ही मुझे मार देंगे। इसलिए इस प्रकार शत्रुओं के संकट में पड़ा हुआ मैं कहाँ जाऊँ ।। ११९।।
अच्छा हो कि विपत्ति में पड़ा हुआ मैं बिलाव की ही शरण में जाऊँ। मुझे जाल काटने में उपयोगी जानकर सम्भव है वह अपनी रक्षा के लिए मेरी भी रक्षा करे' ॥१२०॥
ऐसा सोचकर और धीरे-से उसके पास जाकर चूहा उससे कहने लगा, 'तुम्हारे बंधन से मुझे अत्यन्त दुःख है। इसलिए मैं तुम्हारा जाल काटता हूँ ।।१२१॥
सरल व्यक्तियों का, साथ रहने के कारण, शत्रुओं पर भी प्रेम हो जाता है। किन्तु, तुम्हारे प्रेम को न जाननेवाले मुझे तुम पर विश्वास नहीं है' ।॥१२२॥
यह सुनकर बिलाव कहने लगा, 'भद्र ! तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए। आज से मेरे प्राण बचानेवाले तुम मेरे मित्र हुए' ।॥ १२३॥
बिलाब से ऐसा सुनकर चूहा उसकी गोद में जा छिपा। यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों निराश होकर वहाँ से चले गये ।।१२४।।
तब जाल से बँधा हुआ बिलाव चूहे से कहने लगा, 'मित्र ! रात बीत-सी गई है। इसलिए मेरे बंधनों को शीघ्र काटो ॥१२५॥
बहेलिये के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हुआ चूहा झूठे ही दाँत कटकटाता हुआ बन्धनों को काटने में बिलम्ब करने लगा ।। १२६।।
प्रातःकाल होने और बहेलिये के निकट आ जाने पर और बिलाव के दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर, चूहे ने तुरन्त जाल के बँधन काट डाले ॥१२७॥
जाल काटने के पश्चात् बहेलिये के भय से बिल्ली के भाग जाने पर, मृत्यु से छूटा हुआ चूहा भी भागकर बिल में घुस गया ॥ १२८॥
बिलाव द्वारा फिर विश्वास दिलाकर बुलाने पर भी उसने उसका विश्वास नहीं किया और कहने लगा- 'समय आने पर ही शत्रु मित्र बनता है, सदा नहीं' ॥१२९॥
इस प्रकार चूहे ने, और भी बहुत से पशुओं ने अपने शत्रुओं से बुद्धिमानी के साथ आत्म-रक्षा की¹, मनुष्यों की तो बात ही क्या है ।॥ १३०॥
जो तुमने मुझसे सुना है, यही मुझसे कहा गया राजा अपनी बुद्धि से महारानी की रक्षा करते हुए अपने कार्य की भी रक्षा कर सकता है ।॥१३१॥
बुद्धि ही सर्वत्र प्रधान मित्र है, पुरुषार्थ नही। हे योगेश्वर ! इस कथा को भी सुनो ।।१३२।
श्रावस्ती नाम की एक नगरी है। उसमें पहले प्रसेनजित् नाम का राजा राज्य करता था। वहाँ एक बार एक कोई अद्भुत ब्राह्मण आया ॥१३३।।
वह शूद्र का अश्न नहीं खाता था। इसलिए एक वैश्य ने उसे तपस्वी समझकर किसी ब्राह्मण के घर ठहरा दिया ॥१३४।।
धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि होने पर उस ब्राह्मण के घर को अन्यान्य वैश्यों ने सूखे अन्न और धन से भरपूर कर दिया ।।१३५।।
उस संग्रह से उस कंजूम ब्राह्मण ने एक सहस्र मुद्राएँ एकत्र कर लीं और जंगल में जाकर भूमि खोदकर उन्हें गाड़ दिया ॥१३६॥
और, प्रतिदिन वहाँ अकेला जाकर उस स्थान को वह देख आता था। एक दिन उसने उस स्थान को खुदा हुआ और मुद्राशून्य पाया ।।१३७।।
उस गड्ढे को मुद्रा-रहित दिशाओ में भी शून्यता फैल गई, देखकर हताश उस ब्राह्मण के हृदय में ही नही, प्रत्युत अर्थात् उसे सभी ओर अँधेरा दीखने लगा ।।१३८॥
