5.304. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन; ग्वालों की कथा;

5.304. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन; ग्वालों की कथा; वत्सराज को खजाना और सिहासन की प्राप्ति; वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार; वीर विदूषक ब्राह्मण को कथा; 

चतुर्थतरंग

वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन

तदनन्तर एक दिन वत्सराज ने अपनी पत्नियो तथा मन्त्रियों के साथ लावाणक से कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया ।। १।।

असमय में उछलती हुई समुद्र की लहरों के समान कोलाह‌ल से दिशाओं को गुजित करती हुई उसकी सेनाओं ने माथ ही प्रस्थान किया ।।२।।

यदि सूर्य उदयाचल पर्वत के साथ आकाश में गमन करे तो हाथी पर बैठे हुए राजा उदयन की उपमा उससे दी जा सके¹ ।॥३॥

सिर पर लगे हुए श्वेत छत्र से ऐसा मालूम होता था कि राजा ने सूर्य के तेज को जीत लिया था; इसलिए प्रसन्न होकर चन्द्रमा मानो छत्र के व्याज से राजा की सेवा कर रहा था ।।४।।

उस सर्वोपरि विराजमान (हाथी पर बैठे हुए) तेजस्वी उदयन के चारों ओर सामन्तगण, इस प्रकार चक्कर लगा रहे थे; जैसे अन्य ग्रह, ध्रुव-नक्षत्र के चारों ओर भ्रमण करते है ॥५॥

राजा के पीछे हथिनियो पर बैठी हुई दोनो रानियां, लक्ष्मी और पृथ्वी के समान, राजा का अनुगमन कर रही थी ।।६।।

मार्ग में ऊँचे-ऊँचे घोड़ो के बुरों के आघात से क्षत-विक्षत भूमि, राजा के द्वारा उपभोग की हुई नायिका-सी मालूम होती थी ।।७।।

इस प्रकार वन्दिगणो से स्तुति किया जाता हुआ उदयन, कुछ दिनों के अनन्तर कौशाम्बी पहुँच गया ।।८।।

जिम प्रकार पति के प्रवास से लौटने पर पत्नी प्रसन्नता का प्रदर्शन करती हुई, शोभित हो रही थी उसी प्रकार स्वामी के लौटकर आने पर कौशाम्बी-नगरी शोभित हो रही थी। नगरी-नायिका, झंडो मे लगे हुए लाल बस्त्रो से डॅकी हुई थी; भवनो के झरोखे, मानो उसके खिले हुए नेत्र थे। गुप्त द्वारो पर रखे हुए पूर्ण कुम्भ नगरी के पीन स्तनों के समान दीखते थे। जन-समाज के कोलाहल के बहाने मानो नगरी, स्वामी के आगमन पर प्रसन्नता सूचक शब्द बोल रही थी। मुधा-धवल स्वच्छ भवन, नगरी-नायिका के हास-स्वरूप मालूम होते थे ।।९।।

राजा के प्रवास से लौटने पर प्रसन्न कौशाम्बी नगरी ऐसी प्रसन्न थी, जैसे पति के प्रवास से लौटने पर पत्नी प्रसन्न होती है ।।१०।।

दोनों पत्नियो से अनुगमन किया जाता हुआ वह राजा, नगरवासिनी स्त्रियो के लिए अत्यन्त उल्लास और प्रसन्नता का विषय रहा ।।११।।

सुन्दर भवनों से देखती हुई सहस्रो नारियो के मुखचन्द्रों से आकाश भर गया, मानो वासवदत्ता के मुखचन्द्र से पराजित चन्द्रो की मेना, उसकी सेवा के लिए एक्त्र हो रही थी ।।१२।।

मकानों के झरोखो (खिडकियो) मे अपलक देखती हुई नागरिक रमणियाँ, राजा को देखने के लिए स्वर्ग से उतरी हुई विमानस्थ अप्सराओं का भ्रम उत्पन्न करती थी ।। अरोखों के आगे लगी हुई सपलक आँखोवाली कुछ स्त्रियों, मानो कामदेव के पखयुक्त बाणो के जाल (कटाक्ष) छोड रही थी ।। किमी सुन्दरी की बड़ी आंखे, राजा को देखकर प्रसन्नता से फैलकर न देखते हुए कानो को मानों ममाचार देने के लिए उसके पास दौड़कर चली गई थीं ।।१३-१५।।

दौड़कर आई हुई किसी सुन्दरी के हाँफने से उछलते हुए स्तन राज-दर्शन के लिए मानो चोली से बाहर निकलना चाहते थे ।।१६।।

घबराहट से दौड़कर खिड़की पर आती हुई किमी सुन्दरी का मुक्ताहार मानो हर्ष के आँसुओं की झड़ी-सा टूटकर बिखर गया² ।। कुछ महिलाएँ, लावाणक मे वासवदत्ता के जल जाने के समाचार पर टीका-टिप्पणी करती हुई आपस में कहने लगी कि यदि लावाणत में आग ने इसे सचमुच जला दिया होता तो सचमुच वह जगत्-प्रकाशक अग्नि, ससार को अन्धेरे मे डाल देती ।। १७-१९।।

प‌द्मावती को देखकर एक सहेली दूसरी से बोली कि सहेली के समान अपनी सौत से लज्जित नही हुई ।।२०।।

सचमुच शिव और कृष्ण ने इन दोनों (वासवदत्ता और प‌द्मावती) का रूप नहीं देखा, यदि वे देख लेते तो पार्वती और लक्ष्मी को कदापि प्यार न करते ॥ २१॥

सुगन्धित और नवविकसित नीलकमल के समान लोचनवाली नगर-रमणियाँ, दोनों रानियों को देखकर इसी प्रकार की चर्चा करती रही ।॥ २२।।

इस प्रकार जनता को आँखो को राजा-रानियों के साथ मंगलयुक्त आनन्द देता हुआ उदयन, मगलाचरण करके, अपने राज-मन्दिर में गया ।॥ २३॥

राजा के भवन में प्रवेश करने पर उस भवन की शोभा ऐसी हुई जैसे प्रभात के समय कमल सरोवर की और चन्द्रोदय होने पर समुद्र की होती है ।। २४।।

क्षण-भर में ही राजभवन, सामन्त नरेशों के मागलिक उपहारो से ऐसा भर गया मानो पृथ्वी के समस्त राजाओं ने उपहार भेजे हो ।॥ २५॥

राजा उदयन ने सभी ममागत सामन्त नरेशों का सम्मान करके जनता के चित्त के समान उस राज-भवन मे प्रवेश किया ।।२६।।

अपने भवन में, रति और प्रीति के मध्य कामदेव के समान बैठे हुए, राजा उदयन ने पान-लीला (मद्यपान) में उस बचे हुए दिन को व्यतीत किया ॥२७।।

ग्वालों की कथा

दूसरे दिन, राज-सभा में मन्त्रियों के साथ बैठे हुए राजा के सभी द्वार पर एक ब्राह्मण चिल्लाने लगा। महाराज ! महान् अनर्थ है कि जंगल में ग्वालों ने विना कारण ही मेरे पुत्र के पैर काट डाले ।।२८-२९।।

यह सुनकर राजा ने दो-तीन ग्वालो को पकड़वा कर बुलाया और पूछने पर वे बोले- महा-राज! हमलोग गौएँ चराते और निर्जन वन में खेलते है, हमलोगो के बीच देवसेन नामक एक ग्वाला है। वह जंगल के एक स्थान पर पत्थर की चट्टान पर बैठकर कहता है कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और हमारा शासन भी करता है। हमलोगों में कोई भी उसकी आज्ञा का उल्लघन नहीं करता। इस प्रकार आज इस ब्राह्मण के लड़के ने उस रास्ते से जाते हुए हमलोगो ने उससे कहा भी कि तुम बिना प्रणाम किये यह गोपालक जंगल में राज्य करता है। उस ग्वाले राजा को प्रणाम नहीं किया। न जाओ, फिर भी हँसते हुए उस बालक ने हमलोगो की बात न मानी ॥ ३०-३५॥

तब उस ग्वालराज ने हमलोगों को आज्ञा दी कि इसके पैर काटकर इसे दंड दो। तब हमलोगों ने दौड़कर इसके पैर काट दिये। राजा की आज्ञा का उल्लंघन कौन कर सकता है ।॥३६-३७।।

इस प्रकार ग्वालों के निवेदन करने पर उसका रहस्य समझकर बुद्धिमान् यौगन्धरायण ने राजा से एकान्त में कहा- महाराज! अवश्य ही उस स्थान में खजाना आदि हैं। उसी के प्रभाव से ग्वाला भी वहाँ राजा बनने की सोचता है। अतः आप वहाँ चले। मत्री के ऐसा कहने पर राजा सेना और सामान के साथ वहाँ गया ।। ३८-४०।।

वत्सराज को खजाना और सिहासन की प्राप्ति

जंगल में जाकर और भमि की परीक्षा करके जब कर्मकर (मजदूर) भूमि को खोदने लगे तब उस गड्ढे के नीचे से एक पर्वताकार यक्ष निकला। और राजा से बोला कि 'राजन् ! तुम्हारे दादा का रखा हुआ यह खजाना है। मैंने बहुत समय तक उसकी रक्षा की। अब तुम इसे सम्हालो³ ।।४१-४२।।

वत्मराज को इस प्रकार कहकर और उसके दिये हुए उपहारों को स्वीकार कर यक्ष अन्तर्धान हो गया और राजा को उस गढ़े में बहुत बड़ा खजाना मिला ॥४३॥

राजा ने उसकी प्रसन्नता में उत्सव मनाया और उस धन को एवं बहुमूल्य रत्न-सिहासन को लेकर तथा उन ग्वालो को समुचित दड देकर वह अपनो राजधानी कौशाम्बी को लौट आया ।।४४।।

