5.103. || तीसरी कहानी || पाटलिपुत्र के निर्माण और राजा ब्रह्मदत्त की कथा

5.103. || तीसरी कहानी  || पाटलिपुत्र के निर्माण की कथा

तृतीय तरंग

पाटलिपुत्र के निर्माण की कथा

इतना कहने पर, उस वन मे काणभूति के एकाग्रचित्त होकर सुनने के कारण, वररुचि ने पुन कहना प्रारम्भ किया ॥ १ ॥ कुछ समय पश्चात् एक दिन अध्यापन कार्य समाप्त होने पर दैनिक कार्य से निवृत्त हुए उपाध्याय वर्ष से हमलोगों ने पूछा ॥ २॥

गुरुदेव, यह पाटलिपुत्र नगर इस प्रकार लक्ष्मी और सरस्वती' दोनों का क्षेत्र कैसे बना? यह कृपा कर कहिए ॥ ३ ॥

यह सुनकर उपाध्याय वर्ष ने हमलोगों से कहा कि इस नगर (पाटलिपुत्र ) की कथा सुनो- "गंगाद्वार' (हरिद्वार) मे कनखल नाम का पवित्र तीर्थ है ॥४॥ उस कनखल तीर्थ में देवगज ऐरावत ने उशीनर नामक पर्वत के शिखर को तोडकर गंगा को उतारा है ॥५॥

वहाँ (कनखल में) दक्षिण देश का निवासी एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ तपस्या कर रहा था। इसी बीच वही पर उसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥ कालक्रम से उस सपत्नीक ब्राह्मण के स्वर्ग सिधारने पर उसके वे तीनों बालक विद्याध्ययन करने के लिए राजगृह चले गये ॥७॥

वहाँ पर (राजगृह में) विद्योपार्जन करके वे तीनों अनाथ और दुःखी बालक, स्वामी कार्तिक के दर्शन करने के लिए वहाँ से दक्षिण-देश को गये ||८|| वे दक्षिण- देश में समुद्र तट पर स्थित चिञ्चिनी नामक नगरी में पहुँचे और वहाँ भोजिक नामक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे ॥९॥

उस भोजिक ब्राह्मण के तीन कन्याओं के अतिरिक्त और कोई सन्तान न थी । अतः वह अपनी तीनों कन्याओं को तीनों ब्राह्मणों को दान कर और साथ ही अपना धन भी उन्हें देकर गंगाद्वार (हरद्वार) की ओर चला गया ।। १० ।।

कुछ काल के अनन्तर श्वशुर-गृह में रहते हुए उन तीनों ब्राह्मणी को वर्षाभाव के कारण होनेवाले भीषण अकाल का अनुभव करना पड़ा ।। ११ ।।

अकाल की भीषणता से व्याकुल होकर वे तीनों ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नियों को छोड़कर भाग गये । क्रूर व्यक्तियों के हृदयों में बन्धुत्व की भावना स्पर्श भी नही करती ॥ १२ ॥ उन तोनों में बिचली बहन गर्भवती थी। अतः वे तीनों इस विपत्ति में अपने पिता के मित्र यज्ञदत्त के घर में शरण लेने चली गई और वहाँ जाकर अपने-अपने पतियों का ध्यान करती हुई कठिनाई से जीवन व्यतीत करने लगी । कुलीन स्त्रियाँ विपत्ति में भी अपने सती चरित्र का परित्याग नही करतीं ।। १३-१४ ।।

उस बिचली बहन ने समयानुसार पुत्र उत्पन्न किया और तीनों बहने उस शिशु के प्रति एक दूसरी से अधिक स्नेह करने लगीं ।। १५ ।। किसी समय आकाश मे भ्रमण करते हुए शिवजी की गोद में बैठी हुई स्कन्दमाता (पार्वती) उस बालक को देखकर दयापूर्वक कहने लगीं ॥१६॥

'देव, देखिए । इस बालक पर ये तीनों स्त्रियाँ समान रूप से स्नेह करती है और यह आशा करती हैं कि यह बड़ा होने पर हमलोगों का पालन-पोषण करेगा ।।१७।। इसलिए भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि यह बालक, इन तीनों का जीवन-निर्वाह कर सके।' पार्वती के इतना कहने पर वरदानी शिवजी ने कहा ।। १८ ।।

'मैं तो इसे पहले ही अनुगृहीत कर चुका हूँ, क्योंकि इसने पूर्वजन्म में पत्नी के साथ मेरी आराधना की थी। उसी का फल भोगने के लिए इसे संसार में यह जन्म दिया गया है ।। १९ ।। पाटली नाम की इसकी पत्नी, राजा महेन्द्रवर्मा की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई है। वही इसकी पत्नी बनेगी ॥२०॥

