51003 || तृतीय कहानी || नरवाहनवत्त की कथा; शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन; दो विद्यारियों की कथा; शुक की आत्मकथा; मनोरथप्रभा की कथा;
51003 || तृतीय कहानी || नरवाहनवत्त की कथा; शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन; दो विद्यारियों की कथा; शुक की आत्मकथा; मनोरथप्रभा की कथा;
तृतीय तरंग
नरवाहनवत्त की कथा (क्रमागत)
सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाह्नदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ।॥१॥
उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरी हुई बहुत-सी विद्यार्धारयों को देखा ॥२॥
उन चमकती हुई विद्यारियों के मध्य उसने, एक कन्या को, इस प्रकार देखा, मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥
उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान झूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ।॥४॥
तरंग-युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी, मानों काम-रूपी वावली की शोभा की वह मूत्तिमती अभिदेवता थी ।।५।।
कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥
'ओह ! यह तो ब्रह्मा के सौन्दर्य-सृष्टि की विचित्र रचना है, इस प्रकार कहता हुआ वह युवराज मन्त्रियों के साथ उसके पास आ गया ।।७।।
वह भी, स्नेह से स्निग्ध और तिरछी आँखों से उसे देखती थी। क्रमशः समीप आकर उसने उस सुन्दरी से पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आई ? ॥८॥
शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन
यह सुनकर वह कन्या बोली, सुनो, मैं तुम्हें बताती हूँ। हिमाचल पर्वत पर कांचन-श्रृंग नाम का सुवर्ण-निर्मित नगर है ।।९।।
वहाँ स्फटिकयश नाम का विद्याधरों का राजा है। वह बहुत धर्मात्मा है और दीन, अनाथों एवं शरणागतों का पालन-रक्षण करनेवाला है ।।१०।।
उस राजा की हेमप्रभा नाम की रानी में, पार्वती की कृपा से उत्पन्न हुई शक्तियशा नाम की कन्या मुझे जानो ॥११॥
पाँच भाइयों में सबसे छोटी और अपने पिता की प्राणों से भी प्यारी कन्या मैंने, अपने पिता की आज्ञा से व्रतों और स्तोत्रों से पार्वती को सन्तुष्ट किया ॥१२॥
उस प्रसन्न पार्वती ने, मुझे सभी विद्याएँ देकर आज्ञा दी कि 'बेटी, तुझे पिता से दसगुना विद्याओं का बल प्राप्त होगा और वत्सराज का पुत्र तथा विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त तेरा पति होगा' ।॥१३-१४॥
इस प्रकार कहकर पार्वती अन्तर्धान हो गई और विद्याबल को प्राप्त कर मैं क्रमश युवती हो गई ॥१५॥
आज रात मुझे स्वप्न में दर्शन देकर पार्वती देवी ने आज्ञा दी कि 'बेटी, प्रातःकाल ही तुम अपने पति को देखना ॥१६॥
और एक माम के पश्चान् आज के ही दिन यहाँ फिर आना। तब चित्त में इस निश्चय को ठाने हुए तुम्हारा पिता तुम्हारा विवाह-संस्कार सम्पन्न करेगा" ।॥१७॥
इस प्रकार की आजा देकर देवी चली गई और रात भी बीत गई। इसलिए, "हे आर्यपुत्र, मैं तुम्हें देखने के लिए यहां आई हूँ ॥१८॥
तुम्हारा दर्शन हुआ, अतः अब मैं जाती हूँ।" यह कहकर शक्तियशा अपनी सहेलियों के साथ आकाश में उड़कर पिता के नगर को चली गई ।॥१९॥
तब उसके विवाह के लिए व्याकुल नरवाहनदत्त, एक मास को एक युग के समान समझता हुआ अपने भवन को गया ॥२०॥
घर आकर उमे उदास देखकर गोमुख ने कहा हे स्वामी, तुम्हारे मन को बहलाने के लिए मैं एक कथा कहता हूँ, मुनी ॥२१॥
