5.401. || प्रथम कहानी || राजा उदयन की कथा (क्रमशः); वत्सराज का मृगया-वर्णन; वत्सराज को नारदजी का उपदेश; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा; राजा पाण्डु की कथा; पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा;
5.401. || प्रथम कहानी || राजा उदयन की कथा (क्रमशः); वत्सराज का मृगया-वर्णन; वत्सराज को नारदजी का उपदेश; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा; राजा पाण्डु की कथा; पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा;
नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक
(मंगल-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरग के प्रारम्भ में देखे।)
प्रथम तरंग
राजा उदयन की कथा (क्रमशः)
कर्णताल के प्रबल आघाती से कुलपर्वनो को एक ओर करके मानो सफलता का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हो, ऐसे विघ्नराज गणेश की जय हो ।।१।।
तदनन्तर कौशाम्बी में रहता हुआ राजा उदयन, विजित पृथ्वी का एकच्छत्र राज्यभोग कर रहा था ।।२।।
वह राजा, सेनापति रुमण्वान् के साथ मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण पर ममस्त राज्य-शासन का भार देकर, अपने नर्मसचिव वसन्तक के माथ मुध्वपूर्वक मासारिक भोग-विलाम का आनन्द लेने लगा ।। ३।।
वह स्वथ वीणा बजाता हुआ रानी वासवदत्ता और पद्मावती के साथ मगीत का सेवन करता था ।।४।।
वासवदना के सूक्ष्म और मधुर मगीत-स्वर उसकी वीणा के स्वर की एकता (समता) होने पर बजाने के लिए चलते हुए अँगूठे से ही दोनो का भेद लक्षित होता था। अर्थात्, गायन और वादन का स्बर एक साथ मिलने पर यह प्रतीत नहीं होता था कि रानी गा रही है या वोणा बज रही है।।५।।
राजमहल के सामने अपनी कीत्ति के ममान शुभ्र चांदनी में धवल बरामदे में बैठकर वह राजा प्यालो में अनवरत धारा में गिरते हुए मद्य का शत्रुओं के मद के समान पान करता था ।।६।। उस एकान्त स्थान में बैठे हुए राजा के लिए मुर्दारर्थां, मद्य के घड़ो मे राग से उज्-वल मद्य को ऐसे पहुंचा रही थी, मानो कामदेव के राज्याभिषेक के लिए स्वर्ण के कलशों में तीर्थों का जल लाया जा रहा हो ।॥७७॥
वह राजा, दोनों रानियो के बीच में बैठकर अपने रागपूर्ण चित्त के समान रक्तवर्ण, स्वादु, स्वच्छ और रानियों के मुखों से प्रतिबिम्बित मद्य का प्रेमपूर्वक पान करता था ।।८।।
ईर्ष्या और क्रोध के विना भी (मद्य के नशे में टेढी भौहोंवाले एव प्रेमपूर्ण रानियो के मुखों को निरन्तर देखते हुए राजा को तृप्ति नहीं होती थी ।।९।।
सुरापूर्ण अनेक स्फटिक के प्यालों से भरी हुई राजा की पानभूमि, प्रभातकालीन सूर्य की लाल किरणों से रक्त और श्वेत कमलों से युक्त कमल-लता के समान सुशोभित हो रही थी ।।१०।।
वत्सराज का मृगया-वर्णन
इसी विलास-क्रीड़ा के बीच कभी-कभी राजा बहेलियों के माथ हरे पत्तों का-सा वेप घारण किये हुए और धनुष लिये हुए मृगवना का भी सेवन करता था, (अर्थात् शिकार खेलने के लिए भी जाता था) ।।११।।
इस क्रीडा में कीचड में मने हुए शुकरों के झुंडों को वह बाणों से वेधकर मार देता था। उसके पीछा करने पर भय से इधर-उधर भागे हुए कृष्णसार मृग ऐसे मालूम होते थे, जैसे मानों पूर्वकाल मे विजय की हुई दिवाएँ उनपर कटाक्षपात कर रही हो ।।१२-१३।।
