5.106. || छठी कहानी || गुणाढ्य, चूहे से धनी बने सेठ, मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण , देवी उद्यान व राजा सातवाहन की कथा
5.106. || छठी कहानी || गुणाढ्य, चूहे से धनी बने सेठ, मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण , देवी उद्यान व राजा सातवाहन की कथा
षष्ठ तरंग
वररुचि के चले जाने पर उसका मित्र विन्नहृदय माल्यवान् नामक गण, मर्त्यशरीर में गुणाढ्य नाम से विख्यात होकर वन में घूमता हुआ, संस्कृत आदि तीन भाषाओं को प्रतिज्ञापूर्वक छोड़कर और सातवाहन राजा की सेवा करके विन्ध्यवासिनी भगवती के दर्शन के लिए आया ।।१२।।
विन्ध्यवासिनी की आज्ञा से उसने विन्ध्यारण्य मे काणभूति को देखा। काणभूति को देखते ही गुणाढ्य को अपनी पूर्व जाति का स्मरण हो गया और वह मानों अकस्मात् जाग उठा ॥ ३॥ संस्कृत, प्राकृत एव देशीय ( अपभ्रंश ) — इन तीनो भाषाओं को छोड़कर पैशाची भाषा मे अपना नाम सुनाकर वह काणभूति से बोला ॥४॥
मित्र काणभूते, पुष्पदन्त से सुनी हुई उस दिव्य कथा को शीघ्र सुनाओ; जिसके सुनने पर मैं और तुम दोनों एक साथ ही शाप से मुक्त हो जायेंगे ||५||
गुणाढ्य की कथा
यह सुनकर कामभूति ने गुणा से कहा- हे स्वामिन् ! उस दिव्य कथा को तो मै सुनाता हूँ। किन्तु मुझे एक महान् कौतूहल है ॥ ६ ॥ वह यह कि पहले आप अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाओ। इस प्रकार काणभूति के प्रार्थना करने पर गुणाढ्य ने अपनी कथा प्रारम्भ की ॥७॥
प्रतिष्ठान- प्रदेश में सुप्रतिष्ठित नामक नगर है। वहाँ पर सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था ॥८॥ उस ब्राह्मण के वत्स और गुल्म नामक दो बालक और तीसरी श्रुतार्था नाम की एक कन्या थी ॥ ९ ॥
कालक्रम से सोमशर्मा और उसकी भार्या दोनों मर गये। उनके मरने पर वत्स और गुल्म 'दोनों भाई बहन श्रुतार्था का पालन-पोषण करने लगे ।। १० ।। उन्होंने किसी समय बहन को गर्भवती देखा। वहाँ अन्य किसी तीसरे पुरुष के अभाव में उन दोनों को परस्पर शंका हुई ।। ११ ।।
भाइयों को शंकित देखकर चित्त की बात को समझनेवाली श्रुतार्था ने भाइयों से कहा- 'तुम्हें किसी प्रकार की शंका न करनी चाहिए। मैं सत्य बात तुम्हें बताती हूँ ।। १२ ।। नागराज वासुकि के भाई का पुत्र कुमार कीत्तिसेन है। मुझे स्नान के लिए जाते हुए उसने देखा ॥ १३॥
मुझे देखकर काम पीड़ित हुए कीर्ति सेन ने अपना वंश और नाम बताकर गान्धर्वविधि से मझे अपनी पत्नी बना लिया ॥ १४ ॥ इसलिए मेरा यह गर्भ, ब्राह्मण जाति से है। इस प्रकार बहन की बात सुनकर वत्स और गुल्म बोले कि इसमें क्या प्रमाण है ? ।। १५ ।।
यह सुनकर श्रुतार्था ने एकान्त में उस नागकुमार का स्मरण किया। नागकुमार स्मरण करते ही आया और वत्स एवं गुल्म से बोला ॥ १६ ॥ इस शापभ्रष्ट अप्सरा को मैंने पत्नी बनाया है, जो तुम दोनों की बहन है। तुम दोनों भी शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हो ॥ १७॥ । तुम्हारी बहन के इस गर्भ से अवश्य पुत्र उत्पन्न होगा। इसके उत्पन्न होने पर इसकी और तुम दोनों की शाप मुक्ति होगी ।।१८।।
