00. | पंचतंत्र | मित्रभेदोनाम प्रथमं तंत्रम् |

अथ मित्रभेदोनाम प्रथमं तंत्रम् ।

अथातः प्रारभ्यते मित्रभेदा नाम प्रथमं तन्त्रम् । 
यस्याय-मादिमः श्लोकः-

इसके अनन्तर मित्रभेद नामवाला प्रथम तन्त्रका प्रारम्भ करते हैं। जिसकी आदिमें यह श्लोक है-

वर्द्धमानो महान्लेहः सिंहगोवृषयोर्वने । 
पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १ ॥

सिंह और बैलका वनमे बढा हुआ महास्नेह चुगुल लालची जम्बुक (गीदड) ने विनाशकर दिया ॥ १॥.

तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र धर्मोपार्जितभूरिविभवो वर्द्धमानको नाम वणिक्पुत्रो बभूव । तस्य कदाचिद्रात्रौ शय्यारूढस्य चिन्ता समुत्पन्ना । "यत्प्रभूतेऽपि वित्ते अर्थोपायाश्चिन्तनीयाः कर्त्त-व्याश्चेति । यत उक्तञ्च

सो यह सुनाजाता है कि, दक्षिण देशमें महिलारोप्यनाम एक नगर है वहां धर्मसे महोधन उपार्जने कर्ता बर्द्धमान नामक, वणिक् पुत्र था। उसको एक समय रात्रीमे खाटमें लेटेहुए चिन्ता उत्पन्न हुई; कि "बहुत धन उत्पन्न होनेपरभी धनप्राप्तिका उपाय चिन्ता करना चाहिये कहाभी है-

न हि तद्विद्यते किश्चिद्यदर्थेन न सिद्धयति । 
यत्नेन मतिमॉस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २ ॥

ऐसी कोई वस्तु नहीं जो अर्थसे सिद्ध न होती हो इस कारण बुद्धिमान् यत्नसे अर्थका उपार्जन करे ॥ २ ॥

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । 
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥

जिसके धन है उसके मित्र हैं, जिसके धन है उसीके बंधु हैं, जिसके धन है लोकमे वही पुरुष है, जिसके धन है वही पंडित है ॥ ३ ॥

न सा विद्यां न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला । 
न तत्स्थैर्य्य हि धनिनां याचकैर्यन्त्र गीयते ॥ ४ ॥

न वह विद्या है, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कला है, न वह धनियोंकी स्थिरता है, जिसको याचक न गाते हो ॥ ४ ॥

इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते । 
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥ ९॥

इस लोकमें धनियोंके गैरभी स्वजन होजाते हैं, दरिद्रोंके कटुम्बी भी सदा दुर्जन होजाते हैं ॥ १ ॥

अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः । 
प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६ ॥

धनके वढनेसे और इधर उधर इकट्ठे होनेसे सब क्रिया प्रवृत्त होती हैं, जैसे पर्वतोसे नदिया (निकल कर सत्ब कार्य पूर्ण करती हैं) ॥ ६ ॥

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते । 
वन्द्यते यदवन्द्योऽवि स प्रभावो धनस्य च ॥ ७ ॥

अपूज्यभी (धनसे) पूजितै होता है, अंगम्यके निकटभी जाया जाता है, अनमस्कारी पुरुषभी वन्दन योग्य होता है, यह प्रभाव धनकाही है ॥ ७ ॥

अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि । एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥ ८ ॥

भोजन करने पर जैसे सब इन्द्रिय (समर्थ होती हैं) इसीप्रकार सम्पूर्ण कार्य धनसे (होते हैं), इस कारणसे धन सबका साधन कहा जाता है ॥ ८ ॥

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते । 
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥ ९॥

धनकी इच्छासे यह प्राणी श्मशानको भी सेवन करता है, निर्धन अपने उत्पन्न करनेवालेको भी छोडकर दूर जाता है ॥ ९॥

गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः । 
अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥

वृद्ध पुरुषोमेभी जिनके धन हैं वे तरुण हैं, जो धनसे हीन हैं, वे युवा अव-स्थामैव ही वृद्ध होते हैं ॥ १० ॥

