11. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 11 || मामा सब्जी वाला (एक संस्मरण)

11. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 11 || मामा सब्जी वाला (एक संस्मरण)


दिल्ली एक ऐसा शहर है जिसमें किसी हर रोज एक या दो घटना किसी भी व्यक्ति के साथ घटित हो जाना आम बात है कुछ लोग उन घटनाओं पर ध्यान देते हैं कुछ उन्हें यूं ही हंसी में टाल देते हैं वैसे एक घटना हमारे पड़ोस में घटी आइए उसी घटना का आपसे जिक्र करते हैं।

                       { *स्नेह के आँसू* }
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गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 

"दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने मुझसे सब्जी नहीं खरीदी, क्या कोई और देकर जा रहा है?" सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 

*"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"*

 उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - "भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"

"कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" सब्जीवाले ने कहा। 

"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी  तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं। जब सब  ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  भैया विश्वास करो, मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती । तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  उन्हें अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 

" दीदी जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से  तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए हैं। अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? दीदी, रुके रहो दो मिनिट।" 

और सब्जी वाले ने  एक थैली के अंदर टमाटर , आलू, प्याज, लौकी, कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 

"भैया ! तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो, कम से कम तोल तो लेते, और मुझे पैसे भी बता दो। मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 

जब देर हो गई तो उस महिला का पति सब्जी वाले को डांटने के लिए गुस्से में नीचे उतरकर आया । वह सब्जी वाले को डांटने हीं वाला था कि उनकी बातचीत सुनकर दरवाजे के अंदर ही रुक गया।

"वाह दीदी.... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और दीदी ! मैं  कोई उपकार भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब  तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसम्बी । बच्चों का खूब ख्याल  रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... *घंटी तो मैं बजाऊँगा, जरूर बजाऊँगा*।" और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 

अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह स्नेह के आंसुओं से भरी हुईं थीं। 

सब्जी वाला आगे बढ़ गया। उसका पति दवे कदमों से वापस कमरे में जाकर लेट गया। और हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि जल्द ही उसे कोई नौकरी दिलवा दे ताकि सब्जी वाले जैसे नेक व्यक्ति को भी घाटा न हो।

लगातार छह महीने तक वह लगातार सब्जी देने आता रहा अचानक से उसका आना जाना बंद हो गया।

फिर वह कभी नहीं आया।

लोगों ने दोस्तों से लोगों ने उसके दोस्तों से पूछा मामा सब्जीवाला कहां है। कोरोना काल मे वह मामा सब्जी वाले के नाम से मशहूर हो गया था।

तो उसके दोस्तों ने बताया कि एक दिन वह बीमार पड़ा । डॉक्टरों ने उसे कोरोना पॉजिटिव घोषित कर दिया। वह हॉस्पिटल गया वहां से लौटकर ही नहीं आया। और हम में से कोई भी उसका पता नहीं जानता।



लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
21/7/21/3/2021

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