5.305. || पंचम कहानी || वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना; देवदास वैश्य की कथा; वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण; वत्सराज के दिग्विजय की कथा

5.305. || पंचम कहानी || वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना; देवदास वैश्य की कथा; वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण; वत्सराज के दिग्विजय की कथा

पंचम तरंग

वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना

तब यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा- 'महाराज ! इस समय आपका दैव (भाग्य) अनुकूल है और पुरुषार्थ (बल) तुममें है ही। इधर हमलोग (मन्त्रिगण) भी राजनीतिक दाँव-पेंचो के जानकार है, इसलिए जैसा सोचा गया है तदनुसार पृथ्वी का विजय करो' ।।१-२।।

यह सुनकर वत्सराज ने कहा- 'यह ठीक है, किन्तु कल्याण-साधना में विघ्न बहुत होते हैं' ॥३॥

इसलिए मैं इस विजय की सिद्धि के लिए मैं तप द्वारा शिव जी की आराधना करता हूँ; क्योंकि उनकी कृपा के बिना इष्ट सिद्धि कैसे हो सकती है' ।।४।।

राजा की इस इच्छा का सभी मन्त्रियों ने इस प्रकार अनुमोदन किया, जिस प्रकार सेतु बाँधने के लिए उद्यत रामजी के शिवाराधन के लिए कभी वानरों ने अनुमोदन किया था ।।५।।

तदनन्तर दोनों रानियों और मन्त्रियों के साथ तीन रात तक उपवास करते हुए राजा को शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया ।।६।।

'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, उठो, तुम विना किसी विघ्न-बाधा के विजय प्राप्त करोगे' ।॥७॥

शिवजी के प्रसाद से कष्ट-रहित राजा इस प्रकार उद्यत हुआ, जिस प्रकार सूर्य की किरणों से वृद्धि प्राप्त करके प्रतिपदा का चन्द्रमा शोभित होता है ॥८॥

प्रभातकाल में उठकर राजा ने, मन्त्रियों तथा व्रत-उपवास से क्लान्त फूल के समान कोमल दोनों रानियो को, स्वप्न का वर्णन करके हर्षित कर दिया ।।९॥

कानो के द्वारा पीने (सुनने) के योग्य उस स्वप्न के वर्णन से दोनो महारानियो को मानो मीठी औषधि का उपचार हुआ ।।१०।।

राजा वत्सराज ने, तपस्या के प्रभाव से अपने पूर्वजों के समान प्रभाव प्राप्त किया। और, उसकी दोनों पत्नियो ने पतिव्रताओं की पवित्र कीत्ति प्राप्त की ॥ ११॥

व्रत की समाप्ति के उत्सव पर समस्त नगरवासी उत्सव में व्यग्र रहे। उसके दूसरे दिन, यौगन्धरायण ने राजा को कहा ॥१२॥

'स्वामी ! तुम धन्य हो, जिस पर शिवजी इस प्रकार प्रसन्न है।' इसलिए तुम अब शत्रुओ को जीतकर अपनी भुजा से अर्जित लक्ष्मी प्राप्त करो ।॥१३॥

अपने धर्म से प्राप्त सम्पत्ति का विनाश नही होता ।।१४।।

इसीलिए तुमने अपने पूर्वजों की चिरकाल से भूमि में गड़ी हुई नष्ट लक्ष्मी को प्राप्त किया है। इस पर एक कथा सुनो ।।१५।।

देवदास वैश्य की कथा

पाटलिपुत्र नगर में बड़े धनी कुल में उत्पन्न देवदास नामका वैश्य-पुत्र था ।।१६।।

उसकी पत्नी, पौण्ड्रवर्धन नगर के किसी बनी वैश्य की कन्या थी ।।१७।।

पिता के मर जाने पर व्यसनी देवदास ने, जुए में सारा धन गँवा दिया ॥१८॥

उसके दरिद्र हो जाने पर उसकी पत्नी दुःख से कष्ट में रहती थी। इसलिए उसका बनी पिता आकर उसे अपने घर (पौण्ड्रवर्धन) ले गया ॥१९॥

कुछ दिनों तक स्वयं कष्ट पाता हुआ और कुछ व्यापार के लिए श्वशुर से धन पाने की इच्छा से देवदास उसके पास गया ।॥२०।।

