जिगर की फिकर

जिगर की फिकर

लिवर शरीर का वह अंग है जो 70 फीसदी तक खराब होने पर भी काम करता है। यही इसकी खूबी भी है। लेकिन कभी-कभी इसी वजह से लिवर में हुए इन्फेक्शन और सूजन का जल्दी पता ही नहीं चलता। इसलिए लिवर की सेहत के लिए सचेत रहना जरूरी है। हेपटाइटिस (लिवर की सूजन) की वैक्सीन की बात हो या फिर इसकी जांच की। इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। हेपटाइटिस का इन्फेक्शन कितनी बड़ी चुनौती है, बचने के उपाय क्या हैं, एक्सपर्ट्स से बात कर जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

आज हेपटाइटिस डे 
पर विशेष

क्यों है चुनौती हेपटाइटिस B

दुनियाभर में
-25.4 करोड़ लोग हेपटाइटिस B से हैं इन्फेक्टेड
-11 लाख से ज्यादा लोग हर साल मारे जाते हैं इससे

भारत में
-2.98 करोड़ से ज्यादा लोग हैं इन्फेक्टेड11% मरीज पूरी दुनिया के भारत में
-95% तक से भी ज्यादा सफल है हेपटाइटिस B वैक्सीन। दुनिया में 80 फीसदी से ज्यादा लिवर कैंसर के मामले हेपटाइटिस B की वजह से ही होते हैं।

हेपटाइटिस दो शब्दों से मिलकर बना है। जिनका मतलब होता है लिवर या जिगर में सूजन यानी इन्फ्लेमेशन। सीधे शब्दों में कहें तो जब लिवर में किसी भी वजह से सूजन हो जाए तो उस स्थिति को हेपटाइटिस कह सकते हैं। यह सूजन हेपटाइटिस वायरस A, B, C, E की वजह से हो या फिर शराब या फैटी लिवर की वजह से, कहा तो जाएगा हेपटाइटिस ही। दरअसल, शब्द से पहले उस कारण को जोड़ दिया जाता है जिसकी वजह से लिवर में सूजन होती है। जब किसी वायरस की वजह से हेपटाइटिस होता है तो उसे वायरल हेपटाइटिस कहते हैं। मसलन: Hep A, Hep B आदि। वैसे तो ये सभी परेशान करते हैं। ये जानलेवा भी हो सकते हैं। कुछ उपाय के बाद डरने की जरूरत नहीं, सचेत रहना चाहिए।

केस-1
 ऐसे पता लगा कि उन्हें है एक्यूट हेपटाइटिस
विकास (बदला हुआ नाम) एक पार्टी में गए थे। वहां उन्होंने खूब पार्टी एंजॉय की। अच्छे-से खाना खाया। देर रात लौटने के बाद वह सो गए और जब दूसरे दिन उठे तो उन्हें पेट कुछ भारी-भारी सा महसूस हुआ। उन्हें लगा शायद पार्टी में ज्यादा खा लेने की वजह से ऐसा महसूस हो रहा है। ऑफिस तो जाना ही था। ऑफिस में काम करते हुए उन्हें उलटी जैसा महसूस होने लगा, लेकिन उलटी नहीं हुई। घर आने के बाद हल्का लूज मोशन हुआ। फिर दूसरे दिन विकास ने ऑफिस से छुट्टी ले ली और सोचा कि शायद घर पर आराम करने से ठीक हो जाए। साथ ही घरेलू नुस्खों से कुछ राहत तो हुई, लेकिन फिर पेट में दर्द होने लगा। विकास ने सोचा, चलो एक दिन और देख लेते हैं। खुद ही कुछ दवाओं का सेवन किया जो गलत था। इनसे भी कुछ राहत तो मिली। चौथे दिन पेट में तेज दर्द होने लगा और लगातार कई बार उलटी हुई। स्थिति ऐसी हो गई कि घर वालों ने विकास को हॉस्पिटल में एडमिट करवा दिया। वहां पर कई तरह की जांच हुई। इनमें LFT (लिवर फंक्शन टेस्ट) भी शामिल था। LFT की रिपोर्ट में SGPT (यह एक तरह का एंजाइम है जो लिवर के डैमेज होने के बारे में बताता है। इसकी ज्यादा मौजूदगी का मतलब है लिवर को ज्यादा नुकसान पहुंचा है।) का स्तर सामान्य से 30 गुणा से ज्यादा था। साथ ही दूसरे मार्कर भी काफी बढ़े हुए थे। डॉक्टरों ने फौरन ही हेपटाइटिस वायरस की स्क्रीनिंग यानी टेस्ट किया।
रिजल्ट में विकास हेपटाइटिस E पॉजिटिव था यानी वह एक्यूट हेपटाइटिस का मरीज हो चुका था। अच्छी बात यह थी कि स्थिति को काबू किया जा सकता था। इलाज हुआ और विकास अब बेहतर हैं। दरअसल, हेपटाइटिस E और काफी हद तक हेपटाइटिस A वायरस भी ज्यादा परेशान नहीं करता। यह 3 से 5 हफ्तों में ठीक हो जाता है। हालांकि, कभी-कभी इलाज में देरी होने से लिवर फेल होने की आशंका भी हो सकती है। विकास ने जब अपने इस इन्फेक्शन की वजह डॉक्टर से पूछी तो उन्होंने बताया कि आजकल बरसात का मौसम है। बाहर का खाना और पीना, दोनों में इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा है। आपने बताया था कि कहीं बाहर पार्टी में खाना खाया था। इसलिए आजकल खानपान पर काफी ध्यान देने की जरूरत है।