उन्नति का समय आने पर अनेक प्रकार की शुभ बाते होती है। कौशाम्बी में राजा द्वारा लाकर राजभवन में रखे गये उस सिहासन को नागरिक जनता देखने लगी। और बजते हुए वाद्य के समान मुन्दर आनन्द शब्द 'वाह-वाह' करने लगे ।।४५।।

वह सिंहासन, जड़ी हुई लाल मणियों की किरणों के प्रसार से मानों राजा उदयन, चारो दिशाओं में फैलनेवाले अभ्युदय की सूचना दे रहा था ।।४६।।

चाँदी के तारो से पिरोये हुए मोतिये की शुभ्र लड़ियों की उज्ज्वल प्रभा से, वह सिंहासन राजा के मन्त्रियों के अत्यन्त आश्चर्य पर मानो हँस रहा था ।।४७।।

उस सिंहासन के प्रभाव को देखकर मन्त्रियों को राजा के दिग्विजय का निश्चय हो गया। अतः वे भी उत्सव मनाने लगे ।॥४८॥

तदनन्तर सिहासन और खजाना मिलने की प्रसन्नता में राजा रूपी मेघ, पताका-रूपी बिजली-से चमकते हुए नगरी के आकाश से सेवकों पर सोने की वृष्टि करने लगे। (राजा ने खूब धन लुटाया) ।।४९-५०।।

इस प्रकार उत्सव, पुरस्कार-वितरण आदि में उस दिन के व्यतीत हो जाने पर दूसरे दिन राजा का मन टोहने (जाँचने) की इच्छा से यौगन्धरायण ने कहा- 'महाराज! तुमने अपनी कुल-परम्परा से आये हुए सिहासन को प्राप्त किया है, अतः अब उसपर बैठो ।।५१-५२।।

वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार

राजा ने कहा- 'मेरे परदादा सारी पृथ्वी को जीतकर जिस सिंहासन पर बैठे थे, उसपर विना चारों दिशाओं की विजय किये, बैठने से मेरा क्या महत्व है? ऐसा कहकर राजा सिहासन पर नहीं बैठा, कारण यह कि कुलोनों को आत्माभिमान स्वाभाविक होता है ।।५३-५५म

तब प्रसन्न यौगन्धरायण ने कहा- 'ठीक है, महाराज! तब पहले पूर्व दिशा में विजय का उद्यम कीजिएगा' ।॥५६।।

यह सुनकर राजा ने यौगन्धरायण से प्रसंगवश पूछा कि 'उत्तर आदि अनेक दिशाओं के रहते हुए राजा लोग पहले पूर्व दिशा की ओर क्यों जाते हैं ?' यौगन्धरायण ने कहा- 'महाराज ! उत्तर दिशा यद्यपि प्रशस्त है, किन्तु म्लेच्छो के संपर्क से दूषित है। सूर्य का अस्त होने के कारण पश्चिम को भी अच्छा नहीं माना जाता और दक्षिण दिशा यमराज की दिशा होने तथा उनमें राक्षसों का निवास होने के कारण उसे भी अच्छा नहीं समझा जाता ॥५७-५९।।

पूर्व में सूर्य का उदय होता है। उसमें इन्द्र का निवास है। गंगा नदी भी पूर्व की ओर जाती है, इसलिए पूर्व दिशा पवित्र और प्रशस्त मानी जाती है ।।६०।।

भारतीय प्रदेशो में भी बिन्ध्याचल और हिमाचल के मध्य का देश, जो गंगा-जल से पवित्र है, सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ।।६१।।

इसलिए मंगलाकांक्षी राजा लोग पहले पूर्व की ओर प्रयाण करते है और गंगा-तटवर्ती देशों में निवास भी करते हैं ।॥६२॥

तुम्हारे पूर्वज पांडवो ने भी पूर्व की दिशा से ही विजय प्रारम्भ की थी और गंगातटवर्ती हस्तिनापुर को राजधानी बनाया था; क्योकि साम्राज्य पौरुष के अधीन है, उसमें किसी देश-विशेष का कोई महत्त्व नही है ।।६३-६४।।

यौगन्धरायण के इस प्रकार कहकर चुप हो जाने पर राजा उदयन पुरुषार्थ को बहुमान देने के कारण बोला- यह सत्य है कि देश-विशेष, साम्राज्य का कारण नहीं होता। उच्च कोटि के व्यक्तियो के सम्पत्ति प्राप्त करने में अपना पुरुषायं ही एकमात्र कारण है ।।६५-६६।।

किन्तु बलवान् उच्च व्यक्ति, आश्रयहीन होकर भी, लक्ष्मी प्राप्त करता है। क्या आपलोगो ने सत्यवान् (जीवनवाले) व्यक्ति की कथा नही सुनी है ? ॥६७॥

इतना कहकर मन्त्रियों से प्राथित वत्सराज ने महारानियों के सामने ही कथा कहना प्रारम्भ किया ।।६८।।

वीर विदूषक ब्राह्मण को कथा

समस्त भूतल में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। पूर्व समय में उसमे आदित्यसेन नाम का राजा राज्य करता था ।।६९।।

आदित्य के हो समान महाप्रतापी आदित्यसेन का रथ भी कभी कही रुकता न था ।।७०।।

चन्द्रमा के समान उस राजा का छत्र ऊँचा होने पर अन्य सभी राजाओ के छत्र दूर हो जाते थे; क्योकि उन (राजाओं) की गर्मी शान्त हो जाती थी। वह राजा, भूतल में प्राप्त हो सकनेवाले सभी भोगों का वैसे ही आश्रय-स्थान था, जैसे ममस्त रत्नों का आश्रय समुद्र होता है। वह राजा, किसी समय यात्रा के लिए निकला और सेना के साथ गगा के तट पर आकर ठहर गया। वहाँ ठहरे हुए राजा के समीप वहाँ का रहनेवाला गुणवर्मा नाम का कोई धनी साहूकार कन्यारत्न को उपहार स्वरूप लेकर राजद्वार में उपस्थित हुआ ।।७१-७४।।

वह द्वारपाल से बोला- 'देव! यह तीनो लोकों की रत्न-स्वरूपा कन्या मेरे घर में उत्पन्न हुई है। इसे मैं अन्य कही प्रदान नहीं कर सकता। आप ही इस उपहार के योग्य है'। द्वारपाल से इस प्रकार निवेदन कराकर गुणवर्मा ने राजा को अपनी कन्या दिखलाई। स्नेहपूर्ण राजा उसके कामाग्नि के समान सौन्दर्य-प्रभाव से पिघलकर पानी-पानी हो गया ।।७५-७८।।

वह तेजस्वती नाम की कन्या अपनी उज्ज्वल कान्ति से दिशाओं को ऐसे प्रकाशित कर रही थी, मानो कामदेव के मंगल-भवन की रत्नदीप-शिखा हो। आदित्यसेन ने महारानी पद के योग्य उस कन्या को ग्रहण कर और प्रसन्न होकर गुणवर्मा को अपने समान राजा बना दिया ॥७९।१

राजा ने उसके साथ विवाह करके अपने को कृत-कृत्य समझ और उसे लेकर उज्जयिनी आया ।।८०।।

उज्जयिनी आकर राजा रात-दिन उसका मुँह निहारने में ही लगा रहता था। इसी कारण राज्य-मम्बन्धी बड़े-बडे कामो को भी देखता न था ।॥८१॥

तेजस्वती के मधुर वचनों से कीलित राजा के कानों को दु.खित प्रजा का चीत्कार-शब्द अपनी ओर आकृष्ट न कर मका ॥ ८२।।

बहुत काल में अन्त.पुर में गया हुआ राजा बाहर न निकला, किन्तु उसकी इस स्थिति से शत्रुओ के हृदय का भय निकल गया ।।८३।।

कुछ समय के अनन्तर उम राजा से महादेवी मे अति सुन्दरी कन्या और बुद्धि में विजय करने की इच्छा उत्पन्न हुई ।।८४।।

तदनन्तर राजा किसी विद्रोही सामन्त राजा पर चढ़ाई करने के लिए उज्जयिनी से बाहर निकला। उसके साथ हथिनी पर चढ़ी हुई महारानी तेजस्वती भी सेना के देवता के समान चली। राजा, दर्प से पसीने के अरने बहाते हुए, जगम पर्वत के समान, श्रीवृक्षक नाम के घोड़े पर सवार हुआ। कुछ दूर जाकर समनल भूमि मिलने पर राजा ने तेजस्वती को अपना कौशल दिखाने के लिए घोड़े को तेज कर दिया। जिस प्रकार यन्त्र से फेंका हुआ बाण, सरसराकर वेग मे जाता है, उसी प्रकार राजा की जाँघों से प्रेरित वह घोड़ा तीर के समान उड चला और लोगों की आँखों से ओझल हो गया ।।८५-९२।।

इस कारण व्याकुल मन्त्रिगण, इस घटना को अनिष्ट समझ कर सेनाओं के साथ उज्जयिनी लौट आये ॥९३-९४।।

वहाँ आकर नगर-रक्षा के वे घेरे (परकोटे) के द्वारों को बाद करके और उनकी रक्षा का प्रबन्ध करके प्रजा को आश्वासन देते रहे। उधर यह घोडा सरपट दौड़ता हुआ राजा को भीषण सिहों से भरे हुए विन्ध्याचल के घोर जगल में ले गया। दैवयोग से उस घोड़े के सहसा रुकने पर राजा को, चारों ओर दृष्टि फैलाने पर, दिशाओं का ज्ञान न रहा और वह भूख से व्याकुल हो गया ।।९५-९७।।

ऐसे समय कोई चारा न देखकर घोडो की नस्ल का जाननेवाला राजा घोड़े से नीचे उतर पडा ओर उसे प्रणाम करके बोला- हे ईश्वर ! तुम घोड़े नही, वास्तव में देवता हो, तुम्हारे ऐसे उच्च जाति के घोडे स्वामी-द्रोह नही करते। यहाँ पर तुम ही मेरी शरण (रक्षक) हो। इमलिए मुझे कल्याण-मार्ग से ले जाओ। पूर्वजन्म का स्मरण करता हुआ घोड़ा, मन में पछताता हुआ, राजा की बात मान गया। ऊँचे (कुलीन) घोड़े सचमुच देवता ही होते है ।।९८-१००।।

