5.101. || YT || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा
5.101. || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट - विरचित कथाओं को हम आपको सुनाने जा रहे हैं।
प्रथम कहानी, मंगलाचरण से प्रारंभ होती है। चलिए और कहानी सनिए।
प्रथम तरङ्ग'
मंगलाचरण'
शिवजी की गोद में बैठी हुई पार्वती के दृष्टिपाशों से कह रहीं हैं कि कामदेव द्वारा वेष्टित शिवजी का श्यामवर्ण कंठ आपको सम्पत्ति प्रदान करे || १ ||
संध्याकालीन नृत्य के समय आकाश में बिखरी हुई प्राचीन तारिकाओं को शुंड से हटाकर, सीत्कार के बिन्दुओं से मानों नवीन तारिकाओं की सृष्टि करते हुए गणेशजी आपकी रक्षा करे || २ || मैं समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए दीपशिखा (लो) के समान सरस्वती भगवती को प्रणाम करके बृहत्कथा के सार का संग्रह करता हूँ ॥ ३ ॥
प्रस्तावना
इस ग्रंथ में 18 लंबक हैं। ||९|| ये कथाएं बृहत्कथा नामक मूलग्रन्थ का संग्रह है। इसमें थोड़ा सा भी अन्तर नहीं है। हाँ, विस्तृत कथाओं को संक्षिप्त जरूर किया गया है। ताकि लंबी कथाओं को आसानी से स्मरण में रखा जा सके।
भाषा का भेद होने के कारण थोड़ा बहुत परिवर्तन हो सकता है परंतु सार वही रखने का प्रयास किया है भाषा पैशाची थी और इसकी संस्कृत है )
शिव और पार्वती का संवाद
किन्नर, गन्धर्व और विद्याधरों की निवासभूमि तथा समस्त पर्वतों का सम्प्राद् हिमालय पर्वत जगत प्रसिद्ध है। इस बात को कौन नहीं जानता। ।।१३।। पर्वतों में इस हिमालय का माहात्म्य इतना बढा-चढ़ा है कि साक्षात् त्रि-जगत-जननी पार्वती, उनकी पुत्री बनीं ॥ १४ ॥
इस हिमालय का उत्तर शिखर कैलाश के नाम से जगत प्रसिद्ध है, जो सहस्रों योजन के भू-भाग को आक्रान्त करके फैला हुआ है ।। १५ ।।
यह कैलास शिखर, अपनी अमल-धवल कान्ति से मन्दराचल को देखता और हँसता है कि उसके द्वारा क्षीरसमुद्र का मन्थन होने पर भी वह मेरे समान सुधा-धवल अर्थात अमृत के समान श्वेत न हो सका और मैं बिना किसी प्रयत्न शुभ्र अर्थात पूर्णतया श्वेत हूँ ।। १६ ।।
उस कैलास शिखर पर, स्थावर-जंगम सृष्टि के स्वामी, विद्याधरो और सिद्धों से सेवित, महेश्वर शिव, अपनी अर्धांगिनी पार्वती के साथ निवास करते हैं ।। १७ ।। जिस शिवजी के पीतवर्ण एव ऊँचे जटाजूट पर स्थित अभिनव चन्द्रमा उदयाचल के सन्ध्याकालीन पीतवर्ण की शोभा धारण करता है ॥१८॥
जिन शिवजी ने अन्धकासुर के हृदय में शूल भोंकते हुए एक साथ ही तीनों लोकों के हृदय से शूल को सदा के लिए निकाल दिया ।। १९ ॥
