5709. || नवम कहानी || नरवाहनदत्त का साहस; राज्यधर बढ़ई की कथा; मानपरा और अर्थलोभ की कथा; नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान
5709. || नवम कहानी || नरवाहनदत्त का साहस; राज्यधर बढ़ई की कथा; मानपरा और अर्थलोभ की कथा; नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान
नवम तरंग
नरवाहनदत्त का साहस
तव प्रात काल, उस तालाब के किनारे में उठकर आगे के लिए प्रस्थान करते हुए नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख से कहा- ॥१॥
"मित्र ! आज रात को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण किये हुई, कोई दिव्यरूपा एक कुमारी ने मुझसे कहा- ॥२॥
'बेटा! निश्चिन्त रहा। यहाँ से शीघ्र ही तुम समुद्र-तट के जंगलों में स्थित आश्चर्यमय बड़े नगर को जाओगे ।।३।।
वहाँ विधाम करके विना कष्ट के ही करसम्भव द्वीप (टापू) में पहुंचोगे और वहाँ कर्फ्यूरिका नाम की राजकुमारी को प्राप्त करोगे ॥४॥
ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गई और मैं भी उसी क्षण जग उठा ॥५॥
ऐसा कहते हुए युबराज से प्रसन्न गोमुख ने कहा- 'महाराज ! तुम्हारे ऊपर देवताओं की कृपा है। अतः, जवश्य ही तुम्हारा मनोरथ शीघ्र सफल होगा' ।॥६॥
गोमुख से इस प्रकार प्रोत्साहित नरवाहनदत्त, गोमुख के साथ जल्दी-जल्दी रास्ता चलने लगा ।।७।।
और, चलते-चलते क्रमशः समुद्र तट पर स्थित पर्वताकार बट्टालिकाओं, गलियों एवं नगर-द्वारों तथा सुमेरु के समान सोने के राजभवनों से युक्त, विशाल विस्तारवाले नये भू-मण्डल के समान नगर में पहुंचा ॥८-९॥
उस नगर में बाजार के रास्ते से घुसकर जाते हुए उसने सब कुछ लकड़ी का बना हुआ और सजीव प्राणी के समान चेष्टा करता हुआ देखा ।।१०।।
बनिया, वेश्याएँ, नागरिक आदि सभी आश्चर्यकारक थे। वे करते सब कुछ थे, किन्तु बोल न सकने के कारण निर्जीव मालूम पड़ते थे ॥११॥
नरवाहनदत्त, गोमुख के साथ हाथी पोटे आदि देखता हुआ क्रमशः उस नगर के राजभवन के समीप जा पहुंचा ॥१२॥
और, उस सुवर्णमय नगर के मस्तक के समान शोभित उम राजभवन में अत्यधिक आश्चर्य के साथ अन्दर गया ।। १३।।
जिसमें यन्त्र के बने हुए पहरेदार, वेश्याएं आदि वथावश्यक भरे हुए थे और उनके मध्य इन्द्रियों का संचालन करनेवाले, आत्मा के समान उन सभी जड़ पदार्थों का संचालन करनेवाले सबके अधिष्ठाता के रूप में रत्न-मिहामन पर बैठे हुए भव्य पुरुष को देखा ।।१४-१५॥
उस पुरुष ने भी अच्छी आकृति देखकर नरवाहन दत्त उच्चकोटि का पुरुष समझा और स्वागत करके आसन पर बिठाया ॥१६॥
और सामने बैठकर पूछा कि 'तुम कौन हो और एक व्यक्ति के साथ मनुष्यों से अगम्य इस भूमि में कैमे पहुंचे ?' ॥१७॥
तब नरवाहनदत्त ने मी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उस पुरुष से नम्रतापूर्वक पूछा-॥१८॥
'तुम कौन हो ? और यह आश्चर्यमय तुम्हारा नगर कैसा है?' यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया ॥१९॥
राज्यधर बढ़ई की कथा
बड़े अच्छे गुणों से गुयी गई और वसुधा-वधू की कांची (करधनी) के समान अलंकार-रूप कांची नाम की एक नगरी है।॥२०॥
उस कांची में बाहुबल नाम का प्रसिद्ध राजा है, जिसने अपनी भुजाओं के बल से उपाजित पंचला लक्ष्मी को भी अपने कोष (लजाने) में बाँध रखा है।॥२१॥
उस राजा के राज्य में मयदानव से बाविष्कृत यन्त्रों के निर्माण में कुशल हम दो बढ़ई भाई रहते थे ॥२२॥
प्राणवर नाम का बड़ा भाई वेश्या-व्यसन में प्रसिद्ध था। उसका मक्त छोटा भाई मैं राज्यधर नाम से प्रसिद्ध हूँ ॥२३॥
मेरे बड़े भाई ने अपनी कमाई के तथा पिता के धन को खा डाला और कुछ मेरे द्वारा स्नेह से दिये गये धन को भी उड़ा दिया ॥२४॥
तो भी अत्यन्त व्यसनी उसने, वेश्या के लिए धन हरण करने के लिए रस्सी से बँबे हुए काठ के हंसों की जोड़ी बनाई ॥ २५॥
वे हंस रस्सी के हिलाने से रात को राजा के खजाने में रोशनदान से अन्दर घुसकर अपनी चांच में पेटियों में रखे हुए आभूषणों को यन्त्र के द्वारा अपने मालिक (मेरे भाई) के गास ले आते थे ।।२६-२७
मेरा बड़ा भाई उन आभूषणों को बेचकर उस धन को वेश्या के साथ भोगता था ॥२८॥
मेरे बहुत मना करने पर भी वह इस अनुचित कार्य से रुका नहीं। व्यसनों में अन्धा कौन मले या बुरे मार्ग को देखता है ॥२९॥
इस प्रकार रात में दृढता से बन्द किये गये और चूहों से रहित उस गोदाम में चोरी होने के कारण कुछ दिनों के अनन्तर भाण्डार का अधिकारी, भय से सर्वदा इस चोरी का पता लगाने की चिन्ता में अत्यन्त सन्तप्त और दुःखी हो गया, और उसने राजा के समीप जाकर स्पष्ट रूप से निवेदन कर दिया ॥३०-३१।।
राजा ने भाण्डारी तथा अन्यान्य सिपाहियों को रात में चोरी का पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया। उन रखवालों ने रात को यन्त्र से बने हुए और रस्सी से बेंचे हंसों को रोशनदान से घुसते हुए और माल उठाते हुए देख लिया और उन्हें पकड़ लिया। रखवाले ने यन्त्र की युक्ति से घूमनेवाली चोंचों में गहना लटकाये हुए और टूटी हुई रस्मीवाले उन हंसों को प्रातः काल राजा को दिखाने के लिए पकड़ रखा ।।३२-३४।।
