5803. || तृतीय कहानी || सूर्वप्रभ का उद्योग;
5803. || तृतीय कहानी || सूर्यप्रभ का उद्योग;
तृतीय तरंग
सूर्यप्रभ का उद्योग
तदनन्तर मय, सुनीथ और सूर्यप्रभ ये सभी उस कश्यप आश्रम से चलकर चन्द्रभागा और इरावती के संगम पर पहुंचे, जहाँ सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में उसके मित्र, बन्धु, ससुर आदि सभी ठहरे हुए थे ।॥१-२॥
सूर्वप्रभ को देखकर वहां ठहरे हुए सभी राजा और मित्र बन्धु मरने को तैयार होकर रोते हुए उसके सामने आये ॥ ३॥
चन्द्रप्रभ को न देखने से उसके प्रति बुरी आशंका से दुःखित उन सब को सूर्यप्रभ ने, जो कुछ समाचार था, सब कह सुनाया ॥४१॥
इस पर भी अत्यन्त व्याकुल हुए सूर्यप्रभ के उनसे पूछने पर उन्होंने श्रुतशर्मा द्वारा उनकी समस्त मर्यादाओं का अपहरण-वृत्तान्त अत्यन्त कठिनाई से उसे सुनाया ।।५।।
श्रुतशर्मा द्वारा किये गये अपमान से दुःखी होकर अपने मरने का निश्चय और आकाशवाणी द्वारा उसका रोका जाना सब उन्होंने कह सुनाया ॥६॥
यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने, क्रोध से यह प्रतिज्ञा की कि यदि ब्रह्मा आदि सभी देवता भी श्रुतशर्मा की रक्षा करें, तो भी उस का समूल नाश करूंगा ॥७८॥
यह मेरा दृढ निश्चय है। दूसरों की स्त्रियों का अपहरण करने में बीरता दिखानेवाला वह महान् दुष्ट है ।।८।।
ऐसी प्रतिज्ञा करके उस पर विजय प्राप्त करने को जाने के निमित्त उसने ज्योतिषियों से सातवें दिन लग्न (मुहूर्त) निश्चित किया ।॥९॥
तब विजय के लिए उद्योग करते हुए सूर्यप्रभ का दूढ निश्चय देखकर उसे अपनी वाणी से और भी दृढ करके मय ने सूर्यप्रभ से कहा- ॥१०॥
'यदि तुम सचमुच युद्ध के लिए प्रयत्नशील हो, तो मैं कहता हूँ कि मैंने ही अपनी माया दिखाकर तुम्हारी स्त्रियों को पाताल में रख लिया है ॥११॥
ऐसा करने से ही तुम जोश के साथ विजय का उद्योग करोगे, इसीलिए मैंने ऐसा किया था। आग वैसे उतना ही प्रचंड रूप धारण नहीं करती, जैसी बायु से प्रेरित होकर धधकती है' ।॥१२॥
मय की ऐसी बातें सुनकर सभी लोग आनन्द से प्रसन्न हुए। तब मय ने कहा- 'तुम पाताल में आबो। मैं तुम्हारी पत्नियों को दिखाता हूँ।' तदनन्तर मयासुर के साथ वे उसी पुराने मार्ग से चौथे पाताल में गये ॥१३-१४।।
वहाँ जाकर एक मकान से मय ने उसकी मदनसेना आदि सभी स्त्रियों को लाकर उसे सौंप दिया ॥१५॥
उन सब पत्नियों तथा असुर-पत्नियों को साथ लेकर मय से प्रेरित सूर्यप्रभ आदि प्रद्धाव का दर्शन करने गये ॥१६॥
मय से कश्यप द्वारा वर-प्राप्ति का समाचार सुनकर असुरराज प्रलाद ने शस्त्र उठाकर सूर्यप्रभ की परीक्षा के लिए बनावटी क्रोध करते हुए कहा-॥१७॥
'अरे पापी, मैंने सुना है कि तूने मेरे भाई द्वारा अपहरण करके लाई गई उन बारह कन्याओं का अपहरण कर लिया है, इसलिए मैं तेरा वध करता हूँ' ।॥१८॥
यह सुनकर बिना किसी प्रकार का विकार दिलाये सूर्यप्रभ ने कहा- 'मेरा शरीर आपके अधीन है। अतः, आप मुझ उदंड पर शासन कीजिए' ।॥१९॥
ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से प्रलाद ने हँसकर कहा-'मैंने तेरी परीक्षा की है, तुझमें घमंड का लेषा मी नहीं है। बर माँग, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ।' तब सूर्यप्रभ ने 'गुरुजनों और शिव में भक्ति बनी रहे', यह वर माँगा ॥२०-२१॥
तब सबके सन्तुष्ट हो जाने पर प्रसन्न प्रह्लाद ने यामिनी नाम की दूसरी कन्या भी सूर्यप्रभको दे दी ॥२२॥
और, युद्ध में उसकी सहायता के लिए अपने दो पुत्र भी प्रदान किये। तदनन्तर, सूर्यप्रभसबके साथ अमील के पास गया ॥ २३॥
उसने भी वर-प्राप्ति का समाचार जानकर प्रसन्न होकर अपनी दूसरी कन्या सुलावती का विवाह भी सूर्यप्रभ से कर दिया और युद्ध में सहायता के लिए उसने भी अपने दो पुत्र सूर्यप्रभ को दिये ॥२४॥
तदनन्तर, अन्यान्य असुर-सरदारों की सहायता के लिए सम्मान प्रकट करता हुआ सूर्यप्रभपत्नियों के साथ वहाँ (पाताल में) कुछ दिन रह गया ।॥ २५।।