ऐसा कहकर वह नागकुमार अन्तर्धान हो गया और कुछ ही दिनों बाद श्रुतार्था को पुत्र उत्पन्न हुआ । है ससे, वह श्रुतार्था का पुत्र मुझे ही समओ ।। १९।। मेरे उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि यह गुणाढ्य नामक ब्राह्मण, शिवजी के गण का अवतार है || २० ॥
मेरे उत्पन्न होने पर वे मेरी माता और मामा-भी शापक्षीण होने के कारण मर गये और एकाकी में अधीर हो गया ॥ २१॥ कुछ दिनों के अनन्तर शोक का परित्याग करके मैं बालक होने पर भी अपने ही सहारे विद्याओं की प्राप्ति के लिए दक्षिणापथ चला गया ॥ २२ ॥
मैं कुछ समय मे दक्षिण देश में समस्त विद्याओ को प्राप्त करके प्रसिद्ध विद्वान् हुआ और अपने गुणों को दिखाने की इच्छा से स्वदेश आया ।। २३ ।।
बहुत दिनों के अनन्तर शिष्यों के साथ उस सुप्रतिष्ठित नगर में प्रवेश करते हुए मैंने नगर की अपूर्व शोभा देखी ॥ २४ ॥ मैंने उस नगर में देखा कि कही सामवेदी विद्वान् विधिपूर्वक साम-गान कर रहे हैं और कही वेदों के अर्थ निर्णय पर विद्वानों का शास्त्रार्थ हो रहा है ।। २५ ।।
कही जुआरी अपनी डीग हाँक रहे थे कि जो जुए की कला जानता है, उसके हाथ में खजाना है ||२६|| अपनी-अपनी व्यापार कला का चातुर्य बतलाते हुए कुछ बनियों की मडली में एक बनिया इस प्रकार बोला ॥ २७॥
चूहे से धनी बने सेठ की कथा
'पैसों के विषय में संयम रखनेवाला ही पैसा कमाता है, यह कितने आश्चर्य की बात है । मैं जब गर्भ में था, तभी मेरे पिता मर गये। मेरी माता के पास जो कुछ भी धन था, वह दुष्ट संबंधियों ने उसे फुसलाकर ले लिया ।। २८-२९ ॥
तब मेरी माता उन संबंधियों की लूट-खसोट के भय से गर्भ की रक्षा करती हुई अपने पिता के मित्र कुमारदत्त के घर जाकर रहने लगी ॥ ३० ॥
कुमारदत के घर में उस पतिव्रता के जीवन का आधार मैं उत्पन्न हुआ। मेरी माता, कष्टसाध्य कार्य करती हुई, मुझे जिलाने लगी ॥ ३१ ॥ मेरे कुछ बड़े होने पर उस अकिंचन और दीन माता ने गुरु से प्रार्थना करके मुझे अक्षर लिखना और कुछ गणित ( हिसाब-किताब ) सिखा दिया ।। ३२ ।।
कुछ पढ़ लेने पर माता ने कहा- 'बेटा! बनिये के बालक हो, व्यापार करो। इस नगर में विशाखिल नाम का एक धनी व्यापारी बनिया है। कुलीन घर के दरिद्र लोगों को वह व्यापार का सामान देता है। अतः तुम उसी के पास जाओ और माँगो' ॥३३-३४ ॥
माता की आज्ञा से मैं उस बनिये के पास गया। उस समय विशाखिल बनिया, क्रोध में किसी बनिये के लड़के से कह रहा था कि यहाँ भूमि पर एक मरा हुआ चूहा पड़ा है। यदि चतुर बनिया हो, तो इस सौदे से भी धन कमा सकता है ।। ३५-३६ ।।
है दुष्ट, मैंने तुझे बहुत-सी स्वर्ण मुद्राएँ दी, उनकी वृद्धि तो दूर रही, तूने उनकी रक्षा भी नही की ।। ३७।। बनिये की बातें सुनकर मैने विशाखिल से कहा- मैंने बेचने के सामान मे तुझसे इस चूहे को लिया ॥ ३८ ॥
ऐसा कहकर मैंने मरे हुए चूहे को हाथ से उठाकर एक डिब्बे में रख लिया और बनिये की बही मे लिखकर चला। मेरे इस कार्य पर वह बनिया भी हँसने लगा ||३९||
मैंने दो अँजुली चने के बदले उस चूहे को किसी बनिये की बिल्ली को खाने के लिए दे दिया ||४०||
