12. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 12 || माँ के प्रेम की पराकाष्ठा (एक कहानी)

12. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 12 ||  माँ के प्रेम की पराकाष्ठा (एक कहानी)


नदी में बह रहे अपने बच्चे को बचाने का प्रयास करती हुई एक बंदरिया को देखा था। दिल को बड़ा सुकून मिला था कि एक मां अपने बच्चे के लिए क्या कुछ नहीं करते कभी ऐसी घटना आंखों के सामने देखने को मिलेगी, यह सोचा भी नहीं था परंतु ऐसा ही हुआ।

लॉकडाउन में work-from-home होने के कारण मुझे अपने गांव जाने का मौका मिला। गांव में बहुत कुछ बदल गया है, उसमें अब कच्चे घास फूस के मकानों के बीच कुछ पक्के मकान भी देखाई देने लगे हैं। जो लोग शहरों की तरफ पलायन कर गए उन्होंने तो अपने घर पक्के बना लिया लेकिन जिन लोगों ने गांव को ही अपना सबकुछ मान लिया है । गांव में रहने वाले उन लोगों के मकान आज भी कच्चे और घास फूस के बने हैं।

शहर के मुकाबले गांव का वातावरण बिल्कुल शांत और स्वच्छ था। लेकिन शहर की चमक दमक ने यहां के लोगों को भी नहीं छोड़ा है।

गांव में एक बारात आई हुई थी। जिसमें आतिशबाजी चल रही थी और हवा भी गांव की ओर बह रही थी। न जाने कब उन पटाखे में से निकाली एक चिंगारी गांव की एक झोपड़ी पर जा पड़ी। सभी लोग बारात देखने में तल्लीन थे।

घास फूस ने एकदम से आग पकड़ ली। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। गांव के सभी लोग, बच्चे, स्त्रियां, बूढ़े पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने का प्रयास करने लगे। लेकिन अथक प्रयास करने के बावजूद आग स्वयं ही बुझी। झोपड़ी के अंदर रखा हुआ सारा सामान जलकर स्वाहा हो गया। 

आग शांत होने के बाद लोग उस झोपड़ी में घुसे जिससे आकाश साफ दिखाई दे रहा था। झोपड़ी का मालिक और मालकिन तथा बच्चे हाथों से एक तरफ बैठे हुए थे।

तभी मालिक की दृष्टि झोपड़ी की दीवार में वेंटीलेशन के लिए बनाए गए एक गोल घेरा पर गई तो " हे भगवान ! " कहता हुआ उस झोपड़ी का मालिक सिर पकड़ कर बैठ गया।"

तभी मेरी दृष्टि भी झोपड़ी की दीवार में वेंटीलेशन के लिए बनाए गए एक गोल घेरा मैं कुछ जला हुआ दिखाई दिया। जब मैं उसके और पास गया तो देखा वह एक जला हुआ पक्षी था। 

वह जलने से हुए अपने सारे नुकसान को भूल गया। और उसका ह्रदय दुख और खिलाने से भर गया। मैंने सांत्वना देने के लिए उसके कंधे पर हाथ रख दिया। 

वह बोला " भाई ! मैंने इस पक्षी को कितनी बार यहां से भगाने का प्रयास किया लेकिन यह नहीं भागा। मुझे क्या पता था कि यहां इसके मृत्यु लिखी है इसलिए यह नहीं जा रहा है।"

एक पक्षी के लिए इतना प्रेम मैंने शहर में तो नहीं देखा था। शहर में पक्षी दिखाई ही कहां देते हैं?

चलो भाई अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा परंतु जैसे तैसे करके इस पक्षी का अंतिम संस्कार अवश्य करूंगा क्योंकि इसकी मृत्यु मेरे घर में अर्थात मेरी शरण में हुई है।

जल कर मरे हुए पक्षी को देखकर लगा कि यदि पक्षी चाहता तो मैं उड़ सकता था। उस पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में अकेले भुनने को तैयार हो गया था।

"भाई ! जब यह पक्षी उड़ सकता था तो उड़ा क्यों नहीं?" मेरे प्रश्न सबको चौंका दिया। अब सबकी निगाह उस वेंटिलेटर की तरफ थी।

सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।

एक व्यक्ति ने भुनकर अकड़ गए उस पक्षी को हटाया तो वहां का दृश्य देखकर सभी लोग दंग रह गए। 

उस पक्षी के हटते ही उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए जो रोशनी देखते ही चहचहाने लगे। पक्षी तो कर मृत्यु को प्राप्त हो गया परंतु उसके बच्चे सकुशल थे और चहचहा रहे थे।

उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने उन्हें अपने नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।

अचानक मेरे मुंह से निकल गया "देखो तो इस  पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"

झोपड़ी के मालिक ने कहा, " नहीं, यह मोह नहीं है, भाई ! अपितु यह तो माँ के प्रेम की पराकाष्ठा है। मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता। इसी कारण प्रेम और मोह में जमीन आसामान का फर्क है। मोह में स्वार्थ निहित होता है और प्रेम में त्याग होता है।

"आपने सही कहा मेरे भाई, भगवान ने माँ को प्रेम की मूर्ति बनाया है और इस दुनिया में माँ के प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। माँ के उपकारो से हम कभी भी उपकृत नहीं हो सकते।" 

कल ही की तो बात है जब मैं नदी के किनारे गया था और वहां पर एक मृत पड़ केकड़े को देखा तो मैंने उसे डंडे से छेड़ दिया । तो पाया कि उस मृत केकड़े में से सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे केकड़े निकल कर नदी की तरफ जाने लगे कितना अद्भुत दृश्य था वह। जब मैंने घर आकर इसकी चर्चा की तो मुझे बताया गया कि जोड़ा बनाने के बाद, मादा शरीर के अंदर बने अंडे मादा केकड़े के शरीर से बाहर नहीं आते। जब अंडों से मादा शरीर भर जाता है तो वह मर जाती है। अंडे पकने पर छोटे बच्चे निकलते हैं तो वह मादा शरीर को खाकर कुछ बड़े होते हैं। 

इस प्रकार हम कह सकते हैं की एक माता और है जो आपने बच्चों के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देती है।


लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
11/6/10/7/2021


Comments

Popular posts from this blog

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.101. || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा