5.204. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज उदयन व लोहजंघ की कथा
5.204. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज उदयन व लोहजंघ की कथा
चतुर्थ तरंग
वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः)
इसी बीच वत्सराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा दिया ।।१।।
उदयन के सन्देश को सुनकर चंडमहासेन ने सोचा कि वह आत्माभिमानी वत्सराज उदयन यहाँ आना नहीं चाहता। मैं भी कन्या को उसके यहाँ नहीं भेज सकता। इसमें मेरी लघुता होगी। इसीलिए चतुराई से कैद कर ही उसे यहाँ बुलाता हूँ ऐसा सोचकर चंड-महासेन ने मन्त्रियों से मन्त्रणा करके अपने हाथी नडागिरि के समान ही एक यन्त्रमय हाथी बनवाया। उसके पेट मे योग्य योद्धाओ को छिपाकर उसे विन्ध्याचल के घोर जंगल में रखवा दिया ।। २-५।।
राजा उदयन के शिकारी भृत्यो ने जंगल में घूमते हुए उम यन्त्र-हस्ती को दूर से देखा और राजा उदयन मे निवेदन किया- 'महाराज, हमने विन्ध्या रण्य में घूमता हुआ एक महान् हाथी देखा है। ऐमा हाथी इस विशाल भूमडल में नहीं देखा गया। लम्बे-चौडे एवं विशाल-काय वह जगम विन्ध्य पर्वन के समान आकाग में व्याप्त हो रहा है। शिकारी गुप्तचरों की बात सुनकर राजा उदयन, अत्यन्त प्रगन्न हुआ और उसने उन्हें सुवर्ण-मुद्राओ के पुरस्कार देकर विदा किया ॥६- ९।।
और सोचा कि 'मैं नडागिरि के समान उस हाथी को यदि प्राप्त कर लूंगा, तो चंडमहासेन अवश्य मेरे वश में आयगा और स्वय ही मुझे वासवदत्ता को प्रदान करेगा।' इस प्रकार सोचते हुए राजा ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥१०-११॥
प्रातःकाल उठकर मन्त्रियों की बात न मानकर राजा उदयन ने हाथी के लोभ में उन शिकारी गुप्तचरों को आगे करके जंगल में प्रस्थान किया। उसके ज्योतिपियों ने उसकी मृगया-यात्रा का फल बताया था कि कन्या-लाभ तो होगा, किन्तु बन्धन (कैद) के साथ। इस बात पर भी उसने ध्यान नही दिया ।। १२-१३।।
विन्ध्यारण्य में पहुँचकर राजा उदयन ने सेनाओं को दूर ही रोक दिया कि उनकी भीषण ध्वनि से हाथी भड़ककर कही भाग न जाय, केवल शिकारी गुप्तचरों को साथ लेकर राजा घोषवती वीणा को बजाता हुआ और अपने बन्धन की बात स्मरण करता हुआ घोर जंगल मे प्रवेश कर गया ।।१४-१५।।
गुप्तचरों द्वारा दूर से दिखाये हुए तथा विन्ध्यवन की दाहिनी ओर घूमते हुए उस कल्पित हाथी को राजा ने देखा ।।१६।।
अकेले वीणा बजाता हुआ और मधुर स्वर में गाता हुआ, साथ ही अपने बन्धन की बात को भी सोचता हुआ वह राज धीरे-धीरे हाथी के समीप चला गया ।।१७।।
गीत की ओर तन्मय होने और सन्ध्याकालीन अन्धकार के घने होने के कारण राजा उस वनगज के रूप में निर्मित माया-गज को वास्तविक रूप में न पहचान सका ।। १८।।
वह हाथी भी, मानो गीतरस मे मस्त होकर लम्बे-लम्बे कानों को हिलाता हुआ राजा के समीप आता हुआ-सा धीरे-धीरे उसे दूर एकान्त में ले गया। एकान्त में पहुँचते ही उस यान्त्रिक हाथी के उदर से निकलकर पहले से तैयार कुछ वीर सिपाहियों ने राजा को घेर लिया ॥१९-२०।।
उन्हे देखकर क्रुद्ध राजा ने कमर से छुरी खींचकर अगले सिपाहियों से जूझना प्रारम्भ किया। इतने में ही संकेत पाकर पीछे छिपे हुए अन्य सैनिक भी जंगल से निकल आये और पीछे से आक्रमण करके बत्सेश्वर राजा उदयन को बन्दी बनाकर चंडमहासेन के पास ले गये ॥ २१-२२।।
चडमहासेन भी, वत्सराज को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया और उसे साथ लेकर उज्जयिनी नगरी में गया ॥ २३॥
उम नगरी में बन्धनयुक्त एव नवागत उदयन को उज्जयिनी की जनता ने नयनानन्दकारी चन्द्रमा के समान देखा ।। २४।।
