5904. || चतुर्थ कहानी || नरवाहनवल का मृगया-वर्णन; चार दिव्य पुरुवों की कथा; नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति; नरवाहनदत्त का नारिकेलद्वीप में जाना; समुद्र वैश्य की कथा; राजा चमरवाल की कथा; राजा बहुसुवर्ण की कथा; अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा;

5904. || चतुर्थ कहानी || नरवाहनवल का मृगया-वर्णन; चार दिव्य पुरुवों की कथा; नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति; नरवाहनदत्त का नारिकेलद्वीप में जाना; समुद्र वैश्य की कथा; राजा चमरवाल की कथा; राजा बहुसुवर्ण की कथा; अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा; 

चतुर्थ तरंग

नरवाहनदत्त का मृगया-वर्णन

तदनन्तर, परम स्नेही गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ पिता बत्सराज के घर में रहता हुआ और मान के विश्न को सहन न कर मकने के कारण प्रेम से नष्ट ईर्ष्यावाली अनुरागिणी अलंकारवती के साथ विहार करता हुआ नरवाहनदत्त, पीछे बैठे हुए गोमुख के साथ रथपर बैठकर मृगया-वन (शिकारगाह) को गया ।॥१-३॥

आगे-आगे चलते हुए नवीन ब्राह्मण सेवक प्रलम्बबाहु के तथा अपने सैनिकों के साथ वह आखेट करने लगा ॥४॥

रथ के घोड़ों के, पूरे प्राण लगाकर भागे जाने पर भी, प्रलम्बबाडू, उनके वेग को जीतकर, सदा उनके बागे ही रहता था ।।५।।

नरवाहनदत्त, रथ में बैठकर सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं को मारता था; किन्तु प्रसम्ब बाहु, पैदल हो चलता हुआ तलवार से हो उन्हें मार डालता था ।।६।।

नरवाहनदत्त, प्रलम्बबाहु के कौतुक को, देख-देखकर आश्चर्यचकित होता था और कहता था-'ओह क्या इसकी वीरता है और कितना इसकी जाँघों में बल है ।।७।।

अन्त में प्रलम्बबाडु के आगे रहते-रहते ही नरवाहनदत्त, गोमुख और सारची के साथ आलेट करके थक गया और रय पर चड़ा हुआ ही प्यास से व्याकुल होकर पानी ढूंडते-ढूंढते जंगल में चला गया ।॥८-९॥

उस वन में, उसने, बिने हुए मोने के कमलों से शोभित एक सुन्दर सरोबर देला, जो मानों अनेक मूयों से युक्त पृथ्वी पर उतरे आकाश के समान प्रतीत होता था। उस सरोवर में स्नान करके और पानी पीकर बैठे हुए नरवाहनदत्त ने उस वन के एक ओर, चार पुरुयों को देलां ॥१०-११॥

दिव्य रूपवाले, दिव्य वस्त्रों और अलंकारों से आभूषित चारों व्यक्ति, उस सरोवर से, सोने के कमलों को, चुन-चुनकर ले रहे थे ।॥१२॥

कौतुकवश नरवाहनदत्त उनके समीप गया और उनके यह पूछने पर कि तू कौन है, उसने अपने नाम, वंश आदि का पूरा परिचय दे दिया ॥ १३॥

चार दिव्य पुरुवों की कथा 

उसके देखने से प्रसत्र उन चारों ने परिचय पूछने पर कहा-'महासमुद्र के मध्य में बहुत सम्पन्न और विशाल सुन्दर द्वीप है, जो संसार में नारिकेल द्वीप के नाम से विख्यात है। उसमें चार पर्वत मैनाक, वृषभ, चक्र और बलाहक हैं, जो दिव्य भूमिवाले हैं। उन चारों पर्वतों पर हम चारों निवास करते हैं।॥ १४-१६١١

हमलोगों में एक का नाम रूपसिद्धि है, जो विविध प्रकार के रूप धारण करता है। दूसरा प्रमाणसिद्धि है, जो बड़े ही सूक्ष्म प्रमाणों को देखता है ॥ १७॥

तीसरा ज्ञानसिद्धि है, जिसे भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों का ज्ञान है और पौषा देवसिद्धि है, जिसे सभी देवताओं की सिद्धि प्राप्त है ॥१८॥

हम चारों इन सोने के कमलों को लेकर श्वेतद्वीप में भगवान् कमलापति (विष्णु) की पूजा के लिए जा रहे हैं ।॥१९॥

हमलोग उन्हीं के भक्त हैं और उन्हीं की कृपा से उन पर्वतों पर हमारा राज्य है और सिद्धियों के साथ सम्पत्तिर्वा भी प्राप्त हैं ।॥२०॥

तो चलो, श्वेतद्वीप में तुम्हें हरि का दर्शन करावें। मित्र, यदि तुम्हें अच्छा लगे, तो हमलोग तुम्हें आकाश-मार्ग से ले चले, ॥२१॥

इस प्रकार कहते हुए देव सूत्रों को स्वीकृत्ति देकर, फल और जल से स्वाधीन उस स्थान पर गोमुक्त आदि साथियों को ठहराकर वह उनके साथ जाने को तैयार होगया ।॥२२॥

उन चारों में देवसिद्धि ने उसे अपनी गोद में बैठाकर आकाश मार्ग से श्वेतद्वीप की यात्रा की ॥२३॥

नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति

श्वेतद्वीप में पास बैठी हुई लक्ष्मी और चरणों के पास बैठी हुई धरित्री से शोभित, शरीरधारी, शंल, चक्र, गदा और पद्म इन शस्त्रों से सेवित, गन्धर्वी और नारद बादि से गाकर स्तुति किये जाते हुए, सामने बैठे हुए गरुड़ से मेवित और शेषनाग की शय्या पर सोये हुए हरि को, उन चारों देवपुत्रों द्वारा पहुंचाये गये नरवाहनदत्त ने देखा। सच है, सज्जनों का मभागम किसके कल्याण के लिए नहीं होता ॥ २४-२७।।

तब उन देवदुत्रों और कश्यप आदि द्वारा स्तुति किये गये भगवान् की नरवाहनदत्त ने हाथ जोड़कर स्तुति की-॥२८॥

'हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे लक्ष्मी-रूरी लता से लिपटे हुए शरीरबाले ! हे अभीष्ट-फल देनेवाले, तुम्हें प्रणाम है।॥२९॥

सज्जनों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाले, निरन्तर नाद करते हुए और अनन्त आकाश में विहार करनेवाले तुम दिव्य हंस के लिए नमस्कार है ॥ ३०।।

सबसे अतिरिक्त रहनेवाले, सबके अन्तर में विराजमान गुणों से परे रहनेवाले और पूरे छह गुणों की मूत्तिवाले तुम्हारे लिए प्रणाम है ।॥३१॥

बेदाध्ययन के कारण मृदु ध्वनि करते हुए और उससे उत्पन्न अनेक चरणोंवाले ब्रह्मा भी आपके समीप भ्रमर के समान लगते हैं ।॥३२॥

आकाश तुम्हारा शिर है, विशाएँ तुम्हारे कान हैं, सूर्य और चन्द्रमा तुम्हारे नेत्र हैं और सारा ब्रह्मांड तुम्हारा उदर है। अतः, तुम परमपुरुष कहे जाते हो ।॥३३।।

हे प्रभो, यह समस्त प्राणियों का समूह और तेज का पुंज तुमसे वैसे ही उत्पन्न होता है, जैसे जलती हुई बग्नि से चिनगारियाँ ॥ ३४।।

यह सारा भूत-संघात (प्राणि-समूह), प्रलयकाल में तुम्हारे ही अन्दर उसी प्रकार समा जाता है, जैसे सायंकाल के समय पक्षियों का समूह महावृक्ष में समा जाता है ।॥३५॥

अनन्त बेला से क्षुब्ध होकर समुद्र जैसे तरंग उत्पन्न करता है, वैसे तुम भी अपने अंश से इन्द्र आदि लोकनालों को उत्पन्न करते हो ।॥ ३६॥

तुम विश्वरूप होकर भी अ-रूप (रूपहीन) हो। विश्वकर्मा होकर भी अक्रिय (कर्म-रहित) हो। विश्व के अवार होकर भी स्वयं निराधार (आधार-रहित) हो। वह कौन है, जो तुम्हारी बास्तविकता को जान सकता है।॥ ३७।

तुम्हारी कृपा-दृष्टि से ही देले गये देवता उन महान् ऐश्वयों को प्राप्त करते हैं। अतः, मुझ पर कृपा करो। शरण में आये हुए मुझे करुण दृष्टि से देखो' ।॥ ३८॥

इस प्रकार, स्तुति किये गये नरवाहनदत्त को प्रसन्न दृष्टि से देखकर हरि ने, नारद से कहा-'जाओ, क्षीर-समुद्र से उत्पन्न हुई अप्सराओं को मैंने इन्द्र के पास अपनी धरोहर के रूप में रखा था. उन सबको रथ में बैठाकर तुम शीघ्र मेरे कहने से यहाँ ले आजओ' ॥३९-४१॥

विष्णु के इस प्रकार कहने पर नारद मुनि ने 'जो बाजा' कहकर तुरन्त ही मातलि के साथ रथ में बैठी अप्सराओं को लाकर उपस्थित किया ॥४२।।

नारद द्वारा अप्सराओं के लाने पर उस वत्सराज के पुत्र को भगवान् ने आदेश दिया है नरवाहनदत्त ! विद्याधर-राजाओं के होनेवाले चक्रवर्ती! तुझे मैंने ये अप्सराएँ दे दीं। तू इनका योग्य पति है और ये तेरी योग्य पत्नियाँ। क्योंकि, शिव ने पहले ही तुझे कामदेव का अवतार बनाया है।॥४३-४५।।

यह सुनकर भगवत्कृपा प्राप्त करने के कारण प्रसन्न उस वत्तेश्वर के पुत्र के चरणों में गिरने पर, हरि ने मातलि को आज्ञा दी कि इस नरवाहनदत्त को, अप्सराओं-सहित जिस मार्ग से यह चाहे, घर पहुंचा दो ॥४६-४७७॥

भगवान् के ऐसा आदेश देने पर नरवाहह्नदत, अप्सराओं के साथ, मातलिद्वारा संचालित रथ पर बैठा, ॥४८॥

नरवाहनदत्त का नारिकेलद्वीप में जाना

देवताओं से ईर्ष्या किया जाता हुआ नरवाहनदत्त उन देवदुत्रों से निमन्त्रित होकर उप रथ से नारिकेलद्वीप को गया ।॥४९॥

नारिकेल-द्वोप में, रूपसिद्धि आदि चारों देवनुत्रों से सत्कृत नरवाहनदत्त, मैनाक, वृषभआदि स्वर्ग से होड़ लेनेवाले उन चारों पर्वतों पर अप्सराजों के साथ रमण करने लगा ।।५०-५१॥

कौतुकी वह नरवाहनदत्त, वसन्त के आगमन से विकसित, नाना प्रकार के पुष्पों से शांभित बनों और वृक्षोंवाले उन पर्वतों की उद्यान-भूमि में, विहार करता था ।।५२।।

'देखो, ये वृक्षों को मंजरियाँ, दुष्प-रूरी बड़ी-बड़ी विकसित आँखों से आते हुए अपने कान्त वसन्त को देख रही हैं ।॥५३॥

देवी, हमारा जन्म-क्षेत्र इस सरोवर में मूर्व-किरणों का प्रचंड सन्ताप न पहुँच सके, मानों इसीलिए कमलों ने व्विलकर नालाब को ढक लिया है।॥५४॥

देखो, खिले हुए कणिकार के गन्धहीन पुष्पों को भौरे उमी प्रकार छोड़ रहे हैं, जैसे श्रीमान् के नीच होने पर सज्जन उसे छोड़ देते हैं ।।५५।।

यहाँ देखो, किन्नरियों के गान, कोकिलों की कूक और भौरों की गुनगुनाहट गानों ऋतुराज के आगमन के संगीत है । ।॥५६॥

