07. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 07 || अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?

07. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 07 || अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?

(मेरे एक मित्र ने यह कहानी सुनाई तो उसे लिखे बिना नहीं रह सका। शायद आपको भी पसंद आए।)

एक पाँच छ: साल का मासूम व बहुत ही प्यारा सा बच्चा, तीन साल की अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था। 

छोटी बहन इस सबसे बेफिक्र मंदिर में आने-जाने वालों को देख रही थी।

बच्चों के कपड़े धुले हुए और साफ थे शायद साबुन ने मिलने के कारण उन कपड़े में मैल लगा हुआ था, मगर फिर भी साफ दिखाई दे रहे थे।

बच्चे की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे जिनसे उसके नन्हे नन्हे गाल आँसूओं से बार बार भीग रहे थे। पास में बैठी बहन आपने नन्हें हाथों से उसके आंसू बार-बार पौछ देती थी।

बहुत से लोग उनकी तरफ आकर्षित हुए परंतु वह बच्चा उनसे बिल्कुल अनजान हो अपने भगवान से बातें करने में लगा हुआ था। इस वक्त केवल वे दो थे, उनके मध्य कोई भी नहीं था।

मैं उस बच्चे की भगवान में तल्लीनता को देखकर वहीं रुक गया। जैसे ही वह उठा तो मैंने उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा,
"क्या क्या मांगा भगवान से?"

उसने कहा, "मेरे पापा मर गए हैं। उनके लिए स्वर्ग।" मैं सन्न रह गया।

"मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र।" मेरा दिल मुंह को आ गया।

"मेरी बहन माँ से चीजें और कपडे मांगती है उसके लिए पैसे".. .....

जैसे तैसे मैंने अपने आपको संभाला। और उस बच्चे से पुनः पूछा, "तुम स्कूल जाते हो..?"

"हां, जाता हूं।", उसने कहा।

"किस कक्षा में पढ़ते हो ?" मैंने पूछा

"नहीं अंकल ! मैं पढ़ने नहीं जाता।" इस अजीब से प्रश्न ने मुझे एक बार फिर से चौंका दिया।

"तो स्कूल क्या करने जाते हो?"

"मां चने बना देती है। उन्हें स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ।"

मैं एकदम आवाक सा खड़ा रह गया वह पुनः बोला, 
"बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, उन्हें भी बहुत अच्छे लगते हैं अगर कभी स्कूल में आप मिलेंगे तो एक पुड़िया में आपको भी दूंगा। आप भी खरीदोगे ना। हमारा यही काम है ।

"हां हां क्यों नहीं बेटा।"

बच्चे का एक एक शब्द मेरे जहन में उतरता जा रहा था।

न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा। "तुम्हारा कोई रिश्तेदार ............" 

अभी वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि बच्चे ने पहले से पहले ही जवाब दे दिया।

"पता नहीं, माँ कहती है। गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता। मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलती।" 

वह एक क्षण के लिए रुका और फिर से बोला, " पर अंकल, मुझे लगता है । मेरी माँ कभी कभी मुझसे झूठ बोलती है।"

"तुमने कैसे जाना?" 

मैंने उससे पूछा तो उसने बहुत ही शानदार जवाब दिया, "जब हम खाना खाते हैं तो वह हमें देखती रहती है और जब मैं उनसे कहता हूँ । माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैने खा लिया था। उस समय लगता है, मेरी मां झूठ भी बोलती है।"

"बेटा ! अगर तुम्हारे घर का खर्च तुम्हें मिलने लग जाय तो क्या तुम पढाई करोगे ?" मैंने पूछा।

"बिल्कुलु नहीं"

"क्यों"

"पढ़ाई करने वाले, गरीबों से नफरत करते हैं अंकल, हमें किसी पढ़े हुए ने कभी कुछ नहीं पूछा। बस वे हमें देख कर पास से गुजर जाते हैं।"

मैं हैरान भी था और शर्मिंदा भी ।

उसने फिर से कहा, " मैं हर दिन इसी इस मंदिर में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा। यहाँ सब आने वाले मेरे पिताजी को जानते हैं। मगर 
उनके मर जाने के बाद हमें कोई नहीं जानता।"

अब उसके सब्र का बांध टूट गया और वह जोर-जोर से रोने लगा। उसी रोता देख बहन भी रोने लगी।

बच्चे ने रोते रोते एक बार फिर से पूछा, "अंकल ! जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?"

मेरे पास इसका कोई जवाब नही था... 

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
20/3/19/5/2021

ऐसे मासूमों को अपने आसपास ढूंढिये और उनकी मदद किजिए .....

किसी संस्था को दान देने से पहले, अपने आस पास किसी गरीब को ढूंढिए शायद उसको आपकी सहायता की ज्यादा जरुरत हो। इस कहानी को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए शायद किसी ग्रुप में ऐसा देवता मिल जाऐ। जो ऐसे बच्चो के लिए भगवान हो।

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