5604. || चौथी कहानी || मदनबेग विद्याधर की कथा; कलिगसेना के विवाह को कथा; वत्सराज की संक्षिप्त कथा; तेजस्वती की कथा; हरिशर्मा ब्राह्मण की कथा;
5604. || चौथी कहानी || मदनबेग विद्याधर की कथा; कलिगसेना के विवाह को कथा; वत्सराज की संक्षिप्त कथा; तेजस्वती की कथा; हरिशर्मा ब्राह्मण की कथा;
चौथा तरंग
मदनबेग विद्याधर की कथा
तदनन्तर अपने घर को गई हुई सोमप्रभा को पीछे की ओर से देखने के लिए, राजमार्ग के किनारे, अपने भवन की छत पर खड़ी कलिंगसेना को दैवयोग से समीप स्थित मदनवेग नामक विद्याधरों के युवक सरदार ने देखा ।।१-२।।
अपने अनुपम रूप से तीनों लोकों को जीतनेवाली कामरूपी ऐन्द्रजालिक की जादुई छड़ी के समान उस कलिंगसेना के रूप को देखकर मदनवेग क्षुब्ध हो गया ॥ ३॥
जहाँ मानव-कन्या का ऐसा रूप है, वहाँ विद्याधरियों और अप्सराओं की क्या कथा ।।४।।
अतः यदि यह मेरी स्त्री न हुई, तो मेरे जीवन से क्या लाभ ? किन्तु मैं विद्याधर होकर मानवी का संग कैसे कर सकता हूँ ।।५।।
ऐसा सोचकर उसने प्रज्ञप्ति नामक विद्या का व्यान किया। वह विद्या सजीव उपस्थित होकर मदनवेग से इस प्रकार कहने लगी- ॥६॥
'वास्तव में यह कन्या मानुषी नहीं है। यह शापच्युत अप्सरा है; जो राजा कलिगदत्त के यहाँ उत्पन्न हुई है' ।॥७७॥
ऐसा सुनकर मदनवेग अपने घर गया और सब कार्यों से विरक्त होकर काम पीड़ित हो. सोचने लगा ॥८H
यदि मैं इसका स्वेच्छापूर्वक अपहरण करूँ, तो यह मेरे लिए उचित नही है। हठपूर्वक स्त्रियों का उपभोग करना मुझे मृत्यू देनेवाला है, यह शाप मुझे मिला है ॥९॥
अत. इसकी प्राप्ति के लिए मुझे शिवजी की आराधना करनी चाहिए; क्योंकि कल्याण तप के अधीन होता है और दूसरा कोई उपाय नहीं' ।॥१०॥
ऐसा निश्चय करके वह दूसरे दिन ऋषभ पर्वत पर जाकर एक पैर से खड़े होकर और निराहार रहकर तप करने लगा ॥११॥
तदनन्तर शीघ्र ही उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर और दर्शन देकर शिवजी, मदनवेग से इस प्रकार कहने लगे - ॥१२॥
'यह कलिंगसेना सारी पृथ्वी में अपनी सुन्दरता के लिए विख्यात है। इसका पति भी रूप-सम्पत्ति में इससे अधिक न होगा ।।१३।।
एक वत्स देश का राजा उदयन केवल है, वह इसे चाहता है। किन्तु वह महारानी वासव-दत्ता के भय से स्पष्ट रूप से इसे नहीं माँगता ॥ १४॥
सौन्दर्य की लोभिन यह कलिंगसेना भी, सोमप्रभा के मुख से वत्सराज की रूप-प्रशंसा सुनकर उसे स्वयं वरण करना चाहती है ॥१५॥
इसलिए जब तक इसका विवाह नहीं होता, इसी बीच शीघ्रता करते हुए तुम वत्सराज का रूप बनाकर इसमे गांधर्व विवाह कर लो। 'इस प्रकार सुन्दरी कलिमसेना तुम्हारी हो जायगी' ॥१६-१७।।
शिवजी से ऐसा आदेश पाकर और उन्हें प्रणाम करके मदनवेग, वालकूट पर्वत पर, अपने घर, चला गया ।।१८।।
इसी बीच प्रतिदिन यन्त्रचालित वायुयान से रात को अपने घर आती हुई और प्रान. काल तक्षशिला जाती हुई और खेलती हुई सोमप्रभा से कलिगसेना ने एकबार कहा ॥१९-२०॥
कलिगसेना के विवाह को कथा