उस चने को भाड़ में भुनाकर और एक घड़ा पानी लेकर मै शहर के बाहर एक चौराहे पर पेड़ की छाया में जा बैठा ।।४१।। लकड़ी का बोझ लेकर आनेवाले थके मजदूरो को मैं नम्रता के साथ चना खिलाने और ठंडा पानी पिलाने लगा ॥ ४२ ॥
प्रत्येक लकड़हारा, अपने-अपने बोझ से दो-दो लकड़ियाँ मुझे प्रेमपूर्वक देने लगा। इस प्रकार कुछ समय में मेरे पास लकड़ी का एक बोझा एकत्र हो गया और मैंने उसे बाजार में जाकर बेच दिया ।।४३ ।।
लकड़ी बेचकर प्राप्त हुए मूल्य में से कुछ मूल्य से चने खरीदकर मैंने दूसरे दिन, फिर उसी प्रकार चौराहे पर पानी पिलाना प्रारंभ किया। इस प्रकार मेरे पास पर्याप्त मात्रा में लकड़ियाँ इकट्ठी हो गई ।। ४४ ।।
इस प्रकार प्रतिदिन करते-करते मैंने धन-संग्रह करके तीन दिनों तक लकड़हारों से सारी लकड़ियाँ खरीद लीं ॥ ४५ ॥
एक बार भयंकर वृष्टि के कारण लकड़ियों का जंगल से जाना बन्द हो गया। तब मैने अपनी इकट्ठी की हुई लकड़ियो को महँगे दाम पर बेचकर पर्याप्त धन कमा लिया ॥ ४६ ॥
उस धन से एक दुकान करके व्यापार की चतुराई से मैं बहुत घनवान् हो गया। मैंने सोने का चूहा बनाकर अपने महाजन विशाखिल को मृत चूहे के मूल्य स्वरूप भेंट में दिया ॥४७॥
वह भी मेरी व्यापार- बुद्धि से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी कन्या मुझे दे दी ॥ ४८ ॥
एक मरे हुए चूहे के आधार पर व्यापार करने के कारण मैं नगर में 'मूसे साब' के नाम से विख्यात हो गया। इस प्रकार निर्धन होकर मैंने लक्ष्मी प्राप्त की ॥ ४९ ॥ यह सुनकर वहाँ एकत्र सभी बनिये आश्चर्य चकित हो गये। बिना भीत की चित्र-रचना करने पर किसकी बुद्धि आश्चर्य चकित नहीं होती ॥५०॥
मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण की कथा
वही पर कहीं से दान में आठ मासा सोना पाया हुआ वेदपाठी ब्राह्मण खड़ा था। उसे किसी वेश्याओं के दलाल ने कहा- 'ब्राह्मण होने के कारण तुम्हें भोजन की चिन्ता तो है नहीं; सो तुम इस आठ मासे सोने से कहीं जाकर जीवन निर्वाह के लिए सासारिक चतुराई सीखो' ॥५१-५२॥
'मुझे चतुराई कौन सिखायेगा ?' ब्राह्मण के ऐसा पूछने पर उसने कहा - 'यहाँ जो चतुरिका नाम की वेश्या है, उसके घर जाकर सीखो ॥५३॥ 'वेश्या के घर जाकर क्या करूँ ?' - ऐसा पूछने पर दलाल ने कहा- 'उसे सोना देकर चतुराई सिखाने को कहना, मनोरंजक और साम (सात्वना) की बातें करना ॥ ५४ ॥
यह सुनकर वह वैदिक ब्राह्मण तुरन्त चतुरिका के घर गया और उसके द्वारा अभ्युत्थान सत्कार करने पर भीतर जाकर बैठ गया ॥ ५५ ॥ 'तुम आज इस सुवर्ण को लेकर मुझे सांसारिक व्यवहार सिखाओ ऐसा कहकर उसने वह आठ मासा सोना उस वेश्या को अर्पित कर दिया ॥ ५६ ॥
उसके ऐसा कहने पर वहाँ बैठे हुए मनुष्य हँसने लगे। उन्हें हँसता देखकर वह मूर्ख वैदिक ब्राह्मण, दोनों हाथों को गौ के कान के समान खड़ा करके उन पर अंगुलियाँ नचाता हुआ इतनी कड़ी आवाज से सामवेद पढ़ने लगा कि आसपास के सभी वेश्या दलाल, उसका तमाशा देखने के लिए वहाँ इकट्ठे हो गये ।। ५७-५८ ।।
वे सब बोले यह सियार यहाँ कैसे घुस आया ? इसे जल्दी ही अर्धचन्द्र (गरदनिया) देकर बाहर निकालो' ॥ ५९ ॥ ब्राह्मण, अर्धचन्द्र को बाण समझकर सिर कटने के भय से 'मैंने लोकयात्रा (चतुराई) खूब सीख ली' ऐसा कहता हुआ भय से शीघ्र बाहर भाग गया ॥ ६०॥