तब राजा के पुन सवार होने पर वह घोड़ा स्वच्छ शीतल जल से भरे हुए और मानों श्रम को दूर करनेवाले रास्ते से चला ॥ १०१।।

सायकाल तक चार सौ कोम की दूरी पर उज्जयिनी के समीप उसने राजा को पहुँचा दिया ॥१०२॥

सायकाल होने पर जबकि अँधेरा फैलने लगा, उज्जैन नगर के द्वार बन्द हो गये और उस घोड़े के वेग से अपने घोड़ों के पराजित हो जाने की लज्जा से मानो सूर्य के अस्ताचल की कन्दरा में छिप जाने पर वह घोडा नगरी के बाहर रात में भीषण दीखनेवाले श्मशान में राजा को ले गया। बुद्धिमान् घोड़ा राजा को ठहराने के लिए श्मशान के समीप एक ब्राह्मण के गुप्त मठ में ले गया ।।१०३-१०५।।

राजा ने उस मठ को रात बिताने के योग्य देखकर उसमें प्रवेश किया, राजा का घोड़ा थक गया था ।।१०६।।

'यह श्मशान का रक्षक सिपाही है या चोर है' ऐसा कह‌कर उन मठवासी ब्राह्मणों ने राजा को अन्दर आने से रोका ।।१०७।।

इस प्रकार लड़ते-झगड़ते वे लोभी और निष्ठुर ब्राह्मण मठ के बाहर निकल आये; क्योंकि वेदपाठी ब्राह्मण स्वभावतः भय, कठोरता और क्रोध के घर होते है ।।१०८।।

उनके चिल्लाने पर उस मठ से एक गुणी और जीवन (जीवट) वाला विदूषक नाम के ब्राह्मण ने अग्नि-देवता की आराधना से ऐसा उत्तम खड्ग प्राप्त किया था, जो स्मरण करते ही स्वयं हाथ में आ जाता था ।।१०९-११०।।

उस धीर-वीर ब्राह्मण ने भव्य स्वरूपवाले राजा को देखकर सोचा कि यह कोई देवता आया है ।।१११।।

वह सब अनुचित विचार रखनेवाले उन मूर्ख ब्राह्मणों को दूर करके (हटाकर) नम्रता से स्वागत करता हुआ राजा को मठ में ले गया ॥ ११२।।

मठ में जाकर दानियां द्वारा रास्ते की धूल झाडने-पोंछने के अनन्तर उसने राजा के लिए उसके योग्य भोजन बनवाया। राजा के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करके विदूषक ने स्वय ही घोड़े की जीन-लगाम आदि बोलकर और उमे घाम-दाना आदि देकर उसकी थकावट दूर कर दी ।।११३-११४।।

बिस्तर पर लेटे हुए राजा मे उमने कहा- स्वामि। आप निश्चिन्त होकर सोइए, मैं गत-भर आपके शरीर की रक्षा करूँगा। ऐसा कहकर स्मरण-मात्र से आये हुए खड्ग को हाथ में लेकर वह मारी रात द्वार पर पहरा देता हुआ जागता रहा ।। ११५-११६।।

प्रात. काल जैसे ही राजा उठा, विदूषक ने स्वय हो जाकर घोड़े की जीन-लगाम कसकर उसे तैयार कर दिया ॥११७॥

राजा भी विदूपक से मिलकर और घोडे पर सवार होकर उज्जैन गया। वहाँ हर्ष-भरे नागरिक आँखें फाड़-फाड़कर उसे देखने लगे ।। ११८॥

राजा के नगर में प्रवेश करते ही उसके आगमन के आनन्द से विभोर नागरिक कोलाहल करते हुए राजा के समीप आये ।। ११९।।

तब वह राजा मत्रियो से घिरा हुआ राजभवन में गया और उधर रानी तेजस्वती के हृदय से महान् शोक-ज्वर निकल गया ।।१२०।।

राजा के पुनरागमन-महोत्सव के उपलक्ष्य में लगी हुई ध्वजाओं के वस्त्रो के वायु से हिलाये जाने के कारण मानों नगरी का सारा शोक झाड़-बहारकर दूर कर दिया गया ॥ १२१॥

उस दिन तबतक (सारा दिन) महारानी उत्सव में मग्न रही जबतक सूर्य के साथ सारी नागरिक जनता सिन्दूर से लाल न हो गई, अर्थात् सायकाल तक आमोद-प्रमोद के उत्सव चलते रहे ।। १२२।।

दूसरे दिन राजा आदित्यसेन ने, उस मठ से, विदूषक के साथ उसमें रहनेवाले सभी ब्राह्मणों को बुलवाया ।। १२३॥

सभा में रात का समस्त वृतान्त सुनाकर राजा ने उपकार करनेवाले विदूषक को एक हजार गाँव पुरस्कार (इनाम) मे दिये। और उसे उस कृतज्ञ राजा ने अपने पुरोहितों में नियुक्त करके लगाने के लिए छत्र और सवारी के लिए घोड़ा दिया। सभी सभासद् राजा की इस उदारता को आश्चर्य से देखते रहे ।। १२४-१२५।।

इस प्रकार वह ब्राह्मण, उमी समय राजा के सामन्तों के समान हो गया। सच है, महान् व्यक्तियों का उपकार करना निष्फल नहीं होता ।। १२६।।

उस महान् हृदय विदूषक ने भी राजा से पाये हुए गाँवो को, मठ में रहनेवाले सभी ब्राह्मणों में ममान भाग से बॉट दिया। और स्वय राजा का आश्रित होकर उसकी सेवा मे रहने लगा एवं उन सभी ब्राह्मणो के साथ गाँव की आय द्वारा समान रूप मे जीवन-निर्वाह करने लगा ।।१२७-१२८।।

कुछ समय के अनन्तर बिना परिश्रम प्राप्त राजवृत्ति की आय से मदोन्मत्त वे सभी मठ-वामी ब्राह्मण, अपनी-अपनी प्रधानता चाहने हुए परस्पर झगडने लगे। उनमें दुष्ट ग्रहों⁴ के समान सात ब्राह्मण एक गुट बनाकर गाँवों के कार्यों में बाधा पहुँचाने लगे। उन ब्राह्मणो की इस प्रकार उच्छृंखलता करने पर विदूषक उदासीन (तटस्थ) हो गया। धैयंशाली व्यक्तियों के लिए छोटी-छोटी बातो मे तटस्थता ही अच्छी रहती है।। १२९-१३१।।

इस प्रकार जब वे आपस मे झगड रहे थे तब चक्रधर नाम का एक स्पष्ट वक्ता ब्राह्मण मठ में आया। वह (ब्राह्मण) काना होने पर भी दूसरों के न्याय के लिए स्पष्ट द्रष्टा था और कुबडा होने पर भी वाणी से स्पष्ट वक्ता था ।।१३२-१३३।।

वह उनसे बोला- 'अरे मूर्वो! तुम भिखमंगों ने किसी तरह यह लक्ष्मी (सपत्ति) प्राप्त की है, उसे आपस में लड़कर क्यो नष्ट कर रहे हो। यदि इस प्रकार लड़ोगे तो फिर भीख माँगोगे ।। १३४-१३५।।

विना नेता का और भाग्य के आधार पर छोडा हुआ एक स्थान अच्छा है; किन्तु सर्वनाश करनेवाले बहुत नेताओं का होना अच्छा नही ॥१३६।।

यह विदूषक का दोष है कि उसने तुमलोगो की उपेक्षा करके तुम्हें स्वतन्त्र छोड़ दिया। इसलिए मेरे कहने से किसी एक को नेता बना लो, इसके द्वारा तुम्हारी सम्पत्ति स्थिर रहेगी और बढ़ती रहेगी। चक्रधर के ऐसा कहने पर वे सभी अपने-अपने को नेता मानने के लिए तैयार हुए। तब चक्रधर ने उन्हे महामूर्ख ममझ कर कहा- आपस में लड़ते हुए तुमलोगो के लिए मैं शतं निश्चित करता हूँ, 'यहाँ के श्मशान में फॉमी से मारे गये तीन चोर झूल रहे है ।।१३७-१३९।।

उन तीनो की नाक काटकर जा वीर ले आये, वह तुममें प्रधान (नेता) हो सकेगा; क्योंकि वीर ही स्वामी बन सकता है' ।।॥१४०।।

चक्रधर द्वारा इस प्रकार कहे गये ब्राह्मणो को विदूषक ने कहा- 'इस शर्त को मान लो, क्या हानि है'? ॥१४१।।

इस कार्य के करने में असमर्थ वे बोले 'हम यह नही कर सकते, जो समर्थ हो वह करे, हम शर्त मानने को तैयार है।' तब विदूषक बोला- 'मैं यह कार्य करता हूँ। रात को श्मशान से उनकी नाक काटकर लाता हूँ' ।।१४२-१४३।।

तब वे मूर्ख उससे बोल उठे- 'ऐसा करने पर तुम हमारे नेता बनोगे- इस निश्चय पर हम दृढ है' ।।१४४।।

इस प्रकार शर्त लगाकर रात आने पर उन ब्राह्मणों से कहकर विदूषक श्मशान में गया ।। १४५।।

स्मरण करते ही उपस्थित होनेवाले खड्ग को हाथ में लेकर अपने कार्य के समान भीषण श्मशान में गया ।। १४६।।