दो विद्यारियों की कथा
प्राचीन समय में कांचनपुरी नाम की एक नगरी थी। उसमें सुमना नाम का महान् राजा था ॥२२॥
दुर्गम भूमियों को आक्रान्त करके उस राजा ने शत्रुओं को भी ऐसा ही कर दिया (अर्थात्, उसके शत्रु भी दुर्गम भूमि की शरण में चले गए) ॥२३॥
एक बार सभा (आम दरबार) में बैठे हुए राजा से द्वारपाल ने आकर निवेदन किया-'महाराज, निषादों की राजकन्या मुक्तलता, पिजरे में रखे हुए शुक (तोते) को लेकर बाहर द्वार पर खड़ी है। उसके साथ उसका बड़ा भाई वीरप्रभ है। वह आपको देखना चाहती है' ॥२४-२५॥
'वे आये,' राजा के इस प्रकार कहने पर, द्वारपाल के बताने मार्ग से, वह मिल्लकज्या, राजसभा-भवन के आँगन में आई। उसके आश्चर्य जनक रूप को देखकर सभी सभासद सोचने लगे कि क्या यह मानुषी है अथवा कोई दिव्य स्त्री ॥ २६-२७॥
वह कन्या राजा को प्रणाम करके बोली-'महाराज, शास्त्रगंज नाम का चारों वेदों का ज्ञाता यह शुक है। यह कवि है। सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं में यह कुशल है। मैं इसे महाराज के लिए उपयुक्त समझकर यहाँ ले आई हूँ। आप इसे स्वीकार करें' ।॥२८-२९॥
इस प्रकार, भिल्लकन्या द्वारा समर्पित शुक को द्वारपाल ने कौतुकवण राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया। तब उस शुक ने एक श्लोक पड़ा, जिसका अर्थ है-॥३०॥
'राजन्, यह तो उचित ही है कि आपके शत्रुओं की विरहिणी स्त्रियों के लम्बे श्वासों के साथ निकलते हुए बायु से, धुएँ से श्याम मुखवाली प्रताप-अग्नि सदा धधकती रहती है; किन्तु यह आश्चर्य की बात है कि शत्रु-स्त्रियों के दुःख के कारण निकले हुए आँसुओं की बाढ़ से, यह प्रताप अग्नि दसों दिशाओं में और भी प्रचंड रूप से जलती रहती है' ॥३१॥
यह श्लोक पढ़कर और उसकी व्याख्या करके वह सुग्गा बोला- 'महाराज, किस शास्त्र से किस विषय का वर्णन करूँ, आज्ञा दीजिए ॥३२॥
तब राजा के आश्चर्य में निमग्न हो जाने पर उसका मन्त्री बोला 'प्रभो, यह पूर्वजन्म का कोई ऋषि, शापवदा सुग्गा बन गया है। इसे पूर्वजन्म की स्मृति है और उम जन्म के पढ़े हुए विषयों का भी यह स्मरण करता है ॥ ३३-३४।।
'हे भद्र, मुझे यही कौतूहल है कि तुम अपना ही वृत्तान्त बताओ तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ और शुक होने पर भी तुम्हारा शास्त्रों का ज्ञान कैसा? साथ ही, तुम कौन हो?' ॥३५॥
शुक की आत्मकथा
तब वह शुक¹ आँसू गिराकर धीरे से बोला 'यह बात यद्यपि कहने योग्य नहीं है, फिर भी आपकी आज्ञा से कहता हूँ, सुनिए' ॥३६॥
हे राजन् ! हिमालय के समीप रोहिणी का एक वृक्ष है। वेदों के समान जिसकी अनेक शाखाओं² में द्विज³ गण (पक्षी और ब्राह्मण) बाश्रय लेते हैं ।॥ ३७७।।
उस वृक्ष में एक सुग्गा, सुग्गी के साथ घोंसला बनाकर रहता था। उसी सुम्गी के गर्सेभ , अपने दुष्कर्मों के कारण मैं उत्पन्न हुजा ॥३८॥
मेरे उत्पन्न होते ही वह माता सुग्गी मर गई। पिता वृद्ध थे, वे अपने पंखों के भीतर मुझे रखकर मेरा पालन पोषण करते थे ॥३९।।
आसपास सुगों के लाकर बचे (फेंके हुए) फलों को खाते हुए और मुझे देते हुए मेरे पिता, मेरा पालन करने लगे ।।४०।।
एक बार शिकार करने के लिए तुरही, गोमुख आदि वाद्यों से भीषण शब्द करती हुई भीलों की भयंकर सेना, शिकार करने के लिए उस वन में आई ॥४१॥
