5.205. || पंचम कहानी || उदयन की कथा : वासवदत्ता-हरण; गुहसेन और बेवस्मिता की कथा; सिद्धी की कथा; सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा; समुद्रवत्त की कथा क्रনহা:

5.205. || पंचम कहानी || उदयन की कथा : वासवदत्ता-हरण; गुहसेन और बेवस्मिता की कथा; सिद्धी की कथा; सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा; समुद्रवत्त की कथा क्रনহা:

पंचम तरंग

उदयन की कथा : वासवदत्ता-हरण

कुछ समय के अनन्तर पिता के पक्षपात से रहित होकर वासवदत्ता को वत्सराज उदयन के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया ।।१।।

यह जानकर मन्त्री यौगन्धरायण अदृश्य रूप से पुनः राजा उदयन के समीप आया । उसकी अदृश्यकारिणी विद्या के प्रभाव से उसे दूसरे व्यक्ति न देख सके ॥ २॥

उसने वसन्तक के सामने ही राजा से कहा- 'महाराज, तुम्हे चंडमहासेन ने छल-कपट करके कैद कर लिया है और अपनी कन्या देकर तुम्हारा सम्मान करके तुम्हें छोड देगा ॥३॥

इसलिए हम लोग स्वयं उसकी कन्या का अपहरण करके ले चलते है। इस प्रकार इस अभिमानी का मान भंग होगा और मसार में तुम्हारी दुर्बलता का अपवाद भी न होगा' ।॥४-५।।

राजा चंडसेन ने कन्या वासवदत्ता को भद्रवनी नाम की हस्तिनी दी है। वह इतनी शीघ्रता से चलती है कि दूसरे हाथी, केवल एक नडागिरि को छोड़कर, उसका पीछा नहीं कर सकते। नडागिरि भी, उसे देखकर युद्ध नहीं करता। उस भद्रवती हस्तिनी के पीलवान (महावत) का नाम आषाढक है। उसे मैंने पर्याप्त धन देकर अपने पक्ष में कर लिया है।॥६-८॥

इसलिए उसी हस्तिनी की सवारी से वासवदत्ता को साथ लेकर तुम्हें रात के समय यहाँ से छिपकर भागना चाहिए ॥९॥

यहाँ के बड़े हाथीवान को मद्य पिलाकर ऐसा बेसुध कर देना चाहिए कि जिससे उसे होश ही न रहे। अन्यया वह हाथियों के संकेत समझने में अति निपुण है॥१०॥

मार्ग-रक्षा के लिए मैं तुम्हारे मित्र पुलिन्दक के पास अभी जाता हूँ। ऐसा कहकर यौगन्धरायण चला गया ।।११।।

वत्सराज ने भी अपना सारा कर्तव्य सोच-समझ लिया। कुछ समय के पश्चात् वासवदत्ता उसके समीप आई ॥ १२॥
राजा उदयन उसके साथ विविध वार्तालाप के प्रसंग में वासवदत्ता को यौगन्धरायण की योजना बतला दी। वासवदत्ता ने उसकी योजना स्वीकार करके अपने महावत आषाढ़क को बुलाकर उसे हस्तिनी पर सवार करा दिया और देवता के प्रसाद का बहाना बनाकर प्रधान महावतों को खूब मद्य पिला दिया ॥१३-१५।।

इसके पश्चात् सायंकाल के समय आषाढक, अपनी उस हस्तिनी को सजाकर तैयार करके नहाँ ले आया ।।१६।।

सजी हुई हस्तिनी ने एक चिग्घाड किया, जिसे सुनकर हाथियों की शब्दावली को समझने-बाले प्रधान महावत ने नशे में चूर अतएव अस्पष्ट अक्षरों में कहा- 'हस्तिनी कह रही है कि आज मैं तिरसठ योजन जाऊँगी' ।॥ १७-१८।।

इतना जान लेने के बाद फिर उसे होश न रहा और न वह कुछ मोच ही सका। दूसरे भहावती ने भी नशे में चूर रहने के कारण उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। तदनन्तर वत्सराज भौगन्धरायण द्वारा दी गई ओषधियों से बन्धनमुक्त होकर वीणा और वासवदत्ता के लाये हुए वायुधों के साथ वसन्तक के सहित वह उस हस्तिनी पर आरूढ हुआ ।।१९-२१।।

इसके पश्चात् वासवदत्ता भी, अपनी एकान्त सहेली कांचनमाला के साथ उसी हस्तिनी कर सवार हो गई ।। २२॥

कुछ ही समय में वत्सराज उदयन, अपने साथियो के साथ टूटी हुई चहारदीवारी के मार्ग से उज्जयिनी के बाहर निकल गया ।।२३।।

उस स्थान पर पहरा देनेवाले वीरबाहु तथा तालभट नामक दोनों क्षत्रिय सिपाहियो को बत्सराज ने स्वयं ही मार डाला ॥२४॥

बाहर निकलकर वासवदत्ता के साथ उदयन प्रसन्नतापूर्वक आगे बढता गया। हस्तिनी पर आषाढ़क ने अंकुश लगा रखा था ।। २५॥

उधर उज्जयिनी में पहरेदारों ने दो वीर सिपाहियों की मृत्यु का समाचार राजा के पास पहुंचाया। चंडमहासेन ने चारों ओर खोज करने पर यह मालूम कर लिया कि उदयन, वासवदत्ता को लेकर भाग गया। चंडमहासेन का लड़का पालक भी शोरगुल सुनकर और मडागिरि हाथी पर सवार होकर उनका पीछा करने चला ॥ २६-२८॥