तब मय आदि के साथ सूर्यप्रभ ने सुना कि सुनीथ की तीनों स्त्रियाँ और उसकी सभी स्त्रियाँ गर्भवती हो गई है ॥ २६॥
दोहद के लिए पूछने पर सबने एक ही इच्छा प्रकट की कि हम लोग महायुद्ध देलना चाहती हैं। यह सुनकर नयासुर प्रसन्न हुआ ॥२७॥
और, बोला कि जो असुर पहले देव-दानव-युद्ध में मारे गये थे, वे सब अब इनके गर्भ में आ गये हैं॥ २८॥
इस प्रकार छह दिन व्यतीत हो गये और सातवें दिन मय, सूर्यप्रभ आदि स्त्रियों के साथ रसातल से बाहर निकलकर गुफा के द्वार पर आये ॥२९॥
उनके आते ही विद्याधरों ने उसकी तैयारी में विन्न करने के लिए जो मायाजन्य उत्पात दिखलाये थे, उन्हें स्मरण-मात्र से वहाँ आये हुए सुवासकुमार ने नष्ट कर दिया ॥ ३०॥
तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ के दूसरे पुत्र रत्नप्रभ को पृथ्वी के राज्य पर प्रतिष्ठित कर मय, सूर्यप्रभ नादि भूतासन नामक विमान पर बैठकर सभी विद्याधरों के राजा सुमेरु के घर पर गये। वहाँ से मय के कथनानुसार वे पहले गंगातट के तपोवन में गये ।। ३१-३२॥
वहाँ तपोवन में मित्र-भाव से आये हुए उनका सुमेरु ने हार्दिक स्वागत-सम्मान किया। मय ने उसे पहले का सभी वृत्तान्त सुना दिया था और उसने भी पहले से प्राप्त शिवजी की माशा का स्मरण किया ॥३३॥
उसी स्थान पर रहते हुए सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों, बन्धुओं और सेनाओं को कठिनाई से एकत्र कियां ॥३४॥
वहाँ सबसे पहले विद्याओं को सिद्ध करके मय द्वारा प्रेरित होकर सेना-सहित सूर्वप्रभके साले बाये ॥३५।
वे हरिभट आदि सोलह थे, जिनमें एक-एक के साथ दस-दस हजार रब और बीस-बीस हजार पैदल सिपाही थे ॥३६॥
उसके बाद पूर्व निश्चयानुसार सूर्यप्रभ के व्वशुर, साले तथा अन्यान्य सम्बन्धी वैत्य-दानव माये ॥३७।।
उनके नाम थे हृष्टरोबा, महामाय, सिहदंष्ट्र, प्रकम्पन, तन्तुकच्छ, दुरारोह, सुमाय, वज्रपंजर, धूमकेतु, प्रभयन, विकटाक्ष आदि। इनके बतिरिक्त सातवें पाताल-पर्यन्त से अनेक दानव और असुर आये ॥३८-३९॥
किसी के साथ दस हजार, किसी के साथ आठ हजार और किसी के साथ सात हजार रथ थे और कोई अपने साथ छह लाख, कोई तीन लाख और कोई कम-से-कम दस हजार पैदल सिपाहियों को लेकर वहाँ बाया। इसी के अनुसार एक-एक के साथ हाथी और घोड़े भी बसंख्य थे। भय और सुनीथ की असंख्य सेना भी इसी प्रकार उसमें सम्मिलित हो गई ॥४०-४२॥
इसके अतिरिक्त सूर्यप्रभ की असंख्य सेमा, इसी प्रकार वसुदत्त आदि की सेनाएँ तथा सुमेरु विद्याधरराज की विद्याषर-सेनाएँ भी वहाँ एकत्र हुई ॥४३॥
तब मयासूर ने ध्यान करते ही उपस्थित सुवासकुमार से सूर्यप्रभ आदि के साथ कहा-॥४४॥
'भगवन्, यह इधर-उधर बिखरी हुई सेना एक साथ नहीं दील रही है। अतः, यह बताइए कि फैली हुई सेना को एक साथ कहाँ से देखें ।॥४५॥
मुनि ने कहा-'यहाँ से एक योजन (चार कोस) पर कलाप ग्राम नामक विस्तृत भू-भाग है। वहाँ जाकर इसका विस्तार देतो' ॥४६॥
सुवासकुमार मुनि के ऐसा कहने पर सुमेरु के साथ वे सभी अपनी-अपनी सेनाओं को लेकर कलाप ग्राम में गये ॥४७॥
वहाँ ऊँचे स्थान पर जाकर असुरों और राजाओं की सेनाबों को वे अलग-अलग देख सके ॥४८॥
तब सुमेरु ने कहा- 'श्रुतार्मा अब भी हमसे सेना की दृष्टि से अधिक है। उसके अधीन एक से अधिक सौ (एक सौ एक) विद्याषरों के राजा हैं ।॥४९॥
उनमें से एक-एक बत्तीस-बत्तीस सरदारों का स्वामी है; किन्तु मैं उनमें से कुछ को फोड़कर अपनी और मिला लूंगा ॥५०॥
इसलिए, प्रातःकाल ही वल्मीक नामक स्थान पर जायेंगे; क्योंकि कल प्रातःकाल फाल्गुन मास की कृष्णाष्टमी नामक महातिथि है ।॥५१॥
इस तिथि में विद्याधर-चक्रवर्ती के लक्षण प्रकट होते हैं। इसलिए, सभी विद्याधर इस तिथि को वहाँ जाते हैं ।॥५२॥
सुमेरु के इस प्रकार कहने पर वे सब उस दिन सेना का प्रबन्ध करके प्रातःकाल ही सेनाओं के साथ रथों द्वारा वल्मीक ग्राम को गये ॥५३।।
