5901. || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा; अलंकारवती की कथा; राम और सीता की कथा; राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा; नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह;

5901. || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा; अलंकारवती की कथा; राम और सीता की कथा; राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा; नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह; 

अलंकारवती नामक नवम लम्बक

[ प्रस्तुत प्रारम्भिक श्लोक का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।]

प्रथम तरंग

मंगलाचरण

निशुम्भ दैत्य के भार से झुकी हुई पृथ्वी के ऊपर टेड़े डाँडोल होते हुए पर्वत, मानों जिसके नृत्य करने पर प्रणाम करते हुए-से प्रतीत होते हैं, ऐसे गजानन को हम नमस्कार करते हैं।॥१॥

नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)

वत्सराज उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त, विद्यावर-राजाओं के चरित्रों को सुनता हुआ और उनसे (बकवर्ती होने के पूर्व हो) प्रणाम किया जाता हुआ, पिता के घर में, विलास के दिन, व्यतीत कर रहा था ॥२॥

एक चार राजकुमार, अपनी बड़ी सेना लेकर, मन्त्री गोमुख के साथ, शिकार खेलने के लिए वन में गया। कुछ समय के पश्चात वह सेना को पीछे छोड़कर गोमुख के साथ अकेले ही घने जंगल में चला गया ।॥३॥

वहाँ उसे दाहिनी आँख के फड़कने से किसी शुभ भविष्य की सूबना मिली। कुछ ही समय में उसने दिव्य वीणा-स्वर-मिश्रित संगीत सुना ॥४॥

और, वह उसी स्वर का अनुसरण करता हुआ उसी ओर को चला गया। कुछ दूर जाकर उसने उस जंगल में एक स्वयंभू¹ शिव का मन्दिर देखा, उसे देखकर थोड़े से उतरकर और उसे एक वृक्ष से बाँधकर वह मन्दिर में प्रविष्ट हुआ ॥५॥

मन्दिर के अन्दर उसने अनेक सुन्दरी कन्याबों से घिरी हुई और वीणा बजाकर शिव को स्तुति करती हुई एक दिव्य कन्या को देखा। लावण्य की वर्षा करती हुई उस कन्या ने, देखते ही नरवाहनदत्त को इस प्रकार क्षुब्य कर डाला, जैसे चन्द्रमा समुद्र को उद्वेलित कर देता है ॥६-७।।

सरस और स्नेहपूर्ण आँखों से राजकुमार को देखती हुई वह दिव्यकुमारी भी, स्वर-संचालन को भूलकर उसके प्रेम में मग्न हो गई ।॥८॥

नरवाहनदल के हृदय को जाननेवाले उसके साथी गोमुख ने, उस कन्या की सखियों से 'यह कोन है और किसकी कन्या है, आदि प्रश्न पूछने का जैसे ही विचार किया, इतने में ही तपे हुए स्वर्ण के समान रक्तवर्णवाली एक प्रौढा विद्याघरी आकाश से नीचे उतरी ॥९-१०।।

उतरकर वह उसी दिव्य कन्या के पास जाकर बैठी। तब उस कन्या ने उठकर उसके चरणों में झुककर प्रणाम किया ॥११॥

तब उस प्रौडा विद्यावरी ने आशीर्वाद दिया कि 'तू समस्त विद्याधरों के चक्रवर्ती को निविष्न रूप से पति के रूप में प्राप्त कर' ॥१२॥

तब नरवाहनदत्त भी, उसके पास जाकर और प्रणाम करके आशीर्वाद देतो हुई उस सौम्य विद्याधरी से पूछने लगा ।।१३।।

'माता, यह कन्या, कौन है और तुम्हारी कौन होती है, बताओ।' तब वह विद्याधरी उससे कहने लगी 'सुनो, मैं कहती हूँ ।॥१४॥

अलंकारवती की कथा 

हिमालय पर्वत के ऊपर सुन्दरपुर नाम का एक नगर है। उस नगर में अलंकारशील नाम का विद्याघरों का राजा है।॥१५॥

उदारगुणोंवाले उस राजा की कांचनप्रभा नाम की रानी है। समयानुसार उस रानी से राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६॥

उसके उत्पन्न होने पर पार्वती ने, स्वप्न में उसे यह आदेश दिया कि यह पुत्र अत्यन्त धर्मशील होगा। तभी राजा ने तदनुसार उसका नाम धर्मशील रख दिया ॥१७॥

क्रमशः युवावस्था में पहुँचे हुए उस पुत्र को पिता ने अपनी विद्याएँ पढ़ाकर युवराज-पद पर बैठा दिया ॥ १८॥

युवराज-पद पर रहकर, एकमात्र धर्मपरायण और जितेन्द्रिय उस धर्मशील ने पिता से भी बढ़कर प्रजा को प्रसन्न किया ।॥ १९॥

तदनन्तर, राजा अलंकारशील की महारानी कांचनप्रभा ने गर्भवती होकर एक कन्या को जन्म दिया ॥२०।।

उस कन्या के उत्पन्न होने पर आकाशवाणी हुई कि 'यह कन्या विद्याधर-चक्रवतीं नरवाहनदत्त की पत्नी होगी' ॥२१॥

तदनन्तर पिता ने उसका नाम अलंकारवती रखा और वह क्रमशः चन्द्रकला के समान बढ़ने लगी ॥२२॥

वह कन्या क्रमशः यौवनावस्था को प्राप्त कर, और पिता से विद्याओं को सीखकर, शिवभक्ति के कारण, उन-उन शिव मन्दिरों में भ्रमण करने लगी ॥२३॥

इसी अवसर पर इसके बड़े भाई धर्मशील ने युवा होने पर भी एक बार एकान्त में पिता से इस प्रकार निवेदन किवा ॥२४॥

