कहानी : एक चादर / एक कफन (आंसुओं भरा एक संकल्प)

कहानी  : एक चादर / एक कफन

(आंसुओं भरा एक संकल्प)

बचपन में बुजुर्गों के साथ बैठने की आदत पड़ गई थी। आदत पढ़ने में मेरा एक स्वार्थ छुपाहआ था। मेरा ही नहीं मुझ जैसे और बच्चों का भी।

हमारा वह स्वार्थ था कि बुजुर्ग हमें कहानियां सुनाया करते थे जिनमें हमें बहुत आनंद आता था। 

परंतु वे अपनी कहानी एक बात से शुरू किया करते थे कि पहले यह बताओ कि आप बीती सुनाएं या जग बीती सुनाएं। उस वक्त समझ नहीं आता था परन्तु हम कभी अपबीती बोल देते थे तो कभी जाग बीती बोल देते । 

तब उन्होंने कहानी सुनानी शुरू की ...

एक बार की बात है कि सीधे, सच्चे और मेहनती किसानों का एक छोटा-सा गाँव था, हरियाली से घिरा हुआ, होता भी क्यों नहीं, यहां के किसान अपने पसीने की कमाई से धरती माता का पेट जो भरते थे। 

इस छोटे से गांव का मिट्टी में खेती-बाड़ी से ही जीवन चलता था। इस गांव के लोग गरीब ज़रूर थे, लेकिन दिलों से अमीर। जहाँ रूपए-पैसों की कमी थी, मगर इंसानियत की कोई कमी नहीं थी…" इसलिए अन्न और धन उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था।

गाँव के लोग अपने-अपने काम में व्यस्त रहते और ईमानदारी से खेती करते। उनकी मेहनत के कारण गाँव की मिट्टी में अनाज तो खूब उगता था, लेकिन अन्न और धन की तंगी हमेशा हर घर में बनी रहती थी। लेकिन गांव वालों में बहुत अधिक मेल-मिलाप था। 

हर सुबह की तरह गाँव में हल्की धूप फैल रही थी। बच्चे खेतों में खेल रहे थे, चारों ओर पक्षियों की चहचहाहट थी, और हवा में मिट्टी की खुशबू घुली थी। 

गांव का एक मेहनती किसान हरिया अपने अधपके खेतों को पानी दे रहा था कि तभी एक भयंकर घटना हुई—हरिया को खेत में काम करते समय किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गई।  

आज एक बार फिर से उस, गाँव के एक कोने में अँधेरा उतर आया। हरिया, गाँव का मेहनती किसान, अब इस दुनिया में नहीं था।

हरिया की अचानक मृत्यु से उसका परिवार बिलकुल असहाय हो गया। पैदावार हर समय नहीं होती और पैसा भी हर समय हर किसी के पास नहीं होता। घर में न खाने के लिए अन्न बचा था, न क्रियाकर्म के लिए धन। 

उसकी विधवा पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे असहाय खड़े थे। आँखों में आँसू और मन में एक ही सवाल था—“अब हम क्या करेंगे?” उसकी पत्नी और बच्चे रोते हुए चारों ओर देख रहे थे। उनके मन में एक बोझ था—*अब अंतिम संस्कार कैसे होगा?*   

यह खबर पूरे गाँव में फैल गई। सबके दिल द्रवित हो उठे। लोग इकट्ठे हुए। उसका करूण कृंदन सबके दिल को झकझोर रहा था। सबके दिल भारी थे, लेकिन किसी के पास इतना धन नहीं था कि पूरे संस्कार का बोझ अकेले उठा सके।

हरिया का मृत शरीर धरती पर पड़ा था उसके बच्चे और पत्नी बुरी तरह से रो रही थे।

तभी गाँव के बुज़ुर्गों ने एक ऐसा निर्णय लिया जो मानवता की मिसाल बन गया।  

“भाइयो-बहनो, हम सब किसान हैं। पैदावार हर मौसम में नहीं होती। कभी खेत लहलहाते हैं, कभी सूखे पड़ जाते हैं। लेकिन इंसान का धर्म यही है कि दुख में हम सब साथ खड़े हों। हम सब जानते हैं कि दुख का समय किसी एक का नहीं, सबका होता है। मृत्यु के आने का कोई वक्त नहीं होता।"

गाँव में सन्नाटा था, लेकिन एक बुज़ुर्ग बोले ही जा रहा था।

"आज से इस गाँव में नियम होगा कि किसी भी किसान भाई की मृत्यु पर दाह संस्कार हम सब मिलकर करेंगे। लकड़ी, उपले और बाकी चीज़ें—जो जिसके पास हो, वह देगा। खर्चा कोई अकेले नहीं उठाएगा। लकड़ियाँ, उपले, या जो भी साधन जिस किसी के घर में हैं, हम सब मिलकर लाएँगे।"

दूसरा बुजुर्ग बोला 

"अंतिम यात्रा में इतनी सारी चादरे डाली जाती हैं आज से केवल एक ही चादर डाली जाएगी।"