तदनन्तर रोता विलाप करता हुआ वह ब्राह्मण वहाँ आया, जहाँ ठहरा हुआ था। वहाँ के गृहस्वामी ब्राह्मण द्वारा पूछे जाने पर अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया ।॥ १३९॥
और, वह अनशन करके तीर्थ में प्राण देने की इच्छा प्रकट करने लगा। यह जानकर वह उसका अन्नदाता वैश्य भी अन्य चनियों के साथ वहाँ आया ।।१४०।।
आकर उस ब्राह्मण से वह कहने लगा, 'हे ब्रह्मदेव ! घन के लिए क्या मरना चाहते हो ? अकाल-मेघ के समान घन आता है और चला जाता है' ।॥१४१॥
इस प्रकार, अनेक बातों से सान्त्वना देने पर भी. उस ब्राह्मण ने, मरने का आग्रह न छोड़ा; क्योंकि कंजूस के लिए धन की मात्रा प्राणों से भी प्यारी और भारी होती है ॥ १४२॥
तदनन्तर मरने के लिए तीर्थयात्रा करनेवाले उस ब्राह्मण को सुनकर प्रसेनजित् स्वयं उसके पास आया ।।१४३।।
और पूछा कि 'जहाँ तुमने मुहरें गाड़ी थीं, वहाँ पर कोई चिह्न भी है?' १४४।।
यह सुनकर उस ब्राह्मण ने कहा- 'वहाँ पर एक छोटा-सा क्षुप (पेड़) है महाराज, उसी की जड़ में मैंने वह घन गाड़ दिया था' ।॥१४५।।
यह सुनकर राजा ने उससे कहा- 'मैं उसे ढूँढवाकर तुम्हें दे दूंगा अथवा अपने कोष से तुम्हें दे दूंगा। इसलिए तुम प्राण न छोड़ो' ॥१४६।।
ऐसा कहकर ब्राह्मण को मरने के प्रयत्न से रोककर और उसे वैश्य के हाथ सौंपकर राजा अपने भवन को चला गया ।।१४७।।
वहाँ जाकर शिर-पीड़ा का बहाना करके द्वारपाल द्वारा नगाड़े पर घोषणा कराकर राजा ने नगर के सभी वैद्यों को बुलवाया ॥१४८॥
और, एक-एक वैद्य को अलग-अलग बुलवाकर पूछने लगा कि तुम्हारे कितने रोगी हैं और तुमने किसे-किसे कौन-कौन-सी दवा दी है ? ॥१४९॥
उन वैद्यों ने भी, एक-एक करके अपना-अपना विवरण राजा को सुनाया। उनमें से एक वैद्य ने, क्रमशः अपनी बारी आने पर राजा से यह कहा ।।१५०।।
'महाराज, रोगी मातृदत्त नामक वैश्य को मैंने नागबला नाम की ओषधि बताई थी, आज दूसरा दिन है। यह सुनकर राजा ने मातृदत्त वैश्य को बुलवाकर कहा, 'तुम्हारे लिए नागबला कौन लाया था ? बताओ' ।।१५१-१५२।।
'महाराज, मेरा भृत्य (नौकर) लाया था।' बनिये के ऐसा उत्तर देने पर राजा ने उस भृत्य को बुलवाकर कहा, 'तू ने नागवला के लिए भूमि खोदते हुए जो मुहरों की राशि प्राप्त की है, वह ब्राह्मण का धन है, उसे दे दे' ।।१५३-१५४।।
राजा के ऐसा कहने पर भयभीत नौकर ने, उसी समय मुहरें लाकर वहाँ रख दीं ।। १५५।।
तदनन्तर राजा ने अनशन करते हुए ब्राह्मण को बुलवाकर, उस कंजूस ब्राह्मण के बाहरी प्राणो के समान चोरी होकर मिली हुई मुहरें उसे दे दी ॥१५६॥
इस प्रकार राजा ने वृक्ष के नीचे से ले जाये गये धन को बुद्धिबल से ब्राह्मण को प्राप्त करा दिया; क्योंकि वहाँ उत्पन्न हुई ओषधि को वह जानता था ।।१५७।।
अतएव, पुरुषार्थ के ऊपर सदा बुद्धि की प्रधानता रहती है। ऐसे कार्यों में पौरुष क्या कर सकता है ? ॥१५८॥
इसलिए हे योगेश्वर ! तुम भी बुद्धिबल से कुछ ऐसा करना, जिससे कलिंगसेना का कोई दोष जाना जा सके ।।१५९।।