उज्जयिनी की जनता ने कैदी राजा उदयन के वध की आशंका से दुःखी होकर मरने का निश्चय किया ।। २५।।
प्रजा के सत्याग्रह को देखकर राजा चंडमहामेन ने उसे आश्वासन दिया कि मैं उसका वध नही, प्रत्युत उससे मित्रता करना चाहता हूँ। इस प्रकार चडमहासेन ने प्रजा के उस विप्लव को शान्त किया ।। २६।।
तब राजा ने वहीं पर अपनी पुत्री वासवदत्ता को सगीत-शिक्षा के लिए उदयन को सौंप दिया ॥२७।।
और बोला- 'हे राजन्। तुम इसे गान्धर्व विद्या की शिक्षा दो। इससे तुम्हारा कल्याण ही होगा। मन मे किसी प्रकार का खेद न करो।' चंडमहासेन की कन्या वासवदत्ता को देखकर राजा उदयन मन में इतना प्रसन्न हुआ कि धोखेबाजी और बंधन आदि के सब दुःख भूल गया ।। २८-२९।।
वासवदत्ता की आँखें भी मन के साथ उदयन के हृदय में मानों गड़ गई। यद्यपि आँखें तो लज्जा के कारण लौट आई, किन्तु मन न लौटा, वह उदयन में ही रम गया ।॥ ३०।।
तदनन्तर वत्सराज उदयन, चंडमहासेन की संगीत-शाला में वासवदत्ता को संगीत की शिक्षा देता हुआ निवास करने लगा ॥३१॥
संगीत-शाला मे राजा उदयन के मनोविनोद के लिए गोद में घोषवती बीणा, कंठ में संगीत का स्वर और आँखों के सामने वासवदत्ता-यह सामग्री थी ॥३२॥
उस कैदी राजा की सुस्थिरा लक्ष्मी के समान शिष्या वासवदत्ता राजा की सेवा-शुश्रूषा में तन्मय रहने लगी ॥ ३३॥
इसी बीच उधर शिकार से लौटे हुए सैनिको तथा गुप्तचरों द्वारा वत्सराज उदयन का कैद होना सुनकर राजा के प्रेम से सारा वत्स-राष्ट्र क्षुब्ध हो गया और उज्जयिनी पर आक्रमण की तैयारियाँ होने लगी ।।३४-३५।।
जनता को क्षुब्ध देखकर मन्त्री रुमण्वान् ने इस प्रकार उसे शान्त किया कि चंडमहासेन युद्ध के द्वारा वश मे नही किया जा सकता। वह महाबलवान् है। और, इस प्रकार आक्रमण करने से वत्सराज की भी खैर न होगी। उसका वध कर दिया जायगा। इसलिए यह कार्य युद्ध से नही, प्रत्युत बुद्धि से सिद्ध करने योग्य है।॥३६-३७।।
राष्ट्र मे राजानुरक्त प्रजा का क्षोभ देखकर परम बुद्धिमान् प्रधान मन्त्री यौगन्धरायण ने, रुमण्वान् आदि मन्त्रियो तथा राष्ट्राधिकारियो से कहा- ॥३८॥
'तुम सबको सर्वदा तैयार रहना चाहिए और इस राजाहीन राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए। समय आने पर युद्ध के लिए भी तैयार रहना चाहिए और मैं नर्म-सचिव वसन्तक के साथ अपने बुद्धि-बल से वत्सराज को छुड़ा लाता हूँ, इसमे सन्देह नही ।॥ ३९-४०।।
अधिक जल-संघर्ष से जैसे अधिक बिजली उत्पन्न होती है, उसी प्रकार भीषण और गम्भीर संकट के समय जिसकी बुद्धि का स्फुरण होता है, वही घीर है ॥४१॥
प्राकारो के ध्वंस करने के योग (उपाय), बेड़ियाँ काटने के योग और अदृश्य हो जाने के योग (उपाय) भी मैं जानता हूँ।' ऐसा कहकर और प्रजा को मन्त्री रुमण्वान् के हाथ सौंपकर यौगन्धरायण, कौशाम्बी से वसन्तक के साथ निकल गया ।॥४२-४३।।
साथ ही, वसन्तक के साथ अपनी बुद्धि के समान सत्त्वयुक्त तथा अपनी नीति के समान दुर्गम विन्ध्य महावन में वह गया¹ ।॥४४॥
वहाँ विन्ध्य-सीमा पर निवास करनेवाले पुलिन्द (जंगली) जाति के राजा वत्सराज के मित्र पुलिन्दक से मिलकर यौगन्धरायण से उसे प्रबल और बडी सेना के साथ तैयार रहने के लिए कहा, जिससे वत्सराज को लेकर लौटते समय यदि पीछे से आक्रमण हो, तो पहली युद्धभूमि यही बने ।।४५-४६।।
तदनन्तर यौगन्धरायण, वसन्तक को साथ लिये हुए उज्जयिनी के महाकाल श्मशान मे पहुंचा ।॥४७॥
वह श्मशान, मांस की दुर्गन्धिवाले और चिता-धूम के गुब्बारो के समान काले-काले वेतालों से भरा हुआ था ॥४८॥
वहाँ श्मशान में पहुँचने पर विद्याबल के कारण उसे देखते ही प्रसन्न होकर योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस यौगन्धरायण का मित्र बन गया ॥ ४९।।