डाकिनी, शाकिनी आदि के गब्दों से युक्त गीघ और कौओं के शब्दों से भीपण, मुंह से आग उगलते हुए गीदड़ों की अग्नि-ज्वाला से फैलती हुई चिता-अग्नि से डरावने उस श्मशान के बीच उसने शूली पर चढ़े हुए, नाक कटने के भय से मानो ऊपर की ओर मुँह किये हुए, तीन चोरो को देखा ।।१४७-१४८।।

विदूषक जब उनके समीप पहुंचा तब वैतालों से आक्रान्त वे तीनों मुर्दे उसे मुक्को से मारने लगे ॥ १४९।।

निडर विदूषक ने भी उन्हें खड्ग से मारा। यह सच है कि धीर पुरुयों के हृदय, भय से शिक्षित ही नही होते ।। १५०।।

तलवार की मार मे वैताल मुर्दो को छोड़कर भाग गये, वैतालों का आवेग हट जाने पर विदूषक ने उन तीनो चोरो की नाक काट ली और उन्हें एक वस्त्र-खंड से बाँध लिया ।। १५१।।

वहाँ से लौटते हुए विदूषक ने ग्मशान में मुर्दे पर बैठकर जप करते हुए एक प्रव्राजक (साधु) को देखा ।। १५२।।

विदूषक उसकी चेष्टा और कार्यक्रम देखने की लालमा से उसकी पीठ की ओर आकर छिप गया ।। १५३।।

कुछ ही समय के अनन्तर मुर्दे ने माधक के नीचे फूत्कार किया, उसके मुँह से अग्नि की ज्वाला और नाभि मे सग्मो निकले ॥ १५४।।

माधक मन्यामी ने मरमो के उन दानों को हाथ में ले लिया और उठकर मुर्दे को थप्पड मारा ।। १५५॥

तदनन्तर वैनाल से आविष्ट वह मुर्दा उठा और वह साधक उसके ही कन्धे पर बैठ गया। उसपर चढ़कर वह सहसा चलने लगा तो कौतूहलवश विदूषक भी छिपे-छिपे उसकी पीठ के पीछे चला। कुछ ही दूर जाने पर साधु, दुर्गा की मूत्तिवाले शून्य मन्दिर के अन्तगृह में गया और वह वैतालवाला गव भूमि पर गिर गया ।।१५६-१५९।।

विद्रूपक भी युक्ति से छिपकर उसकी गति-विधि देखता रहा। माधक ने देवी की पूजा करके प्रार्थना की- 'हे देवि, यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो मुझे मेरा इच्छित वर प्रदान करो। नही तो मैं अपना बलिदान करके तुम्हे प्रसन्न करता हूँ ॥१६०-१६१।।

उम कठोर अनन्यमाधना से गवित उस साधु को उम गर्भगृह से निकली हुई वाणी ने कहा- 'राजा आदित्यमेन की लडकी को लाकर उसका वलिदान करो तो तुम अपना अभीष्ट प्राप्त कर मकते हो' ।।१६२-१६३।।

यह सुनकर उस माधक ने बाहर निकल कर उस मुर्दे को फिर थप्पड़ लगाकर उठाया और वह फू-फू करने लगा ।।१६४।।

मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए उसके कन्धे पर बैठकर साधक प्रव्राजक राजकुमारी को लाने के लिए आकाश-मार्ग से चला ।।१६५।।

विदूषक यह सारी घटना देखकर सोचने लगा कि मेरे जीते-जी यह राजकुमारी का वध कैसे करेगा ? ।।१६६।।

इसलिए मैं तबतक यही ठहरता हूँ, जबतक वह नीच आता है। ऐसा सोचकर वह वही छिपा रहा ।।१६७।।

इस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ प्रव्राजक, खिड़की के रास्ते से, राजकुमारी के भवन में जा पहुँचा ॥ १६८॥

उसने उमे इस प्रकार पकडा, जिस प्रकार अंधकारपूर्ण आकाश में कान्ति फैलानेवाली शशिकला को राहु पकड़ता है ॥ १६९॥

इतने में ही अरे बाप अरी मा! इस प्रकार चिल्लाती हुई राजकन्या को लिये हुए वह नीच आकाश में नीचे उतरा। उस वैताल (मुर्दे) को उसी प्रकार छोड़कर कन्या को लेकर देवी की मूत्ति के समीप पहुँचा ॥ १७०-१७१।।

वह जब राजकुमारी का वध करने के लिए तैयार हुआ, इतने मे ही तलवार खीचे हुए विदूषक भी मन्दिर में घुसा और बोला- 'ओ पापी! मालती के फूल को पत्थर से पीसना चाहता है; जो इस कोमल कन्या पर शस्त्र प्रहार करना चाहता है' ।।१७२-१७३।।

ऐसा कहकर और उसकी जटा पकड़कर विदूषक ने साधक संन्यासी का बध कर डाला और भय से काँपती हुई एव अत्त्यन्त सिकुडती हुई राजकन्या को धीरज बँधाया ।।१७४-१७५।।

वह सोचने लगा कि अब इसे (राजकुमारी को) फिर रनिवास में कैसे पहुँचाऊँ ? ॥१७६।।

इतने मे ही आकाशवाणी हुई - 'हे विदूषक ! तुमने इस प्रव्राजक को मारा है, इसे यह वैताल और सरसो सिद्ध थे ।। १७७।।

इसीलिए इसकी पृथ्वी का राज्य और राजकुमारी को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई थी। किन्तु आज यह ठगा गया ।। १७८।।

इसलिए 'हे वीर। तुम उसके सरसो के दाने ले लो, इससे केवल एक आज की रात तुम्हारी आकाश में गति हो जायगी' ॥ १७९॥

यह सुनकर वह प्रसन्न हुआ। सच है, ऐसे वीर और सत्कार्यकर्ताओ को देवताओं की भी कृपा प्राप्त होती है।॥१८०॥

तब विदूषक ने उस मृत साधु के आँचल से सरसों निकालकर एक हाथ में लिये और दूसरे हाथ से राजकन्या को गोद में लेकर बाहर निकला ।। १८१।।

जब वह देवी के मन्दिर से बाहर निकला तब उसे पुनः दूसरी आकाशवाणी सुन पडी- 'हे महावीर ! महीने के अन्त मे तुम इस मन्दिर में फिर आना, यह भूलना नही' ।।१८२-१८३।।

यह सुनकर और उमे स्वीकार करके देवी की कृपा से राजकुमारी को लिये हुए विदूषक आकाश की ओर उड़ा ।।१८४।।

आकाशमार्ग से जाकर राजकन्या को उसके भवन में पहुंचाकर और उसे धीरज बँधाकर बोला- 'सबेरे आकाश में उड़ने की मेरी शक्ति न रहेगी। वह केवल इसी रात के लिए प्राप्त थी। तब इम घर से निकलते हुए मुझे मब लोग देखेगे। इसलिए मैं अभी ही जा रहा हूँ' ।।१८५-१८६।।

विदूषक के भलीभाँति समझाने पर भी डरती हुई बालिका उससे बोली- 'तुम्हारे जाने पर भय से काँपते हुए मेरे प्राण अब निकल रहे है। इसीलिए हे महापुरुष! तुम न जाओ। स्वीकार किये हुए कार्य का निर्वाह करना सज्जनों का स्वाभाविक व्रत (नियम) है' ।॥१८७-१८८॥

यह सुनकर महा प्राणवान् विदूषक सोचने लगा, 'जो भी हो, मैं नहीं जाता। यह भय से प्राणों को छोड देगी। तब मेरी राज-सेवा ही क्या हुई?'। ऐसा मोचकर वह वही राजकन्या के भवन में ठहर गया। घोरे-धीरे श्रम और जागरण से थका हुआ वह रात मे भी सो गया। किन्तु डरी हुई राजकुमारी ने जाग करके ही सारी रात व्यतीत की ।।१८९-१९१।।

'यह कुछ देर विश्राम कर ले'- इस प्रकार स्नेहपूर्ण-हृदया राजकन्या ने उसे प्रातःकाल नहीं जगाया। तब रनिवास की सेविकाओं ने अन्दर आकर उसे देखा और घबराकर राजा से निवेदन किया ।।१९२-१९३।।

राजा ने भी तत्त्व जानने की इच्छा से अपने निजी सेवक को भेजा। उसने अन्दर जाकर उस विदूषक को देखा ।। १९४।।

राज-सेवक ने राजकुमारी के मुंह से सुना हुआ सारा समाचार राजा से कह दिया ।। १९५॥

विदूषक के मन और बल को जाननेवाला राजा 'यह क्या बात है?'- ऐमा सोचता हुआ व्याकुल-सा हो गया। और कन्या के भवन से विदूषक को बुला ठीक-ठीक समाचार पूछा। उसने भी प्रारम्भ से अन्त तक सारा समाचार कह डाला। और कपड़े के कोने में बँधे हुए उन चोरों की कटी हुई नाक भी दिखा दी, साथ ही प्रव्राजक के उन भूमिभेदी सरसों के दानों को भी दिखाया ।। १९६-१९९।।

राजा ने सारी घटना को सत्य समझकर सभी मठवासी ब्राह्मणों को चक्रधर के साथ बुलाया और उसने मूल कारण जानकर श्मशान में जाकर उन तीनों नक-कटो को देखा और कटे हुए गलेवाले उस दुष्ट साधक को (देवी मन्दिर में) देखा ॥२००-२०१।।

इन प्रमाणों से विश्वस्त राजा ने कन्या को प्राणदान करनेवाले विदूषक को अपनी कन्या प्रदान कर दी। सच है, उदार व्यक्तियो के उपकारों के लिए कौन-सी वस्तु अदेय है ? ॥२०२-२०३॥

राजकुमारी के हाथ में लक्ष्मी का निवास था, इसी कारण विदूषक ने उसका पाणि-ग्रहण करते ही लक्ष्मी को प्राप्त किया ।।२०४।।