उसी समय मेरे भाई ने घबराये हुए आकर मुझसे कहा कि गोदाम के रखवालों ने मेरे हंसों को पकड़ लिया है ॥३५॥
क्योंकि रस्सी ढीली हो गई है और यन्त्र की कील भी खिसक गई, इसलिए अब हम दोनों को अभी ही यहाँ से हट जाना चाहिए ॥३६॥
क्योंकि, प्रातःकाल राजा हम दोनों को चोर समझकर मरवा डालेगा, इसलिए कि हम दोनों ही यहाँ ऐसे कूटवन्त्रों को बनानेवाले और आननेवाले प्रसिद्ध कारीगर हैं॥३७॥
मेरे पास जो मायामय यन्त्रांवाला विमान (आकाश-यान) है, वह एक वार चाभी देने से बत्तीस कोम तक जाता है।॥ ३८।।
उसके द्वारा हम लोग दुःखदायी विदेश में भी जा सकते है। बुरे काम में हितैवी के हित वाक्य न मानने से मुम्ब कहाँ मिन सकता है? उस मेरा हित चाहनेवाले तुम्हारे बहुत मना करने पर भी पापबुद्धि मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, उमी पाप का यह फल, निष्पाप तुम्हें भी भोगना पड़ा ।।३९-८०11
ऐमा कहकर मेरा बड़ा भाई प्राणधर अपने कुटुम्ब के साथ दूर जानेवाले विमान पर चढ़ गया ।। ४१
उसके कहने पर भी बहुत लोगों में भरे हुए उस विमान पर मैं नहीं बैठा। इस आशंका में कि वह विमान आकाश में उड़कर कही दूर न चला जाय ।।४२।।
यथार्थ नामवाले उस प्राणधर के चले जाने पर एकाकी मैं भी प्रातःकाल ही में आने बनाये हुए वाय्यन्त्रवाले विमान में शीघ्र ही आठ मो काम दूर राजा के भय आगा ॥४३-४४
उम आकाश-पान में पुनः चाभी भरकर मैं और भी दो कोम दूर चला आया ।। ४५॥
तब समुद्र की समीपता की शंका से विमान को छोड़कर पैरों से चलता चलता इस सूने नगर में आ गया ।॥४६॥
देखते-देखते में वस्त्र, आभूषणाय्या आदि साज-सामान में मजे हुए उस राजमन्दिर में आया। सायंकाल बाग की बावलीमें नहाकर और फलों को खाकर राजा के पंलग पर सोया हुआ अकेला मैं सोचने लगा-॥४७-४८॥
कि मैं इस निर्जन नगर में क्या करूंगा। प्रातःकाल उठकर कहीं इधर-उधर देखूंगा। अब राजा के बाहुबल से तो मुझे भय नहीं रहा ॥४९॥
ऐसा सोचकर सोये हुए मुझने प्रातः काल के समय मोर पर चढ़े हुए किसी पुरुष ने इस प्रकार कहा- ।॥५०॥
'हे भद्र ! तुम्हें यहीं रहना चाहिए और भोजन के समय राजभवन के मध्यन (बिचले) खंड में जाना चाहिए' ।॥५१॥
ऐसा कहकर उसके अन्तर्धान होने पर मैंने सोचा कि निश्चय ही यह दिव्य स्थान कात्तिकेय स्वामी का बनाया हुआ है ।॥५२॥
मेरे पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से उन्होंने स्वप्न में मुझ पर कृपा की है। अतः, यहाँ रहने से अवश्य ही मेरा कल्याण है ।।५३।।
ऐसा विश्वास रखकर मैं उठा और दैनिक कृत्यों से निबटकर बैठा और भोजन के समय गिर गया ।।५४।।
इसी प्रकार, मैं बिचने खंड में चढ़ा। वहाँ जाते ही सोने के बरतनों में आकाश से दूध-भात आदि दिव्य जो-जो भी भोजन मोचता था, वह-वह भोजन मुझे प्राप्त हो जाना था। महाराज। मैं उम भोजन को बाकर अध्यन्त मुखी हो गया ।॥५५-५६।।
हे प्रभु! तभी से मैं इस नगर में इच्छा करते ही प्राप्त होनेवाले स्त्री, नौकर-चाकर और राजकीय भोगों से मुम्बी रहकर निवास करने लगा ॥५७-५८॥
हे महाराज ! इस प्रकार मैं बढ़ई होकर भी दैववश राज्यधर नाम धारण करके राजाओं की-सी लीला कर रहा हूं ।॥५९॥
इसलिए हे महाराज! आज दिन आप लोग मेरे निर्मित इस नगर में विधाम करे मैं वयाशक्ति आपकी सेवा में तत्पर हूँ ॥६०॥
ऐमा कहकर वह राज्यधर, गोमुख मन्त्री के साथ नरवाहनदत्त को उस नगर के उद्यान में ले गया ॥५१॥
वहाँ पर बावली के जल में स्नान करके और शिव की पूजा करके उस नरवाहनदत्त को उस भवन के बिचले खण्ड में पहुंचा दिया गया और वहाँ बैठकर नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख के साथ ध्यान करते ही तुरन्त उपस्थित होनेवाले बहार से तृप्ति प्राप्त की। राज्यघर भी साथ ही उपस्थित था ।॥६२॥
तदनन्तर, किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा उस स्थान के स्वच्छ किये जाने पर नरवाहनदत्त मध-पान करके और पान चबाकर आराम करने लगा ।। ६३१।
तदनन्तर, राज्यघर के भोजन कर लेने पर उस चिन्तामणिनगर की महिमा से चकित नरवाहनदत्त ने निद्रा ली ॥६४॥
कर्फ्यूरिका की प्राप्ति की उत्सुकता के कारण निद्रा न आने से उनींदे नरवाहनदत्त को लेटे-लेटे राज्यघर ने कहना प्रारम्भ किया- ।।६५।।
'राजन् ! सोते क्यों नहीं? आप अपनी ईप्सित प्रियतमा कर्फ्यूरिका को अवश्य प्राप्त करोगे। क्योंकि, लक्ष्मी के समान स्त्री भी उदार हृदयवाले का वरण करती है ।।६६-६७।।
यह बात हमने स्वयं ही प्रत्यक्ष रूप से देली है। जिसे मैं कहता हूँ सुनो-
मानपरा और अर्थलोभ की कथा
कांची नगरी के बाहुबल नामक राजा जिसके विषय में मैंने तुमसे कहा है, का अर्थलाभ नाम का एक धनी दरबारी था। उसकी मानपरा नामकी मुन्दरी रूपवती स्त्री थी ॥६८-६९।।
वह लोभी बनिया, मुनीम या अन्य नौकरों को बीच में न रखकर व्यापार-वाणिज्य के कार्यों में अपनी स्त्री को ही रखता था ।।७०।।