केस-2
ब्लड डोनेशन की वजह से वह बच पाए
हॉस्पिटल के बेड पर लेटे हुए ब्रजेश (बदला हुआ नाम) पिछले 3 दिनों से यही सोच रहे थे कि काश! उन्होंने हेपटाइटिस B की वैक्सीन लगवा ली होती तो यह इन्फेक्शन उन्हें परेशान न करता। दरअसल, ब्रजेश ओवरवेट हैं। उनकी लंबाई और उम्र के अनुपात में उनका वजन करीब 20 किलो ज्यादा है। वह फैटी लिवर के पुराने मरीज हैं। इसके अलावा ब्रजेश शुगर व बीपी के भी करीब 10 साल पुराने मरीज हैं। उस पर से हेपटाइटिस B के इन्फेक्शन ने स्थिति कुछ ज्यादा खराब कर दी। उनके करीब 35 से 40 फीसदी लिवर का ही नुकसान हुआ था। 
दरअसल, अपने दोस्तों को देखते हुए ब्रजेश ने भी ब्लड डोनेट करने का सोचा। वैसे तो यह काम बहुत ही अच्छा है। शायद इसलिए भी ब्रजेश को अपने इन्फेक्शन के बारे में पता चला। ब्लड डोनेशन से पहले शख्स के खून की जांच होती है। ब्रजेश को वहीं पता चला कि वह हेपटाइटिस B पॉजिटिव हैं। इतना ही नहीं, इस वायरस ने ब्रजेश के लिवर को डैमेज भी किया था। जब ब्रजेश डॉक्टर के पास पहुंचे तो लिवर कितना खराब हुआ है, यह पता लगाने के लिए टेस्ट हुए। जांच में यह निकला कि SGPT का स्तर सामान्य से 2 गुना है। 
क्रॉनिक हेपटाइटिस (ज्यादातर हेपटाइटिस B और C) के मामले में SGPT का लेवल 2, 3 गुना तक ही अमूमन बढता है। साथ ही, क्रॉनिक हेपटाइटिस में अलग से कोई सिम्पटम आए यह जरूरी नहीं, मसलन: पेट दर्द, उलटी आदि का होना जरूरी नहीं है। यही वजह है कि इसके इन्फेक्शन के बाद मरीज को पता ही नहीं होता कि वह हेपटाइटिस B पॉजिटिव है। कुछ मामालों में तो हेपटाइटिस के लक्षण उभरने में 20 साल से ज्यादा का वक्त भी लग जाता है जब किसी शख्स को यह पता नहीं होता कि वह इन्फेक्टेड है तो अनजाने में ही इन्फेक्शन फैलाता रहता है। डॉक्टर ने ब्रजेश को उनके परिवार के सभी सदस्यों को हेपटाइटिस B की वैक्सीन फौरन ही लगाने के लिए कहा है ताकि दूसरे सदस्यों में यह न फैले।