हिमालय के उस दक्षिण शिखर पर सेनाओं के कोलाहल के साथ उन लोगों ने बहुत-से विद्याषटरों को देखा ।॥५४॥
वे विद्याधर वाँ कुंडों में अग्नि जलाकर हवन करने में लग गये और बहुत-से विनाधर जप करने लगे ॥५५।।
तब सूर्यप्रभ ने भी वहाँ एक विशाल अग्निकुंड बनवाया। उसमें उसकी विद्या के प्रभाव से स्वयं ही बग्नि जल उठी ।।५६।।
यह सुनकर सुमेरु को अत्यन्त सन्तोष हुआ और विद्याधर ईर्ष्या से जल उठे। तदनन्तः, उनमें से एक ने कहा- हे सुमेय, तुम्हें धिक्कार है कि तुम विद्याधरों का राजत्व छोड़कर सूर्यप्रभमनुष्य का अनुसरण कर रहे हो ।॥५७-५८।।
यह सुनकर क्रुद्ध सुमेरु ने उसे खूब फटकारा और सूर्यप्रभ द्वारा उसका नाम पूछे जाने पर सुमेरु ने कहा- भीम नाम का एक विद्याधर है, उसकी पत्नी की ब्रह्मा ने कामना की थी, उसी से यह उत्पन्न हुआ है, चूंकि ब्रह्मा के साथ गुप्त रूप से व्यभिचार करने पर यह उत्पन्न हुआ है, इसी से इसका नाम ब्रह्मगुप्त है। इसलिए, अपने जन्म के समान ही वचन यह बोल रहा है ।।५९-६१।।
ऐसा कहकर सुमेव ने भी अग्निकुंड बनवाया, तब सूर्यत्रभ ने उसके साथ ही अग्नि में हवन किया ।॥६२॥
क्षण-भर में ही पृथ्वी के एक छिद्र से एक भीषण और विशाल अजगर निकला, उसे देखकर वह ब्रह्मगुप्त नामक विद्याधरों का राजा घमंड के साथ उसे पकड़ने के लिए दौड़ा, जिसने सुमेरु की निन्दा की थी ॥६३-६४५
उसे अजगर ने अपनी एक फुफकार से ही सूखे पत्ते की तरह सौ हाथ दूर फेंक दिवा ॥६५॥
तेजप्रभ नामक विद्याधरों का राजा उसे पकड़ने के लिए उठा, उसे भी अजगर ने फूंक से दूर फेंक दिया ॥६६।।
तब दुष्टदमन नामक विद्याधर उसे पकड़ने गया, उसे भी अजगर ने दूसरों के समान ही दूर फेंक दिया ॥६७॥
तदनन्तर, विरूपशक्ति नामक विद्याधरराज उसकी बोर गया और उसे भी उसने तिनके के समान दूर फेंक दिया ॥६८॥
इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी विद्याधरों के राजाओं के उसे पकड़ने का प्रयत्न करने पर उसने सभी को श्वास के झोंकों से ऐसा पटका कि उनके बंग पत्थरों से टकराकर चूर हो गये और किसी भी तरह ने फिर उठ न सके। इसके पश्चात् श्रुतशर्मा बड़े अभिमान से सर्प की ओर दौड़ा और उसे भी सर्प ने अपने श्वास से बहुत दूर फेंक दिया। पत्थरों की टक्कर से चूर-चूर हुए अंगों-वाले और लज्जित श्रुतशर्मा के फेंके जाने पर सुमेरु ने सूर्यप्रभ को उसे पकड़ने के लिए भेजा। देखो, यह भी इस सर्प को पकड़ने के लिए उठा है। ये मनुष्य बन्दरों की भाँति विचारहीन होते हैं। दूसरों से जो कुछ भी किया जाता है, उसकी ये नकल करते हैं।' इस प्रकार, कहते हुए सभी विद्याधर राजा सूर्यप्रभ की हँसी उड़ाने लगे ॥६९-७५।।
उनके हँसते हुए ही सूर्यप्रभ ने मुँह बन्द किये हुए उस अजगर को पकड़ लिया और बिल से बाहर खींच लिया ॥७६॥
उसी समय वह सर्प तरकस बन गया और सूर्यप्रभ के सिर पर आकाश से पुष्पवर्षा हुई ।॥७७॥
तदनन्तर आकाशवाणी हुई- हे सूर्यप्रभ, तुम्हारे लिए यह तूणीर-रत्न सिद्ध हो गया, इसे ग्रहण करो' ।॥७८॥
तब सभी विद्याधर, मलिन और लज्जित हो गये। सूर्यप्रम ने उसे स्वीकार कर लिया। मय, सुनीय, सुमेरु आदि अति प्रसन्न हुए ॥७९॥
तब विद्याधरों की सेना के साथ श्रुतशर्मा के चले जाने पर उसका दूत आकर सूर्यप्रभसे इस प्रकार बोला-॥८०॥
'जैसा कि हमारे स्वामी श्रुतवार्मा तुमको बाक्षा देते हैं कि यदि तुझे अपने जीवन से कार्य है, तो इस तरकस को मुझे दे दें' ॥८१॥
तब सूर्यप्रभ ने उत्तर दिया, 'दूत, उससे जाकर कह दो कि मेरे बाणों से छिदा हुआ तेरा शरीर ही तरकस बन जायगा' ।॥८२॥
उत्तर सुनकर दूत के चले जाने पर वे सब श्रुतशर्मा की मूलता-पूर्ण बातों पर हँसने लगे ॥८३॥
तब सुमेरु ने सूर्यप्रभ का बलिगन करके उससे कहा- 'भाग्य से ही आज शिवजी की बात निःसन्देह सफल हुई ।॥८४॥
इस तूणीर-रत्न के सिद्ध हो जाने पर तेरी चक्रवत्तिता सिद्ध हुई। जब बाओ, धनुष-रत्न को सिद्ध करें ॥८५॥