उसकी पत्नी, इम कार्य को न बाहती हुई भी उनकी इच्छा से विवश होकर अपने मधुर रूप, भाषण और व्यवहार से मनुष्यों को आकृष्ट कर उसका व्यापार चलाती थी ।॥७१।।
बह मुन्दरी हाथी, पोटे, ग्न आदि के विक्रय से प्रचुर धन कमाती थी और उसका पति उसकी प्रशंगा करता था ।॥७२॥
एक बार, किमी दूर देश से मुखधन नाम का एक बड़ा धनी व्यापारी घोड़े आदि माल लेकर कांची में बेचने के लिए आया ॥ ३३।।
उमे आया हुआ देखकर उम लोभी अर्यलोभ ने कमाई के लोभ ने अपनी पत्नी से कहा- सुलधन नाम का बनिया दूर देश से यहाँ आया है।॥७४॥
हे प्यारी! वह बीस हजार चीनी घोड़े और तरह-तरह के अनगिनत चीनी कपड़े लाया है ॥ ७५॥
इमलिए, तू उसके पास जाकर पाँच हजार घोड़े और दस हजार कपड़ों के जोड़े खरीद ले ॥७६॥
तब मैं उन हजारों पोड़ों और कपड़ों को लेकर राजा का दर्शन करके उसमे व्यापार कहें ॥७७॥
ऐसा कहकर उम पापी अर्थलोभ के द्वारा भेजी गई मानपरा सुखधन के पास पहुंची और उसने बीस हजार घोड़ों और कपड़ों की माँग की ॥७८॥
उने सुन्दरी देखकर कामातुर बनिया सुलघन एकान्त में ले जाकर बोला- 'दाम लेकर तो मैं तुम्हें एक भी घोड़ा या एक भी वस्त्र न दूंगा ॥७९-८०॥
यदि तू एक रात मेरे साथ रहे, तो एक सौ. घोड़े और पाँच हजार कपड़े विना मूल्य भेंट कर दूंगा' ।॥८१॥
ऐसा कहकर उसे सकुचाती देखकर उसने और अधिक भी देने का आश्वासन दिया। क्योंकि, स्वतन्त्र स्त्री की चेष्टा की ओर किसका आकर्षण नहीं होता ॥८२॥
तब वह सुन्दरी उससे बोली कि 'मैं अपने पति से पूछती हूँ। मैं समझती हूँ कि वह अत्यन्त लोभ के कारण मह मुझे इस कार्य के लिए भी प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रदान करेगा। ॥८३॥
ऐसा कहकर और अपने घर जाकर उसने अपने पति से वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया, जो सुखधन नामक बनिया ने उससे एकान्त में कहा था ।।८४।।
यह सुनकर अर्थलोभी पिशाच बोला- 'प्रिये! यदि एक रात में पाँच हजार वस्त्र और पांच मौ चीनी घोड़े मिलते हैं, तो क्या दोष है? तू उसके पास जा और सबेरे जल्दी ही आ जाना ।।८५-८६।।
अर्थपिशाच पुरुष पति के वचन सुनकर मानपरा सन्देह-मग्न होकर सोचने लगी-'स्त्री को बेचनेवाले इस पापी नीच पति को धिक्कार है, जो लोभ की भावना से तन्मय हो गया ॥८७-८८॥
इमसे तो वही मेरा समुचित पति है, जो पाँच सौ घोड़ों और पाँच हजार वस्त्र के जोड़ों से मुझे एक रात के लिए खरीद रहा है। इस कारण मेरा वास्तविक पति वही ठीक है'- ऐसा सोचकर और नीच पति की आज्ञा लेकर वह सुलघन के पास चली गई ॥८९-९०।।
मुखधन भी उसे आई हुई देखकर और पूछकर यक्ति हुआ और उसके आगमन से उसने अपने-आप को धन्य माना ॥९१॥
मुखधन ने उसके आगमन से प्रसन्न होकर उसके पति के पास तुरन्त उस रमणी के शुल्क के रूप में बहुत-से घोड़े और बस्त्र भेज दिये, जो देने के लिए कहे थे।॥९२॥
और, सारी रात सुख से उस स्त्री के साथ रहा, मानों वह सुन्दरी उसकी सम्पत्ति के फल-रूप में मिली थी ॥९३॥
प्रातःकाल ही उस नपुंसक अर्थलोभ से उसे बुलाने के लिए भेजे गये नौकरों से मानपरा ने कहा- ॥९४॥
जब अर्थलोभ ने मुझे दूसरे के हाथ बेच दिया, मूल्य देकर मुझे खरीद लिया गया, तब मैं अब उस अर्थलोभ की भार्या कैसे हूँ? जैसा वह निर्लज्ज है, क्या में भी वैसी ही निर्लज्ज हूँ ? ॥९५॥
आपलोग ही मुझे कहिए कि क्या यह कोई अच्छी बात है? तो अब आप लोग जाइए। जिसने मुझे खरीदा है, वही मेरा पति हैं ।॥९६॥
मानपरा से इस प्रकार कहे गये दूतों ने लौटकर अर्थलोम से नीचा मुँह किये हुए सभी मन्देश उसी प्रकार सुना दिया ॥९७॥
यह सुनकर उम नराधम अर्थलाभ ने बलपूर्वक अपनी पत्नी को सुखधन के घर से लाने की इच्छा प्रकट की, तब हबल नामक उसके मित्र ने कहा- ॥९८॥
'मुम्वचन से छीनकर तुम अपनी स्त्री को नहीं ला सकते। उम बीर के आगे तुम्हारी धीरता मैं नहीं देखता ।॥९९।।
उसे त्याग की अनुरागिणी तुम्हारी भार्या ने शूरवीर बना दिया है, वह बनवान् है और अनेक बलवान् मित्रों के साथ है। और, तू तो कंजूसी के कारण बेच दी गई पत्नी से विरहित और अपमान ने निरुत्साह होकर नपुंसक बन चुका है। न स्वयं उसके समान बलवान् है। और न तेरे मित्र ही बलवान् है। इसलिए उस शत्रु को जीतने में तू कैसे समर्थ हो सकना है ? ॥१००-१०२।।
स्त्री-विक्रय-रूप नुम्हारे कुकृत्य को सुनकर राजा भी क्रोष करेगा। इसलिए चुप रही। व्यर्थ हँसी के पात्र बनने का यत्न न करो ॥ १०३॥
इस प्रकार, मित्र में रोका गया भी अयंलोभ, क्रोध से भरकर अपने सिपाहियों को लेकर सुखधन पर चढ़ाई कर दी और उसे घेर लिया।। १०४१।
तब मित्रों के साथ मुखधन की सेना के सामने अयंलोभ की सेना क्षण-भर में भाग खड़ी हुई ॥१०५॥
तब वह अर्यलोभ भागकर तुरन्त राजा के समीप जा पहुंचा और बोला- 'महाराज ! सुश्ववन नामक बनिया ने मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया' ।॥१०६।।
