5.105. || पांचवी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा

5.105. || पांचवी कहानी || 

पंचम तरंग

वररुचि की कथा (चालू): वररुचि का वैराग्य

ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम, क्रोध आदि के वशीभूत हो गया || १ ||

वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था । आकस्मिक रूप से प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नही बना देती ॥२॥

तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता से आक्रान्त होकर मेरा कर्त्तव्य, भ्रष्ट हो रहा है। अतः, अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी, तो मेरे रहते क्या कर सकता है ।। ३-४।।

इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः कोमल होती है ॥५॥

'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बेंत के समान नम्र नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए ॥ ६ ॥

ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रि-पद प्राप्त कर राज्यकार्य करने लगा ॥७॥

किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अंगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने गंगाजी में घूमते हुए देखा ॥८॥

राजा ने उसी समय मुझे बुलाकर पूछा कि 'यह क्या है ?' मैंने भी उसी दिशा की ओर अपनी दो अंगुलियाँ दिखा दीं और हाथ अन्तर्हित हो गया ||९|| इस प्रकार उस हाथ के तिरोहित हो जाने पर राजा ने अत्यन्त विस्मय के साथ मुझसे फिर पूछा, तब मैंने कहा - ॥१०॥ 

पाँचों अंगुलियों को दिखाते हुए उस हाथ ने कहा कि पाँच के मिलने पर कौन-सा काम सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ११॥ इसीलिए मैंने उसे दो अँगुलियाँ दिखाई कि यदि दो का एकचित हो, तो संसार में असाध्य क्या है ? ||१२||

राजा योगनन्द का अन्तःपुर : मरी मछली का हँसना

इस प्रकार गूढ़ विज्ञान बतलाने पर राजा अति प्रसन्न हुआ और शकटाल मेरी बुद्धि को दुर्जेय समझकर दुःखी हुआ ।। १३ ।।

एक बार राजा योगनन्द ने, ऊपर मुंह किये हुए एक ब्राह्मण अतिथि को झरोखे से देखती हुई अपनी महारानी को देखा ।। १४ ।।

राजा ने ब्राह्मण को दुराचारी जानकर उसके वध की आज्ञा दे दी। क्योंकि, ईर्ष्या विवेक की विरोधिनी होती है। ।। १५ ।।

राजाज्ञानुसार जब ब्राह्मण वध्यभूमि में ले जाया जा रहा था, तब बाजार में रखा हुआ मृत मत्स्य उसे देखकर हँसने लगा ।। १६ ।।

जब राजा को यह मालूम हुआ, तब उसने ब्राह्मण का वध रोक दिया और मुझसे मछली के हँसने का कारण पूछा ।। १७ ।। 

'सोचकर कहूँगा', ऐसा कहकर मैं राजभवन से चला गया। जब एकान्त में मैंने सरस्वती का ध्यान किया, तब सरस्वती ने उपस्थित होकर यह कहा ।। १८ ।। इस ताल के पेड़ पर रात को छिपकर बैठो, तब यहाँ मछली के हँसने का कारण निश्चय ही सुनोगे ॥ १९ ॥

यह जानकर मैं रात में वहाँ जाकर ताल-वृक्ष पर बैठा और रात को छोटे-छोटे बालकों के साथ आई हुई एक भीषण राक्षसी को देखा ॥ २०॥ बच्चों के भोजन मांगने पर वह राक्षसी बोली कि अभी प्रतीक्षा करो। प्रातःकाल तुम्हें ब्राह्मण का मांस दूंगी। आज वह मारा नही गया ।। २१ ।। बच्चों ने पूछा कि आज वह क्यों नहीं मारा गया ? तब राक्षसी ने कहा कि उसे देख कर मरा हुआ मत्स्य भी हँसने लगा, इसलिए नही मारा गया ॥ २२ ॥