उस सेना के भील, जब जंगली प्राणियों के विनाश के लिए चारों ओर दौड़-धूप कर रहे थे, तब भागते हुए कृष्णसार मृग-रूपी आँखोंवाली, धूल से भरे हुए पत्तोंवाली, भाग्य से घनराकर इधर-उधर भागते हुए चमरी मृगों के पूँछ रूपी केशोंवाली यह वनभूमि सहसा व्याकुल हो उठी ॥४२-४३॥
सारे दिन उस शिकार की भूमि में विनाश-लीला करके, मारे हुए पशुओं के बोझ को लादे हुए वह भील-सेना सायंकाल के समय उस वृक्ष के नीचे आ गई ॥४४
उसमें एक वृद्ध भील था, जिसे मांस नहीं मिला था। उस भूखे मील ने, सायंकाल के समय उस वृक्ष पर वृष्टि डाली और वृक्ष के समीप आ गया ।॥४५॥
आकर, तुरन्त ही वृक्ष पर चढ़कर उसने सुम्गों तथा अन्यान्य पक्षियों को घोसलों से निकाल-निकालकर और मार-मारकर वृक्ष के नीचे फेंकना प्रारम्भ किया ॥४६॥
उसे यम के किकर की तरह निकट आया देख मैं भय से अपने पिता के पंखों के बीच चुपके-ते दुबक गयः ॥
अब उस पापी ने, क्रमशः मेरे घोंसले को देखकर मेरे पिता को घोंसले से बाहर खींचकर, गला दबाकर मार डाला और फेंक दिया ॥४८॥
मैं भी अपने पिता के साथ भूमि पर गिरकर और उनके पंखों से निकलकर घास और पत्तों के भीतर धीरे-धीरे घुस गया ।॥४९॥
तब वह भील, नीचे उतरकर और मारे हुए पक्षियों को आग में भून-भूनकर खाने लगा। शेष कुछ सुग्गों को लेकर वह पापी अपने गाँव को चला गया ।॥५०॥
तब भय-रहित होकर मैने लम्बी रात किसी तरह बिताई और प्रातःकाल संसार के नेत्र के समान भगवान् भास्कर के उदय होने पर, पंखों के भूमि में लगने के कारण लड़खड़ाता हुआ मैं, प्यास से व्याकुल होकर, समीप स्थित पद्म सरोवर तक किसी प्रकार पहुँचा ॥५१-५२॥
उस सरोवर में स्नान करके तट की बालू पर बैठे हुए मैंने अपने पूर्वजन्मों के पुष्यों के समान मरीचि नाम के मुनि को देखा ।।५३।।
बह मुनि मुझे देखकर और जल की बूंदों को मेरे मुँह पर डालकर, मुझे धीरज बँधाकर और पत्तों के दोनों में मुझे रखकर कृपापूर्वक अपने आश्रम में ले गये ॥५४॥
वहाँ मुझे देखकर आश्रम के कुलपति पुलस्त्य ऋषि ने हँस दिया। तब अन्य ऋषियों द्वारा उनके हँसने का कारण पूछने पर पुलस्त्य ने कहा-'मैं अपना दैनिक कृत्य समाप्त करके इसकी कथा आप लोगों से कहूँगा। इस कथा को सुनने से यह सुग्गा अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा और अपना पिछला वृत्तान्त भी स्मरण करेगा। ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि, नित्य-कर्म में लग गरे ।॥५५-५७।।
नित्यकर्म करने के उपरान्त अन्य मुनियों द्वारा पुनः पूछे गये पुलस्त्य महामुनि ने, मेरे सम्बन्ध की कथा का वर्णन किया ।।५८।।
सोमप्रभ, मकरन्दिका और मनोरबप्रभा की कथा
रत्नाकर नगर में ज्योतिष्प्रभ नाम का राजा था। वह प्रचंडशासन राजा समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का शासन करता था ॥५९॥
उस राजा की तीव्र तपस्या से प्रसन्न शिवजी के वर से उसकी रानी हर्षवती के पुत्र उत्पन्न हुआ ।॥६०॥
रानी ने स्वप्न में चन्द्रमा को अपने मुँह में प्रवेश करते देखा था, इसलिए राजा ने उस पुत्र का नाम सोमप्रभ⁴ रखा ॥६१।।
प्रजाओं के नेत्रों के आनन्द को बढ़ाता हुआ वह बालक सोमप्रभ अपने अमृतमय गुणों के साथ क्रमशः बढ़ने लगा ॥६२॥
कुछ दिनों के पश्चात् पुत्र सोमप्रभ को शूर, युवा और प्रजा का प्रिय देखकर पिता ज्योतिष्प्रभ ने उसे युवराज के पद पर बैठा दिया ॥६३॥
और प्रभाकर⁵ नाम के अपने मन्त्री के सद्गुण पुत्र प्रियंकर को उसका मन्त्री बना दिया ॥६४।।
उसी समय मातलि दिव्य घोड़े को लेकर आकाश से उतरा और सोमप्रभ के समीप आकर बोला-॥६५।।
