5502. || द्वितीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना; अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा; अशोकदस और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा

5502. || द्वितीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना; अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा; अशोकदस और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा

द्वितीय तरंग

शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना

इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति-देव सोचने लगा ॥१॥

'कनकपुरी मैंने देखी है' - इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त अपमान प्राप्त किया है ।।२।।

अतः उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा, जबतक मैं उस नगरी को न देख लूं या प्राणों का त्याग न कर लूं ॥ ३॥

उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से ही क्या लाभ है ? 11

ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्षमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल पड़ा ।।५।।

क्रमण. चलते हुए उम शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य नाम का महान् और घोर वन-प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक, अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में प्रविष्ट हुआ ।।६।।

वाय् से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन, अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त उपके शरीर पर मानों पंखा झल रहा था॥७७॥

सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं से मारे जाते हुए मृग आदि की करुण चीत्कारों के बहाने, अनेका-नेक चोर-डाकुओं के पराभव-दुःख के कारण मानों वह वन दिन-रात रोता रहता था ।॥८॥

स्वतन्त्रता से उछलती हुई मरुभूमि की किरणों से वह बन मानों सूर्य के उग्र तेज को जीतना चाहता था ।।९।।

जल के सम्पर्क से रहित निरन्तर चलते रहने पर भी समाप्त न होनेवाले एवं पग-पग पर विपत्तियों से भरे लम्बे रास्तोवाले उस वन को कुछ दिनों में लाँधकर उसने एकान्त और शान्त स्थान में शीतल और स्वच्छ जल से भरे हुए एक बड़े सरोवर को देखा ।।१०-११।।

उस सरोवर में खिले हुए कमल ऊपर उठे हुए छत्र के समान लग रहे थे और हंस-रूपी विर इधर-उधर चलायमान हो रहे थे। मानों वह सरोवर, सभी सरोवरो के राजा की शोभा ।।रण कर रहा हो।। १२।।

शक्तिदेव ने, उसमें स्नान आदि किया और तत्पश्चात् उमने उस सरोवर के उत्तर की ओर सफल एवं सघन वृक्षो से भरे हुए आश्रम-स्थल को देखा। उसमें एक पीपल-वृक्ष के नीचे अनेक तपस्वियो से घिरे हुए सूर्यतपा नामक ऋषि को देखा। वह ऋषि अपनी अवस्था के सौ वर्षों के समान मानों सौ गाँठों से गूंथी हुई एव वृद्धावस्था से श्वेत कनपटी में लटकती हुई स्फटिक की माला से शोभित हो रहा था ।।१३-१५।।

वह शक्तिदेव, प्रणाम करके उस मुनि के समीप गया और मुनि ने भी अतिथि-सकार करते हुए उसका स्वागत किया ।।१६।।

मुनि ने भोजन के लिए फल आदि देकर उससे पूछा- 'हे भद्र, कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे, बताओ' ।।१७।।

'भगवन् ! मैं वर्धमान नगर से आया हूँ और प्रतिज्ञा करके कनकपुरी जाने के लिए उद्यत हूँ' ॥१८॥

पता नहीं, वह नगरी कहाँ है, यदि आप जानते हों, तो कृपाकर कहें। इस प्रकार नम्रता-पूर्वक शक्तिदेव ने मुनि से कहा ॥१९॥

'बेटा, मुझे इस आश्रम-स्थान में एक सौ आठ वर्ष व्यतीत हो गये। आज तक मैंने कनक-पुरी का नाम भी नही सुना। इस प्रकार मुनि से कहा गया शक्तिदेव अत्यन्त निराश और दुःखी हुआ ॥२०॥

तब फिर वह बोला-'यदि ऐसा है, तो मैं इस पृथ्वी पर घूमते-घूमते मर जाऊँगा।' क्रमश उसकी सारी बातें सुनकर मुनि उससे बोला- 'यदि तुम्हारा यह निश्चय है, तो मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो।' यहाँ से तीन सौ योजन (अर्थात् बारह सौ कोस) पर काम्पिल्य नाम का नगर है। वहाँ पर उत्तर नाम का पर्वत है, उसमें एक आश्रम है।॥ २१-२३॥

'वहाँ पर मेरा माननीय बड़ा भाई दीर्घतपा नाम का ऋषि है। उसके पास जाओ। वह बहुत वृद्ध है। सम्भव है, वह उस पुरी को जानता हो' ॥२४।।

यह सुनकर 'ठीक है' ऐसा कहकर और मुनि की बातों में विश्वास करके शक्तिदेव ने वह रात वहीं व्यतीत की और प्रातःकाल ही काम्पिल्य नगरी की ओर शीघ्रता से चला गया ।।२५।।

अनेक कष्टो से सैकड़ो दुर्गम पथ पार करते हुए बहुत दिनों के पश्चात् वह काम्पिल्य नगर में पहुंचा और उस पर्वत पर चढ़ा ॥२६॥

वहाँ जाकर उसने आश्रम में रहनेवाले दीर्घतपा मुनि को देखा और प्रणाम करके उसके समीप गया। मुनि ने भी उसका स्वागत किया ।। २७।।

तत्पश्चात् शक्तिदेव ने राजकुमारी द्वारा बताई हुई कनकपुरी नगरी के सम्बन्ध में निवेदन किया और कहा कि 'मैं उसी ओर जा रहा हूँ, किन्तु ज्ञात नहीं कि वह नगरी कहाँ है ॥२८॥

मुझे वहां अवश्य जाना है। उसका पता प्राप्त करने के लिए ही सूर्यतप ऋषि ने आपके पास मुझे भेजा है' ।।२९।

इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव से मुनि ने कहा- "बेटा! इतनी लम्बी अवस्था में भी मैंने आजतक इस नगरी का नाम नही सुना था ।। ३०।।

दूर-दूर देशो से आये हुए किन-किन से मेरा परिचय नहीं हुआ, किन्तु किसी से भी यह नाम मैने नहीं सुना, दर्शन तां दूर की बात है।॥ ३१॥

बेटा! में तो समझता हूं कि वह दूर कही किसी दूसरे ही द्वीप में है। उसका उपाय तुम्हे बताता हूँ ॥ ३२॥

समुद्र के मध्य में उत्स्थल नाम का एक द्वीप है, वहाँ सत्यव्रत नाम का एक घनी निषादराज है। उसका प्रायः सभी दूर-दूर के द्वीपों में आना-जाना है। इसलिए सम्भव है कि उसने वह नगरी कही देखी या सुनी हो। इसलिए, तुम यहाँ से पहले समुद्र के समीप स्थित विटकपुर नामक नगर को जाओ। वहां से किसी बनिये के साथ उसकी नाव से उस निषादराज के पास अपनी इष्टसिद्धि के लिए जाओ" ॥३३-३६॥

इस प्रकार उस मुनि से कहा हुआ शक्तिदेव उसी समय मुनि से आज्ञा लेकर उसके आश्रम से चला गया ।। ३७।।

समयानुसार वह बहुत-से देशो और कोसो को पार करके समुद्र-तट के भूषण उस विटंकपुर में पहुँचा ॥ ३८।।

वहाँ उसने पता लगाकर उत्स्थल द्वीप जानेवाले समुद्रदत्त नामक बनिये से मित्रता की और उसी के जहाज पर प्रेमपूर्ण पायेय लेकर समुद्री मार्ग से वह उत्स्थल द्वीप को चला ।।३९-४०۱۱

समुद्र में कुछ दूर जाने पर बिजली-रूपी जीभ को लपलपाता हुआ काल-रूपी मेघ-राक्षस एकाएक उमड़ पड़ा। साथ ही विधि के समान भारी को हल्का और हल्के को भारी करता हुआ प्रचंड पवन भी चलने लगा ।।४१-४२।।

समुद्र में वायु से विताड़ित बडी-बड़ी पर्वताकार लहरें उठने लगीं। मानों अपने आधार का अपमान होने के कारण पक्षधारी पर्वत उठ खड़े हुए हों ।॥४३।।

वह जहाज, कभी ऊपर और कभी नीचे इस प्रकार उछलने लगा, मानों धनिकों में उत्थान और पतन का आदर्श उपस्थित कर रहा हो ।॥७४॥

कुछ ही समय में बनिये की चिल्लाहट से शब्दायमान वह जहाज, मानो भार वहन न कर सकने के कारण टूट गया ।॥४५॥

जहाज के टूटने पर उसका स्वामी एक तख्ते के सहारे तैरता हुआ, दूसरे जहाज के मिल जाने पर उसके द्वारा पार हो गया ।॥४६।।

गिरते हुए शक्तिदेव को मुँह बाये हुए एक बड़े मच्छ (ह्वेल) ने समूचा ही निगल लिया ।।४७।।

वह मच्छ, समुद्र में स्वेच्छा से घूमता हुआ दैवयोग से उत्स्थल द्वीप के समीप जा पहुँचा ॥४८॥

वहाँ पर उसी सत्यव्रत मछुआ के मछली पकड़नेवाले व्यक्तियों (मछियारों) द्वारा दैववश वह पकड़ लिया गया ।।४९।।

वे उस महामत्स्य को खींचकर अपने स्वामी सत्यव्रत के पास ले गये ।।५०।।

सत्यव्रत ने भी उस भारी मत्स्य को देखकर कौतुकवश उन दासों से उसे फड़वा दिया ॥५१।।

उसके फाडने पर, उसके पेट से, आश्चर्यमय दूसरे गर्भवास का अनुभव करनेवाला जीवित शक्तिदेव निकल पड़ा ॥५२॥

मच्छ के पेट से निकले हुए और कल्याण-कामना करते हुए उस युवक को देखकर चकित सत्यव्रत ने पूछा- 'हे ब्राह्मण! तुम कौन हो ? कैसे हो ? इस मत्स्य के पेट में तुमने शयन कैसे किया ? तुम्हारा यह वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत है' ।।५३-५४।।

यह सुनकर शक्तिदेव, उस निषादराज से बोला- मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण वर्षमान नगर से आया हूँ। मुझे कनकपुरी अवश्य जाना है। उसका पता न जानने के कारण चिरकाल तक दूर-दूर घूमा हूँ। तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि के कथन से उसके किसी द्वीपान्तर में होने का अनुमान करके उत्स्थल द्वीप-निवामी, निवादराज सत्यव्रत के पाम जाने के लिए जहाज पर आया और जहाज के टूट जाने पर मुझे मत्स्य ने निगल लिया और उसीने मुझे यहाँ पहुँचा दिया' ।।५५-५८।।

इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव को मत्यव्रत ने पुन. कहा- 'मैं ही सत्यव्रत हूँ और यही उत्स्थल द्वीप है। किन्तु अनेक द्वीपो को देखनेवाले मैंने तुम्हारी ईप्सित कनकपुरी नहीं देखी है। हाँ, द्वीपों के अन्त में है, ऐमा सुना गया है' ।॥५९-६०।।

उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव को निराश और खिन्न देखकर अतिथि-प्रेम से सत्यव्रत बोला- ।।६१।।

'हे ब्राह्मणदेवता, खेद न करो। आज रात को यहीं निवास करो। प्रातःकाल तुम्हारी सफलता के लिए कोई उपाय करूँगा' ।॥६२॥

ऐसा आश्वासन देकर निषाद के द्वारा भेजा गया वह शक्तिदेव एक ब्राह्मण-मठ में गया, जहाँ अतिथियों का सत्कार सुलभ था। उम मठ में रहनेवाले विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण द्वारा भोजन कराने पर शक्तिदेव ने उसके साथ अपनी जीवन-चर्चा प्रारम्भ की ॥६३-६४।।

उसका परिचय सुनकर तुरन्त ही विष्णुदत्त ने उसका आलिंगन करके हर्ष के आँसुओं के कारण रुँघे हुए कंठ से गद्गद होकर कहा- भाग्य से तू मेरे मामा का लड़का (ममेरा भाई) है और हम दोनों एक ही देश में उत्पन्न हुए हैं।॥६५-६७।।

मैं बहुत पहले अपने देश से यहाँ आ गया था। अब तुम यहीं रहो। शीघ्र ही द्वीपान्तरों से आनेवाले व्यापारी बनियो के कानों-कान तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा ॥६७-६८॥

ऐसा कहकर अपने कुल का पता लगाकर विष्णुदत्त ने उस समय के योग्य उपचारों से शक्तिदेव की सेवा की ।।६९।।

शक्तिदेव भी उसे पाकर मार्ग के दुःखप्रद कष्टों को भूल गया। विदेश में अपने बन्धु-जन का मिलना मरुभूमि में अमृत के झरने के समान सुखद होता है ॥७०॥

उसने अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि को भी समीप आया हुआ समझा। किसी कार्य के प्रसंग के बीच में आनेवाला श्रेय कार्य की समृद्धि का सूचक होता है ॥७१॥

तब रात्रि में शय्या पर लेटे हुए, अपनी कार्य-मिद्धि की चिन्ता में जागते हुए शक्तिदेव के पास सोया हुआ विष्णुदत्त, उसकी कार्य-मिद्धि का समर्थन करता हुआ इस प्रकार की कथा उसको सुनाने लगा ।।७२-७३।।

अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा

पुराने समय में यमुना नदी के तट पर एक विशाल गाँव में गोविन्दस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था ।।७४।।

उस गुणी ब्राह्मण के उसी के समान दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम अशोकदत्त और छोटे का नाम विजयदत्त था ।॥७५॥

