वे दर्द दें तो...
'इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है...' परेशानी की वजह कई बार खुद की समस्याएं होती हैं तो कई बार ऐसे लोग भी होते हैं जो परेशानियां पैदा करते हैं। कभी अपने शब्दों से तो कभी कामों से। उन्हें दूसरों को परेशानी में देखना या दुखी देखना अच्छा लगता है। वे इसे एंजॉय करते हैं। ऐसे लोग रिश्तों में, ऑफिस में, पड़ोस में, सफर में कहीं भी मिल सकते हैं। जब ऐसे लोगों से अक्सर साबका होने लगे तो निदान खोजना जरूरी हो जाता है। टॉक्सिक लोगों के साथ किस तरह बर्ताव करना चाहिए, क्या करना चाहिए और क्या नहीं? देश के बेहतरीन एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

8 खास बातें
1. अपनी ज़िंदगी में दूसरों का दखल कितना हो, यह तय होना जरूरी है। सीधे कहें तो अपनी ज़िंदगी का रिमोट दूसरों के हाथों में न जाने दें।
2. अगर बाउंड्री बनाना आसान न हो तो इस कान से सुनना और दूसरे से निकालना सही है यानी बोलते रहो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
3. परिवार में कोई शख्स अगर हर वक्त कमियों, नाकामियों पर फोकस करता हो तो समस्या की जड़ तक पहुंचें।
4. कई बार चीजें सामूहिक तौर पर कही जाती हैं, मसलन: सोशल मीडिया पर। ऐसी बातों को पर्सनली लेना सही नहीं।
5. जहां पर NO कहने की जरूरत हो, वहां हर बार बातों को टालना या कुछ न बोलना सही नहीं है।
6. अगर गुस्सा बढ़ गया है, दूसरों की बातों को सुनने की क्षमता कम हुई है तो यह टॉक्सिसिटी बढ़ने के लक्षण हो सकते हैं।
7.  थोड़ी-बहुत टॉक्सिसिटी या निगेटिविटी सभी में होती है, लेकिन वह दूसरे को शब्दों से या स्वभाव से नुकसान न पहुंचाए तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं है।8. कहते हैं The Best way to respond to a Toxic Character is not responding. सीधे शब्दों में टॉक्सिक लोगों की बातों पर ध्यान मत दें।

खुद टॉक्सिक हूं, कैसे समझें
-जब बात-बात पर गुस्सा आए।
-दूसरों की बातें सुनना ही न चाहूं।
-अपनी उपलब्धियों को इतना बढ़ाकर सुना दूं कि सामने वाले को छोटे होने का अहसास होने लगे।
-रिश्तेदार और सच्चे दोस्त भी जब दूर जाने लगें।
-दूसरों को दुखी देखकर खुश होने लगूं।ध्यान दें: अगर कोई ऊपर बताई हुई बातों को महसूस करे तो उसे तसल्ली के लिए किसी ऐसे शख्स से अपने बदले हुए बर्ताव के बारे में जरूर पूछना चाहिए जिसे वह सच्चा और अपना हितैषी मानता हो। अगर फिर भी संतुष्टि न मिले तो उसे किसी साइकॉलजिस्ट की मदद लेनी चाहिए। अगर एक साइकॉलजिस्ट की काउंसलिंग से फायदा न हो तो दूसरे के पास भी जाना चाहिए। मुमकिन है कि पहला साइकॉलजिस्ट उसकी परेशानी को न समझ पाया हो। 

हकीकत यह है कि किसी को दुखी देखकर दुखी होना इंंसानी फितरत है। पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरोंं को दुखी देखकर खुश होते हैंं। अगर कोई सुखी है, खुश है तो वे इससे चिढ़ जाते हैंं और उसे दुखी करने के जतन करते रहते हैंं। 

कैसे पहचानें कि वह है घातक इंसान
ऐसे लोगों के साथ वक्त बिताकर अमूमन अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे टाइम बेकार किया और अपनी एनर्जी का नुकसान भी किया। इसलिए इन्हें एनर्जी वैम्पायर भी कहा जाता है। नीचे कुछ खास तरह के टॉक्सिक लोगों की प्रजाति बताई गई है:

कंट्रोलर
-कुछ लोग बेहद टॉक्सिक होते हैं। ऐसे लोग निगेटिविटी में कमी नहीं रखते। हमेशा निगेटिव बातें ही करते हैं। नीचा दिखाते हैं।
-सोच ऐसी होती है कि अपना काम बनता और भाड़ में जाए जनता। ये जुगाड़ु होते हैं। काम निकालने के लिए खूब झूठ बोलते हैं।
-स्वार्थी तो सभी होते हैं, लेकिन इतना नहीं होना चाहिए कि उससे दूसरों का नुकसान हो जाए। ये आत्ममुग्ध यानी नार्सिस्ट होते हैं।
-दूसरों को काबू करने में लगे रहते हैं।
-दूसरों के मान-सम्मान की परवाह नहीं करते, उनकी वैल्यू नहीं करते।
-अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरों पर अक्सर नहीं, हमेशा ही फोड़ते हैं।
-दूसरों को ठेस पहुंचाकर, कमेंट करके अपना एंटरटेनमेंट करते हैं।

ड्रामेबाज 
-ऐसे लोग नाटक या नौटंकी बहुत करते हैं। छोटे-छोटे मुद्दों को बड़ा बनाने में महारथ रखते हैं। एक तरह से ये ड्रामा मैग्नेट होते हैं यानी इनको ड्रामा करने में मजा आता है।
-ऐसे लोग यह चाहते हैं कि उनकी बातों को तो गंभीरता से लिया जाए, लेकिन वे सामने वाले की बातों पर ध्यान नहीं देते।
-ऐसे लोग विक्टिम गेम खेलते हैं। दूसरों से जलन महसूस करते हैं। खुद को हमेशा पीड़ित दिखाते हैं और अपना काम निकालने में माहिर होते हैं।

अंदर से अच्छे लेकिन देते हैं टेढ़े या उलटे जवाब
-सामान्य सवालों का भी टेढ़ा जवाब देते हैं। मसलन: आपने खाना खाया? इसका जवाब आएगा, 'नहीं भी खाया तो मर नहीं जाएंगे या 'तुम खाना देकर अहसान नहीं करते' आदि।
-किसी ने पूछ लिया कि ऑफिस में क्या हुआ? तो जवाब आएगा, 'तुम्हें क्या फर्क पड़ता, तुम तो घर में रहती हो या रहते हो।'
-ऐसे लोगों को कई बार अपने जवाब पर पछतावा होता है, लेकिन घमंड की वजह से ये माफी नहीं मांग पाते।
ध्यान दें: ऊपर जो लक्षण बताए गए हैं, ये कभी-कभार किसी खास स्थिति में या गुस्से में उभर सकते हैं, लेकिन ऐसा अक्सर नहीं हो सकता। सामान्य लोग जब ऊपर बताई हुई टॉक्सिक ऐक्टिविटी करते हैं तो परिस्थिति सामान्य होने पर उन्हें पछतावा भी होता है। वे इसके लिए माफी भी मांगते हैं और वादा भी करते हैं कि आगे इस तरह की चीज दोबारा नहीं होगी।

यहां कुछ ऐसी घटनाएं और कहानियां दी जा रही हैं, जिनसे हमें ऐसे लोगों को पहचानने और उनके निपटने का सही तरीका जानेंगे:

1. करीबी ऐसे करते टॉर्गेट, बनाते हैं मजाक
ऋचा (बदला हुआ नाम) ने 10वीं बोर्ड में 100 पर्सेंट नंबर हासिल किए। परिवार में सभी खुश थे। रिजल्ट आने के कुछ ही दिन बाद एक रिश्तेदार के यहां शादी थी। उस फंक्शन में शामिल होने के लिए ऋचा, उनके पापा और उनकी मम्मी भी पहुंचीं। वहीं पर ऋचा के दूर के मामा ब्रजेश (बदला हुआ नाम) भी पहुंचे थे। उस फंक्शन से पहले ऋचा की उन मामाजी से मुलाकात नहीं हुई थी। हां, उनके बारे में सुन जरूर रखा था। वहीं मामाजी ने भी ऋचा के 100% नंबरों के बारे में सुन रखा था। ब्रजेश थे टॉक्सिक सोच वाले और बात-बात में गुस्सा करने वाले। उन्हें दूसरों की खुशी में शामिल होने में कभी मजा नहीं आता था। अपनी निगेटिव सोच का उदाहरण उन्होंने तुरंत पेश कर दिया। ऋचा का मजाक बनाने के लिए उनके पापा और घर में मौजूद दूसरे लोगों के सामने ही अपने पास बुलाया। पहला सवाल यही पूछा कि कितने पर्सेंट नंबर आए बोर्ड में? ऋचा ने कहा 100 पर्सेंट। इस पर ब्रजेश ने कटाक्ष किया ...तो क्या हुआ? आजकल हजारों बच्चों के आते हैं। इसमें उड़ने वाली बात क्या है? इस पर ऋचा उदास हो गईं, उन्होंने कहा कि मैं कहां उड़ रही हूं। चूंकि मामाजी के स्वभाव के बारे में ऋचा के पापा को पहले से ही पता था। उन्होंने फौरन ही मुस्कुराते हुए मामाजी से कहा- 'हां, बड़ी बात तो नहीं है, लेकिन अपने रिश्तेदारों में दूर-दूर तक किसी के आजतक 100 क्या 99 पर्सेंट भी नहीं आए हैं? आपके या आपके बेटे को भी नहीं मिले।' ऋचा के पापा ने आगे कहा कि हमें बच्चों से क्या, बड़ों से भी इस तरह की बातें करने से बचना चाहिए। आप बड़े हैं इसलिए आशीर्वाद बनाकर रखें। इतना कहकर ऋचा के साथ वह वहां से उठ गए।
यही है टॉक्सिसिटी: मामाजी जी को इस तरह नहीं बोलना था। एक बच्चे की इतनी शानदार परफॉर्मेंस पर इस तरह कटाक्ष करना कहीं से भी सही नहीं।
इस तरह से जवाब देना जरूरी: ब्रजेश को सही समय पर सही जवाब देकर, आगे फिर से इस तरह के कटाक्ष करने से पहले एक तरह की चेतावनी और हिदायत दे दी गई कि अगर उन्होंने फिर ऐसी कोशिश की तो सटीक जवाब दिया जाएगा। वैसे कोई मामा ही नहीं, ऐसी निगेटिव भूमिका में कोई चाचा, फूफा, दादा, पड़ोसी, ऑफिस में काम करने वाला भी हो सकता है।
अगर नहीं देते जवाब तो: मामाजी के कटाक्ष 
पर अगर ऋचा के पापा ने जवाब न दिया होता तो मुमकिन है ऋचा को स्ट्रेस हो जाता। वहीं मामाजी 
किसी दूसरे बच्चे या फिर किसी दूसरे रिश्तेदार का भी मजाक बनाते।