इस प्रकार, कहते हुए देवपुत्रों ने नरवाहनदत्त को अपने उद्यानों की पंक्तियाँ दिखाई ॥५७॥

नरवाहह्नदत, वसन्तोत्सव का आनन्द-नृत्य करती हुई नागरिक स्त्रियों के गान का आनन्द लेता हुआ उस नगर में आनन्द-क्रीडा करता रहा। वह यहाँ अप्सराओं के साथ देवताबों के योग्य आनन्द-भोग करता रहा। भाग्यवान् व्यक्ति जहाँ भी जाता है, भोग उसके साथ पहले ही वहाँ उपस्थित हो जाते हैं।॥५८-५९॥

इस प्रकार, वह तीन-बार दिनों तक वहाँ रुककर अपने उन मित्र देवपुत्रों से कहने लगा-'पिताजी को देखने की उत्कंठा है। अतः, अब मैं अपनी नगरी को जाता हूँ। देखिए, आपलोग मेरी नगरी में आकर मुझे कृतार्थ कीजिए ॥६०-६१॥

यह सुनकर वे बोले-'उस नगरी के सारभूत आपको हमने देख लिया, और क्या कहें? जब आपको सभी विद्याएँ प्राप्त हो जायें, तब हम लोगों को आप स्मरण करें' ।॥६२॥

इस प्रकार कहकर उनसे विदा किया हुआ नरवाहनदत्त, इन्द्र के रस को लेकर आये हुए सारथी मातलि से बोला- 'उस दिब्य सरोवर के समीप, जहाँ गोमुख आदि ठहरे हैं, चलकर उसी मार्ग से मुझे कौशाम्बो पहुँवाओं ॥६३-६४।।

'वैमा ही करूंगा' मातलि से ऐसा कहा गया वह नरवाहनदत्त अप्मराओं के साथ रखपर चढ़कर उग मरोवर पर पहुंचा और वहाँ गोमुख, प्रलम्बबाडू आदि को उसने देखा ।।६५।।

और उनमे बोला 'आप लोग अपने ही मार्ग से आओ। 'घर पर मब कुछ कहूंगा'-ऐसा कहकर वह इन्द्र के रव में कौशाम्बी चला गया ॥६६॥

वहाँ पर आकाश से उतरकर और मातलि को सत्कार के माथ विदा करके अप्मराओं के साथ वह अपने भवन में गया ।॥६७॥

उन अप्सराओं को वहां ठहराकर वह उसके आगमन में प्रसन्न अपने पिता बत्सराज के पास गया और उसके चरणों की वन्दना की ॥६८॥

इसी प्रकार, उमने माता वामवदत्ता और पद्मावती के चरणों में प्रणाम किया। दर्जन में अनुप्त आंखों में उसे देवकर माताओं ने उसे आशीर्वाद दिया ॥६९॥

इतने में ही गोमुख भो रथ पर चड़ा हुआ। मारथी और प्रलम्बवाहु नामक उस ब्राह्मण के माय वहां आ पहुंचा ॥७०॥

तदनन्तर, सभी मन्त्रियों के आ जाने पर पिता द्वारा पूछे गये नरवाहनदत्त ने, अपना अत्यन्त आयवयंमव यात्रा-वृत्तान्त उन्हें मुनाया ॥७१॥

'ईश्वर, जिम पुष्वकर्मा पर कृपा करता है, उसे अच्छे और कञ्याणकारी मित्रों का संयोग कराता है ॥ ७२॥

सब लोगों के ऐसा कहने पर वत्मराज ने, अपने पुत्र पर भगवान् विष्णु की कृपा का महोत्सव मनाया ॥७३।

तब राजा (वत्सराज) ने विष्णु की कृपा से प्राप्त उन नई वबुओं (अप्सराओं) को देवा, जिन्हें राजा और रानी के चरणों की वन्दना करने के लिए गोमुख वहां लाया था ।।७४।।

दासियों द्वारा नाम पूछने पर उन चारों ने अपने नाम देवरूपा, देवरति, देवमाला और देवप्रिया बतन्नाया ॥७५॥

उस समय वायु से हिलती हुई लाल पताकाओं से उत्सव मनाती हुई कौशाम्बी में कहाँ और अप्सराएँ कहाँ ? नरवाहनदत्त ने तो पृथ्वी पर मुझे स्वर्ग की नगरी के समान बना दिया- इस प्रसन्नता से मानों सिन्दूर उड़ाती थी ।॥७६-७७७॥

माता-पिता की आँखों को आनन्द देनेवाले नरबाहनदत्त ने, प्रतीक्षा करती हुई अपनी अन्यान्य पत्नियों को जाकर प्रसन्न किया ॥७८॥

के मब चार वर्षों के समान चार दिनों में सूखकर लकड़ी-मी हो गई थीं? उन्होंने अपनी-अपनी विरह-वेदनाओं का वर्णन करते हुए नरवाहनदत्त को आनन्दित किया ।॥७९॥

तब गोमुख ने, वनवास के समय उसके रथ के घोड़ों की रक्षा करते हुए हाथों से ही सिह आदि हिंसक जन्तुओं को मार डालने की प्रलंबबाहु की वीरता का वर्णन किया ॥८०॥

इस प्रकार, आनन्द देनेवाली इधर-उधर की बातों को सुनते हुए और पत्नियों का नवनामून पान करके उन्हें रिझाते हुए तबा और मन्त्रियों के साथ मयवान करते हुए नरवाहनदत्त के दिन गुन्यपूर्वक बीतने लगे ॥ ८१-८२॥

एक बार अलंकारवती के भवन में मित्रों के माय बैठे हुए नरवाहनदन ने. बाहर की ओर में कोड-नगाड़ों का शब्द गुना ॥८३॥

तब उसने अपने सेनापति हरिशिस में कहा पहां अकस्मात् यह ढोल-नगाड़ों का शब्द कहों में ओर कैसे हो रहा है?' ॥८४॥

समुद्र वैश्य की कथा

यह सुनकर बाहर निकलकर और तुरन्त लौटकर हरिशिख ने स्वामी नरवाहनदल से निवेदन किया- "स्वामी, इस नगरी में समुद्र नाम का एक बनिया है। वह व्यापार के लिए यहाँ से सुवर्ग-द्वीप को गया ॥८-५८६॥