स चार्थः पुरुषाणां ष‌ड्भिरुपायैर्भवति भिक्षया, नृप-सेवया, कृषिकर्मणा, विद्योपार्जनेन, व्यवहारेण, वणिक्क र्मणा वा । सर्वेषामपि तेषां वाणिज्येन अतिरस्कृतोऽर्थलाभः स्यात् । उक्तञ्च यतः-

वह धन पुरुषोंको छः उपायोंसे मिलता है, भिक्षा, राजसेवा, खेतीका कार्य, विद्याउपार्जन, लेनदेन वा वणिक्कर्मसे । इन सबमें वाणिज्यसे सर्वसम्मत लाभहोता है।

कृता मिक्षाऽनेकैर्वितरति नृपो नोचितमहो कृषिः क्लिष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्यातिविषमा । कुसीदादारिद्रयं परकर गतग्रन्थिशमना-न्न मन्ये वाणिज्यात्किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ११ ॥

अनेक पुरुषोने भिक्षा की है. राजाभी, योग्य वृति नहीं देता है, खेती क्लेशदायिनी है, विद्या गुरुक्की विनयवृत्तिसे अति विषम है, व्याजसे भी दरिद्र होता है, कारण कि, दूसरेके हाथमे आनेसे ग्रन्थिंशमन (कोई धरोहर मारले) हो जाय, वाणिज्यसे अधिक कोईमी जीवनोपाय नहीं मानता हूं । शिखरिणी छन्द है ॥ ११ ॥

उपायानाञ्च सर्वेषामुपायः पण्यसंग्रहः । 
धनार्थ शस्यते ह्येकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥

सम्पूर्ण उपायों में बेचने योग्य द्रव्यका संग्रह ही एक उत्तम है और संशयात्मक हैं ॥ १२ ॥

तच्च वाणिज्यं सप्तविधमर्थागमाय स्यात्तद्यथा गान्धिकव्य-बहारो, निक्षेपप्रवेशो, गोष्ठिककर्म, परिचितग्राहकागमो, मिथ्याक्रयकथनं, कूटतुलामानं, देशान्तराद्भांडानयनश्चेति । उक्तञ्श्व-

वह वाणिज्य सात प्रकारका धनके निमित्त होता है, गन्धद्रव्यका व्यवसाय, निक्षेप प्रवेश अर्थात् रुपयेका अपने यहा जमा करना उसे व्याज देना, गोसम्बन्धीकर्म, पहचाने हुए ग्राहकोका आना (कारण कि, जानाहुआ ग्राहक दुरुक्ती नहीं करता है), वस्तुका मिथ्या मोल कहना (थोडे मूल्यमें खरीद कर अधिक मोल बताना), कमती तोलना, देशान्तरोसे वरतन द्रव्यादिका लाना, कहा है कि-

पण्यानां गान्धिकं पण्यं किमन्यैः काञ्चनादिभिः । 
यत्रैकेन च यत्क्रीतं तच्छतेन प्रदीयते ॥ १३ ॥

वेचने योग्य द्रव्योंमे सुगन्धि द्रव्यका व्यापार श्रेष्ठ है और दूसरे सुवर्णादिसे क्याहै; जो कि, एकसे मोल लेकर सौको बेचा जाता है॥ १३ ॥

निक्षेपे पतिते हयें श्रेष्ठी स्तौति स्वदेवताम् । 
निक्षेपी म्रियते तुभ्यं प्रदास्याम्पुपयाचितम् ॥ १४ ॥

धरोहर घरमे आनेसे सेठ अपने देवताकी स्तुति करता है कि, यदि यह धरोहरवाला मर जाय, तो मैं तुझको अभिमत वस्तुसे पूजन करूगा ॥ १४ ॥

गोष्ठिककर्मनियुक्तः श्रेष्ठी चिन्तयति चेतसा हृष्टः । 
वसुधा वसुसंपूर्णा मयाद्य लब्धा किमन्येन ॥ १५ ॥