जगली भैसों को मारने के कारण उनके रक्त से रजिन वनभूमि ऐमी मालूम होती थी कि मानो वन-कमलिनी राजा की सेवा के लिए उपस्थित हुई हो ।।१४।।
मुँह फाडे हुए, अनएव भालो मे विधे (पिरोये) हुए मुखोंवाले सिहां को देखकर राजा प्रसन्न होता था ।।१५।।
अपने शस्त्र पर विश्वास रखनेवाले उस राजा की मृगया-क्रीड़ा में गड्ढो में छिपे हुए शिकारी कुत्ते और मार्ग में बिछे हुए जाल- यह परिस्थिति थी ।।१६।।
वत्सराज को नारदजी का उपदेश
इस प्रकार के आनन्द के दिनों में एक बार नारद मुनि, सभा (दरबार) में बैठे हुए राजा के समीप आये ।।१७।।
अपनी देह के कान्ति-मंडल से आवृत वे ऐमे मालूम होते थे; मानों तेजस्वी राजा के प्रेम से तेजस्वी सूर्य, अवतार धारण करके आये हों ।॥ १८॥
मादर प्रणाम करते हुए राजा से समुचित सत्कार प्राप्त करने पर प्रसन्नचेता मुनि कुछ ठहरकर बोले ।।१९।।
राजा पाण्डु की कथा
हे वत्मराज संक्षेप मे ही कहता हूँ, सुनो। पहले समय में पाडु नाम का राजा था, जा तेरा पहला पितामह (परदादा) था ।।२०।।
तुम्हारे ही समान उस महान् प्रतापी राजा के दो पत्नियाँ थी- एक कुन्ती और दूसरी माद्री ।। २१।।
अपने अतुल बल से आममुद्र पृथ्वी का विजय करके एक बार शिकार का व्यसनी होने के कारण वह पांड वन को गया ।॥ २२॥
वन में किन्दम नाम का एक मुनि, मृग का रूप धारण करके अपनी पत्नी के साथ आनन्द कर रहा था ।।२३।।
राजा ने, उमे मृग ममझकर और बाण चलाकर मार डान्ना। उस मुनि ने, प्राणो का परित्याग करते हुए, अनुप छोडकर खिन्न बैठे राजा को शाप दिया- हे राजन् ! विना विचारे तुमने मुझे मार डाला। अत. पत्नी का समागम करने पर मेरे ही समान तुम्हारी भी मृत्यु होगी ।।२४-२५।।
इस प्रकार यापित और ग्राप के भय में सामारिक भोगों में विरक्त राजा पाडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ प्रशान्त तपोवन में रहने लगा ।।२६।।
तपोवन में रहते हुए याप मे प्रेरित राजा ने अकस्मात् छोटी पत्नी माद्री के साथ समागम किया और मर गया ।। २७।।
इसलिए हे राजन् ! यह शिकार राजाओ में प्रमाद करानेवाला बुरा व्यमन है। इसने और भी अनेक राजाओं का मगो के समान नाश कर दिया है।॥ २८।।
यह शिकार राक्षसी के समान है। इसमे किमका कल्याण हो सकता है? यह घोर शब्द के साथ माम निकालती है, रूखी है, प्रमिल और उठे हुए बालोवाली है और भाले इसके दांत है, अर्थात् शिकारी दौड़न दौडने धूल में रूखा हो जाता है। उसके धूल से भरे केश हवा से ऊपर उठे रहते है ॥२९॥
इसलिए व्यर्थ परिश्रमवाले इम शिकार के प्रेम को छोड दो। इसमें शिकार, शिकारी और वाह्न तीनो के प्राणो का मन्देह माथ ही रहता है।॥३०॥
तुम्हारे पूर्वज मेरे मित्र थे, उन्ही के प्रेम से तुम भी मेरे प्यारे हो। साथ ही तुम्हारा पुत्र कामदेव के अगरूप से उत्पन्न होनेवाला है। सुनो ॥३१।।
प्राचीन समय में काम का दहन होने पर उसकी पत्नी रति ने शिवजी की स्तुति द्वारा आराधना की। उसने प्रसन्न होने पर शिवजी ने सक्षेप में उसमे कहा- पार्वती अपने अश से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर और पुत्र की कामना मे स्वय मेरी आराधना करके उसे अपने गर्भ से जन्म देगी ।।३२-३३।।
इसलिए हे राजन्। चडमहासेन की पुत्री यह वासवदत्ता गौरी के अंश से उत्पन्न हुई है और तुम्हारी महारानी है।॥ ३४॥
यह रानी शिवजी की आराधना करके कामदेव के अशभूत बालक को जन्म देगी, जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा बनेगा ।। ३५।।