उसी योगेश्वर की बताई हुई युक्ति के अनुसार यौगन्धरायण ने तुरन्त अपना रूप बदल दिया। रूप बदलते ही यौगन्धरायण, उसी समय टेढ़े-मेढे शरीरवाला कुबडा और चिकनी ग्खोपड़ीवाला बुढा लगने लगा। उसका रूप अत्यन्त हाम्यजनक हो गया ।।५०-५१।।
उमी युक्ति से उसने वगन्तक की बाहर निकली हुई तोद (पेट) को चमड़े की डोरियो मे बाँधकर बड़े-बडे और निकले हुए दाँतोंवाला बुरा-सा मुँह बनाकर उसका वेष ही बदल दिया ।।५२।।
वेष बदलने के अनन्तर वसन्तक को राजभवन के द्वार पर पहले भेजकर यौगन्धरायण भी स्वयं उसी वेश में चला। नाचता-गाता और बच्चों से घिरा हुआ एवं नागरिको के लिए तमाशा-सा बना हुआ वसन्तक राजभवन मे पहुँचा ।।५३-५४।।
महल में रानियों को तमाशा दिखलाता हुआ वसन्तक, वासवदत्ता के कानो में भी पहुँचा ॥५५॥
वासवदत्ता ने सेविका को भेजकर तमाशा देखने के लिए उसे संगीत-शाला में बुलवाया; क्योंकि नई अवस्था हास्य-विनोद की ओर अधिक आकृष्ट होती है।॥५६॥
संगीत-शाला में जाकर, पागल-वेश में आँसू बहाते हुए (राजा की दशा पर रोते हुए) यौगन्धरायण ने, कैदी वत्सराज को देखा ।।५७।।
और राजा से संकेत भी किया। राजा ने भी वेश बदलकर आये हुए योगन्धरायण को पहचान लिया ।।५८।।
उधर कुबड़ा यौगन्धरायण, अदृश्य होने की युक्ति से, वासवदत्ता और उसकी सेविकाओं से अदृश्य हो गया। केवल एकमात्र राजा उदयन ही उसे देख सका। इस प्रकार उसके अदृश्य होने पर सभी सेविकाएँ आश्चर्य करने लगी कि वह पागल कहाँ गया ? ॥५९-६०।।
सेविकाओं की ऐसी बातें सुनकर और यौगन्धरायण को सामने देखकर राजा ने बासव-दत्ता से कहा- कन्ये, तुम जाकर सरस्वती पूजा का सामान लाओ। फलतः गुरु की आज्ञासे सहेलियों के साथ वासवदत्ता यहाँ से चली गई ।।६१-६२॥
अब एकान्त देखकर छद्मवेशी यौगन्धरायण ने युक्तिपूर्वक राजा की बेड़ियाँ काट डालीं और वासवदत्ता तथा उसकी सहेलियों को वश में करने के लिए राजा को वशीकरण की औषधियाँ भी दे दी ॥६३-६४।।
और राजा से बोला 'हे महाराज! वसन्तक भी छद्म-वेश धारण करके द्वार पर खड़ा है। उसे अपने पास बुलवाओ ।।६५।।
जब वासवदत्ता का तुम पर पूरा विश्वास हो जायगा, तब मैं तुम्हें जो कहूँगा वह करना, अभी तुम मौन रहो' ।॥६६।।
यौगन्धरायण राजा से इस प्रकार कहकर बाहर चला गया और उसी समय वासवदत्ता सरस्वती-पूजन की सामग्री लेकर आई। उसके आने पर राजा ने वासवदत्ता से कहा कि एक ब्राह्मण द्वार पर खडा है। उसे पूजा की दक्षिणा लेने के लिए बुलवा लो। वासवदत्ता ने राजा की आज्ञा से विकृत रूप धारण किये हुए उस ब्राह्मण को भीतर बुलवा लिया ।।६७-६९।।
बसन्तक, राजा उदयन के सामने आते ही रोने लगा, उदयन भी भेद खुल जाने के भय से उसमे कहने लगा ।।७०।।
'हे ब्राह्मण, रोग के कारण तुममें जो यह कुरूपता आ गई है, उसे मैं अभी दूर कर देता हूँ। रोओ मत। मेरे पास रहो' ॥७१।।
तब वसन्तक बोला- 'देव! यह आपकी महती कृपा है।' राजा भी वसन्तक की विकृत आकृति को देखकर मुस्कराने लगा ॥७२॥
वसन्तक राजा को प्रसन्नता से मुस्कराते हुए अपने रूप को और भी बिगाड़कर हँसने लगा ।। ७३।।
खिलौने के समान उस वसन्तक को इस प्रकार विकृत चेष्टा मे हँसते हुए देखकर वासव-दत्ता भी हँसने लगी और प्रसन्न हुई ।॥७४॥
तब वासवदत्ता ने अपने हास्य-विनोद के रूप मे उससे पूछा कि 'हे ब्राह्मण ! तुम कौन-सा विशेष ज्ञान रखते हो। बताओ तो सही' ।॥७५॥
तव विदूषक वसन्तक बोला- 'मैं अच्छी-अच्छी कहानियाँ कहना जानता हूँ।' तब वासवदत्ता ने कहा- 'अच्छा, एक अच्छी-सी कहानी सुनाओ तो' ।॥७६॥
तब वह वसन्तक राजपुत्री वासवदत्ता का मनोरजन करता हुआ हास्य के पुट से सरस एवं एक विचित्र कहानी सुनाते हुए कहने लगा ।॥७७॥
