24. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 24 || जब जज के सामने बिहारी जी की पेशी हुई!

जब जज के सामने बिहारी जी की पेशी हुई!

वृंदावन में एक ही गरीब ब्राह्मण रहता था। वह पूरे दिन ठाकुर जी का नाम जपता रहता था। उसके पास जितना भी धन आता, उसी धन से रूखा-सूखा जो मिलता, उसे भगवान की मर्ज़ी समझकर खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहा था। 

गरीब आदमी की जरूरतें कब पूरी होती है। एक बार उसे कुछ पैसों की जरूरत पड़ी तो वह पैसे लेने एक साहुकार के पास जा पहुंचा। 

वह बोला, "साहूकार जी ! मुझे कुछ पैसों की जरूरत आ पड़ी है । कृपा करके उसे दे देंगे तो मैं हर माह थोड़ा-थोड़ा दे कर चुका दूंगा।"

साहुकार ने पैसे देते हुए कहा, "ठीक है, पैसे जल्द ही लौटाने होंगे।" 

"क्यों नहीं साहूकार जी ! हर महीने आपको थोड़े थोड़े पैसे भिजवाता रहूंगा।"

उसकी बात मानकर ब्राह्मण पैसे लेकर घर आ गया। वह ब्राह्मण हर महीने किश्त के हिसाब से साहुकार के पैसे लौटा रहा था। 

आखिरी किश्त के थोड़े दिन से पहले ही साहुकार ने पैसे न लौटाने का कोर्ट का समन पत्र उस ब्राह्मण के घर भिजवा दिया उस समय पत्र में लिखा हुआ था कि उसने जो पैसे साहूकार से उधार लिया था वह समय पर नहीं लौट आया है इसलिए पूरी रकम ब्याज सहित कोर्ट में जज साहब के सामने वापस करे। 

समन पत्र देखकर ब्राह्मण बहुत परेशान हो गया। उसकी भूख प्यास जाती रही। वह सीधा साहूकार के पास गया और उसने साहुकार से अपना दावा वापस लेने के लिए बहुत विनती की। लेकिन साहुकार अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ। 

कोर्ट में जाकर भी ब्राह्मण ने जज से यही बोला, " जज साहब ! मैंने आखिरी किश्त के अलावा साभी किस्त दे दीं हैं। यह साहुकार झुठ बोल रहा है।"

ये सब सुनकर जज साहब ने ब्राह्मण से पूछा, " कोई ग्वाह है जिसके सामने तुमने साहुकार को धन लौटाया हो।"

थोड़ी देर रुक कर और सोच कर ब्राह्मण ने कहा, “वृंदावन के बांके बिहारी ही मेरे पैसे लौटाने के साक्षी हैं। वही मेरी गवाही देंगे।“ 

"क्या तुमने सभी पैसे उनके सामने दिए" जज साहब ने ब्राह्मण से पूछा।

"जी जज साहब ! मैं जब भी किस्त देने जाता था तो पूरा हिसाब बांके बिहारी के सामने रखकर करता था। उनके सिवा और कोई वहां नहीं होता था । बस एक वे ही हैं जो मेरी गवाही दे सकते हैं।"

"ठीक है। उसका नाम व पता लिखवा दो ताकि उसे कोर्ट का समन भिजवाया जा सके।"  

ब्राह्मण ने बताया, “बांके बिहारी वल्द वासुदेव, वृंदावन।“ 

ब्राह्मण के बताए गए पते पर सम्मन जारी कर दिया गया और ब्राह्मण को वही समन बांके बिहारी को देने का काम सौंपा गया। 

ब्राह्मण ने सम्मन को मूर्ति के सामने रखकर कहा, ‘‘बांके बिहारी आपको गवाही देने कचहरी जाना है। मैं जब भी साहूकार को पैसे देने के लिए पैसे लेकर गया तो आपके सामने गिन कर ले कर गया। और साहूकार ने मेरी एक नहीं मानी अब तुम्हें गवाही देने कचहरी जाना होगा।'' 

पेशी का दिन आ गया लेकिन ब्राह्मण की कोर्ट में जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह मंदिर में बिहारी जी के सामने बैठ गया। वह बिहारी जी से केवल प्रार्थना कर रहा था "मेरी लाज रख लीजिए प्रभु । अपने इस भक्त की लाज रख लीजिए प्रभु।"

पेशी की अगली तारीख पर एक बूढ़ा आदमी कोर्ट में ब्राह्मण के साथ पेश हुआ। साहूकार ने देखा कि कोर्ट में ब्राह्मण के साथ बांके बिहारी नाम का एक बूढा भी खड़ा है। 

उस बूढ़े व्यक्ति ने जज साहब को बताया " जज साहब मैं बांके बिहारी हूं। जिसको आपने सम्मन भिजवाया था। जज साहब !"

