5.202. || दूसरी कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा
5.202. || दूसरी कहानी || राजा सहस्त्रनीक, श्रीवत्त व रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा
द्वितीय तरंग
उस दिन राजा (सहस्रानीक) कुछ दूर रास्ता चलकर किसी जंगली तालाब के किनारे पड़ाव डालकर ठहर गया ॥ १॥ उस शिविर में सन्ध्या के समय सेवा के लिए आये हुए संगतक नामक कथा कहने ( कहानी सुनाने) वाले सेवक' से राजा ने कहा ॥ २ ॥
मृगावती के मुखकमल का दर्शन करने के लिए उत्सुक मेरे मन को बहलानेवाली कोई कथा ( कहानी ) सुनाओ ॥ ३॥ तब मंगलक ने कहा- 'राजन् ! क्यो व्यर्थ संताप करते हो । शाप के नष्ट होते ही तुम्हारा महारानी के साथ समागम सुनिश्चित है ॥४॥
हे स्वामिन्! जीवन में मनुष्य को अनेक संयोग और वियोग हुआ करते है। इस सम्बन्ध में तुमको मैं एक कहानी सुनाता हूँ, सुनो' ॥५॥
श्रीवत्त और मृगांकवती की कथा
मालव देश में यज्ञसेन नाम का एक ब्राह्मण था । उस सज्जन ब्राह्मण के दो लोकप्रिय पुत्र थे ॥ ६ ॥
उनमें एक कालनेमि के नाम से और दूसरा विगतभय नाम से प्रसिद्ध हुआ ||७|| पिता की मृत्यु के पश्चात् वे दोनों भाई बाल्यावस्था के अनन्तर विद्या प्राप्ति के लिए पाटलिपुत्र नगर को गये ॥ ८ ॥ वहाँ पर विद्या प्राप्ति के अनन्तर उनके अध्यापक देवशर्मा ने मूर्तिमती विद्याओं के समान अपनी दो कन्याएँ उन्हें दान दे दी || ९ ||
विवाह के अनन्तर कालनेमि ने अन्यान्य पड़ोसी गृहस्थों को अपने से अधिक घनवान और सुखी देखकर ईर्ष्या के कारण होम के द्वारा नियमपूर्वक लक्ष्मी की आराधना प्रारम्भ की ।। १० ।।
उसकी आराधना से प्रसन्न लक्ष्मी ने स्वयं प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा कि 'तुम पर्याप्त धन और पृथ्वीपति पुत्र प्राप्त करोगे ॥ ११ ॥ किन्तु इतना सब होते हुए भी अन्त में तुम्हारा वध चोरो के समान होगा, क्योकि तुमने अग्नि में जो हवन किया है, वह ईर्ष्या से कलुषितचित्त होकर किया है ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर लक्ष्मी अन्तर्धान हो गई और कालनेमि भी धीरे-धीरे महाधनी हो गया। कुछ दिनों बाद उसके एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ ।। १३ ।। श्री (लक्ष्मी) के वरदान से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है, इसलिए उसका नाम श्रीदत्त रखा और पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ।। १४ ।
श्रीदत्त, ब्राह्मण होने पर भी, क्रमशः युवा होने पर, अस्त्र-शस्त्र विद्याओं मे एवं मल्लयुद्ध मे अद्वितीय हो गया ।। १५ ।। कालनेमि का दूसरा भाई विगतभय पत्नी को सर्प के काट लेने के कारण उसकी सद्गति के निमित्त तीर्थयात्रा के लिए दूसरे देश को चला गया ।। १६॥
श्रीदत्त को धीर और वीर जानकर गुणग्राही राजा वल्लभशक्ति ने, अपने पुत्र विक्रमशक्ति का मित्र बना दिया ॥ १७ ॥ अत्यन्त अभिमानी राजपुत्र विक्रमशक्ति के साथ श्रीदत्त की मित्रता इस प्रकार हुई; जैसे दुर्योधन के साथ भीमसेन की थी ॥ १८॥
तदनन्तर अवन्ति देश में उत्पन्न हुए बाहुशाली और वज्रमुष्टि नामक दो क्षत्रिय श्रीदत्त के मित्र बन गये ॥ १९॥ मल्लयुद्ध में जीते हुए अन्यान्य गुणग्राही दक्षिण देशवासी तथा मंत्रियो के पुत्र श्रीदत्त के स्वयं मित्र बन गये ॥ २० ॥ महाबल, व्याघ्रभट, उपेन्द्रबल एवं निष्ठुरक आदि नाम के अनेक व्यक्ति श्रीदत्त के गुणों से आकृष्ट होकर उसके मित्र बन गये ॥ २१ ॥
एक बार वर्षा के दिनों में विहार करने के लिए राजपुत्र तथा ऊपर कहे गये मित्रो के साथ श्रीदत्त गंगा के तट पर गये ॥२२॥ वहाँ जाकर विनोद-क्रीड़ा में राजकुमार विक्रमशक्ति के भृत्यों ने राजकुमार को राजा बनाया, उसी समय श्रीदत्त के मित्रों ने भी उसे राजा बना दिया ॥ २३ ॥
इसी बीच मदोन्मत्त राजकुमार ने उस ब्राह्मण-वीर को युद्ध के लिए ललकारा ।। २४ ।। श्रीदत्त ने राजकुमार को मल्लयुद्ध में जीत लिया। अत, क्रोध से भरे हुए राजकुमार ने उसे मार डालना चाहा ।। २५ ।।
राजकुमार के अभिप्राय को जानकर श्रीदत्त अपने उन मित्रो के साथ उसका साथ छोड़कर दूर हट गया ॥२६॥ हटते हुए श्रीदत्त ने गंगा के बीच जलप्रवाह से बहाई जाती हुई स्त्री को इस प्रकार देखा; जैसे सागर लक्ष्मी को लिये जा रहा हो ।। २७।।
श्रीदत्त, उसे देखकर बाहुशाली आदि अपने छह मित्रो को तटपर नियुक्त करके उस स्त्री को जल से निकालने के लिए गंगा में उतर पड़ा ।। २८ ।। डूबती हुई स्त्री के केशों को पकड़कर भी श्रीदत्त ने उसे अधिक जल-तल मे डूबी हुई देखकर स्वयं भी उसका अनुसरण किया, अर्थात् उसके साथ ही डूब गया ॥ २९ ॥
डूबने पर श्रीदत्त ने क्षणभर में ही एक दिव्य शिव मन्दिर देखा, वहाँ न जल था और न वह स्त्री ही थी ॥ ३० ॥ इस महान् आश्चयं को देखकर थके हुए श्रीदत्त ने शिवजी को प्रणाम करके उस सुन्दर उद्यान मे वह रात्रि व्यतीत की ॥ ३१ ॥
प्रात उठकर श्रीदत्त ने देखा कि स्त्रीगुणों से युक्त साक्षात् लक्ष्मी के समान वह सुन्दरी शिवजी की प्रातःकालीन पूजा के लिए आई ॥ ३२ ॥ वह चन्द्रमुखी शिवजी की पूजा करके अपने घर चली गई। साथ ही, श्रीदत्त भी उसके पीछे-पीछे गया ॥३३॥
उसने देव-भवन के समान उसके उस गृह को देखा। वह अपमानिता-सी मानवती सुन्दरी व्याकुल भाव से उस भवन में प्रविष्ट हुई ॥ ३४ ॥ वह स्त्री, श्रीदत्त से बिना कुछ कहे ही उस भवन के भीतरी कमरे में जाकर अनेक स्त्रियों से घिरी हुई पलंग पर बैठ गई ।। ३५ ।।
साथ आया हुआ श्रीदत्त भी उसी पलंग पर उसके साथ ही बैठ गया। इसके उपरान्त उस सती स्त्री ने सहसा रोना प्रारम्भ किया ।। ३६ ।। उसके उष्ण अश्रुबिन्दु स्तनों पर गिरने लगे, इस प्रकार उसका रुदन देखकर श्रीदत्त के हृदय में दया आ गई ।। ३७ ।।
श्रीदत्त ने उससे पूछा- तुम कौन हो ? तुम्हें क्या दुःख है? बताओ सुन्दरि ! मै तुम्हारे दुःख को दूर करने में समर्थ हूँ' ॥ ३८ ॥ तब उसने अत्यन्त कठिनता से कहा- हम दैत्यराज बलि की एक सहस्र पोत्रियों है, जिनमें सबसे बड़ी विद्युत्प्रभा मैं हूँ ।। ३९ ।।
विष्णु ने मेरे पितामह (दादा) बलि को लम्बे बन्धन में डाल दिया है और हमारे पिता को मल्लयुद्ध में मार डाला ||४०|| मेरे पिता को मारकर उस विष्णु ने हमे अपने नगर से निर्वासित कर दिया। साथ ही, नगर में जाने की रोक के लिए बीच में एक सिंह को खड़ा कर दिया है ॥ ४१ ॥
उस सिंह ने यह स्थान और हमारा हृदय दोनों आक्रान्त कर दिया। वह सिंह एक यक्ष है, जो कुबेर के शाप से सिंह बन गया है ।। ४२ ।। जब पुर प्रवेश के लिए हम लोगो ने विष्णु से प्रार्थना की, तब उन्होने इस यक्ष का शाप नष्ट होने की बात कही थी। (मनुष्य द्वारा इस सिह की हत्या होगी, तब इसका शाप नष्ट होगा ) ||४३||
इसलिए तुम हमारे शत्रु उस सिह को जीतो या मार डालो। हे वीर ! मैं तुम्हे इसीलिए यहां लाई हूँ ।। ४४ ।। उस सिह को मार डालने पर उससे मृगाक नामक खड्ग भी तुम्हे प्राप्त होगा, जिसके प्रभाव से तुम पृथ्वी को जीतकर राजा बनोगे ।। ४५ ।।
ऐसा सुनकर और ठीक है यह कहकर श्रीदत्त ने, वह दिन, वहीं व्यतीत किया और अगले दिन उन दैत्य-कन्याओं को आगे करके उस नगर को गया ।। ४६ ।। वहाँ पर उसने मल्लयुद्ध से उस सिह को जीत लिया। वह सिंह भी शापमुक्त होकर पुरुष के आकार में बदल गया ||४७||
शाप से छुड़ानेवाले श्रीदत्त पर प्रसन्न होकर उस पुरुष ने उसे एक तलवार दी और दैत्यकन्याओं के दुःख के साथ ही अदृश्य हो गया ।। ४८ ।। तदनन्तर श्रीदत्त छोटी बहनों के साथ उस दैत्य कन्या को लिये हुए उस नगर में गया ॥ ४९ ॥
दैत्य - कन्या ने श्रीदत्त को विषनाश करनेवाली एक अंगूठी दी। वहाँ रहते हुए युवा श्रीदत्त का हृदय उस दैत्य कन्या की ओर आकृष्ट हुआ ॥५०॥
उन्होंने तर्क करके उससे कहा कि तुम यहीं के जल में स्नान कर लो। यह तलवार लो और इसमें गोता लगाओ जिससे मगरमच्छों का भय नष्ट हो जाएगा || 51 || इतना कहकर संसारी दत्त जल में डूबा हुआ, जाहन्वी के तट से आया। वह उसी स्थान पर निकला जहां से वह जल में पहले उतरा था। ।।52 ।।