वहां ग लौटते हुए उसका अपना और कमाया हुआ भी धन, समुद्र में जहाज के डूब जाने से नष्ट हो गया ॥८७॥

इन दुर्घटना में वह बनिया, वैवयोग से जीवित, समुद्र के बाहर निकल आया और अपने घर पहुँच गया। आज उमे पर पहुंचे हुए छठा दिन है। इसी बीच जब वह अन्यन्त दुःखी होकर अपने घर रहता था. तब उसने अपने बगीचे में एक गड़ा हुआ बहुत बड़ा खजाना पाया ॥८८-८९।।

यह बात उस के सगे भाई-बन्धुओं द्वारा महाराज उदयन को जात हुई। इसलिए, आज उस बनिये ने, स्वयं आकर महाराज से निवेदन किया-॥९०॥

'हे स्वामी मैंने रत्नों के ढेर के माथ सोने के चार करोड़ सिक्के जजाने से पाये हैं, यदि महाराज की आज्ञा हो, तो में उन्हें लाकर महाराज की सेवा में अपित करें ।॥९१॥

'समुद्र द्वारा धननाश किये जाने पर तुम्हे वीन देखकर भाग्य ने धन दिया है' तो उसे कोन समझदार लेना बाहेगा ?॥९२॥

इसलिए, तुम जाओ। अपनी भूमि से प्राप्त धन का अपने इच्छानुसार उपभोग करो, वत्सराज द्वारा इस प्रकार कहा गया वह वैश्य, हर्ष से भरकर महाराज वत्सराज के चरणों में गिर पड़ा और अब ढोल-नगाड़े बजाता हुआ अपने परिजनों के साथ अपने घर जा रहा है ।॥९३-९४।।

हरिनिख के ऐसा कहने पर और पिता की घामिकता सुनकर चकित नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों से बोला ।॥९५॥

'दैव मनुष्यों का धन छीनकर, पुनः तुरन्त ही क्यों दे देता है? इग प्रकार देव मनुष्यों के उत्थान और पतन से खेल करता है, यह आश्चर्य है ! ' ।॥९६॥

यह मुनकर गोमुख ने कहा-इंच की गति ऐसी ही है। इस सम्बन्ध में ममुद्र सूर की कथा गुनो' ॥९७॥

समुद्रशूर वैश्य को कथा

पूर्व ममय में राजा हर्षवर्मा का हपुर नाम का विशाल नगर था. जिसमे मुराज्य के कारण प्रजा अत्यन्त प्रसन्न थी ॥९८॥

उम नगर में समुद्रशूर नाम का एक बनिया था। वह कुलीन, घामिक धैर्यशाली और बहुत धनवाला था ।॥९९॥

एकबार ममुद्रसूर व्यत्वार के लिए स्वर्गद्वीप को जाते हुए माल-सामान लेकर और ममुद्र के तट पर पहुंचकर नांव पर चढ़ा ॥१००॥

उस नाव में, ममुद्र में जाते हुए कुछ ही मार्ग क्षेत्र रहने पर भीपण बादल आकाश में उठा और समुद्र को क्षुब्य कर देनेवाला भारी तूफान भी आ गया ।।१०१०

ऊंबी-ऊँची लहरों द्वारा नाव के फेंक दिये जाने और अन्ततः उसके डूब जाने के कारण वह बनियां कमर कमकर समुद्र में कूद पड़ा ॥१०२॥

कूरने पर कुछ समत्र तक वह हाथों को चलाकर समुद्र में तैरता रहा। तब उस ममुद्र में तैरते हुए एक मुर्दे का दाव उसके हाथ लग गया। वह वैश्य उस पर चढ़कर हाथो से पानी को चलाता हुआ बाबू के अनुकूल होने के कारण सुवर्ण-द्वीप के तट पर पहुंच गया ।॥ १०३-१०४।।

बहां पहुँचकर वह उस तव से उत्तर पड़ा और उसकी कमर में बंधी हुई घोती की वह देखने लगा, जिसमें एक गाँठ बंधी भिली। उसने जब उसकी कमर में घोती निकालकर उस गांठ क। खोलकर देखा, तो उस गाँठ में एक दिव्य और रत्नमय कंठाभरण उसे दिखाई पड़ा ॥१०५-१०६॥

उस अमूल्य कंठाभरण को देखकर वह प्रसन हुआ और भलो भाँति स्नान करके उस एक हार के सामने उसने, समुद्र में डूबी हुई अपनो सम्पति को तुच्छ समझा ॥१०७।।

हाथ में उस कंठहार को लिये हुए वह क्रमशः कलशपुर नामक नगर में पहुंचा और वहाँ एक देव-मन्दिर में गया ॥ १०८॥

पानी में तैरते-तैरते बका हुआ वह बनिया भाग्यवश वहाँ अच्छी छाया पाकर धीरे-धीरे सो गया ।॥१०९।।

उसके मोते हुए में ही नगर के पहरेदार अकस्मात् उधर आ निकले और उन्होंने उसके हाथ में खुले हुए उस हार को चमकते देला ।।११००॥

'यह हार हमारी राजकुमारी चक्रसेना का है। इमने ही उसके गले से झपट लिया है, इसलिए यह अवश्य चोर हैं ॥१११॥

ऐसा कहकर वे पहरेदार उसे जगाकर राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के उससे पुछने पर उसने मब सत्व ममाचार राजा से कह दिया ॥११२।।

'यह बोर है. झूठ बोलता है। ऐसा कहकर और हार को फैलाकर राजा ने सभासदों को दिखलाया ॥११३॥

कान्ति से चमकते हुए उस हार को आकाश में उड़ते हुए एक मीष ने देखा और राजा के हाथ में उमे अपटकर वह आकाग में ले उड़ा तया अदृश्य हो गया ।॥११४।।

तदनन्तर अत्यन्त दीन उम वैश्य के शिव के नाम लेकर चिल्लाहट मचाने पर, राजा ने, कुद्र होकर उसके वर का आदेश दे दिया, किन्तु इतने में ही आकाशवाणी हुई ।।११५।।

