02. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 02 || गुमशुदा की तलाश – सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम,

 02. यह दिल्ली है मेरी जान 

|| कहानी 02 || 

गुमशुदा की तलाश – सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम, 


 रामलाल एक सेवानिवृत अध्यापक हैं। उसे अच्छी खासी पेंशन भी मिलती है। सेवानिवृत तक का उसका समय बहुत ही अच्छी तरह से बीता था और सेवानिवृत्ति के उपरांत तो परिवार के साथ और भी अच्छी तरह से बीत रहा है। घर के अंदर की खुशियां देखकर उसे घर मैं स्वर्ग होने की प्रतीति होती थी।

परेशानी कम किस पर आ जाए कहा नहीं जा सकता। 20 अप्रैल 2020, सुबह दस बजे तक रामलाल एकदम स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे। शाम के सात बजते- बजते तेज बुखार के साथ-साथ वे सारे लक्षण दिखायी देने लगे, जो एक कोरोना पॉजीटिव मरीज के अंदर दिखाई देते हैं।

इस समय देश भर में कोरोना महामारी मुंह फैलाए घूम रही थी इसलिए परिवार के सभी सदस्यों के चेहरों पर खौफ़ साफ़ दिखाई देने लगा था । 

इसी ख़ोफ में उसकी चारपाई घर के एक पुराने बड़े से बाहरी कमरे में डाल दी गयी। यह कमरा अक्सर बंद रहा करता था जो विशेष कार्यों पर ही खोला जाता था। इसमें केवल "प्लूटो" का बसेरा था इसलिए इस बात को यूं कहें कि यह प्लूटो का कमरा है तो गलत नहीं होगा।

यह प्लूटो कौन था ? 
प्लूटो का नाम आते ही आपके दिमाग में आया होगा कि प्लूटो रामलाल के परिवार का कोई सदस्य ही होगा । जी हां आप सही समझे, प्लूटो रामलाल के परिवार का ही सदस्य है वह रामलाल के परिवार में कैसे शामिल हुए चलिए बताते हैं।

रामलाल कुछ साल पहले बाजार जा रहे थे तो उन्होंने देखा की एक बहुत ही सुंदर सा प्यारा सा पिल्ला रास्ते में खेल रहा है। उन्हें वह बहुत अच्छा लगा लेकिन तभी वह तेजी से आ रही है एक मोटरसाइकिल से टकराकर घायल हो गया। 

वह बहुत तेजी से दर्द में कराहने लगा। रामलाल से उसका दर्द देखा नहीं गया। वह तेजी से उसके पास पहुंचा और धीरे-धीरे उस पर हाथ फिराने लगा। प्यार भरे हाथों का स्पर्श पाकर वह कुछ शांत हुआ तो रामलाल ने हिम्मत करके उसे अपनी गोद में उठा लिया और अपने घर ले आए। उसका अच्छे से इलाज कराया और अपने पास रख लिया। रामलाल ने इसको एक सुंदर सा नाम दिया "प्लूटो"। रामलाल उसे अपने बच्चे की तरह पालने‌ पोसने लगे। अब रामलाल के परिवार में रामलाल उसकी पत्नी, दो बहू- और दो बेटों व चार पोते-पोतियों के साथ प्लूटो सहित ग्यारह सदस्य थे।

बस यहीं से शुरू हो गया प्लूटो और रामलाल के बीच एक आत्मीयता भरा संबंध। रामलाल को अपने कमरे में पाकर प्लूटो की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह उछल कूद करता और रामलाल को खुश करने का प्रयास करता है। जैसे उसे मालूम हो कि उसके मालिक को कुछ तकलीफ है और खुशी ही इसका इलाज है। इस प्रकार अब इस कमरे में रामलाल, उसकी चारपाई और उनका प्यारे प्लूटो का बसेरा हो गया हैं।

दोनों बेटों -बहुओं ने उससे दूरी बना ली और बच्चों को भी पास ना जानें के शख्त निर्देश दे दिए गए।

सरकार द्वारा जारी किये गये नंबर पर फोन कर के रामलाल की बीमारी की सूचना दे दी गयी।