'हे पिता ! ये क्षण-भंगुर सांसारिक भोग, मुझे प्रसन्न नहीं करते। संसार में वह क्या है, जो अन्त में नौरस नहीं हो जाता ॥२५॥

और, क्या तुमने व्यास मुनि का यह वचन नहीं सुना है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सभी का अन्त विनाश है। और, जितनी उन्नति है, उस सभी का अन्त पतन है ।।२६।।

मभी संयोगों का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है। इसलिए, हे पिता, निश्चित रूप से विनाशवान् इन पदार्थों में मनस्वी विद्वानों को क्या प्रेम ? ॥२७॥

सांगारिक भोग और धन का संग्रह परलोक में सहायक नहीं हो सकते। अर्थात्, ये यहीं नष्ट हो जाते हैं।॥२८॥

इसलिए, में वन में जाकर सर्वोत्तम तप करता हूँ, जिसके द्वारा परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर सकें ।॥२९।।

राजा अलंकारशील, पुत्र धर्मशील कोइस प्रकार कहते हुए सुनकर व्याकुल हो उठा ओर आँवों में आंसू भरकर बोला- ॥३०॥

'पुत्र, इस समय (यौवनकाल) में हो तुम्हें यह क्या बुद्धि-भ्रम हो गया! विद्वान् लोग युवावस्था का उपयोग हो जाने पर ही वैराग्य की कामना करते हैं।॥३१॥

यह समय विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य के पालन करने का है। यह तुम्हारे लिए सांसारिक भोगों के भोगने का समय है, वैराग्य का नहीं' ॥३२॥

पिता के इस प्रकार वचन सुनकर धर्मशील फिर कहने लगा-'भोग और विराग का नियम अवस्था पर निर्भर नहीं है। ईश्वर की कृपा से अनुगृहीत कोई बालक भी विरक्त हो जाता है, किन्तु कोई कुत्सित पुरुष, वृद्ध होने पर भी विरक्त नहीं हो पाता ॥३३-३४१।

राज्य पर मेरा प्रेम नहीं है और न मैं विवाह ही करना चाहता हूँ। शिव की आराधना करके तप करना ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है' ।॥३५॥

ऐसा कहते हुए और विविध प्रयत्नों से भी न मानते हुए पुत्र को पिता ने आंसू बहाते हुए कहा- ।।३६।।

'बेटा, यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है, तो क्या वह मुझ बुद्ध को नहीं होगा ? जतः 'मैं भी वन में जाऊँगा' ।॥ ३७।।

ऐसा कह‌कर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों बौर स्वर्णों के दस हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥

और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आशा से इसी नगर में रहना होगा ॥ ३९॥

यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय बने पर, एक वर्ष पूरा होने पर, क्योंकि 'जाज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके विवाह के शुभ लग्नवाला है- इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए दूंगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा ॥४०-४१॥

ऐसा कहते हुए राजा, रोती हुई पत्नी और पुत्री को शपथ देकर और उन्हें अपने घर लौटाकर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ।॥४२॥

तब वह रानी कांचनप्रभा, अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है, कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ।॥४३॥

तब राजा अलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती, स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई अपनी माता के संग, बहुत से शैव तीथों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥

एक बार उस अलंकारक्ती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत-से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप, पूजन आदि करो। तब तुम विनाविष्न के सब विद्याषरों के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५-४६॥

विद्या के द्वारा ऐसा आदेश श्लिने पर अलंकारवती ने, माता के साथ कश्मीर जाकर अनेक पुण्यतीयों में शिव की पूजा की ॥४७॥

नन्दिक्षेत्र में, महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में, पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने घर लौट आई ॥४८-४९।।

हे सुन्दर, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता कांचनप्रभा ।।५०।।

आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ।॥५१॥

इसी विद्या के द्वारा यह भी जाना कि तुम भी यहाँ बाये हो। बतः, देवता के आदेश से प्राप्त इस कन्या को ग्रहण करी ॥५२॥

इसके पिता का बताया हुआ विवाह-लग्न कल प्रातः काल है। मतः, आज तुम अपनी कौशाम्बी नगरी को जाओ और हम दोनों भी यहाँ से जाती हैं। प्रातःकाल इसके पिता बलंकार-शील, तपोवन से आकर, इस कन्या को स्वयं तुम्हें देंगे ॥५३-५४।॥

कांचनप्रभा के इस प्रकार कहने पर, उस अलंकारवती और नरवाहनदत्त-दोनों की अवस्था अवर्णनीथ हो गई ॥५५॥

वे दोनों चकवा-चकवी के समान परस्पर एक रात्रि का वियोग-दुःख भी सहन करने में असमर्थ हो रहे थे। अतः, सायंकाल के समय, उन दोनों की आँखों में, आँसू ये ॥५६॥

उन दोनों को इस प्रकार आतुर देखकर कांचनप्रभा ने कहा- 'एक रात्रि के ही वियोग में तुम दोनों को इतना अधैर्य क्यों हो रहा है? ॥५७॥

धैर्यशाली व्यक्ति, अनिश्चित अवधि तक चिरकालीन विरह का सहन करते हैं। इस सम्बन्ध में रामभद्र और सीतादेवी की कथा सुनो ॥५८॥

राम और सीता की कथा

प्राचीन समय में अयोध्या-नरेण दशरथ के पुत्र, राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुम्न-इन चारों भाइयों में राम, सबसे बड़ा था। वह रावण का विनाश करने के लिए विष्णु के अंवा से उत्पन्न हुआ था। जनक राजा की सीता नाम की पुत्री उसकी प्राणप्यारी पत्नी थी ॥५९-६०॥

दैवयोग से भरत को राज्य देकर पिता ने राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन मेज दिया ।।६१॥

वहाँ वन में रावण ने कपट करके उसको प्राणप्यारी सीता का हरण कर लिया और मार्ग में जटायु का वध करके वह उसे लंका को ले गया ॥६२॥

तब वियोगी राम ने वाली को मारकर और सुत्रीच से मित्रता की और हनुमान् को लंका भेजकर उसका समाचार प्राप्त किया ॥६३॥

तदनन्तर, राम ने समुद्र-तट पर जाकर, उसमें पुल बाँधकर रावण को मारा और लंका का राज्य विभीषण को देकर सीता को प्राप्त किया ॥६४।।

लंका से लौटने के पश्चात् भरत द्वारा सौंपे गये राज्य का पालन करते हुए राम की पत्नी सीता ने गर्भ धारण किया ॥६५॥

उस अवसर पर प्रजा का समाचार जानने के लिए गुप्त रूप से अयोध्या में भ्रमण करते हुए राम ने एक पुरुष को देला ।।६६।।

जो अपनी पत्नी को हाथ से सींचकर बाहर निकाल रहा था और बह उसका यह दोष घोषित कर रहा था कि उसकी स्त्री दूसरे व्यक्ति के घर पर जाकर रही ।॥६७॥

राजा राम ने, उस स्त्री को यह कहते हुए सुनकर अत्यन्त खेद और लज्जा का अनुभव किया कि 'राक्षस के घर में रही हुई सीता को रामचन्द्र ने नहीं छोड़ा। यह मेरा पति उससे भी बड़ा है, जो अपने ही बन्धु के घर में रही हुई मुझे त्याग रहा है, ॥६८-६९।।

इस प्रकार, लोक-निन्दा के भय से राम ने सीता को वन में छोड़ दिया। सच है, यशस्वी व्यक्ति विरह-क्लेश का सहन करते हैं, किन्तु निन्दा का सहन नहीं करते ॥७०॥

गर्भ के कारण लिन सोता, वन से वाल्मीकि के आश्रम में पहुंची और उस ऋषि ने, उसे बाश्वासन देकर वहीं ठहराया ॥७१॥

'सीता अवश्य दुष्टा है, अन्यथा उसका पति उसे क्यों छोड़ देता? तो, प्रतिदिन उसका दर्शन करने से लोगों को पाप चढ़ता है। वाल्मीकि तो दया के कारण उसे आश्रम से नहीं निकालते और उसके दर्शन से होनेवाले पाप को तप से नष्ट करते हैं। तो चलो, किसी दूसरे आश्रम को चलें' वाल्मीकि के आश्रम में रहनेवाले दूसरे मुनि इस प्रकार चर्चा करने लगे ।। ७२-७४।।

दूसरे मुनियों के इन विचारों को सुनकर वाल्मीकि ने उनसे कहा 'इसमें सन्देह नहीं कि यह सीता चरित्र से शुद्ध है। हे मुनियो, मैंने ध्यान से इसे देख लिया है।' फिर भी, जब उन मुनियों को अविश्वास रहा, तब सीता ने कहा- 'जाप लोग जैसा समझे उस प्रकार मेरी शुद्धि की आँच करें। यदि में अशुद्ध होऊँ, तो मेरा शिर काटकर मुझे दंड हैं।' यह सुनकर सभी दयालु मुनि कहने लगे। 'यहाँ बोर बन में टीटिभ सर नाम का तीर्थ है। प्राचीन समय में किसी टिटिहरी को उसके (नर) टिटिहरे ने दूसरे टिटिहरों के संगम का मिथ्या दोष लगाया था।।७५- ७८।।

इस कलंक के कारण दुःखित शरणहीन एवं अनाथा टिटिही पृथ्वी और लोकपालों को दुहाई देकर विलाप करने लगी। तब उन्होंने उसकी शुद्धि के लिए उस सरोवर की रचना की ॥७९॥

उसी सरोवर में राम की यह पत्नी अपनी निष्कलंकता का हमें प्रमाण दें। इस प्रकार कहते हुए उन मुनियों के साथ सीता टोटिन-सर में गई ॥८०॥

'यदि आर्यपुत्र राम के सिवा स्वप्न में भी मेरा मन पर-पुरुष की बोर न गया हो, तो है वसुन्धरे ! मैं इस तालाब के पार हो जाऊँ ॥८१॥

ऐसा कहकर उस सरोवर में प्रविष्ट उस सती सीता को माता पृथ्वी ने गोद में उठाकर उस पार कर दिया ।॥८२॥

इस घटना से विश्वस्त समस्त महामुनियों ने उस महापतिव्रता को प्रणाम किया और वे उसका त्याग करने के कारण क्रोध से राम को शाप देने के लिए तैयार हो गये ॥८३॥

तब सती सीता ने कहा- 'आप लोगों को मेरे पति रामचन्द्र का अशुभ न सोचना चाहिए। आप लोग मुझे ही शाप दे सकते हैं। मैं आप लोगों को हाथ जोड़ती हूँ' ।॥८४॥

इस प्रकार, जब सीता ने उन मुनियों को शाप देने से रोका, तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे पुत्र होने का आशीर्वाद दिया ॥८५॥

तदनन्तर, आधम में रहती हुई सीता ने वहाँ पुत्र-प्रसव किया। मुनि वाल्मीकि ने उसका नाम लव रखा ॥८६॥

एक बार बालक को साथ लेकर वह सीता स्नान करने चली गई। इस कारण उसकी पर्णकुटी को खाली देखकर मुनि वाल्मीकि ने सोचा कि वह (सीता) बालक को सदा यहाँ रखकर ही स्नान करने जाती थी, तो अवश्य हो किसी हिंस्रक जन्तु ने बालक को मार खाया होगा। अतः, में दूसरे बालक का निर्माण करता हूँ १८७-८८॥

नहीं तो नहाकर आई सीता अवश्य ही प्राण त्याग कर देगी। यह सोचकर मुनि ने कुश की पवित्री बनाकर बालक की रचना कर दी ॥८९॥

और लव के समान ही उसे बनाकर उसके स्थान पर रख दिया। तदनन्तर, स्नान से लौट कर आई हुई सीता ने उस बालक को देखकर मुनि से कहा- ॥९०॥