'ई राजन् इसे मत मारो। यह मज्जन बनिया समुद्रशूर तुम्हारे देश में व्यापार करने आया है ॥११६।।

हार को जिम चोर ने चुराया था, वह सिपाहियों के डर से घबराया हुआ रात को समुद्र में डूब गया। यह बनिया नाव के टूट जाने पर उसी चोर के शव पर बैठकर हाथों से समुद्र पार करके यहाँ आया है। उस शव को कमर में बंधी हुई घोती की गाँठ से बनिया ने यह हार पाया है। अतः, इमने यह हार तुम्हारे पर से नहीं लिया है ।। ११७- ११९।।

इमलिए, यह चोर नहीं है। हे राजन्, इस धार्मिक वैश्य को छोड़ दो और सम्मानित करके इसे विदा करो। इतना कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ॥१२०॥

यह सुनकर सन्तुष्ट हुए राजा ने उसे छोड़ दिया और धन से सम्मानित करके उसे विदा किया। उस वैश्य समुद्रशूर ने भी, उस घन से व्यापार का सामान लेकर स्वदेश आते हुए उस भयंकर महासमुद्र को पार किया ॥ १२१-१२२॥

उस किनारे पहुंचकर और नाव से उतरकर वैश्य व्यापारियों के झुंड के साथ क्रमशः स्वदेश जाते हुए एक दिन सायंकाल के समय एक भोवण जंगल में जा पहुँचा ॥१२३०

उस जंगल में झुंड के डेरा डालने पर और ममुद्रशूर के जागते रहने पर यहाँ डाकुओं को बलवती सेना ने आक्रमण कर दिया ।। १२४।।

उस मेना द्वारा व्यापारियों के मारे जाने पर, वह समुद्रशूर अपना सामान छोड़कर चुपचाप एक बड़े बरगद के वृक्ष पर चढ़कर छिप गया ।॥१२५।।

ममस्त व्यापारियों का माल, लूटकर चले जाने के कारण भय से व्याकुल और दुःख से पीडित समुद्रशूर ने वह मारी रात, उसी वृक्ष पर बिताई ॥१२६॥

प्रातःकाल दैववन वृक्ष के ऊपरी भाग में दृष्टि डालते हुए समुद्रशूर ने, पत्नों के झुरमुट में चमकती हुई दीपक की लौ-मी देखी ॥१२७॥

आश्चर्य चकित वैश्य उसे देखकर, जब ऊपर चड़ा, तब उमने वहां गीध का घोंसला देखा, जिमके भीतर से अमुल्य रत्नों का प्रकाश बाहर छिटक रहा था ॥१२८॥

उस वैश्य ने घोंसले में हाथ डालकर उसे उठा लिया और वही कंठहार उसे वहां दील पदा, जिसे उसने मुवर्ग-द्वीप में पाया था और जिसे राजमना में गीच झपट ले गया श्रा ॥१२९॥

तब उस अनन्त धन को प्राप्त करके बनिया उम वटवृक्ष में नीचे उतरा और प्रसन्न होकर जाता हुआ क्रमणः अपने हर्षपुर नगर में पहुँच गया। वहाँ ओर एन कमाने की चाह छोडकर वैश्य समुद्रशूर, अपने परिवार के पास आनन्दपूर्वक रहने लगा। समुद्र में गिरना, धन का डूबकर नाश होजाना, गले का हार पाना, मुर्दे पर बैठकर समुद्र पार करना, फिर उसका छिप जाना, निष्कारण मृत्युदंड मिलना, उसी क्षण प्रसन्न द्वीप के राजा में धन की प्राप्ति होना, मार्च में फिर डाकुओं द्वारा उसका भी अपहरण हो जाना और अन्त में उस वृक्ष मे फिर घन (हार) की प्राप्ति होना--आदि देलकर मानना पड़ता है महाराज, कि बैंव की गति विचित्र है। किन्तु, पुण्यवान् व्यक्ति पहले दुःसा का अनुभव करके अन्त में सुख पाता है ।।१३०-१३५।।

गोमुल से यह कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त स्नान आदि नित्यकर्म के लिए सभा से उठ गया ।॥१३६।।

दूसरे दिन सभा में बैठे हुए उसके पास उसका बाल-मित्र और शूर राजपूत समरतुंग आकर बोला-'महाराज, मेरे कुटुम्बी दायाद संग्रामर्ष ने, वीरजित आदि चार पुत्रों की सहायता से मेरे देश जीत लिये हैं ॥ १३७-१३८॥

तो, मैं जाकर उन पाँचों को बाँवकर लाता हूँ, आपको यह विदित हो ऐसा कहकर वह चला गया ।॥ १३०॥

नरवाहनदत ने, समरतुंग की सेना को न्यून (कम) और संग्रामवर्ष की मेना को अधिक जानकर ममरतुंग की सहायता के लिए अपनी सेना भेज दी ॥ १४०॥

वह मानी ममरर्जुन, उम सेना की सहायता लिये बिना ही वहाँ जाकर उन पांचों शत्रुओं को अपने बाहुबल में जीतकर और एक साथ ही बाँचकर ले आया ।॥१४११॥

इस प्रकार आये हुए उमस विजयी वीर का सम्मान करके नरवाहनदत ने अपने उस गवक की प्रशंगा करे ॥ १४२॥

आश्वर्य है कि विषय (देश) को आक्रान्त किये हुए पाँच इन्द्रियों के ममान इन पांच मनुत्री की जोनकर इसने पुष्धार्थ को मापना की हैं ॥१८३॥

यह सुनकर गोमुख ने कहा- स्वामिन, यदि तुमने इसी प्रकार की राजा चमरवाल की कथा न मुनी हो, जो कहता है. मुनों-॥१०४

राजा चमरवाल की कथा

हस्तिनापुर नाम का एक नगर है। वहां कोप (न्वजाना), दुर्ग (किला) और बल (मेना) मे युक्त चमरवाल नाम का राजा था। उसके साथ ही समरबल आदि उसके गोत्र में उत्पत्र दावादों के राज्य थे। उन लोगों ने एकत्र होकर मांचा ॥ १४५-१४६।।