वह यशस्वी विदूषक अपनी पत्नी के साथ आदित्यसेन के घर राजाओ के समान रहने लगा ॥२०५।।

कुछ दिनों के बाद देव से प्रेरित राजकन्या ने रात्रि में विदूषक से कहा कि 'हे स्वामिन् ! क्या तुम्हें स्मरण नही है कि देवी-मन्दिर में आकाशवाणी ने कहा था कि 'एक मास बाद तुम यहाँ आना' । तदनुसार आज मास समाप्त हो गया, आप उसे भूल गये। पत्नी से यह सुनकर विदूषक प्रसन्न हुआ। और बोला- 'प्रिये ! तुमने अच्छा स्मरण किया, मैं उसे भूल ही गया था'। ऐसा कहकर उसने उसे पुरस्कार में आलिंगन किया ।।२०६-२०९।।

उसके सो जाने पर रात में वह विदूषक तलवार लेकर स्वस्थतापूर्वक देवी-मन्दिर को गया ।।२१०।।

मन्दिर के बाहर पहुँचकर उसने आवाज दी- 'हे! मैं विदूषक आ गया।' बन्दर से किसी की आवाज आई कि 'अन्दर आओ' ॥२११॥

उसने अन्दर जाकर दिव्य स्थान देखा। उसके अन्दर दिव्य रूप और दिव्य वस्त्रधारिणी सुन्दरी को देखा। वह अपनी कान्ति से अन्धकार को ऐसे दूर कर रही थी, मानों शिव के कोप से जले हुए कामदेव को जिलाने के लिए जलती हुई सजीवनी औषधि हो ।। २१२-२१३।।

'यह क्या देख रहा हूँ' - इम प्रकार आश्चर्यचकित विदूषक का उस प्रसन्न सुन्दरी ने बड़े ही मान-सम्मान के साथ स्वागत किया ॥२१४।।

कुछ समय के अनन्तर आश्वस्त होकर बैठे हुए और उस सुन्दरी का परिचय प्राप्त करने के लिए उत्सुक विदूषक को वह सुन्दरी स्वयं कहने लगी- 'मैं महान् वंश में उत्पन्न भद्रा नाम की विद्याधरी हूँ, अभी अविवाहिता कन्या हूँ। स्वेच्छाचारिणी होने के कारण उस दिन मैं यहाँ आई और तुम्हें देखा। तुम्हारे गुणों से आकृष्ट होकर मैंने ही अदृश्य रूप से तुम्हें पुनः आने के लिए आकाशवाणी की थी। मेरी विद्या से प्रेरित राजकुमारी ने आज तुम्हें याद दिलाई ।। २१५-२१८॥

भद्रा से कहे गये विदूषक ने 'ठीक है'- ऐसा स्वीकार करके गन्धर्व-विधान से उसके साथ विवाह कर लिया। और, वही रात-भर ठहरकर, पौरुष-समृद्धि के फलस्वरूप, उस प्रिया के साथ दिव्य आनन्द लेने लगा ।। २१९-२२१॥

इसी बीच रात के अन्त में उठी राजकुमारी पति को न देखकर सहसा दुःखी हो गई ।। २२२।।

उठकर व्याकुल और आंसुओं से डबडबाते आँखोंवाली कुमारी लड़खड़ाती पैरों से माता के पास गई ।। २२३।।

अपने द्वारा किये गये अपराध पर पश्चात्ताप करती हुई राजकुमारी ने माता से कहा कि 'मेरा पति रात में कहीं चला गया' ।। २२४।॥

पुत्री के स्नेह से माता के व्याकुल हो जाने पर क्रमशः राजा भी उठा और बहुत व्याकुल हो गया ॥ २२५॥

मालूम होता है कि 'वह (मेरा पति) श्मशान के बाहरवाले देवी मन्दिर में गया होगा'- राजकुमारी के ऐसा कहने पर राजा आदित्यसेन स्वयं मन्दिर की ओर गया ।॥ २२६।।

वहाँ पर विद्याधरी की विद्या के प्रभाव से तिरोहित विदूषक को राजा ने नही देखा ॥ २२७।।

तब राजा के लौट आने पर निराश हुई उस राजकन्या से किसी ज्ञानी ने आकर कहा- 'तुम किसी प्रकार के अनिष्ट की शका न करो। वह तुम्हारा पति जीवित है और शीघ्र ही दिव्य भोगों से युक्त तुम्हे मिलेगा' ।। २२८-२२९।।

यह सुनकर हृदय में पैठी हुई पति के लौटने की आशा से राजकन्या ने किसी तरह अपने जीवन की रक्षा की ।॥२३०।।

इधर जब विदूषक भद्रा नाम की विद्याधरी के साथ दिव्य भोगो का आनन्द ले रहा था, इसी बीच भद्रा की योगेश्वरी नामक सखी वहाँ आई ॥२३१।।

वह आकर भद्रा में एकान्त मे बोली कि 'हे मखि! तुमने मनुष्य के साथ सम्पर्क कर लिया है। इसलिए विद्याधर तुमपर बहुत क्रुद्ध हैं और तुम्हारा अहित करना चाहते है, इसलिए तुम यहाँ से भाग जाओ ।।२३२-२३३।।

पूर्व समुद्र के पार कार्कोटक नामक नगर है। उसे पार करके शीतोदा नाम की पवित्र नदी है। उसे पार करके उदयनामक महान पर्वत है, जो सिद्धो का क्षेत्र है।॥ २३४।।

वह उदय पर्वत विद्याधरी से आक्रमण नहीं किया जा सकता। वहाँ तुम जाओ और अपने प्यारे इस पुरुष के लिए चिन्ता न करो ॥ २३५॥

यह सब इस मनुष्य को बता देना, तब यह प्राणवान् वीर पुरुष, तुम्हारे जाने के अमन्तर वहाँ पहुंच जायगा ।। २३६।।

उस सखी के द्वारा डराई गई उस भद्रा ने विदूषक के प्रति अत्यन्त अनुरक्त होने पर भी उसकी बात मान ली ॥२३७।।

भद्रा, विदूषक को सारी घटना समझाकर और अपनी अंगूठी उसे देकर रात्रि के अन्त में स्वयं अन्तर्धान हो गई ॥२३८॥

विदूषक ने उस पुराने घर में न अपने को, न भद्रा को और न मन्दिर को देखा ॥ २३९॥

यह सब विद्याधरी की विद्या का प्रभाव समझकर और अंगूठी को देखता हुआ विदूषक खेद और आश्चर्य के वशीभूत हो गया। उसकी बात को स्वप्न के समान स्मरण करता हुआ विदूषक सोचने लगा कि वह उदय पर्वत का पता बताकर गई है। इसलिए उसे प्राप्त करने के निमित्त मुझे भी वही शीघ्र जाना चाहिए ॥२४०-२४१॥

यदि मैं न जाऊँगा और लोग मुझे देखेगे, तो राजा मेरी इस स्थिति को देखकर मुझे छोड़ देगा ।।२४२।।

ऐसा सोचकर शरीर में धूल इसलिए ऐसी युक्ति करता हूँ कि जिसमे मेरा काम सिद्ध हो सके बुद्धिमान् विदूषक ने अपना रूप बदल लिया। फटे-पुराने कपड़े पहिने, लपेटे हुए वह देवीमन्दिर से बाहर निकलकर 'हा भद्रे ! हे भद्रे' इस प्रकार रटने लगा ॥२४३-२४४।।

उस ममय उसे इम स्थिति मे देखकर उस देश के निवासी 'यह तो वही विदूषक है'- ऐसा हुल्लड़ मचाने लगे। राजा आदित्यसेन ने यह समाचार जानकर उसे उस रूप में देख-कर पकड़वाकर अपने घर बुलाया ।। २४५-२४६।।

वहाँ स्नेह-भरे भूत्यों एव बन्धुओ के विविध प्रश्नों पर केवल 'हा भद्रे', 'हा भद्रे' ही कहता रहा ।।२४७।।

वैद्यों द्वारा बताये गये उबटनों के लगाने पर भी वह पुनः बहुत-सी धूल उठाकर शरीर में लपेट लेता था ॥ २४८।।

राजकुमारी द्वारा प्रेमपूर्वक लाई गई भोजन की थाली को वह पैरो से मारकर फेंक देता था ।।२४९।।

इस प्रकार पागलपन का प्रदर्शन करता हुआ, अपने कपड़ों को फाड़ता हुआ, यह विदूषक लापरवाही से कुछ दिनो तक वहाँ रहा ।। २५०।।

'इसका रोग असाध्य है, इसे व्यर्थ कष्ट क्यों दिया जाय ? 'यदि कही इसने प्राण त्याग दिये तो व्यर्थ की ब्रह्महत्या लगेगी, वह स्वच्छन्दचारी अपने समय से ही आरोग्य होगा'- राजा आदित्यसेन ने ऐसा सोचकर उसे छोड़ दिया ॥ २५१-२५२।।

वह स्वच्छन्दचारी पागल विदूषक, उंगली में अंगूठी पहने हुए धीरे-धीरे भद्रा की ओर चला (उदय पर्वत) ॥२५३॥

पूर्व दिशा की ओर दिन-रात चलने-चलते उसे मार्ग में पौण्ड्रवर्धन नाम का नगर मिला ।। २५४।।

'माता ! एक रात मैं यहाँ निवास करना चाहता हूँ' - ऐसा कहकर वह किसी बूढ़ी के मकान में घुसा ।। २५५।।

आश्रय देना स्वीकार करके तुरन्त ही उसका स्वागत करके दुःखित-हृदया ब्राह्मणी उसके समीप आकर बोली- 'बेटा! यह सारा घर मैंने तुम्हें ही दे दिया, तुम इसे लेलो; क्योंकि मेरा जीवन अब समाप्त हो रहा है' ।। २५६-२५७।।

'तुम ऐसा क्यों कर रही हो? - विदूषक से इस प्रकार पूछी गई वृद्धा फिर बोली- 'सुनो, मैं तुम्हे सब सुनाती हूँ' ।॥२५८॥