तब वह तलवार का घेरा देखता हुआ अधोलोक से उठा राक्षसों की पुत्री से धोखा मिलने पर वह निराश और आश्चर्यचकित था ।।53।। तब वह अपने मित्रोंको ढूंढ़ने को उनके घर गया। रास्ते में उनकी मुलाकात निश्ठुरक नामक मित्र से हुई ।। 54 ।।
उस ने उसके पास आकर उसे दण्डवत् किया, और तुरन्त उसे एकान्त स्थान में ले गया। अपने रिश्तेदारों के पूछने पर निश्ठुरक ने इस प्रकार उत्तर दिया ।। 55।। जब वह गंगा में डूब गया, और बहुत दिन तक नहीं मिला हम तुझे ढूंढ़ते रहे। हम दुःख में अपना सिर कटाने को तैयार थे ।।56 ।।
हे मेरे पुत्रों, तुम्हारा मित्र साहस का काम करने को गया है। तुम को जीवित मिल जाएगा। आसमान से आई एक आवाज़ ने हमें प्रयास करने से रोक दिया। ।।57 ।। और फिर हम तेरे पिता के पास लौट आए। रास्ते में एक आदमी तेजी से उसके पास आया और बोला ।।58 ।।
तुम्हें इस समय यहां नगर में प्रवेश न करना चाहिए अपनी प्रियतमा की शक्ति के कारण यहाँ का राजा संकट में है ।।59।। उसके मन्त्रियों ने उसे पराक्रम की शक्ति दी और वह राजा बन गया । राज्य प्राप्त करने के बाद वह अगले दिन कालानेमी अपने घर चला गया । ।।60।। श्रीदत्त ने क्रोध से भरकर पूछा, “तुम्हारा वह पुत्र कहाँ है?” उसने उससे पूछा तो उसने जवाब दिया कि वह उसे नहीं जानता । ।।61।।
इस से वह छिप गया, और यह कहकर, कि वह मेरा पुत्र है, मार डाला। राजा ने क्रोधपूर्वक कालनेमि पर भाला चोर होने का आरोप लगाया। ।।62।। यह देखकर उसकी पत्नी का हृदय टूट गया । पाप में पाप का हस्तक्षेप उन लोगों के लिए क्रूर है जो क्रूर कर्म करते हैं । ।।63।। और वह अपने पराक्रम के बल से उसे भी मार डालने का यत्न करेगा। श्रीदत्त और उनकी छोटी बहनें यहीं से उस स्थान पर जाते हैं। ।। 64।।
उसके ऐसा कहने पर वे मनुष्य दुःखी होकर अपने देश को लौट गए बाहुशल्य के नेतृत्व में पाँचों व्यक्ति सलाह लेने के बाद उज्जैन गए, ।।65।। और मुझे आपके लिए, मेरे मित्र, छद्मवेश में यहाँ रखा गया है। तो चलिए इस बीच हम वहीं अपने दोस्त के पास चलते हैं। ।।66 ।।
निष्ठुरक की बातें सुनकर श्रीदत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों बदला लेने की भावना से अपनी आँखों को खड्ग पर डाला ॥ ६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ श्रीदत्त, निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ।। ६८ ।। गंगा मे गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृतांत मित्र निष्ठुरक को मार्ग मे सुनाते हुए श्रीदत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥ ६९ ॥
'मै असहाय अबला हूँ, मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ- -उस अबला के ऐसा कहने पर श्रीदत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ।। ७० ।। दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर श्रीदत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, अतएव शून्य नगर में ठहर गया ॥ ७१ ॥
इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए श्रीदत्त ने उस स्त्री को देखा जो निश्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी॥७२॥
यह देखते ही श्रीदत्त मृगांक नामक खड्ग को खीचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ।।७३॥
श्रीदत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी- ॥७४॥
"महाभाग ! मुझे मत मारो में राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे, उस समय कुवेर ने मुझे उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था। क्योकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥ ७६ ॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥
मेरे राक्षसी रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन् ! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ।। ७९ ।
मैंने ही बहुत समय से इस नगर को ग्रस रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया, अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो" ॥८०॥