वैदिक ब्राह्मण, वेश्या के घर से भागकर फिर उसी के पास गया, जिसने उसे भेजा या और उससे सारा वृत्तान्त भी बताया। उसने कहा कि मैंने तुमसे कहा था कि वहाँ साम (शान्ति) का प्रयोग करना। सामवेद पढ़ने की कौन-सी तुक थी। सचमुच, वेदपाठी मूर्ख ब्राह्मणों में मूर्खता कूट-कूट कर भरी गई है ।। ६१-६२॥
इस प्रकार हँसकर और उस वेश्या के पास जाकर उस दलाल ने कहा कि 'इस दो पैर के पशु को वह सुवर्ण-रूपी घास दे दो, अर्थात् इसका सोना लौटा दो ॥६३॥ वेश्या ने हँसते हुए उस ब्राह्मण का आठ मासा सोना लौटा दिया और वह भी मानों अपना पुनर्जन्म समझता हुआ घर वापस आया ।। ६४ ।।
गुणाढ्य ने काणभूति से कहा कि मैं उस सुप्रतिष्ठित नगर में पग-पग पर इस प्रकार के तमाशे देखता हुआ महेन्द्र भवन के समान राजभवन में पहुँचा ।। ६५ ॥ वहाँ पर मैने वर्मा आदि मन्त्रियों से घिरे हुए तथा दरबार में बैठे हुए राजा सातवाहन को देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के समान देखा ।। ६६ ।।
आशीर्वाद देकर आसन पर बैठे हुए और राजा के द्वारा सत्कार किये गये शर्ववर्मा आदि मन्त्री मेरी प्रशसा करने लगे ।। ६७॥ हे महाराज, यह सारे भुवन मे विख्यात और सभी विद्याओं में पारंगत गुणाढ्य नाम का विद्वान् है। सभी गुणों से पूर्ण होने के कारण गुण आढ्य इसका नाम यथार्थ है ।। ६९।।
मन्त्रियों द्वारा मेरी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न राजा सातवाहन ने मुझे भी एक मन्त्री का पद प्रदान किया ॥७०॥ मन्त्री नियुक्त होने पर वहाँ विवाह करके और शिष्यों को पढ़ाते हुए आनन्द के साथ रहने लगा ।।७१।
देवी उद्यान की कथा
किसी समय कौतुकवश स्वतन्त्र रूप से भ्रमण करते हुए मैंने वहाँ पर गोदावरी के तट पर, देवी के बनाये हुए उद्यान को देखा ॥७२॥ पृथ्वी पर बने हुए नन्दन-वन के समान उस अत्यन्त रमणीय उद्यान को देखकर मैंने उद्यानपाल ( माली) से उसकी उत्पत्ति का कारण पूछा ॥७३॥
माली ने मुझसे कहा -- मालिक ! बूढ़ों से ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन समय में मौनी और निराहारी एक ब्राह्मण यहाँ आया और उसने देव मन्दिर के साथ इस बाग को बनाया। इसलिए इसमें ब्राह्मणगण, बड़े उत्साह के साथ यहाँ एकत्र होते हैं, परस्पर मिलते हैं ॥ ७५ ॥
अति आग्रह के साथ उनसे पूछे जाने पर उस ब्राह्मण ने कहा कि इस भारतभूमि में नर्मदा के तट पर भरकच्छ नाम का प्रसिद्ध देश है ।। ७६ ।।
मैं उसी भरुकच्छ देश मे उत्पन्न एक ब्राह्मण हूँ। मुझ आलसी और दरिद्र को कोई भिक्षा भी नही देता था ॥७७॥ इस कारण अत्यन्त दुःख से मैं जीवन के प्रति विरक्त होकर अनेक तीर्थो का भ्रमण करता हुआ विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए गया ।।७८ ।। देवी का दर्शन करके मैने सोचा कि यहाँ लोग वरदानी देवी को पशुवलि देकर प्रसन्न करते है, तो मै मूर्ख और पशु-स्वरूप अपने को ही मारकर वलि क्यों न दे दूं ऐसा सोचकर मैंने अपना गला काटने के लिए शस्त्र उठाया ।।७९-८०।।
उसी क्षण प्रसन्न होकर देवी ने मुझे स्वयं कहा - 'पुत्र तू सिद्ध हो गया है। अपने को मत मार ! मेरे पास रह ॥ ८१ ॥ | इस प्रकार देवी का वर प्राप्त करके मैंने दिव्यता प्राप्त की। तभी से प्यास के साथ मेरी भूख भी नष्ट हो गई ॥ ८२ ॥