सुमेरु के वचन सुनकर और उसी के आगे-ब्रागे चलने पर सूर्यत्रम आदि उसके पीछे-पीछे वहाँ से हेमकूट पर्वत पर गये ॥८६॥
वे उसके समीप ही उत्तर की ओर मानस-सरोवर पर पहुंचे, जो सरोबर समुद्र के निर्माण के लिए मानों ब्रह्मा का साधन हो ।॥८७॥
जलक्रीडा करती हुई देवांगनाओं के मुखों से मानों वह सरोवर खिले हुए स्वर्ण-कमलों से अपने को छिपा रहा था ॥८८॥
जबतक वे लोग मानस-सरोवर की शोभा देखते हैं, तबतक श्रुतशर्मा आदि विद्याषर वहाँ आ गये ॥८९॥
तब सूर्यप्रभ और वे सब विद्याधर घृत और कमलों से हृवन करने लगे। उसी क्षण उस सरोवर से एक भयानक बादल निकला ।॥९०।।
वह मेघ, आकाश में जाकर घोर वर्षा करने लगा, उसी वर्षा में मेष से एक भीषण काला नाग गिरा ॥९१॥
सूर्यप्रभ के कहने पर सुमेरु ने उसे कसकर पकड़ा। बाणों से बींधा जाता हुआ भी वह काला नाग उसी क्षण धनुष बन गया ।॥९२॥
उस नाग के धनुष बन जाने पर दूसरा नाग फिर गिरा, उसके मुल से निकलते हुए विष बऔर आग की लपटों के भय से सभी आकाशचारी विश्चाघर भयभीत हो, काँपने लगे ॥९३॥
पहले नाग के समान ही उस नाग के भी सूर्वप्रभ द्वारा पकड़े जाने पर वह (नाग) धनुष की बोरी बन गया और वह मेच भी नष्ट हो मबश ॥९४॥
सूर्यत्रम, यह अनन्त बलशाली धनुष-रत्न तुझे सिद्ध हो गया और इसके साथ कमी न टूटनेवाली डोरी भी तुझे प्राप्त हो गई। ये दोनों रत्न तुझे सिद्ध हुए, बब इन्हें स्वीकार कर' ।।९५-९६॥
इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर सूर्यप्रभ ने उन दोनों रत्नों को ग्रहण कर लिया और श्रुतशर्मा भी व्याकुल होकर अपने अनुचरों के साथ निराश होकर तपोवन को चला गया। तदनन्तर मय, सुनीय, सूर्यप्रभ आदि सभी प्रसन्न हुए ॥९७।।
उस धनुष की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सुमेरु ने कहा- 'यहाँ पर बायु से शब्द करनेवाले बाँसों का एक महान् और दिव्य जंगल है, उससे काटकर जो बड़े-बड़े बाँस इस सरोवर में फेंके जाते हैं, वे सभी दिव्य धनुष बन जाते हैं। उन्हीं धनुषों को पहले समय में देवताओं ने, असुरों ने, गन्धयों ने तथा विद्याधरों ने अपने लिए सिद्ध किया है ॥९८-१००॥
उनके अलग-अलग नाम हैं। इस सरोवर में पुराने समय में देवताओं ने अमृतबछ नाम के धनुष भी छोड़े हैं, जो चक्रतियों के धनुष हैं। वे बड़े ही कष्ट से किसी भावी चक्रवर्ती को ईश्वर की कृपा होने पर ही सिद्ध होते हैं ॥१०१-१०२॥
वही चक्रवर्ती धनुष आज सूर्यप्रभ को सिद्ध हुआ है। उसके ये प्रभास आदि मित्र भी अपने-अपने योग्य धनुषों की साधना करें ॥१०३॥
जिन सिद्धविश्च कुशल वीरों की योग्यता होती है, उन्हें आज भी उन धनुषों की सिद्धि प्राप्त होती है' ।॥१०४।
सुमेरु के वचन सुनकर सूर्यप्रभ के मित्र प्रभास आदि बाँसों के जंगल में गये और उस जंगल के रक्षक चंड-दंड को जीतकर वहाँ से बाँस लाये और उन्हें सरोवर में फेंक दिया ।।१०५-१०६।।
इसके बाद सूर्यप्रभ के मित्रों ने सरोवर के किनारे बैठकर जप और हवन प्रारम्भ किया। उन सत्त्वशाली मित्रों को सात दिन में धनुष सिद्ध हो गये ॥ १०७।।
सात दिनों के पश्चात् मिले हुए मित्रों से धनुष-सिद्धि का समाचार जानकर सूर्वप्रभ उन मित्रों और मय आदि के साथ सुमेरु के तपोवन में लौट आये ॥१०८॥
वहाँ पर सुमेरु ने उनसे कहा कि तुम्हारे मित्रों ने वेणु-दंड के रक्षक चंड-दंड को जीत लिया, यह आश्चर्य की घटना है' ॥१०९॥
उसके पास मोहिनी विद्या है, जिसके कारण वह जोता नहीं जा सकता। अनुमान है कि उस विद्या को उसने अवश्य ही प्रधान शत्रु के लिए सुरक्षित रखा होगा ।।११०।।
इसीलिए, उसने तुम्हारे इन मित्रों पर इस समय उसका प्रयोग नहीं किया; क्योंकि वह उस विद्या का एक ही बार प्रयोग कर सकता है, बार-बार नहीं ।॥१११॥
चंड-दंड ने गुरु पर ही उस विद्या का प्रभाव जानने के लिए उसको प्रयोग किया था। बतः, गुरु ने ही उसे वैसा शाप दिया ॥११२॥