खबर, मुहल्ले भर में आग की तरह फैल चुकी थी, खौफ इतना कि कोई मिलने नहीं आया।

साड़ी के पल्ले से मुँह लपेटे हुए, हाथ में छड़ी लिये पड़ोस की कोई एक बूढी अम्मा आई और रामलाल की पत्नी से बोली - 
'अरे कोई उसे थोड़ा सा खाना खिला दो।'

परंतु खौफ के कारण किसी ने भी यह कार्य करना उचित नहीं समझा तो वह वृद्धा पुनः बोली–
"अरे कोई दूर से ही खाना सरका दो, वरना अस्पताल वाले तो इसे भूखे को ही उठा के ले जाएँगे।"

अब प्रश्न ये था कि उहको खाना देने के लिये कौन जाए ?

बेटे और बहुओं ने खाना अपनी सास को पकड़ा दियाl

रामलाल ने देखा कि पत्नी के हाथ, थाली पकड़ते ही काँपने लगे हैं, उसके पैर एक जगह ही जम गए , मानो खूँटे से बाँध दिये गए हों।

इतना देखकर वह पड़ोसन बूढ़ी अम्मा बोली- "अरी तेरा तो पति है, तू भी ........। मुँह बाँध के चली जा और नहीं तो दूर से थाली सरका दे, वो अपने आप उठाकर खा लेगा।"

सारा वार्तालाप रामलाल चुपचाप सुन रहा था। वह सोचने लगा कि परिवार होता किस लिए हैं, मुश्किल में एक दूसरे के काम आने के लिए। यह सोचकर रामलाल की आँखें नम हो गईं । उसकी तो मानव भूख ही मर गई हो। रामलाल के मुख से निकला, "हे राम ! यह कैसा समय आ गया है कि अपने ही मुख मोड़ रहे हैं।"

उसने खाना लेकर खड़ी अपनी पत्नी की ओर देखा और काँपते होठों से उसने कहा, "कोई मेरे पास ना आये तो बेहतर है, मुझे भूख भी नहीं है।"

इसी बीच एम्बुलेंस आ जाती है और रामलाल को एम्बुलेंस में बैठने के लिये बोला जाता है। रामलाल चारपाई से उठकर चुपचाप एंबुलेंस की ओर चल दिया। आज उसे विदा करने के लिए कोई नहीं आया। आस-पड़ोस के लोग भी अपने दरवाजे पर खड़े होकर उसके जाने का तमाशा देख रहे थे।

रामलाल ने घर के दरवाजे पर आकर एक बार पलटकर अपने घर की तरफ देखता हैं।

पोती -पोते प्रथम तल की खिड़की से मास्क लगाए दादा को निहार रहे हैं, और उन बच्चों के पीछे सर पर पल्लू रखे उसकी दोनों बहुएँ दिखाई देती हैं।

घर के दरवाजे से हटकर बरामदे पर, दोनों बेटे काफी दूर अपनी माँ के साथ खड़े थे।

विचारों का तूफान  रामलाल के अंदर प्रचंड रूप से उमड़ने लगा था।

उनकी पोती ने उनकी तरफ हाथ हिलाते हुए टाटा एवं बाई बाई कहा तो एक क्षण को उसे लगा कि सच में 'जिंदगी ने अलविदा कह दिया।'

रामलाल की आँखें लबलबा उठी। उसने चेहरा नीचे किया ताकि उसके आंसू किसी को दिखाई ना दे।

अब उसने एक दृष्टि घर पर डाली तो जमीन खरीदने से लेकर मकान बनाने तक के सारे स्थिति चलचित्र की भांति उसके दिमाग में घूम गई। इस घर की नींव उसने स्वयं खोदी थी और मजदूरों के साथ काम करके दो मंजिला मकान बना कर खड़ा करवा दिया था । तब बच्चे छोटे-छोटे थे। 

उसने बैठकर अपने घर की देहरी को चूमा, माथा टेका और एम्बुलेंस में जाकर बैठ गया।

उनकी पत्नी ने तुरंत पानी से भरी बाल्टी घर की उस देहरी पर उडेल दी, जिसको चूमकर रामलाल एम्बुलेंस में बैठा था।