बालकों के यह पूछने पर कि 'वह मृत मत्स्य क्यों हँसा?' राक्षसी बोली कि 'राजा की सभी रानियाँ भ्रष्ट हो गई हैं' ॥ २३ ॥

राजा के रनिवास में अनेक पुरुष, स्त्रियों के रूप में भरे' हैं, किन्तु यह बेचारा ब्राह्मण बिना अपराध ही मारा जा रहा है—ऐसा सोचकर मत्स्य हँसा था ॥ २४॥ राजा की अत्यन्त निर्विवेकता पर हँसनेवाले सब के अन्तर में रहनेवाले प्राणियों को ऐसे विकार होते हैं ॥ २५ ॥

राक्षसी की इन बातों को सुनकर मैं वहाँ से भाग आया और प्रात काल मैंने राजा से मछली के हँसने का कारण बता दिया ॥ २६ ॥ मेरे कथनानुसार राजा ने खोज करने पर रनिवास में रहनेवाले स्त्रीवेषधारी अनेक पुरुषों को पकड़ा। तब से मुझे अत्यधिक मानने लगा और ब्राह्मण को भी वध से मुक्त कर दिया ॥ २७ ॥

इस प्रकार की राजकीय अव्यवस्थाओं को देखकर मै खिन्न हो रहा था कि एक बार राजा के पास एक नया चित्रकार आया ॥ २८ ॥

उसने एक चित्रपट पर महादेवी और योगनन्द का चित्र ऐसा सजीव बनाया कि जो केवल बोलने की चेष्टा मे ही रहित था ।। २९ ।।

राजा ने चित्रकार पर प्रसन्न होकर उसे भरपूर धन दिया और चित्र को अपने निजी भवन ( कमरे ) की दीवार पर लटकवा दिया ॥ ३० ॥

एक बार जब मैं राजा के शयन कक्ष में गया, तब उस चित्र में महारानी के सम्पूर्ण लक्षणों को देखा ।। ३१ ।। अन्यान्य लक्षणों के सम्बन्ध में मैंने अपनी प्रतिभा के बल से यह जान लिया कि इसकी को सम्पूर्ण लक्षण से कमर में तिल का चिह्न होना चाहिए। मैंने चिह्न बना दिया और महारानी युक्त कर दिया ॥ ३२॥

कुछ समय के अनन्तर राजा जब उस भवन में आया, तब उसने मेरे बनाये हुए तिल - चिह्न को देखा ||३३||

राजा ने उस तिल को देखते ही वासगृह के रक्षकों से पूछा कि 'यह चिह्न किसने बनाया ?" उन्होंने मेरा नाम बता दिया ॥ ३४ ॥

'महारानी के गुप्त प्रदेश के इस चिह्न को मेरे बिना दूसरा नहीं जानता, इसे वररुचि ने कैसे जान लिया ?' ॥३५॥

अतः वररुचि ने गुप्त रूप से अवश्य ही मेरी महारानी को भ्रष्ट किया है और इसीलिए इसने रनिवास में स्त्रियों का रूप धारण किए हुये पुरुषों को भी देखा होगा ॥ ३६ ॥

ऐसा सोचकर योगनन्द क्रोध से जलने लगा। सच है, मूर्खों की सभी बाते मूर्खतापूर्ण ही होती हैं ||३७|| तब महाराज ने शकटाल को स्वतन्त्र रूप से बुलाकर कहा कि 'वररुचि ने महारानी का सतीत्व भंग किया है। अतः तुम उसे मार डालो ||३८||

जो आज्ञा – ऐसा कहकर शकटाल अपने घर आकर सोचने लगा कि मुझमें वररुचि को मारने की शक्ति नहीं है ।। ३९ ।।

उसका बुद्धि प्रभाव अलौकिक है। उसने मुझे मृत्यु से बचाया है। फिर वह ब्राह्मण है। अतः, इस समय इसे गुप्त रखकर (वघ की आज्ञा ) स्वीकार कर लेता हूँ ॥ ४० ॥