किसी समय वहीं निवास करती हुई देवी ने मुझसे स्वयं कहा- हे पुत्र, तुम प्रतिष्ठान नगर में जाकर एक अच्छा उद्यान बनाओ' ॥८३॥ ऐसा कहकर देवी ने मुझे दिव्य बीज दिया और उसीके प्रभाव से मैंने यह रमणीय उद्यान बनायां ॥ ८४ ॥
आपलोग इस उद्यान की रक्षा करें। ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गया । 'हे स्वामिन् ! इस प्रकार प्राचीन समय में देवी ने इस उद्यान को बनाया ॥ ८५ ॥ उद्यानपाल (माली) से इस प्रकार उस देश में देवी की कृपा का समाचार सुनकर मैं आश्चर्यान्वित होकर घर के लिए लौटा ॥ ८६ ॥
गुणाढ्य के इतना कहने पर काणभूति ने कहा कि राजा सातवाहन यह नाम क्यों हुआ ? ॥८७॥
राजा सातवाहन की कथा
तब गुणाढ्य ने कहा कि यह भी सुनो! प्राचीन समय में दीपकण नामक प्रसिद्ध पराक्रमी राजा हुआ ॥ ८८ ॥
उसकी प्राणों से भी प्यारी शक्तिमती नाम की रानी थी। किसी समय रतिकाल के अन्त में उद्यान में सोई हुई रानी को साँप ने काट लिया ॥ ८९ ॥
उससे अत्यधिक प्यार करनेवाले राजा ने उसके मर जाने पर, सन्तान रहित होने पर भी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने का निश्चय किया ॥९०॥
किसी समय राज्य के योग्य पुत्र के न होने से अत्यन्त दुःखी राजा को भगवान् चन्द्रशेखर ने स्वप्न मे आदेश दिया ।।९१॥ 'किसी समय जगल में घूमते हुए सिंह पर चढ़े हुए बालक को तुम देखोगे, उसे लेकर घर जाना, वह तुम्हारा पुत्र होगा ।। ९२ ।।
सोकर उठे हुए राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। किसी दिन राजा शिकार के सिलसिले मे जगल में दूर तक निकल गया ।। ९३॥ जंगल में भ्रमण करते हुए राजा ने मध्याह्न के समय एक पद्म-सरोवर के किनारे शेर पर चढ़े हुए सूर्य के समान तेजस्वी एक बालक को देखा ।। ९४ ।।
इसके अनन्तर राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए बालक को उतारकर पानी पीते हुए सिह को एक वाण मारा ।। ९५ ।। वाण लगते ही सिंह अपना शरीर छोड़कर तुरन्त पुरुष बन गया। उसे देखकर राजा ने पूछा कि तुम्हे यह कष्ट कैसे हुआ' ॥९६॥
सिंह बोला - " मैं कुबेर का मित्र सात नामक यक्ष हूँ ! मैंने एक बार स्नान करती हुई एक ऋषि कन्या को देखा। देखते ही वह और में दोनों परस्पर आसक्त हो गये। उसे गान्धर्व विवाह द्वारा मैन पत्नी बना लिया ॥ ९७ ॥
ऋषिकन्या के बन्धुओं ने यह जानकर उसे और मुझे दोनों को शाप दिया कि तुम दोनों पापी स्वेच्छाचारी सिंह बनोगे ।। ९९ ।। ऋषियों ने उस कन्या को पुत्र उत्पन्न होने तक शाप की अवधि दी और मुझे तुम्हारे बाण का आघात लगने तक की ॥१००॥
तदनन्तर हम दोनों सिंह की जोड़ी बन गये। कुछ समय बाद वह ( सिहनी ) गर्भवती हुई और इस बालक के उत्पन्न होने पर मर गई । मैंने इस बालक को अन्यान्य सिहनियों के दूध से पाला है। आज तुम्हारे बाण के आघात से मैं भी शाप से छूट गया हूँ ॥ १०१ ॥
इसलिए तुम इस महाबलवान् बालक को लो। यह बात पहले के ही शाप देनेवाले मुनियों ने कही थी" ॥। १०२-१०३।।