लिवर को हर इन्फेक्शन से बचाना है क्योंकि...
-किडनी या फेफड़ों से अलग लिवर खुद को छोटे-से बड़ा बना सकता है। इसे रीजेनरेशन पावर भी कहते हैं। इसके लिए शरीर में कम से कम 25% असल लिवर का मौजूद रहना जरूरी है। इसे मूल स्वरूप में लौटने में अमूमन 2 से 3 हफ्तों की ही जरूरत होती है।
-यह शरीर में ग्लूकोज को नियंत्रित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। अगर किसी को फैटी लिवर की परेशानी है तो वह टाइप-2 डायबीटीज का मरीज भी हो सकती है। जब हम कुछ खाते हैं तो यह ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में बदल देता है। जब लिवर में ग्लूकोज ज्यादा मात्रा में जमा होने लगता है तो यह फैट में बदल जाता है। इसके बाद ही फैटी लिवर का मामला बनता है। फैटी लिवर होने के बाद धीरे-धीरे कई तरह की परेशािनयों की शुरुआत हो जाती है। पहले कलेस्ट्रॉल बढ़ना शुरू होता है। एक बार जब कलेस्ट्रॉल खून की नलियों में जमा होने लगता है तो बीपी बढ़ना शुरू हो जाता है। इसी के साथ शुगर की समस्या भी दस्तक दे सकती है। इसलिए लिवर को दुरुस्त जरूर रखना चाहिए।
-प्रोटीन हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी है। प्रोटीन हमारे शरीर का बिल्डिंग ब्लॉक्स (जिससे शरीर मूल रूप से बना है) कहलाता है। कई बार हमारा शरीर इतना प्रोटीन पैदा नहीं कर पाता कि उसकी जरूरत पूरी हो। ऐसे में लिवर ही वह प्रोटीन बनाता है।
-लिवर विटामिन का भंडारण भी करता है। A,D,E,K ये फैट में घुलने और पचने वाले विटामिन हैं। लिवर में 5 फीसदी से कम फैट रहना भी जरूरी है ताकि इन विटामिनों को शरीर सही तरीके से जज्ब कर सके। इसके लिए जरूरी है कि हम हर दिन एक चम्मच शुद्ध देसी घी का सेवन करें। 
लिवर आयरन और कॉपर को भी स्टोर करता है और इसे शरीर को जज्ब करने में मदद करता है। एक और खास बात यह कि विटामिन D को ऐक्टिव फॉर्म में लाने के लिए 
भी इसकी जरूरत होती है ताकि शरीर कैल्सियम को भी जज्ब कर सके।

कितनी तरह के हेपटाइटिस वायरस: A, B, C, D और E

 ऐसे फैलते हैं हेपटाइटिस A और E, यह है बचाव

हेपटाइटिस A- यह ज्यादातर छोटे बच्चों को होता है।
ऐसे फैलता है: संक्रमित पानी और खाने आदि से। 
इसके लक्षण: भूख न लगना, कमजोरी, दस्त, पेट में तकलीफ, गहरे पीले रंग का यूरिन, बुखार और पीलिया।
क्या हैं उपाय: इसकी वैक्सीन बहुत कारगर है। अमूमन बचपन में लग जाती है। वैसे यह बहुत नुकसान नहीं पहुंचाता। दवा से, आराम करने और सही खानपान से अमूमन 3 से 5 हफ्तों में ठीक भी हो जाता है। जब इन्फेक्शन 15 साल की उम्र के बाद हो, तब ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है।

हेपटाइटिस E- अमूमन बड़ों में होता है। ज्यादा खतरनाक नहीं होता। इसकी वजह से एक्यूट हेपटाइटिस होता है। करीब 0.5 फीसदी मामलों में यह खतरनाक होता है।
ऐसे फैलता है: संक्रमित पानी और खाने आदि से।
इसके लक्षण: भूख न लगना, हल्का या तेज फीवर, पेट में दर्द, उलटी, पीलिया आदि।
ये हैं उपाय: इन्फेक्शन के बाद इसका इलाज हो सकता है। इसका इन्फेक्शन भी अपने आप खत्म हो जाता है, लेकिन इस दौरान परहेज, सही खानपान और दवा की जरूरत पड़ती है।