सम्बि, मैं तुमसे जो कहती हूँ, वह किसी से कहना नहीं। मैंने सुना है कि मेरे विवाह का समय आ गया है। मुझे माँगने के लिए अनेक राजाओं ने दूत भेजे हैं। किन्तु, मेरे पिता ने उन्हें यहाँ से लौटा दिया है ॥ २१-२२॥
किन्तु श्रावस्ती नगरी का राजा प्रसेनजित् है। केवल उगी के दूत को मेरे पिता ने विशेष रूप से सत्कृत किया ।।२३।।
मेरी माता से भी सम्मति कर ली है। कुलीन होने के कारण वह मेरे माता-पिता को सम्मत है ।। २४।।
वह उस कुल में उत्पन्न हुआ। है, जिसमें कौरवों और पांडवों की अम्बा, अम्बालिका आदि दासियाँ उत्पन्न हुई ।। २५।।
हे सखि, इस समय मझे पिता ने श्रावस्ती नगरी में उस प्रसेनजित् को ही दे दिया है' ॥ २६॥
कलिगसेना से यह सुनकर सोमप्रभा आँसुओं का हार बनाती हुई रोने लगी ॥ २७॥
सखी के रोने का क, रण पूछने पर समस्त भूलोक को देखी हुई सोमप्रभा कहने लगी-॥२८॥
अवस्था, रूप, कुल, चरित्र आदि जो वर में ढूंढ़े जाते हैं, उनमें सर्वप्रथम अवस्था ही है। वंश आदि उसके बाद की गिनती में लिये जाते हैं ।॥ २९॥
राजा प्रसेनजित् को मैंने देखा है। वह वृद्ध है। मरझाये हुए जाती (मालती) के पुष्प के समान उस वृद्ध की जाति या कुल से क्या करना है।॥ ३०।।
हिम के ममान शुभ्र उस वृद्ध के समक्ष मलिन मुखवाली तू ऐसी लगेगी; जैसे हेमन्त में हिम मे मारी हुई कमलिनी शोचनीय हो जाती है ॥३१॥
इसलिए मुझे खेद हुआ। प्रसन्नता तो तब हो, जब हे कल्याणि, बत्सराज उदयन तेरा पति हो ॥ ३२॥
रूप से, लावण्य से, कुल से, सौर्य से और ऐश्वर्य से उनके समान पृथ्वी पर दूसरा राजा नही है।॥ ३३॥
हे पतली कमरवाली, यदि तू अपने समान उस पति से यक्त हो जाय, तो विधाता का तुझमे सौन्दर्य उत्पन्न करना गफल हो जाय' ।॥३४॥
इस प्रकार गोमप्रभा के यन्त्रों के समान वाक्यों में प्रेग्नि कलिगसेना का मन, वत्सेश्वर पर चला गया ।॥ ३५॥
तव राजकन्या ने मोमप्रभा से पूछा- 'मग्वि, वह वत्मराज किस वंश में उत्पन्न हुआ है और उसका नाम उदयन कैसे हुआ ?' तब सोमप्रभा वोली- 'सखि, कहती हूँ, सुनो' ।॥३६-३७।।
वत्सराज की संक्षिप्त कथा
इम भूमि का भूषण वत्म नाम का देश है। उसमे दूसरी इन्द्रपुरी के समान कौशाम्बी नाम की नगरी है।॥३८॥
उस नगरी में वत्सेश्वर राज्य करता है। अब मैं उनके वंश का वर्णन करती हूँ, मुनो ॥३९॥
पांडु के पुत्र अर्जुन का लड़का अभिमन्यु हुआ। चक्रव्यूह का भेदन करनेवाले जिस अभिमन्यु ने कौरवों को सेना का सहार किया था ॥४०॥
उस अभिमन्यु द्वारा भरत-वंश को चलानेवाला परीक्षित नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। परीक्षित से सर्पसत्र (नागयज्ञ) करनेवाला पुत्र राजा जनमेजय हुआ। जनमेजय से शतानीक नाम का राजा हुआ, जिसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया, और जो देवासुर संग्राम में दैत्यों को मारता हुआ स्वयं भी मारा गया ।॥४१-४२॥
उस शतानीक से संसार में प्रशंसनीय सहस्रानीक नाम का राजा हुआ, जो इन्द्र के रथ भेजने पर भूमि से स्वर्ग में यातायात किया करता था ॥४३॥