यह चमरवाल हम लोगों में से एक-एक को सदा दबाता रहता है। अतः हम सब मिलकर इसका अपमान करें ॥१४७७॥

ऐगी सम्मति करके उस पर बढ़ाई करने के लिए उद्यत उन पांचों राजाओं ने, एकान्त में ज्योतिपी से चढ़ाई का मुहर्त पूछा ॥१४८॥

वे लोग अनुप लक्षणों को दूर करके चढ़ाई करने का शुभ लग्न पूछना चाहते थे। तब ज्योतियी ने कहा- 'इस वर्ष-भर बढ़ाई का लग्न नहीं है' ।॥१४९॥

यदि किसी प्रकार तुमने चढ़ाई की भी, तो उसमें तुम लोगों की विजय न होगी और उस चमरवाल को समृद्धि को देखकर तुम लोगों का इतना अनुबन्त्र क्यों है ? ॥१५०।।

लक्ष्मी का फल है भोग। वह तो तुम्हारे पास उससे भी अधिक है। यदि नहीं सुनी है, वो इस सम्बन्ध में दो बनियों की कथा सुनों ॥१५१॥

राजा बहुसुवर्ण की कथा

"प्राबीन काल में इस पृथ्वी पर कौतुकपुर नाम का नगर था। उस नगर में यथार्थ नाम-बाला बहुमुवर्ण नाम क। राजा था ।॥१५२॥

यशोवर्मा नाम का युबा क्षत्रिय उनका सेवक था। राजा ने दाता होने पर भी उस सेवक को कभी कुछ नहीं दिया ॥१५३॥

वह मेधक, काठ पाकर जब-जब राजा से कुछ मांगता था, तब-तब वह राजा, उमे गुर्व को दिवाकर कहना था कि मैं देना चाहता हूं, किन्तु यह भगवान् तुझे देना नहीं बाहतः। कहो, क्या करूं? ॥१५४-१५५॥

तब दुःखित वह मेवक, अवनर को चिन्ता में या कि इनने में ही सूने-यहण का समय आ गश। उस गमर वह सबक यशोवर्मा बड़े-बड़े महान् दान करते हुए राजा से उसने कहा कि मुझे कुछ दो, जो सूर्य तुम्हें देने नहीं देता. वह इस समय जबतक शत्रु से घिरा है, तबतक मुझे कुछ दे दो ॥१५९-१५८॥

ओर, दान दे।। हुआ राजा बहुमुवर्ण यह सुनकर पहले हूंगा, बाद में वस्त्र, सोना आदि दान में दिये ॥१५९॥

धीरे-धीरे उस धन को समय कर लेने पर और राजा ने पुनः न मिलने पर खिन्न वह मेवक यशोवर्मा, पत्नी के मर जाने से विरक्त होकर, विन्ध्यवामिनी को चला गया ॥ १६०॥

इम व्यर्थ शरीर से क्या लाभ ? मृत के समान इस जीवन से भी क्या लाभ? इसलिए, देवी के मामने इसे त्याग दूंगा अथवा ईप्सित वर हो प्राप्त करूंगा ।। १६१।।

ऐसा सोचकर विन्ध्यवासिनी के आगे कुशास्तरण पर बैठकर और निराहार रहकर वह कठिन तप करने लगा ।॥ १६२॥

तप से सन्तुष्ट देवी ने, स्वप्न में उसे आशीर्वाद दिया कि क्या तुझे धन-लक्ष्मी दूँ अथवा भोगलक्ष्मी दूँ ? ॥१६३॥


यह सुनकर यशोवर्मा ने देवी से कहा-'मैं इन दोनों लक्ष्मियों का भेद भली भाँति नहीं जानता' ११६४।।

तब देवी ने उनमें कहा- 'तेरे देश में जो दो बनिये भोगवर्मा और अर्थवर्मा हैं, जाकर उनकी लक्ष्मी को देखो और बताओ कि तुम्हें किसके समान लक्ष्मी चाहिए। उसे मेरे पास आकर माँगो' ।।१६५-१६६।।

यह सुनकर और जागकर प्रात. काल पारण करके यशोवर्मा अपने देश कौतुकपुर को गया ।॥१६७।।

अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा

पह‌ले वह अर्थवर्मा के घर पर गया, जिसने असंख्य मोना और रत्नों का ढेर प्राप्त किया था। उमकी इस सम्पत्ति को देखता हुआ यशोवर्मा उसके पास गया। अर्थवर्मा ने उसका आतिथ्य-मत्कार करके उसे भोजन के लिए निमन्त्रण दिया ।।१६८-१६९।।

तब यशोवर्मा ने अर्थवर्मा के यहाँ पी, मांस, व्यंजन आदिजी अतिथि के भोजन के लिए उचित थे, खाये ॥ १७०॥

अर्थवमों ने दो तोला घी में मने हुए मत्तू, थोड़ा-सा भात और अत्यल्प मांस का व्यंजन खाया ॥१७१॥

यह देखकर यशोवर्मा ने अर्थवर्मा से आश्चर्यपूर्वक पूछा हे व्यापारी, क्या तुम इतना ही भोजन करते हो? तब बनिया ने कहा- 'आज मैने तुम्हारे कारण थोड़ा-मा माम का व्यंजन खा लिया और दो तोला थी भी सत्तू के साथ वा लिया ॥ १७२-१७३।।

सदा तो मैं एक कर्व-मात्र घी सत्तू के साथ खाया करता है। इससे अधिक मुझ मन्दाग्निवाले को पचता नहीं ॥१७८॥

यह सुनकर अर्थवर्मा ने मन्देह करते हुए उसकी निन्दा की और उसकी लक्ष्मी को व्यर्थ समझा ।। १७५।।

तदनन्तर, रात्रि के समय अर्थवर्मा ने यशोवर्मा के लिए दूध और भात मंगाया। यशोवर्मा ने डटकर भोजन किया, किन्तु अर्थवर्मा ने एक छटांक भर दूब विया ॥१७६-१७७।।

भोजन के पश्चात् वे दोनों (अर्ववर्मा और यशोवर्मा) बिस्तर बिछाकर पास ही पास सो गये ॥१७८॥