इस प्रकार, अपने कुकृत्यों को छिपाकर उसने राजा से निवेदन किया, तो राजा ने क्रोष से सुलधन को पकड़वाने की इच्छा की ।॥१०७।।
तब राजा का संधान नामक मन्त्री बोला- 'स्वामी! उस बनिया को वैसे ही पकड़ा नहीं जा सकता। ग्यारह मित्रों के साथ आये हुए उसके पास एक लाख से अधिक अच्छे-अच्छे घोड़े हैं। और, इस विषय का वास्तविक तत्त्व भी आपने नहीं जाना ॥१०८-१०९।।
बिना कारण यह घटना कैसे हुई। इसलिए दूत भेजकर सुलघन को बुलवाना चाहिए। देखिए, वह इस विषय में क्या कहता है ? ।।११०।।
मन्त्री की सम्मति मानकर राजा बाहुबल ने सुखधन के पास पूछने के लिए दूत भेज दिया। जब राजा की आज्ञा से दूत ने जाकर उससे पूछा, तब अर्थलोभ की पत्नी मानपरा ने स्वयं सारा समाचार उसे सुनाया ।।१११-११२॥
इस आश्चर्थमय वृत्तान्त को सुनकर और मानपरा के रूप को देखने के लिए राजा, अर्थलोभ को साथ लेकर सुखधन के घर पर आया ।।११३।।
वहाँ मुखवन के प्रणाम स्वीकार करते हुए उसने मानपरा को देखा, जो अपने लावण्य से ब्रह्मा को भी चकित करनेवाली थी ।॥११४॥
पैरों पर पड़ी हुई मानपरा ने राजा के पूछने पर, अर्थलोन के सामने ही, अपना वृत्तान्त स्वयं कहने लगी। उसका कथन सुनकर, उसे मत्य समझकर और अर्थलाभ के चुप हो जाने पर, राजा ने मानपरा से पूछा कि हे सुन्दरी! अब क्या होना चाहिए ? ॥११५-११६॥
तब वह बोली- महाराज! जिस लोभी ने विना किसी आपत्ति या संकट के आये ही मुझे सिर्फ लोभ से बेच डाला, ऐने लोभी पिशाच के पाम फिर कैसे जाऊँ? ॥११७॥
यह मुनकर जब राजा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया, तब काम, क्रोध और लज्जा से भरा हुआ अर्थलोभ बोला- ॥११८॥
'महाराज! मैं और सुखधन दाना किसी अन्य की सहायता के विना अपनी-अपनी सेना से युद्ध करें। आंग दोनों के बलाबल का निरीक्षण करें ॥११९०॥
अर्थलोभ की बातों को सुनकर सुखधन बोला- यदि ऐसा हो, तो सेना की क्या आव श्यकता है। हमी दोनों परस्पर द्वन्द्व-युद्ध करके निपटारा कर लें ।॥१२०॥
इस द्वन्द्र-युद्ध में जो विजयी होगा, मानपरा उसी की होगी।' यह सुनकर राजा ने भी कहा कि 'ठीक है। यही हो' ॥१२१॥
तदनन्तर, राजा और मानपरा के समक्ष, दोनी घोड़े पर बढ़कर युद्ध-भूमि में उतरे। युद्ध में भालों में लड़ते हुए उन दोनों में मुखचन ने अर्थलोभ को भाले की मार से पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ १२२-१२३॥
इसी प्रकार, उसने अर्थलोभ को तीन बार गिराया और उसके घोड़े को मार डाला, किन्तु धार्मिक सुम्वधन ने अर्थलोभ को प्राणों से वियुक्त नहीं किया ।।१२४।॥
पाँचवी बार में घोड़े के पैरों से भूमिपर रौंदे गये प्राणहीन अर्थलोभ के शरीर को, उसके दास, युद्धभूमि से उठाकर ले गये ।।१२५॥
तब दर्शकों द्वारा प्रशंसा किये जाते हुए सुखधन का राजा ने भी समुचित सत्कार-सन्मान आदि किया, उसे उपहार प्रदान किया एवं अर्थलोम की पाप से कमाई हुई सारी सम्पत्ति अधिकृत कर ली ॥१२६-१२७।।
और, उसके स्थान पर दूसरे प्रतिहार की नियुक्ति करके राजा राजभवन को गया। सज्जन व्यक्ति दुष्टजनों के सम्पर्क से दूर रहकर ही सुखी रहते हैं ।॥ १२८॥
वह मुखधन भी प्रेम करनेवाली पत्नी मानपरा के साथ सुखभोग करता हुआ आनन्द से विहार करने लगा ।।१२९॥
इस प्रकार, दुर्बल और नीच हृदयवाले कुत्मित पुरुषों में स्त्रियाँ और पन दूर हो जाते हैं और उदारचेता पुरुषों को इधर-उधर से म्वयं आकर मिलते हैं ।॥ १३०॥
इसलिए, तुम चिन्ता न करो। आनन्द से नींद लो। महाराज! तुम राजकुमारी कर्फ्यूरिका को अवश्य प्राप्न करोगे' ।॥१३१॥
नरवाहनदत्त ने राज्यघर से, इस प्रकार रहस्य-युक्त वचन सुनकर गोमुख के साथ नीद नी। प्रातःकाल, जब नरवाहनदत्त, भोजन करके विधाम कर ही रहा था कि इतने में बुद्धिमान् गोमुख ने राज्यघर से कहा- 'तुम मेरे स्वामी के लिए ऐमा यन्त्रमय विमान बनाओ कि वह कर्पूरसंभव द्वीप में पहुँचकर अपनी प्राणप्यारी को पा सकें ॥१३२-१३४।।
नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान
तब उस कुशल शिल्पकार ने पहले से ही तैयार किये हुए वायुयन्त्र-विमान को नर-वाह्नदत्त के लिए तैयार कर दिया ॥१३५॥
मनके समान शीघ्र चलनेवाले उस विमान पर बैठकर गोमुत्र के साथ नरवाहनदत्त, अपने धैर्य को देखकर प्रसन्नता से उछलते हुए समुद्र को लौंपकर उसके किनारे पर स्थित कर्पूरसंभव द्वीप में पहुंचा और आकाश से उतरकर कौतुकवश नगर के भीतर भ्रमण करने लगा ।।१३६-१३८॥
लोगों से पूछने पर उसे ठीक कर्पूरद्वीप समझकर और संशय-रहित होकर वह राजभवन समीप पहुंचा ।।१३९।।
राजभवन के समीप ही एक बूढ़ी औरत के मनोरम मकान को देखकर, उस विनम्र बूढ़ी से अनुमति प्राप्त कर वह निवास के लिए उस घर में घुसा ॥१४०।।
अब राजकुमारी से मिलने की युक्ति खोजते हुए उसने उस स्त्री से कुछ ही देर बाद पूष्छा कि हे आयें ! यहाँ के राजा का क्या नाम है और उसकी सन्तान क्या है? और, उसका रूप कैसा है? यह हमें बताओ। क्योंकि, हम विदेशी हैं।' राजा नरवाहनदत्त से इस प्रकार कही गई वह बूढ़ी उसकी उत्तम नाकृति देकर बोली ॥१४१-१४२॥