यह बात तो है कि उस कलिंगसेना पर देवता और असुर सभी ललचा रहे हैं और रात में तुमने ऐसा कुछ शब्द भी सुना है ।।१६०।।
उसका दोष मिलने पर उसका और हमारा अकल्याण न होगा। राजा उससे विवाह न करेगा, इसलिए अधर्म भी न होगा ॥१६१।।
उदार बुद्धिवाले यौगन्धरायण से यह सुनकर ब्रह्मराक्षस योगेश्वर प्रसन्न होकर बोला- ॥१६२॥
'नीति में बृहस्पति के सिवा तुम्हारे समान और कौन है। तुम्हारी सम्मति, राज्य-रूपी वृक्ष के लिए अमृत-सिंचन के समान है' ।।१६३।।
अब मैं, कलिगसेना की गतिविधि को बुद्धि और शक्ति दोनों से ही जानने का प्रयत्न करूंगा। ऐसा कहकर योगेश्वर चला गया ॥ १६४॥
उस समय, अपने भवन में बैठी हुई कलिंगसेना, राजमहल, उद्यान आदि में भ्रमण करते हुए बत्सराज को देख-देखकर तड़प रही थी ।।१६५॥
वत्सेशमय हृदयवाली कलिंगसेना मृणाल (कमलनाल) के अंगद (भुजा के आभूषण) से मनोहर लगा रही थी और चन्दन का लेप करने पर भी विरहाग्नि से शान्ति प्राप्त नहीं कर पा रही थी ।।१६६।।
इसी बीच मदनवेग नाम का वह विद्याधरो का राजा पहले से ही कलिगसेना को देखकर कामबाणों की गम्भीर वेदना का अनुभव कर रहा था ।।१६७।।
उसकी प्राप्ति के लिए तप करके शिवजी से वर लाभ कर लेने पर भी दूसरे पर आसक्त और दूसरे देश में गई हुई कलिगसेना अब उसके लिए सहज मे ही पाने योग्य नहीं रह गई थी ॥ १६८॥
इसीलिए अवसर की प्रतीक्षा में विद्याधरी का वह राजा, रात्रियों मे, आकाश में विचरण करता हुआ एक बार कलिंगसेना के निवास-भवन के ऊपर आया ।।१६९।।
और तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के उस आदेश का स्मरण करके एक बा। रात के समय, अपनी विद्या के बल से वत्सराज का रूप और वेष बनाकर द्वारपाल से प्रणाम किया जाता हुआ कलिंगसेना के मन्दिर में गया। मानो मन्त्रियो द्वारा किये गये कालक्षेप को सहन न करके राजा, गुप्त रूप से स्वयं ही आ गया हो ।। १७०-१७१।।
उसे देखकर कम्पन से व्याकुल कलिंगसेना उठी। उसके उठने पर झनझनाते उसके आभूषण मानों यह कह रहे थे कि यह वह (वत्गराज) नही है ।।१७२।।
तदनन्तर वत्सराज का रूप धारण किये हुए उस विद्याधर ने धीरे-धीरे उसे विश्वास दिलाकर गान्धर्व विधान से अपनी पत्नी बना लिया ।। १७३।।
उसी समय अन्दर घुसा हुआ और अपनी विद्या के प्रभाव से अलक्षित योगेश्वर वत्सराज को देखकर भ्रम से चकित रह गया ।।१७४।।
और, वत्सराज को यौगन्धरायण के पास बैठा हुआ देखकर उसके आदेश से उसे यह सब वृत्तान्त कहने के लिए उसके पास गया ।।१७५।।
मन्त्री के कहने से कलिगसेना के गुप्त प्रेमी का वास्तविक रूप देखने के लिए वह पुनः लौट आया ।।१७६।।
और, सोई हुई कलिंगसेना के पास जाकर उस पर सोये हुए मदनवेग के वास्तविक रूप को उसने देखा ॥१७७।।
उस दिव्य मनुष्य के छत्र और ध्वजा से चिह्नित तथा निष्पंक कोमल चरणकमल थे। सो जाने पर छिपी हुई विद्या के कारण उसका बदला हुआ रूप समाप्त हो गया और वह स्पष्टतया अपने वास्तविक रूप में दीख रहा था ।।१७८।।
इस स्थिति को देखकर परम सन्तुष्ट योगेश्वर ने जो कुछ देखा, उसे मन्त्री यौगन्धरायण को बताते हुए उसने कहा- ।।१७९।।