पार्वती से ऐसा कहकर शिवजी ने उन तीनों पतिव्रताओं से स्वप्न में कहा कि 'यह तुम्हारा शिशु नाम से भी पुत्रक ही रहेगा, पुत्रक नाम से प्रसिद्ध होगा। यह जब सोकर उठेगा, तब प्रतिदिन इसके सिरहाने में एक लाख स्वर्ण मुद्रा मिला करेगी और आगे चलकर यह राजा होगा ।। २१-२२।।

दूसरे दिन उस बालक के सोकर उठने पर उसके सिरहाने में सुवर्ण पाकर यज्ञदत्त की पतिव्रता पुत्रियाँ अपने व्रत को सफल समझकर अत्यन्त आनन्दित हो उठीं ॥ २३ ॥ इस प्रकार प्रतिदिन एकत्र होते हुए सोने से खजाना बढ़ जाने पर धीरे-धीरे पुत्रक राजा बन गया। सच है, 'सिद्धियाँ तप के अधीन होती हैं ' ॥ २४ ॥

एक बार एकान्त में यज्ञदत्त ने पुत्रक से कहा- 'हे राजन् ! तुम्हारे पितर दुर्भिक्ष के कारण यहाँ से कहीं चले गये हैं। इसलिए तुम ब्राह्मणों को सदा दान दिया करो। वे भी तुम्हारी उदारता सुनकर आ जायेंगे। मैं इस विषय में ब्रह्मदत्त राजा की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ।। २५-२६।।

राजा ब्रह्मदत्त की कथा

प्राचीन समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त नाम का राजा था। उसने एक बार रात्रि के समय आकाश में उड़ते हुए हंसों की जोड़ी को देखा, जिसके चारों ओर बिजली के समान चमकती हुई, सोने के पंखों की प्रभा छिटक रही थी। उसके चारों ओर श्वेत हंस ऐसे उड़ रहे थे, जैसे अकाल मे ही खेत मेघखंडों से व्याप्त विद्युत्पुंज हों ।। २७-२८ ।।

उम हंस-युगल को देखने की राजा की लालसा ऐसी तीव्र हुई कि वह राज्य के सुखों से भी विरक्त रहने लगा ॥ २९ ॥ तब राजा ने मन्त्रियों के साथ सम्मति करके एक सुन्दर सरोवर बनवाया और अपने राज्य में समस्त प्राणियों को अभयदान दिया ||३०||

कुछ समय के पश्चात् वे हंस पुनः उस सरोवर पर आये और उनके विश्वस्त होने पर राजा ने उनके स्वर्ण के शरीर होने का कारण पूछा ।। ३१ ।। तब वे हंस स्पष्ट वाणी मे राजा से बोले - 'हे राजन् ! पहले जन्म में हम कौए थे ॥ ३२ ॥

बलि (भोजन) के लिए लड़ते हुए हम दोनो एक शून्य और पवित्र शिवालय में गये और वहाँ जाकर जल की टंकी में गिरे और मर गये ||३३||

इसी कारण इस जन्म मे हमलोग सुवर्णमय हंस हुए राजा इस प्रकार सुनकर और आँखें भर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ || ३४ ॥

अत: तुम भी असाधारण रूप से दान करते हुए अपने पितरों को प्राप्त करोगे। ऐसा सुनकर पुत्रक ने असाधारण रूप से दान करके ख्याति प्राप्त की ।। ३५ ॥

इस प्रकार पुत्रक के दान की ख्याति सुनकर वे ब्राह्मण वहाँ आये और पहचाने जाने पर अतुल सम्पत्ति और अपनी पत्नियों को प्राप्त कर सुखी हुए ।। ३६ ।। यह आश्चर्य है कि अविवेक से अन्ध बुद्धिवाले दुष्ट आपतियों को आते और नष्ट होते, देखकर भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते ।। ३७॥

कुछ समय आनन्द का उपभोग करते हुए भी वे ब्राह्मण पुत्रक को मारकर उसका राज्य हड़पने की इच्छा से उसे विन्ध्यवासिनी के दर्शन के बहाने वहाँ ले गये || ३८॥

वहाँ पर देवी के मन्दिर के भीतरी भाग में वध करनेवालों को रखकर उन्होंने पुत्रक से कहा कि 'पहले तुम अकेले ही देवी के दर्शन करो। भीतर जाओ ।। ३९ ॥

उनके विश्वास पर मन्दिर के अन्दर प्रवेश करते ही पुत्रक ने, प्रहार के लिए उद्यत वधकों को देखकर पूछा कि 'तुमलोग मुझे क्यों मारते हो ? ' ॥ ४० ॥