ऐसा सुनकर मुनि के वचन का आदर करके राजा ने सम्पूर्ण पृथ्वी, मुनि को दान कर दी। नारद मुनि, उसे पुन. शासन के लिए राजा को लौटाकर अन्तर्धान हो गये ।। ३६।।
मुनि के चले जाने पर राजा ने पुत्र की इच्छावाली रानी वासवदत्ता के साथ पुत्र की चिन्ता में ही दिन व्यतीत किया ।। ३७।।
पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा
किसी एक दिन प्रातःकालीन सभा (दरबार) में बैठे हुए वत्सराज से नित्योदित नामक मुख्य द्वारपाल ने आकर निवेदन किया है महाराज, दो बच्चोवाली एक दरिद्र ब्राह्मणी आपके दर्शन की अभिलाषा से द्वार पर खड़ी है।। ३८-३९।।
यह सुनते हो राजा से उसके प्रवेश की आज्ञा पाकर दुबली-पतली, मैली-कुचैली एक ब्राह्मणी राजा के सम्मुख उपस्थित हुई ।॥४०॥
अपने मम्मान के समान फटे-पुराने वस्त्र से लिपटी हुई और दैन्य एव दुःख के समान अपने दोनो बालको को गोद में लिये हुई वह ब्राह्मणी, राजा का समुचित अभिवादन करके बोली-मैं कुलीन घर की ब्राह्मणी हूं और परिस्थितिवश ऐमी दरिद्रावस्था में आ गई हूँ। ये एक साथ दो, अर्थात् जडवाँ बच्चे उत्पन्न हो गये। मेरे भोजन का ठिकाना नहीं है। इसलिए इन बच्चो को मैं दूध नहीं पिला सकती ।।४१-४३।।
इलिए हे महाराज, मै दरिद्रा, शरण में आये हुए पर दया करनेवाले आपकी शरण में आई हूँ। अब आप जो उचित समझे, करे ।। ८४।।
यह सुनकर दयालु राजा ने द्वारपाल को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर महारानी वासवदत्ता को सोप दो ।।४५।।
तब वह अपने शुभकर्म के समान आगे चलनेवाले उस द्वारपाल ने उसे महारानी वासव-दत्ता के पास पहुंचा दिया ॥४६॥
द्वारपाल से यह जानकर कि 'इसे महाराज ने भेजा है'- रानी वासवदत्ता ने उस ब्राह्मणी पर अत्यन्त श्रद्धा प्रकट की ।।४७७॥
दो बच्चोंवाली उस दीन ब्राह्मणी को देखकर रानी सोचने लगी कि विधि की यह विपरीत गति है कि अच्छी वस्तु से उसे डाह होता है और अ-वस्तु से प्रेम होता है। अभी तक मुझे एक बालक भी नहीं हुआ और इसके एक साथ ही दो हो गये ॥४८-४९।।
ऐसा सोचती हुई रानी स्नान करने गई और दासियो को उस ब्राह्मणी के स्नानादि के लिए आज्ञा दे गई ।।५०।।
दासियों द्वारा स्नान, नवीन वस्त्र और स्वादिष्ट भोजनो से सम्मानित वह ब्राह्मणी इस प्रकार आश्वस्त होकर लम्बी साँस लेने लगी, जैसे सतप्त भूमि पानी सीचने पर सोधी सुगन्ध छोड़ती है ।।५१।।
भोजनोपरान्त स्वस्थ हुई उस ब्राह्मणी की परीक्षा लेने के लिए महारानी ने कहा 'है ब्राह्मणी ! मनोविनोद के लिए कोई कथा सुनाओ' यह सुनकर वह ब्राह्मणी 'जो आज्ञा' -कहकर कथा सुनाने लगी ।।५२-५३।।
राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा
किमी ममय जयदत्त नाम का एक साधारण राजा (जमीदार) था। उसके देवदत्त नाम का एक पुत्र हुआ ।।५४।।
कुमार के युवक होने पर उसके विवाह के लिए बुद्धिमान् राजा ने इस प्रकार सांचा ।।५५।।
राजलक्ष्मी प्रत्यन चचल, अतत्व बलवान् के योग्य है। किन्तु वैश्यो की लक्ष्मी कुलवधू के समान स्थिर और एक ही के पास रहनेवाली है। इसलिए इस कुमार का विवाह बनिये के घर करता हूँ। इगमे इसके राज्य में कोई वित्ति न आवेगी, क्योकि इसके अनेक हिस्मेदार है ।।५६-५७।।
ऐमा सोचकर उस राजा ने पाटलिपुत्र नगर में वसुदत्त नाम के वैश्य की कन्या मॉगी ।। ५८।।