'हे मुने, मेरा बालक तो यह है, फिर यह दूसरा बालक कैसा है?' यह सुनकर मुनि ने सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया और कहा- हे पवित्र सीते, यह भवितव्य की बात है। अब इस दूसरे बालक को भी ग्रहण कर लो। इसका नाम कुश है; क्योंकि मैंने अपने प्रभाव से इसे कुशों द्वारा निर्मित किया है ॥९१-९२॥

मुनि द्वारा इस प्रकार कही गई सीता ने मुनि द्वारा ही संस्कार किये गये उन दोनों बालकों का पालन-पोषण किया ।॥९३॥

उन दोनों क्षत्रियकुमारों ने बालकपन में ही मुनि वाल्मीकि की कृपा से सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों और विद्याओं को भली भाँति सीख लिया ।।९४।।

एक बार उन दोनों बालकों ने, आश्रम के एक मूग को मारकर उसका मांस खा डाला और मुनि बाल्मीकि के पूजन करने के शिवलिग को खिलौना बनाकर खेल डाला ॥९५॥

इस कारण मुनि लित्र हुए, तो सीतादेवी ने उनसे क्षमा-प्रार्थना की। तब मुनि ने उन दोनों के लिए इस प्रकार प्रायश्चित्त की आज्ञा दी ।॥९६॥

'यह लव, कुबेर के सरोवर में आकर सोने के कमल के बावे और उसके उद्यान से मंदार के पुष्प। उनसे ये दोनों भाई इस शिवलिंग की पूजा करें तो इस पाप की शान्ति होगी' ।॥९७-९८॥

यह सुनते ही उस बालक लव ने, कुबेर के सरोवर और उद्यान पर धावा बोल दिया और उसके रक्षक यक्षों को मारकर कमल और मंदार-पुष्प प्राप्त किये। उन्हें लेकर लौटते समय मार्ग में थान्त होने के कारण उसने एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया ॥९९-१००।।

इसी बीच राम के नरमेध यज्ञ में किसी अच्छे लक्षणोंवाले पुरुष को ढूंढता हुआ लक्ष्मण उधर आ निकला ॥१०१।।

वह (लक्ष्मण) युद्ध के लिए ललकारे हुए लव को सम्मोहनास्त्र से मोहित करके, क्षात्र-धर्म के अनुसार उसे बाँधकर अयोध्या नगरी को ले गया ।॥१०२॥

उधर लव के आने में विलम्ब होने पर दुःखित सीता को धैर्य देकर ज्ञानी वाल्मीकि ने अपने आश्रम में कुश से कहा-॥१०३॥

'पुत्र! लव को लक्ष्मण पकड़कर अयोध्या ले गया है। तू ज और इन दिव्य अस्त्रों से उसको जीतकर और लब को छुड़ाकर ले आ' ॥१०४।।

मुनि के ऐसा कहने पर दिव्य अस्त्रों से मुक्त कुश, अयोध्या गया और युद्ध करते हुए उसने यज्ञभूमि को घेर लिया ॥१०५॥

और युद्ध करने के लिए आये हुए लक्ष्मण को उसने दिव्य महान् अस्त्रों से जीत लिया। तब राम ने उस पर आक्रमण किया; किन्तु वाल्मीकि मुनि के प्रभाव से राम भी उसे अपने अस्त्रों से जीत न सके । तब राम ने कुण से पूछा 'तुम कौन हो ?' ॥१०६-१०७॥

तब कुश ने कहा-'लक्ष्मण ने मेरे बड़े भाई लब को बाँध लिया है, उसे यहाँ लागो। मैं उसे छुड़ाने के लिए ही यहाँ बाया हूँ ॥१०८॥

हम लव और कुवा दोनों राम के पुत्र हैं। ऐसा माता जानकी कहती हैं।' इतना कहकर फिर उसने अपना समाचार कहा ॥१०९॥

तब रोते हुए राम ने लव को वहाँ बुलाकर उन दोनों को गले लगाया और कहा कि वह पानी राम मैं ही हूँ। (तुम दोनों जिसके पुत्र हो) ॥११०॥

तदनन्तर एकत्र नगर-निवात्तियों के सोता को प्रशंसा करने पर राम ने उन दोनों पुत्रों को स्वीकार किया ॥१११॥

तब सीतादेवी को वाल्मीकि के आश्रम से बुलाकर और पुत्रों को राज्य का भार सौंप कर राम सुखपूर्वक रहने लगे ॥११२१॥

इस प्रकार, चैरंशाली महापुरुष, इतने भीषण विरहों का भी सहन करते हैं। पुत्रो, तुम दोनों एक रात्रि का विरह भी सहन नहीं कर पा रहे हो ॥ ११३॥

इस प्रकार, विवाह के लिए उत्सुक पुत्री अरुंकारवती और नरवाहनदत्त से कांचन-प्रभा ने कहा ॥११४॥

ऐसा कहकर और कन्या को साथ लेकर कांचनत्रमा, प्रात काल आने के लिए आकाश-मार्ग में उड़कर चली गई और दुःखी चित्त नरवाहनदत्त भी कौशाम्बी लौट आया ॥११५॥

कोजाम्बी में रात्रि को निद्राहीन नरवाहनदत्त का मनोरंजन करते हुए गोमुख ने कहा-'महाराज, मैं तुन्हें धीरूप राजा को कथा सुनाता हूँ, सुनो'- ॥११६॥

राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा

दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठान नाम का एक नगर है। वहाँ पृथ्वीरूप नाम का अत्यन्त रूपवान् राजा था ।॥११७॥

किती ममय उसके समीप दो जानी श्रमण (जैन भिक्षु) आये और राजा के आश्चर्यकारी सुन्दर रूप को देखकर बोले-॥११८॥

