5.108. || आठवीं कहानी || राजा सातवाहन द्वारा कथा के प्रचार के लिए कथापीठ की रचना

5.108. || आठवीं कहानी || राजा सातवाहन द्वारा कथा के प्रचार के लिए कथापीठ की रचना

अष्टम तरंग

इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोध में काणभूति ने अपनी पिशाच भाषा में सात कथाओंवाली वह दिव्य कथा सुनाई, जो उसने पुष्पदन्त ( वररुचि) से सुनी थी ॥ १ ॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में सात लाख छन्दो में पंशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ||२||

इस कथा को कही विद्याधर हरण न कर ले और घोर जंगल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥ ३ ॥ इस कथा को सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्यावर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था, जैसे चंदवा टंगा हो ॥४॥

गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिखे जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ; अर्थात् यक्ष हो गया ||५|| काणभूति के साथ जो उसके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे; वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥ ६ ॥

तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि शाप का अन्त बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। तो अंब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ, जो इसका प्रचार कर सके ।।७-८ ॥

तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य से कहा ||९|| इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रमिक है। वह फूलों की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है, उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर सकता है ॥ १० ॥

'यही ठीक है' ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को रजा सातवाहन के पास भेज दिया ।। ११ ।। और स्वयं प्रतिष्ठान नगर के बाहर देवी उद्यान मे मिलने का संकेत करके ठहर गया ।।१२।। गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है', ऐसा कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ।। १३ ।।

उस पिशाच भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या- मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा-सात लाख छन्द, नौरस पिशाच भावा और रक्त से अक्षरों का लेखन ऐसी इस पिशाच कथा को धिक्कार है! ।। १४-१५ ।।

तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर जो कुछ हुआ था, सब उस गुणाढ्य को सुना दिया ॥ १६ ॥ यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्त्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान होने पर किसका हृदय संतप्त नही होता ॥ १७॥

गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ-सुथरे एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुड बनाया ।। १८ ।। गुणाय बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढकर और मृगपक्षियों को सुनाकर उसे आग मे जला देता था। शिष्य आंखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ।। १९ ।।

शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया, जो एक लाख श्लोकों में था ।। २० ।।

जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था, उस समय जंगल के सभी पशु-हिरन, सूअर, भैंसे आदि-शुड़ में, निश्चल होकर और घास चरना छोड़-कर आंसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ।। २१-२२ ।।

इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यो ने बताया कि इसका कारण सूखे मांस का भोजन है ॥२३॥ राजा को सूखा मांस खिलाने के लिए डाँटे गये रसोईदारों ने कहा कि इसमें हमारा क्या अपराध है ? बहेलिये जैसा मांस लाते हैं, वही हम पकाते हैं ||२४|| शिकारी बहेलियों ने पूछने पर कहा कि यहाँ से समीप ही एक पहाड़ की चोटी पर कोई ब्राह्मण एक-एक पत्र पढ़कर अग्नि में फेंक रहा है ।। २५ ।।

इसलिए जंगल के समस्त प्राणी एकत्र होकर और निराहार रहकर उसे सुनते है। कही चरने के लिए नही जाते, इसीलिए उनका मांस सूख गया है ।। २६ । राजा, व्याघ्रों के इस प्रकार के वचन सुनकर और उन्हें ही आगे करके अत्यन्त कौतूहल के साथ गुणाढ्य के पास गया ॥ २७ ॥

राजा ने वनवास के कारण बढी हुई जटाओं से आवृत गुणाढ्य को इस प्रकार देखा, मानों अल्पशेष शाप रूपी अग्नि की पतली धूम रेखाएँ लटक रही है ||२८|| आँसू बहाते हुए मृग-पक्षियों के मध्य बैठे हुए गुणाढ्य को पहचानकर राजा ने नमस्कार किया और सब समाचार पूछा। गुणाढ्य द्वारा बृहत्कथा का वृत्तान्त सुनकर और गुणाढ्य की माल्यवान् नामक शिव गण का अवतार जानकर राजा पैरो पर गिर पड़ा और उसने शिवजी के मुख से निकली हुई वह दिव्य कया उससे माँगी ।। ३०-३१।।

गुणाढ्य ने राजा मातवाहन से कहा - 'राजन्, छह लाख श्लोकों में लिखी गई छह कथाएँ मैंने जला दी ||३२|| एक लाख श्लोक की एक कथा यह बची है— इसे ले लो। मेरे ये दोनों शिष्य इस कथा के व्याख्याता होंगे ॥३३॥

ऐसा कहकर और योग-समाधि द्वारा अपने मानव शरीर का त्याग कर शाप-मुक्त गुणाढ्य ने अपने पूर्व पद को प्राप्त किया ॥ ३४ ॥ अनन्तर राजा सातवाहन गुणाढ्य द्वारा दी गई नरवाहनदत चरितमयी बृहत्कथा नामक वह कथा प्रसन्नतापूर्वक लेकर अपने नगर मे आया ॥ ३८ ॥ 

राजा ने, नगर में आकर, गुणाढ्य के शिष्य गुणदेव और नन्दिदेव को भूमि, धन, वस्त्र, वाहन, भवन, धन आदि देकर उनकी सेवा की ।। ३९ ।।

राजा सातवाहन ने उन दोनों शिष्यों की सहायता से, उस कथा के प्रचार के लिए उसका देश - भाषा मे अनुवाद कराकर कथापीठ की रचना की ॥४०॥ विचित्र रसों से परिपूर्ण एव देव कथाओं को भुला देनेवाली यह कथा, नगर में निरन्तर प्रसिद्ध होती हुई क्रमशः सारे भूमंडल में प्रसिद्ध हो गई ||४१ ||

महाकवि श्री सोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त कथासरित्सागर का प्रथम लंबक समाप्त

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