उस सहस्रानीक की रानी मृगावती के गर्भ से उदयन नाम का कुलभूषण और संसार की आँखों को आनन्द देनेवाला राजा हुआ ॥४४॥
अब इसके उदयन नाम का कारण भी सुनो- एक बार सहस्रानीक की रानी और उदयन की माता मृगावती, गर्भवती हुई। गर्भावस्था में उसे रुधिर से भरी बावली में स्नान करने की इच्छा हुई, तो पाप से भीरु राजा सहस्रानीक ने लाख आदि के लाल रंग से बावली भरवा दी। उसमें स्नान की हुई रानी में मांस के टुकड़े का भ्रम करके, गरुड़-वंश के पक्षी ने उसे उठा लिया और ले जाकर उदयाचल पर्वत पर उसे जीते ही छोड़ दिया ॥४५-४७।।
वहाँ पर उसे पुनः पति-मिलन की आशा दिलानेवाले जामदग्न्य ऋषि ने रानी को धैर्य प्रदान किया और उसे अपने आश्रम में ले गये ॥४८॥
दिन पूरे होने पर रानी ने उमी आश्रम में पुत्र को इस प्रकार उत्पन्न किया; जैसे आकाश नवीन चन्द्र को उत्पन्न करता है ॥४९॥
अपमान से क्रुद्ध तिलोत्तमा ने उसके पति को शाप दिया था, जो इस रूप में दोनों को वियोग-दुःख देनेवाला हुआ ।।५०।।
'वह उदयन, सारी पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ और इसका पुत्र समस्त विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा' ।॥५१॥
इस प्रकार की आकाशवाणी के कारण और उदयपर्वत पर जन्म लेने के कारण इसका नाम उदयन हुआ ।।५२।।
मातलि (इन्द्र के सारथी) द्वारा परिचय कराया गया और शाप का अन्त होने की आशा बाँध हुए राजा सहस्रानीक ने मृगावती के बिना बारह वर्ष वियोग में व्यतीत किये ॥५३॥
शाप का अन्त होने पर, दैववश उदयाचल से आये हुए एक भील से परिचय पाकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर सहस्रानीक, उमी भील को पय-प्रदर्शक बनाकर उदयाचल पर गया ।।५४-५५।।
वहाँ पर मूतिमती वांछित सिद्धि के समान मृगावती पत्नी तथा मनोराज्य के समान पुत्र उदयन को पाकर और उन्हे लेकर राजा कौशाम्बी आया। और, कौशाम्बी आते ही उदयन के गुणों से सन्तुष्ट होकर उसे युवराज-पद पर प्रतिष्ठित कर दिया ।।५६-५७।।
और यौगन्धरायण आदि अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उसके मन्त्रिमण्डल में प्रतिष्ठित कर दिया। उदयन के राज्य-भार संभाल लेने पर राजा, महारानी के साथ सांसारिक सुखो का उपभोग करता रहा। वृद्धावस्था में समस्त राज्य-भार उदयन को देकर राजा महाप्रस्थान को चला गया ।।५८-५९।।
पिता के राज्य को पाकर और फिर सारी पृथ्वी को जीतकर उदयन यौगन्धरायण के साथ पृथ्वी का शासन कर रहा है ।॥६०॥
इस प्रकार शीघ्र ही उदयन की कथा, कलिंगसेना को, एकान्त में सुनाकर सखी सोमप्रभा फिर कहने लगी- 'इस प्रकार वत्सदेशों में राज्य करने के कारण वह वत्सराज कहा जाता है और पांडवों के वंश में उत्पन्न होने के कारण सोमवंशोद्भव भी वह कहा जाता है।॥६१-६२॥
उदयाचल पर जन्म होने से देवताओ ने उसका नाम उदयन रखा है। इस समय संसार में उसके समान सुन्दर कामदेव भी नहीं है ।॥६३॥