उसकी इस प्रकार बातें सुनकर श्रीदत्त ने आदर के साथ कहा- 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगें ? यह मेरा मित्र जी जाय, यही वर दो' ॥ ८१ ॥
ऐसा ही हो' इस प्रकार वर देकर वह अन्तर्धान हो गई। और वह निष्ठुरक सम्पूर्ण अगों से अक्षत रहकर जीवित हो उठा ॥ ८२ ॥
प्रातःकाल चकित और प्रसन्न श्रीदत्त उठा और निष्ठुरक के साथ क्रमशः उज्जैन पहुँचा ॥ ८३ ॥ उज्जैन जाकर उत्सुकतापूर्वक राह देखते मित्रों को उसने ऐसा आनन्दित किया; जैसे मेघ मयूरो को आनन्दित करता है ॥ ८४ ॥
अपने आश्चर्यपूर्ण समस्त वृत्तान्त को कहने के पश्चात् बाहुशाली, विधिपूर्वक आतिथ्य सत्कार करके श्रीदत्त को अपने घर ले गया ।। ८५ ।। वहाँ पर बाहुशाली के माता-पिता द्वारा अपने बालक के समान उनका प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीदत्त, अपने घर के समान ही रहने लगा ॥ ८६ ॥
किसी समय वसन्तोत्सव के अवसर पर श्रीदत्त, अपने मित्रो के साथ किसी उद्यान में मेला देखने गया || ८७॥ वहां मेले में उसने राजा श्रीबिम्बकि की कन्या को मूर्ति धारण करके आई हुई साक्षात् वसन्त लक्ष्मी (शोभा) के समान देखा ॥ ८८॥
तदनन्तर वह मृगाकवती नाम की राजकुमारी, विकसित नेत्रो के मार्ग से श्रीदत्त के हृदय में प्रवेश कर गई ।।८९ ॥ राजकुमारी की प्रेममयी सरस दृष्टि भी दूती के समान श्रीदत्त के साथ यातायात करने लगी ॥ ९० ॥
घूमती-फिरती राजकुमारी के वृक्षों के झुरमुट में छिप जाने के कारण श्रीदत्त को दिग्भ्रम होने लगा। उसे कुछ सूझता न था ।। ९९ ।।
'मित्र ! मैंने तुम्हारा हृदय जान लिया, छिपाओ नहीं, आओ, इधर ही चले, जिघर राजकुमारी गई है ।। ९२ ॥ ऐसा कहकर श्रीदत्त को उसका मित्र बाहुशाली राजकुमारी के समीप ले गया ।।९३।।
इतने ही में वहाँ 'अरे रे राजकुमारी को साँप ने काट लिया - इस प्रकार कोलाहल सुनाई दिया, जिसे सुनकर श्रीदत्त के हृदय में ज्वर-सा हो गया ।। ९४ ।।
इतने में बाहुशाली ने, राजकुमारी के कंचुकी से कहा कि मेरे इस मित्र के पास विष दूर करनेवाली एक अंगूठी है और यही विष उतारने का मंत्र भी जानता है ।। ९५ ।।
उसी समय वह कंचुकी श्रीदत्त के चरणों में झुककर प्रणाम करके श्रीदत्त को राजकुमारी के समीप ले गया ॥ ९६ ॥ श्रीदत्त ने जाकर राजकुमारी की अंगुली में अंगूठी पहना दी और मंत्र भी पढ़ा। इससे वह पुनर्जीवित हो उठी ॥९७॥
राजकुमारी के स्वस्थ होते ही वहाँ एकत्र सभी व्यक्ति श्रीदत्त की प्रशंसा करने लगे। यह समाचार सुनकर राजा बिम्बकि भी वहाँ आ पहुँचा ।। ९८ ।। राजा के आने पर श्रीदत्त अपनी अगूठी बिना लिये ही अपने मित्र बाहुशाली के साथ उसके घर लौट आया ।। ९९ ।। राजा बिम्बकि ने, प्रसन्न होकर श्रीदत्त के लिए जो सोना आदि उपहार के रूप में भेजे थे, उन्हें श्रीदत्त ने बाहुशाली के पिता को दे दिया ॥ १००॥
तदनन्तर श्रीदत्त, उस राजकुमारी के विरह में इतना व्याकुल रहने लगा कि उसके मित्र भी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ से हो गये ॥ १०१ ॥
कुछ समय के पश्चात् राजकुमारी की प्रिय सहेली भावनिका अगूठी लौटाने के बहाने श्रीदत्त के समीप आई ।। १०२ ।।
और बोली- 'हे सौभाग्यशालिन् ! मेरी सहेली को प्राणदान करनेवाले तुम उसके स्वामी बनो; अन्यथा उसकी मृत्यु हो जायगी। इसमें सन्देह नहीं ।। १०३ ।।
भावनिका के इस प्रकार कहने पर श्रीदत्त, भावनिका, बाहुशाली तथा अन्य मित्र मिलकर गुप्त मंत्रणा करने लगे ।। १०४ ।। हम लोग किसी भी उपाय से राजकुमारी का हरण कर ले और रहने के लिए गुप्त रूप से यहाँ से मथुरा चलें ।। १०५ ॥
कार्य सिद्धि के लिए इन लोगों की सम्मति मे परस्पर ऐसा निश्चय करके भावनिका अपने घर लौट गई ॥ १०६ ॥ दूसरे दिन अपने तीन मित्रो के साथ बाहुशाली व्यापार के बहाने मथुरा चला गया ।। १०७ ।।
उसने मथुरा जाते हुए मार्ग में स्थान-स्थान पर सवारी का प्रबन्ध करके राजकुमारी के जाने के लिए चारों ओर से गुप्त प्रबन्ध किया ॥ १०८ ॥ श्रीदत्त ने भी कन्या के साथ किसी पगली स्त्री को सायंकाल राजकुमारी के निवास स्थान में ठहरा दिया ।। १०९ ।।