गोष्टीकर्ममें नियुक्त हुआ श्रेष्ठी प्रसन्न मनहो विचारता है, मैने धनसे पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्ति की और क्या चाहिये ॥ १९ ॥

परिचितमागच्छन्तं ग्राहकमुत्कण्ठया विलोक्यासौ । 
हृष्यति तद्धनलुब्धो यद्वत्पुत्रेण जातेन ॥ १६ ॥

पहचाने ग्राहकको आता हुआ देखकर उत्कंठा से यह उसके धनसे ऐसे प्रसन्न होताहै; जैसे पुत्र उत्पन्न होनेसे ॥ १६ ॥

अन्यच्च-

औरभी-

पूर्णापूर्णे माने परिचितजनवञ्श्चनं तथा नित्यम् । 
मिथ्याक्रयस्य कथनं प्रकृतिरियं स्यात्किरातानाम् ॥१७॥

पूराकमती तोलकर नित्य पहचाने जनका वंचन करना, मिथ्या मोल कहना यह किरातोंकी प्रकृति है ॥ १७ ॥

अन्यच्च-

औरभी-

द्विगुणं त्रिगुणं वित्तं भाण्डक्रयविचक्षणाः। 
प्राप्नुवन्त्युद्यमाल्लोका दूरदेशान्तरं गताः ॥ १८ ॥

" भाण्डके बेचनेमें चतुर दुगुने तिगुने धनको दूरदेशमें जानेत्राळे मनुष्य उद्यमसे प्राप्त होते हैं ॥ १८ ॥'י

इत्येवं सम्प्रधार्य्य मथुरागामीनि भाण्डानि आदाय शुभायां तिथौ गुरुजनानुज्ञातः सुरथाधिरूढः प्रस्थितः । तस्य च मंगलवृषभौ सञ्जीवकनन्दकनामानौ गृहोत्पन्नौ धूर्वोढारौ स्थितौ ॥ तयोरेकः सञ्जीवकाभिधानो यमुनाकच्छमवतीर्णः सन् पङ्कपुरमासाद्य कलितचरणो युगभंगं विधाय निषसाद । अथ तं तदवस्थमालोक्य वर्द्धमानः परं विषादमगमत् । तदर्थ च स्नेहार्द्रहृदयः त्रिरात्रं प्रयाणभंगमकरोत् । अथ तं विषण्णमालोक्य साथिकैरभिहितम्- "भोः श्रेष्ठिन् ! किमेवं वृषभस्यः कृते सिंहव्याघ्रसमाकुले बह्वपायेऽस्मिन् वने सम-स्तसार्थः त्वया सन्देहे नियोजितः । उक्तञ्च-

- इस प्रकार मनमें विचार, मथुराके जानेवाले भाण्डों को लेकर, शुभ तिथिमें गुरुजनोंकी आज्ञालेकर, रथपर चढकर 'चला, उसके दो मंगळवृषभ संजीवक, नन्दक, नामेवाळे घरमें उत्पन्न हुये भारवाहक थे; उनमें एक संजीवक नामवाला बैल यमुनाके अनूप देशमें प्राप्त होकर, महादलदलमें फँसनेके कारण लंगडी टांग होकर जुआओं गिराय स्थित हुआ। उसकी यह दशा देखकर बर्द्धमान परम विषादको प्राप्त हुआ और उसके निमित्त प्रेमसे आर्द्रत्दृदय होकर तीन रात्रितक गमन न किया । तब उसको दुःखी देख सार्थियोंने कहा- "मो सेठ' क्यो इस बैलके निमित्त सिह व्याघ्रसे युक्त अनेक विपत्तिवाले इस वनमें सम्पूर्ण साथियोको तुमने सन्देहमे नियुक्त किया है, कहाहै कि-

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः । 
एतदेवात्र पाण्डित्थं यत्स्वल्पाद्भरिरक्षणम् ॥ १९ ॥ 

" बुद्धिमान् थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करै, यह पडिताई है कि, थोडेहीसे बहुतकी रक्षा करे ॥ १९ ॥"