लोहजंघ की कथा
इम देश मे भगवान् कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नाम की एक नगरी है। उसमे रूपणिका नाम की एक वेश्या रहती थी ॥ ७८।।
उसकी माता मकरदंष्ट्रा नाम की बूडी कुट्टनी थी। वह मानो रूपणिका के रूप और गुणो पर आकृष्ट कामुको की आखो के लिए विष के समान थी ॥७९॥
एक बार किमी देवता के पूजन के लिए रूपणिका, किसी मन्दिर में गई और उसने दूर से ही किसी एक युवा पुरुष को देखा ॥८०॥
रूपणिका को देखते ही वह युवक, उसके हृदय में गड़-मा गया और कुट्टनी माता के सभी उपदेश उसके हृदय से दूर हो गये। उनका स्थान मानों उस पुरुष ने ले लिया। रूपणिका ने अपनी सेविका से कहा- 'तुम उस पुरुष के पास जाकर कहो कि आज वह मेरे घर पर आवे' ।।८१-८२।।
सेविका ने इस प्रकार स्वामिनी का सन्देश उस पुरुष से कह दिया। वेश्या का सन्देश सुनने पर और कुछ सोचकर वह युवक बोला- ॥८३॥
'मैं लोहजंघ नामक ब्राह्मण हैं। मेरे पास धन नही है। इसलिए धनिको के जाने योग्य रूपणिका के घर में मेरी क्या योग्यता है' ।।८४।।
सेविका ने कहा- 'मेरी मालकिन तुमसे धन नही चाहती। सेविका का यह उत्तर सुनकर लोहजंघ ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया ।।८५।।
सेविका से यह सामचार सुनकर, उत्सुकतापूर्वक घर आकर उसके आने की राह देखती हुई रूपणिका खिडकी में बैठ गई ।।८६।।
कुछ समय के अनन्तर पूर्वनिश्चयानुसार लोहजंघ उसके घर आ गया और वेश्या की माता मकरदंष्ट्रा कुट्टनी को आश्चर्य हुआ कि यह कहाँ से आया ।।८७७।
रूपणिका भी उसका आगमन देखकर प्रसन्न हुई और उठकर उसका स्वागत करती हुई शयनगृह में ले जाकर आनन्दमग्न हो गई। लोहजंघ के सहवास से उसे ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ, जिसे पाकर उसने अपना जन्म सफल समझा ।।८८-८९॥
तदनन्तर अन्य पुरुषों के साथ समागम को छोडकर एकमात्र उसी के साथ प्रेम करनेवाली रूपणिका के साथ वह भी उसी घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा। कन्या की यह रीति देखकर नगर की समस्त वेश्याओं की शिक्षिका मकरदंष्ट्रा ने अत्यन्त दुःखी होकर एकबार एकान्त में अपनी कन्या रूपणिका से कहा- 'बेटी तुम इस दरिद्र से क्या प्रेम कर रही हो। अच्छे व्यक्ति मुर्दे को भी छू लेते है, पर वेश्या निर्धन को भी नहीं छू सकती। कहाँ सच्चा प्रेम और कहाँ वेश्या-वृत्ति, क्या तुम वेश्याओं के इस सिद्धान्त को भी भूल गई। बेटी! स्नेह करनेवाली वेश्या सन्ध्या के समान अधिक देर तक नही चमक सकती। वेश्या को तो केवल धन के लिए अभिनेत्री के समान प्रेम दिखलाना चाहिए। इसलिए तुम इस दरिद्र ब्राह्मण को छोड़ो, अपना विनाश न करो। माता के उपदेश को सुनकर रूपणिका क्रोध से बोली- 'माता! तुम ऐसा न कहो । यह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारा है, धन तो मेरे पास बहुत है, अधिक धन लेकर मैं क्या करूंगी। इसलिए हे माता ! तुम फिर मुझे ऐसा कभी न कहना ।।९०-९६।।
यह सुनकर कणिका की माता मकरदंष्ट्रा मन-ही-मन जल गई और लोहजंघ को घर से निकालने का षड्यन्त्र सोचने लगी ।। ९.७।।
कुछ गमय के अनन्तर कुट्टनी ने गह में जाते हुए किसी धनहीन राजपुत्र को देखा, जो शस्त्र-बारी सिपाहियो से घिरा हुआ जा रहा था ।॥९८॥
उसे देखकर कुट्टनी दौडकर उसके पास आ गई और एकान्त में ले जाकर कहने लगी-'मेरे घर पर एक दरिद्र कामी व्यक्ति ने अधिकार जमा रखा है, इसलिए तुम मेरे घर पर आओ और ऐसा उपाय करो कि वह मेरे घर से निकल जाय। इस कार्य के पुरस्कार-स्वरूप तुम मेरी पुत्री का उपभोग करो ।।९९-१००।।