वसुदत्त ने भी उच्च सम्बन्ध की अभिलापा में, दूर होने पर भी, उस राजपुत्र को अपनी कन्या दे दी ।॥५९॥
उमने दहेज में अपने दामाद को ग्लों से इतना भर दिया कि पिता की सम्पत्ति पर भी उसका अधिक सम्मान न रह गया ।।६०।।
धनी की कन्या से विवाहित उस पुत्र के साथ राजा जयदत्त सुख से रहने लगा ॥६१॥
एक बार बनिया वसुदत्त अपनी कन्या का देखने की उत्कटा से समधी जयदत्त के घर आकर कन्या को अपने घर ले गया ।। ६२।।
कुछ दिनों के बाद वह राजा जयदत्त अकस्मात् ही स्वर्ग सिधार गया। फलत. उसके रिश्तेदारों ने आक्रमण कर उसके राज्य को अपने अधीन कर लिया ।। ६३।।
शत्रुओ के भय से डरी हुई देवदत्त की माता, रातो-ही-रात उसे लेकर छिपकर भाग गई ।।६४।।
वहाँ दुःखिता माता ने राजकुमार से कहा कि 'हमारा स्वामी पूर्व दिशा का चक्रवर्ती राजा है। बेटा ! तुम उसके पास जाओ। वह तुम्हारा राज्य दिला देगा' ।॥६५॥
माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'विना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदिठीक करके चक्रवर्ती के पास जाओ ।।६६-६८।।
इस प्रकार माता मे प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर मे धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायकाल मसुराल में पहुँचा ।। ६९।।
पितृहीन, नष्टराज्य और धनवाला वह राजकुमार रोने की शका से उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ।।७०।।
धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्मी के सहारे ऊपर चढती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१।।
कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश में गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर मतप्त हो गया ।। ७२।।
उसकी स्त्री, मार्ग-क्लेग से दुर्बल और भूल से धूमरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि तुम कौन हो ? उत्तर में उसने कहा- मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥
तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ।। ७४।।
वहीं पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारी ॥ ७५।।
लातें खाकर वह पापिन दुगुने प्रेम से उमे मनाकर उसके माथ विहार करने लगी ।। ७६।।
उमे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि यह क्रोध करने का समय नही है। मुझे तो इन समय दूसरा ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥
शत्रुओ के योग्य अपने शस्त्र को इस पापिन स्त्री और नरपशु पर क्यों चलाऊँ ? ऐसी दुष्टा स्त्री से भी क्या प्रयोजन? यह मेरे दुर्भाग्य का ही काम है, जो मेरे धैर्य की परीक्षा का तमाशा देखने के लिए मुझपर दुःखों की वर्षा कर रहा है ।।७८-७९।।
असमान कुलो के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। कौवी कौवे को छोड़कर कोयल (नर) को कैसे चाह सकती है ।॥८०॥
ऐसा सोचकर उसने उपपति के साथ उस स्त्री की उपेक्षा कर दी। शत्रु-विजय की प्रबल इच्छा रखनेवाले सज्जनो के हृदय में स्त्री-रूपी तृण का क्या महत्त्व है ।।८१।।
उसी समय बिहार की हलचल में उस बनिये की बेटी का मोती से जड़ा हुआ कान का बहुमूल्य आभूषण (तरकी) वही गिर पड़ा। जाने की शीघ्रता में उसने गिरे हुए कान के आभूषण को नहीं देखा और वह अपने प्रेमी से आज्ञा लेकर अपने घर चली गई ।।८२-८३॥