'राजन्, हम दोनों सारे भू-मंडल में घूमे, किन्तु हे प्रभु, तुम्हारे जैसा रूपवान् पुरुष या स्त्री, कहीं भी हमने नहीं देखा ॥११९।।

किन्तु, मुक्तिपुर द्वीप में राजा रूपघर की पत्नी हेमलता देवी में उत्पन्न रूपलता नाम की कन्या है ॥१२०॥

वही एक तुम्हारे योग्य है और तुम्हीं एक उसके योग्य हो। यदि तुम दोनों का विवाह हो जाय, तो बहुत अच्छा हो ॥ १२१॥

इस प्रकार बमणों की बातों को सुनकर कामदेव के बाण राजा के कानों द्वारा घुसकर उसके हृदय में जा लगे ॥१२२॥

तब उत्कंठित राजा पृथ्वीरूप ने, कुमारिदत्त नामक अपने कुशल चित्रकार को आज्ञा दी ॥ १२३॥

'हे चित्रकार, एक कपड़े पर मेरा चित्र बनाकर और उसे लेकर इन श्रमणों के साथ मुक्तिपुर द्वीप में जाओ ।।१२४॥

वहाँ राजा रूपधर को कन्या हालता को किसी युक्ति से मेरा चित्र दिलानो ॥१२५॥

और, यह देखो कि वह रूावर मेरा चित्र देखकर अपनो उस कन्या को मुझे देता है या नहीं और रूपलता का भी चित्र बनाकर मुझे लाकर दिखाओ' ॥ १२६॥

ऐसा कहकर और चित्रपट पर अपना चित्र लिखवाकर राजा ने, चित्रकार को श्रमणों के साथ मुक्तिपुर नामक द्वीप में भेज दिया ॥१२७७॥

वे चित्रकार और चमण चलते-चलते क्रमशः समुद्र तट पर पत्रपुर नामक नगर में पहुँचे ॥१२८॥

वहाँ से वे जलधान (जहाज) में बैठकर पाँचवें दिन मुक्तिपुर पहुंचे ॥ १२९॥

वहाँ जाकर उस चित्रकार ने राजद्वार पर उस चित्रपट को लटकाकर यह घोषणा की कि मेरे समान कोई दूसरा चित्रकार नहीं है।॥ १३०॥

यह जानकर राजा रूपवर ने उसे बुलवाया और उसने राजमवन में जाकर राजा को प्रणाम कर निवेदन किया ।।१३१॥

'देव, मैंने सारे भूमंडल में घूमकर भी अपने समान चित्रकार नहीं देखा। अतः, आप आज्ञा दें कि देवों, चैत्यों और मनुष्यों में किसका चित्र बनाऊँ?' ॥१३२॥

यह सुनकर राजा ने अपनी कन्या रूपलता को उसके सामने लाकर कहा कि 'मेरी इस कन्या का चित्र बनाकर दिखाओ' ।।१३३॥

तब उस कुमारिदत्त चित्रकार ने, कपड़े पर रूपलता का चित्र बनाकर उसे वास्तविक रूप में दिखावा ॥१३४।।

तब राजा रूपषर ने, प्रसन होकर और उसे कला-कुशल जानकर जामाता की इच्छा से उस चित्रकार से पूछा-॥१३५॥

'भत्र, तुमने सारी पृथ्वी का भ्रमण किया, अतः यह बताओ कि कहीं पर मेरी कन्या के समान रूप में सुन्दर स्त्री या पुरुष है या नहीं?' ॥१३६॥

राजा के इस प्रकार कहने पर चित्रकार ने उससे कहा- 'मैंने इसके समान स्त्री या पुरुष नहीं देता। हाँ, प्रतिष्ठानपुर नगर का राजा पृथ्वीरूप इसके समान रूपवान् देखा गया है। यदि उसके साथ इसका सम्बन्ध बने, तो उपयुक्त हो ॥१३७-१३८॥

उत्स राजा को अपने समान सुन्दरी कन्या नहीं मिली, इसीलिए उसने अभी तक विवाह ही नहीं किया ॥१३९॥

महाराज, मैंने तो नयनों के प्यारे उस राजा को देखकर ही उसके सौन्दर्य के कौतूहल से पट पर उसका चित्र भी बना दिया है, ।॥ १४०॥

उसके इस प्रकार कहने पर राजा ने पूछा कि 'क्या उसका चित्रपट, तुम्हारे पास है? ऐगा कहकर राजा को वह चित्र दिखा दिया ॥१४१॥ उत्तर में चित्रकार ने 'है'

उस चित्रपट पर अपना शिर हिलावा ॥१४२॥ राजा पृथ्वीरूप का रूप देखकर राजा रुपघर ने आश्चर्य के साथ

और प्रसन्न होकर वह बोला- 'हम धन्य हैं। जिन्होंने वस्त्र पर लिले राजा के इस रूप को देया और जो लोग इसे प्रत्यक्ष देखते हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं' ।॥१४३।।

गिता के ऐसे वचन सुनकर और चित्र में राजा को देखकर उत्कंठित रूपलता ने और कुछ देखा न सुना ॥१४४।

तदनन्तर, अपनी कन्या को काम मोहित देखकर राजा रूपघर ने उस चित्रकार से कहा- ॥१४५॥

'यदि तुम्हारे चित्रपट में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है, तो राजा पृथ्वीरूप, इस कन्या के अनुरूप पति है। इसलिए, मेरी इस कन्या के चित्रपट को ले जाकर उन्हें दिखा दां ।।१४६--१४७७॥

और, वह सत्र समाचार सुनकर वदि, उचित समझे, तो मेरी कन्या का परिणय करने के लिए नीघ्र ही यहां आवे ॥१४८॥

इतना कहकर और चित्रकार का धन से सत्कार करके राजा रूपधर ने भिक्षुओं के साथ उसे विदा किया और अपने एक दूत को भी उसके साथ भेजा ॥१४९।।