और मैला-कुचैला धूल से भरा हुआ वह मायकाल पौण्ड्रवर्धन नगर में पहुँचा। अपनी ऐसी स्थिति देखकर सोचने लगा कि इस हालत में ससुराल कैसे जाऊँ। दरिद्र व्यक्ति के लिए मर जाना अच्छा है, किन्तु अपने सम्बन्धियों के आगे दीनता-प्रदर्शन उचित नही ।॥२१-२२॥

ऐसा मोचकर वह बाजार में जाकर किसी दूकान के बाहर चौतरे पर रात में कमल के ममान सिमटकर पड़ा रहा ।।२३।।

कुछ ही देर बाद उसने दूकान का दरवाजा खोलकर उसमे घुसते हुए किसी युवक वैश्य को देखा। कुछ ही समय के बाद दबे पांवो आई हुई और जल्दी से दूकान में घुसी किसी स्त्री को देखा ।।२४-२५।।

दूकान के अन्दर जलते हुए दीप के प्रकाश मे दरवाजे की दरार से जब उसने अन्दर झाँका, तब अपनी पत्नी को देखा और पहचान लिया ।। २६।।

अन्दर से द्वार बन्द करके अन्य पुरुप के संसर्ग में अपनी पत्नी को देखकर उस पर मानों वज्रपात-सा हुआ और वह मोचने लगा ।। २७।।

बुरे त्र्यसनों के ममुद्र में पड़े हुए पुरुषों के लिए ऐसी विपत्तियाँ सुलभ है। धनहीन व्यक्ति, शरीर को भी बेच देता है, स्त्रियों की तो बात ही क्या, जिसका जीवन स्वभावतः विद्युत् के ममान चचल होता है? ॥२८॥

पिता के घर में रहनेवाली स्वतन्त्र स्त्री की यही गति होती है ।।२९।।

ऐसा सोचता वह वाह बैठा हुआ अपनी स्त्री तथा उसके उपपति का गुप्त वार्तालाप सुनने लगा ।। ३०।।

उसने दूकान के द्वार पर आकर कान लगाया, तो वह पापिन स्त्री एकान्त में उस अपने उपपति वैश्य से कह रही थी कि तेरे प्रति मेरा प्रेम है, इसलिए कहती हूँ सुनो ॥३१॥

मेरे पति का परदादा वीरवर्मा था, उसने अपने घर के आँगन के चारो कोनों मे सोने की अशर्फियों से भरे चार घड़े छिपाकर गाड़े है। यह बात उसने अपनी एक स्त्री से कही थी, उस स्त्री ने मरने के समय उसकी बहू (पतोहू) से बता दी। उसने अपनी बहू (मेरी सास) को यह बतलाया और मेरी सास ने मुझसे कहा। इस प्रकार मेरे पति के कुल में सासो के द्वारा इस धन की जानकारी के लिए परम्परा चल रही है।॥३२-३५॥

मेरा पति यद्यपि दरिद्र है, फिर भी मैंने उससे नहीं कहा। वह जुआरी है, इसीलिए मेरा शत्रु है और तुम मेरे परम प्रिय हो। इसलिए तुमसे कह रही हूँ ।। ३६।।

अतः तुम जाकर और धन देकर मेरे पति से उसका मकान खरीद लो और उस धन को निकालकर यहाँ आकर मेरे साथ सुख से रहो ॥ ३७॥

उस कुटिला स्त्री से इस प्रकार कहा गया उसका जार (यार) बिना परिश्रम धन-प्राप्ति की आशा से प्रसन्न हो गया ।। ३८ ।।

देवदास ने भी उस दृष्टा स्त्री के वाक्य-बाणों में क्रुद्ध होकर धन की आशा को हृदय मे धारण किया ।। ३९।।

इस प्रकार उम बनिये की पत्नी का गुप्त पति, वह बनिया, खजाने के लालच से व्यापार के बहाने पाटलिपुत्र को चला ।।४०।।

उसने पटना जाकर देवदास में उम घर को खरीद लिया। देवदास ने भी जान-बूझकर अधिक मुल्य में मकान उसे दे दिया। देवदाम भी पाटलिपुत्र में जाकर अपने निवास के लिए नये घर का प्रबन्ध करके श्वमुर-गृह में शीघ्र ही अपनी स्त्री को लिवा लाया ॥४१-४२।।

ऐसा होने पर उसकी पत्नी का गुप्त कामी वह धूर्त बनिया, उम मकान में खजाना न पाकर देवदास में आकर बोला ॥ ४३।।