यह विचारणीय है। ऐसी विद्याओं का प्रभाव कठिनाई से ही प्राप्त होता है। इसका कारण आप लोग मय से पूछे। उसके रहते मैं क्या कहूँ। सूर्य के आगे दीपक की क्या बात है ? सूर्यप्रभ से सुमेरु के ऐसा कहने पर मय ने कहा- ॥११३-११४०॥
'सुमेरु ने सच कहा है, इसे में बताता हूँ, सुनो। अव्यक्त परमात्मा से वे शक्तियाँ और अनुशक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। उमी अव्यक्त से बिन्दु-मार्ग पर आचूत प्राण-शक्ति का उद्गम हुआ। वही परमात्मतत्त्व की कला से युक्त होकर विद्या के मन्त्रों का रूप धारण करती है ॥११५-११६॥
उन्ही मन्त्र-विद्याओं के ज्ञान से या तप से अथवा सिद्धों की आज्ञा से सिद्धि प्राप्त करने-बालों का प्रभाव बहुत कठिन हो जाता है।॥११७॥
तो हे पुत्र, तूने सभी विद्याओं की साबना तो कर ली और वे सिद्ध भी हो गईं। किन्तु, दो विद्याएँ अभी तुझे नहीं आई-एक मोहिनी और दूसरी परिर्वात्तनी। इनकी सिद्धि तूने नहीं की है।॥११८॥
इन दोनों विद्याओं को याज्ञवल्क्य ऋषि जानता है। अतः, उसके समीप जाकर उससे प्रार्थना करो।' मय के ऐसा करने पर सूर्यप्रभ याज्ञवल्क्य ऋषि के पास गया ।॥११९॥
उस मुनि याज्ञवल्कय ने सूर्यप्रभ को सात दिनों तक अग्नि में रखकर तपस्या कराई ॥१२०॥
नागों के दर्शन का सहन किये हुए सूर्यप्रभ को सात दिनों में मोहिनी विद्या और तीन दिनों तक अग्नि ताप सहन कर लेने पर विपरिवत्तिनी विद्या उसे दी ॥१२१॥
विद्या प्राप्त कर लेने पर मुनि ने उसे फिर अग्नि-कुंड में प्रवेश करने के लिए कहा और उसने आज्ञानुसार अग्नि में प्रवेश किया ॥१२२॥
उसी क्षण सूर्यप्रभ को इच्छानुसार चलनेवाला महापद्म नामक आकाश-यान प्राप्त हुआ। यह विमान एक सौ आठ पंखोंवाला था और एक-एक पंखे में एक-एक नगर था। इस प्रकार, सौ नगर उसमें बने थे। बनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हुए थे और विचित्र प्रकार से उसकी रचना की गई थी ॥१२३-१२४।।
इतने में आकाशवाणी हुई कि यह चक्रवर्ती विमान तुम्हें सिद्ध हुआ है। इसके सभी नगरों (पुरों) में अपनी-अपनी रानियाँ रखोगे, तो वे शत्रुओं की बाषा से सुरक्षित रहेंगी ।। १२५-१२६॥
तब उसने प्रणाम करके गुरु याज्ञवल्क्य से निवेदन किया कि 'जाज्ञा दीजिए कि किस प्रकार गुरु-दक्षिणा अर्पण करूं' ॥१२७॥
'अपने चक्रवर्ती-अभिषेक के समय मुझे स्मरण करना, यही मेरी दक्षिणा है। अब तुम अपने सेना शिविर में जाबो ॥१२८॥
मुनि के ऐसा कहने पर सूर्वप्रभ, मुनि को प्रणाम कर और उस विमान पर बैठकर सुमेरु के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में आया ॥१२९॥
वहाँ सब समाचार सुनाते हुए उसे मव, सुनीय और सुमेरु ने विमान और विद्या-प्राप्ति पर बधाई दी ॥१३०।।
तब सुनीय ने सुवासकुमार का स्मरण किया। उसने आकर मथ आदि तथा अन्य राजाओं से कहा- 'सूर्वप्रभ को विमान भी सिद्ध होगया और सब विद्याएँ भी सिद्ध हो गई। अब आप लोग शत्रु पर विजय प्राप्त करने में उदासीन क्यों हो रहे है ? ' ॥१३१-१३२॥
यह सुनकर मय ने कहा- 'आपने सच कहा, किन्तु पहले दूत भेजा जाय, तो ठीक हो। यहाँ नीति का प्रयोग करना चाहिए' ।॥१३३॥
यह सुनकर मुनि-पुत्र ने कहा- 'ऐसा ही करो। हानि क्या है? प्रहस्त को दूत के रूप में भेजो' ॥१३४॥
यह (प्रहस्त) प्रतिभाशाली, गम्भीर भाषण करनेवाला, कार्य और काल की स्थिति को जाननेवाला, कठोर और सहिष्णु है। इसमें दूत के सभी गुण हैं ।॥१३५॥
इस प्रकार, सुवासकुमार के वचनों पर श्रद्धा करके मय आदि ने सन्देश देकर प्रहस्त को श्रुतशर्मा के प्रति भेजा ॥१३६॥
उसके चले जाने पर सूर्वप्रभ ने अपने उन सभी साथियों से कहा-'मैंने आज जो एक कौतुकपूर्ण सपना देखा है, उसे सुनिए- 'आज रात के अन्त में मैंने देखा कि हम सभी प्रबल जल-धारा में बहे जा रहे हैं। बहाये जाते हुए हमलोग नाच रहे हैं, पर डूबते नहीं। कुछ समय बाद यह जल का प्रवाहू विपरीत वायु के कारण बदल गया ।॥१३७-१३९॥.
