पांच पण्डे और पांच अण्डे
।।पांच पण्डे और पांच अण्डे।।
शांति वार्ता विफल हो चुकी थी।
युद्ध के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं था।
इसलिए भगवान् ने दोनों सेनाओं को युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र चलने का निर्देश दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र को युद्ध भूमि के लिए इसलिए चुना था कि वाराणसी के स्थल में मुक्ति है, हरिद्वार के जल में मुक्ति है लेकिन कुरुक्षेत्र के जल, स्थल और वायु में भी मुक्ति है।
यहां स्थाण्वीश्वर शिवलिंग भगवान् से स्पर्शित वायु भी मुक्तिप्रद है।
युद्ध भूमि का चयन करके भगवान् श्री कृष्ण ने ऐसी चाक चौबंद व्यवस्था कर दी कि कोई योद्धा युद्धभूमि में आने के बाद यहां से भागने न पाए।
कुरुक्षेत्र भूमि के चारों दिशाओं में चार यक्षों को यक्षिणियों सहित निर्देश दिया --
हे यक्षो ! कुरुक्षेत्र के सुरक्षा घेरे की जिम्मेदारी तुम्हारी है। ध्यान रहे कि युद्ध की समाप्ति तक दोनों दलों का कोई भी योद्धा परिणाम से डरकर भागने न पाए।
यक्षों ने मायाचक्र से सीमाओं की अभेद्य सुरक्षा स्थापित कर दी।
युद्ध का शंख फूक दिया गया।
युद्ध से समस्त प्रकृति स्तब्ध हो गई।
दिशाएं घनघोर गर्जना से गूंज उठी।
उसी भूमि पर भयानक उत्पात् के लक्षण देखकर टिटिहरी दम्पत्ति व्याकुल हो उठा।
नवजात पांच अंडों को छोड़कर वे कहीं जा भी नहीं सकते थे, और युद्धभूमि में उनके अंडों के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।
अन्य उपाय न देखकर टिटहरी दम्पत्ति ने करुणा भरी पुकार लेकर करुणानिधि भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में कातर भाव रख दिए और जगदीश्वर को पुकार कर कहा -- हे नाथ ! हे शरणवत्सल! हमारे अंडों को इस युद्ध में सुरक्षा प्रदान करें।
भगवान् तो सबके हैं। वे सबकी भाषा समझते हैं।
उन्होंने अभी ताजा ताजा दिए गए गीता उपदेश को सत्य दिखला दिया और साबित किया की चाहे कितनी ही विपरीत परिस्थिति हों - "मामेकं शरणं व्रज " में कोई कटौती नहीं होगी।
भगवान् श्रीकृष्ण ने टिटिहरी के जोड़े को निर्भय करते हुए कहा - खग श्रेष्ठ ! निर्भय होकर जाइये !
जैसे पांच पंडे वैसे ही तुम्हारे अंडे !!
अर्थात् जैसे पांचों पांडव सुरक्षित रहेंगे वैसे ही तुम्हारे अंडे भी सुरक्षित रहेंगे !!
भगवान् के वचनों से प्रसन्न होकर टिटिहरी दम्पत्ति वापस लौट आया।
तभी युद्ध में दौड़ता हुआ एक विशाल हाथी वहां से गुजरा तो योद्धा के प्रहार से उसके गले में बंधा हुआ घंटा टूटकर उन अंडों पर गिर गया।
घंटे के नीचे वे अंडे सुरक्षित बच गए।
अठारह दिन का भीषण युद्ध गुजर गया। अठारह अक्षौहिणी सेना में दस योद्धा भी नहीं बचे।
लेकिन भगवान् के वचनानुसार पांच पंडे और टिटहरी के पांच अंडे सुरक्षित बच गए।
ब्रह्माण्डानि विनश्यन्ति देवा ब्रह्मादयस्तथा । कल्याणभक्तियुक्तश्च मद्भक्तो न प्रणश्यति ।
भगवान् ने ठीक ही कहा है कि ब्रह्मा आदि देव और समस्त ब्रह्माण्ड भी नष्ट हो सकता है लेकिन भक्ति से युक्त मेरा भक्त नष्ट नहीं होता है।
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