'हे भाग्यशालिन् ! सुनो, मैं सब तुमसे कहती हूँ। इस कर्पूरसंभव द्वीप में कर्पूरक नाम का राजा है। सन्तान-हीन उस राजा ने सन्तान के लिए, अपनी महारानी बुद्धिकार्या के साथ शंकर की उपासना की। तीन रातों तक उपवास किये राजा को शिवजी ने स्वप्न में बादेश दिया कि उठो, तुम्हें पुत्र से भी अधिक प्यारी कन्या उत्पन्न होगी, जिसका पति विद्याघरों का राजा होकर माम्राज्य प्राप्त करेगा।' शिवजी से इस प्रकार आदेश दिया गया राजा प्रातःकाल उठा ॥१४३-१४६।१
उसने प्रसन्नचित्त होकर रानी वृद्धिकार्य को अपना मपना कह सुनाया और उसके साथ ही वत का पारण किया ॥ १४७॥
कुछ दिनों बाद उसकी रानी ने गर्भ धारण किया और सम्पूर्ण अच्छे लक्षणांवाली सर्वागमुन्दरी बल्या उत्पन्न की ॥१४८॥
उस कन्या की शरीर-ज्योति से प्रसूति गृह के सारे दीपक निष्प्रभ से हो गये। काजल उगलने के बहाने मानों वे अपनी पराजय के कारण लम्बी साँसे ले रहे थे ॥१४९।।
तब राजा कर्पूरक ने उत्सव करके और उसका नामकरण संस्कार करके उसका नाम कर्पूरिका रखा ॥१५०॥
जनता के लोचनों को चाँद-सा आनन्द देनेवाली वह कर्पूरिका क्रमशः बढ़ती हुई अब पूर्ण युवावस्था में है ।।१५१॥
उसका पिता उसका विवाह करना चाहता है; किन्तु वह पुरुषों से द्वेष रखनेवाली मनस्विनी, विवाह करना नहीं चाहती ।।१५२।।
उसकी सहेली मेरी कन्या के यह पूछने पर कि 'सखि ! कन्या के जन्म का फल विवाह है। तू उसे क्यों नहीं बाहती?' ऐसा पूछने पर वह इस प्रकार बोली- ।। १५३॥
"सलि ! मैं अपने पूर्व जन्म का हाल जानती हूँ। तू मेरी बात सुन। मैं बिवाह न करने का कारण बताती हूँ। समुद्र के किनारे एक बड़ा चन्दन का पेड़ है ।॥ १५४॥
उसी समुद्र के किनारे खिले हुए कमलोंवाला एक सुन्दर सरोवर है। मैं उसी सरोवर में पूर्व जन्म के कर्मानुसार हंसिनी हुई ।। १५५।।
मैं किसी समय समुद्र के तट से दूर चन्दन के वृक्ष के पास पति के साथ अपना घर बना कर रहती थी ।। १५६।।
उस घर में रहते हुए मुझे बच्चे उत्पन्न हुए, जिन्हें समुद्र की लहरों ने, अपहृत कर (छीन) लिया ॥१५७॥
बच्चों के अपहरण हो जाने पर रोती, चिल्लाती एवं अनशन करती हुई मैं समुद्र-तट पर स्थित शिवलिग के सामने शोक से बैठी रही ।॥ १५८॥
तब मेरे पति राजहंग ने आकर कहा 'उठ, मरे हुए बच्बों के लिए क्या शोक कर रही है ॥१५९॥
हम दोनों रहेंगे, तो और बच्चे उत्पन्न हो जायेगे। जाते रहने पर सब कुछ प्राप्त होता है। इस प्रकार, उसके वाक्यों के बाणों से हृदय में बिधी हुई मैंने सोचा-॥१६०॥
'इन पापी पुरुषों को धिक्कार है, जो अपने बच्चों के सम्बन्ध में भी ऐगे स्नेह-हीन और दया-रहित होते हैं, जब कि स्त्रियों अत्यन्त भक्तिमती होती है। इमलिए, ऐसे क्रूर पति में नया प्रयोजन और इस देह में भी क्या लाभ ? ऐमा सोचकर शिवजी को प्रणाम करके और उन्हें भक्तिपूर्वक हृदय में धारण करके सामने देखते हुए पति के समक्ष ही मैंने अपने को समुद्र में डाल दिया। और, मरने के समय यह संकल्प किया कि मैं अगले जन्म में राजपुत्री बनूं। तभी मैं आज इस राजा की राजकुमारी हुई। ॥१६१-१६४०।
पूर्वजन्म में अपने पति की क्रूरता को सोबकर मेरा मन पुरुषों के प्रति आकृष्ट नहीं होता। इसीलिए, विवाह करता नहीं चाहती हूँ। आगे भविष्य तो देव के अधीन है।" मेरी कन्या से राजकुमारी ने एकान्त में यह बात कही थी ।।१६५-१६६।।
उस मेरी कन्या ने मेरे पास आकर यह वृत्तान्त कह सुनाया 'बेटा! तुमने जो मुझसे पूछा यह सब मैंने कह दिया। तभी विद्याधरों के चक्रवर्ती होनेवाले तुम्हारी ही वह महारानी (पत्नी) बनेगी' ऐसा महादेव ने पहले ही आदेश दिया है। विद्याधर-चक्रवर्ती के उन तिलक आदि लक्षणोंवाले तुम्हें मैं देख रही हूँ ॥१६७-१६९।।
क्या देव ने उसी के लिए तुम्हें यहाँ ला दिया है? तुम मेरे ही घर पर तबतक ठहरो। फिर देखेंगे, आगे क्या होता है' ? ॥१७०।।
ऐसा कहकर वृद्धा के द्वारा भोजन कराया गया गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने वह रात्रि वहीं व्यतीत की ।।१७१।।
प्रातः काल गोमुख के साथ एकान्त में अपना कर्तव्य निर्धारण करके बत्सेश्वर के पुत्र ने महाव्रती का वेश धारण किया ।।१७२।।
इस प्रकार का वेश बनाकर गोमुख को साथ लिये हुए 'हा हंसिनी! 'हा हंसिनी !' इस प्रकार बकता सकता राजभवन के आस-पास घूमने लगा। जनता उमका तमाणा देमाने लगी ।। १७३॥
इस प्रकार, उसे देखकर राजभवन की दासियाँ आश्चर्यचकित होकर राजकुमारी कर्षरिका में बोली- ।।१७४।।
'राजभवन के मिद्वार पर किसी महाव्रती युवा को हम लोगों ने देखा, जो द्वितीय मित्र के माय रहने पर भी सौन्दर्य में अद्वितीय है।॥ १७५१
वह स्त्रियों के लिए महामोहन मन्त्र के नमान दिन-रात हंसिनी! हा हंसिनी! इस प्रकार की रट लगाये हुए है ।।१३६०।
यह सुनकर पूर्वजन्म की हंसिनी उस राजकुमारी ने बड़े ही कौतुक से दासियों द्वारा उसे अपने समीप चुन्नाया ।।१७७॥