'यह तुम्हारा पुराना मकान मुझे अच्छा नही लगा, इसलिए मेरा दाम लौटा दो और अपना घर ले लो' ।।४४।।

वह बनिया, इस प्रकार कह रहा था और देवदाम इनकार कर रहा था। इस प्रकार लडते-झगडते वे दोनों फैसला कराने के लिए राजा के सन्मुख जा पहुँचे ।।४५-४६।।

राजा के पास जाकर हार्दिक दु ख के कारण देवदास ने अपनी दुष्ट पत्नी का ममस्त वृत्तान्त राजा से कहा ।।४७।।

तब राजा ने उसकी स्त्री को बुलवाकर मारी बातो के तत्त्व की खोज की और परदारा-गमन के अपराध में उम वैश्य (गुप्तकर्मी) को भी सर्वस्व-हरण का दण्ड दिया ॥४८॥

देवदास, उस दुष्ट स्त्री की नाक काटकर, दूसरा विवाह करके और गड़े हुए धन को पाकर आनन्द से रहने लगा ।।४९।।

वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण

इस प्रकार, धर्म से कमाई हुई लक्ष्मी सन्तान-परम्परा तक नष्ट नही होती और पाप की कमाई पत्ते पर पड़ी ओस की बूंद के समान विनाशशील होती है ॥५०॥

इसलिए पुरुष को चाहिए कि धर्म से घन कमावे। राजा के राज्य-रूपी वृक्ष का तो धर्म से अजित धन ही मूल है। अत. महाराज ! मन्त्रिमण्डल का विधिवत् सम्मान कर धर्म से धन प्राप्त करने के लिए दिग्विजय करो ।।५१-५२।।

तुम्हारे दो श्वसुरों के सम्बन्ध (मित्रता) के कारण बहुत-से राजा विरोध नहीं करते; बल्कि मित्रता रखते है ।।५३।।

यह जो वाराणसी (काशी) में ब्रह्मदत्त नाम का राजा है, वह तुम्हारा सदा का वैरी है, पहले उमी की विजय करो ।। ५४।।

उसके जीत लेने पर क्रमश ममूची पूर्व दिशा की विजय करो। और पाण्डु के कुमुद के ममान शुभ्र यश को ऊँचा करो - विस्तृत करो ।।५५।।

मुख्यमन्त्री से इस प्रकार कहे गये वत्सराज उदयन ने, विजय के लिए तैयार होकर, सारे राज्य की प्रजा में विजय-यात्रा की घोषणा करा दी ।।५६।।

राजा उदयन ने अपने साले और अपने सहायक गोपालक को उसका सम्मान करने के लिए विदेह (मिथिला) का राज्य दे दिया ।।५७।।

अपनी सेनाओ के साथ सहायता के लिए आये हुए पद्मावती के भाई सिंहवर्मा को सम्मानित करके चेदि देश का राज्य दे दिया ।। ५८।।

तदनन्तर राजा ने मेघो से वर्षाकाल के समान अपनी सेनाओ से चारो ओर घिरे हुए भिल्लो के राजा पुलिन्दक को बुलवाया ।। ५९।।

उम महान् राजा के राष्ट्र मे विजय-यात्रा की तैयारी हुई और शत्रुओ के हृदय में व्याकुलता उत्पन्न हो गई, यह आश्चर्य की बात है।॥ ६०।।

प्रधानमन्त्री यौगन्धरायण ने राजा ब्रह्मदत्त की कार्यवाही जानने के लिए अपने गुप्तचरो को वाराणसी भेजा ॥ ६१।।

इस प्रकार, सभी तैयारी हो जाने पर विजयसूचक शकुनो से प्रसन्न राजा उदयन ने, शुभ दिन में पहले पूर्व दिशा में ब्रह्मदत्त पर चढ़ाई की ।।६२।।

उठे हुए छत्रवाले ऊँचे हाथी पर बैठा हुआ राजा, ऐसा मालूम हो रहा था, जैसे फूले हुए वक्षवाले पर्वत-शिखर पर मदोन्मत्त सिह विराजमान हो ॥६३।।

सफलता की दूती के समान आई हुई जलाशयों और नदियों को सुखाक¹' मार्गों को सुखद और सुगम बनाती हुई शरद ऋतु ने राजा को उत्साह प्रदान किया ।॥६४।।

विविध प्रकार के शब्द करती हुई सेनाओं से भूतल को भरता हुआ और अकाल में ही वर्षा-काल का भ्रम करता हुआ वह राजा विजय के लिए अग्रसर हुआ ।। ६५।।