जिन शिव के चरणों में प्रणाम करने के कारण, मुक्तामणियों में नख के अग्रभाग के प्रतिबिम्बित होने के कारण, सुर और असुर राज ऐसे मालूम होते हैं कि उन्हें प्रसाद-रूप में अर्धचन्द्र प्राप्त हुआ हो ॥ २० ॥
किसी समय लोकनाथ स्वामी को कैलाश पर्वत पर एकान्त में बैठे देखकर उनकी प्राणवल्लभा पार्वती ने, उन्हें स्तुतियों से प्रसन्न किया ॥ २१ ॥
पार्वती के स्तुति वचनों से प्रसन्न होकर, और उसे गोद में बैठाकर चन्द्रशेखर शिवजी ने पूछा, 'कहो, में तुम्हारे लिए कौन-सा प्रिय कार्य करूं'। ॥२२॥
तब पार्वती ने कहा - 'स्वामिन्, हे देव, यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो, तो कोई नवीन कथा सुनाओ' ॥२३॥
यह सुनकर शिवजी ने कहा- 'प्रिये, समय में भूत, वर्तमान और भविष्य की कौन-सी ऐसी बात है, जिसे तुम न जानती हो ॥२४॥
इतना कहने पर भी शिववल्लभा पार्वती ने स्वामी से पुनः कथा सुनाने का आग्रह किया, क्योकि मानिनी स्त्रियों का मन, सदा ही प्रियपति के प्रणय की अभिलाषा रखता है ।। २५ ।।
शिवजी ने पार्वती का आग्रह देखकर उसे प्रसन्न करने की दृष्टि से उसी (पार्वती) के सम्बन्ध की स्वल्प कथा अर्थात छोटी सी कथा का वर्णन किया ॥ २६ ॥
ब्रह्मा और नारायण शिव के दर्शन
एक बार ब्रह्मा और नारायण मेरे दर्शन के लिए निकले और सारी पृथ्वी पर घूमते हुए हिमालय की उपत्यका में आये ॥२७॥
तभी दोनों में मेरा जनक कौन? और बड़ा कौन ऐसा कहकर बहस शुरू हो गई। तब नारायण ने कहा, मेरे जनक तो भगवान सदाशिव हैं और वे ही तुम्हारे पितामह हैं क्योंकि तुम्हरा जन्म मेरी नाभि से उत्पन्न कमल से हुआ है अतः तुम मेरे पुत्र हुए और भगवान शिव तुम्हारे पितमह।
तभी हिमालय की तटवर्ती भूमि में उन्होंने अपने सामने एक महान् ज्वालामय लिंग को देखा। इस पर ब्रह्मा जी और विष्णु जी उसके ओर-छोर का पता जानने का प्रयास करने लगे। परंतु असफल रहे हैं।
तभी आकाशवाणी हुई जोओ और इस लिंग के ओर-छोर का पता लगा कर आओ। इससे तुम्हारी शंकाओं का समाधान हो जाएगा।
इस पर ब्रह्मा जी सिर की तरफ अर्थात ऊपर की तरफ गए और नारायण नीचे की तरफ अर्थात चरणों की तरफ गए। दोनों को कुछ नहीं मिला तो नारायण तो चुपचाप ऊपर लौट आए जबकि ब्रह्मदेव ने सिर को न पाकर बड़ा बनने के लालच में गाय और केतकी के पुष्प को झूठ बोलने के लिए मना लिया।
जैसे ही दोनों मिले आकाशवाणी हुई।
नारायण क्या तुम्हें इसका अंत मिला। नारायण ने हाथ जोड़कर मना कर दिया।
ब्रह्मदेव क्या तुम्हें इसका आरंभ मिला।
हां मुझे इसका आरंभ मिला है।
कैसे भरोसा किया जाए। आकाशवाणी ने पूछा।
मुझे पता था कि तुम्हें विश्वास नहीं होगा इसलिए मैं दो साक्षी अपने साथ लाया हूंँ।
ओह !
