03. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 03 || कालू बेटा (एक कहानी)

 03. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 03 || कालू बेटा (एक कहानी)


✍️लॉकडौउन में कुछ लोग पिछले कई दिनों से इस जगह पर खाना बाँट रहे थे।

 हैरानी की बात ये थी कि एक कुत्ता हर रोज आता था और किसी न किसी के हाथ से खाने का पैकेट छीनकर ले जाता था।

 आज उन्होने एक आदमी की स्पेशल ड्यूटी भी लगाई थी कि खाने को लेने के चक्कर में कुत्ता किसी आदमी को न काट ले।

लगभग ग्यारह बजे का समय हो चुका था और भोजन वितरण शुरू हो चुका था। तभी वह कुत्ता तेजी से आया और एक आदमी के हाथ से खाने की थैली छीनकर भाग गया।

ड्यूटी वाला लड़का डंडा लेकर, उस कुत्ते के पीछे भागा। कुत्ता भागता हुआ, थोड़ी दूर स्थित एक झोंपड़ी में घुस गया।

वह लड़का भी उसका पीछा करता हुआ झोंपड़ी तक पहुंच गया। कुत्ता खाने की वह थैली झोंपड़ी में रख उसके पास बैठा था।

उस लड़के ने झोंपड़ी में देखा कि गंदे से कपड़े पहने एक बड़ी सी दाढ़ी वाला आदमी अंदर लेटा हुआ था। उसने उस लड़के को देखा तो उठने की कोशिश की। जब वह उठ कर बैठा तो लड़के ने देखा कि उसके एक पैर भी नहीं है, वह लंगड़ा है। 

"ओ भैया! ये कुत्ता तुम्हारा है क्या?" लड़के ने उस व्यक्ति से पूछा।

"हाँ सर जी ! यह कुत्ता नहीं है। यह कालू है मेरा बेटा। इसे कुत्ता मत कहो भाई।" वह व्यक्ति बोला।

"अरे भाई ! ये हर रोज खाना छीनकर भाग आता है। किसी को काट लिया तो, lockdown में डॉक्टर कहाँ मिलेगा .... इसे बांध के रखा करो।" लड़के ने कहा।

गरीब बोला, " मैं इसे मना नहीं कर सकूँगा। यह एक बिना झोली वाला भिखारी है। यह मेरी भाषा भले ही न समझता हो लेकिन मेरी भूख को समझता है।" 

और वह जोर-जोर से रो पड़ा। वह बोला, "यह पिछले साल की बात है। जब मुझे कोरोना हुआ था, तो मेरे घर के सभी लोगों ने एक-एक कर आंखें फेर ली थी। एक मात्र यही बेजुबान जानवर था, जो मेरे इंतजार में हॉस्पिटल के बाहर 14 दिन तक बिना कुछ खाए पिए मेरे इंतजार में पड़ा रहा था।"

वह पुनः बोला, "सर कुछ समय तक, मेरा भी भरा पूरा परिवार था। जिसे मैं अब छोड़ चुका हूं । उनसे मेरा मन भर चुका है परंतु इससे नाता नहीं तोड़ सकता।"

"जब मैं घर छोड़ कर आया था, तब से ही मेरे साथ है। मैं अब तो यह भी नहीं कह सकता कि मैंने उसे पाला है। एक्सीडेंट के बाद से तो इसने ही मुझे पाला है। मेरे तो बेटे से भी बढ़कर है।" वह व्यक्ति कुछ देर रुका और फिर से बोला।

"जबसे इन गरीबों ने मेरी सहायता की है तब से, इन गरीबों के बीच रहकर, मैं उनके दुख-दर्द को दूर करने का प्रयास करता हूं और इसी रेड लाइट पर पैन बेचकर अपना गुजारा करता हूँ ...... पर आजकल सब बंद है।"

वह लड़का एकदम मौन हो गया। उसे यह संबंध समझ ही नहीं आ रहा था। इतने में उस आदमी ने खाने का पैकेट खोला और आवाज लगाई, "कालू ! ओ बेटा कालू ..... आ जा खाना खा ले।"

कुत्ता दौड़ता हुआ आया और उस आदमी का मुँह चाटने लगा। अभी तक उसने खाने को सूंघा भी नहीं। उस आदमी ने खाने की थैली खोली और पहले कालू को खाना दिया फिर अपने लिए खाना रख लिया।

"खाओ बेटा !" उस आदमी ने कुत्ते से कहा मगर कुत्ता एकटक उस आदमी को ही देखता रहा।

जब उस व्यक्ति ने खाना शुरू किया, तो ही उसे खाते देख कालू ने भी खाना शुरू किया और दोनों खाने में व्यस्त हो गए।

उस लड़के के हाथ से डंडा छूटकर नीचे गिर पड़ा। जब तक दोनों ने खा नहीं लिया वह अपलक उन्हें देखता रहा। किसी जानवर और इंसान का ऐसा प्यार उस लड़के ने अभी तक नहीं देखा था। जब दोनों ने खाना खा लिया तो उस लड़के ने कहा, "भैया जी ! आप न तो गरीब हैं और न ही मजबूर। मगर आपके जैसा बेटा किसी के पास नहीं होगा।" 

कहते कहते उसने जेब से कुछ रुपए निकाले और उस व्यक्ति के हाथ पर रख दिये। 

वह एक बार फिर से रो पड़ा उसने अपने आंसू पोंछे और उस लड़के से कहा, " बेटा ! वैसे तो मेरी पेंशन आती है । हम अच्छी जगह रह सकते हैं परंतु जबसे इन गरीबों ने मेरी सहायता की है तब से इन्हें छोड़ने का मन ही नहीं करता।"  

उस व्यक्ति ने पैसे लेने से इनकर कर दिया और बोला, "रहने दो भाई ! किसी और को शायद इनकी ज्यादा जरूरत होगी। मुझे तो मेरा सपूत कालू ला ही देता है। मेरे बेटे के रहते मुझे भोजन की कोई चिंता नहीं। पर बेटा यह बात किसी को मत बताना अपने तक ही रखना। वरना मेरे घरवाले मुझे यहां से ले जाएंगे।"

"ठीक है, अंकल जी ! यह कहानी मुझ तक ही सीमित रहेगी।"

वह लड़का हैरान था कि आज आदमी, आदमी से छीनने को आतुर है और ये कुत्ता...बिना अपने मालिक के खाये.... खाना भी नहीं खाता है।

तब उस लड़के ने बड़े प्यार से कालु के सिर पर हाथ फेरा ओर बोला, "कल से खाना लेने आ जाना कालू , हम तुझे एक नहीं दो पैकेट देंगे। ठीक है और हाँ, किसी से छीनना नही, सीधा हमसे लेना।"

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
12/2/17/5/2021


 🙏 💐राधे राधे, जय श्री कृष्णा 💐🙏

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