तब यशोवर्मा ने, स्वप्न में देखा कि हाथों में डंडे लिए हुए कुछ भयंकर पुरुष विना भय और शंका के वहाँ घुस आये ॥१७९॥

'तूने आज एक तोला घी अधिक क्यों लाया, मांस-रस के साथ मात अधिक क्यों खाया और दूध भी एक छटांक अधिक क्यों पिया? क्रोष में ऐसा कहते हुए उन पुरुषों ने अर्थवर्मा को डंडों से खूब पीटा ॥ १८०-१८१॥

और, उसने जो मांसरस, भात, घी, दूध अधिक खा लिया था, उसे उन्होंने उसके पेट से निकाल लिया ॥१८२॥

स्वप्न में यह देखकर जगे हुए यशोवर्मा ने देखा कि अर्थवर्मा पेट के झूल से व्याकुल है ॥१८३॥

वेदना से विल्लाता हुआ और सेवकों द्वारा पेट दबाया जाता हुआ अर्थवर्मा अपने अधिक खाये हुए को बमन करने लगा। उनका शूल, शान्त होने पर, यशोवर्मा सोचने लगा कि इस अवंलक्ष्मी को विक्कार है, जिनका इम प्रकार का भांग है।॥१८४-१८५॥

यह वैश्य, लक्ष्मी से ऐसे तंग किया जाता है, तो ऐसी लक्ष्मी से दरिद्र रहना ही अच्छा है। मन में इस प्रकार मोचते हुए उसने वह रात्रि व्यतीत की ॥१८६॥

प्रातःकाल यशोवर्मा अर्थवर्मा से मिलकर वहाँ से भोगवर्मा के घर पर गया ॥ १८७७॥

वहाँ भी भोगवर्मा द्वारा समुचित सत्कार किया गया यशोवर्मा भोगवर्मा से भोजन के लिए निमन्त्रित हुआ ॥१८८॥

उसने उस वैश्य के यहाँ किसी प्रकार की सम्पत्ति का आडम्बर नहीं देखा। केवल सुन्दर स्वच्छ भवन, अच्छे वस्त्र और आभूयण-मात्र देखे ॥१८९॥

तदनन्तर, यशोवर्मा की उपस्थिति में ही भोगवर्मा ने अपना दैनिक व्यापार¹ प्रारम्भ किया ॥ १९०॥

एक से माल खरीदकर उसी समय उसने दूसरे को देदिया और अपना धन विना लगाये ही बीच में (दलाली में दीनार कमा लिया ।।१९१॥

और, शीघ्र ही उन स्वर्ण मुद्राओं को नौकर के हाथ अपनी स्त्री के पास भेजकर अच्छा भोजन बनाने के लिए निर्देश दिया ॥१९२॥

इतने में ही भोगवर्मा का इच्छामरण नाम का एक मित्र आकर शीघ्रता से उससे बोला-'हमारा भोजन तैयार है, उठो, आाओ। खा लें और भी अनेक मित्र तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठे हैं ।॥१९३-१९४।।

'मैं आज नहीं आऊँगा, क्योंकि मेरा यह मित्र पाहुना बैठा है।' ऐसा कहते हुए भोगवर्मा में उसके मित्र ने कहा-'तुम्हारे माथ तुम्हारा पाहुना भी आवे। क्या यह हमारा मित्र नहीं है ? अतः, शीघ्र उठो ॥१९५-१९६।।

वह मित्र इस प्रकार भोगवर्मा को, आग्रह के साथ ले गया और उसने यशोवर्मा के साथ जाकर उत्तम भोजन किया ॥१९७॥

नदनन्नर, ऊपर में आसव आदि पान करके सायंकाल भोगवर्मा अपने घर आया। घर आकर यशोवर्मा के माथ मायंकालीन भोजन किया ॥१९८॥

रात होने पर उसने अपने सेवकों से पूछा कि आज रात्रि के लिए पूरा जल है या नहीं। 'हां प्रभु है' सेवकों के इस प्रकार कहने पर वह वैश्य भोगवर्मा चारपाई पर यह कहते हुए सो गया कि देखें आज पिछली रात में कैमा पानी मिलता है' ।।१९९-२००।।

उमी के समीप सोये हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि दो-तीन पुरुष शयनागर में प्रविष्ट हुए और उन के पीछे 'हे दुष्टो, आज तुम लोगों ने भोगवर्मा के लिए पिछली रात में पीने के जल का ध्यान क्यों नहीं रखा' इस प्रकार कहते हुए बहुत में दंडधारी पुरुष घुसे और उन्होंने क्रोध करके डंडों से उन सेवकों को मारा ॥२०१-२०३॥

'यह हमारा पहला अवराध है. क्षमा करी ऐना कहते हुए उन सेवकों को छोड़कर वे चले गये ॥२०४।।

तदनन्तर, यह देखकर और जागकर यशोवर्मा ने मोजा कि विना चिन्ता किये ही आनेवाली भोगवर्मा की भोगश्री प्रशंसनीय है ।।२०५।।

अयं से पूर्ण होने पर भी भोग-रहित अर्थवर्मा की अर्थलक्ष्मी ठीक नहीं, ऐसा सोचते-सोचते उसकी वह रात्रि व्यतीत हो गई ॥२०६।।

प्रातःकाल ही यशोवर्मा, वैश्य भोगवर्मा से आज्ञा लेकर वहाँ से फिर विन्ध्यवासिनी के चरणों में गया ॥२०७।।

वहाँ तपस्या में बैठे हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में आई हुई विन्ध्यवासिनी से भोग-बी की प्राप्ति के लिए बर माँगा और उसने वही दिया ॥२०८॥

तदनन्तर, यशोवर्मा देवी की कृपा से घर में आकर बिना सोचे ही प्राप्त होनेवाली भोग श्री से सुखपूर्वक रहने लगा ॥२०९॥

इस प्रकार, भोग से सम्पन्न थोड़ी भी श्री अच्छी है और भोगरहित अनन्त लक्ष्मी भी व्यर्थ है ॥ २१०॥