'तुम इन्द्र के मित्र विद्याधर-भूमि पर अवतार हो, इसलिए इन्द्र ने उच्चैःश्रवा नामक अपने घोड़े के पुत्र आशुश्रवा⁶ को तुम्हारे लिए भेजा है ॥६६॥
यह घोड़ा, तुम्हें प्राचीन स्नेह के कारण भेजा गया है। इस पर चढ़कर तुम शत्रुओं के लिए अजेय हो जाओगे ' ॥६७॥
इस प्रकार कहकर और उस अश्वरत्न को सोमप्रभ के लिए देकर तथा सोमप्रभ से सत्कृत होकर इन्द्र का सारथी वह मातलि आकाश में उड़कर चला गया ।॥६८॥
तब युवराज सोमप्रभ ने उत्सव से मनोहर उस दिन को, व्यतीत कर दूसरे दिन अपने पिता से कहा-॥६९॥
'पिता, क्षत्रिय का यह धर्म नहीं है कि वह विजय की इच्छा न करें। इसलिए, मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं दिग्विजय करने जाऊँ' ॥७०॥
यह सुनकर प्रसन्न उसके पिता ने 'अच्छा' कहकर उसके दिग्विजय की तैयारी की ॥७१।।
तब युवराज सोमप्रभ, माता-पिता को प्रणाम कर, सेनाओं के साथ इन्द्र के उस थोड़े पर चढ़कर शुभ दिन में दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥७२॥
उम अध्वरत्न में सभी दिशाओं में राजाओं को जीतकर, उस अनन्त शक्तिवाले सोमप्रभ ने, उनने अनेक रत्न प्राप्त किये ॥७३॥
उसने अपने धनुष के साथ शत्रुओं के शिर भी झुका दिये। वह धनुष तो फिर तन गया, किन्तु शत्रुओं के शिर फिर न उठ सके ॥७४॥
दिग्विजय करके लौटते हुए युवराज ने मार्ग में हिमालय के समीप सेना का शिविर लगाया और वन में आखेट करना प्रारम्भ किया ॥७५॥
दैवयोग में उसने सुन्दर रत्नों से अलंकृत एक किन्नर को देखा और उसे पकड़ने के लिए इन्द्र के घोड़े से उसका पीछा किया; किन्तु वह किन्नर पर्वत की किसी गुफा में घुसकर अदृश्य हो गया। सोमप्रभ को वह घोड़ा बहुत दूर ले गया ।७६-७७।।
सभी दिशाओं को प्रकाशित करके जब प्रचंडरश्मि भगवान् भास्कर सन्ध्या से संगम करानेवाली पश्चिमा दिशा में पहुँचे, तब थके हुए सोमप्रभ ने, एक सरोवर को देखा और उसी के किनारे रात बिताने की इच्छा से वह घोड़े से उतर पड़ा ॥ ३८-७९।।
घोड़े को घास-पानी देकर और स्वयं फल तथा जल ग्रहण कर एक ओर विश्राम करते हुए उसने गाने का शब्द सुना ॥८०॥
कौतुकवश गान-ध्वनि के अनुसार कुछ ही दूर जाकर उसने शिवलिग के आगे गाती हुई एक दिव्य कन्या को देखा ॥८१॥
'यह आश्चर्यजनक रूपवाली कन्या कौन है!' विस्मय के साथ वह यह सोच ही रहा था कि उस कन्या ने भी सोमप्रभ को प्रभावशाली स्वरूपवाला देखकर और उसका आतिथ्य सत्कार करके उससे कहा-॥८२॥
'तुम कौन हो और अकेले ही इस दुर्गम भूमि में कैसे पहुंचे ?' यह सुनकर सोमप्रभ ने अपना परिचय देकर उससे भी पूछा--॥८३॥
'तू मुझे बता कि तू कौन है और इस वन में तेरी क्या स्थिति है?' ऐसा पूछते हुए राजकुमार से वह दिव्य कन्या बोली- हे महापुरुष, यदि तुम्हें मेरे सम्बन्ध में जिज्ञासा है, तो कहती हूँ, सुनो। ऐसा कहकर आंसुओं की निरन्तर धारा बहाती हुई वह कहने लगी-॥८४-८५।।
मनोरथप्रभा की कथा
हिमालय के मध्यभाग में कांचनान नाम का नगर है। वहाँ पयकूट नाम का विद्याधरों का राजा है। उस राजा की प्रभा नाम की रानी से उत्पन्न हुई मैं मनोरथप्रभा⁷ नाम की कन्या हूँ ॥८६-८७७॥
मैं विद्याओं के प्रभाव से अपनी सहेलियों के साथ प्रतिदिन, आश्रमों, द्वीपों, कुलपर्वतों, वनों और उपवनों में दिन के तीन पहरों तक मनोविनोद करके चौथे पहर (सायंकाल) पिता के भोजन के समय घर आ जाती थी। एक बार में विहार करती हुई यहाँ सरोवर के तीर पर आई और मैंने इस तीर पर, अपने मित्र के साथ बैठे हुए एक मुनिकुमार को देखा ।।८८-९०।।