ऐसा कहकर उस सात नामक यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर वह राजा उस बालक को लेकर लौट आया ।। १०४ ।। सात नामक यक्ष ने उसे उठा रखा था अतः उस बालक का नाम सातवाहन रखा और समय आने पर उसे राज्य सिंहासन पर बैठा दिया ।। १०५ ॥
कुछ समय के बाद राजा दीपकण के वन में चले जाने पर वह सातवाहन राजा सार्वभौम बन गया ।। १०६ ॥ इस प्रकार कथा कहकर काणभूति के अनुरोध से बुद्धिमान् गुणाढ्य ने प्रसंग से पुनः स्मरण करके कहा ।। १०७ ।।
कुछ समय के अनन्तर, वसन्तोत्सव के समय, राजा सातवाहन उस देवी के बनाये हुए उद्यान में गया ॥ १०८ ॥ नन्दन-वन में महेन्द्र के समान बहुत काल तक उस उद्यान मे अपनी रानियों के साथ विहार करता हुआ राजा सातवाहन बावली के जल में रानियों के साथ जलक्रीड़ा के लिए उतरा ।। १०९ ।।
जल मे वह रानियां को हाथ से फेंके हुए छोटो से सीचने अर्थात भिगोने लगा और रानियाँ भी उसे इस प्रकार सीचने अर्थात भिगोने लगी, जैसे हथिनियाँ हाथी को सीचती अर्थात भिगोती हैं ।। ११० । काजल के घुल जाने पर लाल नेत्रो से और पानी से वस्त्रो के अगों मे चिपक जाने के कारण स्पष्ट दीखते हुए शरीर-भिन्न अवयवों से वे राजा का मन हरण करने लगी ।। १११ ।।
वायु के समान राजा ने उन प्रियतमाओं को वन में लताओं के समान कर दिया ! वन में, वायु, लताओं के पत्र रूपी तिलक को हटा देता है और पुष्परूपी आभरणों से रहित कर देता है। उसी प्रकार राजा ने रानियों के पत्रावली-रूपी तिलक को पानी के छीटो की बौछार से धो डाला और पुष्पों के समान शोभित उनके आभरणों को उतरवा डाला ॥ ११३ ॥
जलक्रीड़ा करते-करते उस राजा की शिरीष पुष्प के समान एक सुकुमार रानी स्तन भार से क्लान्त होकर खेलती-खेलती थक गयी ॥ ११४ ॥ वह रानी पानी के छींटों की बौछार करती हुई राजा से बोली- 'स्वामिन्! मुझे पानी से मत मारो।' ॥ ११५ ॥
यह सुनकर राजा ने जल्द ही बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी ने हँसकर फिर कहा- राजन्, पानी के अन्दर लड्डुओं की कौन तुक है? मैंने तो तुमसे कहा कि जल से मुझे मत सीचो अर्थात भिगोओ॥ ११६ ॥
तुम इतने मूर्ख हो कि 'मा' शब्द और 'उदक' शब्द की सन्धि भी नही जानते और न बातों का प्रसंग ही समझते हो। तुम कैसे मूर्ख हो ?" ॥११७॥
शब्दशास्त्र को जाननेवाली रानी से इस प्रकार फटकारा गया राजा, अन्यान्य रानियों के मन-ही-मन हँसने पर लज्जा से धक् हो गया ॥ ११८ ॥
ऐसी स्थिति में राजा हतप्रभ होकर जलक्रीड़ा को छोड़कर अपमानित और मलिन मुख होकर अपने भवन में चला गया ॥ ११९॥ तब चिन्ताओं से चूर, भोजन आदि को छोड़कर राजा चित्र में लिखा-सा पड़ गया। कुछ भी बोलता नही था ।। १२० ।।
'पांडित्य की शरण में जाऊँ या मृत्यु की ?' ऐसा सोचता हुआ शय्या पर पड़ा हुआ राजा अत्यन्त सन्तप्त होने लगा ॥ १२१ ॥राजा की अकस्मात् ऐसी अवस्था देखकर 'यह क्या हुआ ? ' ऐसा सोचते हुए सभी सेवक जन व्याकुल हो गये ।। १२२ ।।
तब मैंने तथा शवर्मा ने क्रमशः परिस्थिति को जाना। इतने में ही दिन समाप्त हो गया ।। १२३ ।। 'अब रात के समय अस्वस्थ राजा के पास जाना उचित नहीं' — ऐसा विचारकर हम लोगों ने राजहम नामक राजा के निजी सेवक को बुलवाया ॥ १२४॥