तीसरा बुजुर्ग बोला 

"हम सब मिलकर हरिया का अंतिम संस्कार करेंगे। उसके बाद, जो जिसकी इच्छा हो, वह मृतक परिवार को धन या अन्न दे सकता है, ताकि घर परिवार का खर्चा चलता रहे।”

चौथा बुजुर्ग किसान खड़ा हुआ और बोला, "भाइयो… हमारा हरिया अब हमारे बीच नहीं है। वह हमारी मदद के लिए हर समय तैयार रहता था। हरिया अब अपने परिवार को अकेला छोड़कर चला गया तो क्या अब उसकी पत्नी और बच्चे भूखे रहेंगे? अगर आज हम नहीं मदद करेंगे, तो कल किसी और की बारी भी यही होगी।"

पहले बुजुर्ग किसान फिर बोला, "तो चलो, हम ठान लें – अब से किसी की भी मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार पूरा गाँव मिलकर करेगा। जो कुछ भी पास हो, वही देंगे। लकड़ी, उपले, चादर… और बाकी का खर्चा सब मिलकर उठाएँगे।"

गाँव के लोगों में सन्नाटा था, बुज़ुर्गों की बात सुनकर एक-एक कर सभी लोग वहां से चले गए। वहां रह गए चंद बुजुर्ग और रोता बिलखता हरिया का परिवार।

सूर्य पश्चिम दिशा की ओर अपनी निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा था। रात्रि में किसी का भी दाह संस्कार नहीं किया जा सकता। 

बुजुर्गों को अब हरिया और उसके परिवार की चिंताहने लगी थी। तभी उनके घर में एक व्यक्ति अपने सिर पर उपलों का बोझ लेकर आया। कोई अपने घर के लकड़ी के गट्ठर उठा लाया। किसी और ने उपलों की गठरी लाकर रख दी।

जल्द ही हरिया की काठी सजाई गई और उसे श्मशान मैं ले जाकर पूरे गाँव ने मिलकर चिता सजाई। और सिर्फ एक चादर से संस्कार पूरा कर उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। 

सबकी आँखों में आँसू थे, लेकिन बुजुर्गों के निर्णय को सुनकर सबके दिलों को संबल मिला। सबने इस नियम को सहमति दे दी।

उसके बाद, गाँव के लोग अपने अपने घर से कुछ न कुछ लाए। किसी ने दो रुपए दिए, किसी ने पाँच रुपए, कोई ने बीस। कोई अनाज का एक मुट्ठी हिस्सा ले आया तो किसी ने गेहूँ की बोरी दी, तो किसी ने दाल का कटोरा। "लो बहन, यह सब तुम्हारे बच्चों के लिए," गांव वालों ने कहा। 

सबने अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया। यह सहयोग उस परिवार के लिए आसमान से बरसी राहत की बूंदों जैसा था।  

वह विधवा और उसके बच्चे जब यह देख रहे थे, तो उनकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। लेकिन वे उन आँसुओं में अब अकेलेपन का डर नहीं, बल्कि उनमें सुरक्षा और विश्वास छिपा था। अब उन्हें पूर्ण एहसास हो गया था कि अब उनका परिवार सिर्फ चार लोग का नहीं, बल्कि पूरा गाँव उसका परिवार बन चुका था।

हरिया की पत्नी हाथ जोड़कर रोई, "आज मुझे लगा कि मेरा परिवार सिर्फ हम चार नहीं हैं… पूरा गाँव हमारा परिवार है।" हरिया की पत्नी के पास खड़ी सभी औरतें हरिया की पत्नी से लिपट गई और बिलख बिलख कर रोने लगीं।

उस दिन से गांव ने यह परंपरा बना ली कि यदि किसी भी किसान पर ऐसी विपत्ति आएगी तो पूरा गांव उसी हरिया की तरह आगे आएगा।  

लेखक 

ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर 

22.10/6/20/9/2025


मुखिया:
आज से यह परंपरा हमारे गाँव की पहचान होगी।
👉 न कोई भूखा रहेगा,
👉 न कोई अकेला संस्कार करेगा।
हम सब मिलकर हर परिवार का सहारा बनेंगे।

नैरेटर की आवाज़ (अगर सुनाई दे तो):
"गरीबी थी, लेकिन दिल इतने बड़े थे कि पूरी दुनिया को इंसानियत का सबक सिखा सकते थे। यही है असली भारत… जहाँ कोई अकेला मरता है तो भी, कोई भूखा नहीं रहता।"

और गाँव में हर मौत के बाद यही नियम बना – "एक चादर का वादा"।

संदेश

यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सच्ची सीख है—
👉 इंसान अकेले कमजोर है, लेकिन जब समाज एक होकर खड़ा होता है, तो कोई दुःख बड़ा नहीं लगता।
👉 एक चादर का नियम सिर्फ खर्चा बचाने के लिए नहीं था, बल्कि यह बताने के लिए था कि मानवता में दिखावा नहीं, बल्कि सहयोग सबसे बड़ा संस्कार है।
👉 आज भी अगर हर गाँव, हर मोहल्ला, हर समाज यह नियम बना ले कि “दुख का बोझ सब मिलकर उठाएँगे”, तो कोई गरीब कभी असहाय नहीं रहेगा।

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