हे त्रैलोक्यसुन्दरी, वही एक तेरे समान उपयुक्त पति है। उसकी बड़ी महारानी वासव-दत्ता है, जो चंडमहासेन की कन्या है। उसने अपने बन्धुओं को छोड़कर स्वतन्त्रता से उदयन का वरण किया है। इस प्रकार उस (वासवदत्ता) ने उषा, शकुन्तला आदि कन्याओं की लज्जा का अपहरण कर लिया है ।॥६४-६६।।
उदयन से, वासवदत्ता में, नरवाहनदत्त नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ है; जिसे देवताओं ने भावी विद्याधर-चक्रवर्ती होने का आदेश दिया है। इसीलिए वासवदत्ता से डरता हुआ उदयन, तुम्हारी माँग नहीं करता। वह वासवदत्ता मैने देखी है। वह तुम्हारी रूप-सम्पत्ति की तुलना नही कर सकती' ।॥६७-६८।।
ऐमा कहती हुई सखी सोमप्रभा को वत्सराज उदयनके प्रति उत्सुक कलिंगसेना बोली ।।६९।।
'माता-पिता से विवश मैं क्या कर सकती हूँ। सबको जाननेवाली और प्रभावशालिनी तू ही एकमात्र मेरी गति है ।॥७०॥
यह कार्य तो दैव के अधीन है। इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ, सुनो!' ऐसा कहकर सोमप्रभा ने उसे यह कथा सुनाई ।।७१।।
तेजस्वती की कथा
पूर्वकाल में उज्जयिनी मे विक्रमसेन नाम का एक राजा हुआ। उसकी एक असाधारण रूपवती तेजस्वती नाम की कन्या थी ॥७२॥
उसे कोई भी राजा वरण के लिए अभिमत नहीं हुआ। एक बार उसने अपने भवन पर बैठे हुए एक पुरुष को देखा ॥७३॥
दैवयोग से वह उसके साथ अपने रूप की संगति चाहने लगी, अर्थात् उस पर अनुरक्त हो गई। तदनन्तर उसने अपने मनोभाव को सन्देश रूप में सखी द्वारा उसके पास भेजा सन्देश सुनकर साहस की शंका करते हुए और न चाहते हुए भी राजपुत्री की सखी ने उससे संकेत कर दिया ।।७४-७५।।
हे भद्र, यह सामने जो एकान्त मन्दिर देख रहे हो, इसमें तुम रात को राजकुमारी के आने की प्रतीक्षा करना। इस प्रकार का उमसे निश्चय करके सखी ने राजपुत्री तेजस्वती से कह दिया। तेजस्वती भी सूर्य को देखती हुई बैठी रही, अर्थात् रात्रि-आगमन की प्रतीक्षा करने लगी ।।७६-७७।।
वह पुरुष, सखी से निश्चय करके भी भय से कहीं भाग गया। सच है. मेढक, कमलिनी के केसर का स्वाद नही जान सकता ।॥७८॥
राजवंग मे उत्पन्न मोमदत्त नामक एक युवा राजकुमार पिता के मर जाने पर पिता के मित्र विक्रमसिंह के पास दैवयोग से इसी सायंकाल वहाँ (उज्जैन मे) आया ।॥७९॥
वह मुन्दर युवा, भाई-बन्धुओं द्वारा राज्य-हरण कर लेने के कारण दुखित और अकेला उज्जैन पहुंचा था। उम समय (सायंकाल) राजा से मिलना उचित न जानकर वह उसी सूने या एकान्न मन्दिर में ठहर गया, जिसमें राजकुमारी की मखी ने उसके प्रेमी पुरुष को आने का संकेत दिया था ।।८०-८१।।
रात्रि में प्रेम से अन्धी राजकुमारी ने, उम मन्दिर में बैठे हुए राजपुत्र को धोखे से अपना पति बना लिया ।।८२।।
उस बुद्धिमान् राजकुमार ने भी चुपचाप उसका प्रेमाभिनन्दन किया, क्योकि वह उसकी भावी राजलक्ष्मी की सूचना दे रही थी ॥८३॥
तब राजकुमारी ने उसे भ्रम से प्राप्त होने पर भी अत्यन्त सुन्दर देखकर अपने को दैव-वंचित (उगाई हुई) नही समझा ॥८४॥