तब किसी जाज्वल्यमान पुरुष ने आकर हमलोगों को जल से निकालकर आग में फेंक दिया। किन्तु, वहाँ पर भी हम आय में जले नहीं ।॥१४०॥
इसके बाद घटा घिर आई और उसने रक्त की वर्षा की, जिससे सारी दिशाएँ रक्तमय हो गईं। और, रात के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई, प्रातः काल हो गया' ।॥१४१॥
ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से सुवासकुमार ने कहा- 'इस स्वप्न से कठिन परिश्रम द्वारा अभ्युदय की सूचना मिलती है।॥ १४२॥
जो पानी का प्रवाह था, वह संग्राम का सूचक था। नहीं डूबना भैर्म का सूचक था; जो नाचते हुए और बहते हुए तुम लोगों को वायु ने विपरीत दिशा में बदल दिया, वह तुम्हें कोई शरण देनेवाला रक्षक है। जो ऊर्ध्वरेता तेज से जलते हुए पुरुष थे, वह साक्षात् शंकर भगवान् हैं। उसने तुम्हें अग्नि में फेंका, वह तुम्हें महासंग्राम में झोंका। मेघों का उमड़ना किसी भव का सूचक था और रक्त-वृष्टि का होना भय के विनाश का सूचक था। इसी प्रकार, दिशाओं का लाल हो जाना तुम्हारी समृद्धि या अभ्युदय का सूचक हुआ ॥१४३-१४६॥
स्वप्न कई प्रकार के होते हैं- जैसे अन्पार्थ, यथार्थ और अपार्थ। जिसका फल तुरन्त होता है, वह अन्वार्थ है। प्रसन्न हुए देवता आदि का आदेश यथार्थ होता है। गम्भीर अनुभव और विन्ता आदि से होनेवाला स्वप्न अपायं है ।॥१४७-१४८॥
रजोगुणप्रधान और बाह्य विषयों से विमूढ प्राणी निद्रा के वश में होकर उन-उन कारणों से स्वप्न देखता है।॥ १४९।।
स्वप्नों का विलम्ब से अथवा तुरन्त फल मिल जाना समय-भेद से होता है। रात्रि के अन्त में देखा हुआ यह स्वप्न शीघ्र फल देनेवाला है' ।॥१५०॥
मुनि-कुमार से यह सुनकर सूर्वप्रम आदि प्रसन्न हुए और उठकर अपने-अपने दैनिक कार्यों में लग गये ।। १५१।।
इतने में ही श्रुतशर्मा के पास से प्रहस्त लौट आया और मय आदि के पूछने पर वहाँ जो कुछ हुआ, कहने लगा- ।।१५२।।
'यहां से मैं वेग के साथ त्रिकूट पर्वत स्थित सोने की बनी त्रिकूटपताका नाम की नगरी को गया ।॥१५३॥
वहाँ जाकर प्रतीहार से सूचित और सभागृह में गए हुए मैंने उन विद्याधर-राजाओं से बिरे हुए बुतशर्मा को देखा ॥ १५४।।
पिता त्रिकूट, सेनापति विक्रमशक्ति और दामोदर जादि शूरवीर उसके समीप बैठे थे। तदनन्तर, आसन पर बैठकर मैंने श्रुतशर्मा से कहा- 'मुझे श्रीमान् सूर्यप्रभ ने दूत के रूप में आपके पास भेजा है और आपके लिए उन्होंने सन्देश दिया है कि मैंने शिवजी की कृपा से विद्या, रत्न, भार्या और सहायक सिद्ध कर लिये। इसलिए, तुम भी इन विद्याधरों के साथ मेरी सेना में बाकर मिलो। मैं विरोधियों का नाशक और नत्रों का रक्षक हूँ' ।॥१५५-१५८॥
तुमने अनजान में सुनीथ की अगम्या कन्या कामचूडामणि का जो अपहरण किया है, उसे मुक्त करो। यह कार्य तुम्हारे लिए अशुभ है।॥१५९॥
मेरे ऐसा कहने पर वे सब क्रुद्ध होकर बोले- 'वह कौन होता है, जो घमंड के साथ हमें यह सन्देश भेजता है ॥१६००।
वह मनुष्यों के लिए ऐसा सन्देश दे। विद्याधरों में इस प्रकार का सन्देश देनेवाला वह कौन होता है। मनुष्य होकर ऐसा पमंड करता हुआ वह बेचारा नष्ट हो जायगा' ।॥१६१।।
यह सुनकर मैंने कहा- 'क्या कहा, वह कौन होता है? तो सुनो, शिवजी ने अब उन्हें तुम लोगों का चक्रवर्ती बनाया है।॥ १६२॥
यदि वे मनुष्य हैं, तो क्या ? मनुष्यों ने तो देवत्व भी सिद्ध कर लिया है और विद्याधरों ने उस मनुष्य का पराक्रम देख लिया है।।१६३॥
उसके यहाँ आने पर तुम लोगों का विनाश होगा, यह निश्चित है।' मेरे ऐसा कहने पर वह सारी सभा क्षुब्ध होगई ॥१६४।।
और, श्रुतशर्मा तथा घुरन्बर मुझे मारने के लिए दौड़े। 'यही आपकी वीरता है?', इस प्रकार मेरे कहने पर दामोदर ने उन्हें रोका तथा शान्त किया और कहा-'दूत और ब्राह्मण दोनों अवध्य है। उन्हें न मारना चाहिए' ।।१६५-१६६॥
तब विक्रमशक्ति ने मुझसे कहा- हे दूत, तुम जाओ। तुम्हारे स्वामी के ही समान हम सब भी ईश्वर के बनाये हुए हैं।॥१६७॥
'वह आवे। हम सब उसका बातिथ्य करने में समर्थ हैं।' गर्व के साथ उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसते हुए कहा- ॥१६८॥
'हंस पद्मवन में तभी तक निश्चिन्तता से बोलते हैं, जबतक आकाश को डकनेवाले मेष उन्हें नहीं दीलते ' ॥१६९॥
अवज्ञा के साथ ऐसा कहकर और उठकर मैं चला बाया। प्रहस्त द्वारा यह समाचार सुनकर मय आदि ने सन्तोष प्रकट किया ।।१७०।।
तदनन्तर, युद्ध की तैयारी का निश्चय करके सूर्वप्रम आदि ने युद्ध में दुर्दम प्रभास को सेनापति बनाया ॥१७१॥
अन्य सभी, सुवासकुमार से आज्ञा लेकर उस दिन नियम के साथ (विधि-पूर्वक) रण-दीक्षा में दीक्षित हुए ॥१७२।।