कुछ ही दिनों में, वे चित्रकार, भिक्षु और दूत समुद्र को पारकर प्रतिष्ठान नगर में राजा पृथ्वीरूप के पास पहुंचे ।।१५०।।

वहाँ पहुंचकर उन्होंने राजा पृथ्वीरूप को, राजा रूपघर के भेजे हुए उपहार आदि देकर, मुक्तिपुर का सब समाचार और राजा रूपघर का सन्देश सुनाया ॥१५१॥

और, उस चित्रकार कुमारिदत्त ने, चित्रपट पर लिखा रूपलता का चित्र भी राजा पृथ्वीरूप को दिखा दिया ॥१५२॥

लावण्य की रारिता-सरीखी उस रुपलता के शरीर को चित्र में देखता हुआ राजा इस प्रकार नग्न हो गया कि वह वहां से अप दृष्टि हटा नहीं सका ॥१५३॥

सौन्दर्य-सुधामयी उस रूपलता को नेत्रों से पान करता हुआ राजा पृथ्वीरूप उसी प्रकार अतृप्त रहा, जैसे अधिकाधिक चन्द्रिका का पान कर लेने पर भी चकोर अतृप्त ही रह जाता है ।॥१५४।।

और वह चित्रकार से बोला 'मित्र, इसे बनानेवाले ब्रह्मा और इसे चित्र में उल्लेख करनेवाले तुम दोनों के हाथ वन्दनीय हैं; जिसने इस रूप का निर्माण किया और जिसने इसे चित्रपट पर चित्रित किया ॥१५५॥

अतः, मैं रूरवर राजा की बात को स्वीकार करता हूँ। मुक्तिपुर द्वीप को जाकर उसकी कन्या को विवाहित करता हूँ ।॥१५६॥

इतना कहकर भिक्षु तथा दूत को बन आदि से पुरस्कृत करके वह चित्रपट में रूपलता को देखता हुआ बैठा रहा ॥१५७॥

और, अपने उद्यानों में भ्रमण करके उस विरही राजा ने, उस दिन को, किसी प्रकार व्यतीत किया। तदनन्तर, लग्न आदि का निश्चय कराकर दूसरे ही दिन राजा ने बरात-सहित मुक्ति-पुर द्वीन की ओर प्रस्थान किया ॥१५८॥

राजा को बरात में, हाथी, घोड़े, सामन्त, राजा, राजकुमार, राजा रूपधर का चित्रकार और वे दोनों भिक्षु आदि सभी सम्मिलित थे ॥१५९॥

राजा स्वयं मंगलवट नामक हाथी पर बढ़कर क्रमशः जाता हुआ कुछ दिनों में विन्ध्या-रण्य के द्वार पर जाकर ठहर गया ।।१६०।।

दूसरे दिन, वह राजा पृथ्वीरूप शत्रुमर्दन नामक हाथी पर सवार होकर विन्ध्य के घोर जंगलों में प्रविष्ट हुआ ॥१६१॥

जब वह कुछ हो दूर गवा था, तब उसने अपनी सेना को सहसा वापस भागते हुए देवा ॥१६२॥

'यह कथा है-ऐसा घबराकर सोचते हुए राजा पृथ्वीरूप के समीप आकर हाथी पर चड़े हुए निर्भय नामक राजपुत्र ने कहा-'महाराज, बागे भीलों की बड़ी सेना है। उन भीलों ने हमारे पचास हाबी मार डाले और एक हजार पैदल सिपाही जौर तीन सौ भोड़े भी उन्होंने मार बाले। इसी प्रकार, हमारे सैनिकों ने भी दो हजार भील मार दिये ॥ १६३-१६५।।

यदि हमारी सेना में एक शव देखा जाता था तो उनकी सेना में दो। तब उनके बाण-वज्रों से मारे जाते हुए हमारे सैनिक वहाँ से भाग आये ।।१६६॥

यह सुनकर क्रुद्ध राजा पृथ्वीरूप तुरन्त दौड़ पड़ा और भीलों की सेना का इस प्रकार नाश करने लगा, जिस प्रकार कौरवों की सेना का संहार, अर्जुन ने किया था ॥१६७७

निर्भय नादि राजकुमारों द्वारा बनेक भीलों के काट दिये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने, एक भाले से भीलों के सरदार का शिर काट दिया ॥ १६८॥

बाणों के घावों से गिरते हुए रक्त की धारा से रंजित राजा का हाथी शत्रुमर्दन, गेरू के झरनोंवाले अंजन पर्वत का अनुकरण कर रहा या ।॥१६९।।

विजयी होकर राजा के लौटने पर उसकी समस्त सेना बकर वहाँ एकत्र हुई और मरने से बची हुई भीलों की सेना के सिपाही इधर-उधर भाग गये ॥१७०॥

तदनन्तर, पुद्ध समाप्त करके लौटे हुए राजा पृथ्वीरूप के पराक्रम की प्रशंसा रूपधर के दूत ने की। विजयी राजा ने, चावल सेना की विधान्ति के लिए, उसी नभूमि में एक तालाब के किनारे अपना शिविर लगा दिया ॥ १७१-१७२।।

इस प्रकार, क्रमशः यात्रा करता हुआ राजा समुद्र-तट पर पत्रपुर नगर में जा पहुंचा ।।१७३।।

पत्रपुर के राजा उदारचरित द्वारा समुचित सत्कार किये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक रात उसी नगर में विश्राम किया ॥ १७४।।

और प्रातःकाल, उसी राजा द्वारा मंगाये गये जहाजों और नावों पर सवार होकर बाठ दिनों में, समुद्र के मार्ग से मुक्तिपुर द्वीप में, बरात के साथ राजा पृथ्वीरूप जा पहुंचा ।।१७५।।

उसके आगमन की सूचना पाकर प्रसन्नचित्त राजा रूपघर, बरात की अगवानी के लिए आया और वे दोनों राजा परस्पर गले मिले ॥ १७६॥

