14. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 14 || अब जैसे मर्जी हो वैसे पत्नी रखो।

 14. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 14 || अब जैसे मर्जी हो वैसे पत्नी रखो।


मेरे दोस्त ने जयपुर में अपने पड़ोस में घटी एक घटना को मुझे बताया । तो इस कहानी को लिखने के लिए मेरी उत्सुकता इतनी बढ़ गई कि मैं उसे शब्दों में बयान भी नहीं सकता।  जितनी उत्सुकता मुझे इस घटना को लिखने में है शायद उतनी ही उत्सुकता आपको इस घटना को पढ़ने में जाग जाएगी।

कहते हैं कि एक बाप अपनी कितनी भी संताने हो उन्हें पाल लेता है और उनकी सारी संताने मिलकर एक बाप को नहीं पाल पाती । यह घटना उसी से संबंधित है।

इसे हम क्या कहें ? समझ नहीं आता। इसे हम आजकल की नालायक व संस्कारहीन संतान कहें या केवल अवसरवादी संतान जो केवल अपने माता-पिता के लाभ लेकर, बाद में उन्हें दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल कर बाहर कर देते हैं।

हुआ यह था कि मेरे दोस्त के पड़ोस में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे। जिनमें बुजुर्ग का नाम राम तथा उनकी पत्नी का नाम रमा था। राम के उनके दो पुत्र थे और दोनों के एक एक पुत्र यानी उन दंपत्ति को दो बेटे और दो पोते भी थे। 

उन्होंने अपनी मेहनत और पूरी उम्र की कमाई से एक मकान बनाया था, जिसकी कीमत करीब ₹3 करोड़ थी। अब तक सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठाक चल रहा था। 

पोते हर वक्त दादा-दादा, दादी-दादी कहकर उन दंपतियों के चारों ओर घूमा करते थे। जब कभी मैं उनके घर जाता तो वह परिवार मुझे सबसे आनंदमय परिवार लगता था।

एक दिन अचानक से उन बुजुर्ग की पत्नी रमा बीमार पड़ी और फिर वह कभी उठी ही नहीं । इससे वह बुजुर्ग टूट गए। 

कहते हैं कि जब बुरा वक्त आता है तो किसी को बताकर नहीं आता। उन्हें न तो समय पर धुले कपड़े मिलते और न ही समय पर भोजन।

खाना बनाना तो दूर की बात, रमा के रहते हुए अभी तक राम ने घर के किसी भी काम को हाथ नहीं लगाया था । रमा ने उन्हें कोई काम करने ही नहीं दिया। और अब उन्हें इस बात का अहसास होने लगा कि बिना पत्नी के जीवन कितना दूभर हो जाता है।

दो दो बच्चों के होते हुए भी उन्हें परेशानी उठानी पड़ रही है। राम समझ रहा था कि परेशानी उसे ही हो रही है लेकिन यहां तो बात बिल्कुल ही उल्टी थी। वह बात है रामा के जाने के बाद कुछ ही दिनों में सामने आ गई।

एक दिन दोनों भाइयों ने सलाह की और पिताजी से कहा, " पापा ! आप गैरेज में शिफ्ट हो जाओ" 

"क्यों ?" की प्रश्नवाचक दृष्टि में राम ने अपने दोनों पुत्रों की ओर देखा।

पहले तो दोनों सकपका गए फिर बड़ा भाई बोला, "क्योंकि आपकी वजह से आपकी बहूओं को परेशानी होती है।"

राम ने बड़े गौर से दोनों बेटों को देखा जिनके बीच में उनकी पत्नियां खड़ी थी।

"माताजी के गुजरने के बाद घर के सारे काम इन्हें ही करने पड़ते हैं, और आपके सामने साड़ी पहन कर कार्य करने में इन्हें परेशानी होती है।" राम की आंखों में आंसू आ गए परंतु वह शांत रहा।

राम बिना कोई बात किये चुपचाप गैरेज में शिफ्ट हो गया। राम के गैरेज में शिफ्ट होते ही, राम की अनदेखी शुरू हो गई। राम की अनदेखी की हदें पार हो गई, परंतु अब भी वह कुछ नहीं बोला। 

करीब पन्द्रह दिन बाद राम ने दोनों बेटों और दोनों बहुओं  को अपने पास बुलाया और उनके पूरे परिवार के लिए दस दिन का विदेश ट्रिप का पास देते कहा,  " बेटा ! जब से रमा गई है तुम कहीं भी घूमने नहीं गए, जाओ बेटा सभी को घुमा लाओ। सभी का मन हल्का हो जाएगा। मेरे पास यह विदेश ट्रिप के पास आए हैं। लेकिन अब मेरे घूमने की उम्र नहीं है। तुम्हारी मां होती तो मैं एक बार सोच लेता। लेकिन आप दोनों बाहर घूमने के लिए जा सकते हैं।"