उधर भावनिका ने दीपक जलाने के बहाने से उस घर में आग लगा दी और गुप्त रूप से राजकुमारी को लेकर बाहर आ गई ॥ ११०॥
बाहर प्रतीक्षा करते हुए श्रीदत्त ने उसी समय अपने दो मित्रों के साथ राजकुमारी को आगे गये हुए बाहुशाली के समीप भेज दिया ।। १११।। और उसके पीछे (या साथ) भावनिका भी गई। इधर कुमारी के भवन में आग लगने से श्रीदत्त की भेजी हुई वह पागल स्त्री कन्या के साथ जल गई ।। ११२ ।।
वहाँ के लोगों ने भावनिका के साथ राजकुमारी को जला हुआ समझ लिया और प्रातःकाल श्रीदत्त को वहाँ उपस्थित देखा ।। ११३ ॥ दूसरी रात को श्रीदत्त, मृगांक नामक खड्ग को हाथ में लेकर पहले से भागी हुई प्रिया (राजकुमारी) से मिलने के लिए चल पड़ा ।। ११४ ।।
उत्सुक श्रीदन, रात मे ही लम्बा रास्ता तं करके प्रातःकाल, एक प्रहर व्यतीत होने पर, विन्ध्याचल के घोर जंगल में जा पहुंचा ।। ११५ ।। श्रीदत्त ने प्रस्थान करते हुए पहले अशुभसूचक शकुन देखे और पीछे भावनिका के साथ आक्रमण से आहत अपने मित्रों को देखा ॥ ११६ ॥
वे लोग घबराकर आए हुए श्रीदत्त से बोले-'हम लोग बहुत बड़ी घुड़सवार सेना द्वारा लूट लिये गये है ॥११७॥ हम लोगों के घायल होने पर एक घुडसवार सैनिक राजकुमारी को घोड़े पर बैठा कर ले भागा ।। ११८॥
जबतक वे लोग दूर नही चले जाते, तबतक इसी मार्ग से उस ओर जाओ । हम लोगो के पास न रहो। उस ( राजकुमारी) की रक्षा प्रधान कर्त्तव्य है। इस प्रकार उन मित्रो का भेजा हुआ श्रीदत्त, लौटकर वेग से घोडा दौड़ाता हुआ गया। कुछ ही दूर आगे उसने घुड़सवार सेना को देखा और उसके बीच एक युवा क्षत्रिय को भी उसने देखा ।।१२०-१२१॥
उस युवा द्वारा घोड़े पर चढ़ाकर पकड़ी हुई राजकुमारी को भी उसने देखा और क्रमशः उन दोनों के समीप आ गया ।। १२२ ।। शान्तिपूर्वक राजकुमारी को न छोड़ते हुए उस युवक को श्रीदत्त ने पैरो से खींचकर पत्थर पर दे मारा और घोड़े से गिराकर चुर-चूर कर दिया ।। १२३ ।।
उसने उसे मारकर और उसी के पोडे पर सवार होकर अन्यान्य क्रुद्ध एवं भागते हुए उसके सिपाहियों को भी मारा। बचे हुए सिपाही, श्रीदत्त के अनुपम पराक्रम को देखकर डर से इधर-उधर भाग गये ।। १२४-१२५ ।।
अश्वारूढ़ श्रीदत्त भी राजकुमारी मृगाकवती को साथ लेकर अपने मित्रों की ओर लौटा ।। १२६ ।। कुछ दूर जाने पर लड़ाई में घायल हुआ उसका घोड़ा गिर गया। श्रीदत्त जब अपनी पत्नी को लेकर उससे उतरा, तब वह घोड़ा मर गया ।। १२७ ।।
वहाँ उतरने पर उसकी प्यारी मृगांकवती भय और थकावट के कारण प्यास से व्याकुल हो गई ।। १२८ ॥
श्रीदत्त, मृगांकवती को वहीं ठहराकर इधर-उधर पानी ढूंढ़ने लगा। पानी ढूंढते ढूँढ़ते सन्ध्या हो गई, सूर्य अस्त हो गया ॥ १२९ ॥ जल मिल जाने पर भी राह भूल जाने के कारण, श्रीदत्त ने चकवे के समान चिल्लाते- चिल्लाते रात व्यतीत की ।। १३० ।।
प्रात काल मरे हुए घोडेवाले उस स्थान को तो उसने पाया, किन्तु उस प्यारी राजकुमारी को कही न देखा ।। १३१ ॥ तब श्रीदत्त, व्याकुलता के कारण मृगांक खड्ग को वृक्ष की जड़ मे रखकर उसे देखने के लिए पेड़ पर चढ गया ।। १३२ ।।
उसी समय उस मार्ग से कोई जंगली भिल्लराज उधर आ निकला। उसने आते ही पहले पेड़ की जड़ में रखी हुई तलवार उठा ली ।। १३३ ।। उसे देखकर श्रीदत्त पेड़ से नीचे उतरा और उसने उतरते ही भिल्लराज से दीनतापूर्वक राजकुमारी का समाचार पूछा। 134 ।।
'यहाँ से तुम मेरे गाँव पर जाओ, सम्भवत वह वही गई होगी, मैं वही जा रहा हूँ और तुम्हारी तलवार भी साथ ला रहा हूँ || १३५ ॥
ऐसा कहकर भिल्लराज द्वारा अपने गाँव को भेजा हुआ श्रीदत्त, उसके आदमियो के साथ उसके गांव आ गया ।। १३६ ।।
वहाँ जाकर उसने आदमियों के 'थकावट मिटा लो— कहने पर श्रीदत्त वहाँ सो गया ॥ १३७॥ जागने पर उसने अपने पैरों को बेडियों से बँधा पाया। मानो वे पैर मृगावती का पता न लगा सकने के कारण दंडित किये गये हो ॥ १३८ ॥
क्षण भर में सुख देनेवाली और क्षण भर में दारुण दुख देनेवाली प्यारी मृगांकवती को देवगति के समान सोचता हुआ श्रीदत्त बंधे पैरों से पड़ा रहा ।। १३९ ।।