ऐसा सोचकर उसने राजा के अकारण क्रोध और मेरी वधाज्ञा मुझे सुनाकर कहा ॥४१॥ 'मैं हल्ला मचाने के लिए किसी और को मारकर तुम्हारे वध की घोषणा कर देता हूँ । तुम मेरे घर में छिपकर रहो और इस क्रोधी राजा से मेरी रक्षा करो ॥४२॥ 

इस प्रकार शकटाल के कहने पर मैं गुप्त रूप से उसके घर में रहने लगा। उसने मेरा वघ प्रचारित करने के लिए रात में किसी अन्य का वध करा दिया ॥४३॥

इस प्रकार, नीति-प्रयोग करनेवाले शकटाल को मैंने एक दिन प्रेमपूर्वक कहा कि 'एक मन्त्री तुम हो, जिसने मेरे मारने का विचार नहीं किया ॥ ४४ ॥ मैं मारा भी नही जा सकता; क्योंकि मेरा मित्र राक्षस है, जो स्मरण करते ही उपस्थित होकर क्षण-भर मे मेरी इच्छा में सारे विश्व का ग्रास कर सकता है ।। ४५ ।।

राजा नन्द, मेरा इन्द्रदत्त नामक मित्र है और ब्राह्मण है। अतः वह भी मेरे लिए वध्य नही है।' शकटाल ने कहा कि 'उस राक्षस को मुझे दिखाओ ॥४६॥

तब स्मरण करते ही आये हुए राक्षस को मैंने उसे दिखा दिया, उसे देखकर शकटाल आश्चर्य चकित और भयभीत हुआ ॥४७॥

सुन्दर कौन है ?

राक्षस के अन्तर्धान होने पर शकटाल मुझसे फिर बोला कि 'यह राक्षस, तुम्हारा मित्र कैसे हुआ ?' ||४८|| तब मैने कहा, कुछ दिन पहले ऐसा हुआ कि रात को भ्रमण ( गश्त) करते हुए प्रतिदिन एक-एक नगर-रक्षक (अर्थात शहर कोतवाल) मारा जाता था ॥ ४९ ॥

सुनकर घबराते हुए योगनन्द ने एक बार मुझे ही नगर-रक्षक (कोतवाल) बना दिया। रात को घूमते हुए ( गश्त लगाते हुए) मैंने एक राक्षस को देखा। उसने मुझे देखकर कहा कि बताओ 'इस नगर में सब से सुन्दरी स्त्री कौन है ?' तब मैंने हँसकर उससे कहा ।। ५१ ।।

'अरे मूर्ख, जो स्त्री जिसे पसन्द है; वही उसके लिए सुन्दरी है।' इस प्रश्न का उत्तर दे देने के कारण हत्या से छूटे हुए मुझे वह फिर बोला मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम मेरे मित्र हो। तुम जब भी याद करोगे; मैं तुम्हारे पास उपस्थित हो जाऊँगा ।। ५२-५३॥

इस प्रकार कहकर राक्षस के अन्तर्धान हो जाने पर मैं अपने रास्ते से चला गया। इस प्रकार यह राक्षस मेरा मित्र बना ॥ ५४ ॥

ऐसा कहकर शकटाल द्वारा पुनः प्रार्थना किये जाने पर मैंने ध्यान से उपस्थित मूर्तिमती गंगा को दिखाया ॥५५॥ मुझसे स्तुति द्वारा सन्तुष्ट की गई गंगा देवी तिरोहित हो गई। यह सब देख-सुनकर शकटाल मुझे प्रणाम करता हुआ मेरा सहायक बन गया ।। ५६ ।। 

एक बार मन्त्री शकटाल ने, छिपे हुए और खिन्न मुझे देखकर कहा-  "तुम अपनी आत्मा मे खेद क्यों कर रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि 'राजाओ की बुद्धि अविचार- पूर्ण होती है' इसलिए शीघ्र ही तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। मैं इस सम्बन्ध मे एक कथा सुनाता हूँ, सुनो" ।।५७-५८।।

