08. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 08 || ज़रूर.. आप भगवान के दोस्त होंगे।
08. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 08 || ज़रूर.. आप भगवान के दोस्त होंगे।
जून की कठोर तपती दोपहरी में, जब सड़कें अलाव की तरह तप रही थी। उसी दोपहरी में एक बच्चा नंगे पैर फूल बेच रहा था।
लोग मोलभाव कर रहे थे। वह अपने पैरों को गर्मी से बचाने के लिए कभी एक पैर के ऊपर रखता तो कभी दूसरे पैर के ऊपर।
एक सज्जन ने उसके पैर देखे; उसे यह देख कर बहुत दु:ख हुआ। वह सज्जन पास ही की दुकान पर गया और उस बच्चे के लिए दुकान से जूते लेकर आया।
मोलभाव की मेहनत बेकार गई । उसका ग्राहक बिना कुछ खरीदे ही चला गया । बच्चा निराश हुआ और वहां खड़े रेड लाइट के खंभे की छाया में ठंडी हुई जमीन पर अपने पैरों को रखकर सुकून महसूस करने लगा।
उस सज्जन ने उस बच्चे को बुलाया और कहा, बेटा तुम्हारे पास जूते नहीं है।
वह हंसा और बोला, "जूते तो क्या ? बाबूजी ! हमारे पास चप्पल भी नहीं है।"
अगर मैं तुम्हें जो दे दूं तो उन्हें पहनोगे
"क्या ?" कहते हुए उसका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।
तभी उस सज्जन ने उससे कहा "बेटा ! यह लो इन जूतों को पहन ले।"
लड़के ने फटाफट जूते पहने, वह बड़ा खुश हुआ और उस आदमी का हाथ पकड़कर कहने लगा, "अंकल, अंकल ! आप भगवान हो।"
वह सज्जन घबराकर बोला, "नहीं..नहीं. बेटा ! मैं भगवान नहीं।"
लड़का फिर से बोला, "ज़रूर.. आप भगवान के दोस्त होंगे।"
"वह कैसे?" उस सज्जन ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसको निहारा।
"क्योंकि मैं आज सुबह अपनी छोटी बहन के साथ मंदिर गया था तो भगवान से प्रार्थना की थी कि भगवानजी, मेरे पैर बहुत जलते हैं। मुझे जूते लेकर के दो न । और देखो उन्होंने आपके द्वारा जूते भिजवा दिए।"
"तो हुए ना आप भगवान के दोस्त।"
उस सज्जन ने अपनी जेब से ₹2000 का नोट निकाला और उस बच्चे के हाथ में दिया और कहा, 'अब तुम्हारी ड्यूटी समाप्त हुई । घर जाकर आराम करो।"
बच्चे की आंखों में चमक आ गई। इससे पहले कि वह बच्चा कुछ और बोलता है । उस सज्जन ने उसके मुंह पर अपनी उंगली रख दी । बच्चा आश्चर्य के साथ उस अंकल को देखता रहा।
वह सज्जन आंखों में खुशी लिये, मुस्कुराता हुआ चला गया, पर वह जान गया था कि भगवान का दोस्त बनना ज्यादा मुश्किल नहीं है।
शायद वह सज्जन समझ गया है कि कुदरत ने कमाई के लिए दो नियम बनाए हैं –
1) देकर जाओ या
2) छोड़कर जाओ।
साथ लेकर के जाने की कोई व्यवस्था नहीं है क्योंकि कफन में जेब नहीं होती।

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