उसकी शोभा से आकृष्ट मैं दूती के समान उसके समीप गई। उसने भी भाव-भरे नेत्रों से मेरा स्वागत किया ॥९१॥
तब मेरे बैठ जाने पर, दोनों के मनोभाव को समझती हुई मेरी सहेली ने, उसके मित्र से उसके सम्बन्ध में पूछा ॥९२॥
तब उसका वह मित्र बोला हे सखि, यह समीप ही, आश्रम में दीधितिमान् नाम का मुनि रहता है।॥९३॥
सरोवर में स्नान करने के लिए आये हुए उस ब्रह्मचारी मुनि को उसी समय आई हुई लक्ष्मी ने देखा और वह उस पर आसक्त (अनुरक्त) हो गई ॥९४॥
लक्ष्मी ने उस जितेन्द्रिय मुनि को शरीर से अप्राप्य समझकर मन से ही जो उसकी कामना की, उससे उसे मानस-पुत्र उत्पन्न हुआ। तब लक्ष्मी उस मानस-पुत्र को मुनि को सर्पित करके अन्तर्धान हो गई। उस मुनि ने भी विन। प्रयास और प्रयत्न के पाये हुए उस पुत्र को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया ।।९५-९७।।
और, उसका नाम रश्मिमान्' रखकर, उसका पालन-पोषण करके स्नेहपूर्वक उसे सभी विद्याएँ सिखाई ॥९८॥
इसलिए, यह वही मुनिकुमार रश्मिमान् है, जो लक्ष्मी का पुत्र है और मेरे साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आ गया है।॥९९॥
ऐसा कहकर उसके साथी ने मेरी सहेली से मेरा परिचय पूछा। उसने मेरा नाम और कुल का परिचय देकर मुझसे कही गई सभी बातें उससे कह दीं ।॥१००॥
इस प्रकार परस्पर नाम, कुल आदि जानने के पश्चात्, अधिक बड़े हुए मुनिकुमार और मैं, दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए बैठे रहे ॥१०१॥
इतने में ही दूसरी सहेली मेरे घर से आकर बोली 'चलो, उठो, भोजनालय में तुम्हारे पिता तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं' ।॥१०२॥
यह सुनकर 'तुरन्त आऊँगी' ऐसा कहकर और मुनिपुत्र को वहाँ बैठाकर मैं डरती हुई पिता के पास गई ।॥१०३॥
वहाँ भोजन करके मैं जैसे ही जाने को तैयार हुई, वैसे ही मेरी पहली सखी ने आकर एकान्त में मुझसे कहा- ॥१०४।।
'सखि, इस मुनिपुत्र का मित्र यहां आया है और आँगन के द्वार पर खड़ा है।' वह शीघ्रता-पूर्वक मुझसे बोला- ॥१०५।।
'मुझे रश्मिमान् ने, अभी ही मनोरयप्रभा के पास पिता से प्राप्त आकाशगामिनी विद्या देकर भेजा है और कहा है कि मैं उस प्राणेश्वरी के विना कामदेव के द्वारा भीषण स्थिति में पहुंचा दिया गया हूँ। अब क्षण-भर भी मैं अपने प्राणों का धारण नहीं कर सकता ॥१०६-१०७॥
ऐसा सुनकर मैं तुरन्त आये हुए उस मुनिपुत्र और सखी के साथ मैं यहाँ आई ॥१०८॥
आने पर मैंने देखा कि वह मुनिपुत्र रश्मिमान्, चन्द्रमा के उदय के साथ ही मेरे विना प्राणों के निकल जाने से मर चुका है ॥१०९॥
तब मैं उसके वियोग से पीड़ित होकर अपने शरीर की निन्दा करती हुई, उसके शरीर को लेकर चिता में जलने (सती होने की इच्छा करने लगी ॥११०।।
इतने में तेज के पुंज के समान देदीप्यमान कोई पुरुष आकाश से उतरकर और उसके शरीर को उठाकर आकाश में उड़ गया ।॥१११॥
फिर भी जब मैं अकेली ही आग में जलने के लिए उद्यत हुई, तब मुझे आकाशवाणी सुन पढ़ी-॥११२॥
हे मनोरथप्रमे, ऐसा न करो। इस मुनिकुमार के साथ तेरा यथासमय पुनः संगम होगा' ॥११३॥
यह सुनकर, मरने से लौटकर और उसकी प्रतीक्षा में आशा बाँधकर शिवजी की आराधना करती हुई बैठी हूँ ॥११४॥
मूनिकुमार का वह मित्र भी न जाने कहाँ अदृश्य हो गया। इस प्रकार कहती हुई विद्याघरी से सोमप्रभ ने कहा-'तो तू अकेली क्यों है ? तेरी वह सहेली कहाँ है?' इस प्रकार कहते हुए सोमप्रभ से वह विद्याधरी मनोरथप्रभा बोली- ।।११५-११६॥