ब्रह्मदेव ने कहा कि तुम्हें विश्वास नहीं है तो इस गाय से पूछो । मैं इसी साक्षी के लिए इसे लेकर आया हूं।
तब भगवान विष्णु ने गाय से पूछा कि तुमने भगवान शंकर का सिर देखा तो उसने भी हां कह दिया। इस प्रकार गाय ने एक रोटी के चक्कर में झूठ बोल दिया।
एक बार फिर आकाशवाणी हुई गाय झूठ बोल रही है ।
तो ब्रह्मा जी पुनः बोल, तुम्हें विश्वास नहीं है तो मेरे पास एक और साक्षी है। इस केतकी के फूल से पूछो, तब भगवान विष्णु ने केतकी से पूछा कि हे केतकी ! क्या ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर का सिर देखा है। तो केतकी ने खुशबूदार बनने के चक्कर में झूठ बोल दिया।
तब शंकर जी ने प्रकट होकर कहा कि गौमाता तूने जगत की माता होकर झूठ बोला है। तेरे शरीर से पूरा विश्व पोषित होता है इसलिए तेरा पूरा शरीर पूजा जाएगा लेकिन तूने मुखसे झूठ बोला है इसलिए, तेरा मुख नहीं पूजा जाएगा। सब लोग सभी देवों की तीर्थ स्थलों की मंदिरों की परिक्रमा आगे से प्रारंभ करेंग। पर गौ माता तूने अपने मुंह से झूठ बोला है इसलिए तेरी परिक्रमा मुख से नहीं बल्कि तेरी पूछ से शुरू होकर तेरी पूंछ पर ही समाप्त हो गई।
संसार में किए जाने वाले सभी दान वस्त्र दान अन्न दान आगे से से करेंगे लेकिन गौमाता का दान अर्थात गोदान पीछे से तेरी पूछ पकड़ कर किया जाएगा। इसलिए आज भी गौ माता का दान गाय की पूंछ पकड़कर किया जाता हैं।
गौमाता को अपनी गलती का एहसास हो गया तो गौ माता ने भगवान शिव से क्षमा मांग ली और शिव ने क्षमा कर दिया।
फिर भगवान भोलेनाथ ने भगवान विष्णु के समक्ष केतकी के झूठ बोलने पर गुस्सा आ गया और वह बोले तुमने विष्णु और मेरे सामने झूठ बोला है इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू सारे देवों ऊपर चढ़ेगा लेकिन मेरे ऊपर कभी नहीं चढ़ेगा।
यदि भूल से भी जो तुझे मेरे ऊपर चढ़ेएया तो उसे सहस्रों गौ हत्या के पाप के बराबर पाप लगेगा।
तब भगवान भोलेनाथ बोले, "हे विष्णु ! तुमने मेरे समक्ष न होने पर भी सबके सामने सत्य बोला। इसलिए आज से तुम्हारा नाम सत्यनारायण होगा। और सत्यनारायण के नाम से जो तुम्हारा कथा पूजन हवन आदि करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
परंतु ब्रह्मा के पांचवें मुख ने अभी भी शिव के लिए उल्टा सीधा बोलना जारी रखा। शिव ने ब्रह्मा जी के पांचवें मुख को बार-बार शांत रहने के लिए कहा लेकिन वह चुप नहीं हुआ।
तब गुस्से में आकर उन्होंने पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्मा के पांचवें मुख को काट दिया। और सिर के जमीन में गिरते ही वह बड़ अर्थात वट के वृक्ष में बदल गया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के के पांचवें सिर से बड़ अर्थात वट के वृक्ष का जन्म हुआ।
हे देवी ! मुझे उन दोनों पर दया आ रही थी इसलिए मैंने उनसे एक बार फिर कहा, आप दोनों मेरे अंशु और मैं आप दोनों को एक मौका और देना चाहता हूं और मैंने उनसे एक बार फिर से कहा कि 'वर मांगो' ॥ २९ ॥