2. एक की तारीफ से दूसरे को नीचा दिखानातारीफ अच्छी चीज है। सभी को पसंद आती है। लेकिन कई लोग तारीफ का इस्तेमाल भी दूसरों को नीचा दिखाने के लिए करते हैं। प्रभाष और विवेक (दोनों के बदले हुए नाम) सगे भाई हैं। दोनों की उम्र में 1 साल का फर्क है, लेकिन दोनों ही 9वीं में पढ़ते हैं। दोनों की आपस में खूब बनती है। प्रभाष जहां बोलने में अच्छा है, वहीं विवेक कम बोलता है। इनके एक चाचा (प्रवीण) हैं। वह विवेक को ज्यादा पसंद करते हैं और प्रभाष को कम। दरअसल, प्रभाष ने एक बार अपने चाचा की शिकायत अपने पापा (सुशील- बदला हुआ नाम) से कर दी थी कि चाचा कॉम्पिटिशन की तैयारी कम करते हैं और सिगरेट खूब पीते हैं, साथ ही घूमते भी रहते हैं। इस वजह से प्रवीण को डांट पड़ी थी। इससे नाराज होकर प्रवीण ने प्रभाष पर तंज कसना शुरू कर दिया। उसकी छोटी गलतियों को भी बड़ा बताना शुरू कर दिया। चाचा ने जान-बूझकर विवेक की तारीफ प्रभाष के सामने शुरू कर दी। जहां तारीफ की जरूरत न हो, वहां भी खूब तारीफ करने लगे। 
इसका मकसद एक ही था कि प्रभाष के आत्मविश्वास को तोड़ दिया जाए। इसकी शिकायत प्रभाष ने अपने पापा से करने की कोशिश की। पापा ने प्रभाष से कहा कि तुम भी प्रवीण के पीछे ही लगे रहते हो। इधर शुरुआत में अपने चाचा से मिली तारीफ विवेक को अच्छी लगी, लेकिन कुछ ही समय में विवेक को समझ आने लगा कि चाचाजी प्रभाष को नापसंद करते हैं। साथ ही, वह महसूस करने लगा कि प्रभाष कुछ उदास रहने लगा है। उसने चाचा को कई बार अप्रत्यक्ष तौर पर कहा भी कि मेरी इतनी तारीफ न करें। लेकिन चाचा ने बात नहीं मानी। 
आखिरकार विवेक ने यही बात अपने पापा को भी बताई। पर पापा ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसी दौरान स्कूल में पैरंट्स-टीचर मीटिंग हुई। प्रभाष की क्लास टीचर ने प्रभाष के पापा और मम्मी को बताया कि पहले की तुलना में प्रभाष कम बोलने लगा है। अब क्लास में जवाब भी कम देता है। इसके बाद उनके सामने सभी चीजें साफ हो गईं। 
उनके पापा ने प्रवीण यानी अपने भाई को समझाया कि इस तरह का बर्ताव ठीक नहीं है और सख्त लहजे में कहा कि आगे ऐसा हरगिज नहीं होना चाहिए यानी सख्ती से NO कहा। इस बार उन्होंने टालने की कोशिश नहीं की। इसके बाद प्रवीण ने अपना स्वभाव बदल लिया।
ऐसे भी आ सकती है टॉक्सिसिटी: किसी घटना की वजह से भी टॉक्सिसिटी आ सकती है। खासकर परिवार में इसके प्रति सचेत होना जरूरी है।
NO कहना जरूरी: टॉक्सिक लोगों से लड़ने के लिए, उनके प्रभाव से निकलने के लिए कई बार सख्ती से NO कहना बहुत जरूरी हो जाता है। हर जगह YES से काम नहीं चलता।

3. ऑफिस में ऐसे-ऐसे लोग...
 ऑफिस में निगेटिविटी की कहानियां काफी मिलती हैं। वहां सबसे ज्यादा कॉम्पिटिशन भी होता है। ऑफिस में कुछ लोग ऐसे जरूर होते हैं जो हर चीज में निगेटिविटी निकाल लेते हैं। उदाहरण के लिए जॉब अच्छी चल रही है। कहीं किसी कंपनी ने कुछ एंप्लाई को निकाल दिया। कुछ लोग इस घटना को कुछ लोग इतना बढ़ाकर बोलते हैं कि दूसरे डर जाएं। सीधे कहें तो माहौल खराब करना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोग अपने शिकार को भी खोजते रहते हैं। मसलन: अगर किसी का अप्रेजल अच्छा न हुआ हो तो भड़का कर अपने बॉस के खिलाफ ही कर देते हैं। इनके अलावा दूसरों के हर काम में कमी निकालना इनकी फितरत होती है। जीवेश एक संस्थान में पिछले 10 बरसों से काम कर रहे हैं। अपने काम में वह हमेशा से औसत या औसत से नीचे रहे हैं। वहीं जब कोई अच्छा काम करता है, खूब मेहनत करता है तो वह उसे भी हतोत्साहित करते हैं कि यहां मेहनत करने से कुछ नहीं होगा। मुझे देखो, आजतक प्रमोशन नहीं दिया। यह सब बोलकर निगेटिव माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उनकी इस फितरत के बारे में ऑफिस के ज्यादातर लोगों को पता है। यही कारण है कि ऑफिस में जब किसी नए एंप्लाई की जॉइनिंग होती है तो कुछ दिनों के अंदर ही उसे जीवेश के बारे में खुद ही या फिर ऑफिस के एंप्लाई से पता चल जाता है। इसके बाद वह जीवेश से हाय, हलो वाला ही रिश्ता रखना शुरू कर देता है। हां, अगर नया आने वाला एंप्लाई भी निगेटिव है तो जीवेश से उसका अच्छा मेलजोल हो जाता है। ऐसे उदाहरण परिवार या रिश्तेदारों में भी मिल जाते हैं। ये लोग हमेशा दूसरों की शिकायत ही करते रहते हैं। अगर ये शिकायतें नहीं करेंगे तो इनका काम ही नहीं चलेगा। यहां इस बात को समझना भी जरूरी है कि जब वह शख्स आपके सामने दूसरे की शिकायत करता है तो स्वाभाविक है कि दूसरों के सामने वह आपकी भी शिकायत करता ही होगा। ऐसे लोगों से दूरी जरूरी है।
अंदर से हो जब कोई निगेटिव: अगर कोई शख्स अंदर से ही निगेटिव हो तो फिर उसमें बदलाव की कोशिश बेमानी हो जाती है। ऐसे लोगों से जितना कम हो सके बातचीत में शामिल होना चाहिए। नहीं तो पॉजिटिविटी से ज्यादा तेजी से निगेटिविटी ही फैलती है।
तब रिश्ते की सीमा है जरूरी: अगर टॉक्सिक या निगेटिव लोगों के साथ रहना मजबूरी हो तो ऐसे लोगों के साथ वक्त की सीमा और शब्दों यानी बातचीत की सीमा भी जरूर तय होनी चाहिए। कभी भी जिरह या बहस में उलझना फायदे का सौदा नहीं है।