इसलिए, तुम लोग राजा चमरवाल की कृपणता से युक्त लक्ष्मी से क्यों ईर्ष्या करते हो? दान और भोग में लगती हुई अपनी सम्पत्ति को ही क्यों नहीं देखते ॥२११॥

इसलिए, उसके प्रति तुम्हारा आक्रमण ठीक नहीं। यात्रा का लग्न भी ठीक नहीं है और तुम्हारी विजय भी नहीं दीवती ॥२१२॥

उस ज्योतिषी से इस प्रकार कहे जाने पर भी वे पाँचों ईर्ष्यालु राजाओं ने नहीं माना और उन्होंने चमरवाल पर चढ़ाई कर दी ॥२१३॥

शत्रुओं को सीमा पर गये हुए जानकर युद्ध के लिए निकलते हुए चमरबाल ने स्नान करके शिव की पूजा की ॥२१४॥

अडसरु उत्तम स्थानों के प्रनिद्ध नामों से उमने विविपूर्वक पापहरण करनेवाले शिव को म्नति की ॥२१५।।

तब उगने 'हे राजन् बिना शंका के जाकर युद्ध करो, शत्रुओं पर अवश्य विजयी होंगे'-'इस प्रकार आकाशवाणी सुनी ॥२१६॥

तब, प्रसन्न होकर और अपनी सेना को साथ लेकर राजा चमरवाल उन शत्रुओं के आगे बाया ॥२१७७।

उसके शत्रुओं की सेना में तीस हजार हाथी, तीन लाख घोड़े और एक करोड़ पैदल सैनिक थे ॥ २१८॥

उसकी अपनी सेना में बीस लाख पैदल सैनिक, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े थे ॥२१९॥

दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध प्रारम्भ होने पर राजा का वीर नाम का अंगरक्षक आगे था। तदनन्तर, राजा चमरवाल भी समुद्र में महावराह के समान स्वयं भी उस सेना में धंस पड़ा ॥२२०-२२१॥

छोटी सेनावाला होने पर भी चमरवाल ने शत्रुओं की सेना का खूब संहार किया, जिससे हाथियों घोड़ों और सैनिकों की लाशों के ढेर लग गये ॥ २२२॥

तब राजा ने आगे दौड़कर सामने आये हुए समरबल को शक्ति से आहत करके पाश से खींचकर बाँध लिया ।॥२२३॥

उसी प्रकार दूसरे समरशूर राजा के हृदय को बाण से बींपकर वैसे ही बाँष लिया ॥ २२४॥

तीसरे राजा समरजित को उसके अंगरक्षक वीर ने, बाँधकर उसके पास लाकर सौंप दिया ॥ २२५॥

चमरवाल के सेनापति देवबल ने, इसी प्रकार बाणों में आहत चोये राजा प्रतापचन्द्र को बांधकर अपने राजा को भेंट कर दिया ॥ २२६॥

यह देखकर प्रतापसेन नाम का पाँचवाँ राजा कोष से भरकर रणभूमि में चमरवाल से भिड़ गया ।॥२२७७

चमरवाल ने उसके बाणों को काटकर तीन बाणों से उमके ललाट का भेदन कर दिया ॥ २२८॥

और फिर, गले में डाले हुए पाश में काल के समान चमरवाल ने, उसे श्रीचकर अपने वश में कर लिया ॥२२९॥

इस प्रकार, क्रम से उन पाँचों राजाओं के बंध जाने पर मरने से बची हुई उसकी सेना इधर-उधर भाग गई ।। २३०।।

तदनन्तर, इन राजाओं के अनन्त धन, रत्न और सोना के अतिरिक्त बहुत-सी रानियाँ चनरवाल को विकीं। उन मर रानियों में राजा प्रतापमेन को महारानी यशांलेखा सबमे अच्छी और सुन्दरी थी ॥२३१-२३२॥

तदनन्तर, अंगरक्षक बीर, मेनापति देवबल और राजा चमरवाल विजय करके अपने नगर में पहुँचे। वहाँ जाकर राजा ने अपने सेनापति और अंगरक्षक को पट्ट बाँध करके उन्हें रत्नों में भर दिया ॥ २३३॥

राजा चमरवाल ने, प्रतापसेन की महारानी यशोलेखा को क्षात्र धर्म से जीत लेने के कारण अपने अन्तःपुर की एक रानी बना लिया ॥२३४।।

'मैं इसके बाहुबल से जीती गई हूँ'-ऐसा समझकर वह रानी यशोलेखा बंचल होकर भी राजा चमरवाल के पास स्थिर हो गई। काम और मोह से प्रवृत्त लोगों की धर्म-भावना विचित्र होती है।॥ २३५॥

कुछ दिनों के बाद रानी यशोलेला की प्रार्थना पर चमरवाल ने प्रतापसेन आदि विनय से विनम्न उन पाँचों राजाबों को छोड़ दिया और उनका सत्कार करके उन्हें अपने-अपने राज्य में भेज दिया ।।२३६-२३७।।

तदनन्तर, शत्रुओं पर विजयी हुए राजा चमरवाल अपनी उस कंटक-रहित और समृद्धि-सम्पन्न राज्य का चिरकाल तक शासन करता रहा और अप्सराबों से भी अधिक रूप-लावण्यवाली विजय-पताका के समान यशोलेला के साथ बानन्द भी उठाया ॥२३८॥

इस प्रकार, आवेग से प्रवृत्त, द्वेष से व्याकुल और अपने पराये स्वरूप को न जाननेवालों और असाधारण पुरुषार्य के आगे चूर-चूर घमंडवालों को भी एक धीर पुरुष जीत लेता है।॥ २३९॥

इस प्रकार-गोमुल से कही गई यथार्थता से भरी कथा को सुनकर उसकी प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त अपने स्नान आदि दैनिक कृत्यों में लग गया ।॥२४०।।

नरवाहनदत्त ने अपनी सभी पत्नियों के साथ संगीत-रस का पान करते हुए उस रात को भी विताया। आकाश में गूँजती हुई उसकी स्वर-सरस्वती 'चिरजीवी हो', मानों ऐसा आशीर्वाद देती थी ॥ २४१॥

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंक। रवती लम्बक का चोया तरंग समाप्त

1. आइल का काम।










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