तदनन्तर इधर-उधर की बातें और आवश्यक परामर्श करके राजपुत्री अपने भवन को गई और राजपुत्र ने यही रात्रि व्यतीत की ।।८५।।
प्रातःकाल राजपुत्र, राजभवन में जाकर, द्वारपाल से सूचना दिलाकर राजा के समीप पहुंचा और उससे परिचित हुआ ।॥८६॥
राजपुत्र के राज्यापहरण आदि दुखों को सुनकर राजा ने उसके शत्रुदमन के लिए सहायता करना स्वीकार किया। साथ ही, पहले से ही देने के लिए तैयार उस अपनी कन्या को उसे देने के लिए भी राजा ने विचार किया और मन्त्रियों से अपना विचार कहा ॥८७-८८।।
अनन्तर राजकुमारी की अन्तरंग सखियों से भली भाँति परिचित कराई गई रानी ने भी राजा से कन्या का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८९॥
अनिष्ट की असिद्धि और इष्ट के काकतालीय न्याय से चकित राजा को उसी समय एक मन्त्री ने कहा--।।९०।।
'जैसे लापरवाह मालिक की कार्य-सिद्धि के लिए अच्छे मेवक सावधान रहते हैं; उसी प्रकार भाग्यवान् व्यक्तियों की कार्य-सिद्धि के लिए दैव ही जागरूक (सावधान) रहता है ॥९१॥
हे राजन् ! मैं इस सम्बन्ध में तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ।
हरिशर्मा ब्राह्मण की कथा
किसी गाँव में हरिशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था ॥९२॥
वह दरिद्र, मूर्ख और जीविका के न मिलने से दु.खी रहता था। मानों पूर्वजन्म के पापों को भोगने के लिए उसके अत्यधिक बालक उत्पन्न हो गये थे ।॥९३॥
वह अपने कुटुम्ब के साथ भीख माँगता हुआ एक नगर में जाकर महाघनी स्थूलदत्त नामक गृहस्थ की सेवा करने लगा ।।९४।।
वह उसका सेवक बनकर उसके बच्चों की रक्षा, गाय की सँभाल और घर का सारा काम करने में स्वय और अपनी स्त्री को लेकर उसके घर के पास ही रहने लगा ।॥९५।।
एक बार उस स्थूलदत्त की कन्या का विवाहोत्सव हुआ, जिसमे अनेक बरातियों के आने की बहुत बड़ी धूमधाम थी ।।९६।।
तब हरिशर्मा ने उसके घर में अपने कुटुम्ब के साथ भरपेट घी, मास आदि खाने की आशा बाँधी ।।९७।।
वह भोजन के समय की प्रतीक्षा कर रहा था, किन्तु उसे किसी ने भी स्मरण नही किया। निगहार रह जाने से दुखी होकर उसने रात में अपनी स्त्री से कहा- 'देखो, दरिद्रता और मूर्खता के कारण मेरा ऐसा अपमान हुआ। इसलिए मैं अब बनावटी पंडिताई का प्रयोग करता हैं और, मैं उस स्थूलदत्त का गौरव पात्र व्न सकूं, इसलिए तुम समय पाकर मेरी पंडिताई के बारे में उससे कह देना ॥९८-१००।।
ऐसा कहकर और बुद्धि से कुछ सोचकर तथा सभी लोगो के सो जाने पर उसने वर (दुलहे) का घोड़ा स्थूलदत्त के घर से चुरा लिया ॥१०१॥
और दूर ले जाकर कही जंगल में बाँध दिया। प्रातःकाल, बराती इधर-उधर ढूंढ़ते हुए भी घोड़े को न पा सके ।।१०२।।
नदनन्तर इस अमंगल घटना से व्याकुल और उस घोड़े के चोर को ढूंढ़ने में व्यस्त स्थूल-दत्त को हरिशर्मा की स्त्री ने आकर कहा- 'मेरा पति ज्योतिष आदि विद्याओं का विद्वान् है। वह तुम्हारा घोड़ा बता देगा, उसे क्यों नही पूछते ?' ॥१०३-१०४।।