कुछ समय के उपरान्त उम प्रेमी के भी चले जाने पर राजकुमार ने उम जड़ाऊ गहने को उठा लिया ॥८४।।
चमकीले रत्नों की चमकती हुई किरणोंवाले बहुमूल्य मोतियों से जड़ा हुआ वह आभूषण, विनष्ट राज्यलक्ष्मी को ढूंढने में महायक, हाथ के दीपक के समान दैव ने मानो राजकुमार के हाथ मे दे दिया था ।।८५।।
मफलमनोरथ राजकुमार वहाँ से निकलकर उनी समय कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश को चला गया ।।८६।।
राजकुमार, कन्नौज जाकर कान के उस आभूषण को एक लाख मुहरों पर बन्धक (गिरवी) रखकर उम धन में हाथी, घोडे आदि खरीदकर राजांचित ठाट-बाट मे कान्यकुब्ज के चक्रवर्ती के समीप गया ।।८७।।
उसमे मिलकर और सहायता-स्वरूप उसकी सेनाओं को लेकर वह शत्रुओ पर चढ़ आया। फलन युद्ध में विजयी होकर उमने पिता का राज्य प्राप्त किया और माता ने भी उसका अभिनन्दन किया ।।८८।।
राज्य प्राप्त करने पर उसने बन्धक का रुपया देकर पत्नी के उस कर्णाभूषण को छुड़ा लिया और अपनी पत्नी का रहस्य प्रकट करने के लिए उस आभूषण को अपने श्वशुर के पास भेज दिया। वह वैश्य इस प्रकार अपनी कन्या के कर्णाभूषण को पाकर घबराया हुआ उसके पाम गया और उसे दिखाया ।।८९-९०।।
वह वैश्यपुत्री, उमे देखकर और वह भी पति के द्वारा भेजा हुआ जानकर, अत्यन्त व्याकुल हुई ॥ ९१।।
मेरे कान का यह आभूषण, उम दिन रात को धर्मशाला के भीतर गिर गया था, जिस दिन मैंने किसी अज्ञात पथिक को देखा था ।। ९२।।
अवश्य ही वह मेरा पति था, जो मेरा चरित्र जानने की इच्छा से छिपकर आया था। मैने उसे नही पहिचाना। अत. उसी ने यह कर्णाभूषण वहाँ पाया होगा ॥९३॥
इस प्रकार सोचते हुए, पापाचार से व्याकुल उम वैश्य-कन्या का हृदय उसी समय फट गया और वह मर गई ।। ९४।।
तदनन्तर उमके रहस्य को जाननेवाली उसकी अन्तरग दासी से युक्तिपूर्वक राब रहस्य जानकर उसके पिता ने भी उसके मरने पर दुख नही मनाया। प्रत्युत, उसका मरना श्रेयस्कर ही समझा ।। ९५।।
राजकुमार भी अपने पैतृक राज्य को प्राप्त कर और अपने गुणों से प्राप्त चक्रवर्ती की कन्या को पत्नी-रूप में स्वीकार कर परम आनन्द का उपभोग करने लगा। अर्थात्, कान्य-कुब्जनरेश ने उसकी वीरता से प्रसन्न होकर उसे अपनी कन्या दे दी ।॥९६।।
इस प्रकार साहस करने में स्त्रियों का जो हृदय वज्ञ के समान कठिन होता है, वही आकस्मिक व्याकुलता होने पर पुष्प से भी कोमल हो जाता है ।॥९७।।
अच्छे वश में उत्पन्न मोती के समान चरित्रवती और स्वच्छ हृदयवाली स्त्रियों तो इनी-गिनी ही होती है, जो ससार का भूपण होती है ।॥९८॥
राजलक्ष्मी हरिणी के समान सदा उछलती-कूदती और छलॉगे मारती रहती है। उसे धैर्य-रूपी पाश में बॉधना कुछ ही बुद्धिमान् जानते है, मभी नही ।।९९।।
इसलिए सम्पत्ति चाहनेवाले को घार विपत्ति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए ॥१००॥
मैंने भी इस घोर विपत्ति-काल में अपने चरित्र की जो रक्षा की है, आपका दर्शन, उसी का परिणाम है।॥ १०१।।
इस प्रकार ब्राह्मणी के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी वासवदत्ता उसके प्रति आदर की भावना से सोचने लगी- ।।१०२।।
अवश्य ही यह ब्राह्मणी उच्चकुल प्रसूता है। इसकी उदारता और अपने चरित्र को प्रकट करने का ढग और वार्तालाप की शैली यह बात बता रही है ।।१०३॥