उसके वहाँ रहते हुए दैवयोग में उस ग्राम में भीषण अकाल पड़ गया। तब गोविन्द-स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा- अकाल के कारण यह देश नष्ट हो रहा है। अत, मैं अपने सामने अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों की दुदंगा नही देख सकता ।।७६-७७।।

इसलिए हमारे घर में जितना अन्न है, उसे 'किसे कितना देना है'- यह मिश्चय करके मित्रों और बन्धुओं को दे डालो। तब यहाँ से किसी दूसरे देश को चलें ॥७८॥

यहाँ से चलकर कुटम्ब के साथ वाराणसी नगरी को चलें। इस प्रकार अपनी पत्नी से परामर्श करके उसने अपने घर का मारा अन्न बाँट दिया ।।७९।।

तदनन्तर, अपनी स्त्री, बालक और सेवक के साथ उस देश से चल पड़।। उच्चकोटि के व्यक्ति, अपने व्यक्तियों का कष्ट नहीं देखना चाहते ॥८०।।

गोविन्दस्वामी ने मार्ग में चलते हुए जटाधारी, भस्म रमाये, खप्पर लिये और अर्धचन्द्र धारण किये हुए शिव के समान एक तपस्वी को देखा ।।८१।।

उसने उस तपस्वी से अपना शुभ-अशुभ पूछा। तब वह योगी कहने लगा- 'तुम्हारे दोनो बालकों का भविष्य कल्याणमय है; किन्तु इनमें छोटे बालक विजयदत्त से तुम्हारा वियोग हो जायगा। तब बड़े पुत्र अशोकदत्त के प्रभाव से उसके साथ फिर तुम्हारा समागम होगा' ।।८२--८४।।

इस प्रकार इस ज्ञानी से कहा हुआ गोविन्दस्वामी, सुख और दुःख दोनों से आक्रान्त होकर वहाँ से चला गया ।।८५।।

तदनन्तर वाराणसी पहुँचकर उसके बाहरी भाग में स्थित चडिका के मन्दिर में ठहरा। वहा देवी की पूजा आदि कार्यों में उसका दिन बीत गया। रात में भी वह मन्दिर के बाहर, वृक्ष के नीचे, अन्य देशो से आये हुए यात्रियों के साथ सपरिवार सो गया ।।८६-८७।।

यात्रा से होनेवाली थकावट के कारण अन्य सभी यात्रियों के पत्ते आदि के बिछावनो पर सो जाने के पश्चात् जागते हुए उस ब्राह्मण के छोटे पुत्र को शीतज्वर का महान् प्रकोप हुआ। भविष्य में होनेवाले अपने परिवार के वियोग के कारण स्वरूप उसके ज्वर का प्रकोप बढ़ गया। रोएँ खड़े हो गये और शरीर काँपने लगा ।।८८- ९०।।

ठडक से काँपते हुए उसने पिता को जगाकर कहा- 'पिता ! मुझे भीषण शीतज्वर कष्ट दे रहा है। इसलिए इस शीत को दूर करने के लिए लकड़ी लाकर आग जलाओ। इसके बिना न तो मुझे गान्ति मिलेगी और न रात ही बिता सकूंगा' ।॥९१-९२।।

यह सुनकर उसके कष्ट से घबराया हुआ गोविन्दस्वामी बोला- 'इस समय रात को आग कहाँ से जलाऊँ?' तब विजयदत्त ने कहा- 'पिताजी, वह देखो, पास ही कहीं आग जल रही है। इसलिए काँपते हुए मुझे हाथ पकड़कर वहाँ ले चलो' ।॥९३-९५।।

पुत्र के ऐसा कहने पर पिता गोविन्दस्वामी ने कहा- 'बेटा! वह तो श्मशान है और वह चिता जल रही है। पिशाच, भूत, प्रेत आदि से युक्त भीषण श्मशान में तुम्हें कैसे ले जाऊँ ? तुम अभी बच्चे हो।' इस प्रकार पिता के वचन सुनकर वीर बालक विजयदत्त पिता को फटकारते हुए बोला- 'पिताजी, ये वेचारे पिशाच आदि मेरा क्या कर लेंगे ? क्या मैं दुर्बल हूँ ? तुम बिना किसी शंका के मुझे वहाँ ले नलो' ।।९६-९८।।

आग्रहपूर्वक इस प्रकार कहते हुए पुत्र को पिता वहाँ ले गया और वह बालक भी, शरीर को तपाता हुआ चिता के पास जा पहुँचा ।। ९९।।

जलती हुई आग की लपटो के केशोवाली और नर-माम को ग्रहण करनेवाली वह चिता मानों राक्षसो की गृहदेवी थी ।। १००।।

कुछ देर तक शरीर तनपाने में सावधान होकर बालक ने पिता से पूछा, 'चिता के अन्दर यह गांला-मा क्या दीखना है?' ॥१०१।।

पारा बैठे हुए पिता ने कहा, 'बेटा! यह मनुष्य का कपाल (शिर) जल रहा है' ।॥१०२॥

तब उस लड़के ने माहम के समान जलती हुई चिता की लकड़ी से उस सिर को फोड़ दिया ।।१०३।।

सिर को फोड़ते हो उसमे निकलती हुई चर्बी की धारा उस बालक के मुँह में आ गिरी। मानो श्मशान की आग ने उसे राक्षमी सिद्धि प्रदान की हो ॥१०४।।

उम चर्बी के चखने में वह बालक राक्षम बन गया। उसके सिर के बाल खड़े हो गये।' विकट दाँत निकल आये और उसने तलवार तान ली ।॥ १०५।।

तत्पश्चात् लकड़ी से उस कपाल को खीचकर वह बालक उसकी सारी चर्बी को आग के समान लपलपाती जीभ से चटपट चाट गया ।।१०६।।

तब वह कपाल को फेंककर और तलवार खीचकर अपने पिता गोविन्दस्वामी को ही मारने के लिए उसके पीछे दौड़ा ॥१०७।।

इतने में ही श्मशान से आवाज आई कि 'हे कपालस्फोट देव! अपने पिता को मत मारो। इधर आओ' ॥१०८।।

यह सुनकर कपालस्फोट नाम प्राप्त करके वह बालक, पिता को छोड़कर राक्षस बनकर अन्तर्धान हो गया ।॥१०९।।

तदनन्तर उसका पिता गोविन्दस्वामी 'हाय बेटा! हाय गुणी विजयदत्त !' इन शब्दों के साथ रोता-चिल्लाता हुआ वहाँ से चला गया ।।११०।।

वहाँ से चण्डी के मन्दिर में आकर उसने प्रातःकाल अपनी पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र अशोक-दत्त से रात की वह सारी घटना सुना दी ।। १११॥