राजा आदित्यवर्मा और मन्त्री शिववर्मा की कथा

पूर्वकाल में आदित्यवर्मा नामक एक राजा था। शिववर्मा नामक उसका महा बुद्धिमान मन्त्री था ।। ५९ ।।

इस राजा की एक रानी एक बार गर्भवती हुई, यह सुनकर राजा ने रक्षकों से पूछा 'मुझे रनिवास में गये हुए दो वर्ष हो गए, फिर भी रानी को यह गर्भ धारण कैसे हुआ यह बताओ' ।। ६०-६१। रक्षकों ने कहा - 'महाराज आपके इस अन्तःपुर में किसी पुरुष का प्रवेश असम्भव है; किन्तु आपका मन्त्री शिववर्मा बे-रोक टोक अन्दर आता-जाता है ।। ६२ ।। यह सुनकर राजा ने सोचा कि अवश्य यह मन्त्री मेरा द्रोही है, किन्तु इसे प्रकट रूप में मार देने पर मेरी निन्दा होगी ।। ६३ ।।

ऐसा सोचकर राजा ने शिवशर्मा को, अपने मित्र सामन्त राजा भोगवर्मा के पास भेज दिया ॥ ६४ ॥ उसके जाने के अनन्तर राजा ने गुप्त रूप से मन्त्री का वध करने के लिए पत्र लिखकर छिपे तौर पर पत्रवाहक को भेजा ॥ ६५ ॥

मन्त्री के चले जाने पर एक सप्ताह व्यतीत होने के अनन्तर वह गर्भवती रानी भय से भाग गई और सिपाहियों ने उसे स्त्री रूप धारण किये हुए पुरुष के साथ पकड़ा ॥ ६६ ॥

यह समाचार जानकर आदित्यवर्मा शोक से पश्चात्ताप करने लगा कि मैंने ऐसे भले मन्त्री को विना कारण ही मार डाला ।। ६७ ।। इसी बीच, शिववर्मा भोगवर्मा के पास पहुँचा, किन्तु राजाज्ञा का पत्र लेकर पत्रवाहक भी तबतक न पहुँचा ॥ ६८ ॥

देववश भोगवर्मा ने पत्र को पढ़कर एकान्त में शिववर्मा से उसके वध की आज्ञा सुना दी ॥ ६९ ॥

मन्त्रिप्रवर शिववर्मा ने, भोगवर्मा से कहा कि 'तुम निर्देश के अनुसार मुझे मारो। यदि नही मारोगे, तो मैं स्वयं आत्मघात कर लूंगा' ॥ ७० ॥ यह सुनकर आश्चर्य चकित भोगवर्मा ने शिववर्मा से कहा कि 'हे विप्र ! यह क्या रहस्य है, मुझे बताओ । यदि नही बताओगे, तो मैं तुम्हे शपथ देता हूँ' ॥७१॥

राजा के आग्रह करने पर मन्त्री ने कहा कि 'हे राजन् ! मैं जिस देश में मारा जाऊँगा, वहाँ बारह वर्षों तक वृष्टि न होगी, अकाल पड़ेगा' ॥७२॥ यह सुनकर भोगवर्मा चकित होकर अपने मन्त्रियों के साथ सोचने लगा कि आदित्यवर्मा दुष्ट है। वह हमारे देश का विनाश चाहता है ॥७३॥

क्या उसके यहाँ गुप्त हत्या करनेवाले वधिक नहीं हैं। इसलिए मन्त्री की रक्षा करनी चाहिए। भले ही आत्महत्या हो जाय; किन्तु इसका वध कदापि न किया जायगा ॥७४॥ इस प्रकार मन्त्री शिववर्मा अपनी बुद्धि में जीवित ही लौट आया, उसकी निर्दोषता दूसरे प्रकार से सिद्ध हो गई। धर्म कभी विपरीत नही होता, सदा सहायक ही होता है ।।७५-७६ ।।