और, अत्यन्त सुन्दर रूप में शोभित शंकर की आराधना से पुनर्जीवित नये कामदेव के समान उसे (नरवाहनदत्त को) देखा ॥१७८॥
और, विस्मय से विम्फारित नेत्रों से उसे देखते हुए राजकुमारी बोली कि तुम 'हा मिनी ! हा हंसिनी!' यह क्यों बार-बार बक रहे हो? ।।१७९॥
राजकुमारी के ऐसा पूछने पर भी उसने उत्तर में भी 'हा हंसिनी ! यही कहा। तब उसके साथ खड़े हुए गोमूल ने कहा- 'हे देवि ! मैं संक्षेप से कहता हूँ, सुनो। यह अपने कर्म योग से पहले जन्म में हंस था ॥ १८०-१८१॥
उस जन्म में यह समुद्र-तटवर्ती किसी बड़े सरोवर के किनारे चन्दन-वृक्ष में अपना घोंसला बनाकर हंसिनी के साथ रहता था। वहाँ पर दैवयोग से समुद्र की लहों से बच्चों का विनाश होने से शोक-पीड़ित इसकी हंसिनी ने समुद्र में कूदकर अपने प्राण दे दिये ॥१८२-१८३॥
तब हंसिनी के वियोग से दुःखी इसने पक्षी-जाति से बिरक्त होकर हृदय में संकल्प किवा-॥१८४।॥
कि मैं अगले जन्म में पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाला राजपुत्र बनूँ और यह मेरी सती पत्नी भी पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली राजकुमारी बने'। ऐसा संकल्प करके और मन में शंकर का ध्यान कर इसने भी समुद्र में कूवकर प्राण वे दिये। तदनन्तर वह हंस इस जन्म में कौशाम्बी नगरी में वत्सराज उदयन के यहाँ नरवाहनदत्त नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ और यह पूर्व-जन्म का स्मरण करता है ।। १८५-१८७॥
'यह विद्याधर-राजाओं का चक्रवर्ती सम्राट् होगा- ऐसी दिव्य वाणी उसके उत्पन्न होने पर स्पष्ट रूप से हुई थी ॥१८८॥
क्रमशः युवराज-पद पर अभिषिक्त इसका विवाह पिता ने किसी कारण वश मनुष्य जाति में उत्पन्न दिव्य कन्या मदनमंचुका के नाय करा दिया ॥१८९॥
तदनन्तर हेमप्रभ नामक विद्याधर राज की कन्या रत्नप्रभा ने स्वयं आकर इसका वरण किया है ॥ १९०॥
तो भी यह अपने पूर्वजन्म की प्राणप्यारी पत्नी हंसिनी को याद करके क्षण-भर भी मुख या गान्ति नही प्राप्त करता है। यह बात इसने अपने बालमित्र मुझसे पहले कही यी ॥१०.१॥
तदनंतर, एक बार मेरे साथ जंगल में शिकार खेलते हुए उसे किसी सिद्ध तपस्विनी के दर्शन हुए। वार्तालाप के सिलसिले में तपस्विनी ने कहा कि पुत्र ! तुम कामदेव किसी कर्मवश पूर्वजन्म में हंस के रूप में अवतीर्ण हुए थे और वह तुम्हारी हंसी भी शाप से च्युत कोई दिव्य रमणी थी, जो चन्दन वृक्ष में घोंसला बनाकर तुम्हारे साथ रहती थी ।।१९२-१९४।।
समुद्र की लहरों द्वारा बच्चों के बहा ले जाने पर उनके शोक से हंसिनी ने समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली और उसके शोफ से तुमने भी ऐसा ही किया ॥१९९।।
अतः, शिवजी की कृपा से तुम वत्सराज उदयन के पुत्र हुए और हे पुत्र ! तुम अपने पूर्वजन्म को जाननेवाले जातिस्मर हो ।।१९६।।
वह इंसिनो भी समुद्र के पार कर्पूरसंभव द्वीप में करूंरिका नाम से राजकुमारी के रूप में अवतीर्ण हुई है।॥१९७॥
तो हे पुत्र ! तुम जाओ। वहाँ तुम अपनी प्यारी पूर्वपत्नी को प्राप्त करोगे। - ऐसा कहकर वह सिद्ध तपस्विनी बन्तर्धान हो गई ।।१९८-१९९।।
उसी समय से यह समाचार जानकर हमारा स्वामी यह राजकुमार तुम्हारे स्नेह से सिंचकर अपने जीवन की बाजी लगाकर और सैकड़ों देशों को पार कर समुद्र के किनारे पहुंचा ॥ २००॥
वहाँ पर हेमपुर के राजा शिल्पकार राज्यवर ने यन्त्र से चलनेवाला विमान दिया ॥२०१॥
मूत्तिमान् साहस के समान उस भयंकर विमान पर चढ़कर समुद्र के दुर्गम मार्ग को पार कर हम दोनों यहाँ पहुंचे हैं ।॥ २०२॥
इसीलिए, यह मेरा मालिक तुम्हारे लिए 'हा हंसिनी! हा हंसिनी! इस प्रकार बकता-अकता व्याकुल हो गया है और तुम्हारे पास तक यहाँ जाया है ॥ २३३॥
अब यह तुम्हारे आनन्द-दायक मुख-चन्द्र के दर्शन से असंख्य दुःख-रूपी अन्धकार से इसका छुटकारा हो रहा है। इसलिए, अत्यन्त कष्ट और उत्कण्ठा से आये हुए इस अतिथि को दृष्टिरूपी नील कुमुदों की माला में सत्कृत करो' ॥२०४-२०५।।
राजकुमारी करिका ने भी गोमुख की बनावटी बातों को अपने पूर्वजन्म के घटना-कम से मिलाकर मत्य समझा ॥ २०६॥
और सोचने लगी कि 'जओह! मेरे पति का मुझ पर इतना स्नेह है। इस पर मेरा क्रोध व्ययं ही था। मुझे इससे विरक्तता भी भ्रम के कारण हुई ऐसा सोचकर वह स्नेह से पिथल गई और बोली-॥२०७॥
'वह हंमिनी में ही हूँ। और धन्य हूँ कि मेरे लिए आर्यपुत्र को दो जन्म तक कष्ट उठाना पड़ा। तो अब मैं प्रेम से खरीदी गई आप लोगों की दासी हूँ।' ऐसा कहकर उसने नरवाहनदत्त को स्नान भोजन आदि से सम्मानित किया ॥२०८-२०९॥
तब अपने दास-दासियों के द्वारा यह बात उसने अपने पिता को कहलवा दिया और स्वयं भी पिता के पास गई ॥२१०।।
विवाह की इच्छा प्रकट करती हुई कन्या और उसके योग्य वर नरवाहनदत्त को आया हुआ जानकर तथा उसे विद्याधर-वक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त जानकर राजा ने अपने को धन्य-धन्य माना ।।२११-२१२॥