'सिहविक्रम नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी असाधारण सुन्दरी मकरन्दिका' नाम की कन्या है ॥११७॥
वह मेरी प्राणों के समान प्यारी और मेरे दुःख से दुःखिता उस कुमारी मकरन्दिका ने, मेरा समाचार जानने के लिए आज एक सहेली को भेजा था। मैंने उसकी सखी के साथ अपनी सखी को भी भेज दिया है। इसलिए, इसी समय में यहां अकेली हूँ ॥११८-११९॥
इस प्रकार कहती हुई मनोरथप्रभा ने, उसी समय आकाश से उतरी हुई अपनी सहेली को, सोमप्रभा के लिए दिखाकर उसका परिचय कराया ॥१२०॥
और, मकरन्दिका का वृत्तान्त सुनानेवाली उस सखी द्वारा सोमप्रभ के लिए पत्तों का बिछावन बनवाया और उसके घोड़े को घास दिलवाई ॥१२१॥
तब वहीं सरोवर के तट पर रात्रि व्यतीत कर, प्रातःकाल, वे सब उठे और उन लोगों ने आकाश से उतरे हुए एक विद्याधर को देखा ॥१२२॥
वह देवजय नाम का विद्याधर, प्रणाम करके और पास में बैठकर मनोरथप्रभा से इस प्रकार बोला-॥१२३॥
'हे मनोरथप्रभे, तुमसे राजा सिहविक्रम यह कहता है कि जबतक तुम्हारे पति का निश्चय नहीं होता, तबतक मेरी कन्या मकरन्दिका भी विवाह नहीं करना चाहती। इसलिए, आकर इसे समझाओ कि यह विवाह के लिए तैयार हो ॥१२४-१२५॥
यह सुनकर मनोरथप्रभा, सखी के स्नेह के कारण जब उसके पास जाने को उद्यत हुई, तब सोमप्रभ ने उससे कहा- ।।१२६॥
हे पवित्र चरित्रवाली, मुझे भी विद्याधरों का लोक देखने का कुतूहल है। इसलिए, मुझे भी ले चलो। घास दिया हुआ घोड़ा यहीं रहे ॥१२७।
यह सुनकर और 'ऐसा ही होगा' इस प्रकार कहकर देवजय की गोद में बैठे हुए सोमप्रभऔर सखी के साथ मनोरथप्रभा मकरिन्दका के घर गई ॥१२८॥
और, मकरन्दिका द्वारा आतिथ्य सत्कार किये जाने पर एकान्त में सोमप्रभः के सम्बन्ध में 'यह कौन है', इस प्रकार पूछी गई मनोरथप्रभा ने, जब मकरन्दिका से सोमप्रभ का समाचार कहा, तब मकरन्दिका सोमप्रभ पर हृदय से आसक्त हो गई ।।१२९-१३०।।
सोमप्रभ भी मूत्तिमती लक्ष्मी के समान उस मकरन्दिका पर मन से आसक्त होकर सोचने लगा कि 'वह कौन पुण्यात्मा (वन्य) होगा, जो इसका पति होगा ॥१३१॥
तदनन्तर, अन्यान्य बातों के प्रसंग में मनोरथप्रभा ने मकरन्दिका से पूछा- हे चंडि, तू विवाह करना क्यों नही चाहती ?' ॥१३२॥
यह सुनकर मकरन्दिका मनोरथप्रभा से बोली- मैं कैसे विवाह करूं; क्योंकि तू मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्यारी है। जबतक तू वर को स्वीकार नहीं करती, तबतक मैं कैसे विवाह कर लूं ? ॥१३३॥
मकरन्दिका के प्रेम के साथ, ऐसा कहने पर, मनोरथप्रभा उससे बोली- 'अरी पगली, मैंने तो वर का वरण कर लिया है ।॥१३४।॥
अब केवल उसके समागम की प्रतीक्षा कर रही हूँ! मनोरथप्रभा के इस प्रकार कहने पर मकरन्दिका ने कहा 'तब ठीक है, मैं तेरी बात मानूंगी' ।॥१३५।।
तब मनोरथप्रभा मकरन्दिका के मनोभाव को जानकर बोली- 'सखि, देखो, यह सोम-प्रभ, सारी पृथ्वी का भ्रमण (विजय) करके तुम्हारे अतिथि के रूप में यहाँ आया है ।॥१३६।।
तो हे सुन्दरि, तुझे इसका अतिथि सत्कार करना चाहिए।' ऐसा सुनते ही मकरन्दिका ने, मनोरयप्रभा से कहा- 'शरीर से लेकर मेरा सब कुछ इसी का है। मैंने सब कुछ देने के लिए इसे अर्थ का पात्र बना दिया है। यदि यह चाहे, तो स्वीकार करे' ।॥ १३७-१३८॥
इस प्रकार, मकरन्दिका के कहने पर, मनोरथप्रभा ने क्रमशः उसके पिता सिंहविक्रम से सब कहकर उन दोनों के विवाह की बात पक्की कर दी ॥१३९॥
