15. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 15 || इच्छा हो तो लकड़ी लगा देना (एक कहानी)

15. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 15 || इच्छा हो तो लकड़ी लगा देना (एक कहानी)

यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है जो दिल्ली के पटपड़गंज के वैस्ट विनोद नगर क्षेत्र में घटित हुई। इस कहानी के पात्रों के नाम काल्पनिक है।

यह कहानी दिल्ली के वेस्ट विनोद नगर में घटित एक सत्य घटना है। जिसमें एक बुजुर्ग ने अपने नालायक बच्चों को कैसे सबक सिखाया।

आज मेरे एक दोस्त का जयपुर से फोन आया तो उसने अपने पड़ोस में घटित एक दुखद घटना का वर्णन किया।

तो मुझे भी कुछ वर्ष पूर्व घटित एक घटना याद आ गई जो एक बुजुर्ग ने पार्क में सुनाई थी। उन बुजुर्ग की आपबीती ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था। आइए बताते हैं कि वह घटना क्या थी?

भारत में घूमना जहां स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है वही मानसिक व आध्यात्मिक ताकत भी प्रदान करता है। यहां हमें प्रकृति का सानिध्य ही नहीं, अपने जैसे अनेक दोस्त भी मिलते हैं। ऐसा ही हुआ था राम सिंह के साथ।

वह अपने दोस्तों के साथ बैठा हंसी ठट्ठा कर रहा था कि तभी एक बुजुर्ग ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया।

"क्या हरिया ? तुझसे भी" कहकर रामसिंह झुंझलाया और एकदम शांत हो गया । साथ में बैठे बुजुर्ग लोग भी एकदम शांत हो गए। अचानक आए इस परिवर्तन ने वही पास बैठे मेरा और मेरी पत्नी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

हम दोनों उनकी बात बड़े ध्यान से सुनने लगे। "बुढ़े ! बाल बच्चे कहां हैं?" उसने गढ़वाली भाषा में पूछा था।

(मैं यहां उनके शब्दों की केवल हिंदी दे रहा हूं ताकि कहानी आसानी से समझ आ सके। लेकिन उनकी बातचीत गढ़वाली भाषा में थी।)

"बच्चे ऽऽ ...? वह तो मजे में हैं।" राम सिंह ने जवाब दिया।

हरिया ने फिर प्रश्न किया "और भाभी ?" 

"क्यों चिंता करता है? वह भी मजे में हैं। बड़ा सा टीवी देख रही होगी।" राम सिंह ने हंसकर जवाब दिया।

"बहू और बच्चों के साथ ?" हरिया ने एक और प्रश्न दागा।

अब सभी को उनके बातों में जिज्ञासा होने लगी। उनकी बात सुनने के लिए, मैं उनके कुछ और करीब खिसक गया था।

"हरिया, मेरे दोस्त ! तू , मुझे कबसे जानता है?"

"पिछले 45 सालों से तुमने और मैंने एक साथ ही तो रेलवे ज्वाइन की थी। और दोनों 10 साल पहले रिटायर भी एक ही साथ हुए थे।"

"हरिया ! मुझे एक एक बात अच्छे से याद है। पर लगता है। आज तू नहीं , तेरा गुस्सा बोल रहा है।" कहकर रामसिंह ठहाके लगाकर हँस पड़ा। अभी तक सभी साथी ठहाकों में उसका साथ दे रहे थे परंतु इस ठहाके में किसी अन्य ने उसका साथ नहीं दिया।

"मैंने सुना है तूने ... " 
अभी वह वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था। कि रामसिंह बीच में ही बोल पड़ा, "हां हरिया ! तुमने जो कुछ सुना है, वह सही सुना है।"

"ऐसी क्या नौबत आ गई?"

"तो तुझे कहानी सुननी ही पड़ेगी। चल, मैं सभी के सामने अपनी इस कहानी को बताता हूं शायद किसी और के भी काम आ सके।"

"हरिया ! तुम्हें तो मालूम ही है। कि नौकरी से पहले ही मेरी शादी हो गई थी और मेरे तीन बच्चे थे तीनों लड़के।" हरिया ने हां में सिर हिला दिया।

" तुम तो मेरा व्यवहार जानते हो। क्या मैंने किसी के साथ कोई गलत बर्ताव किया या उनकी पढ़ाई लिखाई में कोई कमी की ? उनकी नौकरी अच्छी जगह लग जाए उसके लिए न जाने कितनी जगह मैंने हाथ जोड़े।"

"हां, मैं जानता हूं क्योंकि मुझे याद है कि बहुत सी जगह तुम मुझे अपने साथ लेकर गए थे । " हरिया ने जवाब दिया। 