अथासौ तदवधार्य्य सञ्जीवकस्य रक्षापुरुषान निरूप्य अशेषसार्थ नीत्वा प्रस्थितः । अथ रक्षापुरुषा अपि बह्वपायं तद्वनं विदित्वा सञ्जीवकं परित्यज्य पृष्ठतो गत्वा अन्येद्युस्तं सार्थवाहं मिथ्याहुः "स्वामिन् । मृतोऽसौ सञ्जीवकोऽस्मा-भिस्तु सार्थवाहस्याभीष्ट इति मत्वा वह्निना संस्कृतः" इति तच्छ्रुत्वा सार्थवाहः कृतज्ञतया स्नेहार्द्रहृदयस्तस्य और्ध्व-देहिकक्रियाः वृषोत्सर्गादिकाः सर्वाश्चकार । सञ्जीवकोऽप्या-युःशेषतया यमुनासलिलमिश्रः शिशिरतरवातैः आप्या-वितशरीरः कथञ्चिदप्युत्थाय यमुनातटमुपपेदे ॥ तत्र मरक तसदृशानि बालतृणाग्राणि भक्षयन् कतिपयैरहोभिर्हरवृषभइव पीनः ककुद्मान् बलवांश्च संवृत्तः प्रत्यहं वल्मीकशिखरा-ग्राणि शृंगाभ्यां विदारयन् गर्जमानः आस्ते । साधु चेदमु-च्यते-

तव यह वैश्य इस बातको विचारकर, सञ्जीवकके निमित्त रक्षापुरुषों को निरूपण कर और सब सार्थियोको लेकर चला। तब रक्षक पुरुषभी अनेक कष्टयुक्त उस बनको देख सजीवकको छोड उसके पीछे जाकर दूसरे दिन सार्थ-वाहसे मिथ्या कहने उगे- "हे स्वामिन् ! वह सजीवक़ मरगया, हमने आप (सार्थ वाद) का प्यारा जानकर अग्निसे सस्कार किया। यह सुनकर सार्थवाह कृत-ज्ञता और प्रेमसे आर्द्रहृदय होकर उसकी और्ध्वदेहिक क्रिया वृषोत्सर्गादि सब करता भया । (इधर ) सजविकभी आयु शेप रहनेके कारण यमुनाजलसे मिली अत्यन्त शीतल वायुद्वारा तृप्तशरीरसे किसी प्रकार उठकर यमुना के किनारे प्राप्त हुआ, वहां मरकतमणिकी समान छोटे तृणके अग्रभाग भक्षण करता हुआ कुछ दिनोंमें शिवजीके वृषभके समान स्थूल ककुदवाला बलवान् हुआ प्रतिदिन वल्मक्रिके शिखर के अप्रभागोंको शृगोंसे विदीर्ण करता गर्जता रहा । कहाभी सत्य है कि-

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विन-श्यति ॥ २० ॥

अप्रतिपालित वस्तु दैवसे रक्षित हुई स्थित रहती है, भली प्रकार रक्षित हुई वस्तुभी दैवसे अरक्षितहो नष्ट होजातीहै, अनाथभी वनमे त्यागन किया जीता है यत्न करनेपरभी घरमें नहीं जीताहै, बंशस्थ वृत्त ॥ २० ॥

अथ कदाचित् पिंगलको नाम सिंहः सर्वमृगपरिवृतः पिपा-साकुल उदकपानार्थ यमुनातटमवतीर्णः सञ्जीवकस्य गम्भीर-तरारावं दूरादेव अशृणोत् । तच्छ्रुत्वा अतीव व्याकुलहृदयः ससाध्वसमाकारं प्रच्छाद्य वटतले चतुर्मण्डलावस्थानेन अव-स्थितः । चतुर्मण्डलावस्थानं त्विदम् सिंहः सिंहानुयायिनः काकरवाः किंवृत्ता इति । अथ तस्य करटकदमनकनामानौ द्वौ शृगालौ मन्त्रिपुत्रौ भ्रष्टाधिकारौ सदानुयायिनौ आस्ताम् । तौ च परस्परं मन्त्रयतः। तत्र दमनकोऽब्रवीत्- "भद्र करटक ! अयं तावदस्मत्स्वामी पिङ्गलक उदकग्रहणार्थ यमुनाकच्छ-मवंतीर्य्य स्थितः स किं निमित्तं पिपासाकुलोऽपि निवृत्त्य व्यूहरचनां विधाय दौर्मनस्येनाभिभूतोऽत्र वटतले स्थितः"। करटक आह- "भद्र ! किमावयोरनेन व्यापारेण। उक्तञ्च यतः-