बेटा, इस नगर मे देवसेन नामक राजा है। उसके एक परम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जो भू-तल का भूषण थी ।। २५९।।

राजा ने 'मैने इसे बडे ही दुःख मे पाया है' ऐसा सोच अत्यन्त वात्सल्य-स्नेह-युक्त होकर उसका नाम 'दुःखलव्धिका' रखा ।। २६०।।

कुछ समय व्यतीत होने पर, यौवन को प्राप्त उस कन्या को, अपने घर पर लाये हुए कच्छप-देश के राजा के लिए दे दिया ।। २६१।।

वह कच्छपनाथ उसके साथ वास घर में प्रवेश करते ही तत्क्षण मर गया ॥ २६२।।

इस घटना से दुःखी होकर देवसेन ने वह कन्या दूसरे राजा को दो, किन्तु वह भी इसी प्रकार मर गया ।।२६३।।

जब इस भय के कारण अन्य किसी राजा ने उस कन्या को लेना स्वीकार नही किया तब राजा ने अपने सेनापति को आज्ञा दी कि तुम इसी नगर से प्रतिदिन एक-एक ब्राह्मण या क्षत्रिय पुरुष को लाकर इस कन्या के शयनागार में भेजो। देखते है कि कबतक कितने मरते है ! जो इसमें सफल हो जायगा, नही मरेगा, वही इसका पति होगा। आश्चर्यकारी देव की गति-विधि जानी नही जा सकती ।।२६४-२६७।।

इस प्रकार राजा की आज्ञा से सेनापति, प्रतिदिन पारी के क्रम से, एक-एक युवा पुरुष को लाता रहा ।। २६८।।

इस प्रकार क्रमशः एक सौ व्यक्ति मारे गये, मुझ अभागिन का भी एक ही पुत्र है ।।२६९।।

उसकी पारी आज है। आज वह मरने के लिए जायगा। इसके मर जाने पर मैं प्रातः-काल आग में प्रवेश करके जल मरूँगी ।। २७०।।

इसलिए जीवित अवस्था में तुम्हारे ऐसे गुणवान् को सारा घर दान देती हूँ, जिससे फिर इस प्रकार का कष्ट न भोगना पड़े। ऐसा कहती हुई वृद्धा से वीर-धीर विदूषक बोला- 'अम्मा ! तुम घबराओ मत। आज पारी में मैं जाऊँगा, तुम्हारा एकलौता बेटा जीवित रहे। इसे क्यों मरवाऊँ'- इस प्रकार तुम मुझपर दया भी न करना, मेरे पास ऐसे सिद्धियोग है, जिनसे मुझे वहाँ जाकर मरने का भय नहीं है। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर बूढ़ी बोली- ।॥२७१-२७४।।

'मालूम होता है कि मेरे पुण्य-प्रभाव से तुम किसी देवता के रूप में आये हो, इसलिए मेरे पुत्र को प्राण-दान करो और अपना भी कल्याण करो' ।।२७५।।

इग प्रकार वृद्धा की सम्मति प्राप्त करके वह विदूषक सायंकाल सेनापति से नियुक्त किय गये दून के साथ राजकन्या के यहाँ गया ।। २७६।।

वहां जाकर उमने यौवन के मद में मदमाती और फूलो के न तोड़ने के कारण भार से झुकी हुई लता के समान राजकन्या को देखा ।। २७७।।

तब रात्रि मे राजकन्या के सो जाने पर पलग पर ध्यान से प्राप्त अपनी तलवार को लिये हुए विदूषक जाग रहा था और यह सोच रहा था कि देखता हूँ, यहाँ कौन है, जो मनुष्यों को मार देता है ॥ २७८-२७९।।

सब लोगों के सो जाने पर उसने किवाड़ों को खोलकर दरवाजे से घुसते हुए भीषण राक्षस को देखा ॥२८०॥

उसने द्वार पर खड़े-खड़े ही सैकड़ों पुरुषो के लिए यम-दंड के समान भीपण भुजा को घर के अन्दर डाला ।।२८१।।

विदूषक ने दौड़कर क्रोध से जसकी भुजा को एक ही खड्ग-प्रहार से काट डाला ॥ २८२॥

कटे हुए हाथोवाला वह राक्षस मानों उसके उत्कृष्ट बल से डरकर फिर न आने के लिए शीघ्रता से भाग गया ।।२८३।।

राजकन्या ने जागकर उस कटकर गिरे हुए राक्षस के हाथ को देखा और उसे देखकर डरी, प्रसन्न हुई तथा अचरज से चकित-सी रह गई ।।२८४।।

प्रातःकाल राजा ने कन्या के शयनागार के द्वार पर पड़े हुए और कटकर गिरे हुए हाथ को देखा ॥ २८५॥

राजा ने समझा कि विदूषक ने अब से लेकर यहां दूसरो का प्रवेश न हो, ऐसा सोचकर द्वार पर परिध (शस्त्र) के समान भुजा की अर्गला लगा दी है।॥ २८६।॥

तब अत्यन्त प्रसन्न राजा ने दिव्य प्रभावशाली विदूष को धन के साथ कन्या प्रदान की ।। वह विदूषक भी, मूत्तिमती सम्पत्ति के समान उस सुन्दरी राजकन्या के साथ कुछ दिनो तक रहा ।।२८७-२८८।।

एक बार भद्रा से मिलने की शीघ्रता के कारण विदूषक रात में उठकर चल पड़ा ।।२८९।।

दूसरे दिन प्रातःकाल राजकुमारी उसे न देखकर अत्यन्त दुःखी हुई; किन्तु राजा ने उसके पुनः लौटने की आशा दिलाकर उसे धीरज बंधाया ।। २९०।।

वह विदूषक भी, दिनरात चलते-चलते, पूर्व समुद्र के समीप ताम्रलिप्ति नामक नगरी में पहुंचा ॥ २०,१।।

उसने वहाँ पर समुद्र-पार जाने की इच्छा रखनेवाले स्कन्ददास नामक व्यापारी वैश्य से मित्रता की ।। २९२।।

और अत्यधिक धन से भरे हुए उसके जहाज पर चढ़कर विदूषक ने समुद्र-मार्ग से यात्रा की ।। २९३।।

क्रमशः जहाज समुद्र के बीच पहुँच गया और किसी वस्तु से फंसकर वही अड़ गया ।। २९४।।

रत्नो से समुद्र की पूजा करने पर भी जब जहाज हिला नही, तब अत्यन्त दीनता से बनिये ने कहा कि मेरे इस फंसे हुए जहाज को जो छुड़ा देगा, उसे मैं अपनी सम्पत्ति का आधा हिस्सा और अपनी कन्या दे दूंगा ।। २९५-२९६॥

यह सुनकर धैर्यशाली विदूषक ने कहा कि 'मैं पानी में उतरकर खोज करता हूँ और तुरन्त इस फंसे जहाज को छुड़ाता हूँ ॥ २९७।।

तुम लोग मुझे जाल और रस्थियों से कसकर बाँधो और ऊपर से पकड़े रहो ॥२९८॥

जब जहाज छूटकर चलने लगे, तब तुमलोग उन रस्सियों द्वारा मुझे ऊपर खींच लेना' ॥२९८।।

उस वैश्य के स्वीकार करने पर जहाज के खलासियों ने इसे रस्सियों से दोनों ओर से कसकर बाँध दिया ॥ ३००।।

इस प्रकार बंधा हुआ विदूषक समुद्र में उतर पड़ा। वीर पुरुष मौका आने पर कभी हिम्मत नही हारता ।।३०१।।

ध्यान करते ही उपस्थित होनेवाले खड्ग को हाथ में लिये हुए विदूषक जहाज के नीचे पानी में गोता लगाकर गया ।।३०२।।

वहाँ उसने एक विशालकाय सोये हुए पुरुष को देखा, जिसकी जाँघो में फंसकर जहाज रुक गया था ।।३०३।।

विदूषक ने तलवार से उसकी विशाल जंघा काट डाली और रुकावट हटने से जहाज चल पडा ।। ३०४।।

यह देखकर उस दृष्ट (बेईमान बनिये ने घोषित धन के लोभ से उसके शरीर से बंधी रस्सियो को काट डाला और वह वैश्य अपचरित्र के समान छुटे हुए जहाज से महान् लोभके समान समुद्र के पार पहुँच गया ।।३०५।।

रस्सियों के कट जाने से समुद्र के बीच निराधार तैरता हुआ धीर विदूषक जल से निकलकर सोचने लगा कि इस पापी बनिये ने यह क्या किया। अथवा क्या कहा जाय ? धन के लोभ से अन्धे कृतघ्न उपकार को देखने या समझने में समर्थ नही होते ।। ३०६-३०७।।

इसलिए अब यह समय घबराने का नहीं है, धैर्य को खो देने पर छोटी-सी विपत्ति भी दूर नही की जा सकती, यह तो भीषण विपत्ति है ॥३०८॥

ऐसा सोचकर वह उस जंघे पर चढ बैठा, जो उसने अन्दर सोये हुए पुरुष की काट दी थी ॥३०९।।

दोनों हाथों से डंडे का काम लेकर उसी जाँघ के सहारे विदूषक ने समुद्र को पार कर लिया। सच है, साहसियों को दैव भी सहायता देता है ॥३१०।।

राम के लिए समुद्र के पार आये हुए हनूमान् के समान उस वीर विदूषक को आकाश वाणी ने कहा- ॥३११।।

'हे विदूषक ! बहुत अच्छा, तुम सच्चे वीर पुरुष हो।' तुम्हारे जैसा बीर दूसरा कौन है। तुम्हारे इस धैर्य से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम मुनो ॥ ३१३॥

'इस समय तुम नग्नदेश में आये हो, यहाँ से सात दिनों में कर्कोटक नगर में पहुँचोगे। वहाँ पहुँचकर तुम्हे धैर्य प्राप्त होगा, तब अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करोगे। तुमने हव्य-कव्य खाने बाले मेरी पहले आराधना की थी ।।३१४-३१५।।