और, उसने कन्या कर्दूरिका को बड़े आदर के साथ विधिपूर्वक नरवाहनदत्त को दे दिया ॥२१३॥
राजा कर्पूरक ने जामाता को प्रत्येक अग्नि-प्रदक्षिणा के अवसर पर तीन-तीन करोड़ सोना और उतना ही कपूर प्रदान किया ॥ २१४।।
राजा द्वारा दिये गये सोने आदि दहेज के ढेर, ऐसे मालूम होते थे, मानो पार्वती का बिबाह देखने के लिए सुमेरु और कैलाश शिस्तर जाकर बैठे हों ।।२१५॥
इस पर करोड़ों वस्त्र और आभूषणों से लदी हुई तीन सौ दासियाँ राजा कर्पूरक ने यहेज में दीं। तदनन्तर, शरीरधारिणी प्रीति के समान कर्फ्यूरिका से विवाहित नरवाहनदत्त उस नगर में रहने लगा ॥२१६-२१७॥
मावबीलता और वसंत के संयोग के समान उन दोनों का समागम किसके आनन्द के लिए नहीं हुआ?' ॥२१८॥
किमी एक दिन सफलमनोरथ नरवाहनदत्त ने, करेंरिका ने कहा कि 'चलो, कौशाम्बी नगरी को चलें।' तब वह बोली कि 'यदि चलना है, तो उसी आकाशगामी यान से क्यों न चले?' ॥२१९०२२०।।
यदि वह छोटा हो, तो उससे मैं दूसरा बड़ा विमान मंगाती हूँ। यहाँ पर (कर्पूरमंभव द्वीप में) प्राणपर नामका शिल्पी (बढ़ई) यन्त्रवाले विमानों का बनानेवाला रहता है ॥२२१॥
वह किसी दूसरे देश में आया है। तो मैं उसमें दूमरा विमान बनवाती हूँ।' ऐसा कहकर द्वारपाल को बुलाकर उसने प्रबन्धक को विमान बनवाने की आज्ञा प्रदान की-॥२२२॥
कि जाकर प्राणधर नामक शिल्पी से कहो कि हम लोगों के जाने के लिए आकाश में उड़नेवाला विमान बना दो ॥२२३॥
इम प्रकार क्षना¹ को आज्ञा देकर कर्तृरिका ने दासी के मुंह में अपने जाने की बात गजा के लिए कहलवाई ॥२२४॥
यह ममाचार जानकर जैसे ही राजा वहाँ बाता है, नरवाहनदत्त अपने मन में सोचता है ॥२२५।।
यह प्राणवर नामक शिल्ली वही है, जो राज्यघर का भाई है। जो कांची-नरेश के भय से भागा था ॥२२६॥
ऐसा मोचते हो द्वारपाल में निवेदित राजा वहां आया और उसी समय वह प्राणषर शिल्पी भी वहाँ उपस्थित हुआ ।॥ २२७७।
और बोला- 'मैंने एक बड़ा वायुयान बनाकर रखा है, जो अभी एक हजार व्यक्तियों को सहज ही ले जा सकता है।॥ २२८॥
ऐसा कहते हुए शिल्पी प्रागभर का अभिनन्दन करते हुए नरवाहनदत्त ने आदर के साथ उससे पूछा- २२९॥
'क्या तुम राज्यचर के बड़े भाई हो, जो भिन्न-भिन्न प्रकार के महान् यन्त्रों का जानकार है?' ॥२३०॥
'हाँ, मैं वही उसका भाई प्रागधर हूँ। आप हम दोनों को कैसे जानते हैं स्वामी!'-प्राणधर ने नम्र होकर यह कहा ॥२३१॥
तब नरवाहनदत्त ने उसे जिस प्रकार देखा था और राज्यधर ने जैसा कहा था, वह सब प्राणवर को सुना दिया ॥२३२॥
तदनन्तर, प्राणधर द्वारा लाये गये महाविमान पर अपने श्वशुर राजा कर्पूरक से बज्ञा प्राप्त करके नरवाहनदत्त दहेज में प्राप्त दासियाँ, सोना, कपूर के ढेर राजा से प्राप्त प्रतीहार² और विमानचालक (प्रागधर) के साथ बैठा ॥२३३-२३४।।
उसकी साम ने प्रास्थानिक मंगलाचार किया और नरवाहह्मदत्त ने नववधू कर्पूरिका को साथ बिठा लिया। इस प्रकार, अपने मित्र गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने ब्राह्मणों को वस्त्र आदि दान देकर प्रस्थान किया ।॥२३५-२३६॥
और, प्राणधर में कहा कि 'चलो, समुद्र के पूर्वतट पर राज्यधर के समीप तक चले। तब अपने घर की ओर चलेंगे' ।॥२३७॥
तदनन्तर चालक द्वारा चलाये गये उस विमान में वह अपने साथियों और सामान के माथ आकाश में उड़ा और कुछ ही क्षणों में समुद्र के पार बसे हुए राज्यधर के हेमपुर नगर में पहुंचा ।।२३८-२३९॥
नरवाहह्नदल ने, वहाँ पर नमस्कार करते हुए और भाई को देखने से प्रसन तथा दामी-हीन उम राज्यधर का दामियों द्वारा मत्कार किया और आंसू बहाते हुए तथा किमी प्रकार छोटे भाई (राज्यधर) से बिदा लिये हुए प्राणधर के साथ उसी विमान द्वारा नरवाहनदत्त कौशाम्बी पहुँचा ॥२४०-२४१।।
बिना किमी शंका के निर्भय होकर आकाश में उतरते हुए और पत्नी एवं दासियों आदि के साथ आये हुए नरवाहनदत्त को देखकर कौशाम्बी की जनता आश्वयं-चकित हो गई ॥ २४२॥
नागरिकों के उत्साह को देखकर और अपने पुत्र को आया हुआ समझकर उसका पिता वत्सराज, अपनी महारानियों, मन्त्रियों और बहुओं के साथ प्रसन्न होकर उसे लेने के लिये आगे आया ।।२४३॥
विमान पर चढ़ने के कारण विद्याधर-चक्रवर्ती होने की सूचना देते हुए राजा उदयन ने चरणों में मुके वधू-सहित पुत्र नरवाहनदत्त का अभिनन्दन किया ।॥२४४१।
पद्मावती के साथ उसकी माता वासवदत्ता ने पुत्र को लिपटाकर आंसू बहाये। चिरकाल से उसे न देखने के कारण हृदय में बनी हुई दुःखकी गाँठ मानों बह निकली ॥२४५॥
आनन्द से भरी हुई उनकी दोनों पत्नियों-मदनमंचुका और रत्नप्रभा ने उसके प्रेम से ईर्ष्या को छोड़कर उसके चरणों और हृदयों को साथ ही ग्रहण किया ॥२४६।।
तदनन्तर यौगन्धरायण आदि पिता के मन्त्रियों तथा मरुभूति आदि अपने मन्त्रियों को नरवाहनदत्त ने यथायोग्य प्रणाम, नमस्कार आदि से सत्कार-सन्मान किया ।॥२४७॥