यह सुनकर स्थूलदत्त ने उस हरिशर्मा को बुलवाया। हरिशर्मा ने कहा- 'कल से मूले हुए मुझे आज घोड़ा खोने पर आपने याद किया' ॥१०५॥
तब 'हमारी भूल को क्षमा करना', ऐसा कहते हुए स्थूलदत्त ने पूछा-'हमारा घोड़ा किसने चुराया, यह बताओ' ॥१०६।।
उसके यह पूछने पर हरिशर्मा, भूमि पर झूठी रेखाएँ खींचता हुआ बताने लगा कि यहाँ से दक्षिणी सीमा के पास चोरों ने घोड़ा रखा है ।।१०७॥
वह छिपा हुआ है, सायंकाल होने पर चोर उसे दूर ले जायेंगे ।।१०८॥
यह सुनकर उधर दौड़कर ढूंढ़ते हुए बहुत से लोगो ने घोड़ा पा लिया और हरिशर्मा के विज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसे घर ले आये ॥१०९।।
तभी से 'विद्वान् है' ऐसा समझकर स्थूलदत्त से सम्मानित हरिशर्मा जनता में भी सम्मानिन हुआ और सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा ॥ ११०॥
कुछ दिनों के उपरान्त उस नगर के राजा के यहाँ सोना, रत्न आदि की चोरी हो गई। जब चोरों का पता न लगा, तव ज्योतिषी के नाम से प्रसिद्ध हरिशर्मा को राजा ने बुलवाया ॥ १११-१२२।।
बुलवाये हुए हरिशर्मा ने व्यर्थ समय व्यतीत करके कहा कि 'सबेरे बताऊँगा' । तब राजा ने मुरक्षा के साथ उसे किसी कमरे में ठहरा दिया ॥११३॥
राजा के यहाँ जिह्वा नाम की एक सेविका थी। जिसने अपने भाई की सहायता से राज-महल में चोरी कराकर धन का अपहरण किया था ॥११४।।
वह जिह्वा चोरी के कारण शंकितहृदय होकर रात को हरिशर्मा के निवास पर जाकर द्वार में कान लगाकर सुनने लगी। उस समय हरिशर्मा कमरे में अकेला बैठा हुआ झूठा विज्ञान बतानेवाली अपनी जिह्वा (जीभ) की निन्दा कर रहा था ।।११५-११६॥
'हे जिल्ह्वा, भोग की लम्पट, तूने यह क्या किया ? दुराचारिणी, अब उसका दंड सहन कर' ।॥११७॥
यह सुनकर भयभीत सेविका 'इसने मुझे जान लिया', ऐसा सोचकर प्राणदंड के भय से व्याकुल होकर किसी उपाय से हरिशर्मा के पास पहुँची ॥११८॥
और उस बनावटी ज्योतिषी के चरणों में गिरकर कहने लगी, 'हे ब्राह्मण, मैं ही वह जिल्ला हूँ, जिस धनहारिणी को तुमने जान लिया है ॥११९॥
मैंने धन ले जाकर इसी भवन के पीछे उद्यान में अनार के पेड़ के नीचे की भूमि में गाड़ दिया है ॥१२०॥
तो अब मेरी रक्षा करो और मेरे हाथ में जो सोना है, उसे ले लो।' यह सुनकर हरिशर्मा गर्व के साथ कहने लगा ॥१२१॥
'तू जा, मैं भूत-भविष्य सब जानता हूँ। दीन और शरण में आई हुई तुझे प्रकट न करूँगा। जो तेरे हाथ में धन है, उसे मुझे दे देगी, तब ऐसा करूंगा' ।॥१२२॥
हरिशर्मा से इस प्रकार कही गई दासी उसकी बात मानकर शीघ्र चली गई ॥ १२३॥
तदनन्तर स्वयं चकित हरिशर्मा ने आश्चर्य से सोचा कि अनुकूल दैव असाध्य बात को भी मरलता से ही सिद्ध कर देता है ॥१२४।।
देखो, मेरे सामने अनर्थ उपस्थित था, किन्तु अब नि. सन्देह मेरा कार्य सिद्ध हो गया। अपनी जिह्वा की निन्दा करते हुए चोरिणी जिल्ह्वा सामने आगई ।। १२५॥
आश्चर्य है, छिपे हुए पाप, शंका से ही प्रकाशित हो जाते हैं, इत्यादि बातें सोचते हुए प्रसन्न हरिशर्मा ने रात्रि व्यतीत की ।॥ १२६।।