उन्होंने कहा कि 'तुम्हारे पितरों ने सोना देकर हमें मारने के लिए प्रेरित किया है। भगवती की कृपा से भ्रष्ट बुद्धिवाले उन वधिकों से पुत्रक ने कहा ॥ ४१ ॥ 'मैं तुम्हें अपने अमूल्य ज्वाहिरातों के आभूषण देता हूँ। तुमलोग मुझे छोड़ दो, मैं यह बात किसी से न कहूँगा और दूर चला जाता हूँ ॥ ४२ ॥

ऐसा कहने पर वधिक लोग उसे छोड़कर चले गये और उसके पितरों से जाकर झूठ कह दिया कि पुत्रक को मार दिया ||४३||

इस प्रकार पाप कर्म करके राज्य पाने की इच्छावाले ब्राह्मण लौटकर घर गये, तो उन्हें राजद्रोही समझकर पुत्रक के मन्त्रियों ने मार डाला। भला ! कृतघ्नों का कल्याण किस प्रकार हो सकता है ।। ४४ ।।

इसी बीच राजा पुत्रक भी अपने सम्बन्धियो से विरक्त होकर विन्ध्याचल के गहन वन मे चला गया ॥ ४५ ॥

वन मे घूमते हुए उसने दो असुर-युवक को बाहुयुद्ध के लिए तैयार खड़े देखा और उनसे पूछा कि 'तुम दोनो कौन हो ? ' ।। ४६ ।।

वे कहने लगे हम दोनों मयासुर के लड़के है। हमारे पास यह पैतृक धन है-एक पात्र, एक लाठी और दो खड़ाऊँ ॥४७॥ इस पैतृक धन के लिए हमलोगों का युद्ध हो रहा है 'कि जो बलवान् हो, वह इसे प्राप्त करे।' उनकी इन बातों को सुनकर पुत्रक ने हँसकर कहा ||४८ || 'पुरुष के लिए यह कितना धन है, जिसके लिए तुमलोग युद्ध कर रहे हो।' तब वे दोनों बोले—' इस खड़ाऊँ को पहनने से मनुष्य आकाशचारी हो जाता है ।। ४९ ।। छड़ी से जो कुछ भी लिखा जाता है, वह सत्य होता है और इस पात्र में जिस भोजन का ध्यान करें, वही भोजन रखा हुआ मिलता है ॥५०॥ यह सुनकर पुत्रक ने कहा--' इन वस्तुओं के लिए युद्ध की शर्त उचित नही है। दौड़ने में जो अधिक बलवान् हो, वही इन्हें ले ले" ॥५१॥

यही ठीक है, ऐसा कहकर वे दोनों मूर्ख असुर-पुत्र दौड़ पड़े और पुत्रक उस छड़ी एवं पात्र को लेकर खड़ाऊँ पहनकर आकाश में उड़ गया और वे दोनों मूर्ख बन गये ॥ ५२ ॥

खड़ाऊँ के प्रभाव से क्षण-भर में ही लम्बी यात्रा करके पुत्रक ने आकर्षिका नाम की सुन्दर नगरी देखी और आकाश से उतर गया ॥ ५३॥

उतरकर उसने सोचा- 'वेश्याएं ठगने में लगी रहती हैं। ब्राह्मण मेरे पितरों के समान विश्वासघाती और लोभी है, बनिये धन के लोभी होते ही है। अतः मैं किसके घर पर निवास करूँ !' ।। ५४ ।।

ऐसा सोचते-सोचते राजा ने एक एकान्त पुराने और टूटे-फूटे मकान तथा उसके भीतर जाकर एक वृद्धा स्त्री को देखा || ५५ ॥ उसने उस बूढ़ी स्त्री को कुछ धन देकर सन्तुष्ट किया और उस वृद्धा के आदर-सत्कार करने पर वह उसी मकान में छिपकर रहने लगा ।। ५६ ।।

किसी समय प्रसन्न होकर उस वृद्धा ने कहा- 'पुत्रक, मुझे केवल एक ही चिन्ता है कि तुम्हारे अनुरूप कही कोई भार्या नहीं है ' ॥५७॥

लेकिन इस राज्य के राजा की पाटली नामक कन्या है। उसे अन्त पुर के ऊपर रत्न के समान सुरक्षित रखा गया है ||५८||

वृद्धा के वचनों की ओर कान दिये हुए पुत्रक के हृदय मे उसी (कान के) मार्ग से कामदेव ने प्रवेश किया ॥ ५९॥ 'उस कन्या को मैं आज ही देखूंगा, 'ऐसा निश्चय करके पुत्रक रात को खड़ाऊँ पहन कर आकाश मार्ग से उसके पास पहुँच गया ॥ ६०॥

पर्वत की चोटी के समान ऊँचे महल की खिडकी से प्रवेश कर उसने एकान्त में सोई हुई पाटली को देखा ॥ ६१ ॥