जज साहब बोलो, "तो उस ब्राह्मण में आपके सामने साहुकार के पैसे लौटाए हैं।"

वह बूढ़ा ब्राह्मण की तरफ़ से गवाही देते हुए बोला, "जज साहब ! जब ब्राह्मण साहुकार के पैसे लौटाता था तब मैं उसके साथ होता था।"

साहूकार उस बूढ़े को नहीं पहचानता था वह जज साहब से बोला, "जज साहब ! यह बूढ़ा झूठ बोल रहा है। इसे मैंने पहले कभी नहीं देखा।"

"अच्छा ! पर मैं तो तुम्हें देखता था ।" उस बूढ़े ने कहा और इसी के साथ उस बूढ़े ने साहूकार की सारी पोल खोल डाली।

उसने यह भी बता दिया कि कब-कब ब्राह्मण ने साहुकार को रकम वापस की थी। उसने कहा, "साहूकार ने जिस खाते में यह रकम दर्ज की है। वह अलमारी के ऊपर रखा है। ब्राह्मण निर्दोष है। मैं उसे अच्छी प्रकार जानता हूं वह बहुत ईमानदार है। उसकी इमानदारी तो देखो वह अभी भी आखिरी किस्त साहूकार को देने के लिए अपने साथ लेकर घूम रहा है।"

जज साहब ने साहूकार के घर सिपाही भेज कर ऊपर रखा हुआ खाता जब्त करवा लिया। जब जज ने सेठ का बहीखाता देखा तो गवाही सच निकली। रकम दर्ज थी और नाम फर्जी डाला गया था।

इस पर जज साहब ने कहा ब्राह्मण बेकसूर है और इनाम के रूप में अंतिम किस्त ब्राह्मण को दी जाती है और इस साहूकार को 6 महीने की जेल की सजा दी जाती है"

इस प्रकार जज साहब ने साहूकार को जेल में डालने का आदेश दे दिया। 

लेकिन ब्राह्मण ने अदालत का आदेश का उल्लंघन करना उचित नहीं समझा और वह अदालत जा पहुंचा जब वह अदालत पहुंचा तो उसने देखा कि सिपाही साहूकार को पकड़ कर ले जा रहे हैं।

ब्राह्मण को देखकर साहूकार उसके पैरों में पड़ गया बोला, "मुझे माफ कर दो । मुझे कैद घर में जाने से बचा लो।"

ब्राह्मण ने सिपाहियों से साहूकार को छोड़ने की विनती की । लेकिन सिपाहियों ने को छोड़ने से मना कर दिया। ब्राह्मण की जिद के सामने सिपाहियों को झुकना पड़ा और वे साहुकार को लेकर पुनः जज के सामने पहुंच गए। 

जज ने ब्राह्मण से कहा कि जब अभी अभी मैंने आपके सामने इस साहूकार को जेल में डालने का आदेश दिया तो आपने साहूकार को छोड़ने के लिए एक बार भी नहीं कहा, परंतु अब इसे छोड़ने के लिए क्यों कह रहे हैं?

ब्राह्मण को जज साहब की बात समझ में नहीं आई "साहब ! मैं तो अभी अभी घर से आ रहा हूं । मैं आपके सामने कैसे आ सकता हूं।" ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा।

जज के मन में उथल-पुथल मच गई और उसने ब्राह्मण से पूछा "वो बूढ़ा आदमी कौंन था। "

"कौन बूढ़ा आदमी ?" जज साहब।

"जो तुम्हारे साथ, मेरे सामने गवाही में खड़ा था। जज साहब ने ब्राह्मण से कहा।

"जज साहब ! मैं आपसे झूठ क्यों बोलूंगा ? मेरी बात का विश्वास कीजिए । मैं सीधा घर से ही आ रहा हूं और सच में मेरे साथ कोई ब्राह्मण नहीं था।"

"ओह ! मैं समझ गया । मुझे माफ करना, मेरे बांके बिहारी । मेरे कारण तुझे कोर्ट में पेश होना पड़ा।"

ब्राह्मण जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और रोने लगा। "मेरे बिहारी जी मेरे लिए गवाही देने के लिए कोर्ट आए। कोर्ट में मुलजिम की तरह पेश हुए । धिक्कार है मेरे जीवन पर । इससे तो अच्छा में ही जेल चला गया होता।"

"मेरे कुछ समझ में नहीं आया । साफ-साफ बताओ बात क्या है।" जज ने ब्राह्मण से कहा।

ब्राह्मण बोला “ जज साहब ! वह कोई और नहीं । वह तो मेरा ठाकुर था। जो भक्त की दुविधा देख ना सका और भरोसे की लाज बचाने आपके सामने मुलजिम की तरह पेश हुआ।“ 