तब सोमप्रभ भी, धैर्य धारण करके मनोरथप्रभा से प्रसत्रतापूर्वक बोला- 'मैं अब तुम्हारे आश्रम को जाता हूँ, वहाँ पर कदाचित् मुझे ढूंढती हुई मेरी सेना और मन्त्री आ गये होंगे, वे मुझे वहाँ न पाकर अहित की आशंका से उलटे लौट जायेंगे ॥१४०-१४१॥
इसलिए, वहाँ जाकर और सेना का समाचार जानकर तथा उधर से निश्चिन्त होकर मकरन्दिका से विवाह करूँगा' ।॥१४२॥
यह सुनकर और 'ठीक है', इस प्रकार कहकर मनोरयप्रभा, सोमप्रभ को देवजय की गोद में बैठाकर फिर अपने आश्रम को ले गई ॥ १४३॥
जैसे ही वे लोग आश्रम में पहुंचे, वैसे ही सोमनप्रभ का मन्त्री प्रियंकर, उसे ढूंढता हुआ वहाँ आया ॥१४४।।
इतने में ही, उसके पिता के पास से 'शीघ्र आओ', इस प्रकार का सन्देश लेकर एक दूत भी वहाँ आ पहुंचा ॥१४५।।
तब सोमप्रभ, मन्त्री की सम्मति से सारी सेना को लेकर पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ अपने नगर को गया ।॥१४६॥
'पिताजी का दर्शन करके मैं तुरन्त आऊंगा', इस प्रकार जाते हुए सोमप्रभ ने मनोरथ-प्रभा और देवजय से कहा ॥१४७७॥
तदनन्तर, देवजय ने जाकर यह सब समाचार मकरन्दिका से कहा। इससे वह विरह से व्याकुल हो उठी ॥१४८॥
उसे (मकरन्द्रिका को) न तो उद्यान में शान्ति मिलती थी; न संगीत में, और न सहेलियों के बीच में। वह अब सुग्गो की भी विनोदपूर्ण वाणियाँ नहीं सुनती थी ।॥१४९-१५०।।
वह भोजन भी न करती थी, शृंगार आदि करने की तो बात ही कहाँ ? माता और पिता द्वारा अनेक प्रयत्नों से समझाने पर भी उसकी अधीरता नहीं गई ॥१५१॥
बह कमलिनी के पत्तों की शैय्या त्याग कर और पागलों की भाँति तुरन्त उठकर घूमने लगती थी। इस कारण उसके माता-पिता व्याकुल होते थे ॥१५२॥
बार-बार समझाते हुए माता-पिता की बातों को जब उसने नहीं माना, तब कुद्ध माता-पिता ने, उसे शाप दिया ॥१५३॥
तू अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूलकर इसी शरीर से दरिद्र निषादों (भीलों) के बीच कुछ समय तक रहेगी ॥ १५४॥
माता-पिता से, इस प्रकार शापित मकरन्दिका उसी समय निषाद के घर पर जाकर भील-कन्या बन गई ।॥१५५।।
और उसी शोक से संतप्त उसका पिता सिंहविक्रम, अपनी पत्नी के साथ ही मर गया ।।१५६।।
और वह पूर्वजन्म का ऋषि, विद्याधरों का राजा, जो सब शास्त्रों का ज्ञाता था, पूर्वजन्म के किसी पाप के शेष रह जाने के कारण सुग्गा बन गया ।॥१५७॥
और, उसकी पत्नी जंगल की सूकरी बन गई वही सुग्गा, तप के प्रभाव से पहले पढ़ा हुआ सब कुछ जानता है। इसलिए, इस सुग्गे की इस विचित्र कर्मगति को देखकर ही मैं हँसा था। इस कथा को राजसभा में कहकर वह मुक्त हो जायगा ॥१५८-१५९॥
सोमप्रभ भी, विद्याधर बनकर उस भीलकन्या-शरीर को प्राप्त मकरन्दिका को प्राप्त करेगा ही ।॥१६०।।
और, वह मनोरथप्रभा भी, इस समय राजा बने हुए मुनिकुमार रश्मिमान् को पति के रूप में प्राप्त करेगी ॥१६१॥
सोमप्रभ भी, पिता से मिलकर और फिर उसके आश्रम में जाकर प्रिया (मकरन्दिका) की प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रहा है ॥१६२॥
पुलस्त्य मुनि, इस प्रकार कथा कहकर चुप हो गये और हर्ष तथा शोक से भरे हुए मैंने, अपने पूर्वजन्म का स्मरण किया ॥ १६३।।
तब जो मुनि कृपा करके मुझे आश्रम तक ले गये थे, उस मरीचि मुनि ने मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया ॥१६४।।