4. सोशल मीडिया पर निगेटिव लोग बहुतअगर आजकल टॉक्सिक लोगों की लंबी लिस्ट देखनी हो तो सोशल मीडिया पर जाएं। उस पर ऐक्टिव रहें। किसी भी खास घटना पर कुछ लिख दें। इसके बाद कमेंट सेक्शन को देखकर यह समझ में आ जाएगा कि लोग कितने निगेटिव हो चुके हैं। अजित अक्सर अपनी राजनीतिक समझ के अनुसार एक खास विचार से प्रभावित होकर सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते रहते हैं। ऐसी पोस्ट पर उन्हें काफी कमेंट आते हैं। इसके बाद वह हर कमेंट का जवाब देने कोशिश में रहते हैं। अलग-अलग निगेटिव या टॉक्सिक कमेंट देखकर इनके अंदर भी कई बार निगेटिविटी आ जाती है। साथ ही इनका ढेर सारा वक्त भी इसी में चला जाता है। इस वजह से वह परेशान रहने लगे। हालांकि, इन्हें यह अहसास ही नहीं था कि इनकी परेशानी की वजह सोशल मीडिया से आई निगेटिविटी है। उनकी निगेटिव सोच का असर परिवार पर भी हुआ। वह अपने घर में भी सोशल मीडिया स्टाइल में बहस चालू कर देते थे।       
एक दिन उनकी मुलाकात एक पुराने दोस्त से हुई। वह उनके स्वभाव को जानता था। उसने सीधे तौर पर अजित से कहा कि तुम निगेटिव होते जा रहे हो। कोई खास वजह? तब अजित को अहसास हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है। फिर उनका ध्यान सोशल मीडिया पर गया। उन्होंने खुद को सोशल मीडिया पर समेटा। अब चीजें काफी बेहतर हुई हैं। इसके अलावा लोगों को वॉट्सऐप हाइजीन का भी ध्यान रखना चाहिए। दरअसल, वॉट्सऐप पर कई ग्रुप बने होते हैं। हर ग्रुप में कोई न कोई निगेटिव मेसेज आता ही रहता है। जब कोई शख्स मेसेज पढ़ता है तो उस पल के लिए ही वह शख्स बुरी सोच का शिकार हो जाता है। खासकर फैमिली ग्रुप में निगेटिव बातें, शिकायतें खूब चलती हैं। जब ऐसा हर दिन कम से कम 50 बार हो तो निगेटिविटी 50 बार हावी होने लगेगी।
ऐसे आ जाती है टॉक्सिसिटी: अगर ज्यादा निगेटिव सोच के बीच रहेंगे तो मुमकिन है कि टॉक्सिसिटी अंदर आने लगेगी, जैसा अजित के साथ भी हुआ।
किसी अच्छे, सुलझे हुए शख्स की मदद अहम: अगर अपने बर्ताव में बदलाव दिखे या फिर ऐसा महसूस हो कि पारिवारिक कलह ज्यादा होने लगी है या फिर रिश्तेदार कुछ दूर जाने लगे हैं तो किसी ऐसे शख्स से बात करें जो सीधे तौर पर आपमें हुए बदलाव के बारे में ईमानदारी से बता सके। आपकी कमियों को समझा सके।

