22. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 22 || कास ! मुझे कहीं प्रधानमंत्री जी मिल जाएं
22. यह दिल्ली है मेरी जान !
|| कहानी 22 ||
कास ! मुझे कहीं प्रधानमंत्री जी मिल जाएं
पहले इस कहानी का शीर्षक 'निकालो ₹400 वरना उतरो' था। लेकिन बाद में मुझे शीर्षक 'कास ! मुझे कहीं प्रधानमंत्री जी मिल जाएं' ज्यादा सटीक लगा । शायद आपको भी लगे कृपया कहानी सुनने के बाद कमेंट करके अवश्य बताइएगा।
दिल्ली में एक गरीब परिवार रहता था। उसमें दो व्यक्ति थे पति पत्नी जिनके नाम क्रमशः हरिराम और मीना थे। हरिराम सेठ के यहां काम करता था। जो मिलता उसी से वह परिवार अपना गुजारा चलाता ।
कभी कभी गरीब होना गुनाह बन जाता है। वह केवल मशीन बन कर रह जाता है। गरीब जो कमाता है उसका सब कुछ परिवार पर खर्च हो जाता है और रात को खा कर सो जाता था और सुबह होते ही वह पुनः अपने काम पर चला जाता है।
एक दिन दोनों पति-पत्नी बैठे हुए अपनी शादीशुदा बिटिया गुड्डों के बारे में सोच रहे थे कि तभी एक छोटा सा, टूटा फूटा फोन, जो सिलाई करने वाली रील के धागे से दो-तीन जगह से बंधा हुआ था बजे उठा।
उसकी स्क्रीन पर नंबर भी साफ दिखाई नहीं दे रहे थे इसलिए पति ने फोन उठाया और बोला, "हेलो ! आप कौन बोल रहे हैं?"
"हम अस्पताल से गुड्डू के घर से बोल रहे हैं।" उधर से आवाज आई
"नमस्कार जी ! सब कैसे हैं ?" हरिराम ने पूछा ।
उधर से आवाज आई , " सब ठीक ठाक हैं। आप नाना बन गए हैं।"
"क्या कहा, मैं नाना बन गया हूं। अजी सुनती हो तुम नानी बन गई हो।" यह सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
"कौन आया है ? लाला या लाली।"
"लाला आया है । आपको सूचना देनी थी इसलिए मैंने सूचना दे दी । अब आपको जैसा उचित लगे वैसा करें।" कहकर सामने वाले ने फोन काट दिया।
गरीब जो भी कमाते हैं । गरीबी वह सब खा जाती है । बचाने के नाम पर कुछ भी नहीं होता । अब इस फोन से जितनी उन्हें खुशी मिली थी, उससे कई गुना ज्यादा हरी लाल की चिंता बढ़ गई कि अचानक से एक खर्चा ऊपर आन पड़ा।
दोनों पति-पत्नी में खर्चे को लेकर जोड़-तोड़ शुरू हो गई। बस से गुड्डू के यहां जाना बहुत महंगा पड़ेगा ट्रेन से चलते हैं वही ज्यादा सुविधाजनक रहेगा और स्वच्छता भी पड़ेगा जनरल डिब्बे में जगह तो मिल ही जाती है। फिर जो सामान होगा उसे कैसे लेकर जाएंगे एक ऑटो कर लेंगे रेलवे स्टेशन के लिए एक ऑटो कर लेंगे।
पत्नी बोली ऑटो क्यों सरकार ने बस जो चला रखी है उसी से चलेंगे घर से थोड़ा जल्दी निकल लेंगे ताकि स्टेशन पर समय से पहुंच जाएं और जनरल बोगी का टिकट ले लेंगे।
अरे मेरे दिमाग से ही निकल गया था कि यहां बसों में तुम्हारा टिकट नहीं लगेगा केवल मुझे ही देना होगा चलो एक खर्चा तो बचा।
तय समय पर दोनों घर से निकले बस पकड़ी और सीधे रेलवे स्टेशन पहुंच गए लेकिन जैसे ही ट्रेन आई तो भीड़ होने के कारण उन दोनों के लिए जनरल बोगी में चढ़ना बहुत मुश्किल हो गया।
जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, और गाड़ी छूटती देखकर और अपने आप को जनरल बोगी में चढ़ते हुए ना पाकर, वे दोनों एक ट्रंक लिए दूसरे डिब्बे में घुस पडे़।
दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर हरीलाल चिंतातुर खड़ा था।
हरीलाल जानता था कि उसके पास जनरल टिकट हैं और ये रिज़र्वेशन वाला डिब्बा है। टीसी आएगा और वह कुछ ना कुछ जुर्माना अवश्य लगाएगा।
थोड़ी देर में टीसी टिकट चेक करता हुआ आ गया उसने जैसे ही उन दोनों पर निगाह डाली तो टीसी ने उनसे टिकट मांग ली।
टीसी को अपनी जनरल टिकट दिखाते हुए उसने हाथ जोड़ दिए। जनरल टिकट देखकर टीसी बोला, " ये जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।"
"साहब ! जनरल डिब्बे में बहुत भीड़ है । उसमें हमसे नहीं चढ़ा गया तो हम इसमें चढ़ गए। साहब ! उसमें बहुत भीड़ है, भीड़ के कारण उसमें नहीं चढ़ा जाएगा।"