इस प्रकार सोच में पड़े हुए श्रीदत्त के समीप आकर मोनिका नामक एक दासी ने कहा - 'हे महाभाग ! मृत्यु के लिए तुम यहाँ कहाँ आ गये हो ?" ।। १४० ।। वह भिल्लराज, अपनी किसी कार्य सिद्धि के लिए कहीं गया है, आकर चंडिका देवी के आगे तुम्हारा बलिदान करेगा ।। १४१ ॥
इसीलिए तुम्हें विन्ध्य के जंगल से युक्तिपूर्वक यहाँ भेजकर कैद कर दिया गया है ।। १४२ ।। चूंकि तुम्हे देवी के सम्मुख बलिदान के लिए निश्चित किया गया है, इसीलिए अच्छे भोजन और वस्त्रों से तुम्हारा सत्कार किया जा रहा है ।। १४३ ।।
यदि तुम मानो, तो तुम्हारी मुक्ति का एक उपाय है। वह यह कि इस भिल्लराज की सुन्दरी नाम की एक कन्या है ।। १४४ ॥
वह तुम्हे देख अत्यन्त कामातुर हो रही है। मेरी उस सहेली को यदि तुम पत्नी बना लो, तो तुम्हारा कल्याण होगा ।। १४५ ।।
श्रीदत्त ने भी उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर गान्धर्व विधि से उस भिल्लराज की कन्या के साथ गुप्त विवाह कर उसे पत्नी बना लिया ।। १४६ ।।
वह सुन्दरी, प्रतिदिन रात में श्रीदत्त के बन्धन खोल देती थी, इस प्रकार कुछ दिनो मे वह गर्भवती हो गई ।। १४७ ।।
कुछ समय के अनन्तर सुन्दरी की माता ने मोचनिका से सब समाचार जान लिया और वह दामाद के स्नेह से बोली--बेटा ! श्रीचण्डनामक सुन्दरी का पिता अति क्रोधी है, वह तुम्हे छोड़ेगा नहीं, अब तुम जाओ, किन्तु सुन्दरी को मत भूलना ।। १४८ - १४९ ।।
ऐसा कहकर सास के द्वारा कैद से छुड़ाया गया श्रीदत्त, भिल्लराज के हाथ लगे अपने खड्ग के लिए सुन्दरी को समझाकर, चिन्ता से आक्रान्त हृदय होकर, मृगाकवती का पता लगाने के लिए फिर उसी विन्ध्यारण्य में गया ।। १५० - १५१ ।।
चलने के समय शुभ शकुनों को देखकर वह फिर उसी स्थान पर आ गया, जहाँ घोड़ा मरा था और जहाँ से मृगांकवती खो गई थी ।। १५२ ॥
वहाँ पर एक व्याघ ( बहेलिये) को सामने आते हुए देखकर श्रीदत्त ने उससे मृगनयनी का समाचार पूछा ।। १५३ ।। 'क्या तुम्ही श्रीदत्त हो ?" बहेलिये के इस प्रकार पूछने पर श्रीदत्त ने लम्बी साँस लेते हुए कहा 'हाँ, मैं ही वह अभागा हूँ" ।। १५४ ॥
तब बहेलिये ने कहा, 'मित्र, बताता हूँ, सुनो। तुम्हारा नाम लेकर विलाप करती हुई तुम्हारी भार्या को इधर-उधर भटकते हुए देखा, तो मैंने उससे सारा समाचार जानकर और धीरज बँधाकर (समझा-बुझाकर ) दयावश उसे मैं अपने गाँव ले गया ।। १५५-१५६॥
वहाँ गाँव मे जवान भीलों को देखकर उनके भय से में उसे मथुरा के समीप नागस्थल नामक स्थान को ले गया ॥ १५७ ॥
वहाँ (नागस्थल में ) मैंने उसे विश्वदत्त नामक वृद्ध ब्राह्मण के घर में गौरव के साथ धरोहर के रूप में रख दिया है। उसी से तुम्हारा नाम जानकर मैं तुम्हें ढूंढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ' ।। १५८- १५९ ॥
बहेलिये से इस प्रकार कहा गया श्रीदत्त, शीघ्र ही वहाँ से चल पड़ा और दूसरे दिन सायंकाल नागस्थल पहुँच गया ।। १६०॥ वहां विश्वदत्त के घर जाकर और उससे मिलकर श्रीदत्त ने कहा कि 'बहेलिये द्वारा रखी गई मेरी भार्या मुझे दे दो ।। १६१ ।।
यह सुनकर विश्वदत्त ने श्रीदत्त से कहा- 'मथुरा में मेरा एक मित्र गुणग्राही ब्राह्मण है। वह उपाध्याय है और राजा शूरसेन का मन्त्री भी है। मैंने उसी के पास तुम्हारी पत्नी को रख दिया है ।। १६२-१६३।।
यह ग्राम निर्जन है, अतः यहाँ उसकी रक्षा सम्भव न थी। अब तुम प्रातःकाल वहाँ जाओ। आज यही विश्राम करो ।। १६४ ।। विश्वदत्त से इस प्रकार कथित श्रीदत्त, उस रात को वही बिताकर दूसरे दिन प्रातःकाल मथुरा पहुँचा ।। १६५ ॥
लम्बे रास्ते के कारण मैला-कुचला तथा थका हुआ श्रीदत्त नगर के बाहर ही ठहर गया और निर्मल बावली के जल में स्नान करने लगा ।। १६६ ॥ स्नान करते हुए उसे चोरों द्वारा बावली मे छिपाये हुए कुछ वस्त्र मिले, जिनकी गांठ मे एक बहुमूल्य हार बँधा हुआ था। उसे श्रीदत्त ने नहीं देखा ।। १६७ ।।
उन कपड़ों को लेकर मृगावती से मिलने की इच्छा से श्रीदत्त ने मथुरा में प्रवेश किया ।। १६८ ।। नगर में जाने पर सिपाहियों ने उन कपड़ों और उनकी गाँठ में बँधे हुए चोरी के हार को पाकर श्रीदत्त को पकड़ लिया और उसे सामान के सहित नगराधिपति के सामने उपस्थित किया ।। १६९ ।।