उसके बाद पूरी होते ही राम सिंह ने अपनी बात कहनी शुरू की, "जब वे अच्छी जगह सेटल हो गए तो उनकी शादी भी अच्छे घरों में और खूब धूमधाम से की। यह सब तुम्हारे सामने ही हुआ है। जो पैसा रिटायरमेंट में मिला। उससे मैंने मकान खरीद था। तुम ही उसका बयाना देने के लिए मेरे साथ गए थे, यह सब याद है ना।"

हरिया ने हां में सिर हिलाया और राम सिंह ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई। 

एक वर्ष पूर्व तुम्हारी भाभी जी की तबीयत खराब हो गई। उस वक्त मैं कहीं बाहर गया हुआ था अर्थात मैं घर पर नहीं था। जब तीन दिन बाद घर लौटा तो देखा कि वह मरणासन्न हालत में छत पर बने टिन शेड के कमरे में पड़ी हुई थी । किसी ने उनकी कोई शुध नहीं ली।

मैं तुरंत उसे लेकर हॉस्पिटल पहुंचा तो बड़े डॉक्टर ने डांटते हुए कहा, "इनकी हालत इतने दिनों से खराब है । पहले क्यों नहीं लेकर आए। यदि कुछ समय और लग जाता तो यह जिंदा नहीं रहती। बिल्कुल लास्ट समय पर लेकर आए हैं।"

मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मैं गिरने से रोकने के प्रयास के बावजूद अपने आप को गिरने से नहीं रोक पा रहा था, तो बड़े डॉक्टर साहब ने मुझे थाम लिया। वह बोले, "डरने की कोई बात नहीं है। गर्मी लगी है, शरीर में पानी की कमी हो गई है जिस कारण ऐसा हुआ है। यदि ज्यादा पानी की कमी हो जाती ट्रेन की मृत्यु हो जाती है। पर अब तुम चिंता मत करो। मैं ग्लूकोस लगा देता हूं। ये जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।" 

मैं डॉक्टर के सामने फूट-फूट कर रो पड़ा था, "डॉक्टर साहब घर में तीन तीन बच्चे हैं। तीनों के कमरों में ए. सी. लगा हुआ है। फिर भी ........।"

बहुत रोया था मैं, पर वहां मेरे आंसुओं को देखने वाला कोई नहीं था। डॉक्टर बूढ़ी की तीमार-दारी में लग गया। मेरी आंखों से लगातार आंसू गिर रहे थे । डॉक्टर ग्लूकोस आदि लगाने के उपरांत मेरे पास में आया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे संतरा दी। 
"डॉक्टर साहब ! मैं बाहर था और बच्चों ने तो सुध भी नहीं ली कि उनकी मां जिंदा भी है या मर गई।" मेरे मुंह से डॉक्टर के सामने ये सब बातें निकल गई।

"भाई ! आप हिम्मत रखो। आप समय पर ले आए।" 

और दोपहर से शाम हो गई किसी ने हमारी सुध नहीं ली। 

शाम को तुम्हारी भाभी की छुट्टी करा कर घर ले आया लेकिन तुम्हारी भाभी को आराम कराने के लिए तीनों कमरों में कहीं भी जगह नहीं मिली।

मुझे मजबूरन छत पर बने टिन शेड वाले कमरे में ही जाना पड़ा। शाम हो चुकी थी। गर्मी से कुछ राहत मिली दोपहर के मुकाबले अब कुछ ठंडक हो गई। पोते छत पर खेलने आ गए और दादी को बीमार देखकर उनकी सेवा में लग गए। 

जब हम दादा बन गए हैं तो पोतों के साथ खेलने का मन भी करेगा। तो मैं भी उनके साथ खेलने लगा। रात हो गई लेकिन तीनों बेटे जो मेरे बाहर जाने से पूर्व हम दोनों का खाना खाने के लिए बोलने आ जाते थे अभी तक नहीं आए।

"हरिया ! मेरे भाई ! अब बता कि बीमारी की ऐसी स्थिति में तुम्हारी भाभी क्या मुझे खाना बनाकर खिला सकती थी या रात में अब तुम्हारी भाभी को इस हालात में छोड़ कर खाना लेने बाजार जाता। जबकि तुम्हें पता है कि मुझे बाहर का खाना हजम नहीं होता।"

कहते हुए राम सिंह की आंखें भर आईं। आंसू रोकने के प्रयास में राम सिंह की आंखें लाल हो गई। हरिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी और खींच कर, अपने से सटा लिया।

"भाई ! मुझे माफ कर देना । मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है । मुझे सही स्थिति का पता नहीं थी।" हरिया बोला।