'हे स्वामी ! मैं कुछ भी नहीं जानता, तुम नीति की आँखों से सब कुछ जानते हो। तुम्हारे ही उपाय से यह दुःसाध्य कार्य भी सिद्ध हो गया ।॥१८०॥
विना सूर्य के आकाश क्या है और विना जल के सरोवर क्या है? विना मन्त्री के राज्य क्या है और विना सत्य के वचन क्या है?' ॥१८१॥
इस प्रकार कहते हुए योगेश्वर को विदा करके यौगन्धरायण प्रातःकाल ही वत्सराज से मिलने गया ।॥१८२॥
उसके पास जाकर वार्तालाप के प्रसंग में अवसर पाकर राजा से कलिंगसेना-सम्बन्धी कार्य के लिए सम्मति पूछता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण कहने लगा ॥१८३॥
'यह कलिंगसेना स्वैरिणी (स्वतन्त्र स्त्री) है। यह आपके हाथों से स्पर्श करने योग्य नही है। अपनी इच्छा से यह प्रमेनजित् राजा को देखने आई थी, किन्तु उसे वृद्ध देखकर रूप के लोभ से तुम्हारे पास आ गयी। यह दूसरे पुरुष का संग भी अपनी इच्छा से करती है' ॥१८४-१८५।।
यौगन्धरायण से ऐसा सुनकर, 'एक अच्छे कुल की कन्या, ऐसा कैसे कर सकती है और मेरे रनिवास में परपुरुष को घुसने की शक्ति कैसे हुई?' ॥ १८६॥
राजा के इस प्रकार प्रश्न करने पर बुद्धिमान् यौगन्धरायण कहने लगा, 'महाराज ! आज ही रात में आपको सब प्रत्यक्ष दिखा दूंगा' ॥१८७॥
सिद्ध, विद्याधर आदि देवता उसे चाहते है, तो मनुष्यो की कथा ही क्या है। और, राजन् ! दिव्य व्यक्तियों की गति को कौन रोक सकता है ? ॥१८८॥
अतः आइए और प्रत्यक्ष देखिए। ऐसा कहते हुए मन्त्री के साथ राजा ने रात्रि के समय कलिगसेना के रनिवास में जाने की इच्छा प्रकट की ।। १८९।।
'पद्मावती के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री का विवाह राजा से नहीं होगा, यह जो मैंने तुमसे प्रतिज्ञा की थी, उसे आज मैंने पूर्ण कर दिया' ।॥१९०॥
यौगन्धरायण ने रानी वासवदत्ता के पास जाकर ऐसा कहा और कलिंगसेना का सारा वृतान्त उसे विस्तारपूर्वक सुना दिया ।।१९१॥
प्रणाम करती हुई वासवदत्ता ने भी 'तुम्हारी शिक्षा के अनुसार कार्य करने का यह परिणाम है' ऐसा कहकर मन्त्री का अभिनन्दन किया ।।१९२॥
तदनन्तर रात में सभी मनुष्यों के सो जाने पर वत्सराज और यौगन्धरायण कलिंगसेना के निवास-भवन में गये। और अलक्षित रूप से सोए हुए मदनवेग के वास्तविक स्वरूप को उन्होंने देखा ।।१९३-१९४।।
जबतक राजा उस साहसी मदनवेग को मारने के लिए तलवार खींचता है, तबतक वह जगकर अपनी विद्या के प्रभाव से विद्याघर बन गया ।।१९५।।
और, शीघ्र ही उठकर एवं भवन से बाहर निकलकर आकाश में उड़ गया। इतने में ही कलिंगसेना भी सहसा उठ गई ।। १९६।।
वह अपने पर्यंक को सूना देखकर बोली- 'मुझे विना जगाये ही स्वयं पहले जगकर आज वत्सराज क्यों चले गये ?' ॥१९७।।
यह सुनकर यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा- 'सुनो' इस विद्याधर ने तुम्हारा रूप धारण करके इसे भ्रष्ट कर दिया है। यह मैंने योगबल से जानकर तुम्हे प्रत्यक्ष दिखा दिया किन्तु वह दिव्यशक्तिशाली है। तुम उसे मार नहीं सकते। ऐसा कहकर राजा और मन्त्री दोनों प्रत्यक्ष होकर कर्कालगसेना के पास पहुँचे। कलिंगसेना भी उन्हें देखकर उनका समुचित सत्कार करती हुई उठकर खड़ी हुई ।।१९८-२००।।