 ऐसे रोक सकते हैं हेपटाइटिस B और C को फैलने से
इन दोनों के होने का तरीका लगभग एक जैसा है, इसलिए इन दोनों को एक समझ सकते हैं। इनके फैलने का सबसे बड़ा जरिया है बॉडी फ्लूड। संक्रमित शख्स के साथ सेक्शुअल रिलेशन बनाने से भी।
-संक्रमित खून चढ़ाने से
-संक्रमित मां से उसके होने वाले बच्चे में
-संक्रमित का टूथब्रश या रेजर यूज करने से
-इस्तेमाल की गई सीरिंज या डेंटल टूल्स से
-लंबे समय तक बहुत ज्यादा शराब पीने से। 

ऐसे नहीं फैलता है यह वायरस
कई लोग यह मान लेते हैं कि हेपटाइटिस B या C के मरीज से बात करने से भी यह बीमारी फैल सकती है जबकि ऐसा नहीं है। किसी से बात करने से या यहां तक साथ रहने से और साथ खाने से भी नहीं फैलता। हां, यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर ऐसे मरीज के साथ रह रहे हैं तो वैक्सीन के तीनों डोज जरूर लगवा लें।

Hep. B वैक्सीन है सभी के लिए जरूरी
हेपटाइटिस B वैक्सीन असरदार है। यह 95 फीसदी से भी ज्यादा सफल है। साल 2011 से यह पूरे देश में मिलती है। यह बीमार शख्स में लिवर कैंसर होने से रोकती है। दुनिया में 80 फीसदी से ज्यादा लिवर कैंसर के मामले हेपटाइटिस B की वजह से ही होते हैं। ऐसे में 3 डोज की वैक्सीनेशन से इस खतरनाक बीमारी से भी छुटकारा मिल सकता है।

वैक्सीन लगाने की जरूरत सबसे ज्यादा किसे है:
-सभी नवजात को लगवाना जरूरी, अगर किसी को लगनी छूट गई हो तो उसे बाद में जरूर लगवा देनी चाहिए।
-मेडिकल फील्ड और भीड़ में काम करने वाले लोगों को
-जिनकी किडनी खराब हो और डाइलिसिस होता हो
-जिन्हें बार-बार अपना खून बदलवाना पड़ता हो। ब्लड कैंसर जैसे मामलों में ऐसा करना पड़ता है।
-प्रेग्नेंसी के दौरान जरूर लगवानी चाहिए। दरअसल, हेपटाइटिस B वायरस मां से उनके होने वाले बच्चे तक ट्रांसफर हो जाता है।  
-ड्रग्स लेने वालों या जिन्होंने पहले ड्रग्स ली हो
-शरीर पर टैटू बनवाने वालों को
-असुरक्षित सेक्स किया हो तो
-जिनकी फैमिली में किसी को हेपटाइटिस B पहले या अभी हुआ हो।
-शुगर के मरीज और फैटी लिवर के मरीज क्योंकि इनका लिवर पूरी तरह स्वस्थ नहीं होता।
-अगर किसी को यह वैक्सीन पहले लग चुकी है तो उसे नहीं लगवानी चाहिए।

हेपटाइटिस D: अगर किसी को हेपटाइटिस B है तो उसे हेपटाइटिस D का इन्फेक्शन भी हो सकता है। यह सीधे इन्फेक्शन नहीं फैलाता। इसलिए इसकी चर्चा भी ज्यादा नहीं होती और हेपटाइटिस B वैक्सीन से ही हेपटाइटिस D के इन्फेक्शन से भी बचाव हो जाता है।

हेपटाइटिस C का है ऐसे होता है इलाज
वैसे तो हेपटाइटिस B की तुलना में इसका इन्फेक्शन रेट कम है, लेकिन नुकसान पहुंचाने में यह वायरस भी पीछे नहीं। 
-इसके लिए फिलहाल कोई वैक्सीन नहीं है। 
-अगर सही समय पर पता चल जाए तो इसका इलाज मुमकिन है। 
-इसे दवा से ठीक किया जा सकता है। सही दवा, सही पोषण और आराम करने से मरीज ठीक हो जाता है। 
-उम्मीद है कि देश से 2030 तक इसे पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। पूरी दुनिया में इजिप्ट ऐसा देश है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह हेपटाइटिस C से मुक्त होने के करीब पहुंच चुका है। जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे 12 देश हैं जो 2030 तक इस वायरस से मुक्त हो जाएंगे।

कितने अंतराल पर वैक्सीन

नवजात
पहली डोज          दूसरी डोज        तीसरी डोज
0 (जन्म पर)     1 महीने की उम्र में        दूसरी के 6 महीने बाद 