अंगो पर निरन्तर पडते हुए चाँदनी के प्रकाश से वह पाटली इस प्रकार सुशोभित हो रही थी, मानों समस्त संसार को जीतकर, अतएव थककर सोई हुई कामदेव की मूर्तिमती शक्ति हो ।। ६२ ।। 'इसे कैसे जगाऊँ' यह जबतक पुत्रक सोच ही रहा था कि तभी कमरे के बाहर से पहरेदार ने आर्या पढ़ी ॥ ६३ ॥ 'मधुर हुंकार करती हुई और अलमाई हुई, अतएव अधखुली आँखोंवाली प्रेमिका का आलिंगन कर उसे जगाना ही युवको के जन्म की सफलता है' ।। ६४ ।। इस भूमिका को सुनकर कुछ काँपते हुए अंगों से पुत्रक ने पाटली का आलिंगन किया और वह जाग उठी ॥ ६५ ॥

उस राजा पुत्रक को देखकर पाटली की आँखों में लज्जा और आश्चर्य का समंदर दिखाई देने लगा। परपुरुष को देखकर लज्जा और उसका ऐसे अवसर पर वहाँ उपस्थित होना आश्चर्य का कारण था ॥ ६६ ॥

इसके अनन्तर वार्तालाप और गन्धर्व विवाह हो जाने पर दोनों में परस्पर प्रीति बढ़ने लगी; किन्तु रात नहीं बढ़ी, अर्थात् रात समाप्त हो गई ।। ६७॥

रात्रि के अन्तिम प्रहर में वह राजा पुत्रक, उत्कठित वधू (पाटली) से कहकर तल्लीन भाव से उस वृद्धा के पुराने घर पर लौट आया || ६.८ || इस प्रकार पुत्रक प्रत्येक रात्रि में पाटली के यहां आता जाता रहा। किन्तु एक बार पाटली के रक्षकों ने उसके सम्भोग चिह्नों को देख लिया ।। ६९ ।।

रक्षकों (पहरेदारों) ने सारी परिस्थिति राजा से बता दी। राजा ने पाटली के भवन मे रात्रि को देखने के लिए एक स्त्री जासूस को नियुक्त कर दिया ॥७०॥

इस प्रकार एक दिन उस गुप्त स्त्री ने पहचान के लिए, सोये हुए पुत्रक के वस्त्र में पाटली की महावर लगा दी ।। ७१ ॥ प्रातःकाल उस जासूस स्त्री ने राजा को बताया और राजा ने भी अपने दूतों को उसे पकड़ने के लिए भेज दिया। दूतों ने उस पुराने घर से महावर से सने कपड़े के सूत्र से उसकी पहचान करके वृद्धा के घर पर पुत्रक को पकड़ लिया ॥ ७२ ॥

दूत पुत्रक को पकड़कर उसे राजा के पास ले आये। किन्तु पुत्रक ने जब राजा को क्रुद्ध होते हुए देखा, तब खड़ाऊँ के प्रभाव से वह आकाश मार्ग से पाटली के घर मे पहुँच गया ॥ ७३ ॥

उसने पाटली से कहा- 'हमलोग पकड़े गये ! तुम उठो, खड़ाऊँ के प्रभाव से निकल भागते है ।' ऐसा कहकर और पाटली को गोद में उठाकर पुत्रक आकाश मार्ग से निकल गया ।। ७४ ।। 

तदनन्तर गंगातट के समीप आकाश मार्ग से उतरकर पुत्रक ने थकी हुई पाटली को उस पात्र के प्रभाव से मिलनेवाले विविध भोजन से प्रसन्न किया ।। ७५ ।। पाटलीने पुत्रक के प्रभाव को देखकर प्रार्थना की और उसके प्रार्थनानुसार पुत्रक ने उस छडी से चतुरगिणी सेना सहित जमीन पर एक नगर का नक्शा बनाया ॥ ७६ ॥ 

छड़ी से लिखे गये और सचमुच बने हुए उस प्रभावशाली नगर मे वह पुत्रक राजा बनकर बैठा और अपने प्रभाव से स्वसुर (पाटनी के पिता) को बश में करके समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का शासक बन गया ।। ७७ ।।

इस प्रकार यह दिव्य नगर पुरवासियों सहित माया से रचा गया, जो पाटलिपुत्र नाम से लक्ष्मी और सरस्वती का क्षेत्र हुआ" || ७८ ॥

वरचि ने कहा - 'हे काणभूते, इस प्रकार उपाध्याय वर्ष के मुख से यह अपूर्व और विचित्र कथा सुनकर हम सब आश्चर्य से आनन्दित हुए ' ॥ ७९ ॥ 

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट - विरचित कथासरित्सागर के प्रथम लम्बक का

तृतीय तरंग समाप्त |



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