अब मेरे ही वरदान से तुम्हे भूख-प्यास नही सतावेंगी। तुम अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जाओ'- ऐसा कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ।।३१६।।

विदूषक, इस आकावाणी को सुनकर हर्षित हुआ और अग्नि को प्रणाम करके चला एव सातवे दिन कर्कोटक नगर में पहुँच गया ।। ३१७।।

वहाँ पहुँचकर बह एक मठ में घुसा, जिसमें श्रेष्ठ जन, तथा अतिथियो से स्नेह रखने वाले भिन्न-भिन्न देशो के निवासी ब्राह्मण निवास करते थे ॥ ३१८।।

वह मठ, वहाँ के राजा आर्यवर्मा ने बनवाया था और बहुत समृद्ध था ।। ३१९।।

उसमें मुर्वण की सुन्दर देव प्रतिमा थी। मठ के निवासियो ने विदूषक का स्वागत किया। एक ब्राह्मण उस अतिथि (विदूषक) को घर ले गया और घर ले जाकर स्नान, भोजन और वस्त्रो से उसकी सेवा की ।।३२०।।

सायकाल उम मठ में आकर ठहरे हुए उसने नगाड़े के साथ की जाती हुई यह घोषणा सुनी ॥३२१॥

कि जो कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिय राजकुमारी को ब्याहने के लिए चाहता हो, वह आज रान को राजकुमारी के घर में निवास करे ॥ ३२२।।

यह सुनकर माझी विदूषक को इस पोपणा में किसी कारण की आशंका न करके रात में वहाँ जाने के लिए तैयार हो गया ॥ ३२३।।

उसे उद्यत देखकर मठ-निवासी ब्राह्मण ने उसे कहा- 'हे ब्राह्मण ! ऐसा साहस न करना। वह राजकुमारी का भवन नही, वह मृत्यु का खुला हुआ मुँह है। उसमें रात को जो प्रवेश करता है, वह जीवित नहीं रहता, अनेक साहसी व्यक्ति गये और मर गये ।। ३२४-३२५।।

उन मठवासी ब्राह्मणों के बहुत मना करने पर भी उनकी बात को अस्वीकार करके विदूषक राजसेवको के साथ वहाँ गया ।। ३२६।।

वहाँ पर राजा आर्यवर्मा ने उसे देखकर अभिनन्दन (स्वागत) किया और रात को वह राजकन्या के शयनागार में इस प्रकार घुसा, जैसे रात्रि को अग्नि में सूर्य प्रवेश करता है ।।३२७।।

उसने वहाँ जाकर आकार से प्रेममयी और निराशा के दुःख से व्याकुल एवं आँसू-भरे नेत्रो से निहारती हुई राजकन्या को देखा ।। ३२८॥

विदूषक वहाँ सतर्क होकर स्मरणमात्र से उपस्थित होनेवाले अग्नि देवता के खड्ग को हाथ में लिये हुए रात-भर जागता रहा। सहसा उसने शयनागार के द्वार पर एक अत्यन्त भीषण राक्षस को देखा, जो दाहिना हाथ कट जाने से छाती को फैलाये हुए था ।।३२९-३३०।।

उमे देखकर विदूषक ने सोचा कि ओह! यह तो वही राक्षस है, जिसका हाथ मैंने पौण्ड्रवर्धन नगर में काटा था ।। ३३१।।

तो आज इसका हाथ नहीं काटता, नहीं तो यह पहले की तरह भागकर कहीं चला जायगा। अत इसे भली भाँति मार डालता हूँ ॥३३२॥

ऐसा सोचकर और दौड़कर उसने उसके बालों को पकड़ा और गला काटने के लिए तलवार उठाई ।।३३३।।

तब वह डरा हुआ राक्षस बोला- 'तुम मुझे मत मारो, तुम साहसी वीर पुरुष हो। मुझ पर दया करो' ।॥ ३३४।।

'तुम कौन हो ? और तुम्हारा यह क्या कार्य है?' इस प्रकार वीर विदूषक के पूछने पर वह राक्षस फिर बोला ।॥३३५।।

'मैं यमदंष्ट्र नामक राक्षस हूँ। मेरी दो कन्याएँ हैं, एक तो यह और दूसरी पौण्ड्रवर्धन राजा की ।।३३६।।

'इन दोनों कन्याओं की कायर पुरुषों के संसर्ग से रक्षा करना' इस प्रकार भगवान् शिव की आज्ञा हुई। इसमें एक वीर ने पहले पौण्ड्रवर्धन में मेरी भुजा काटी और आज तुमने मुझे जीत लिया। अब मेरा यह कार्य समाप्त हुआ' ॥३३७-३३९।।

राक्षस ने और कहा कि 'तुम पुरुष नही, देवता का अंश हो। समझता हूँ, तुम्हारे लिए ही शिवजी की आज्ञा की कृपा हुई थी ।। ३४०।।

अब तुम मेरे मित्र हो गये। तुम जब कभी संकट में स्मरण करोगे, तब मैं तुम्हारी सफलता के लिए उपस्थित रहूँगा' ।॥३४१॥

इस प्रकार विदूषक को मित्रता से वरण करके और उसकी स्वीकृति प्राप्त करके राक्षस यमदंष्ट्र अन्तर्धान हो गया ।॥ ३४२॥

राजकुमारी से साहस और वीरता के लिए प्रशंसित प्रसन्नचित्त विदूषक ने वही रात बिताई ।॥ ३४३।।

प्रातःकाल राजा ने, सब वृत्तान्त जानकर विदूषक के शौर्य की अद्वितीय पताका के समान उस राजपुत्री को पर्याप्त दहेज (धन) के साथ उसके लिए दे दिया ।।३४४।।

विदूषक ने उसके गुणों से बंधी हुई अतएव उसका साथ न छोड़ती हुई लक्ष्मी के समान उन कुछ रात्रियों को राजकुमारी के साथ व्यतीत किया ।। ३४५।।

एक दिन भद्रा के प्रति उत्सुक विदूषक रात में चुपचाप चल दिया। सच है, दिव्य रस का आस्वाद प्राप्त कर लेने पर कौन दूसरे रसों की चाह करता है ? ॥३४६।।

नगर से बाहर निकलकर विदूषक ने राक्षस का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित और नमस्कार करते हुए राक्षस को विदूषक ने कहा ॥३४७।।

'मित्र। मुझे उदय पर्वत पर सिद्धक्षेत्र में भद्रा नाम की विद्याधरी के लिए जाना है, इस लिए तुम मुझे वहाँ ले चलो' ।।३४८।।

ठीक है, चलो, ऐसा कहते हुए राक्षस के कन्धे पर चढ़कर वह विदूषक रातो-रात दुर्गम और साठ योजन लम्बी शोतोदा नदी के किनारे पहुँचा। प्रात काल मनुष्यों के लिए अलध्य शीतोदा नामक नदी को पार करके, विना परिश्रम ही, उदयाचल के समीप जा पहुँचा ।।३४९-३५०।।

उदय पर्वत के समीप पहुँच कर राक्षस ने कहा- 'श्रीमान् ! यह तुम्हारे सामने उदय पर्वत है। सिद्धो के निवास स्थान इस पर्वत पर मेरी गति नहीं है' ।।३५१।।

ऐसा कहकर और विदूषक की आज्ञा पाकर राक्षस के अन्तर्धान होने पर विदूषक ने वहाँ एक सुन्दर बावली देखी ।। ३५२॥

खिले हुए कमलों से मुख-शोभा को घारण करती हुई वह बावली, गुंजारते हुए भौरों के शब्दों से, मानो उसका स्वागत कर रही थी ।। ३५३।।

उस बावली के तट पर उसने स्त्रियों के पैरों की पंक्तियाँ देखी, जो मानों उसे यह कह रही थीं कि तुम्हारी प्रियतमा के मिलने का मार्ग यही है ।।३५४।।

विदूषक ने सोचा कि यह पर्वत मनुष्यो के लिए अलङ्घनीय है। अतः यहीं बैठकर देखता हूँ कि यह पैरों की पक्तियाँ किस की हैं? ॥३५५॥

वह ऐसा सोच ही रहा था कि बहुत-सी सुन्दरियाँ, सोने के घड़े लिये हुए जल भरने के लिए बावली पर आई ।।३५६।।

पानी से घड़े भर लेने के अनन्तर विदूषक ने उन सुन्दरियों से स्नेह-सरस शब्दों में पूछा कि यह जल किसके लिए ले जा रही हो ।। ३५७।।

उन सुन्दरियों ने कहा- भद्र ! इस पर्वत पर भद्रा नाम की विद्याधरी निवास करती है। यह उसके स्नान का जल है ।। ३५८।।

यह सत्य है कि साहसिक कार्यों को प्रारम्भ करनेवाले वीरों के लिए विधाता स्वयं ही उपयोगी सामग्री घटित कर देता है ।। ३५९।।

इतने में ही उन सुन्दरियों में से एक बोली- हे महापुरुष ! घड़े को मेरे कन्धे पर रख दो ॥३६०।।

उस बुद्धिमान् विदूषक ने घडे को उसके कन्धे पर रखते हुए, भद्रा की दी हुई रत्नों की अगूठी को, उस (घडे) में धीरे से रख दिया ।। ३६१।।

और उसी बावली के किनारे फिर बैठ गया। वे स्त्रियाँ पानी लेकर भद्रा के घर चली गई ।। वहाँ जब वे भद्रा को पानी देकर स्नान कराने लगी, तव वह अंगूठी (भद्रा) उसकी गोद में गिर पड़ी ॥३६२-३६३।।

उसे देखकर भद्रा ने सहेलियो से पूछा कि क्या तुम लोगों ने किसी नये मनुष्य को देखा है ।। ३६४।।