राजपुत्र ने कुट्टनी की बात स्वीकार कर ली और उसने रूपणिका के गृह में प्रवेश किया उसी समय रूपणिका किमी देवमन्दिर में दर्शन के लिए चलो गई थी ।॥१०१।।
लोहजघ भी दैवयोग से उस समय कही बाहर गया हुआ था। फलतः लोहजंघ आकर निःशंक भाव से सदा के अनुसार वेश्या के घर में घुसा ।। १०२।।
उसके घर में घुसते ही राजपुत्र के सिपाहियों ने उसे दौड़ाकर लात-घूसो से खूब मारा ।।१०३।।
मार खाकर भगे हुए लोहजंघ को पकड़कर सिपाहियों ने किसी गंदे गड्ढे (संडास) मे फेक दिया। लोहजंघ, फिर उससे किसी प्रकार निकल भागा ।।१०४।।
इस बीच देव-दर्शन करके आई हुई रूपणिका सारा वृत्तान्त देख-सुन अत्यन्त शोक-सन्तप्त हुई और वह राजपुत्र भी यह सब कांड करके जिघर जा रहा था, उधर ही चला गया ।। १०५।।
कुट्टनी पर चढ़े हुए क्रोध से जलता हुआ लोहजंघ भी किसी तीर्थ में प्राण त्याग करने की इच्छा से किसी ओर चला गया ।॥ १०६।।
लोहजंघ का हृदय, कुट्टनी के इस कुकृत्य से जल रहा था। ऊपर से पड़ती हुई गर्मी की कड़ी धूप से उसका शरीर भी जल रहा था। वह कहीं ठंडी छाया की खोज में था उस निर्जन भूमि में कही वृक्ष तो नहीं दिखाई पड़ा, किन्तु एक हाथी की खाली खाल कही पड़ी हुई उमे दिखाई दी, जिसे शृगालो ने भीतर से खाकर खोखला कर दिया था और दोनों ओर खुली रहने में हवा के आवागमन में वह ठंडी भी थी। लोहजंघ पैरों की ओर में उसमे घुस गया और शीतल वायु के झोकों में उसी में पड़े हुए लोहजघ को नीद आ गई ।।१०७-१०९।।
इसी बीच महमा आकाश में बादल उमड आये और चारों ओर मुमलाधार वर्षा के कारण नदी-मी वह चली और हाथी की खाल सिकुड गई ।।११०।।
कुछ समय में ही पानी के प्रवाह में वह खाल वह चली और लुढकते-लुढकते गंगाजी मे जा गिरी। वह वहां से भी बहकर समुद्र में गिर गई ॥ ११२॥
समुद्र में इवती-उतराती हुई उम खाल को मांसपूर्ण समझकर गरुडवंश² का एक पक्षी नोच में पकडकर उसे समुद्र के उस पार किमी टापू पर ले गया ।११३।।
टापू के किनारे उस पक्षी ने चोंच से उसे फाडकर देखा, तो वह खोखला हाथी का चमडा था और उसके भीतर जीवित मनुष्य को देखकर वह पक्षी उसे वही छोड़कर उड़ गया।। ११४।।
लोहजघ भी पक्षी की चोंच से किये हुए छेद के द्वारा बाहर निकलकर चारों ओर देखा और उस घटना को विना नीद का स्वप्न उसने समझा। इतने में ही उसने समुद्र तट पर घूमते हुए तथा विस्मय से डरे हुए दो भयानक राक्षसों को देखा ।।११५-११६।।
रामचन्द्र द्वारा घटी हुई लंका की दुर्दशा का स्मरण करके फिर से आये हुए एक मनुष्य को देखकर उन्हें भय हुआ। डरे हुए राक्षसों ने लंका में किसी मनुष्य के आने का समाचार वहाँ के राजा विभीषण से जा कहा। विभीषण रामचन्द्र के प्रभाव को देख चुका था। अत. वह भी मनुष्य के आगमन से भयभीत होकर गुप्तचर राक्षस से बोला- 'तुम समुद्र के तटपर जाकर मेरी ओर से उस मनुष्य से कहो कि आओ, हमारे घर पर पधारने की कृपा करो' ।।११७-१२१॥
आश्चर्यचकित राक्षस ने आकर लोहजंघ को अपने स्वामी विभीषण का सन्देश सुनाया ।। १२२॥
लोह्यंघ ने शांतचित्त से विभीषण का सन्देश मुना और उसी राक्षस के साथ लंका को गया ।।१२३।।
लंका में जाकर नगरी के सुवर्णमय अनेक विशाल भवनों को देखकर चकित होते हुए लोह-जंघ ने राजमहल में जाकर राजा विभीषण के दर्शन किये ॥१२४।।
लंका के राजा विभीषण ने उसका आतिथ्य सत्कार किया। उसके द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करने पर राजा ने पूछा- 'हे ब्राह्मण देवता! आप यहाँ कैसे पधारे?' ॥१२५।।
यह सुनकर वह धृत्तं ब्राह्मण लोहजंघ विभीषण मे बोला- 'राजन् में मथुरा का रहने-वाला ब्राह्मण हूँ ॥१२६॥
दरिद्रता से दुःखी होकर मैंने भगवान् नारायण के मन्दिर में निराहार रहकर तपस्या की ।। १२७।।