प्रातःकाल, झूठी रेखा आदि खीचकर, राजा को, उस उद्यान में ले गया और गड़ा हुआ धन निकलवा दिया ॥ १२७॥
और कह दिया कि चोर कुछ हिस्सा लेकर भाग गया है। इस बात पर सन्तुष्ट राजा उसे गाँव आदि पुरस्कार में देने को उद्यत हुआ ।॥१२८।।
तब एक मन्त्री ने राजा के कान में कहा- 'ऐसा ज्ञान, शास्त्र के बिना मनुष्य के लिए अगम्य है। अत. यह अवश्य ही चोर से बनाई हुई धूर्त की जीविका है ।।१२९॥
इसलिए किसी अन्य उपाय से भी इस ज्योतिषी की परीक्षा करनी चाहिए' ॥१३०।।
तब राजा ने एक नया घड़ा मंगाकर, उसमें एक मेढक डालकर बन्द कर दिपा और हरिशर्मा से कहा- ।।१३१।।
'ब्राह्मण, इस घड़े के अन्दर क्या है? यदि बता दो, तो तुम्हारी पूजा विशेष रूप से करूंगा' ॥१३२॥
यह सुनकर और अपना विनाश-काल जानकर, अपने पिता द्वारा हँसी-हँसी में रखे हुए अपने मंडूक नाम को स्मरण कर विलाप करता हुआ दैवप्रेरित हरिशर्मा इस प्रकार बोल उठा ।।१३३-१३४।।
'हे मंडूक, भोले-भाले और विवश तेरे नाश के लिए यह बड़ा कारण हुआ' ।॥१३५॥
यह सुनकर प्रसंग की ओर अर्थ लगाकर वहाँ उपस्थित पुरुषों ने कहा- 'ओह ! यह तो महान् ज्योतिषी है। इसने महक को भी जान लिया ॥ १३६।।
तब प्रसन्न राजा ने उसके वचन को प्रतिभा-प्रसूत ज्ञान समझकर सोने के छत्र, हाथी, घोड़े आदि के साथ ग्राम भी भेट किये ॥१३७॥
क्षण-भर में वह हरिणर्मा सामन्त राजा के समान हो गया।¹ दैव, अच्छे कर्मवालों के कार्य स्वयं ऐसे ही सिद्ध कर देता है ।। १३८।।
इसलिए दैव ने इस कन्या को मोमदत्त के पास उचित ही अभिसरण करा दिया और अयोग्य व्यक्ति को भी हटा दिया ।॥ १३९।।
मन्त्री के मुँह से इस प्रकार कथा सुनकर विक्रममेन ने लक्ष्मी के समान अपनी कन्या राजपुत्र सोमदत्त को दे दी ॥१४०॥
तदनन्तर मोमदत्त भी श्वशर की सेना के बल से शत्रुओं पर चढाई करके और उन्हें जीतकर अपने राज्य में अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१४१॥
हे कलिगसेने, दैवगति की विशेषता से ऐसी पटनाएँ घटित होती हैं। अत., ऐसी सुन्दरी तुझे वत्मेश्वर से मिलाने में दैव के सिवा और कौन समर्थ है। मैं इस विषय में क्या कर सकती हैं ।॥१४२॥
इस प्रकार, सोगप्रभा के मुख से एकान्त मे कथा सुनकर बन्धुओ के भय और लज्जा को छोड़कर कलिगसेना वत्सराज के संगम के लिए अत्यंत उत्कंठित हो गई ॥ १४३।।
तदनन्तर त्रिभुवन के एकमात्र दीपक सूर्य के अस्त हो जाने पर, प्रातःकाल पुनः आने की अवधि प्रदान करके मयासुर की पुत्री सोमप्रभा, अभीष्ट-सिद्धि के लिए उद्यत सखी कलिंगसेना से पूछकर आकाग-मार्ग से घर को चली गई ।॥१४४।।
चतुर्थ तरंग समाप्त
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१. इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, प्रीम्स की 'परियों की कहानी' में भी है। वेनफी का कथन है कि योरोव में प्रचलित ऐसी कहानियों का मूल स्रोत कथासरित्सागर ही है। अनु०
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