देवी-दर्शन के लिए आया हुआ वाराणसी का रहनेवाला एक तपस्वी तथा अन्य एकत्र यात्री- सभी विना मेघ के वज्रपात के समान इस घटना के संबंध में सुनकर गोविन्द स्वामी के दुःख में समवेदना प्रकट करने लगे ।।११२-११३।।

इतने में ही देवी-पूजन के लिए वहाँ समुद्रदत्त नाम का एक धनी वैश्य आया। उसने इस प्रकार दुःखी गोविन्दस्वामी के पास जाकर उसे धैर्य प्रदान किया ।। ११४।।

तदनन्तर वह सज्जन बनिया, गोविन्द स्वामी को मपरिवार अपने घर ले गया और स्नान, भोजन आदि की आवश्यक व्यवस्था करा दी। विपद्मस्त प्राणियो पर दया करना उच्च व्यक्तियों का स्वभाव होता है ।।११५-११६।।

महातपस्वी के वचन पर विश्वास करके पुत्र के पुर्नार्मलन की आशा से गोविन्दस्वामी ने किसी प्रकार धैर्य धारण किया ॥११७॥

तब से लेकर उस महाषनी बनिये की प्रार्थना पर उसने वाराणसी में उस बनिये के घर ही रहना निश्चित किया ॥११८॥

वहीं पर विद्या प्राप्त करके उसका पुत्र अशोकदत्त युवक हो गया और कुश्ती लड़ना सीखने लगा ।।११९॥

धीरे-धीरे वह मल्लविद्या (पहलवानी) में निपुण हो गया। संसार में किसी भी दूसरे पहलवान के लिए उसे जीतना कठिन था ।।१२०।।

एक बार किसी देवयात्रा के मेले में दक्षिण-देश का एक विख्यात मल्ल (पहलवान) वाराणसी आया और उसने काशिराज प्रतापमुकुट के सभी पहलवानो को उनके सामने ही पछाड़ दिया ॥१२१-१२२।।

तब राजा ने, उस बनिये से अशोकदत्त की प्रशंसा सुनकर, उसे बुलवाकर लड़ने की आशा दी ।। १२३॥

वह दक्षिणी मल्ल भी हाथ से भुजाओं पर ताल ठोंकता हुआ अखाड़े में आया। अशोकदत्त ने उस मल्ल (पहलवान) का हाथ मरोड़कर उसे पटक दिया ।। १२४।।

तब उस पहलवान के पटके जाने पर उठे हुए जनरव से, मानो अखाड़े की भूमि, उस अशोकदत्त को धन्यवाद देने लगी ।। १२५॥

काशिराज प्रतापमुकुट ने प्रसन्न होकर पुरस्कार में अशोकदत्त को रत्नो से लाद दिया ।। १२६।।

साथ ही, उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उमे अपना अंग-रक्षक नियुक्त कर लिया। फलतः वह अशोकदत्त कुछ ही दिनो में राजा से अतुल सम्पत्ति प्राप्त कर धनी हो गया। राजा भी मल्लविद्या का विशेषज्ञ था ।।१२७।।

एक बार वह राजा चतुर्दशी तिथि को नगर के बाह्र स्थापित किये गये शिवजी के दर्शन के लिए गया। उनकी पूजा करके वह रात में श्मशान-मार्ग से ही लौटा। आते हुए उसने श्मशान से निकली हुई यह वाणी मुनी कि 'हे स्वामी ! मुझे दडाधिकारी ने झूठे ही प्राणदड की सजा देकर मूली पर चढवा दिया है। आज तीमरा दिन है। मुझ पापी के प्राण नही निकल रहे हैं। मै अत्यन्त प्यागा हूँ। मुझे पानी पिलाओ' ।।१२८-१३१॥

यह सुनकर राजा ने दया करके अपने साथ चल रहे अशोकदत्त से कहा कि 'तुम इसे जल भेजो' ।॥१३२॥

उमने कहा- 'महाराज, इम ममय रात को श्मशान में कौन जायगा, इसलिए मैं स्वयं ही जाता हूँ'- ऐसा कहकर अशोकदत्त पानी लेकर स्वयं ही वहाँ गया ॥ १३३॥

राजा के अपनी नगरी में चले जाने पर वह वीर अशोकदत्त चारों ओर घने अँधेरे से भरे हुए, शुगालो द्वारा इवर-उधर फेके गये मास के टुकडों से मानों बलि दिये गये, चिताओ की चमक से कहीं-कही प्रकाशमान, नाचते हुए वैतालों से शब्दायमान और काली रात के निवास-भवन के समान उम श्मशान में उसने प्रवेश किया ।। १३४-१३६।।

वहाँ जाकर उसने ऊँचे स्वर में कहा- 'राजा से किसने पानी माँगा है?' तब उसने एक ओर से 'मैंने माँगा है' इस प्रकार का शब्द सुना ॥ १३७।।

उसी शब्द के अनुसार उसने चिता की आग देखी और वहीं शूली से बिंधे हुए किसी पुरुष को देखा ।।१३८।।

उसने उस शूली के नीचे सुन्दर आभूषणों से सुशोभित एक रोती हुई स्त्री को देखा। वह अपूर्व रमणी सर्वांग सुन्दरी थी, मानों कृष्णपक्ष के बीतने के कारण चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर चाँदनी के समान रजनीरमणी, चिता पर चढ़कर सती होने के लिए आई हो । १३९-१४०।।

'हे माता, तू कौन है, यहाँ क्यों रो रही है और इस प्रकार क्यों बैठी है ?'- इस प्रकार अशोकदत्त के प्रश्न करने पर वह स्त्री बोली- 'मैं शूली पर चढ़े हुए इस पुरुष की अभागिन स्त्री हूँ। इसके साथ सती होने का निश्चय करके यहाँ बैठी हूँ। कुछ समय तक इसके प्राणो के निकलने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। तीन दिन बीत जाने पर भी इसके प्राण नही निकले हैं ।।१४१-१४३।।

यह बार-बार पानी माँगता है। मैं पानी लाई भी, किन्तु ऊँची शूली पर लटके हुए इसके मुँह तक नहीं पहुँच पा रही हैं ।॥१४४।।

स्त्री की बाते सुनकर वीर अशोकदत्त बोला- 'राजा ने मेरे हाथों यह जल भेजा है। अब तू मेरी पीठ पर पैर रखकर इसके मुख में यह जल डाल दे। आपत्ति के समय पुरुष का स्पर्श स्त्री के लिए दूषित नही है' ।।१४५-१४६।।

यह सुनकर और उसकी बात मानकर वह स्त्री, पानी लेकर, शूली की जड़ में नीचे मुंह किये हुए अशोकदत्त की पीठ पर दोनों पैर से चढ़ गई ।। १४७।।

कुछ ही समय पश्चात् उसने भूमि पर और अपनी पीठ पर रक्त की बूंदों के गिरने से शंकित हो, मुँह उठाकर ऊपर देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह स्त्री, शूली पर चढ़े हुए उस पुरुष का मांस कटार से काटकर खा रही है।।१४८-१४९।।