उससे राजा की शारीरिक अवस्था पूछने पर उसने कहा कि 'महाराज को इतना अस्वस्थ कभी नही देखा । अन्यान्य रानियों ने कहा कि 'झूठी पडिता बनी हुई विष्णुशक्ति राजा की पुत्री ने महाराज को इतना अस्वस्थ कर दिया है।' ।। १२५-१२६ ।।
राजा के निजी सेवक से यह सुनकर शर्ववर्मा के साथ मैंने यह सोचा ।। १२७॥ यदि शारीरिक व्याधि होती, तो वैद्यों का प्रवेश होता। यदि मानसिक व्याधि है, तो उसका कोई कारण मालूम नहीं होता ।। १२८ ॥
कटकों (विद्रोहियों) के शुद्ध कर देने के कारण उस राजा का शत्रु कोई नहीं है और प्रजा भी राजा के प्रति प्रेम रखती है। अत राजा को कौन-सी मानसिक चिन्ता हो गई ।। १२९ ।।
अतः 'अकस्मात् स्वामी को कौन मा खेद उत्पन्न हुआ ऐसा सोचने पर बुद्धिमान शर्ववर्मा बोला ।। १३०॥ 'मैं जानता हूँ। इस राजा को मूर्खता के कारण पश्चात्ताप हुआ है, उसी के शोक से पीडित है'। मैंने उसके इस आशय को पहले ही जान लिया है। 'मैं मूर्ख हूँ" यह समझकर राजा सदा पांडित्य चाहता है ॥ १३१ ॥
आज उसी मूर्खता के कारण रानी से अपमानित हुआ है, यह मैंने सुना ॥ १३२ ॥
इस प्रकार परस्पर विचार करते हुए उस रात को व्यतीत कर हमलोग प्रातःकाल राजा के निवास स्थान पर गये ।। १३३ ।।
प्रवेश निषेध रहने पर भी मैं अन्दर गया, मेरे जाने पर धीरे-धीरे शर्ववर्मा भी आया ।। १३४ ।।
उसके पास बैठकर मैंने राजा में निवेदन किया कि 'हे महाराज, आप अकारण ही स्वस्थ क्यों है ?' ॥१३५॥ मेरी बात सुनकर भी राजा उसी प्रकार मौन रहा। तब शर्ववर्मा ने यह अद्भुत वाक्य कहा ।। १३६ ।।
'राजन्, आपने मुझसे कभी सुना होगा। मैंने पहले भी आपसे कहा है । अतः आज मैंने स्वप्न- माणवक बनाया ।। १३७॥आज मैने स्वप्न मे देखा कि एक कमल आकाश से गिरा है। उसे किसी दिव्य कुमार ने विकसित किया और उसमें से श्वेतवस्त्रधारिणी एक स्त्री निकली, जो महाराज ! आपके मुंह में चली गई ।। १३८॥
इतना देखकर मैं जग गया। मैं समझता हूँ कि वह स्त्री सरस्वती देवी ही थी, जो आपके मुख में प्रविष्ट हुई। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं ' ॥ १३९ ॥ इस प्रकार शर्ववर्मा के स्वप्न वृत्तान्त बतलाने पर राजा, मौन त्याग कर, स्मित भाव के साथ मुझसे बोला ॥। १४० ॥
'मुझे विद्या के विना यह लक्ष्मी अच्छी नहीं लगती । लकड़ी के गहनों के समान मुर्ख को इस वैभव से क्या लाभ ? || १४१ ॥ यत्नपूर्वक शिक्षा ग्रहण करता हुआ मनुष्य कितने समय में पांडित्य प्राप्त कर सकता है, यह मुझे बताओ' ।। १४२-१४३।।
तब मैंने राजा से कहा - 'राजन्, सब विद्याओं का मुख नवीन व्याकरण बारह वर्षो में आता है ।। १४४॥ लेकिन प्रभो, मैं तुम्हें छह वर्षों में व्याकरण सिखा दूँगा।' यह सुनकर शर्ववर्मा ईर्ष्या के साथ बोला ॥ १४५ ॥
सुख में रहनेवाला राजा जैसा व्यक्ति इतने समय तक पढ़ने का कष्ट कैसे सकता है ? सो महाराज ! मैं तुम्हें छह महीनों में व्याकरण पढ़ा उठा दूँगा ॥१४६॥
इस अनहोनी बात को सुनकर मैंने कोष से शर्ववर्मा से कहा कि 'यदि तुम छह महीने में राजा को व्याकरण पढ़ा दोगे, तो मैं संस्कृत, प्राकृत और देशभाषा इन तीनों को सदा के लिए छोड़ दूंगा, जो मनुष्यों की बोलचाल में आती हैं ।। १४७-१४८ ।।