उसने अपने आप को संभालने के लिए कुछ क्षण लिए फिर वह बोला, "मेरे भाई! बात यहीं खत्म नहीं हुई। वे एक एक कर ऊपर आए और बच्चों जो अपनी दादी की सेवा में लगे हुए थे को डांट कर अपने साथ ले गए।"

समझ नहीं आ रहा था कि तीनों में एकदम से ऐसा बदलाव क्यों आया ? उनकी बेरुखी कम होने के स्थान पर बढ़ती ही गई । बच्चे भी अब हम से दूर रहने लगे । धीरे-धीरे समय बीत गया दिसंबर आ गया।

बच्चों की सर्दियों की 10 दिन की छुट्टियां पड़ गई । उन्होंने अपने परिवार के लिए वैष्णो देवी यात्रा के लिए 10 दिन की बुकिंग करा ली। 

हम होते कौन हैं कि हम से सलाह ली जाए या हमसे पूछा जाए कि हम वैष्णो देवी जाना चाहते हैं या नहीं। उन्होंने अपने टिकट कराए, ताले लगाए और वैष्णो देवी यात्रा के लिए निकल गए।

पुत्रों के वैष्णो देवी जाने के बाद मैं दो दिन बड़ा परेशान रहा। पार्क में बैठने वाली मेरे कुछ साथियों ने मुझसे परेशानी पूछी तो मैंने अपनी सारी व्यथा उन्हें बता दी।

उनमें से एक व्यक्ति एक दबंग परंतु बहुत ही सज्जन प्रॉपर्टी डीलर को जानते थे। मुझे उसके पास ले गए। सारी बात सुनने के उपरांत प्रॉपर्टी डीलर नहीं कहा, " सर जी ! आजकल के बच्चों को पैसे का घमंड हो जाता है। उन्हें रास्ते पर लाना बहुत जरूरी है, इसके लिए आपको एक कड़ा फैसला लेना होगा।" 

उसने राम सिंह की शक्ल देखी और फिर से प्रश्न किया, " क्या मकान बच्चों के नाम है?"

"नहीं , वह मेरी पत्नी के नाम है ।" 

"तो चिंता कैसी ? बस तुम्हारा कड़ा निर्णय ही अब तुम्हारा साथ दे सकता है।"

राम सिंह ने प्रॉपर्टी डीलर के मुंह की तरफ देखा। वह मुस्कुराया और फिर से बोला, " मैं तुम्हारे घर को इसी हालत में खरीद सकता हूं। लेकिन बच्चों के कमरे तुम्हें अपनी निगरानी में और फोटोग्राफी के साथ खाली कराने होंगे। क्या तुम तैयार हो? "

"हां , लेकिन पैसा?" हरि सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा।

"सर ! पैसा आप बताइए । मुंह मांगा दूंगा । भगवान ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मैं यह काम लोगों के दिल दुखाने के लिए नहीं करता। बल्कि आप जैसे ईश्वर के बंदों को खुश करने के लिए करता हूं।"

फिर क्या था दोस्तों के सामने ही सारी लिखाई पढ़ाई हो गई। 

" सर ! मेरे तीन कमरे खाली पड़े हैं। उनमें तीनों बच्चों का सामान शिफ्ट करवा दो। आपके और माताजी के लिए एक फ्लैट दिखाता हूं । उसमें आपका गुजारा हो जाएगा। जो पैसे बचेंगे उसे संभाल कर रखना। भविष्य में काम आएंगे।"

सब काम ठीक ठाक निबट गया। जब बेटे घूम कर वापस आया तो अपने घर का हुलिया बदला हुआ देखा। और देखा कि ताले भी उन पर नहीं हैं। कमरों के ताले खुले हुए हैं। 

यह देखते ही छोटा बेटा दूसरी मंजिल पर दौड़ा फिर तीसरी पर फिर सबसे ऊपर। फिर वह तेजी से हाफता हुआ नीचे आया।

मझले और बड़े बेटे ने पूछा, " पिता जी कहां हैं?" 

"पता नहीं ऊपर उनका सामान भी नहीं है।" छोटे बेटे ने जवाब दिया।

फिर उन्होंने नीचे वाला दरवाजा खटखटाया। उसमें से एक व्यक्ति बाहर आया और उनसे बोला, "क्या बात है भाई ? बड़े परेशान दिख रहे हो?"