उसकी सेना के महान् कलकल शब्द की प्रतिध्वनियों से मानो दिशाएँ परस्पर उसके आगमन की सूचनाएँ देने लगीं ।। ६६।।

सोने के साजो से सजे हुए, अतएव सूर्य की किरणो से चमकते हुए उसकी सेना के घोड़े ऐसे मालूम होते थे, मानो नीराजन विधि से प्रसन्न अग्नि का अनुगमन कर रहे है।॥ ६७।।

दोनो कानों के समीप झूलते हुए सफेद चामरो से शोभित और मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर के कारण लाल मद-जल बहाते हुए उसके हाथी, मार्ग में चलते हुए ऐसे भले मालूम होते थे, मानों राजा के भय से डरे हुए पर्वतो ने, शरत्कालीन श्वेत मेघ-खण्डो से मण्डित एवं घातु-रसों के झरने बहाते हुए अपने पुत्र, सेना की सहायता के लिए भेजे हों ।॥६८-६९।।

यह राजा, अपने मामने फैलते हुए दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता। इसीलिए मानो गेना गे उड़ी हुई धूल ने, सूर्य के तेज को ढाँप दिया ।।७०।।

राजा के पीछे-पीछे उसकी दोनों महारानियाँ इस प्रकार चल रही थी, मानो राजा की नीति और ग्णां से आकृष्ट होकर कीत्ति और विजय लक्ष्मी चल रही हों ॥ ७१।।

वाय् में इधर-उधर उड़ाये जाते हुए सेना की ध्वजाओं के झण्डे मानों गत्रुओं को चेतावनी दे रहे थे कि या तो नम्र होकर अधीनता करो या भाग जाओ ।।७२।।

बह राजा खिले हुए श्वेत-कमलो में शोभित अगल-बगल के भू-भागों को शेषनाग के उठे हुए फणां के समान देखता हुआ जा रहा था ।। ७३।।

इयो बीच यौगन्धरायण से प्रेरित गुप्तचर, कापालिक का वेग बनाकर, वाराणसी नगरी में पहुँचे ।।७४।।

उनमे एक भूत-भविष्य का हाल जाननेवाला ज्ञानी (ज्योतिषी) बन गया और दूसरे सब उसके शिष्य बन गये ।।७५।।

वे उसके शिष्य, नगर में, इधर-उधर घूमते हुए अपने गुरु के सम्बन्ध में यह प्रचार करते थे कि यह हमारा आचार्य त्रिकालज्ञ और केवल भिक्षा लेकर ही खाता है ।।७६।।

वह ज्ञानी गुरु, पूछनेवालो को जो भविष्य में होनेवाली अग्निदाह आदि की बातें बताता था, उसके शिष्य उन बातों को गुप्त रूप से स्वयं प्रचारित करके उसका यश बढाते थे। इस प्रकार वह मिथ्या सिद्ध, काशी नगरी में, प्रसिद्ध सिद्ध बन गया। इस प्रकार उम सिद्ध ने, एक छोटे-से चमत्कार से राजा के अत्यन्त प्यारे एक राजपुत्र को अपना उपासक बना लिया ।।७७-७८।।

उसी राजपुत्र के द्वारा राजा ब्रह्मदत्त की युद्ध-सम्बन्धी गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त करना था ।।७९।।

तदनन्तर योग नामक ब्रह्मदत्त के मन्त्री ने आते हुए वत्सराज के मार्ग में विविध प्रकार के विनाश के जाल बिछा दिये ॥८०॥

यात्रा में आनेवाली प्रत्येक सड़क पर आनेवाले पेड़ो, लताओ, कुंओ, तालाबों, घास, फूस आदि में जहरीले द्रव्यों का योग करा दिया ।।८१॥

वत्सराज की सेना में विषकन्या² को बाजारू वेश्याओ के रूप में और रात में चोरी के आघात करनेवाले गुप्तचरों को वत्सराज की सेना में भेजा ॥८२॥

उम बनावटी सिद्ध कामलिक ने राजपुत्र से सारी बातें जानकर अपने सहायकों द्वारा यौगन्धरायण को शीघ्र सूचनाएँ प्रेषित की ॥८३॥