"पर दादू, आप तो अकेले रह जाएंगे।" पोते ने कहा।

"हां बेटा ! जब से तुम्हारी दादी गई हैं तब से मैं अकेला ही तो रह गया हूं। अब भी घर पर अकेला ही रह जाऊंगा। आप बाहर घूम कर आओ।" राम ने पोते को समझाते हुए कहा।

बड़ी बहू बोली, "पिताजी ! जो राशन फ्रीज और रसोई में पड़ा है । वह तो खराब हो जाएगा।" 

"कैसे खराब हो जाएगा । यदि मुझ पर विश्वास हो तो चाबियां मुझे दे दो। मैं 10 दिन उसी में गुजारा कर लूंगा।" राम ने उत्तर दिया।

"ठीक है पिताजी ! अगर किसी चीज की जरूरत पड़े तो बाजार से खरीद लाना"

पुत्रों के विदेश जाने के बाद राम ने अपना तीन करोड़ का मकान तुरंत दो करोड़ में बेच दिया। उसी पैसे में से उसने अपने लिए एक अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया। तथा बेटों का सारा सामान किराये के फ्लैटों में शिफ्ट करवा दिया। 

जब बेटे घूम कर वापस आए तो घर के द्वार पर एक दरबान बैठा था। एक बार तो उन्हें लगा कि वह गलत जगह आ गए हैं। फिर उन्होंने उससे पूछा, " काका, जो बूढा यहां रहता था वह कहां है?"

" बूढ़ा ...…..! "उसने लंबा खींचते हुए बोला ।

"हां बूढा ! अबे कहां मिलेगा ?"

"साब जी ! उन्होनें तो यह मकान बेच दिया। और अपने बच्चों का सामान दूसरी जगह शिफ्ट करा दिया। "

यह सुनते ही बेटों और बहुओं के पैरों के तले से जमीन ही खिसक गई। दोनों बेटों ने एकदम फोन निकाला और दोनों ही पिता को फोन करने लगे। तो वह बन्द आ रहा था। 

दरबान उनके चेहरे के भावों को देख रहा था फिर वह उनसे बोला, " बोला, क्या पुराने मालिक को फोन कर रहे हो?"

"हां, काका!'
 
वह बोला, "भाई ! उन्होंने अपना नंबर बदल लिया है और नंबर देने को मना किया है परंतु आपके आने पर आपसे बात कराने की बोल कर गये थे।" 

दरबान ने अपने फोन से नंबर लगा कर बड़े बेटे की राम से बात कराई। 

फोन पर राम ने उन्हें वहीं रुकने के लिए कहा। थोड़ी देर में वहां एक कार आकर रुकी। उसमें से राम नीचे उतरे, उन्होंने अपने दोनों बेटों के हाथ में किराए वाले फ्लैट का पता और चाबियां थमा दी।

राम ने किराये वाले फ्लैट की चाबी देते हुए कहा, " यह रही तुम्हारे फ्लैटों की चाबियां, और हां उन फ्लैटों का एक साल का किराया तो मैंने दे दिया है। और हांँ, अब तुम दोनों अपनी पत्नियों को जैसी मर्जी हो वैसे ही रखना। अब मेरी वजह से किसी को कोई परेशानी नहीं होगी?"

यह कह कर राम अपनी कार में बैठे और वहां से चले गए। पूरा का पूरा परिवार एक टक राम को गाड़ी से जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई। पोतों की समझ में कुछ नहीं आया कि उनके दादा अचानक आए और अचानक क्यों चले गए?

राम के एक पोते ने पूछा, " पापा ! दादा जी आए थे और चले गए उन्होंने हमसे बात क्यों नहीं की?

परंतु पापा के मुख से एक भी जवाब नहीं निकला।

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
11/3/12/7/2021

यह कहानी दिल्ली में घटित एक सत्य घटना है। जिसमें एक बुजुर्ग ने अपने नालायक बच्चों को कैसे सबक सिखाया। अब समय आ गया है जब बुजुर्गों को उनसे साफ कह देना चाहिए, " हम तुम्हारे साथ नहीं रह रहे हैं। तुम्हें हमारे साथ रहना है तो रहो। अन्यथा अपना ठिकाना ढूंढ लो।"


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