"हां, इसमें हम और हमारे मम्मी-पापा रहा करते थे। हम वैष्णो देवी गए और पापा और मम्मी पता नहीं कहां चले गए।"

"ओह! मम्मी पापा, तो वे आपके मम्मी पापा थे। उन्होंने यह मकान हमें बेच दिया है। "

"और हमारा सामान।"

"वह सब सुरक्षित है। वे दोनों कहीं और चले गए हैं। उन्होंने फोन नंबर बदल दिया है। उनका नया नंबर मेरे पास नहीं है। जब भी आपको मिले तो उनसे ले लेना। अरे ! हां , मुझे याद आया कि वे आपके लिए कुछ देकर गए हैं।"

वह व्यक्ति अंदर गया एक लिफाफा लेकर आया, जिसमें एक चिट्ठी, तीस हजार रुपए और तीन वीडियो सीडी रखीं थी।

बड़े बेटे ने बड़ी उतावली में वह पत्र खोला छोटे बेटे तथा बहुएं उसमें क्या लिखा है, यह पढ़ने का प्रयास करने लगी।

बेटों
खुश रहना
क्या कहूं ? मेरे पास शब्द नहीं है। तुमने तो हमें मरा समझ ही लिया। 

ओह! गलती हो गई बेटा। तुम नहीं, आप। अब बड़े जो हो गए हो। हमारा तो आपके प्रति कर्तव्य था कि आप को पढ़ाया लिखाया और आपका हमारे प्रति कोई कर्तव्य ही नहीं रहा। 

हम आपके लिए जीते जी मर गए तो हमारी इस प्रॉपर्टी में आपका अधिकार कैसे बन सकता है, क्योंकि यह प्रॉपर्टी मैंने अपनी कमाई से खरीदी है और इसका पैसा रिटायरमेंट तक भरता रहा हूं। मुझे इस घर से बहुत लगाव हो गया था क्योंकि इसमें पैसा ही नहीं हमारा सुख दुख एहसास सब कुछ लगा हुआ था। 

आपकी मां जिसने आपको नौ महीने कोख में रखा। जब बीमार पड़ी तो आप चंद दिन उसे अपने कमरे में नहीं रख सके। आपको जरा भी दुख नहीं हुआ। जिस प्रकार आपको अपनी पत्नियां प्रिय हैं। उसी प्रकार मुझे भी अपनी पत्नी प्रिय है क्योंकि मैंने उसके साथ सात फेरे लिए हैं। 

उस दिन यदि मैं समय पर आ नहीं गया होता तो वह मर ही गई होती। आपने ने तो उसके दूध का भी लाज नहीं रखी। हमें छत पर सड़ने के लिए फेंक दिया।

हमने तो आपको तीस पैंतीस साल तक भरपेट भोजन खिलाया, अच्छा पहनाया, अच्छा पढ़ाया-लिखाया और हारी बीमारी में भी अच्छा देखभाल की। जब तुम ऐसे कोई बीमार होता तो हमें रात रात भर नींद नहीं आती थी। अब बीमार पड़ने की हमारे बारी आई तो अपना मुंह ही मोड़ लिया। 

कोई बात नहीं, हम भी मुंह मोड़ना जानते हैं। यह सब आपने ही सिखाया है। जैसा आपने किया, वही आज मैं कर रहा हूं।

मन तो बड़ा दुखी हुआ परंतु क्या करता। यह दुख आपकी अनदेखी वाले बर्ताव से तो बहुत कम है। 

इस पत्र के साथ आपको चाबियां मिली होंगी । यह तुम्हारे नए फ्लैटों की है। और हां, इन फ्लैटों का एक साल का किराया मैंने दे दिया है। तुम्हारे एक महीने के खर्चे के लिए तीस हजार रुपए अतिरिक्त दे रहा हूं। आपस में बांट लेना ।

अब तुम तीनों अच्छे से कमाते हो। मुझे आशा है कि तुम तीनों एक साल के भीतर ही भीतर हमारे मकान को पुनः खरीद लोगे और उसमें मजे से रहोगे। 

धन्य हूं मैं, जो मुझे अच्छे दोस्त मिल गए और उनकी सलाह से मैं, यह काम कर पाया।

और हां, एक बात और यदि आपको हमारी मृत्यु का पता चल जाए और मन करे तो लकड़ी दे देना। वरना कोई भी लावारिस समझ कर हमें अग्नि को समर्पित तो कर ही देगा।
तुम्हारा

...............

पत्र पढ़ते ही बेटे और बहुओं के पैरों के तले से जमीन ही खिसक गई। कुछ देर तक सन्न खड़े रहने के उपरांत। उन्होंने पत्र से पता निकाला और अपना सामान उठाकर भारी कदमों से धीरे-धीरे उस ओर बढ़ने लगे।

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
पुनः लेखन
14/4/28/7/2021

यह कहानी दिल्ली के वेस्ट विनोद नगर में घटित एक सत्य घटना है। जिसमें एक बुजुर्ग ने अपने नालायक बच्चों को कैसे सबक सिखाया।


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