कात्यायन, इसी प्रकार तुम्हारी भी शुद्धि होगी। अर्थात्, निर्दोषता प्रमाणित हो जायगी और राजा पश्चात्ताप करेगा ॥७७॥

शकटाल से इस प्रकार कहा हुआ मैं उसी घर में छिपा रहा और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। वे दिन मैंने अत्यन्त कठिनता से व्यतीत किये ॥ ७८ ॥

मित्रद्रोह का फल

एक बार उस योगनन्द का पुत्र हिरण्यगुप्त शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। घोड़े की तेज दौड़ान के कारण राजपुत्र अति दूर गहन वन में पहुँच गया। उसे अकेले भ्रमण करते-करते दिन समाप्त हुआ ।। ७९ ॥

राजपुत्र उस रात को बिताने के लिए एक उपयुक्त पेड पर चढ़ गया। कुछ ही समय के अनन्तर सिंह से डराया हुआ एक भालू भी उसी वृक्ष पर आ चढ़ा ॥ ८० ॥

भालू राजपुत्र को घबराया हुआ देखकर मनुष्य की भाषा में बोला- 'राजपुत्र, तू मेरा मित्र है। डर मत । मैं मारूंगा नही।' ऐसा कहकर उसने राजपुत्र के हृदय पर अपना विश्वास जमा दिया और उसे निर्भय कर दिया ।।८१-८२ ॥

भालू की बातों से निर्भय होकर राजपुत्र सो गया और भालू जागता रहा। इतने में नीचे से सिंह बोला ॥८३॥

हे ऋक्ष, तुम इस मनुष्य को पेड़ से नीचे फेंक दो। मैं इसे लेकर चला जाऊँ। भालू बोला- "रे पापी ! यह मेरा मित्र है। मैं मित्र को मरवाना नहीं चाहता ॥ ८४ ॥ क्रमशः भालू के सोने और राजपुत्र के जागते रहने पर सिंह ने राजपुत्र से कहा- 'हे मनुष्य, तुम इम भालू को मेरे लिए पेड से नीचे फेंक दो' ॥८५॥

यह सुनकर भय के कारण सिंह को प्रसन्न करने के लिए राजपुत्र ने भालू को नीचे फेंकने का यत्न किया। आश्चर्य है कि दैवयोग से तत्काल जगा हुआ भालू, उसके यत्न करने पर भी नीचे न गिर सका ॥ ८६ ॥ भालू ने राजपुत्र को शाप दिया कि 'हे मित्रद्रोहिन् ! जबतक यह वृत्तान्त प्रकट न होगा, तबतक तू पागल बना रहेगा' ॥८७॥ प्रातःकाल राजकुमार राजभवन पहुंचते ही पागल हो गया। योगनन्द, उसकी यह दशा देखकर अकस्मात् अत्यन्त दुःखी हुआ ॥ ८८ ॥

राजा ने कहा—'यदि इस समय वररुचि जीवित होता, तो इस पागलपन का कारण मालूम होता। उसके मारने में जो मैंने चातुर्य अर्थात षड्यंत्र किया, इसके लिए मुझे धिक्कार है' ॥८९॥

राजा की बाते सुनकर मन्त्री शकटाल ने सोचा कि यह अवसर वररुचि को प्रकट करने का है ॥९०॥

उसने सोचा कि वररुचि मानी है। अब वह यहाँ मन्त्री बनकर न रह सकेगा और मैं ही एकमात्र सर्वेसर्वा रहूँगा। राजा मुझ पर विश्वास करेगा। ( तब मैं अपना बदला निशंक होकर ले सकूंगा) ऐसा सोचकर उसने राजा से अभय की प्रार्थना करके बोला ।। ९९ ।।

इसके अनन्तर शकटाल ने हठपूर्वक मुझे योगनन्द के पास पहुँचाया और मैंने उन्मत्त राजपुत्र को देखा ।। ९२॥ उसे देखकर मैने राजा से कहा- 'इसने मित्रद्रोह किया है' और सरस्वती की कृपा से वन की रात का सारा वृत्तान्त कह दिया ॥९३॥ 

मेरे वृत्तान्त कहने पर राजपुत्र शाप से मुक्त होकर मेरी स्तुति करने लगा और राजा ने पूछा कि तुमने इस वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ।। ९४-९५ ।।

तब मैंने कहा - 'राजन् ! बुद्धिमानो को बुद्धि, लक्षणों में, अनुमान में तथा प्रतिभा से सब कुछ जान लेती है। जैसे मैने रानी की कमर के तिल को जान लिया था।' यह सुनकर राजा पश्चात्ताप करने लगा ।।९६-९७ ।।

तदनन्तर राजा के द्वारा किये गये सम्मान, दान आदि को उपेक्षा करके निर्दोषता को बहुत बड़ा लाभ समझकर मैं अपने घर चला गया। कारण यह कि चरित्र की पवित्रता ही विद्वानों का धन है ॥ ९८ ॥

मेरे घर पहुँचते ही वहाँ के सभी मनुष्य मेरे सामने आकर रोने लगे। इस प्रकार, व्याकुल मुझे उपवर्ष ( श्वसुर ) ने कहा --- ।। ९९ ।।

'राजा के द्वारा तुम्हारे मारे जाने का समाचार सुनकर उपकोशा ने शरीर को अग्नि में दग्ध कर दिया और तुम्हारी माता का हृदय शोक से फट गया ॥ १००॥ यह सुनकर अभिनव शोक के आक्रमण से मूच्छित होकर में हवा से गिराये हुए वृक्ष के समान भूमि पर गिर पड़ा ।। १०१ ।।

मूर्च्छित होने के अनन्तर ही पागलों की भांति प्रलाप करने लगा। प्रियतम बन्धु के विनाश से उत्पन्न शोक अग्नि किसे उत्तप्त नहीं करती ।। १०२ ।। 'इस अनन्त ससार में अनित्यता ही एकमात्र नित्य वस्तु है, इस बात (ईश्वरी माया) को जानते हुए भी तुम साधारण मनुष्यों के समान क्यों मोहित हो रहे हो ?' आचार्य वर्ष ने आकर ऐसे वचनों से मुझे प्रतिबोधित किया, तब किसी प्रकार मुझे धैर्य प्राप्त हुआ ॥१०३-१०४ ।।

वररुचि का वैराग्य और महाप्रस्थान

तदनन्तर विरक्तहृदय होकर और सांसारिक सभी बन्धनों को छोड़कर मैं शान्तिपूर्वक तपोवन की शरण मे गया ।। १०५ ।। कुछ दिनों के अनन्तर मेरे तपोवन मे रहते ही उसमें एक ब्राह्मण अयोध्या से आया ॥ १०६ ॥ 

मैने उस ब्राह्मण से योगनन्द की राज्य स्थिति के सम्बन्ध में पूछा। उसने मुझे पहचान कर शोक के साथ कहा ॥ १०७ ॥

सुनो, मन्त्रिपद त्यागकर तुम्हारे चले जाने पर धीरे-धीरे शकटाल को चिरकाल के बाद अवसर मिला || १०८॥

शकटाल ने युक्ति द्वारा नन्द के वध का उपाय सोचते-सोचते पृथ्वी को खोदते हुए चाणक्य नामक ब्राह्मण को मार्ग में देखा ॥ १०९ ॥ शकटाल के यह पूछने पर कि 'तुम भूमि क्यों खोद रहे हो ?" उस ब्राह्मण ने कहा कि 'मैं कुशाओं का उन्मूलन कर रहा हूँ; क्योंकि इसने मेरे पैरों मे व्रण (अर्थात घाव) कर दिया ॥ ११० ॥