उन्होंने कहा- हाँ, हम लोगो ने नदी के किनारे एक जवान मनुष्य को देखा है; उसने ही यह घड़ा भी उठवा दिया था ।। ३६५।।

तब भद्रा बोली- तुम लोग उसे स्नान और वेश-भूषा आदि से सज्जित करके शीघ्र ही मेरे पास ले आओ, वह मेरा पति आया है ।।३६६।।

भद्रा के इस प्रकार कहने पर और सब कुछ विदूषक से निवेदन करके उसकी सहेलियाँ स्नान किये विदूषक को भद्रा के पास ले आई ।।३६७।।

विदूषक ने उत्सुकता के साथ राह देखती हुई भद्रा को, अपने साहस-रूपी वृक्ष के पके हुए फल के समान, देखा ॥ ३६८।।

भद्रा भी उसे देखकर हर्ष के आँसुओं से मानों अर्घ्य देती हुई उसके गले में लिपट गई और उसे अपनी भुज-लता रूपी पाश से बाँध लिया ।।३६९-३७०।।

तदनन्तर बैठे हुए दोनों परस्पर देखते हुए अघाते नहीं थे। मानों सैकड़ोंगुनी बढ़ी हुई उत्कंठा (चाह) उनमें भरी थी ॥ ३७१॥

'इस स्थान पर कैसे आये?' भद्रा के इस प्रकार पूछने पर विदूषक उसी समय बोला- १३७२।।

'तुम्हारे प्रेम के सहारे अनेक प्रकार के प्राण-संशयों को प्राप्त करते हुए आया हूँ और क्या कहूँ ?' यह सुनकर और प्राणों की परवा न करनेवाले उसके प्रेम को देखकर अत्यन्त स्नेह पूर्ण भद्रा उससे बोली- ।।३७३-३७४।।

'आर्यपुत्र ! मुझे अपनी सखियो या सिद्धियों से कुछ भी प्रयोजन नही; हे स्वामी ! मैं तो तुम्हारे गुणों से खरीदी हुई दासी हूँ' ।। ३७५।।

तब विदूषक बोला- 'यदि ऐसा है तो मेरे माथ आओ। इस दिव्य योग को छोड़कर उज्जयिनी रहने के लिए चलो' ।।३७६।।

भद्रा ने तुरन्त उसकी बात स्वीकार कर ली और इस प्रकार का विचार करने से नष्ट हुई विद्या को तृण के समान छोड दिया ।। ३७७।।

भद्रा की सखी योगेश्वरी के समस्त प्रबन्ध करने पर विदूषक ने उस रात को वहीं विश्राम किया ।। ३७८।।

और प्रातःकाल ही भद्रा के साथ उदयाचल से नीचे उतर कर यमदंष्ट्र नामक राक्षस को विदूषक ने फिर याद किया ।। ३७९।।

स्मरण करते ही उपस्थित राक्षस को मार्ग के कार्यक्रम बताकर और भद्रा को उसके कन्धे पर चढ़ाकर विदूषक स्वय भी उस पर सवार हो गया ।। ३८०।।

उस अति कोमल भद्रा ने भी राक्षस के कठोर कन्धे पर चढ़ने का कष्ट सहन किया। प्रेम-पराधीन रमणियाँ क्या नहीं करती ? ॥३८१॥

प्रेयसी के साथ राक्षस पर सवार विदूषक फिर उसी कर्कोटक नगर में पहुँचा ॥३८२।।

राक्षस को देखने के कारण व्याकुल जनता से देखा जाता हुआ विदूषक जरा आर्यवर्मा के समीप गया और अपनी पत्नी को माँगा ।। ३८३।।

अपने बाहुबल से प्राप्त की हुई आर्यवर्मा की लड़की को साथ लेकर उसी प्रकार राक्षस पर सवार होकर वह कर्कोटक नगर से चला ॥३८४।।

समुद्र के तट पर पहुँच कर उसने उस धूर्त बनिये को पकड़ा, जिसके फंसे जहाज को छुड़ाकर शर्त में उसकी कन्या को जीत लिया था और जिसने पहले रस्सी काटकर उसे समुद्र में डुबाने के लिए छोड़ दिया था ॥३८५।।

विदूषक ने उसका सारा बन अपहरण कर लिया, धनापहरण को ही उसने वैश्य के पाप का दण्ड माना; क्योकि धन ही कंजूसों का दूसरा प्राण होता है।। ३८६।।

इस प्रकार बनिये की बेटी को लेकर उसी राक्षस-रूपी रथ पर बैठा हुआ विदूषक भद्रा और राजकुमारी के साथ आकाश में उड़ गया ।।३८७।।

आकाश-मार्ग से, समुद्र में किये गये अपने पौरुष का वर्णन करता हुआ विदूषक क्रमशः समुद्र पार कर गया ।।३८८।।

इस प्रकार, वह क्रमश. पौण्ड्र-वर्धन नगर में पहुँचा। राक्षस को वाह्न बनाये हुए उस विदूषक को सभी पुरवासी आश्चर्य से देख रहे थे ।। ३८९-३९०।।

पौण्डवर्धन नगर में विदूषक ने राक्षस को पराजित की हुई चिरकाल से उत्सुक देवसेन राजा की कन्या का स्वागत किया ।। ३९१।।

राजा देवसेन द्वारा रोका जाता हुआ भी विदूषक उज्जैन जाने के लिए उत्सुक हो रहा था, अतः वहाँ रुका नहीं और उसे भी साथ लेकर उज्जैन पहुँचा ॥ ३९२-३९३।।

विशाल शरीरवाले राक्षम के ऊपर बैठे हुए और कन्धे पर बैठी हुई अपनी वधू की शोभा से शोभित होते हुए विदूषक को, उज्जयनी की जनता ने जलती हुई औषधियोवाले पूर्वाचल के शिखर पर चमकते हुए चन्द्रमा के समान देखा ।।३९४-३९५।।

नागरिकों के आश्चर्यचकित और व्याकुल होने पर समस्त वृन्तान्त जानकर विदूषक का श्वसुर राजा आदित्यसेन उसके सन्मुख आया ।। ३९६।।

तब विदूषक ने, राक्षस के कन्धे से शीघ्र ही उतरकर राजा को प्रणाम किया। राजा ने भी उसका अभिनन्दन किया ।। ३९७।।

तदनन्तर विदूषक ने राक्षस के कन्धे पर बैठी हुई सभी पत्नियों को उतारकर उसे स्वतन्त्रता-पूर्वक विचरण करने के लिए छोड़ दिया ।।३९८।।

राक्षस के चले जाने पर विदूषक, अपनी पत्नियों को लिये हुए राजा के साथ राजभवन में गया। राजभवन में जाकर राजा की कन्या और अपनी प्रथम पत्नी से मिला, जो चिरकालीन विरह के कारण अत्यन्त उत्कण्ठित हो रही थी। ३९९-४००।।

उज्जयिनी-नरेश आदित्यसेन ने विदूषक के प्रभाव को देखकर उसे अपने जामाता को आधा राज्य प्रदान कर दिया ।।४८ १।।

राजा ने विदूषक से पूछा कि ये इतनी पत्नियाँ कैसे प्राप्त की और यह राक्षस कौन है ? विदूषक ने क्रमशः सारा वृतान्त सुना दिया ॥४०२।।

आधा राज्य प्राप्त करके वह विदूषक उसी क्षण राजा बन गया। उसके मस्तक पर ऊँचा छत्र लग गया और दोनों ओर बँवर हुलने लगे ॥४०३।।

मांगलिक बाजों के शब्द से भरी हुई नगरी ऐसी मालूम हो रही थी मानों हर्ष के कारण प्रसन्नता प्रकट कर रही हो ।।४०४।।

इस प्रकार राज्य-वैभव प्राप्त करके विदूषक धीरे-धीरे सारी पृथ्वी को विजय करके, स्नेह से एक साथ रहती हुई भद्रा आदि पत्नियों के साथ चिरकाल तक आनन्द का अनुभव करता रहा ।।४०५।।

इस प्रकार, दैव के अनुकूल होने पर मनुष्य का अपना ही बल और साहस लक्ष्मी को हठ पूर्वक आकृष्ट करने का महामन्त्र हो जाता है ॥४०६।॥

आश्चर्यमयी इस कथा को वत्सराज के मुंह से सुनकर वे सभी यौगन्धरायण आदि मन्त्री तथा दोनों महारानियाँ (वासवदत्ता, पद्मावती) अत्यन्त प्रसन्न हुई ।।४०७।।

चतुर्थ तरङ्ग समाप्त

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1. इसका नाम अद्भुतोपमा है। उसका उदाहरण दण्डी के काव्यादर्श में इस प्रकार है-- हे सुध्रु ! यवि सुन्दर नेत्रों बाला कमल हो तो तेरे मुंह की शोभा धारण कर सके। काव्य प्रकाशकार ने इस अलंकार को अतिशयोक्ति का एकभेव माना है।

2. आनन्दाक्षु शीतल और शोकाश्रु गरम होते हैं। देखिए कालिदास--आनन्दजः शोकजमधुवाष्पस्तयोरशीतं शिशिरो विभेव । गङ्गा-सरप्वोर्जलमुष्ण तप्तं हिमाद्रिनिष्यन्व इवा-वतीर्ण :- रघुवंश १४-३। 17

3. सिहासन बत्तीसी की कथा में भोजराज के विषय में इसी ढंग की कया मिलती है। उसे भी उसी प्रकार सिहासन की प्राप्ति हुई थी। 47

4. सृष्टि के प्रारम्भ में सात ग्रह, एक राशि में थे और प्रलयकाल में भी वे एक राशि में एकत्र होंगे ऐसा ज्योतिष-सिद्धान्तवादियों का मत है। ज्योतिष-सिद्धान्त से अनेक पापग्रहों का एक राशि पर एकत्र होना अनिष्टकारी होता है। 129

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