तब राजा रूपवर के साथ राजा पृथ्वीरूप, उस द्वीप की राजधानी में जाकर उसके अनुरूप स्वागत-सत्कार करती हुई नागरिक स्त्रियों से मानों वह नेत्रों द्वारा पिया जा रहा था। राजभवन में पहुंचने पर राजा रूपवर और रानी हेमलता ने अपनी कन्या के अनुरूप जामाता को देखकर अत्यन्त मानन्द का अनुभव किया ॥१७७-१७८।।

तदनन्तर, राजा रूपघर ने, अपनी सम्पत्ति के अनुसार समुचित वातिथ्य-सत्कार द्वारा सत्कृत राजा पृथ्वीरूप को वहीं ठहराया ॥ १७९।।

दूसरे दिन, वेदी में बैठकर, शुभ लग्न में, राजा पृथ्वीरूप ने, चिरकाल से उत्कंठिता रूपलता का पाणिग्रहण किया ॥१८०॥

परस्पर सौन्दर्य-पान करने के कौतूहल से उन दोनों की आँखें मानों कानों से यह कहने के लिए उनके पास तक चली गई थीं कि जैसा ही तुमने सुना था, वैसा ही हमने देखा ॥१८१॥

राजा रूपघर ने, लाजा-हवन के प्रत्येक जवसर पर इतने रत्न, उन वर-वधू को दिये कि दर्शकों ने उसे सचमुच रत्नाकर समझा ॥१८२॥

कन्या का विवाह समाप्त होने पर, उस राजा रूपवर ने, चित्रकार कुमारिदत्स, जैन भिक्षुबों तथा अन्यान्य सम्भ्रान्त व्यक्तियों का धन आदि से समुचित सत्कार किया ॥१८श

तदनन्तर उस नगर में रहते हुए राजा पृथ्वीरूप ने, अपने साथियों के साथ उस द्वीप के अनुसार भोजन-पान आदि स्वीकार किया ॥ १८४॥

नाच-गान में, दिन व्यतीत करके राजा पृथ्वीरूप, रात को उत्कंठा के साथ रूपलता के शयन-भवन में गया ।॥१८५।।

उस शवनागार में रत्नों से जड़ा हुआ पलंग बिछा था। शयनागर की भूमि भी रत्नों से जड़ी हुई थी। भवन के मध्य में रत्नों से जड़े हुए खम्भे बमक रहे थे और भवन, रत्नों के दीपों से जगमगा रहा था ॥१८६॥

उस शवनागार में वह युवा राजा पृथ्वीरूप, उस रूपलता के साथ चिरकाल की उत्कंठा के कारण दूने और चौगुने उत्साह तथा प्रेम से आनन्द-सग्न हो गया ॥ १८७७॥

आनन्द-विलास से थककर सोया हुआ राजा पृथ्वीरूप, प्रातःकाल गाते हुए बन्दियों द्वारा जगाया गया ऐसा शोभित हो रहा था, जैसा कि स्वर्ग में इन्द्र ॥ १८८॥

इस प्रकार, श्वशुर साधर द्वारा प्रस्तुत किये गये नाना प्रकार के भोगों का आनन्द लेता हुआ दृथ्वीरूप, दस दिनों तक उस द्वीप में रहा ।॥१८९॥

ग्यारहवें दिन, ज्योतिषियों के कवनानुसार रूपलता के साथ राजा पृथ्वीरूप मंगला-चरण करके वहाँ से चला ॥१९०॥

समुद्र के तट तक श्वशुर राजा रूपधर द्वारा पहुंचाया गया राजा पृथ्वीरूप, जलयान पर सवार हुआ और उसके साथी भी अन्यान्य जलयानों पर उसके साथ सवार हुए। आठ दिनों तक निरन्तर समुद्र-यात्रा करने के पश्चात् उनके जलयान, समुद्र के तीर पर पहुंचे, जहाँ राजा की सेना अगवानी के लिए उसको प्रतीक्षा में खड़ी थी। पत्रपुर का राजा उदारचरित भी वहाँ स्वागत के लिए खड़ा था।। १९१-१९२॥

पत्रपुर के राजा द्वारा कुछ दिनों तक आतिथ्य प्राप्त कर विश्राम कर लेने के पश्चात् राजा पृथ्वीरूप वहाँ से चला ॥ १९३॥

वह जयमंगल नामक हाथी पर रूपलता को बैठाकर और कल्याणगिरि नामक हाथी पर स्वयं बैठकर वहाँ से चला ॥१९४।।

इस प्रकार, निरन्तर यात्रा करता हूँबा राजा, क्रमशः तोरणों और ध्वजाओं से सजाये हुए अपने प्रतिष्ठान नगर में पहुँचा ॥१९५॥

उस नगर में, रूपलता के सौन्दर्य को देखती हुई नामरिक रमणियों ने, अपने रूप का गर्व त्याग दिया ॥१९६।।

तदनन्तर, राजा पृथ्वीरून ने राजधानी में प्रवेश करके अपने विवाह का उत्सव किया और चित्रकार को गाँव और जागीरें पुरस्कार में देकर तथा धन आदि से उसे सन्तुष्ट किया ।। १९७।।

उन दोनों भिक्षुओं को भी समुचित रूप से धन देकर उसने सत्कृत किया। इसी प्रकार सामन्तों, मन्त्रियों तथा अन्यान्य सम्बन्धित राजपूतों का भी उसने यथोचित सत्कार किया ॥१९८॥...

