"जीवन में हुई एक घटना को कहानी के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं इतना कहता हूं पूरी कहानी के बाद सब लोगो के अलग विचार अलग नजरिया हो सकता है एक प्रार्थना पूरी जरूर पढ़िएगा वादा करता हूं आपका समय नष्ट नहीं होगा सिर्फ इतना बताना मुझे कहना क्या था और इस कहानी का सबसे अच्छा शीर्षक क्या हो सकता था....🙏
"" क्या कहूं ""
माई और जून में दिल्ली के आसपास का क्षेत्र बहुत गर्म होता है। इस समय लू चलती हैं। तपती हुई गर्म हवाओं को जो शरीर का पानी सूख ले लो कहलाती हैं। अचानक दिल्ली से महावतपुर जाना पड़ा जो शामली रेलवे स्टेशन से थोड़ा आगे चलकर सिक्का चीनी मिल के पास और थानाभवन के बीच पड़ता है। 10:00 बजे की गाड़ी कैंसिल हो गई अब 2:00 गाड़ी थी जिसके कारण सुबह की भीड़ और दोपहर की भीड़ वहां एकत्रित हो गई।
अचानक जाना हुआ था इसलिए रिजर्वेशन ना हो सका। गर्मियों की छुट्टी होने के कारण गाड़ियों में और भी भीड़ बढ़ गई थी । रिजर्वेशन न होने के कारण जनरल डिब्बे में ही चढ़ना पड़ा। गाड़ी मुश्किल से मिनट भर भी नहीं रुकी होगी कि उसने सीटी बजाई और चल दी। हम लोग तीन सदस्य थे मैं मेरी पत्नी विनीता और मेरा 4 साल का बेटा राहुल । गर्मी और भीड़ की स्थिति उसने कभी नहीं देखी थी इसलिए वह बुरी तरीके से रोए जा रहा था। इतनी भीड़ की सांस लेना मुश्किल गिनती करने पर पता लगा कि 70 लोगों वाले इस डिब्बे में करीब 2:30 300 लोग होंगे। अब तो यह लगने लगा कि यह सुपरफास्ट गाड़ी भी पैसेंजर की तरह चल रही है जबकि कुछ ही स्टेशन थे लेकिन बे भी बहुत भारी लग रहे थे।
भीड़ के कारण हालत ऐसी हो गई के हिलना डुलना तो दूर सांस तक लेना मुश्किल हो रहा था । हम घर से जो पानी की बोतल ले कर चले थे। वह खत्म हो चुकी थी । जून की भयानक गर्मी एक बच्चा का प्यास के मारे बुरा हाल था।
ऐसी स्थिति जिसमें हिलना डुलना तक मुमकिन नहीं था ऐसे में किसी से पानी मांगना फिजूल था। अगला स्टेशन आने तक बड़ी मुश्किल से धक्का मुक्की करते हुए मैं जैसे तैसे साथ यात्रियों के हाथ जोड़ता, रिक्वेस्ट करता खिड़की तक पहुंचा गया । जैसे कि सभी को विदित है कि भारतीय रेल गाड़ियों में जर्नल डिब्बा अक्षर गाड़ी की सबसे अंत में जुड़ा होता है। आज भी यही हुआ था कि जनरल डिब्बा आखरी में था इसलिए हमारा डिब्बा मध्य स्टेशन से काफी दूर लगभग अंत में था। दुकान तो क्या आस पास कोई हाकर भी दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया । जो देखने में एक किसान लग रहा था। मेरे पास चेंज नहीं थी और केवल ₹2000 का एक नोट था। मैंने हाथ जोड़कर उससे अपनी समस्या बताते हुए उससे प्रार्थना की मुझे एक पानी की बोतल ला दीजीए।
और मेरे पास 1000 का ही नोट था लेकिन उस समय बस इतनी चिंता थी के किसी तरह पानी मिल जाए बस मैंने उसे 1000 का नोट दे दिया (उस समय चलता था 1000 का नोट) भला आदमी लगा उसने कहा ठीक है भाईसाब कोई बात नही ला देता हूं मैने थोड़ी राहत की सांस ली 1-2 मिनट हुए वो नही आया मैने सोचा भीड़ ज्यादा है इसलिए टाइम लग गया होगा लेकिन 4-5 मिनट में भी नही दिखाई दिया वो कहीं ,मैं लगभग रोते हुए उम्मीद भरी से नजरो से खिड़की से बिना पलक झपकाए देखे जा रहा था की अब आया और अब आया लेकिन इतने में ट्रेन ने हॉर्न दे दिया और ट्रेन चल दी और वो दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था उसकी इस दगाबाजी ने मुझे अंदर तक झिंझोड़ दिया मैंने इतनी जोर से अपना हाथ खिड़की पे दे मारा के मुझे चोट भी लग गई मैं अंदर से बुरी तरह से निराश तो था ही और वास्तव में भी मेरी आंखो से आंसू बह रहे थे इंसानियत नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई इस दुनियां में ,धोखेबाज इंसान 1000 रख लेता लेकिन कम से कम 1 पानी की बोतल तो देता मैने उसे अपने बेटे के बारे में बताया भी था मैं जितनी गालियां जितनी बद्दुआएं उसे दे सकता था दे डाली जितना कोस सकता था उसे कोसा अब ट्रेन की रफ्तार बढ़ने लगी मैं अपना मुंह खिड़की से हटाने ही वाला था की वो आदमी बहुत तेज़ी से दौड़ता हुआ मेरी खिड़की की तरफ भागा हुआ आ रहा था भागते हुए वो मेरे पास पहुंचा और मुझे एक छोटा सा थैला दिया जिसमे 2 पानी बोतले और कुछ बिस्कुट भी थे और 1000 का नोट भी वापस किया वो बुरी तरह हाफ रहा था बोला कोई भी 1000 का नोट खुल्ला नहीं दे रहा था इसलिए मैंने ही ले ली मैं आंखे फाड़े उसे देखे ही जा रहा था इतने में ट्रेन ने स्पीड पकड़ वो अपना पेट पकड़ के हांफते हुए मेरी नजरो से दूर हो गया और होश में आते ही मैं बस इतना ही कह सका सॉरी भाई और अभी भी मेरी आंख में आंसू थे मैं उसका नाम भी नहीं जान सका आज भी उस शख़्स को कभी नहीं भूल सका मै....🙏
"लेखक"
_अमित रहेजा_
Comments
Post a Comment