श्वेत नीलकंठ

राधे राधे, जय श्री कृष्ण। श्री शिवाय नमस्तुभ्यं। श्री साम्ब सदा शिवाय नमः। 
आपका प्यारा मित्र ॐ  जितेंद्र सिंह तोमर एक बार फिर से आपके लिए लेकर आया है एक और नई कहानी। 

इस बार की कहानी भारत की आन, बान और शान महाराज विक्रमादित्य के राज्य से जुड़ी हुई है।

एक बार राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक ब्राह्मण आया। उसने विक्रमादित्य से दान में इतना धन मांगा कि वह आराम से जिंदगी बिता सके। 

विक्रमादित्य जैसा कि नाम के अनुसार पराक्रम में ही नहीं विधान देने में भी बहुत बड़े दानवीर थे। अतः उन्होंने उस ब्राह्मण को खेत खलिहान, गौशाला, घुड़साल सहित एक गांव का जागीरदार बना दिया और इन से मिलने वाले सभी पदार्थ पर उसका अधिकार कर दिया। 

पहले पहले तो ब्राह्मण ने बहुत मेहनत की किंतु धीरे-धीरे वह नौकरों के आधीन हो गया। उसके पास मौजूद जमीन बहुत उपजाऊ थी। धीरे-धीरे ब्राह्मण आलसी हो गया। उसके शरीर को आराम से  रहने की आदत हो गई। ब्राह्मण की अर्धांगनी उससे स्वयं का काम स्वयं करने को कहती पर वह उसकी एक नहीं सुनता।

अब वह ब्राह्मण दिनभर खाली बैठा रहता और गप्पें हांकता रहता। रिश्तेदार और काम करने वाले नौकर-चाकर उसके आलस्य का लाभ उठाते और उसके माल पर हाथ साफ करने में लगे रहते। इस वजह से उसकी आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई ।

एक दिन उसका पुराना मित्र उससे मिलने आया। उसकी कष्टमय अव्यवस्था देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ और उसने ब्राह्मण को समझाने की कोशिश की, किंतु उस पर कोई असर नहीं हुआ। 

एक दिन उस ब्राह्मण की पत्नी राजा विक्रमादित्य के पास गई और रोने लगी। विक्रमादित्य ने से पूछा बहन क्या बात है?

महाराज मेरे पति को अपने एक जागीर दी थी परंतु अब उस जागीर के होने के बावजूद भी हमारे घर का खर्चा नहीं चल पा रहा आप ही कुछ कीजिए।

अगले दिन विक्रमादित्य ने सैनिकों को भेज कर उस ब्राह्मण को राज दरबार में बुला लिया।

दरबार में सैनिकों द्वारा जबरदस्ती ले जाने पर ब्राह्मण बहुत डर गया। वह राजा से बोला महाराज मुझसे क्या गलती हो गई जो आपने मुझे जबरदस्ती यहां बुला लिया। 

हमारे एक मित्र का श्वेत नीलकंठ आपके ग्राम की तरफ उड़ कर गया है। उसे पकड़ कर लाना है यदि पड़कर नहीं ला पाए तो एक महीने बाद तुम्हें फांसी दे दी जाएगी।

महाराज मैंने तो ऐसा कोई पक्षी उधर नहीं देखा।

राजा ने ब्राह्मण से कहा, " मुझे मेरे मित्र ने बताया है कि हर दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले श्वेत नीलकंठ तुम्हारे खेत खलिहान, गौशाला, घुड़साल और घर में चक्कर लगाता है और बहुत जल्दी गायब हो जाता है।"

मरता क्या न करता। अगले दिन वह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले उठा और श्वेत नीलकंठ की खोज में अपने खेत खलियान, गौशाला, घुड़साल और घर में चक्कर लगाने लगा।

सबसे पहले वह नीलकंठ की खोज में अपने खेत गया। वहां उसने देखा कि उसका एक नौकर अनाज से बोरा भरकर ले जा रहा है। जैसे ही उसने मलिक को देखा तो वह अनाज का बोरा छोड़ कर भाग गया। उसने दूसरे नौकर को वह अनाज का बोरा अपने घर पहुंचाने का आदेश दिया।

अगले दिन उसने खेत खलियान घूमने के उपरांत सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले ही वह गौशाला पहुंचा तो उसने देखा कि उसका नौकर दूध की भरी बाल्टी चुराकर अपने घर ले जा रहा है। 

ब्राह्मण न उसे रोका और बोला, दूध कहां लेकर जा रहे हो। 

मालिक मैं इसे घर आप ही घर लेकर जा रहा था। 

ठीक है जाओ सीधे घर पहुंचाओ और गौशाला की ठीक से देखभाल करो।

अगले दिन खेत खलियान और गौशाला घूमने के उपरांत सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले ही वह घुड़साल पहुंच गया तो वहां बेहद गंदगी पाई और देखा नौकर सो रहा था। 

यह सोने का वक्त है क्या?

मालिक की आवाज सुनकर अस्तबल वाला नोकर उठकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। मलिक आगे से ऐसा नहीं होगा।

ठीक है घोड़ों की अच्छे से देखभाल करो। अस्तबल कितना गंदा है। कल से अच्छे से साफ सफाई होनी चाहिए, गंदगी में घोड़े बीमार पड़ जाएंगे। मैं राजा क्या जवाब दूंगा ?

ब्राह्मण के नौकर अब सजग होकर अपना काम ईमानदारी और फुर्ती से करने लगे। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठने पर अब ब्राह्मण आलस्य मुक्त और स्वस्थ हो गया। 

लेकिन उसे श्वेत नीलकंठ कहीं दिखाई नहीं दिया। वह पूरी लगन से ब्रह्म मुहूर्त में उठता और श्वेत नीलकंठ को ढूंढने के लिए जाता। पूरा एक महीना बीत गया परंतु उसे श्वेत नीलकंठ दिखाई नहीं दया। राजा ने अगले दिन पूरे परिवार के साथ ब्राह्मण को राजमहल में बुलवा लिया। 

हां तो ब्राह्मण देवता क्या हमारे मित्र के श्वेत नीलकंठ को ढूंढ कर लाए।

नहीं महाराज वह मुझे नहीं मिला। परंतु महाराज मैं गांव से कुछ सामन आपके लिए भेंट स्वरूप लेकर आया हूं। इसे स्वीकार करें। 

विक्रमादित्य मुस्कुराए और बोले। ब्राह्मण श्रेष्ठ यह आपका धन है। परंतु हमारा श्वेत नीलकंठ कहां है। मैं तुमको एक महीने का नहीं पूरे एक और वर्ष का समय देता हूं, श्वेत नीलकंठ ढूंढ कर लाने के लिए।

और विक्रमादित्य ठठाकर कर हंस पड़े। ब्राह्मण हाथ जोडकर और एक वर्ष के समय पाकर चला गया। लेकिन महाराज विक्रमादित्य के हंसने का कारण उसकी समझ नहीं आया परंतु ब्राह्मणी ने उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद दिया।

क्या आपके समझ में आया, यदि हां तो कमेंट करके बताएं ।

बस इतनी सी है आज की कहानी। यह कहानी आपको कैसी लगी कृपया हमें कमेंट करके अवश्य बताएं। 

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नमस्कार

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