और कहने लगी, 'राजन् ! अभी ही जाकर फिर आप मन्त्री के साथ कैसे पधारे !' ऐसा कहती हुई कलिगसेना से मन्त्री यौगन्धरायण बोला-॥२०१॥
'है कलिंगसेना ! तुझे किसी झूठे व्यक्ति ने, वत्सराज का रूप धारण करके भ्रम में डालकर विवाहित कर लिया। मेरे इस स्वामी से तू विवाहित नहीं हुई है' ।॥२०२॥
यह सुनते ही मानों तीर से विदीर्ण हृदय, अतएव अत्यन्त व्याकुल कलिंगसेना आँसू बहाती हुई वत्तराज से कहने लगी ॥ २०३॥
'गान्धर्व विधि से विवाहितकर लेने पर आपने मुझे वैसे ही भुला दिया, जैसे दुष्यन्त ने शकुन्तला को भुला दिया था। यह क्या है? ॥२०४॥
कलिंगसेना के इस प्रकार कहने पर राजा ने नीचे मुंह किये हुए कहा- 'सत्य है, मैंने तुझे' विवाहित नहीं किया। मैं तो आज ही यहाँ आया हूँ' ॥२०५॥
ऐसा कहते हुए राजा को मन्त्री यौगन्धरायण 'आइए' ऐसा कहकर राजभवन में ले गया ॥ २०६॥
इस प्रकार मन्त्री के राजा के साथ चले जाने पर अपने बन्धु-बान्धुवों से छूटी हुई और विदेश में पड़ी हुई कलिंगसेना झुंड से बिछुड़ी हुई हरिणी के समान, हाथी के पैरो से रौदी हुई कमलिनी के समान मलिन मुखवाली, भ्रमरों से घिरी हुई कमलिनी के समान बिखरे हुए केशोंवाली और कौमार के नष्ट होने से मलिन एवं निरुपाया कलिंगसेना आकाश की ओर देखती हुई यह कहने लगी-॥२०७-२०९।।
'वत्सराज का रूप धारण करके जिसने मुझे विवाहित किया है, वह मेरे कौमार का हरण करनेवाला प्रकट हो। बही मेरा पति है' ।॥२१०॥
उसके ऐसा कहते ही वह विद्याघरो का राजा मदनवेग हार और केयूर पहने हुए दिव्य रूप से उतरकर आया ।। २११।।
'तुम कौन हो ?' कलिंगसेना के इस प्रकार पूछने पर मदनवेग ने उससे कहा-'हे सुन्दरि ! मैं मदनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मैंने तुझे पहले ही तेरे पिता के घर में देखा था और तुम्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या करके शिवजी से वर पाया है ।। २१२-२१३॥
तू वत्सराज पर आसक्त थी, इसलिए मैंने शीघ्र ही उससे विवाह होने के पूर्व उपाय करके तुझे विवाहित कर लिया है' ।॥ २१४।।
मदनवेग की ऐसी वाणी-रूपी अमृतधारा ने कानों के मार्ग से कलिगसेना के हृदय में प्रवेश कर उसके हृदय-कमल को प्रफुल्लित और विकसित कर दिया ॥२१५॥
तदनन्तर वह मदनवेग, उस अपनी प्यारी पत्नी को धीरज बंधाकर और उसे स्वर्ण की प्रचुर राशि प्रदान कर, 'यह भी अच्छा ही हुआ' ऐसा सोचती हुई और हृदय में पति-भक्ति को प्रतिष्ठित करती हुई कलिंगसेना से पूछकर वह आकाश में उड़ गया ।॥२१६॥
'अपने पति का स्थान दैवी है, मनुष्य द्वारा जानने योग्य नहीं है, अपने पिता का घर काम-वश छोड़ दिया'- ऐसा सोचकर कलिंगसेना ने मदनवेग की अनुमति प्राप्त कर उसी के पास रहने का विचार स्थिर किया ।।२१७।।
सप्तम तरंग समाप्त ।
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1. यह कया महाभारत के १२वें पर्व में तथा पंचतंत्र में भी मिलती है। - अनु०
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