अपने उच्च कुल को अपनी परिस्थिति से अलंकृत करनेवाले पति के साथ समुद्र को पार करके आई हुई अमृत की सहोदरा भगिनी के समान और सैकड़ों युवती स्त्रियों से लक्ष्मी के समान घिरी हुई और नश्न भाव से स्थित उस नववधू करिका का वत्सराज आदि ने समुचित अभिनन्दन आदि किया। और, वत्सराज ने उसके साथ आये हुए उसके पिता के प्रतीहार को पुरस्कार आदि से सम्मानित किया। उस प्रतीहार ने भी विमान पर लदे हुए सोना, वस्त्र, कपूर आदि दहेज की मामग्री समधी उदयन को समर्पित की ।। २४८-२५०।।
उदयन ने नरवाहनदत्त द्वारा परिचित कराये गये विमान-निर्माता शिल्पी प्राणधर का भी समुचित सत्कार किया ।।२५१।।
तदनन्तर राजा उदयन ने गोमुख का अभिनन्दन करके पूछा कि 'यह राजकुमारी कैसे प्राप्त हुई और तुम लोग यहां से वहाँ कैसे पहुँचे?' ॥२५२॥
तदनन्तर गोमुख ने, महारानियों और मन्त्रियों के साथ बैठे हुए महाराज उदयन को शिकारवाले वन में भटक जाने और तपस्विनी का दर्शन होने से लेकर राज्यघर के विमान द्वारा द्वीप में पहुँचने, विवाह से विमुख कर्पूरिका को अपनी ओर लाने तथा प्राणबर द्वारा निर्मित विमान से पुनः लौट आने आदि का सारा वृत्तान्त सबको क्रमशः सुना दिया ॥२५३-२५५॥
कहाँ शिकार ! कहाँ वह बूड़ी तपस्विनी कहाँ समुद्र के किनारे वह शिल्पी कारीगर राज्यधर ! कहाँ समुद्र पार करना। समुद्र के पार भी दूसरे विमान-निर्माता का मिलना और फिर उसका पहले स्थान पर बना- यह सब असम्भव और अघटित घटनाएँ है। यह सत्य है कि भाग्यवान् व्यक्ति के कल्याण-कायों को सफल करने के उपाय, दैव स्वयं ही घटित कर देता है।॥ २५६॥
इस प्रकार, इस घटना को सुनकर अत्यन्त आनन्द से सिर हिलाते हुए उन सभी ने, गोमुख की स्वामी-भक्ति की अत्यन्त प्रशंसा की ।। २५७।।
अपनी विद्या के प्रभाव से अपने पति की मार्ग में रक्षा करनेवाली पतिपरायणा रत्नप्रभा की भी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥२५८॥
तदनन्तर बाकाश-यान की थकावट दूर करके नरवाहनदत्त, माता-पित्ता एवं पत्नियों के साथ अपने नगर के भवन में आया ॥२५९।।
घर पर आकर उसने अपने आश्रितों (सेवकों), बन्धुओं तथा मित्रों को जी लोळकर पुरस्कार प्रदान किया और श्वशुर के द्वारपाल तथा विमान चालक प्रागधर को धन, रत्न आदि से भर दिया ।।२६०॥
भोजन करने के बाद प्रणाम करते हुए प्राणघर ने नरवाहनदत्त से निवेदन किया कि 'महाराज ! राजा कर्पूरक ने हम दोनों (मुझे और प्रतीहार) को ऐसी आज्ञा दी है कि मेरी कन्या के उसके पति के घर पहुंच जाने पर तुरन्त लौट आना, जिससे मैं शीघ्र उसे सकुवाल वहाँ पहुंची हुई जान सकूं ।। २६१-२६२॥
इसलिए, हम दोनों को निश्चय ही वहाँ अभी जाना चाहिए। आप हम दोनों को कर्फ्यूरिका से अपने हाय का लिखा हुआ पत्र दिलाइए ॥२६३।।
बिना हस्तलिखित पत्र के कन्या के प्रति स्नेही राजा का हृदय आश्वस्त न होगा। उसे विमान पर बढ़ने के कारण कर्पूरिका के उसमे गिर जाने की शंका बनी होगी ॥ २६४॥
इसलिए, आप पत्र-प्रदानपूर्वक मेरे साथ ही विमान चलाने की प्रतीक्षा करते हुए उस प्रधान प्रतीहार को प्रस्थान करने की आज्ञा प्रदान करें ।। २६५।।
हे युवराज ! मैं तो अपने कुटुम्ब को साथ लेकर फिर यहीं बाऊँगा। मैं आपके इन अमृतमय चरण-कमलों को नहीं छोड़ गा' ।॥ २६६॥
इस प्रकार, प्राणधर के कहने पर नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका को पत्र लिखने को निर्देश किया ॥२६७।।
'पिताजी ! अच्छे पनि के सुत्र को पानेवाली मेरे लिए आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। क्या उत्तमपुरुष (विष्णु) को प्रदान की गई लक्ष्मी के लिए चिन्ता करना योग्य है?' ॥२६८॥
इस प्रकर कर्फ्यूरिका के हस्तलिखित पत्र के देने पर धन-मान आदि से सत्कृत प्राणघर और प्रतीहार को वत्सराजपुत्र नरवाहनदत्त ने बिदा किया ॥२६९॥
आश्चर्य चकित जनता द्वारा देखे गये वे दोनों विमान पर चढ़कर आकाश-मार्ग से समुद्र को पार कर कर्पूरसम्भव द्वीप को पहुंचे। वहाँ पर उन्होंने कन्या को पति-गृह में पहुंचने का समाचार सुनाकर और कर्फ्यूरिका का पत्र देकर राजा कर्पूरक को आनन्दित किया ॥ २७०-२७१॥
दूसरे दिन, प्राणघर पूरक राजा से आज्ञा लेकर, अपने कुटम्ब के साथ, छोटे भाई राज्यघर का सम्मान करता हुआ पुनः नरवाहनदत्त के पास ही आ गया ।॥ २७२॥
नरवाहनदत्त ने भी आये हुए अपने उपकारी प्राणघर को, अपने भवन के समीप ही निवास-स्थान और बड़ी वृत्ति (जीविका) प्रदान की ॥२७३॥
और, अपनी रानियों के साथ उसके बनाये हुए विमानों के द्वारा ब्योम-विहार करता हुजा मानों विद्याधर-चक्रवर्ती होने की शिक्षा प्राप्त करने लगा ॥ २७४।। इस प्रकार, अपने बन्धुबान्धवों एवं मित्रों को आनन्दित करती हुआ नरवाहनदत्त, मदनमंचुका और रत्नप्रभा में तीसरी कर्फ्यूरिका के साथ सुद्धा से दिन बिताने लगा ।।२७५॥
नवम तरंग समाप्त
महाकवि श्रीसोमदेवस्ट्रविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभा लम्बक का रत्नप्रभा नामक सप्तम सम्म समाप्त
1. पार्शवर्ती सेवक ।
2. द्वारपाल
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