इसी प्रकार राजसभा में आने की चतुरता भी इसकी उच्चता बता रही है। ऐसा मोचकर रानी ब्राह्मणी में फिर वोली- 'तुम किसकी स्त्री हो और क्या विशेष परिस्थिति है, कहो।' यह सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी ।।१०४-१०५।।
पिंगलिका को आत्मकथा
हे महारानी ! मालबदेश में अग्निदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। वह लक्ष्मी और सरस्वती दोनो का आश्रय था, याचको को स्वय धन देनेवाला था ।। १०६।।
उसीके समान उसके क्रमशः दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम शकरदत्त और छोटे का नाम शान्तिकर था ।। १०७।।
छोटा पुत्र शान्तिकर, बाल्यकाल में ही विद्याध्ययन के लिए पिता के घर से कही चला गया ।।१०८।।
बड़े पुत्र शकरदत्त ने, यश के लिए सम्पत्ति एकत्र करनेवाले यज्ञदत्त की कन्या (मुझसे) विवाह कर लिया ।। १०९।।
समय के अनुसार मेरे पति के पिता अग्निदत्त वृद्धावस्था के कारण परलोक सिधार गये और उनकी पत्नी (मेरी सास) उनके साथ सती हो गई ॥ ११०।।
मेरे पति ने तीर्थयात्रा के उद्देश्य से मुझ गर्भवती को घर पर छोड़कर और पितृशोक से अन्धे होकर सरस्वती नदी के प्रवाह में अपना शरीर त्याग कर दिया ।। १११॥
उसके साथी अन्यान्य यांत्रियोद्वारा उसका समाचार कहने पर गर्भवती होने के कारण मैंने अपने बन्धुओ से सती होने की आज्ञा नही प्राप्त की ।। ११२।।
जब मैं पति के शोक में मग्न ही थी कि एकाएक लुटेरों ने हमारे निवास-स्थान गाँव को ही लूट लिया ।।११३।।
उस समय मैं गाँव की तीन ब्राह्मणियों के साथ चरित्र नष्ट होने के भय से थोड़े से वस्त्रों को साथ लेकर घर से भाग गई ।। ११४।।
अपना देश नष्ट हो जाने पर उन तीनों के साथ दूर देश को चली गई और एक मास तक परिश्रम के कार्य करके जीवन-निर्वाह करती रही ।। ११५।।
यहाँ आकर यह सुना कि 'वत्म देश के राजा अनाथो की रक्षा करते हैं', तो मैं उन ब्राह्मणियों के साथ एकमात्र चरित्र के सहारे यहाँ आ गई ।। ११६।।
यहाँ आते ही एक साथ दो बालकों को उत्पन्न किया। उस समय वे तीनो ब्राह्मणी सहेलियाँ मेरे साथ थी ।। ११७।।
पति का शोक, विदेश, दरिद्रता और दूना प्रसव आदि- यह सब देखकर भाग्य ने मेरी विपत्तियो का द्वार खोल दिया है ॥ ११८।।
इन दोनो बच्चो के पालन-पोषण के लिए मेरे पास अब कोई रास्ता नही है, यह सोचकर, इसीलिए स्त्रियो के भूषण - लज्जा को छोड़कर मैंने दरबार में आकर वत्सराज से प्रार्थना की। सच है, निरीह शिशुओं की वेदना को, कौन सहन कर सकता है ।।११९-१२०।।
उन्ही की आज्ञा से मैंने तुम्हारे चरणो में स्थान पाया है। फलत. मेरी सारी विपत्तियाँ मानो राजद्वार से टकराकर पीछे लौट गई ।।१२१।।
यह मेरा वृत्तान्त है। मेरा नाम पिंगलिका है। बालकपन से अग्निहोत्र के धूम से मेरी आँखे पीली हो गई, इसीलिए मेरा नाम पिंगलिका हुआ ।॥१२२॥
विदेश गया हुआ मेरा देवर शान्तिकर, किस देश में है, इसका अभी तक मुझे पता नही है ।।१२३।।
इस प्रकार अपना वृत्तान्त कहती हुई उस ब्राह्मणी को कुलीन समझकर रानी प्रेमपूर्वक कहने लगी-॥१२४।।
यहाँ शान्तिकर नाम का हमारा एक पुरोहित रहता है; वह इस देश का नहीं, परदेशी है। मैं समझती हूँ, वह तुम्हारा देवर होगा ॥१२५।।
ऐमा कहकर उत्कंठित ब्राह्मणी की रात्रि में उसी प्रकार व्यवस्था करके प्रातःकाल ही रानी ने पुरोहित को बुलाकर उसके कुल और देश का पता पूछा ।। १२६।।