ऐसा सुनकर ब्रह्मा ने कहा कि 'आप मेरे पुत्र हो, । इसी कारण ऐसा निन्दित वर माँगने के कारण ब्रह्मा निन्दित होकर अपूज्य हो गये ॥ ३० ॥
तब विष्णु ने मुझसे वर माँगा कि हे भगवन् ! मैं सदा आपकी सेवा में तत्पर रह सकूं, ऐसा वर दीजिए ॥ ३१ ॥
सती का पार्वती के रूप में जन्म
तभी से वे नारायण तुम्हारे रूप में उत्पन्न होकर मेरे अर्धांग बने। शक्तिमान् मेरी शक्ति स्वय नारायण है ||३२||
और तुम पूर्व जन्म की मेरी पत्नी हो, शकरजी के ऐसा कहने पर पार्वती ने पूछा—' में पूर्व जन्म में तुम्हारी स्त्री कैसे हुई, यह बतलाओ ॥ ३३ ॥
पार्वती के पूर्वजन्म को संक्षिप्त कथा
तब शिव ने उत्तर दिया- "देवि, प्राचीनकाल में दक्ष प्रजापति की तुम और अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुई ॥ ३४ ॥
पूर्व जन्म में तुम प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी। तब तुम्हारा नाम सती था और दक्ष ने तुम्हे मेरे लिए दिया और चन्द्रमा व धर्म आदि अन्य देवताओं को दूसरी कन्याएँ प्रदान कीं ।
एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें समस्त देवों को आमंत्रित किया गया। उसने अपने यज्ञ में अपने सभी जामाताओं को भी निमन्त्रित किया। उसने तुम और मुझ में से किसी को आमंत्रित नहीं किया।
तुम मन ही मन पिता का यज्ञ देखने व माता और बहनों से मिलने के लिए उत्सुक होने लगी। मैने तुम्हे बहुत समझाया फिर सारी बातें विचार कर भगवान मैने तुमसे कहा था, 'देवी! प्रजापति दक्ष किसी कारण हमसे रूष्ट हैं। इसी कारण इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया है और उनके यज्ञ भाग भी उनको अर्पित किए हैं, परंतु उन्होंने जानबूझकर हमें यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार ठीक नहीं है।'
परंतु तुम पर मेरे इस उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । यज्ञ में जाने व बहनों से मिलने की व्यग्रता कम होने की स्थान पर और बढ़ गई। मैने तुम्हारी उत्सुकता व आग्रह देखा तो मैंने तुम्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।
जब तुम वहां पहुंची तो तुम्हें तिरस्कार ही मिला। वहां पर तुमसे आदर के साथ बात करने के स्थान पर सब मुंह फेर रहे थे। बहने व्यंग और उपहास भरे शब्द बोलती थी। केवल माता ने ही तुम्हें गले लगाया ।
जब, तुमने अपने पिता से पूछा कि हे पिता जी! तुमने मेरी बहनों के सभी पतिदेवों को बुलाया है परंतु मेरे पति को क्यों नहीं बुलाया ?
जब उन्होंने यज्ञ स्थल पर तुमको देखा तो उन्होंने मेरे प्रति कटु शब्दों में दक्ष ने कहा - 'मुंडो की माला पहननेवाले ( अपवित्र ) तुम्हारे पति को पवित्र यज्ञ में कैसे बुलाया जाय। '
उन्होंने और भी अनेक बातें मेरे अपमान में ऋषियों, महात्माओं व देवों के समक्ष कहीं।
यज्ञ स्थल पर ऋषियों, महात्माओं व देवों के समक्ष भगवान मेरे प्रति तिरस्कार का भाव देखकर तथा पिता से अपने मेरे प्रति अपमानजनक वचन सुनकर तुम्हारा हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा।