एक समय पिंगळ्क नाम सिंह सम्पूर्ण मृगोंसे युक्त प्याससे व्याकुळ जल पीनेके निमित्त यमुना के किनारे प्राप्त हुआ, संजीवकका अधिक गम्भीर शब्द दूरसे सुनता भया । वह सुन अत्यन्त व्याकुल हृदय होकर भयके आकारको छिपाकर वटवृश्चके नीचे चतुर्मण्डलावस्थान (जिसके चारों ओर मृग बैठे हों) से बैठा । चतुर्मण्डलावस्थान इसको कहतेहैं, कि सिह, सिंहानुयायी, काकरव (काककेसे शब्दः करनेवाले), किंवृत्त (क्यों उपस्थित हुआ है, इस वृत्तान्तके जाननेवाले) बैठे ।

तब उसके करटक, दमनक नामवाले दो शृगाल मत्रीके पुत्र अधिकारसे भ्रष्ट सर्दी अनुयायी थे । वह दोनो परस्पर सम्मति करने लगे, उसमे दमनक बोला-"भद्र करटक ! यह तो हमारा स्वामी पिंगलक जल पीनेको यमुनाकच्छमें प्राप्त हो स्थित हुआ था। क्या कारण है कि, प्याससे व्याकुल होकरभी लौटकर अपनी सेनाकी मण्डल रचनाको विधानकर दुर्मनस्कता से तिरस्कृत हुआ इस वट वृक्षके नीचे बैठा है?" करटक बोला- "भद्र ! हमारा इस व्यापारसे क्या लाभ है, कहा भी है-

अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति । 
स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥ २१ ॥"

जो मनुष्य अनधिकारियोमे अधिकार करनेकी इच्छा करता है वही नाश होता है, जैसे कीटको उखाडकर वानर ॥ २१ ॥ "

दमनक-आह- "कथमेतत" ? । सोऽब्रवीत्-

दमनक बोला "यह कैसी कथा है' ?? वह बोला-

कथा १.

कस्मिश्चित् नगराभ्यासे केनापि वणिक्पुत्रेण तरुषण्ड-मध्ये देवतायतनं कर्तुमारब्धम् । तत्र च ये कर्मकराः स्थप-त्यादयः ते मध्याह्नवेलायामाहारार्थ नगरमध्ये गच्छन्ति । अथ कदाचित् तत्रानुषङ्गिकं वानरयूथमितश्चेतश्च परिभ्रमत आगतम् । तत्र एकस्य कस्यचित् शिल्पिनोऽर्द्धस्फाटितोऽञ्ज-नवृक्षदारुमयः स्तम्भः खदिरकीलकेन मध्यनिहितेन तिष्ठति एतस्मिन् अन्तरे ते वानराः तरुशिखरप्रासादशृङ्गदारुपर्य-न्तेषु यथेच्छया क्रीडितुमारब्धाः । एकश्च तेषां प्रत्यासन्नमृत्युः चापल्यात् तस्मिन्नर्द्धस्फाटितस्तम्भे उपविश्य पाणिभ्यां कीलकं संगृह्य यावत् उत्पाटयितुमारेमे तावत् तस्य स्तम्भ-मध्यगलवृषणस्य स्वस्थानात् चलितकीलकेन यवृत्तं तत्प्रा-गेव निवेदितम् । अतोऽहंब्रवीमि "अव्यापारेषु" इति । आवयोः भक्षितशेष आहारोऽस्त्येव, तत् किमनेन व्यापा-रेंण"। दमनक आह- "तत् किं भवान् आहारार्थी केवलमेव। तन्न युक्तम् । उक्तं च-



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