" दिमाग खराब मत करो। यह जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना। वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" कह टीसी आगे को बढ़ गया और सीटी बजाती हुई और छुक छुक करती हुई अपनी मंजिल की तरफ आगे की ओर बढ़ती गई बढ़ती गई।
पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे। सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे।
बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे।
लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।
" साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते। हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे। बड़ी मेहरबानी होगी।"
टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता। आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब। नाती को देखने जा रहे हैं। गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो। एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहना।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।" दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद तो बनानी ही पड़ेगी। ऊपर से आर्डर है। रसीद तो बनेगी ही। चलो, जल्दी चार सौ निकालो। वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।"
इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी चार सौ रुपए ऐसे निकाल कर दे रहा था मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो। परंतु टीसी भी क्या कर सकता था। उसकी ड्यूटी है । अगर कोई चेकिंग हुई तो उसकी नौकरी चली जाएगी इसलिए उसे मजबूरन यह सब करना ही होता है।
अभी तक दोनों पति-पत्नी के मुख पर जो खुशी थी वह अचानक नदारद हो गई। दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे ऐसे बैठ गए, मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक में जा रहे हो।
हरीलाल के दिमाग में हलचल हो रही थी, " कैसे एडजस्ट करेंगे ये केवल चार सौ रुपए है ?"
"क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगने पड़ेंगे?
नहीं-नहीं।
आखिर में हरीलाल अपनी पत्नी मीना से बोला, "सौ-डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। खर्च में कुछ कटौती करनी पड़ेगी। मुझे तो भूख नहीं है शाम को तुम खाना खाना चाहो तो खा लेना। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। इससे कुछ पैसे बच जाएंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर ट्रेन से आयेंगे। सौ रूपए और बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए यह सब सह लूंगा।"
" मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।" मीना ने हरीलाल से कहा।
" ऐसा करते हैं, हम दोनो नाना-नानी की तरफ से जो सौ-सौ रुपए देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम दोनो अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।"
पत्नी के कहा, " मगर मुन्ने के कम करना....""। और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ने को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। " कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली, " कास ! मुझे कहीं प्रधानमंत्री जी मिल जाएं तो उनसे प्रार्थना करूं कि आप जितने पैसे बुलेट ट्रेन चलाने में खर्च करने जा रहे हैं साहब इतने पैसों खर्च करके हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगियां और लगवा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़ेगा और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम होंगे।" कहते हुए उसकी आँखें एक बार फिर छलक पड़ी।
पति सांत्वना देते हुए बोला, " अरी पगली ! हम गरीब आदमी हैं, हमें वोट देगणने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत।"

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