5. ऐसे फायदा उठा लेते हैं शराफत काकुछ लोग इमोशनल स्पॉन्ज होते हैं। ये हर एक की परेशानी में घुस जाते हैं और खुद बहुत ज्यादा दुखी हो जाते हैं। पर कई बार अपनी इसी फितरत की वजह से दूसरों की निगेटिव सोच के शिकार भी हो जाते हैं। ये मदद करने जाते हैं लेकिन लोग इनका फायदा उठा लेते हैं। इस वजह से खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। फिर तनाव में आ जाते हैं। इसलिए इमोशनल स्पॉन्ज न बनें। राघव की फितरत है कि वह हर किसी की परेशानी में घुस जाते हैं। दूसरों के दुखों को सुनकर बहुत दुखी हो जाते हैं। उनके दुख से बहुत ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं। इस वजह से उनके अंदर नकारात्मक विचार आने लगते हैं। ऐसे लोग भी फिर जाने-अनजाने निगेटिविटी फैलाने लगते हैं। वे अपने परिवार में भी निगेटिव बातें करने लगते हैं। वे डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। हालांकि, राघव डिप्रेशन में तो नहीं गए लेकिन उन्हें आर्थिक नुकसान जरूर उठाना पड़ा। राघव ने अपने रिश्तेदारों को उधार देकर मदद की, लेकिन लोगों ने उन्हें बेवकूफ समझा। जब पैसा लौटाने करने की बारी आई तो सभी गायब। एक बार राघव के पापा की तबियत खराब हुई। उन्हें पैसों की सख्त रूरत थी। जिन लोगों को उन्होंने पैसे दिए थे, सभी से अपना पैसा वापस मांगा। सभी ने बहाना करके मना कर दिया। फिर राघव को महसूस हुआ कि उन्होंने ऐसे लोगों की मदद करके गलत किया। वह अपनी आदत पूरी तरह तो नहीं बदल पाए लेकिन यह तय कर लिया कि एक खास अमाउंट से ज्यादा वह किसी को नहीं देंगे। वह अमाउंट इतना ही होगा जिसकी वापसी न हो तो ज्यादा परेशानी न हो। साथ ही, उन्हें यह बात भी समझ में आ गई कि वह सभी की समस्याओं का निपटारा नहीं कर सकते। जितना मुमकिन हो, उतनी ही मदद कर सकते हैं। इससे उनके अंदर की बढ़ती हुई टॉक्सिसिटी भी कम होने लगी।
अहम है मदद करना: हर चीज की एक हद होती है। हद के पार बेहद होता है और बेहद से जब हम और हमारा परिवार प्रभावित होने लगे तो इस पर विराम लगाना जरूरी है। दूसरों की मदद करने के दौरान अपने इमोशन को काबू में रखना भी अहम है।
हम भगवान नहीं: यह समझना होगा कि एक शख्स दुनिया के हर एक शख्स की मदद नहीं कर सकता। हर एक का दुख दूर नहीं कर सकता।

एक्सपर्ट पैनल
-डॉ. समीर पारिख, सीनियर सायकायट्रिस्ट
-डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, सीनियर सायकायट्रिस्ट
-याधव मेहरा, कॉर्पोरेट ट्रेनर
-रागिनी सिंह, साइकोथेरेपिस्ट काउंसलर
-डॉ. अनुराग आर्य, डर्मेटॉलजिस्ट और काउंसलर
-गीतांजलि शर्मा मैरिज-रिलेशनशिप काउंसलर
-पूजा प्रियंवदा, रिलेशिनशिप काउंसलर
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