उसने (नगराधिपति ने) राजा मे निवेदन किया; और राजा ने उसे ( श्रीदत्त को ) फाँसी के लिए सिपाहियो को आदेश दे दिया ।। १७० ।। पीछे-पीछे बज रही डुगडुगी के साथ फाँसी के स्थान पर ले जाये जाते हुए श्रीदत्त को देखकर मृगांकवती ने राज्य के उस दूसरे मुख्यमंत्री से, जिसके घर में वह ठहरी थी, जाकर कहा कि 'मेरा पति फांसी पर लटकाने के लिए ले जाया जा रहा है' ।। १७१-१७२।।
उस मुख्यमंत्री ने अपनी आज्ञा से वधिकों को रोककर और राजा को सूचित करके उस श्रीदत्त को दंड से छुड़वाकर अपने घर बुला लिया ॥ १७३ ॥ ये मेरे चाचा विगतभय, किसी समय घर से विदेश चले गये थे वे ही आज दैवयोग से मथुरा- नरेश के मन्त्री हो गये हैं, ऐसा समझकर और उनसे पूछकर श्रीदत्त उनके चरणों पर गिर पड़ा ।। १७४ ।।
वह मन्त्री भी, अपने भतीजे को पहचानकर आश्चर्यचकित रह गया और उसे गले से लगा लिया। इसके पश्चात् उसने सारा समाचार पूछा ।। १७५ ।। चाचा के पूछने पर श्रीदत्त ने पिता के वध से उस समय तक का सारा वृत्तान्त अपने चाचा को सुना दिया ।। १७६ ।।
चाचा ने अपने भाई की मृत्यु के समाचार पर आंसू बहाकर एकान्त में श्रीदत्त से कहा- 'बेटा। अधीर न हो। मुझे धनदा यक्षिणी सिद्ध है। उसने मुझे पाँच सहस्र घोड़े और सात करोड सोने की मुहरे दी है। मै पुत्रहीन हूँ, अतः यह सब धन तुम्हारा ही है ।।१७७-१७९ ॥
ऐसा कहकर चाचा ने भतीजे श्रीदत्त को वह सारा धन दे दिया। श्रीदत्त ने भी धन पाकर वही मृगावती के साथ विवाह कर लिया ।। १८० ।। श्रीदत्त उस मृगाकवती पत्नी के साथ वही ठहर गया और रात्रि से कुमुदाकर के समान आनन्दित तथा प्रफुल्लित होने लगा ।। १८१ ॥
पूर्ण सम्पनशाली श्रीदत्त के हृदय को बाहुशाली आदि मित्रों की चिन्ता, चन्द्रमा में कलंकरेखा के समान मलिन करती थी ।। १८२ ।। एक बार चाचा ने एकान्त में श्रीदत्त से कहा- 'बेटा! राजा शूरसेन की एक कन्या है । वह राजा की आज्ञा से मेरे द्वारा दान करने के लिए अवन्तिदेश (उज्जयिनी ) मे ले जायी जायगी। तो में उसी बहाने से उसका हरण करके तुम्हे दे दूंगा' ।। १८३-१८४ ।।
ऐसा निश्चय करके चाचा विगतभय और भतीजे श्रीदत्त ने सेना और दहेज का सामान साथ लेकर उज्जयिनी को प्रस्थान किया ।। १८५ ।। चाचा ने श्रीदत्त से कहा- इस प्रकार उस राजा की सेना और मेरी सेना के प्राप्त होने पर तुम राज्य को प्राप्त करोगे; जैसा कि लक्ष्मी ने तुम्हारे लिए आदेश दिया है' ।। १८६ ॥
जब ये दोनों विन्ध्य पर्वत के जंगलों में पहुंचे, तब वहां लुटेरों की एक बड़ी सेना ने बाणवर्षा करके उन्हें मार्ग मे ही सहसा रोक दिया ।।१८७।।
चोरगण, आघात से बेहोश और भागे हुए सैनिकोंवाले अकेले श्रीदत्त को हाथ-पाँव बाँध- कर सारे धन के साथ अपने गाँव ले गये ।। १८८ ।। उस गाँव में ले जाकर उसे खंडी के एक भीषण मन्दिर में पहुँचा दिया गया, जहां घंटे अपने शब्दों से मानो उसकी मृत्यु का आह्वान कर रहे थे ।। १८९ ।।
वहाँ पर भिल्लराज की पुत्री सुन्दरी भी छोटे बच्चों को गोद में लेकर उस बलिदान का दृश्य देखने आई थी। जो पिता की मृत्यु के बाद वहाँ का शासन करती थी ॥ १९०॥ आनन्द-भरी सुन्दरी ने उन डाकुओं को वलिदान करने से रोक दिया और श्रीदत्त भी आनन्दपूर्वक उस सुन्दरी के घर चला गया । १९१ ॥ वहाँ जाकर उसने उस भिल्लपल्ली का राज्य प्राप्त किया; जिसे सुन्दरी के पिता ने अपनी मृत्यु के समय अन्य संतान न होने के कारण एकमात्र उत्तराधिकारिणी अपनी कन्या सुन्दरी को दिया था ।। १९२ ।।
चोरो से आकान्त चाचा और सेना-सामग्री से युक्त सपत्नीक श्रीदत्त ने वहाँ पर अपने मृगाक नामक खड्ग को भी प्राप्त कर लिया ।।१९३।। श्रीदत्त वही (भिल्लपल्ली मे ) शूरसेन की उस कन्या से विवाह करके उस नगर में महान् राजा बन गया ।। १९४ ।।
श्रीदत्त ने राजा बिम्बकि और राजा शुरसेन दोनों ने अपने श्वसुरों के पास दूत भेज दिये। फलत अपनी-अपनी कन्याओं के स्नेह के कारण वे दोनों राजा अपनी-अपनी सेना-सामग्री के साथ विवाह संबंध के लिए वहां आये ।। १९५-१९६॥