यौगन्धरायण जासूसो से यह सब जानकर मार्ग में विष से दूषित तृण, जल आदि का विपरीत योगो से शोधन कर देता था। उसने मेना-शिविर में आनेवाली अपूर्व स्त्रियो के वध की आज्ञा दे दी और गुप्त घातकों को मेनापति रुमण्वान् के साथ खोज-खोजकर मरवा डाला ।।८४-८५।।

यह जानकर कूटनीति के विफल होने पर ब्रह्मदत्त ने विशाल सेना के साथ सब दिशाओं को घेरकर आक्रमण करते हुए वत्सराज को अजेय समझा ।।८६।।

ऐसा सोचकर और मन्त्रियो से सम्मति करके सन्धि-दूत को भेजकर सिर पर अजलि रखकर प्रणाम करता हुआ ब्रह्मदत्त निकट आये हुए वत्सराज के समीप स्वयं गया ।॥८७॥

वत्सराज ने भी उपहार लेकर स्वय आये हुए राजा ब्रह्मदत्त का समुचित सम्मान किया; क्योकि वीर पुरुष प्रणति से प्रसन्न हो जाते है ॥८८॥

वत्सराज के दिग्विजय की कथा

इस प्रकार, काशी-नरेश के विजित हो जाने पर पूर्व दिशा को शान्त करता हुआ, मृदु नम्र राजाओं को झुकाता हुआ और कठोर शत्रुओं को, वृक्षों को वायु के समान उखाड़ता हुआ वत्सराज चलती हुई लहरों से घूरते हुए एवं वंग-देश के विजय त्रास से मानों काँपते हुए पूर्व समुद्र के तट पर पहुँचा ।।८९-९०।।

वत्सराज ने पूर्व समुद्र तट पर एक जयस्तम्भ गाड़ दिया, मानों पाताल के लिए अभय की प्रार्थना करने के निमित्त नागराज उठकर आया हो ।।९१।।

कलिंग-देशों को राजाओं ने नम्र-होकर कर दे देने पर (पराजित होकर अधीनता स्वीकार कर लेने पर) उम यशस्वी वत्सराज का यश, महेन्द्र पर्वत पर गड़ गया ।। ९२।।

महेन्द्र पर्वत के अपमान से डरे हुए, अतएव अनुगमन करते हुए विन्ध्य-पर्वत के शिखरो के समान हाथियो से उम देश के राजाओं को जीतकर (वत्सराज) दक्षिण दिशा की ओर गया ।॥९३।।

दक्षिण दिशा में गरत्काल के ममान राजा ने मेधो के समान शत्रुओं को (दक्षिण के राजाओ को) निम्मार और श्वेत बदनवाले, गर्जना-रहित और पर्वतो पर आश्रय लेनेवाला बना दिया ।।९,४

भोवण मघर्ष करनेवाले उन राजा उदयन ने, कावेरी का उल्लघन करके उसे और चाल देश के राजा की कीर्तन को कलुषित कर डाला, अर्थात् चोल' राजा को पराजित कर दिया ।।९५।।

राजा उदथन ने करा से मारे हुए मुरल' देश के राजाओ के सिरों की उन्नति को ही सहन नही किया, प्रत्युन करा में विवादित उस देश की स्त्रियो की कुचोन्नति को भी सहन नही किया ।।९६।।

राजा उदयन के हाथियों ने मात बारा में विभक्त गोदावरी का जल पीया था, अत उन्होंने उस जल को मद के बहाने मात स्थानों से निकाल दिया ॥९७॥

दक्षिण-विजय करने के अनन्तर वत्सराज, नर्मदा नदी को पार करके उज्जयिनी में आया। वहाँ उसके श्वसुर (वासवदत्त । के पिता) ने उसकी अगवानी की ।।९८।।

वहाँ राजा उदयन, मालाओ से शिथिल केशपाशों से दूनी शोभा धारण करते हुए मालव-रमणियों के कटाक्षो का लक्ष्य (शिकार) बन गया ।।९९।।

श्वसुर द्वारा सत्कार किया गया उदयन, उज्जयिनी में कुछ दिनो तक ठहर गया। वहाँ उसकी ऐसी आवभगत हुई कि वह अपने घर के सुखों को भी भूल गया ।।१००।।

पिता की गोद में लोटती हुई वामवदत्ता अपने बाल्यकाल का स्मरण करके महारानी के मुख में भी निस्पृह हो गई ।।१०१।।

राजा चण्डमहासेन भो जैमे वामवदत्ता में आनन्दित हुआ, वैसे हो पद्मावती से भी आनन्द अनुभव करता था ।। १०२।।