इस प्रकार पिता का जहरीली सुई के समान चुभने वाले उत्तर को सुनकर, इस पापी शरीर से क्या लाभ -- ऐसा सोचकर तुमने रोष से उस शरीर का परित्याग का निर्णय लिया।
तुम मेरा यह अपमान सह न सकीं और तुम दक्ष से बोली, 'अरे मूढ ! यह शरीर तुम से ही प्राप्त हुआ है इसलिए मैं इसे अभी त्यागती हूं ।' यह कहकर तुमने उसी समय अपने शरीर की हवन कुंड में आहुति दे दी। लेकिन अग्निदेव ने तुम्हें जलाने से मना कर दिया। तब तुमने योगाग्नि के द्वारा स्वयं को भस्म कर दिया।
हे देवि, तुम्हारे शरीर त्याग करने के वज्रपात के समान दुखद घटना से क्रुद्ध होकर मेरे गणों ने दक्ष यज्ञ को नष्ट भ्रष्ट कर दिया। और उसके पश्चात् तुम हिमालय के घर में इस तरह उत्पन्न हुई, जैसे क्षीर-समुद्र से चन्द्रकला उत्पन्न हुई थी ||३९||
पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण ही तुम्हें 'पार्वती' कहा जाता है।
देवि, स्मरण करो, उसके अनन्तर में हिमालय पर्वत पर तप करने के लिए आया और तुम्हें तुम्हारे पिता ने मुझ अतिथि की सेवा के लिए नियुक्त किया ||४०||
त्रिपुरासुर को मारने के लिए मेरे द्वारा पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से देवताओं द्वारा प्रेरित कामदेव ने उस अवसर पर मुझे काम से दग्ध किया था ॥ ४१ ॥ तब मेरे नेत्र खोलने ही कामदेव भस्म हो गया।
कामदहन के उपरान्त धैर्यंशालिनी तुमने कठोर तप करके मुझे खरीद लिया और तुम्हारी प्राप्ति के लिए ही मैंने उसे सहन किया ||४२ ||
इस प्रकार पूर्व जन्म में तुम मेरी पत्नी थी। अब और क्या कहूँ ?" इतना कहकर शिवजी चुप हो गए। शिव के चुप हो जाने पर पार्वती क्रुद्ध होकर बोली ||४३||
पार्वती का प्रणय-कोप अर्थात गुस्सा होना
'तुम बहुत चालाक हो, मेरी प्रार्थना पर भी मनोहर कथा नही सुना रहे हो। तुम एक ओर गंगा को धारण किये हो और दूसरी ओर सन्ध्या को नमस्कार करते हो, यह मैं जानती हूँ ||४४ ||
पार्वती के व्यग्य वचन सुनकर शिवजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और दिव्य कथा सुनाने का वचन दिया। इससे पार्वती प्रसन्न हुई ।।४५ ॥
शिवजी को उद्यत देखकर पार्वती ने स्वयं आज्ञा दी कि यहाँ कोई न आवे और आज्ञानुसार नन्दी के द्वारा प्रवेश बन्द कर देने पर भगवान शिवजी ने कथा कहना प्रारम्भ किया ॥ ४६ ॥
पुनः कथा का उपक्रम
शिवजी कहने लगे 'हे देवि ! देवता सदा सुखी रहते हैं और मनुष्य नित्य दुःखित रहते हैं। इसलिए उनके चरित्र उत्कृष्ट रूप से मनोहर नहीं होते। अत में दिव्य और मानुष दोनो प्रकृतियों से मिश्रित एक विद्याधरी नाम के व्यक्ति का चरित्र तुम्हें सुनाता हूँ।'
शिवजी यह कह ही रहे थे कि उसी समय उनका एक परम कृपापात्र, उनका मनोरंजन करनेवाला गण पुष्पदन्त अपने मित्र मालवंत के साथ वहां आ गया तो द्वार पर बैठे हुए नन्दी ने उसे रोका ।।४७, ४८, ४९ ।।
तब माल्यावंथ ने पुष्पवंत को उसके आनंद अर्थात शरीर रहित होने की याद दिलाई। तब पुष्पवंत ने सोचा कि बिना कारण हो मेरे ऐसे अनंग व्यक्ति का भी निषेध किया जा रहा है। ' इस कौतूहल के कारण पुष्पदन्त योगशक्ति द्वारा तुरन्त अन्दर पहुँच गया ॥ ५० ॥ उसने अन्दर प्रवेश कर शिवजी द्वारा वर्णन किये जाते हुए सात विद्याधरों के अपूर्व अद्भुत चरित्र सुने ॥५१॥