उधर युद्ध के कारण बिछुड़े हुए बाहुशाली आदि उसके मित्र भी घावों के भर जाने पर स्वस्थ होकर उसके समीप आ गये थे ॥ १९७॥ तदनन्तर श्वसुरों और उनकी सेनाओं के सहित श्रीदत्त ने अपने पिता के हत्यारे एवं विरोधी पाटलिपुत्र के राजा विक्रमशक्ति को अपनी कोपाग्नि की आहुति बना डाला ।अर्थात उसे मारकर अपना बदला चुका लिया ॥। १९८ ।।
इसके बाद श्रीदत्त ने मृगावती, असामुद्र सहित पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर लिया, सम्राट बन गये और सुख भोगने लगे।। १९९।।
राजा सहस्रानीक को कहानी सुनानेवाले संगतक ने इस कथा को सुनाकर कहा- 'राजन् ! धैर्यशाली व्यक्ति, इस प्रकार वियोगजन्य कष्ट के समुद्र को पार करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करते हैं ॥ २००॥
प्रिया समागम के लिए उत्सुक राजा सहस्रानीक ने उस रात को अत्यन्त उत्सुकता के साथ बिताया ।।२०१ ।। प्रातःकाल ही मनोरथ पर चढ़े हुए और मन को आगे से ही भेजे हुए राजा सहस्रानीक ने अपनी प्रिया के प्रति प्रस्थान किया ॥ २०२ ॥
कुछ दिनों बाद वह शान्त मृगोंवाले प्रशान्त पावन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में पहुँचा ॥ २०३ ॥ वहाँ उसने सस्नेह अतिथि सत्कार करते हुए, तपस्या के मूर्तिमान् आकार एवं पवित्र- दर्शन जमदग्नि ऋषि के प्रणामपूर्वक दर्शन किये ॥ २०४ ॥
आश्रम मे, मुनि जमदग्नि ने पुत्री सहित आनन्दित एवं मुख की मूर्ति रानी मृगावती को राजा के लिए अर्पण कर दिया ।। २०५ ॥ शाप का अन्त होने पर ( चौदह वर्षो के पश्चात् ) उन दोनों राजा और रानी का परस्पर दर्शन, आनन्द के आंसुओं से छलछलाती आंखो से मानों अमृत वर्षा कर रहा था ।। २०६ ।। प्रथम दर्शन के कारण उदयन को हृदय से लगाये हुए राजा, रोमांच के कारण शरीर से जड़े हुए के समान उसे कठिनता से दूर कर सका ।। २०७ ।।
तपोवन के अन्त तक आँसू बहाते हुए मृगों से अनुसरण किया गया राजा, उदयन और मृगावती को साथ लेकर जमदग्नि ऋषि से आजा प्राप्त कर अपनी नगरी की ओर चला। आश्रम से चलकर प्रिया को अपनी विरह-गाथा सुनाता हुआ राजा मानों नागरिक लोगो के विकसित नेत्रों से पान किया जाता हुआ क्रमशः कौशाम्बी नगरी में पहुँचा ।। २०८-२१०।।
राजधानी मे पहुँचते ही सर्वप्रथम उसने उदयन को युवराज-पद पर अभिषिक्त किया। अपने मंत्रियों के पुत्रों को उसने सम्मतिकार के रूप में नियुक्त कर दिया। उस समय उदयन के अभिषेक के समय आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ यह वाणी हुई कि 'वसन्तक, रुमण्वान् और यौगन्धरायण - इन मुख्य मंत्रियों की सहायता से सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करोगे ।।२११-२१४ ॥
तदनन्तर युवराज उदयन पर राज्य का भार देकर राजा चिरकाल से अभिलषित सांसारिक सुखो का मृगावती के साथ उपभोग करने लगा ।। २१५ ।।
कुछ समय आनन्द का उपभोग कर लेने पर, शान्ति की दूती वृद्धावस्था के कान के समीप आ जाने पर उसे देखकर राजा की विषय-वासना, मानों क्रोधित होकर उससे दूर हो गई ।। २१६ ॥
तदनन्तर कल्याणकारी एवं अनुरक्त प्रजावाले संसार के उदय के लिए उत्पन्न अपने पुत्र उदयन को राज्य पर बैठाकर राजा सहस्रानीक, सचिवों और महारानी के साथ महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चला गया ॥ २१७॥
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१. प्राचीन समय से राजाओं के यहाँ ऐसे सेवक होते थे, जो रात के समय राजाओं के शरीर-पैर आदि दबाते हुए मनोरंजक कहानियाँ सुनाते थे, ताकि राजा को शीघ्र और अच्छी नींद आ जाय। अनु०
२. देवगति भी क्षण भर में दुःख और दूसरे ही क्षण सुख देती है। उसी प्रकार मृगांक- वती भी श्रीदत्त को क्षण-क्षण में सुख और दुःख का अनुभव करा रही थी। -- अनु०
३. सती स्त्री अपने पति को अन्य स्त्री में अनुरक्त देखकर जो ईर्ष्या करती है, उसे मांन, प्रणयकोप मा सौतियाढाह कहते हैं। -- अनु०
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