कुछ राते उज्जयिनी में व्यतीत करके, समुर की सेनाओं से युक्त वत्मराज पश्चिम दिशा की ओर चला ।।१०३।।

अवश्य ही राजा उदयन की तलवार उसके प्रतापानल की धूमरेखा के समान थी; क्योंकि उसने लाट देश की स्त्रियों की आँखों को उमड़ते हुए आँसुओं से कड़ आ कर दिया था ।।१०४।॥

यह राजा, समुद्र-मन्थन के लिए कही मुझे उखाड़ न ले, इसी भय से वायु से काँपते हुए वनोवाला मन्दराचल पर्वत, मानो काँपने लगा ।।१०५।।

राजा उदयन, सचमुच सूर्य से विलक्षण कोई तेजस्वी है; जिसका पश्चिम में उदय हुआ ।।१०६।।

पश्चिम-विजय करने पर राजा उदयन, कुबेर से अलंकृत अलका-नगरी से विभूषित, कैलास के हास से सुन्दर उत्तर दिशा को चला ।।१०७।।

वहाँ पर घोड़ो की सेना से युक्त उदयन ने सिन्धुराज को वश में करके म्लेच्छों का इस प्रकार सहार किया, जैसे राम ने राक्षसों का किया था। विक्षुब्ध समुद्र की लहरों के समान पारसी घोड़ों के झुण्ड उदयन के हाथी-रूपी तटवनो से आकर टकराये ।। शत्रुओ से कर लेने-वाले उस महापुरुष उदयन ने, हाथ में चक्र लिये हुए विष्णु के समान, पापी पारस के राजा का सिर राहु के समान काट डाला ॥१०८-११०।।

हूणो का विनाश करनेवाले राजा उदयन की कीत्ति दूसरी गंगा के समान, हिमाचल पर विचरण करने लगी ।। १११।।

हिमाचल में, कन्दराओ में भय से अस्त (छिपे हुए) शत्रुवाले राजा की सेना के कोलाहल की केवल प्रतिध्वनि ही सुन पड़ती थी ।। ११२॥

कामरूप (असाम) देश का राजा, विना छत्र के सिर से उसे (उदयन को) प्रणाम करता हुआ जो हतप्रभ हो गया, वह आश्चर्य की बात नही ।। ११३।।

उस (कामरूप-नरेश) द्वारा जंगम पर्वतों के समान कर के रूप में दिये गये हाथियों के साथ सम्राट् उदयन दिग्विजय-यात्रा से लौट आया ।। ११४।।

वह वत्मराज इस प्रकार पृथ्वी को जीतकर सेना के साथ पद्मावती के पिता मगध-नरेश के नगर (राजगृह) लौट आया ।। ११५॥

मगध-नरेश, दोनो महारानियों के साथ उसे उपस्थित देखकर इस प्रकार प्रसन्न हुआ, जैसे, निशा में चाँदनी-युक्त चन्द्रमा के होने पर कामदेव प्रसन्न होता है ।। ११६।।

पहले छिपे रूप में और पश्चात् प्रकट रूप में स्थित वासवदत्ता को उसने नन्नता के कारण अधिक रूप में माना ॥११७॥

तदनन्तर नगरवासियो के साथ मगध नरेश द्वारा सत्कार किया गया स्नेहह्वश समस्त जनों से अभिनन्दित, सेना के भार से समस्त पृथ्वी को वश में किये हुए विजयी सम्राट् उदयन, अपने देश गया ।। ११८।।

पञ्चम तरंग समाप्त

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1. देखिए रघु०, सर्ग ४, इलो० २४--
सरितः कुर्वती गाषाः पयश्चाश्यान कर्वमान् ।
यात्राये चोदयामास तं शक्तेः प्रथम शरत् ।। 64

2. विषकन्याएँ वो प्रकार की होती हैं, एक तो ऐसे नक्षत्र या लग्न में उत्पन्न होती हैं कि जिनके सहवास से व्यक्ति तुरन्त मर जाता है। दूसरी, प्रारम्भ से ही विष खिलाकर कृत्रिम विषकन्याएँ बनाई जाती हैं, जिनके सम्पर्क में आते ही पुरुष की मृत्यु हो जाती है।- अनु० 82

१. देखिए परिशिष्ट । २. देखिए परिशिष्ट । ३. देखिए रघु०, सर्ग ४-- असूययेव तनागाः सप्तथैव प्रसुस्तुवुः ।



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