उस स्त्री की इस प्रकार विकृति को देखकर उस वीर ने उसे पछाड़ने के लिए उसके पैर पकड़े, जिनमें पैरों का आभूषण (पायजेब) बज रहा था ॥१५०॥

वह स्त्री भी पैरों को छुड़ाकर और अपनी माया से आकाश में उड़कर अदृश्य हो गई ॥ १५१॥

पैरों को छुड़ाते समय अशोकदत्त के बलपूर्वक खीचने पर उसके एक पैर का पायजेब उसी अशोकदत्त के हाथ में ही रह गया ।।१५२।।

और, दुष्टों की संगति के समान प्रारम्भ में अच्छी, मध्य में अधःपातकारिणी और अंत में घोर बिकारबाली वह स्त्री हाथ से निकल गई ॥१५३॥

देखकर वह अशोकदल आश्चयं और सन्ताप करने लगा ।। १५४।।

किन्तु अपने हाथ में उसके दिव्य पायजेब को देखकर प्रसन्न भी हुआ। तदनन्तर वह अशोकदत्त, पायजेब हाथ में लेकर श्मशान से घर आया और प्रातःकाल स्नान करके राजभवन को गया ।। १५५।।

'क्या उस शूली पर चढ़े हुए को तुमने पानी दिया?' - इस प्रकार पूछते हुए राजा को उसने 'हाँ' कहकर वह पायजेब भेंट किया ।।१५६।।

'यह कहाँ से मिला?' - इस प्रकार प्रश्न करते हुए राजा को उसने रात की अद्भुत और भीषण घटना कह सुनाई ।। १५७।।

इस प्रकार उसके असाधारण मनोबल को जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उस दिव्य आभूषण को लेकर रनिवास में गया। उसे महारानी को देते हुए उसने रात का सारा वृत्तान्त रानी से कह सुनाया ॥१५८-१५९।।

यह सब सुनकर और उम दिव्य आभूषण को देखकर रानी अशोकदत्त की प्रशंसा करती हुई मन में अत्यन्त प्रसन्न हुई ।।१६०।।

तब राजा ने रानी से कहा- 'देवि, यह अशोकदत्त जाति से, विद्या से और अपने सच्चे स्वरूप से बड़ों में बड़ा है। अतः यदि यह मेरी भव्य बेटी मदनलेखा का पति हो तो अच्छा हो। यह मेरा विचार है' ।।१६१-१६२।।

वर के ये हो गुण देखे जाते है, न कि क्षण में नष्ट होनेवाली चंचल लक्ष्मी। इसलिए उस उत्तम वीर पुरुष को मैं कन्या देता हूँ ।॥ १६३॥

यह सुनकर आदर के साथ उसका समर्थन करती हुई रानी ने कहा- 'यह उचित है। यह युवा अपनी कन्या के मवंथा अनुरूप और योग्य है। वह कन्या भी, मधु-उद्यान में उसे देखकर उसपर आसक्त हो चुकी है। इन दिनो वह शून्य हृदय होकर न कुछ सुनती है और न कुछ देखती ही है।।१६४-१६५।।

उसकी सखी से यह जानकर चिन्ता करती हुई मैं सो गई और रात बीतने पर (उषःकाल में) स्वप्न में किसी दिव्य स्त्री द्वारा मानों इस प्रकार कही गई। 'बेटी, इस मदनलेखा को दूसरे के लिए न देना, यह अशोकदत्त की पूर्वजन्म की अजित पत्नी है' ।।१६६-१६७।।

यह सुनकर, जागकर और बहुत ही सबेरे के उस स्वप्न में विश्वास कर, मैं बेटी को धीरज भी दे आई हूँ ॥१६८।।

इस समय आपने स्वयं कह दिया, तो ऋतु की लता जैसे वृक्ष का समागम करती है, उसी प्रकार इन दोनों का भी समागम हो जाय ॥१६९॥

पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रसन्न राजा ने विवाहोत्सव का आयोजन करके वह कन्या अशोकदत्त को दे दी ॥१७०।।

उन दोनों, राजेन्द्र की कन्या और विप्रेन्द्र के पुत्र का समागम, परस्पर शोभा बढ़ाने के लिए लक्ष्मी और विनय के संगम के समान हुआ ।॥ १७१।

एक बार रानी ने राजा से उस दिव्य मणि के पायजेब के सम्बन्ध में कहा, 'आर्यपुत्र, यह अकेला पायजेब अच्छा नहीं लगता, इसलिए इसी के समान दूसरा भी बनवाओ' ।।१७२-१७३।।

यह सुनकर राजा ने सोनार, जड़िये आदि को आज्ञा दी कि 'इसी के समान दूसरी पायजेब बनाओ, ।।१७४।।

वे उसे भली भाँति जांचकर बोले 'महाराज इस प्रकार का दूसरा पायजेब नही बनाया जा सकता। यह तो देवताओं की कारीगरी है, मनुष्यों की नहीं ॥ १७५॥

इसमें के बहुत-से रत्न तो भूतल में मिलते ही नहीं, इसलिए जहाँ से यह एक मिला है, वही इसका जोड़ा भी ढूंढ़ो' ।।१७६।।

यह सुनकर राजा और रानी के निराश और खिन्न हो जाने पर वहाँ बैठा हुआ अशोकदत्त बोला- 'मैं तुम्हारे पायजेब का जोड़ा लाता हूँ' ।।१७७।।

उसकी इस प्रकार की प्रतिज्ञा को राजा ने केवल साहस समझा। अतः स्नेह से बार-बार मना करने पर भी अशोकदत्त, अपने निश्चय से विचलित न हुआ और उस पायजेब को लेकर फिर श्मशान में गया ।।१७८-१७९।।

कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात में, जहाँ उसने वह आभूषण पाया था, वहीं पहुंचा। वहाँ जाकर घधकती हुई चिता के धुएं से मलिन (काले) पाश में लपेटे हुए मनुष्यों के गलों को अपने गलों में लटकाये हुए, वृक्षों के समान दीर्घकाय राक्षसों से संकीर्ण उस श्मशान में उसने पहले देखी हुई उस स्त्री को देखा। उसका पायजेब लेने के लिए उसने नर मांस बेचने का उपाय सोचा ॥ १८०-१८२।।

उसने एक वृक्ष में बंधी हुई मनुष्य की लाश को खींचकर और कन्धे पर लादकर घूमना आरम्भ किया और चिल्लाने लगा कि 'मैं मानव-मांस बेच रहा हूँ, जिसे लेना हो, ले' ।॥१८३॥