यह सब बातें सुनने के बाद जज समझ गए कि साक्षात श्री बांके बिहारी जी ही कोर्ट में पेश हुए थे। इस घटना के बाद जज साहब हक्का-बक्का रह गए। 

"हे भगवान ! मेरे सामने आप साक्षात रुप में आए और मुलजिम की तरह कटघरे में खड़े हुए। मैं राजा की तरह आपके सामने अपने सिंहासन पर बैठा रहा। मुझसे बड़ा पापी और कौन हो सकता है।"

इस घटना के बाद उन जज साहब ने उसने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और यहां तक कि उसने अपना घर-परिवार तक छोड़ दिया और फकीर बन गया। 

इतना सुनने के बाद जज, ब्राह्मण के चरणों में लेट गए । इसके बाद जज साहब ने अपना घरबार और सारा काम-धंधा छोड़ दिया और ठाकुर को ढूंढने के लिए निकल गए और फकीर बन गए। 

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बहुत समय बीत गया लेकिन जज साहब का कहीं पता नहीं चला। 

लोगों का कहना है कि इस घटना के बहुत सालों बाद लोगों ने वृंदावन में एक विक्षिप्त से व्यक्ति को घूमते हुए देखा। वह किसी से कुछ नहीं मांगता था परंतु जब कभी किसी भंडारे में जाता तो वहां के पत्तलों की जूठन उठाता। उसमें से आधा जूठन ठाकुर जी को अर्पित करता और आधा खुद खाता। उसे ऐसा करते देखकर लोग उसे मारने पीटने लगते । 

बार-बार पिटाई खाने के बावजूद वह नहीं सुधरा । जूठन बटोर कर खाता और भगवान को खिलाता रहता। 

उससे परेशान होकर लोगों ने भंडारे में अपनी पत्तलों में जूठन छोड़ना बंद कर दिया ताकि यह पागल ठाकुर जी को जूठन का भोग न लगा सके। 

हर दिन की तरह उसने आज भी सभी पत्तलों को पोंछ-पोंछकर भोजन इकट्ठा किया पर यह क्या आज तो केवल एक निवाला इकट्ठा हुआ और उसने भूख से व्याकुल होकर उसके लेने वाले को अपने मुख में डाल लिया। 

पेट की आग के आगे आज पहली बार वह ठाकुर को खिलाना तो भूल ही गया। लेकिन जैसे ही उसे इस बात का ख्याल आया कि उसने बिना भोग लगाए ही वो निवाला मुख में रखा है, तो उसने वो निवाला गले के अंदर ही रोक लिया। अगर पहले मैं खा लूंगा तो ठाकुर का अपमान हो जाएगा और अगर थूका तो अन्न का अपमान होगा। अब वो निवाला मुंह में लेकर ठाकुर जी के चरणों का ध्यान लगा कर बैठ गया।

तभी अचानक से एक सुंदर से बालक के रुप में एक बाल-गोपाल पागल व्यक्ति के पास आया और बोला, "क्यों मेरे प्यारे  ! आज मेरा भोजन कहां है।" 

यह सुनकर जज की आंखें आंसुओं से भर आई और वो मन ही मन बोल रहे थे, "ठाकुर जी बड़ी गलती हो गई, मुझे माफ़ करें।"

ठाकुर जी भी मुस्कराते हुए बोले, "आज तक तो तूने मुझे लोगों का जूठा खिलाया है मेरे प्यारे । आज अपना ही जूठा खिला दें।" 

पागल की आंखों से अश्रु रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। रोते-रोते वो बाल-गोपाल के चरणों में गिर पड़ा और फिर कभी नहीं उठा । उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए।

जानते हो यह पागल कौन था। यह पागल बाबा, लीलानंद ठाकुर नाम का जज थे। जब जज को पता लगा कि उसके सामने साक्षात श्री बांके बिहारी कोर्ट में पेश हुए थे। तब वो सब कुछ छोड़ बांके बिहारी को ढूंढने लगा। इस बात ने उसे पागल सा कर दिया था। उन्होंने बिहारी जी के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया।

आज भी उन जज को समर्पित पागल बाबा नाम का विशाल मंदिर वृन्दावन में स्थित है। लेकिन यह चमत्कारिक मंदिर है। कहा जाता है कि यहां से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता। यहां भक्तोंं की सभी मनोकामनाएं पागल बाबा और बांके बिहारी ज़रूर सुनते हैं। 

लेखक


ॐ जितेंद्र सिंह तोमर

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