तब शर्ववर्मा ने कहा कि 'यदि मैं ऐसा न कर सकूंगा, तो तुम्हारी पादुका को बारह वर्षों तक सिर पर उठाऊंगा' ।। १४९ ।। ऐसा कहकर शर्ववर्मा के चले जाने पर मैं भी अपने घर चला गया। राजा ने दोनों ओर से कार्य सिद्धि समझकर धैर्य धारण किया ।। १५० ।।
प्रतिज्ञा से व्याकुल शर्ववर्मा ने अत्यन्त कठिन प्रतिज्ञा कर ली और उसने यह सारी बात अपनी स्त्री से कही ।। १५१ ।। शर्ववर्मा की स्त्री अत्यन्त दुःखित होकर बोली – 'हे स्वामिन्! इस कठिन संकट के समय स्वामिकुमार के बिना दूसरी गति नही दीखती' ॥ १५२ ॥
शर्ववर्मा ने भी ऐसा ही निश्चय किया और रात के चौथे पहर में उठकर बिना भोजन किये ही कुमार कार्त्तिकेय के मन्दिर को चल दिये ।। १५३ ॥
मैंने भी गुप्तचर के द्वारा शर्ववर्मा का जाना जानकर प्रातःकाल राजा से कहा। राजा भी 'जाने क्या होगा' ऐसा सोचने लगा ।। १५४ ।। तब सिहगुप्त नामक राजपुत्र राजा से बोला कि "हे महाराज! आपका अस्वास्थ्य देखकर उस समय मुझे महान् खेद हुआ ।। १५५ ।।
और तब मैं नगर के बाहर चडिका के मन्दिर में अपना सिर काटने के लिए उद्यत हुआ ॥१५६॥ इतने में ही आकाशवाणी ने कहा- 'ऐसा मत करो। राजा की इच्छा अवश्य ही पूरी होगी।' इस प्रकार उसने मुझे रोक दिया। तो मेरी समझ से आपको सिद्धि प्राप्त होगी" ।। १५७॥
ऐसा कहकर और राजा से विचार करके सिहगुप्त ने शर्ववर्मा के पीछे दो गुप्तचर छोड़ दिये ।। १५८।। शर्ववर्मा भी, केवल वायु-भक्षण करता हुआ मौनी और दृढनिश्चयी होकर क्रमश: स्वामिकुमार के स्थान पर पहुँचा ।। १५९ ।।
शरीर की परवाह न करके किये गये कठोर तप से प्रसन्न होकर स्वामिकार्तिक ने शर्ववर्मा पर कृपा की और उसे अभीष्ट वर प्रदान किया ।। १६० ।। तब सिंहगुप्त के भेजे हुए अनुचरों ने राजा के सामने आकर शर्वशर्मा की सफलता बताई ।। १६१।।
शर्ववर्मा की सफलता का समाचार सुनकर मुझे और राजा को क्रमशः खेद और हर्ष उस प्रकार हुआ, जैसे मेघ को देखकर हंस और चातक को होता है ।। १६२ ॥
इसके अनन्तर स्वामिकुमार के वर से सिद्धि प्राप्त करके आये हुए शर्ववर्मा ने स्मरण करते ही उपस्थित हुई सब विद्याएँ राजा को दी ।। १६३ ।।
शर्ववर्मा के पढ़ाने पर राजा को सभी विद्याएं स्वयं उपस्थित हो गई। परमात्मा की कृपा से तत्क्षण क्या नही होता है ।। १६४ ॥
इस प्रकार राजा को सभी विद्याओं की प्राप्ति का समाचार सुनकर सारे राष्ट्र में महान उत्सव मनाया गया। उत्सव के अवसर पर घरों पर फहराती हुई ध्वजाएँ मानों प्रसन्नता से नाच कर रही थी ।। १६५ ॥
तदनन्तर प्रणाम करते हुए राजा ने राजाओं के धारण करने योग्य रत्नों से शर्ववर्मा की गुरु-पूजा की और उसे नर्मदा के सुरम्य तट पर बसे हुए भरुकच्छ (भड़ोंच) देश का राजा बना दिया || १६६॥
तदनन्तर सबसे पहले गुप्तचरों द्वारा वर प्राप्ति का समाचार देनेवाले सिंहगुप्त को, राजा सातवाहन ने राजा बना दिया और विद्या प्राप्ति का मूल कारण विष्णुशक्ति की पुत्री उस रानी को भी सभी रानियों के ऊपर स्वयं पदाभिषिक्त महारानी बनाया ॥ १६७॥
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के कथापी लम्बक का पष्ठ तरंग समाप्त
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