इन कार्यों से निवृत्त होकर राजा पृथ्वीरूप, अपनी पत्नी रूपलता के साथ सांसारिक सुख-भोग करने लगा ॥१९९॥

मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा सुनाकर अपनी ओर देखते हुए नरवाहनदत्त की ओर देख-कर फिर उससे बोला- ॥२००।।

'महाराज, धीर लोग, इस प्रकार कष्ट के साथ विरह को चिरकाल तक सहन करते हैं और तुम एक रात्रि का भी वियोग सहन नहीं कर सकते ॥२०१।।

प्रातःकाल ही, तुम अलंकारवती को विवाहित करोगे।' गोमुख के इस प्रकार कहने पर उसी समय आया हुआ यौगन्धरायण का पुत्र मरुभूति बोला-गोमुख ! काम-पीड़ा से बनभिज्ञ एवं शान्तचित्त तुम यह क्या कह रहे हो ॥२०२-२०३॥

मानव, धीरज, विवेक, चरित्र आदि को तभी तक धारण करता है, जब-तक वह कामदेव के बाणों का लक्ष्य नहीं बन जाता ॥२०४।।

सरस्वती, स्कन्द और जिन ये तीन ही संसार में बधन्य हैं, जिन्होंने काम को वस्त्र के कोने में चिपके हुए कोट के समान फटकार दिया ॥ २०५॥

मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और गोमुख को घवराया हुआ देखकर नरवाहह्नवत्त ने उसका पक्ष लेते हुए कहा-'मेरे मन का विनोद करने के लिए गोमुख ने ठीक ही कहा; क्योंकि स्नेही व्यक्ति विरह के दुःख में क्या धन्यवाद देता है ? ॥२०६-२०७७॥

आत्मीय जनों को वियोगावस्था में अपने व्यक्ति को धीरज ही देना चाहिए। उसके आगे भगवान् कामदेव ही जानें ॥२०८।।

इस प्रकार की बातें और अपने साथियों से विविध प्रकार की चर्चाएं करते हुए नरवाहन दत्त ने वह रात्रि किसी प्रकार व्यतीत की ॥ २०९॥

नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह

रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् प्रातः काल उठकर और प्रातःकालीन आवश्यक क्रियाओं को समाप्त करके नरवाहनदत्त ने आकाश से उतरती हुई कांचनप्रभा विद्याषरी को देखा ॥२१०।।

वह अपने पति अलंकारशील, पुत्र धर्मशील और कन्या अलंकारवती के साथ थी ।॥ २११॥

वे सब उतरकर नरवाहनदत्त के समीप आये और उसने उनका यथोचित आदर-सत्कार किया ॥२१२॥

इतने में ही सोने और रत्नों के भार उठाए हुए हजारों दूसरे विद्याधर भी बाकाश से उतरे ॥२१३॥

यह सब समाचार जानकर राजा उदयन, मन्त्रियों और महारानियों के साथ, वहाँ आया और पुत्र की उन्नति से अत्यन्त हपित हुआा ॥२१४।।

वत्सेश्वर द्वारा यथोचित आतिथ्य सत्कार आदि करने पर स्नेह से झुके हुए राजा अलंकारशील ने वत्सराज उदयन से कहा ॥२१५॥

'हे राजन्, यह अलंकारवती नाम की मेरी कन्या है। जिसके उत्पन्न होते ही आकाश-वाणी ने आदेश दिया था कि 'यह तुम्हारे पुत्र और विद्याधरों के भावी चक्रवतीं नरवाहनदत्त की पत्नी बनेगी ॥२१६-२१७।।

अतः, मैं इसे नरवाहनदत्त के लिए देता हूँ। आज इन दोनों (वर-वधू) का शुभ लग्न है। इसलिए, में अपने परिवार के साथ यहाँ आया हूँ ॥२१८॥

वत्सेश्वर उदयन ने विद्याधरों के राजा अलंकारशील की इन बातों को सुनकर 'यह आपको बड़ी कृपा है', ऐसा कहते हुए उनकी बातों का अभिनन्दन किया ॥२१९॥

तदनन्तर, अपनी विद्या के प्रभाव से उत्पन किये जल से उस विद्यावर राज ने, आंगन की भूमि को सींचा और वहाँ पर दिव्य वस्त्र से ढकी हुई सोने की वेदी निकल आई। और वह आँगन, विविध प्रकार के रत्नों से जड़ा हुआ एक (स्वाभाविक) कौतुकागार-सा बन गया ।१२२०-२२१॥

तब राजा अलंकारशील ने नरवाहनदत्त से कहा 'उठो, लग्न का समय हो गया।" तदनन्तर स्नान किये हुए तथा मंगलमय विवाह-वेष धारण किये हुए नरवाह्नदत्त को बेदी में लाकर, प्रसन्न अलंकारशील ने, अपनी कन्या उसे प्रदान की ॥२२२-२२३॥

लाजा-हवन के समय पुत्र-सहित अलंकारशील ने अलंकारवती के साथ मणि, रत्न, सोना, वस्त्र, भूषण आदि के हजारों भार और अनेक दिव्य नारियाँ (दासियाँ) दी ॥२२४॥

विवाह-कार्य सम्पन्न होने पर, अन्य सभी सम्बन्धियों को सम्मानित करके और उनसे आ लेकर अलंकारशील अपनी पत्नी और पुत्र के साथ, जैसे आया था, उसी प्रकार (आकाश-मार्ग) से चला गया ॥ २२५॥

तदनन्तर, नम्र होते हुए विद्याधर-राजाओं से सम्मानित किये जाते हुए पुत्र नरवाहनदत्त की उन्नति को देखकर अत्यन्त प्रसन्न राजा उदयन ने, बहुत काल तक विवाह-उत्सब मनाया ॥२२६।।

वह नरवाहनदत्त भी सदाचार से मनोहर और उदार गुणोंवाली अलंकारवती को प्राप्त कर उसी प्रकार प्रसन्न हुआ, जिस प्रकार अच्छे छन्दोवाली और उदार गुणोंवाली कविता को पाकर रसिक मुकवि प्रसन्न होता है।॥ २२७॥

महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त

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1. अशातकालीन, अतिप्राचीन।


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