इसे तिरस्कार कहो या मजबूरी, लेकिन ये दृश्य देखकर उसका कुत्ता प्लूटो भी रो पड़ा और वह रामलाल के साथ जाने के लिए एंबुलेंस में बैठने के लिए दौड़ पड़ा। एंबुलेंस वालों ने उसे डांट कर भगा दिया। 

प्लूटो सारी स्थिति समझ चुका था। वह अपने मालिक के लिए उसी एम्बुलेंस के पीछे - पीछे दौड़ लिया, जो रामलाल को अस्पताल लेकर जा रही थी।

रामलाल इस बात से बिल्कुल अनजान था कि उसका प्लूटो गाड़ी के पीछे पीछे आ रहा है। जहां सभी ने उसका साथ छोड़ दिया एकमात्र एक जानवर उसका साथ निभा रहा था।

रामलाल को अस्पताल में 14 दिनों के अब्ज़र्वेशन पीरियड के लिए भर्ती कर लिया गया।

परंतु प्लूटो बाहर ही रहा गया। जो कोई भी अस्पताल के दरवाजे से निकलता तो वह दौड़कर उस तरफ जाता और अपने मालिक को न पाकर निराश होकर फिर से दरवाजे पर आकर बैठ जाता क्योंकि सिक्योरिटी गार्ड उसे गेट के अंदर जाने की अनुमति नहीं देते। गार्ड ने महसूस किया कि कुत्ता सैकड़ों बार उठकर गया और फिर अपनी जगह पर आकर बैठा गया । उसने दोपहर से कुछ भी नहीं खाया।

गार्ड अपने लिए खाना लेकर आता था। उसमें से कुछ खाना उसके सामने डाल दिया लेकिन उसने उसे मुंह तक नहीं लगाया। रात हो गई और रात से शुभ है गार्ड के द्वारा दिया गया भोजन अभी भी वहीं पड़ा हुआ था। गार्ड ने धीरे-धीरे और उससे दोस्ती की और उस पर हाथ फहराने लगा । 

अपनापन पाकर प्लूटो ने पूछ हिलानी शुरू कर दी। अब दोनों में दोस्ती हो गई। अब गार्ड ने उसे कुछ खाने के लिए दिया तो वह उसने खा लिया। अगले दिन गार्ड कुछ फालतू खाना घर से लेकर आने लगा। 

 गार्ड ने देखा था कि कुत्ता केवल एक ही रोटी खाता जो उसे जीवित रखने के लिए पर्याप्त थी। उसके खाने के बाद जो रोटी बच जाती उसे वह अपने मुंह से उठाता और अपने पास पड़ोस के दूसरे कुत्तों को दे दिया करता।

गार्ड कुत्ते के इस अनोखे व्यवहार को देखकर आश्चर्यचकित था और उससे और भी लाड प्यार करने लगा। अब कुत्ता भी गार्ड के साथ घुलमिल गया था।

14 दिन ऐसे ही बीत गए, रामलाल पूर्णतया स्वस्थ हो गया। रामलाल की सभी जाँच सामान्य आईं। हॉस्पिटल ने उसे पूर्णतः स्वस्थ घोषित करके छुट्टी दे दी।

जब वह अस्पताल से बाहर निकला तो अस्पताल के गेट पर प्लूटो बैठा दिखाई दिया । पहले तो उसे यह सब सपना सा लगा। कुत्ता गार्ड के साथ खेल रहा था। 

रामलाल को विश्वास ही नहीं हुआ परंतु उसका मन नहीं माना उसने उस कुत्ते की ओर देखते हुए पुकारा –'प्लूटो!'

जानी पहचानी आवाज में, अपना नाम सुनते ही प्लूटो के कान खड़े हो गए वह सतर्क हो गया और आवाज की तरफ देखने लगा। 

रामलाल को पहचानते देर न लगी कि यह प्लूटो ही है उसने फिर से आवाज लगाई, "प्लूटो ! मेरे बच्चे !"