बच्चों और बड़ों को
पहली डोज      दूसरी डोज      तीसरी डोज
0 (आज)      1 महीने बाद        6 महीने बाद 
नोट: कई डॉक्टर बड़ों को 4 डोज लगाने की सलाह देते हैं।

लिवर की सेहत के लिए जरूरी टेस्ट
LFT (Liver Function Tests)
लिवर के काम को जांचने के लिए सबसे कॉमन टेस्ट यही है। इस टेस्ट को कराकर देखते हैं कि लिवर की क्या स्थिति है। इससे SGPT लेवल का भी पता चलता है। इसका कितना बढ़ा है, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हेपटाइटिस वायरल इन्फेक्शन हो सकता है या नहीं। इसके बाद हेपटाइटिस टेस्ट करवाना चाहिए।
खर्च: 400 से 700 रुपये  कैसे: खून से  रिपोर्ट: उसी दिन

HEPATITIS B SURFACE ANTIGEN
इससे हेपटाइटिस B के इन्फेक्शन के बारे में पता चलता है।
खर्च: 1200 से 1500 रुपये  रिपोर्ट: 1 से 2 दिन

HEPATITIS C ANTIBODY (Anti-HCV)
खर्च: 300 से 1600 रुपये  रिपोर्ट: 1 से 2 दिन  

Serum Albumin
जब लिवर से बना प्रोटीन एल्बुमिन का लेवल खून में कम होने लगता है, तब इस टेस्ट से ही पता चलता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।
खर्च: 150 से 200 रुपये  कैसे: खून से  रिपोर्ट: उसी दिन

Liver Fibrosis
इस टेस्ट को लिवर का गोल्डन टेस्ट भी कहते हैं। इससे लिवर को हो चुके नुकसान के बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है।
खर्च: 4000 से 6000 रुपये  कैसे: अल्ट्रासाउंड।

जब टेस्ट में आ जाए हेपटाइटिस B पॉजिटिव तो...
अगर अब तक इसके लक्षण न उभरे हों तो मुमकिन है कि वायरस ने लिवर का ज्यादा नुकसान न किया हो। इसलिए सबसे पहले किसी गैस्ट्रो एक्सपर्ट डॉक्टर से मिलें। फिर डॉक्टर लिवर की असल स्थिति के बारे में, कितना नुकसान हुआ है इसके लिए दूसरे टेस्ट भी कराएंगे। इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है। यह वायरस 20 साल तक बिना लक्षण उभरे दबा हुआ रह सकता है। हां, कुछ चीजों का जरूर ध्यान रखना चाहिए।
-डॉक्टर के संपर्क में रहना। नियमित रूप से चेकअप करवाना।
-नियमित रूप से दवा का सेवन करना। इस दौरान एंटिवायरल दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं लिवर को आगे होने वाले नुकसान को रोकने में सक्षम होती हैं।
-लाइफस्टाइल को बदलना बहुत जरूरी है। एक्सरसाइज करना, फाइबर (मौसमी सलाद, मौसमी फल: वैसे तो 1-1 कटोरी ले सकते हैं, लेकिन डॉक्टर से पूछकर लेना जरूरी है), साबुत अनाज (रागी, ज्वार आदि), कम फैट खाने की सलाह दी जाती है। अगर शुगर न हो तो डॉक्टर मीठे फल खाने के लिए कहते हैं ताकि लिवर को ज्यादा मेहनत न करनी पड़े।
-इन्फेक्शन न फैले इसका ध्यान रखना है। अपने परिवार का वैक्सीनेशन जरूर करवा देना चाहिए।
-सिगरेट, शराब पीने की बात तो दूर, हाथ भी नहीं लगाना।

ध्यान दें: जब लिवर 70 फीसदी तक खराब हो जाता है तो ऐसे शख्स को सिरोसिस या फिर कैंसर भी हो सकता है। ऐसे में मरीज के पेट में पानी भरना, पेट में तेज दर्द, कुछ भी न पचा पाना, बहुत ज्यादा कमजोरी, लगातार फीवर रहना जैसे लक्षण हो सकते हैं। 