उसके अपने कुल का पता बताने पर भली भाँति निश्चय कर रानी ने यह तुम्हारी भाभी है-ऐसा कहकर उस ब्राह्मणी को उसे दिखाया ॥१२७।।
परिचय होने पर और अपने भाई की मृत्यु का समाचार जानने पर शान्तिकर अपनी भाभी को अपने घर ले गया ।। १२८।।
घर आकर पिता और भाई के लिए ममुचित शोक प्रकट करके दोनों बच्चों सहित भाभी को उसने धैर्य प्रदान किया ।।१२९।।
रानी वासवदत्ता ने भी उन दोनो बालको को उत्पन्न होनेवाले अपने पुत्र का पुरोहित नियुक्त कर दिया ॥१३०।।
रानी ने ही उन दोनो पुत्रों में में बड़े का नाम शान्तिसोम और छोटे का नाम वैश्वानर रखा। माथ ही, उनके लिए प्रचूर सम्पत्ति प्रदान की ।। १३१॥
अन्धे के समान जीव के आगे-आगे चलनेवाला और अपने कर्मों द्वारा फल की ओर ले जानेवाला भाग्य ही होता है; पुरुषार्थ तो एक निमित्तमात्र है ।।१३२।।
यही कारण है कि वह ब्राह्मणी, दोनो बालक और शान्तिकर इधर-उधर से आकर प्रचुर राज-संपत्ति पाकर परस्पर मिल गये ।।१३३॥
इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर एक बार एक कुम्हारिन अपने पांच पुत्रों को साथ लेकर मिट्टी के कुछ पात्रों सहित वहाँ आई ।। १३४।।
उसे अपने भवन में देखकर रानी ने समीप बैठी हुई पुरोहितानी ब्राह्मणी से कहा-'सखि ! देखो, इसके पाँच-पाँच लड़के है और मुझे अभी तक एक भी नहीं हैं, यह इतनी पुण्यवती है। गरीब होकर भी यहाँ मेरे जैसी निपूती नही है ।।१३५-१३६।।
तब पिगलिका बोली- 'महारानी ! पाप के फलस्वरूप अधिक सन्तान कष्ट देती है और दरिद्रों के ही होती है ।। १३७७॥
तुम्हारे समान उच्च लोगों की जो एकाध सन्तान होती है, वह उत्तम होती है। जल्दी न करो। शीघ्र ही अपने कुल के योग्य सन्तान प्राप्त करोगी ॥१३८।।
पिंगलिका के इस प्रकार कहने परभी पुत्र के लिए उत्कठित रानी चिन्ता करने लगी ।।१३९॥
उसी समय आये हुए वत्सराज उदयन ने, रानी की चिन्ता का कारण जानकर कहा-देवि ! नारद मुनि ने कहा है कि शिवजी की आराधना करने पर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ।। १४०।।
ऐसा कहकर राजा ने शिवजी का व्रत करने का निश्चय किया। रानी के व्रत ग्रहण करने पर राजा ने भी मन्त्रियो और राज्य की प्रजाओं के साथ शकर की आराधना का व्रत किया ॥१४१-१४२।।
तीन रातों तक उपवास करते हुए राजा और रानी को, प्रसन्नता से प्रकट होकर शिवजी ने स्वय आज्ञा दी 'तुम दोनो उठो तुम्हें कामदेव का अंश पुत्र उत्पन्न होगा, जो मेरी कृपा से विद्याधरो का राजा होगा ।।१४३-१४४।।
स्वप्न मे ऐसा वरदान देकर शिवजी के अन्तर्धान हो जाने पर, प्रात काल उठकर वर को पाये हुए राजा और रानी ने हार्दिक आनन्द का अनुभव किया ।।१४५।।
तदनन्तर उठकर राजा ने मन्त्रियो तथा प्रजाओ को देखे हुए स्वप्न के समाचार-रूपी अमृत-रस से तृप्त कर दिया और उन दोनो ने अपने बन्धु-बान्धवो और सेवकों के साथ उत्सव मनाते हुए व्रत का पारण (समाप्ति) किया ।।१४६।।
और कुछ दिनो के बीतने पर स्वप्न में रानी वामवदत्ता को किसी जटाधारी पुरुष ने आकर फल प्रदान किया ।। १४७।।
रानी के द्वारा उस स्वप्न का वृत्तान्त जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और मन्त्रियो ने उसे बधाइयाँ दी। राजा भी फल के ममान शिवजी द्वारा दिये गये पुत्र को समझकर शीघ्र ही पूर्ण होने की आशा करने लगा ।।१४८।।
नरवाहनदत्त जनन नामक लम्बक का प्रथम तरग समाप्त।
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