और पुष्पदन्त ने, शिवजी के मुख से सुनकर सात विद्याधरो के उस अद्भुत चरित्रों को, जाकर अपनी पत्नी जया को जा सुनाया ॥५२॥
पुष्पदन्त की पत्नी जया, पार्वती की सखी थीं । भला स्त्रियों में वाणी का संयम कहाँ सम्भव होता है ! जया ने पति (पुष्पदन्त ) से सुने हुए सात विद्याधरों के चरित्र को पार्वती को जा सुनाया। ||५३॥
जया से यह कथा सुनकर पार्वती ने क्रोधपूर्वक शिवजी से कहा 'मैं तुमसे पहले भी कहा था कि तुम बहुत चालाक हो। तुमने कोई अपूर्व कथा मुझे नहीं सुनाई, इस कथा को तो जया भी जानती है ॥ ५४ ॥
शिवजी ने समाधि द्वारा वस्तुस्थिति को समझकर पार्वती से कहा- 'देवी ! जब मैं तुम्हें कथा सुना रहा था, उस समय पुष्पदन्त ने योग द्वारा अलक्षित रूप से अन्दर आकर उस चरित्र को सुना लिया था, अन्यथा जया कैसे जानती ?' ॥५५॥
पुष्पदन्त और माल्यवान् को पार्वती का शाप
प्रिये ! उसी पुष्पदन्त ने सारी कथा अपनी पत्नी जया को सुना दी। अन्यथा इस कथा को कौन जानता है। यह सुनकर पार्वती ने अत्यन्त क्रोध के साथ पुष्पदन्त को बुलवाया ॥५६॥
व्याकुल हुए पुष्पदन्त को तथा उसे क्षमा करने की प्रार्थना करते हुए माल्यवान् नामक गण को पार्वती ने श्राप दिया कि जाओ ! तुम लोग मनुष्य-योनि में उत्पन्न होओ। ५७॥
शापान्त की घोषणा
जब वे दोनो गण जया के साथ पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा-प्रार्थना करने लगे, तब पार्वती ने शाप के अन्त की घोषणा करते हुए कहा "सुप्रतीक नाम का यक्ष, कुबेर के शाप से विन्ध्यारण्य में पिशाच बनकर रहता है, जो काणभूति के नाम से प्रसिद्ध है ।। ५९ ।।
हे पुष्पदन्त ! जब तुम उस काणभूति को देखकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करोगे और यह कथा उसे सुनाओगे, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे ||६०||
यह माल्यवान् जब काणभूति से इस कथा को सुनकर प्रसारित करेगा, तब काणभूति के मुक्त होने पर यह भी मुक्त हो जायेगा" ।। ६१ ॥
ऐसा कहकर नग-नन्दिनी अर्थात पर्वत-नन्दिनी पार्वती चुप हो गई और वे दोनों गण, उसी क्षण देखते-देखते ही अन्तर्धान हो गये ।। ६२ ।।
तदनन्तर कुछ समय बीतने पर पार्वतीने करुणायुक्त होकर शिव से पूछा कि देव ! मुझसे शापित वे दोनो गण कहाँ उत्पन्न हुए ? ।। ६३ ।।
तव चन्द्रशेखर शिव ने कहा--"प्रिये ! कौशाम्बी नाम की जो महानगरी है, उसमे पुष्पदन्त, वररुचि के नाम से उत्पन्न हुआ है । ६४॥ और वह माल्यवान् गण भी सुप्रतिष्ठित नाम के नगर में, गुणाढय नाम से उत्पन्न हुआ है। यही उन दोनों का वृत्तान्त है" ॥६५॥
भगवान् शिव, इस प्रकार कहकर, निरन्तर सेवा निरत सेवकों के अपमान से सन्तप्त पार्वती का मनोविनोद करते हुए, कैलास तट पर बने हुए कल्प-लता के कुंज-गृहों में निवास करने लगे ।।६६।।
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट - विरचित कथासरित्सागर का कयापीठ लम्बक नामक
प्रथम तरंग समाप्त।
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