नियमानुसार रात्रि में शवन-गृह में जाकर सूर्यप्रभ ने निद्रा-रहित रहकर एक सुन्दरी कन्या को वहाँ देखा ॥१७३॥
वह कन्या जान-बूझकर सोये हुए मन्त्रियोंवाले सूर्यत्रम के पास आकर साथ खड़ी हुई सली से कहने लगी ।।१७४।।
'हे सखि, यदि सोये हुए अतएव विलास-रहित (निश्चेष्ट) इसको रूपशोभा ऐसी है, तो जगी हुई दशा की शोभा कैसी होगी ॥१७५॥
जब रहने दो, इसे मत जगाओ. आँखों का कौतूहल पूरा हो गया। इसके साथ अधिक तन्मयता से हृदय को बाँधने से क्या लाभ है ? ।।१७६॥
श्रुतिशर्मा के साथ होनेवाले युद्ध में कौन जानता है कि किसका क्या होगा ? ॥१७७॥
मुद्धोत्सव शूरों के प्राण विनाश के लिए होता है। इसका (सूर्यत्रम का) भी जाने क्या होगा। इसका कल्याण हो ॥१७८॥
जिस इस आकाशचारी ने कामचूडामणि को देखा है, वहाँ मुझ जैसी इसका क्या हृदय-रंजन कर सकती है ?' ॥१७९॥
उसके ऐसा कहने पर उसको सत्ती ने कहा- 'सखि, ऐसा क्या कह रही हो, क्या तुम्हारा हृदय उसके प्रति आसक्त नहीं हुआ ? ॥१८०॥
जिसने देखते ही कामचूडामणि का हृदय हरण कर लिया, वह किसका हृदय हरण नहीं कर सकता। भले ही वह अरुन्धती क्यों न हो। क्या तू अपनी विद्या के प्रभाव से युद्ध में होनेवाले इसके कल्याण को नहीं जानती ? सिद्धों ने तुम सभी को इसी चक्रवर्ती की भार्या बनाया है ॥१८१-१८२॥
कामचूडामणि, तू बऔर सुप्रभा एक ही गोत्र में उत्पन्न हुई हो। इसने इन्ही दिनों में सुप्रभा का विवाह किया है। तो क्या युद्ध में इसका कल्याण नहीं होगा। सिद्धों की वाणी व्यर्थ नहीं जाती। फिर, सुप्रभा ने इसका चित्त-हरण किया है, तो उससे इसका क्या ? ॥ १८३-१८४।।
क्या तू इसका चित्त हरण नहीं कर सकती ? क्योंकि तू रूप में उससे अधिक सुन्दरी है। अपने बन्धु-बान्धवों के कारण यदि तुझे सन्देह है, तो यह ठीक नहीं ॥१८५॥
सती स्त्रियों का पति के सिवाय और कोई बन्धु नहीं है।' सखी की यह बात सुनकर वह सुन्दरी कन्या बोली-॥ १८६॥
'हे सखि, तूने सच कहा। मुझे अन्यान्य बन्धु-बान्धवों से क्या प्रयोजन ? मैं अपनी विद्या के प्रभाव से जान रही हूँ कि युद्ध में आर्यपुत्र की जीत होगी ॥ १८७॥
उसे विद्याधर-चक्रवर्ती होने के कारणभूत सभी रत्न सिद्ध हो चुके हैं और विद्याएँ भी सिद्ध हो गई है, किन्तु ओवधिर्या उसे अभी सिद्ध नहीं हुई हैं। इससे मन कुछ व्याकुल है ॥१८८॥
वे सभी ओषधियों चन्द्रपाद नामक पर्वत पर गुफा के अन्दर रखी हैं। वे ओषधियाँ किसी पुण्यात्मा चक्रवर्ती को ही सिद्ध होती हैं।॥१८९॥
यदि यह अभी जाकर उन सब ओषधियों को सिद्ध करे, तो इसका कल्याण हो। क्योंकि, प्रातःकाल ही इसका युद्ध प्रारम्भ होगा' ।॥१९०।।
यह सुनकर, जान-बूझकर सोया हुआ सूर्यप्रभ, उठकर उस कन्या से नम्रता के साथ बोला- हे सुलोचने, तूने मुझपर अत्यधिक पक्षपात प्रकट किया है। इसलिए मैं अभी वहाँ (चन्द्रपाद गिरि पर) जाता हूँ। अब तू बता कि कौन है ?' ॥१९१-१९२॥
उसकी बातें सुनकर वह कन्या इसलिए लजा गई कि सूर्यप्रभने उसकी सारी बातें सुन ली। अतः, वह चुप हो गई। तब उसकी सखी ने सूर्यप्रभ से कहा- ।।१९३॥
'यह विद्याधरों के राजा सुमेरु के छोटे भाई की कन्या विलासिनी है। तुम्हें देखने को बहुत उत्सुकता थी' ।।१९४॥
वह विलासिनी, इस प्रकार कहती हुई सहेली को 'आओ, चलें' कहकर वहाँ से चली गई ।।१९५।।
तब सूर्यप्रभ ने प्रभास आदि मन्त्रियों को जगाकर ओषधियों की सिद्धि की चर्चा उनसे की ॥१९६॥
और, इनकी सिद्धि के लिए योग्य प्रहस्त को सुमेरु, मय और सुनीथ के समीप भेजा ॥१९७॥
इस बात पर विश्वास करके उन सब के आने पर उनके और मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ रात्रि में ही चन्द्रपाद गिरि पर गया ।॥१९८॥
जाते हुए उनके मार्ग में शस्त्र उठाये हुए यक्ष, गुह्यक, कूष्मांड ग्रादि विघ्न करने के लिए खड़े हो गये ।।१९९॥
उनमें से कुछ को शस्त्रों से विवश करके और कुछ को विद्या-प्रभाव से मोहित करके सूर्यप्रभआदि चन्द्रपाद गिरि पर पहुंच गये ॥ २००॥
वहाँ गुफा के द्वार पर पहुँचने पर विचित्र आकृतिवाले शिवजी के गणों ने इन्हें गुफा में जाने से रोका ॥२०१॥
'इसके साथ बुद्ध न करना चाहिए; क्योंकि इससे भगवान् शिव क्रुद्ध हो जायेंगे। इसलिए शिव के अष्टोत्तर शत नाम के पाठ से उन्हीं वरदायक की स्तुति करते हैं। ये उनके गण इसी से प्रसन्न होते हैं' सुवासकुमार ने इस प्रकार सूर्यप्रभ आदि से कहा ॥२०२-२०३॥
तब वे इसी प्रकार शिव की स्तुति करने लगे। स्वामी की स्तुति से प्रसन्न होकर वे गण उनसे बोले - 'हमने इस गुफा को छोड़ दिया है। आपलोग महौषधियों को ले, किन्तु सूर्यप्रभस्वयं उसमें प्रवेश न करें ।॥२०४-२०५।।
केवल प्रभास ही उसमें जाय, यह गुफा उसके लिए सुगम है।' गणों की बातें सुनकर उन सब ने उसे स्वीकार किया ॥२०६॥