'हे महामना ! इसे लेकर मेरे साथ आओ।' इस प्रकार दूर बैठी हुई स्त्री बोली-१८४।।

यह सुनकर उसका पीछा करते हुए उसने समीप ही एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई, दिव्य रूप-वाली और रत्नों के आभूषणों से चमकती हुई, अनेक स्त्रियों से घिरी हुई और आसन पर बैठी हुई एक स्त्री को देखा ।।१८५।।

मरुभूमि में कमलिनी के समान उस स्थान (श्मशान) पर ऐसी स्त्री का रहना सम्भव नहीं था। उस स्त्री के द्वारा ले जाया गया अशोकदत्त, उस बैठी हुई सुन्दरी के पास जाकर बोला- 'मैं मनुष्य-मांस बेचता हूँ, ले लो' ।॥१८६-१८७।।

तब वह दिव्य रमणी बोली कि 'हे महापुरुष ! इसे किस मूल्य पर देते हो ?' ॥१८८॥ तब वीर अशोकदत्त ने हाथ में लिये हुए एक पायजेब दिखाकर कहा- 'जो इसके ही

समान दूमरी पायजेब मुझे देगा, उसे दूंगा। यदि वह है, तो ले लो' ॥१८९॥

यह सुनकर वह बोली- 'हाँ, इसी का जोड़ा दूसरा पायजेब मेरे पास है। यह मेरा ही 'पायजेब तूने छीना है।॥१९०॥

मैं वही स्त्री हूँ, जिसे तुमने शूली में बिघे हुए उस मनुष्य के पास उस दिन देखा था। इस समय दूसरा रूप बदलने के कारण तूने मुझे नही पहिचाना ॥१९१-१९२॥

तो अब मांस लेकर क्या होगा; मैं जो कहती हूँ, वह करो, तो इसी के समान दूसरा पायजेब तुम्हें दूंगी' ।॥ १९३॥

इस प्रकार कहे गये उस वीर ने उसकी बात स्वीकार करके कहा- 'जो तू कहेगी, वह उसी समय करूँगा' ।।१९४।।

अशोकदस और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा

तब उस दिव्य स्त्री ने उससे अपने मन की बात इस प्रकार कही- 'हे भले आदमी ! हिमालय के शिखर पर त्रिघंट नाम का एक नगर है। वहाँ पर स्तम्भजिह्व नाम का एक राक्षसराज है। मैं उसकी विद्युत्छिखा नाम की पत्नी हूँ और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हूँ ॥१९५-१९६॥

वह मेरा पति एक कन्या के उत्पन्न होने पर कपालस्फोट नाम के राक्षसराज द्वारा युद्ध में मारा गया ।।१९७।।

तब हमारे स्वामी कपालस्फोट ने प्रसन्न होकर हमारा नगर मुझे दे दिया। उसमें मैं अपनी कन्या के साथ आनन्द से रहती हूँ ॥१९८॥

इस समय मेरी कन्या नयी चढ़ी जवानी पर है। उसके लिए किसी उत्कृष्ट बीर वर की प्राप्ति की चिन्ता मुझे सता रही है। इसीलिए उस दिन चतुर्दशी की रात को राजा के साथ जाते हुए तुम्हें देखकर मैं यहाँ रुक गई और सोचने लगी कि यह भव्य, सुन्दर वीर और युवा मेरी कन्या के लिए योग्य पति है। अतः इसकी प्राप्ति के लिए कोई उपाय क्यों न करूँ ।।१९९-२०१।।

ऐसा सोचकर शूली से विधे मनुष्य के बहाने, झूठे ही जल मंगाकर मैं तुझे श्मशान के बीच लाई ॥ २०२॥

माया से दिखाये गये रूप आदि के झूठे प्रपंच से झूठ बोलकर मैंने कुछ समय के लिए तुझे धोखा दिया ॥२०३।।

तुम्हारा फिर से आकर्षण करने के लिए जान-बूझ कर अपने एक पायजेब को छोड़कर मैं चली गई ।।२०४।।

आज इस रूप में तुम्हें पुनः प्राप्त किया है, तो अब तुम मेरे घर आकर मेरी कन्या का उपभोग करो और दूसरा पायजेब भी ले जाओ' ॥२०५॥

राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वह वीर उसकी बात को स्वीकार करके उसी की सिद्धि के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा उसके नगर में गया ॥ २०६॥

उसने हिमालय के शिखर पर सोने के चमकते हुए नगर को इस प्रकार देखा, मानों आकाश-गमन की श्रान्ति को मिटाने के लिए अचल सूर्यबिम्ब स्थित हो गया हो ॥२०७॥

वहाँ पर उसने राक्षसराज की विद्युत्प्रभा नाम की कन्या को भी प्राप्त किया, जो उसके साहस की साक्षात् सिद्धि के समान थी ।॥२०८॥

उसके साथ कुछ समय तक वही रहकर अशोकदत्त, सास की सम्पत्ति का सुख प्राप्त करता रहा ॥२०९।।

कुछ समय बीतने पर उसने सास से कहा- 'मुझे वह पायजेब दो, अब मैं वाराणसी नगर जाऊँगा। वहाँ मैंने राजा के सामने तुम्हारा एक पायजेब लाने की प्रतिज्ञा की है।' दामाद के इस प्रकार कहने पर उसकी सास ने दूसरा पायजेब भी उसे दे दिया और साथ ही एक सोने का कमल भी उसे दिया ॥२१०--२१२॥

अशोकदत्त, पुनः आने का निश्चय करके आभूषण और कमल लेकर उस नगर से निकला और उस सास ने अपनी सिद्धि द्वारा आकाश-मार्ग से उसे उसी श्मशान में पहुंचा दिया ॥२१४।।

उसी वृक्ष की जड़ में बैठकर वह उससे फिर कहने लगी कि मैं सदा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में यहाँ आती हूँ। इसलिए तू उस दिन रात को जब-जब यहाँ आयेगा, तब-तब मुझे इसी वटवृक्ष के नीचे पायेगा ।।२१५-२१६॥

ऐसा सुनकर और 'ठीक है' ऐसा कहकर, उस राक्षसी से विदा लेकर अशोकदत्त अपने पिता के घर आया ।।२१७।।

छोटे लड़के के (विजयदत्त के) वियोग-दुःख को दूना करनेवाले अशोकदत्त के वियोग से उसके माता-पिता अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥ २१८॥

जब अशोकदत्त ने, अचानक आकर अपने माता-पिता को सुखी किया, तब यह समाचार सुनकर उसका श्वशुर राजा भी वही आ गया ।। २१९।।

वहाँ आकर साहसिक के स्पर्श से मानों डरे हुए, अतएव रोमांचयुक्त अंगों से, राजा ने प्रणाम करते हुए अशोकदत्त को लिपटा लिया ॥२२०॥

तब अशोकदत्त, राजा के साथ राजभवन में गया। वहाँ जाकर उसने मूत्तिमान् आनन्द के समान पायजेब का जोड़ा और लक्ष्मी के लीला कमल के समान वह सुन्दर स्वर्ण-कमल उसने राजा को सर्पित किया ।। २२१-२२३।।