चाणक्य' की कथा

शकटाल ने उस ब्राह्मण का नाम पूछकर कहा - 'हे ब्राह्मण, मैं तुम्हें राजा नन्द के घर में त्रयोदशी तिथि को श्राद्ध का निमन्त्रण देता हूँ ॥ १११ ॥ भोजन की दक्षिण से तुम्हें एक लाख सोने की मुहरे प्राप्त होंगी एवं और भी ब्राह्मणों से ऊंचे बैठकर भोजन करोगे। आओ मेरे घर पर ।।११२-११३ ॥

ऐसा कहकर शकटाल उस चाणक्य ब्राह्मण को अपने घर ले गया, श्राद्ध के दिन उसे राजा के पास ले गया और राजा ने उसे स्वीकार किया ॥ ११४॥ तदनन्तर श्राद्ध के अवसर पर जाकर चाणक्य सबसे ऊपर बैठ गया, किन्तु सुबन्धु नामक ब्राह्मण उस स्थान को अपने लिए चाहता था ।। ११५ ।।

शकटाल ने राजा नन्द के पास जाकर ऊपर बैठने का झगड़ा सुनाया। नन्द ने कहा- 'सुबन्धु ही सबसे ऊपर बैठेगा। दूसरा योग्य नही है । " ॥ ११६ ॥

भय से नीचे मुँह किये हुए शकटाल ने, श्राद्ध-स्थान में आकर, चाणक्य को वह राजाज्ञा सुना दी और कहा कि इसमें मेरा अपराध नही है, यह राजाज्ञा है ।। ११७॥

राजाज्ञा को अपना अपमान समझते हुए क्रोध से जलकर चाणक्य ने अपनी शिखा को खोलकर यह प्रतिज्ञा की ।। ११८ ।।

सात दिनों के भीतर राजा नन्द को अवश्य मार डालूंगा। तभी मै क्रोध रहित होकर शिखा को बाँधूंगा ।। ११९ ।। ऐसा कहते हुए चाणक्य पर योगनन्द के कुपित होने के कारण वह वहाँ से भागा और शकटाल ने गुप्त रूप से उस अपने घर मे रख लिया ।। १२० ।।

शकटाल मन्त्री के द्वारा सामग्री दिये जाने पर वह ब्राह्मण कही एकान्त मे जाकर कृत्या की साधना करने लगा ।। १२१ ।।

उस कृत्या के प्रभाव से राजा नन्द दाह-ज्वर से सातवे दिन मर गया ।। १२२ ।। योगनन्द के मरने पर शकटाल ने उसके पुत्र हिरण्यगुप्त को मारकर ( असल) नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया ।। १२३॥

चन्द्रगुप्त की मन्त्रिता के लिए बृहस्पति के समान बुद्धिवाले चाणक्य को प्रार्थनापूर्वक स्वीकार कराकर शकटाल पुत्रों के शोक से विरक्त होकर भीषण वन में चला गया ।। १२४-१२५ ॥

हे कणभूते ! उस ब्राह्मण के मुख से नन्द-राज्य की समस्त कथा सुनकर मुझे अत्यन्त खेद हुआ कि यह सारा प्रपच अनित्य है ।। १२६ ॥

इसी खेद के कारण, मैं विन्ध्यवासिनी का दर्शन करने के लिए यहाँ आया । इसकी कृपा से तुम्हें देखकर मुझे अपना पूर्वजन्म का स्मरण हुआ ।। १२७ ॥

और जाति-स्मरण होने के कारण, दिव्य विज्ञान भी प्राप्त हो गया। अब मैं शापमुक्त होकर शरीर छोड़ने का यत्न करूँगा ।। १२८॥

हे काणभूते ! तुम तबतक यहीं रहो, जबतक तीन भाषाओं को छोड़े हुए गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिष्यों के साथ तुम्हारे पास आता है ॥ १२९ ॥