टैटू के साथ ले आते हैं हेपटाइटिस वायरस
टैटू बनवाते समय छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने से न सिर्फ हेपटाइटिस से बचाव हो जाता है बल्कि एचआईवी के संक्रमण से भी बच सकते हैं। दरअसल, टैटू बनाने के दौरान पतली निडल से इंक स्किन के अंदर डाली जाती है। वह ब्लड के संपर्क में आती है। अगर वह निडल पहले से ही किसी हेपेटाइटिस इन्फेक्टेड शख्स की स्किन के अंदर पहुंचकर उसके ब्लड के संपर्क में आ चुकी है तो उसके आगे जो लोग टैटू गुदवाएंगे, उन्हें हेपटाइटिस B या C के इन्फेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा रहेगा। इससे एचआईवी होने का खतरा भी रहता है। 

ऐसे बचें टैटू वाले इन्फेक्शन से
-ऐसे किसी भी पार्लर से टैटू नहीं गुदवाएं, जिसे लाइसेंस न मिला हो। सड़क किनारे टैटू बनवाने में यह खतरा बढ़ जाता है।
-वैसे तो ज्यादातर आर्टिस्ट्स ग्ल्वस पहनते हैं। सिर्फ ग्लव्स पहनना काफी नहीं है। उसे ग्लव्स पहनने से पहले हाथों को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। यह भी ध्यान रहे कि आर्टिस्ट हर बार नए ग्लव्स पहनकर ही टैटू बनाए। 
-सिर्फ टैटू मशीन को साफ करने से काम नहीं चलेगा। मशीन को हर बार स्टरलाइज करना भी जरूरी है। कई बार किसी टॉवेल से पोंछकर मशीन को साफ कर दिया जाता है। यह हेपटाइटिस से बचने के लिए पर्याप्त सफाई नहीं है।
-स्टरलाइजेशन प्रक्रिया में केमिकल के इस्तेमाल से या गर्मी से बैक्टीरिया या वाइरस को मारा जाता है। 
-जहां पर टैटू गुदवाना हो, शरीर के उस हिस्से की सफाई भी जरूरी है। उसे भी केमिकल से स्टरलाइज करें।

हेपेटाइटिस से फ्री इंडिया कैसे मुमकिन?
नैशनल वायरल हेपटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम (NVHCP) को भारत सरकार ने 2018 में लॉन्च किया था। इसका मकसद सभी वायरल हेपटाइटिस A, B, C, D और E से होने वाली मौत में कमी और 2030 तक हेपटाइटिस C पूरी तरह खत्म करना है। यह प्रोग्राम अब भी जारी है।
-हेपटाइटिस A का वैक्सीनेशन सभी के लिए हो।
-नए जन्मे बच्चों को 100 फीसदी हेपटाइटिस B का वैक्सीनेशन
-हेपटाइटिस B का वैक्सीनेशन हो सभी के लिए
-जब ब्लड जांच हो तो साथ में हेपटाइटिस की भी स्क्रीनिंग हो जिसमें हेपटाइटिस B और C जो क्रॉनिक बीमारियां पैदा करते हैं और इनके लक्षण जल्दी नहीं उभरते, ऐसे इन्फेक्शन के बारे में भी जानकारी मिल सके ताकि इनका इलाज भी सही समय पर शुरू हो सके।
-जब तक इन्फेक्टेड लोग मौजूद रहेंगे, तब तक यह इन्फेक्शन फैलता रहेगा। इसलिए ऐसे लोगों का सही इलाज बेहद जरूरी है। साथ ही, नए इन्फेक्शन न हों इसके लिए वैक्सीनेशन 100 प्रतिशत होना चाहिए।

कहां से लें मदद
नैशनल वायरल हेपटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम
मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर
वेबसाइट: nvhcp.mohfw.gov.in
टोल फ्री नंबर: 1800 11 6666
कब कर सकते हैं कॉल: सुबह 7 से रात 11 बजे तक
नैशनल हॉलिडे पर बंद, बाकी हर दिन ओपन।

एक्सपर्ट पैनल
-डॉ. एस. के. सरीन, डायरेक्टर, ILBS
-डॉ. (कर्नल) अरुण कुमार, सीनियर कंसल्टेंट, गैस्ट्रो, PSRI
-डॉ. पीयूष रंजन, वाइस चेयरमैन-गैस्ट्रो, सर गंगा राम हॉस्पिटल
-डॉ. अमित मिग्लानी, HOD गैस्ट्रो, एशियन हॉस्पिटल
-डॉ. अमितेश कुमार, सीनियर कसल्टेंट, गेस्ट्रो
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