कुछ समय के अनन्तर रानी के साथ बैठे हुए राजा से कौतूहलवश पूछे गये अशोकदत्त ने, कानों को आनन्द देनेवाले अपने वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनाया ।॥२२४।।

साहस विना किये विचित्र चरित्रों के उल्लेख से चेतना को चमत्कृत करनेवाला स्वच्छ यश प्राप्त नही होता ।। २२५।।

इस प्रकार कहते हुए राजा और रानी उस जामाता से अपने को धन्य-धन्य समझने लगे ।।२२६।।

उत्सव में बजनेवाले वाद्यों और गीतों से गूंजनेवाला राजभवन, मानों अशोकदत्त के गुणों का गान कर रहा था।। २२७।।

दूसरे दिन, राजा ने, अपने पूजा-गृह में उस स्वर्ण-कमल को चाँदी के कलश में स्थापित कर दिया ।॥ २२८॥

श्वेत और रक्त वे दोनों कलश और पद्म इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानों राजा और अशोकदत्त के क्रमशः यश और प्रताप हों ।। २२९।।

उसकी अनुपम शोभा देखकर शिवभक्त राजा ने हर्ष से आँखें फाड़ते हुए भक्तिरस के आवेश में कहा- 'अहा! इस स्वर्ण-कमल से यह कलश ऊँचा होकर ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे हिम-धवल शिवजी, अपने लाल-पीले जटाभार से ऊँचे और शोभित होते हैं' ।। २३०-२३१।।

यह सुनकर अशोकदत्त ने कहा, 'महाराज! मैं आपके लिए दूसरा कमल भी ला दूंगा।' तब उत्तर देते हुए राजा ने उससे कहा- 'मुझे दूसरे कमल की आवश्यकता नही, तुम साहस न करो' ॥ २३२-२३४।।

कुछ दिन व्यतीत होने पर भी अशोकदत्त की दूसरे स्वर्ण-कमल को लाने की इच्छा बनी रही। इतने में ही कृष्ण चतुर्दशी आ गई ।।२३५॥

उस दिन अशोकदत्त की, स्वर्ण-कमल लाने की इच्छा जानकर, आकाश-सरोवर के स्वर्ण-कमल सूर्य के भय से अस्त हो जाने पर, सन्ध्या के समान लाल मेघ-रूपी मांस का ग्रास करने के गर्व से मानों तम-रूपी धुएँ से धूमिल राक्षसों के इधर-उधर दौड़-धूप करने पर चमकती हुई दीपमाला-रूपी दाँतों की पंक्ति से भीषण, अति भीषण रात्रि-राक्षसी के मुँह के खुलने पर वह अशोकदत्त शयन करती हुई राजपुत्रीवाले अपने भवन से चुपचाप निकलकर फिर उसी श्मशान में जा पहुँचा ॥२३६-२३९।।

वहाँ पर उसने उसी वटवृक्ष की जड़ में बैठी हुई और स्वागत करती हुई अपनी राक्षसी सास को देखा ।। २४०।।

तदनन्तर वह युवक, उसके साथ फिर हिमालय-शिखर पर स्थित उसके घर पर गया, जहाँ उसकी पत्नी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ।।२४१।।

सास से बोला कुछ समय तक अपनी पत्नी के साथ वहाँ निवास करके अशोकदत्त अपनी सास से बोला कि 'मुझे दूसरा स्वर्ण-कमल दो' ।॥ २४२॥

यह सुनकर वह कहने लगी कि 'मेरे पास दूसरा स्वर्ण-कमल कहाँ है। यह हमारे राजा कपालस्फोट का सरोवर दीख रहा है, उसमें इस प्रकार के स्वर्ण-कमल होते हैं। उन्हीं में से एक कमल राजा ने मेरे पति को प्रेम से दिया था ।। २४३-२४४॥

सास के ऐसा कहने पर अशोकदत्त ने कहा- 'तब तुम मुझे उस सरोवर पर ले चलो। मैं स्वयं स्वर्णकमल ले लूंगा' ।॥ २४५॥

उसकी सास ने उससे कहा- 'यह सम्भव नहीं है। बड़े-बड़े भीषण राक्षस उस सरोवर की रक्षा करते हैं'। इस प्रकार सास द्वारा निषेध करने पर भी उसने अपना हठ नहीं छोड़ा ।।२४६।।

तब किसी प्रकार उस सास द्वारा वहाँ ले जाये जाने पर उसने दिव्य स्वर्ण-कमलों से युक्त और हिमालय की ऊँची चोटी पर स्थित उस सरोवर को देखा ॥२४७॥

वह सरोवर, सूर्य की किरणों का निरन्तर पान करने के कारण सूर्य की प्रभा के समान चमकते हुए ऊँचे-ऊँचे एवं विकसित स्वर्ण-कमलों से ढका हुआ था ।।२४८॥

वहाँ जाकर जब वह कमलों को चुनने लगा, तब भयानक रक्षक राक्षसों ने उसे रोका ।।२४९।।

तब अशोकदत्त ने भी शस्त्र निकालकर उन्हें मारना प्रारम्भ किया। फलतः, कुछ राक्षस भय से भागकर अपने स्वामी कपालस्फोट के पास पहुँचे और उन्होंने उससे निवेदन किया ।। २५०।।

यह सुनकर क्रोध से भरे हुए राक्षसराज ने, स्वयं आकर लूटे हुए स्वर्ण-कमलों के साथ अशोकदत्त को देखा ।। २५१।।

उसने आश्चर्य के साथ अपने भाई को पहचान कर सोचा कि 'यह मेरा भाई अशोक-दत्त यहाँ कैसे आ गया' ।॥ २५२॥

तब हर्ष के आँसुओं से भरी हुई आँखोंवाला वह राक्षसराज शस्त्र को फेंककर दौड़कर उसके पैरों पर पड़कर कहने लगा- 'मैं विजयदत्त नाम का तुम्हारा छोटा सहोदर भाई हूँ। हम दोनों ब्राह्मणश्रेष्ठ गोविन्दस्वामी के पुत्र हैं। दैववश में इतने दिनों तक राक्षस बन गया था। चिता में पड़े हुए कपाल (सिर) को फोड़ने के कारण मेरा नाम कपालस्फोट पड़ गया। इस समय तुम्हारे दर्शन से मुझे ब्राह्मणत्व का स्मरण हो आया और अज्ञान से बुद्धि को ढक देनेवाला मेरा राक्षसपन अब मुझसे निकल गया ।॥ २५३- २५६।।