वह गुणाढ्य भी मेरा पक्षपाती शिवजी का माल्यवान् नामक उत्तम गण है। मेरा पक्षपात करने के कारण पार्वती ने उसे क्रोध से शाप दिया, इसीलिए मानव-योनि में उत्पन्न हुआ है ।। १३० ।।

इस गुणाढ्य को शिवजी के द्वारा कही गई और मुझसे सुनाई गई यह कथा सुनाना । तब तुम्हारी और उसकी शाप मुक्ति होगी ।। १३१ ।।

इस प्रकार वररुचि काणभूति को कहकर शरीर त्याग करने के लिए पवित्र बदरिकाश्रम को गया ।। १३२ ॥

शाकाहारी मुनि की कथा

बदरिकाश्रम जाते हुए वररुचि ने गंगातट पर एक शाकाहारी ब्राह्मण को देखा। वररुचि के सामने ही उस ऋषि का हाथ कुश से कट गया ।। १३३ ।।

उस ऋषि के अहंकार की परीक्षा के लिए तथा कौतुक से उस निकलते हुए रक्त को वररुचि ने अपने प्रभाव से शाक का रस बना दिया ।। १३४॥

अपने इस प्रभाव को देखकर उस मुनि को घमंड उत्पन्न हुआ, यह देखकर वररुचि ने मुस्कराते हुए कहा ।। १३५ ।।

मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए रक्त को शाक का रस बना दिया। किन्तु मालूम हुआ कि अभी तक तुमने अहकार को त्यागा नहीं है ।। १३६ ।।

अहकार, ज्ञानमार्ग में कठिनाई से हटनेवाली बाधा है, और ज्ञान के बिना सैकड़ों व्रतों से भी मुक्ति नही होती ॥ १३७॥

पुण्यों के क्षीण होने पर नष्ट हो जानेवाला स्वर्ग, मुक्ति चाहनेवालो को आकृष्ट नही करता। इसलिए अहंकार का त्याग कर मुक्ति के लिए यत्न करो ।। १३८।। इस प्रकार मुनि को शिक्षा देकर और नम्र होते हुए उससे स्तुति किया गया वररुचि प्रशान्त-पावन बदरिकाश्रम के स्नान को गया ।। १३९ ।।

मनुष्य देह को छोड़ने की इच्छा से वररुचि, बदरिकाश्रम में गाढ़ी भक्ति के साथ देवी की धारण में प्राप्त हुआ। देवी ने स्वयं प्रकट होकर शरीर की मुक्ति के लिए उसे स्वयं योग द्वारा शरीर से निकली हुई अग्नि से देहनाश करने के लिए कहा, अर्थात् अपने शरीर से उत्पन्न योगानल अर्थात योगाग्नि से अपने शरीर की मुक्ति के लिए इसे भस्म करो ।। १४० ।।

इस प्रकार वररुचि, उसी देवी के द्वारा निर्दिष्ट धारणा से योगानल में मानव शरीर को दग्ध करके अपनी गण-गति को प्राप्त हुआ और इधर काणभूति, इच्छित गुणाद्ध के समागम के प्रति उत्कंठित था ।। १४१ ।।

महाकवि श्रीसोमभट्ट-विरचित पारिनागर के कथापीठ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त





१. अरेबियन नाइट्स में शहरयार के अन्तःपुर में इसी प्रकार स्त्री-वेवधारी पुरुषों के रहने की चर्चा आती है। २. शेक्सपियर के नाटक 'सिम्बेलाइन' में भी ऐसी शंका का उत्पन्न होना बीखता है।

२. विशालवत्त के मुद्राराक्षस में इस वार्ता को प्रकारान्तर से लिया गया है, किन्तु मुद्राराक्षस की कथा का आधार यही है। चाणक्य के विषय में विस्तृत और ऐतिहासिक विवेचन परिशिष्ट में देखिए।

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