तपस्या करते हुए मुझे नारायण ने स्वप्न में आज्ञा दी की तू लंकाधिपति विभीषण के गारा जा। वह मेरा भक्त है और तुझे घन देगा, ॥ १२८॥
जब मैने उनसे कहा कि 'महाराज कहाँ राजा विभीषण और कहाँ मैं ! मैं उन्हे कैसे प्राप्त कर सकूंगा' ? इस पर भगवान् नारायण ने कहा कि तू अभी जा, विभीषण को देखेगा ।।१२९।।
भगवान् की इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा प्राप्त कर मैं ज्यों ही जगा, त्यो हो मैंने अपने को समुद्र के पार तट पर पड़ा हुआ पाया ॥१३०।।
इससे अधिक मैं कुछ नही जानता। यह सुनकर और साधारण व्यक्ति का लंका मे पहुँचना अति कठिन समझकर विभीषण ने उसे मचमुच दिव्य प्रभाववाला व्यक्ति समझा ।। १३१।।
'ठहरो, मैं तुम्हें धन दूंगा' - ऐसा कहकर विभीषण ने उसे नरघानियों के लिए अवघ्य समझकर राक्षसों को सौप दिया और वह वहाँ ठहरा रहा ।।१३२।।
तव विभीषण ने राक्षमों को मुमेरु पर्वत पर भेजकर गरुड-वंग के पक्षी को वाहन के रूप मे मंगाया ।। १३३।।
उस वाहन को लोहजंघ को देकर कहा कि 'तुम इसे वश में करो। इसी के द्वारा तुम फिर मथुरा जा सकोगे' ।॥१३४।।
लोहजंघ कुछ दिनों तक लंका में ही उस पक्षी पर उड़ने का अभ्यास करता रहा और विभीषण के स्वागत सत्कार का आनन्द लेता रहा ।॥ १३५।।
एक बार उसने विभीषण से कौतुक के साथ पूछा कि 'महाराज, लंका में यह सारी भूमि काष्ठमयी क्यों मालूम देती है' ।॥ १३६॥
उसका प्रश्न सुनकर विभीषण ने कहा- "यदि तुम्हें यह जानने की जिज्ञासा है, तो सुनो। मैं तुम्हें इसका रहस्य बताता हूँ' ।॥१३७॥
प्राचीन समय में कश्यप के पुत्र गरुड़ ने प्रतिज्ञावश नागो की दासता मे पड़ी हुई अपनी माता विनता को दासता से मुक्त करने की इच्छा से उसका मूल्यस्वरूप अमृत का कलश लाने की इच्छा की और उसके लिए शक्ति प्राप्त करने को वह पिता के पास गया ।।१३८-१३९॥
पिता से प्रार्थना करने पर कश्यप ने उससे कहा कि समुद्र में बड़े-बड़े दो हाथी और कछुए है, उन्हे तुम जाकर खाओ, तो शापमुक्त हो जाओगे ॥१४०।।
गरुड समुद्र में जाकर उन दोनों को लेकर खाने के लिए कल्पवृक्ष को शाखा पर जा बैठा। उसके भार में वह शाखा टूट गई, किन्तु उसके नीचे बालखिल्य मुनि तपस्या कर रहे थे। अत उनकी रक्षा के लिए गरुड ने उस शाखा को अपनी चोच से रोक रखा। और जनापवाद के भय से गरुड़ ने उस शाखा को यहाँ समुद्र तट पर लाकर रख दिया ।। १४१-१४३।।
उसी शाखा की पीठ पर यह लका नगरी निर्मित हुई। इसी कारण यहाँ की भूमि काष्ठ-मयी है।" विभीषण से यह कथा सुनकर लोहजघ सन्तुष्ट हुआ ।॥१४४।।
तब विभीषण ने मथुरा जाना चाहते हुए लोहजंघ को बहुत-से बहुमूल्य रत्न मँगाकर दिये और मथुराधिपति भगवान् को भेट देने के लिए सोने के शंख, चक्र, गदा और पद्म बनवाकर भक्ति-पूर्वक उसके द्वारा भेज दिये। विभीषण से प्राप्त समस्त धन को लेकर लोहजंघ एक बार में सौ योजन उड़नेवाले उस गरुड़जातीय पक्षी पर बैठ गया और आकाश में उड़कर समुद्र पार करता हुआ बड़े आराम से मथुरा पहुँच गया ।। १४५-१४८।।
मथुरा पहुँचकर वह नगरी के बाहरी भाग में स्थित किसी बौद्ध विहार में आकाश-मार्ग से उतरा। प्राप्त धन को वही भूमि में गाड़कर उसने बहीं उस पक्षी को भी बाँध दिया ।। १४९।।
विभीषण से प्राप्त रत्नों में से एक को बाजार में बेचकर उसने भोजन, कपड़े, इत्र, तैल आदि सजावट के अनेक सामान खरीद लिये। उसने विहार में आकर स्वयं भोजन किया और उस पक्षी को भी भोजन कराया तथा नवीन वस्त्र आदि पहनकर सुन्दर वेश बनाया ।। १५०-१५१॥
सायंकाल होने पर हाथों में शंख-चक्र धारण करके उसी गरुड़ पक्षी पर बैठकर रूपणिका वेश्या के घर की छत पर आकाश से उतरा ॥ १५२॥