पंखों के लग जाने पर पक्षियों की स्वाभाविक चंचलता के कारण इधर-उधर घूमता और अपनी विद्या के आश्चर्य दिखाता हुआ में एक निषाद के हाथ लग गया और क्रमशः आपके पास भी आ पहुंचा। अब पक्षियोनि में मेरा पाप क्षीण हो गया ॥१६५-१६६।॥
इस प्रकार, उस राजसभा में अपनी कथा सुनाकर उस विद्वान् और विचित्र वाणीवाले सुग्गे के मौन हो जाने पर, वह राजा सुमन, अत्यन्त हर्ष के कारण आत्मविस्मृत-सा हो गया ॥१६७।।
इसी बीच तपस्या से प्रसन्न शिव ने स्वप्न में सोमप्रभ को अन्देश दिवा- 'राजन् ! उठो, राजा सुमन के पास चलो। वहां अपनी पत्नी मकरन्दिका को प्राप्त करोगे, जो पिता के शाप से मुक्तालता नाम की भीलकन्या हो गई है और सुग्गा बने हुए अपने पिता को लेकर वह राजा के पास गई है! वह, विद्याधरी, तुम्हें देखकर शापमुक्त होकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगी ! परस्पर परिचय से बड़े हुए हर्ष से शोभित तुम दोनों का संगम होगा ॥१६८-१७०।।
भक्तवत्सल शिवजी ने राजा से इस प्रकार कहकर, अपने आश्रम में तप करती हुई उस दूसरी मनोरथप्रभा से भी कहा- ॥१७१॥
'जिसे तू चाहती थी, वह इस समय सुमन नाम के राजा के रूप में अवतीर्ण हुआ, हे कल्याणी, इसलिए तू वहाँ जा। वह तुझे देखते ही अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा' ॥१७२॥
इसी प्रकार, शिवजी से स्वप्न में पृथक् पृथक् आदिष्ट वे सभी, राजा सुमन की सभा में आये ॥ १७३।।
उस सभा में आये हुए सोमप्रभ को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके मकरन्दिका फिर उसी दिव्य विद्याधरी के रूप में आ गई और उसने सोमप्रभा के गले से मिलकर आलिंगन किया ॥ १७४।॥
वह सोमप्रम भी, शिवजी की कृपा से उस विद्याधर-राजकुमारी मकरन्दिका को पाकर मूर्ति मती दिव्य भोगलक्ष्मी के समान उसका आलिंगन करके सफल हुआ ।॥१७५॥
वह राजा सुमनस् भी, जो पूर्वजन्म में रश्मिमान् नामक मुनिपुत्र या, मनोरथप्रमा को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके आकाश से गिरे हुए अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करके फिर मुनिपुत्र रश्मिवान् बन गया। और, उस अपनी प्रियतमा मनोरथप्रभा को चिरकालीन उत्सुकता के पश्चात् प्राप्त करके उसके साथ अपने आश्रम को गया । वह राजा सोमप्रभ भी अपनी प्रियतमा मकरन्दिका को लेकर अपने नगर को गया ।।१७६-१७७।।
इसी प्रकार वह शुकः (सुग्गा) भी अपने शरीर को छोड़कर अपने तपोबल से प्राप्त अपने स्थान (विद्याधर पुर) को गया। इस प्रकार, बहुत दूरी का अन्तर रहने पर भी विधि से विहित प्रणियों का समागम होता ही है ॥१७८॥
इस प्रकार, शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त, गोमुख मन्त्री से सुनाई गई आश्चर्यमयी और रुचिकर कथा को सुनकर प्रसन्न हुआ ।॥१७९।।
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशोलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त
1. यही कादम्बरी का वैशंपायन शुक है। 36
2. वृक्ष के पक्ष में शाखा या डालें। वेद के पक्ष में कक्षा या भाग। 37
3. द्विज के पक्ष में पक्षी। बेद के पक्ष में त्रिवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य)। 37
4. यही कादम्बरी का चन्द्रापोड है।
5. कादम्बरी का वा रुनास ।
6. यही कादम्बरी का इन्द्रायुष है।
7. वही कादम्बरी की महाश्वेता है।
8. कादम्बरी का पुण्डरीक ।
9. यही बाणभट्ट की कादम्बरी है। अनु०
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