तदनन्तर प्रभास के प्रवेश करते ही वह अंधेरी गुफा कुछ प्रकाशित हो गई ॥२०७॥
गुफा के बन्दर बैठे हुए अति भयंकर रूपवाले चार राक्षस उठकर प्रणाम करते हुए उससे बोले- 'आइए' ॥२०८॥
तब प्रभास ने अन्दर जाकर और उन दिव्य सात ओषधियों को लेकर और बाहर आकर उन्हें सूर्यप्रभ को दिया ॥२०९॥
उसी समय आकाशवाणी हुई कि ये सातों ओषधियाँ महाप्रभावशालिनी हैं। हे सूर्यप्रभ, ये ओषधियाँ, तुम्हें सिद्ध हो गई ॥२१०॥
यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न वे सभी वहाँ से चलकर सुमेरु के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में लौट आये ॥२११॥
वहाँ जाकर सुनीष ने सुवासकुमार से पूछा कि 'गुफा में सूर्यप्रभ को रोककर प्रभास को क्यों जाने दिया, इन दोनों में क्या बन्तर है ? ॥२१२॥
तथा गणों और किकरों ने भी गुफा में उसका स्वागत किया, इसका क्या रहस्य है?' यह सुनकर सभी को सुनाते हुए मुनि सुवासकुमार ने कहा- "सुनो, कहता हूँ। प्रभास सूर्यप्रभ का अत्यन्त हितकारी है, इन बोनों में परस्पर भेद नहीं है ॥२१३-२१४॥
प्रभास के समान शूरता और प्रभावशालिता में दूसरा व्यक्ति नहीं है। इसके पूर्वजन्म के पुण्य-प्रभाव से यह गुफा उसी की है।॥२१५॥
अब इसके पूर्व जन्म का हाल कहता हूँ, जैसा कि वह पहले या। प्राचीन समय में नमुचि नाम का श्रेष्ठ दानव था ।। २१६॥
वह इतना महान् दानी था कि माँगते हुए शत्रु के लिए भी उसे कुछ अदेय नहीं था ॥२१७७॥
उसने दस हजार वर्षों तक केवल धुआं पीकर ही तपस्या की। इस कारण उसने ब्रह्मा से बर प्राप्त किया कि वह लोहा, पत्यर और लकड़ी से मारा न जाय ॥२१८॥
तब उसने इन्द्र को जीतकर भगा दिया। तदुपरान्त कश्यप ऋषि ने मध्यस्थ बन करके देवताओं से उसकी सन्धि (मित्रता) करा दी ॥२१९॥
तदनन्तर, सुरों और असुरों ने परस्पर वैर-भाव छोड़कर मन्दराचल द्वारा क्षीर-समुद्र का मंथन किया और उससे निकले हुए लक्ष्मी आदि रत्नों को विष्णु आदि देवताओं ने परस्पर बाँट लिया और उसी नियमानुसार नमुचि दानव ने अपने हिस्से में उच्च धवा नामक घोड़ा पाया ॥२२०-२२१॥
इसी प्रकार, अन्यान्य देवताओं और दानवों ने ब्रह्म। के निर्देशन के अनुसार समुद्र से निकले रत्नों को बाँट लिया ॥ २२२॥
मन्यन के अन्त में जब अमृत निकला, तब उसे देवता लोग हरण कर ले गये। इस कारण, देवों और दानवों या दैत्यों में फिर शत्रुता हो गई ॥२२३॥
और, उनमें परस्पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में जो भी असुर सुरों द्वारा मारे जाते थे, उन्हें उच्चैःथवा सूंघ-सूंघकर उसी क्षण पुनर्जीवित कर देता था ।॥ २२४॥
इस कारण दैत्य और दानव देवताओं के लिए अजेय हो गये। तब खिन्न चित्तवाले इन्द्र को एकान्त में बुलाकर बृहस्पति ने कहा-'अब तुम्हारे लिए एक ही उपाय है। उसे शीघ्र ही कर डालो। तुम स्वयं जाकर नमुचि से उच्चैःश्रवा को दान में माँगो ॥२२५-२२६॥
यद्यपि तुम शत्रु हो, फिर भी वह अपनी दानशीलता के कारण घोड़े के लिए तुम्हें नहीं न करेगा; क्योंकि वह समूचे जीवन में संग्रह किये गये धन का दानी होने के यश को नष्ट न करेगा ॥२२७॥
यह गुफा उसी प्रबल दानव की है। इसी कारण वह उन पहछेदारों के साय यह उसी के अधीन है ।। २४२।।
उस गुफा के नीचे प्रबल का भवन है, जहाँ अलंकारों से सजी हुई उसकी बारह पत्नियाँ रहती हैं ॥२४३॥
वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्न और विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र है। चिन्तामणि है और एक लाख योद्धा हैं और उतने ही घोड़े भी हैं ॥ २४४॥
प्रभास की ये सब वस्तुएँ उसके पहले जन्म की कमाई है। इस प्रकार, यह प्रभास की कहानी है। अतः, इसके लिए यह सब कुछ आश्चर्य नहीं है" ।॥२४५॥
मुनि सुवासकुमार के मुख से यह सब सुनकर सूर्यप्रभ, सुनीय, मय, प्रभास आदि सभी रत्न आदि की प्राप्ति के लिए पाताल-स्थित प्रबल के गुहा-मन्दिर में गये ॥ २४६।।
उसमें प्रवेश करके प्रभास ने अपने पूर्वजन्म की पत्नियों, चिन्तामणि, घोडों, सैनिकों तया धन-रत्नों को बाहर लाकर सूर्यप्रभ को कुछ सन्तुष्ट किया ॥२४७॥
तब मय, सुनीय और सुमेरु के साथ अपने मन्त्रियों के संग सूर्यप्रभ, अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर फिर सेना-शिविर में लौट आया ॥२४८॥
वहाँ पर असुर और मानव-राजाओं के अपने-अपने निवास-भवन में चले जाने पर स्वयं भी रण-दीक्षा का व्रत लेकर सूर्यप्रभ ने कुशा के आसन पर रात्रि व्यतीत को ॥ २४९॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के सूर्वप्रभ लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त
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