प्लूटो ने जैसे ही रामलाल को देखा वह तुरंत ही रामपाल की तरफ दौड़ गया।

दोनों एक दूसरे से लिपट गये। एक की आँखों से गंगा तो दूसरे की आँखों से यमुना बहे जा रही थी। सभी गार्ड रामलाल और प्लूटो की मिलन को एकटक होकर देख रहे थे। 

प्लूटो का गार्ड दोस्त रामलाल के पास आया और बोला, "क्या यह तुम्हारा ही कुत्ता है?"

"हां भाई ! यह मेरा कुत्ता नहीं, मेरे बच्चा है । कितने दिनों से यह यहां है।" गार्ड के प्रश्न का उत्तर देते हुए रामलाल ने उसे पूछा।

"करीब चौदह पंद्रह दिनों से।" गार्ड ने उत्तर दिया।

"हे भगवान ! इतने दिनों से यह भूखा प्यासा रहा होगा।"

"नहीं, पहले दो दिन तो इसने कुछ नहीं खाया। उसके बाद केवल जीवित रहने के लिए एक दिन में एक ही रोटी खाता अगर मैं दो डाल दूं तो दूसरी रोटी दूसरे कुत्ते को ले जा कर दे देता था। कितनी अच्छी आदत डाली है आपने इसे।" गार्ड ने कहा।

रामलाल ने प्लूटो को एक बार फिर से अपने गले लगा लिया, " तूने तो अपने खून से भी ज्यादा बड़ा रिश्ता निभा दिया। तू मेरा तीसरा बेटा है।" कह कर एक बार फिर से उसे गले लगा लिया।

जब तक उनके बेटों की लम्बी गाड़ी उन्हें लेने पहुँचती, तब तक रामलाल अपने प्यारे प्लूटो को लेकर किसी दूसरी दिशा की ओर निकल चुके थे।

उसके बाद वो कभी दिखाई नहीं दिये।

आज उनके फोटो के साथ उनकी गुमशुदगी की खबर छपी हैl

*अखबार में लिखा है कि सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम दिया जायेगा।*

40 हजार - हाँ पढ़कर ध्यान आया कि इतनी ही तो मासिक पेंशन आती थी रामलाल की, जिसको वह परिवार के ऊपर हँसते खिलखिलाते हुए उड़ा दिया करता था। 

बस इतनी सी है आज की कहानी।



एक बार रामलाल की जगह पर स्वयं को खड़ा करोl

कल्पना करो कि इस कहानी में किरदार आप हो।

आपका सारा अहंकार और सब मोह माया खत्म हो जाएगी।

इसलिए मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि कुछ पुण्य कर्म कर लिया कीजिए l

जीवन में कुछ नहीं है l कोई अपना नहीं है l

*जब तक स्वार्थ है, तभी तक आपके सब हैं।*

जीवन एक सफ़र है, मौत उसकी आखिरी मंजिल है l मोक्ष का द्वार कर्म है। यही सत्य है ।

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
11/2/2/6/2021

शिक्षा:

हे कोरोना, तू पूरी दुनिया में मौत का तांडव कर रहा है पर सचमुच, तूने जीवन का सार समझा दिया है।

" अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, स्त्री-पुरुष, धर्म-जाति, क्षेत्र-देश, राज़ा-रंक, कोई भेदभाव नहीं, सब एक समान हैं!

असली धर्म इंसानियत है! निस्वार्थ भाव से, निष्काम कर्म, सच्चाई, ईमानदारी, निर्मल प्रेम, मधुर वाणी, सद्भाव, भाईचारा, परोपकार करना ही सर्वश्रेष्ठ है...
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इसके बाद भी अगर लोगो की सोच में परिवर्तन आ जाए तो समझ लेना करोना वायरस नहीं एक देवदूत बनकर आया है जिसने लोगो को जीवन का मूल मंत्र दे दिया है। 
वरना इंसान कीड़े मकोड़ों की तरह ही जन्मा है और उसी की तरह ही मर जाएगा।
😭😭😭😔😔😔🤔🤔🤔

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