इस प्रकार कहते हुए विजयदत्त को छाती से चिपकाकर अशोकदत्त ने अपनी अधु-धारामों से जबतक उसके राक्षस-भाव से दूषित शरीर को धो डाला। इतने में ही प्रज्ञप्तिकौशिक नामक विद्याधरों के गुरु आकाश-मार्ग से उतरकर उन दोनों भाइयों से बोले- 'तुम सभी विद्याधर हो, शाप के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हो। अब तुमलोगों का वह शाप समाप्त हो गया है। अतः अब तुम अपनी विद्याओं को ले लो और अपने बन्धु विद्याधरों की श्रेणी में मिल जाओ। अब अपने स्थान को जाओ और अपने बन्धु-बान्धवों को स्वीकार करो'। उनसे ऐसा कहकर और विद्या देकर गुरु चले गये ।। २५७-२६१॥

तदनन्तर उन्होंने अपने को पहिचाना और वे दोनों विद्याधर हो गये और स्वर्ण-कमलों को लेकर विद्या के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा हिमालय-शिखर-स्थित अपने स्थान को चले गये ॥ २६२।।

वहाँ पर अशोकदत्त, राक्षसराज की पुत्री, अपनी पत्नी के पास गया। फलतः वह भी विद्याधरी हो गई ।।२६३।।

उस मुनयना के साथ वे दोनो भाई आकाश-मार्ग से क्षण-भर में वाराणसी आ गये ।।२६४।।

वहाँ आकर वियोग की अग्नि से तपे हुए माता-पिता को अपने दर्शन-रूपी अमृत-वर्षा से उन्होने शान्त किया ॥ २६५।।

शरीर का भेद न होने पर भी, उसी शरीर से दूसरे जन्म का अनुभव करते हुए वे दोनों, न केवल माता-पिता के ही, प्रत्त्युत सारी जनता के लिए प्रसन्नता देनेवाले हुए ॥ २६६॥

विजयदत्त को बहुत दिनों के पश्चात् प्राप्त करने पर प्रगाढ़ आलिगन करते हुए उसके पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ।।२६७।।

वाराणसी का राजा और अशांकदत्त का श्वशुर प्रतापमुकुट भी यह समाचार सुनकर प्रसन्न होकर वहाँ आ गया ।॥ २६८।।

उसके द्वारा सम्मानित अशोकदत्त, उत्सवों से सुन्दर वाराणसी नगरी में गया, जहाँ उसकी पत्नी राजकुमारी उत्कंठा से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥२६९॥

राजभवन में राजा को अशोकदत्त ने बहुत-से स्वर्ण-कमल दिये। इच्छा से भी अधिक कमलों के मिलने से राजा अत्यधिक प्रसन्न हुआ ।। २७०।।

एकबार परिवार के साथ बैठे हुए गोविन्दस्वामी ने आश्चर्य के साथ विजयदत्त से पूछा-॥२७१।।

'बेटा, उस समय श्मशान में रात के समय जब तू राक्षस बन गया था, तब क्या हुआ, बतामो' ।॥ २७२॥

तब विजयदत्त ने कहा- 'पिताजी, मैंने बाल-स्वभाव-सुलभ चंचलता से चिता में जलते हुए कपाल को दैववश फोड़ डाला ॥२७३॥

उससे निकली हुई चर्बी की धारा जब मेरे मुख में गई, तब माया से मूढ़ मैं उसी समय राक्षस बन गया ।।२७४।।

तदनन्तर दूसरे राक्षसों ने मेरा नाम कपालस्फोट रखकर अपनी मंडली में बुलाया और मैं भी उसमें सम्मिलित हो गया ।। २७५।।

वे लोग मुझे अपने साथ राक्षसों के राजा के समीप ले गये। उसने मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट की और मुझे अपना सेनापति बना दिया ।। २७६।।

उसके पश्चात् एक बार राक्षसराज ने घमड में आकर गन्धों पर चढ़ाई कर दी और वह स्वय युद्ध में मारा गया ॥ २७७।।

तब से उसके सेवको ने मेरा शासन स्वीकार किया और मैंने उसके नगर में रहकर राक्षसों पर राज्य किया ।।२७८।।

वहाँ पर अकस्मात् सोने के कमल लेने के लिए आये हुए आर्य (बड़े भाई) अशोकदत्त के दर्शन से वह मेरी राक्षसी दशा समाप्त हो गई ।। २७९।।

उसके पश्चात् शाप से मोक्ष होने पर हमलोगो ने अपनी विद्याएँ जैसे प्राप्त कीं, यह सब आर्य अशोकदत्त आपको सुनायेंगे' ।॥२८०।।

विजयदत्त के इस प्रकार कहने पर अशोकदत्त ने सारी कथा प्रारम्भ से सुनाई ॥२८१॥ पूर्वकाल में हम दोनो विद्याधर थे। उस समय हम दोनों ने गालव मुनि के आश्रम में गंगा स्नान करती हुई मुनि कन्याओं को देखा ॥ २८२॥

समान अभिलाषावाली उन कन्याओं को चाहते हुए हम लोग एकान्त स्थान ढूंढ़ने लगे। दिव्य दृष्टिवाले हमारे बन्धुओं ने इस रहस्य को जानकर हमें शाप दिया ॥२८३॥

तुम दोनों पापाचारी मनुष्य-योनि में उत्पन्न होओ। उस योनि में भी तुम दोनों का विचित्र वियोग होगा ॥२८४।।

मनुष्यों से अगम्य दूर देश में एक-दूसरे को देखकर अपने तत्त्व को जानोगे ॥ २८५॥ 

उस समय विद्याषरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे ॥२८६।।

इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम लोगों का जैसे वियोग हुआ, यह सब आपको ज्ञात ही है।॥ २८७७।

इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण, सास के प्रभाव से, राक्षसराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया ॥ २८८॥

और वही गुरु प्रज्ञप्तिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये ।।२८९।।

शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न अशोकदत्त ने इस प्रकार माता-पिता को तथा अपनी राजकुमारी पत्नी को अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया ॥ २९०।।

तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता, दोनो प्रियतमाओ और भाई के साथ वह धन्य अशोकदत्त, आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया ॥ २९१॥

वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम अशोकवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥ २९२॥

वे दोनों सुन्दर विद्यावर, तरुण भाई, अपने बन्धु-बान्धवो से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये ।।२९३।।

अपने देव-मन्दिर में दूसरे कलश में भी एक स्वर्ण-कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और चकित हुआ ।॥२९४।।

इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति, किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणो से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुरूप बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं।। २९५।।

इसलिए हे बल के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने मनोरथ सिद्ध करनेवाले किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना, उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है ।।२९६॥

वह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य स्त्री है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती ? ॥२९७।।

विष्णुदत्त से इस प्रकार एकान्त रात्रि में सरस कथा सुनकर उस शक्तिदेव ने हृदय में कनकपुरी देखने की अभिलाषा रखते हुए वैर्य के साथ वह रात्रि व्यतीत की ।।२९८।।

द्वितीय तरंग समाप्त

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