उसने वेश्या को गुप्त रूप से सुनाते हुए ऊपर से कुछ शब्द किया ॥ १५३॥
उसकी वाणी सुनकर बाहर आई रूपणिका ने रत्नों से अलंकृत एवं भगवान् के स्वरूप में लोहजंघ को उस रात्रि में देखा ॥ १५४॥
'मैं भगवान् हरि स्वयं तुम्हारे लिए आया हूँ, लोहजंघ के ऐसा कहने पर वेश्या उसे प्रणाम करके बोली- 'महाराज, आपकी कृपा है। आप दया करें और यहाँ ठहरें'। लोहजंघ ने पक्षी से उतरकर उसे बाँध दिया और वेश्या के साथ उसके शयनकक्ष में प्रवेश किया ।। १५५-१५६।।
कुछ समय के अनन्तर वेश्या-भवन से निकलकर लोहजंघ पक्षी पर बैठकर पुनः अपने निवास पर आ गया ।। १५७।।
प्रातःकाल होते ही रूपणिका वेश्या ने सोचा कि 'मैं भगवान् विष्णु की प्रेयसी होने के कारण देवता हो गई। अब तो मनुष्यों के साथ बात करना भी अपमान है। ऐसा सोचकर उसने मौन धारण कर लिया और पर्दे में रहने लगी ।॥ १५८॥
उसकी माता मकरदंष्ट्रा ने उसकी यह स्थिति देखकर पूछा कि 'आज तुम इस प्रकार मौन क्यो हो रही हो? मुझे बताओ'। उसके आग्रहपूर्वक और बारम्बार पूछने पर रूपणिका ने पर्दे की ओट से मौन का सारा भेद बना दिया ।। १५९-१६०।।
कुट्टनी को बेटी की बातों पर सन्देह हुआ और उसी रात को उसने स्वयं अपनी आँखों से गरुड़ पर बैठे हुए विष्णुरूपी लोहजंघ को देखा ।। १६१।।
प्रातःकाल ही कुट्टनी ने पर्दे में बैठी हुई रूपणिका को बड़े ही नम्रभाव से कहा ।। १६२।।
'हे बेटी ! भगवान् की कृपा से तू तो देवता बन गई। मैं तेरी माता हूँ। मुझे भी तो लड़की होने का फल दे' ।॥ १६३॥
'मैं बूढी, इस शरीर से जिस प्रकार स्वर्ग चली जाऊँ, ऐसी कृपा के लिए तुम भगवान् से निवेदन करो'। रात को उसी छद्मरूप में आये हुए लोहजंघ को वेश्या की माता ने प्रार्थना सुना दी ।।१६४-१६५।।
तब वह नकली देवता लोहजंघ रूपणिका से बोला- 'तुम्हारी माता पापिनी है, उसे स्पष्ट रूप से स्वर्ग नहीं ले जाया जा सकता। हाँ, एकादशी के दिन स्वर्ग का द्वार खुलता है। उस द्वार से सबसे पहले शिवजी के भक्तगण उसमें प्रवेश करते हैं। यदि उन शिवगणों में उनका-सा वेश बनाकर तुम्हारी माता की भरती करा दी जाय, तो वह स्वर्ग में जा सकती है। इसलिए इसके सिर को छुरे से मुँड़ाकर सिर पर पाँच शिखाएँ या चोटियाँ रखवाओ। और गले में हड्डियों की माला और शरीर का एक भाग काजल से काला तथा दूसरा सिदूर से लाल करके और नंगी करके उसे शिवगणों में भरती किया जा सकेगा। यदि वह इस प्रकार शिवगण के रूप मे मेरे साथ आवे, तो मैं उमे स्वर्ग ले जा सकता हूँ।। १६६-१६९॥
ऐसा कहकर और कुछ ठहरकर लोहजंघ चला गया। पूर्वनिश्चयानुसार एकादशी को प्रान. काल रूपणिका ने स्वर्ग जाने के लिए उत्सुक माता को गणों का वेश बनाकर तैयार कर दिया। सायंकाल लोहजंघ उसी प्रकार वेश्या के घर आया और रूपणिका ने माता को उसे मौप दिया ।। १७०- १७२।।
लोहजंघ भी अपने नित्यकृत्य मे निवृत्त होकर उस विकृतवेशा कुट्टनी को अपने साथ गरुड पर बैठाकर आकाश में उड गया। आकाश में उड़ते हुए उसने एक देव-मन्दिर के सामने गड़े हुए चक्र-चिह्नित पत्थर के स्तम्भ को देखा। उसी स्तम्भ में लगे हुए चक्र के सहारे अपना अपमान करनेवाली ध्वजा के समान उस कुट्टनी को उसने खड़ा कर दिया ।। १७३- १७५।।
तब कुट्टनी से उसने कहा कि 'तुम कुछ देर के लिए यहाँ ठहरे। मैं तुम्हें गणों में भरती कराने का प्रबन्ध करता हूँ।' ऐसा कहकर लोहजघ उसकी आँखों से ओझल हो गया ।॥१७६॥
कुछ आगे जाकर उसने एक मन्दिर के समीप रात्रि जागरण के लिए एकत्र हुए नागरिकों का मेला देखा। उसे देखकर वह आकाश मे ही चिल्लाकर बोला- 'है नागरिक लोगो, आज तुम्हारे ऊपर सर्वसंहारकारिणी महामारी गिरेगी। इसलिए भगवान् का भजन करो, उन्हीं की शरण में जाओ' ।।१७७-१७८।।
इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर डरे हुए सभी मथुरावासी, स्वस्ति पाठ करते हुए भगवान्के समीप जा बैठे ।।१७९।।
वह लोहजंघ भी विहार में उतरकर पक्षी को बाँधकर और देवता का नकली बेश उतारकर साधारण नागरिक के वेश में उसी जन-समाज मे चुपचाप आकर मिल गया ॥१८०॥
उधर चक्र के सहारे खम्भे पर खड़ी कुट्टनी खड़े-खड़े थककर सोचने लगी कि अभी तक न तो भगवान् ही आये और न मैं ही स्वर्ग गई। ऐसा सोचकर त्रस्त कुट्टनी चिल्लाने लगी और गिरने के भय से कहने लगी- 'मैं गिरती हूँ।' उसका रोना-धोना सुनकर देव-मन्दिर में एकत्र मथुरा के निवासी उसे ही साक्षात् महामारी समझकर व्याकुल हो गये और कहने लगे कि 'मत गिरो, मत 'गिरो।' ।। १८१- १८३।।
इस प्रकार महामारी के पतन से घबराये हुए मथुरावासियों ने बाल-बच्चों के साथ वह रात किसी प्रकार व्यतीत की ।। १८४।।
प्रातःकाल के प्रकाश में सभी मथुरावासी प्रजा और राजा ने भी उस रूप में खम्भे पर खड़ी कुट्टनी को देखा और पहचाना ।। १८५।।
महामारी का भय दूर होने पर तथा एक बार खूब हँसी हो जाने पर रूपणिका वेश्या माता का समाचार सुनकर वहाँ आई ॥ १८६॥
माता को इस प्रकार खम्भे पर खड़ी देखकर उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और किसी प्रकार उसने उसे ऊपर से उतरवाया ।।१८७।।
वहाँ एकत्र जनसमूह के पूछने पर उस कुट्टनी ने अपनी दुर्दशा का सारा वृत्तान्त लोगों से कह सुनाया ॥ १८८।।
इस विस्मयकारी घटना को किसी सिद्ध आदि का विनोद समझकर ब्राह्मण, वैश्य और राजा आदि एकत्र लोगों ने कहा- 'अनेक कामियों को ठगनेवाली इस कुट्टनी को भी जिसने इस प्रकार ठग लिया, वह धन्य है। यदि वह इस जनसमाज मे है, तो प्रकट हो जाय, उसे पुरस्कार-स्वरूप पट्ट-बन्ध³ किया जायगा' ।।१८९-१९०।।
इस घोषणा को सुनकर जनसमाज में छिपा हुआ लोहजंघ प्रकट हो गया और उसने जनता के पूछने पर समस्त वृत्तान्त सुना दिया ॥१९१।।
साथ ही, उसने वही उपस्थित मथुरा-नरेश को शंख, चक्र आदि उपहार मेट कर दिये, जिसे देखकर जनता ने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया ।। १९२।।
तदनन्तर मथुरा के नागरिकों ने लोहजंघ के इस साहसिक कार्य पर सन्तोष प्रकट करते हुए उसे पट्ट बाँधकर सत्कृत किया और राजा की आज्ञा से वेश्या रूपणिका को स्वाधीन करा दिया, अर्थात् उसे वेश्यावृत्ति से मुक्त कर दिया ॥ १९३॥
इस प्रकार राजा तथा प्रजा से सम्मानित लोहजंघ, लंका से प्राप्त रत्नराशि द्वारा अत्यन्त समृद्ध बनकर और कुट्टनी मकरदंष्ट्रा से बदला चुकाकर सुखपूर्वक मथुरा में निवास करने लगा ।।१९४।।
इस प्रकार विकृत वेषघारी वसन्तक के मुँह से कथा सुनकर बन्दी उदयन को अत्यन्त सन्तोष हुआ और बासवदत्ता भी हृदय से प्रसन्न हुई ।।१९५।।
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का चतुर्थ तरग समाप्त
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1. जंगल के पक्ष से सत्सव का अर्थ प्राणी है, यौगन्धरायण के पक्ष से मनोबल है। जिस प्रकार यौगन्धरायण की नीति दुर्गम थी, उसी प्रकार वह जंगल कठिनताओं से भरा, अतएव दुर्गम था। अनु० 44
2. अरेबियन नाइट्स में सिवबाद जहाजी की कहानी में तीन फकीर और बगवाद की तरुणियों की कथा के प्रसंग में, तीसरे फकीर की कहानी, उससे मिलती-जुलती है, उसमें इस पक्षी की चर्चा है। - अनु० 113
3. प्राचीन समय में जिस व्यक्ति का राजा या जनता से नागरिक सम्मान किया जाता था, उसे विशेष प्रकार के मुकुट आदि पहनाकर और रथ में बैठाकर शोभायात्रा (जुलूस) के साथ नगर में घुमाकर सम्मानित किया जाता था।- अनु० १८९-१९०
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