वत्सराज ने उसे पीछा करते हुए देखकर बाणों से युद्ध प्रारम्भ किया। किन्तु नडागिरि ने भद्रवती हाथी को देखकर प्रहार नही किया ॥२९॥

तदनन्तर पिता की आज्ञा से आये हुए दूसरे राजकुमार गोपालक ने आकर पालक को लौटा लिया। उसके लौट जाने पर वत्सराज भी सुख और शान्तिपूर्वक सारा दिन यात्रा करता रहा। धीरे-धीरे रात समाप्त हुई। तब मध्याह्न समय तिरसट योजन चल लेने पर हस्तिनी को प्यास लगी ।।३०-३२।।

राजा और रानी के उतर जाने पर हस्तिनी ने पेट भर पानी पिया और डमी कारण वह मर भी गई ॥३३।।

घोर विन्ध्यारण्य में खड़े और हस्तिनी के मर जाने से दुखित राजा ने आकाशवाणी सुनी- ।॥ ३४।।

'हे राजन्। मैं मायावती नाम की विद्याधरी हूँ। शाप के कारण हस्तिनी बन गई थी। मैने अपने जीवन के रहते तुम्हे भागने में सहायता दी। भविष्य में भी तुम्हारे होनेवाले पुत्र का उपकार करूंगी ॥३५-३६।।

कुमारी वासवदत्ता जो तुम्हारी पत्नी होनेवाली है, यह भी मानव नहीं है; प्रत्युत शाप के कारण मनुष्य-रूप मे पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई है ॥३७॥

तब राजा ने अपने नर्म-सचिव वसन्तक को विन्ध्य-शिखर पर स्थित अपने मित्र पुलिन्दक को अपने आगमन की सूचना देने के लिए भेजा ॥३८॥

और स्वयं भी राजा वासवदत्ता के साथ पदयात्रा करता हुआ धीरे-धीरे उसी ओर जाता हुआ डाकुओ से घेर लिया गया। हाथ मे धनुष लिये हुए राजा अकेला था और डाकू संख्या मे एक सौ पाँच थे। राजा उदयन ने वासवदत्ता के देखते-देखते सबको एक-एक करके मार डाला ।। ३९-८०।11

उसी समय वत्सराज का मित्र पुलिन्दक, वसन्तक को आगे किये हुए यौगन्धरायण के साथ आ पहुँचा ।।४१।।

पुलिन्दक ने आते ही बचे-खुचे डाकुओं को भगाकर वत्सराज को प्रणाम किया और वासवदत्ता के साथ उसे अपने ग्राम मे ले गया ।।४२।।

जगली कुशाओ के आघात से छिले हुए कोमल चरणोंवाली वासवदत्ता के साथ राजा ने, उस रात्रि को भिल्लपल्ली मे ही व्यतीत किया ।॥४३॥

यौगन्धरायण द्वारा दूत के मुँह से पहले से ही सूचित वत्सराज का प्रधान सेनापति रुमण्वान् भी वहाँ आ पहुँचा ॥४४।।

उसके साथ ही चारों दिशाओ को व्याप्त करती हुई सेनाएँ भी आ पहुँची ॥४५॥

उस विन्ध्यभूमि में स्थित अपनी सेना के शिविर में प्रवेश करके उज्जयिनी का समाचार प्राप्त करने के लिए उसने स्थिर रूप से निवास किया। जव उदयन उसी शिविर में निवास कर रहा था, उसी समय यौगन्धरायण का मित्र एक बनिया उज्जयिनी से वहाँ आया और कहने लगा- 'महाराज ! उज्जयिनी नरेश चंडमहासेन आप जामाता पर बहुत प्रसन्न है। उसने आपके पास अपने सन्देशवाहक प्रतिहार (खवास) को भेजा है ।।४६-४८।।

वह आकर यहा ठहरा है। पहले मैं यहाँ आया हूँ। वह गुप्त रूप से आपसे निवेदन करना चाहता है। इनका आगमन जानकर वत्सराज प्रसन्न हुआ और राजा की उसने प्रशंसा की। वामवदत्ता भी उससे प्रसन्न थी। यह समाचार सुनते समय अपने बन्धुओं को छोड़कर आई हुई और विवाह के लिए शीघ्रता करती हुई वासवदत्ता लज्जिन और उत्सुक हुई। उसने निकट बैठे हुए वसन्तक से कहा कि तुम एक कहानी सुनाओ ।॥४० - ५२।।

वसन्तक ने भी उम सुलोचना वासवदत्ता को पतिभक्ति बढ़ानेवाली कहानी सुनाना प्रारम्भ किया ।।५३।।

गुहसेन और बेवस्मिता की कथा

इस देश में ताम्रलिप्ति नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है। उसमें बहुत बडा धनी धनदत्त नाम का एक वैश्य रहता था ।। ५४।।

वह पुत्रहीन था, अत उसने बहुत-से ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें प्रणाम करके निवेदन किया कि आप लोग ऐसा उपाय करें जिसमे मुझे पुत्र लाभ हो ।॥५५॥

यह सुनकर ब्राह्मणों ने कहा 'यह कोई कठिन काम नहीं है। ब्राह्मण लोग, वैदिक कर्मों से सभी दुष्कर कार्यों को सुकर बना सकते है' ।॥५६।।

प्राचीन समय मे एक पुत्रहीन राजा था; उसकी एक सौ पाँच रानियों थीं। पुत्रेष्टि-यज्ञ करने के पश्चात् राजा के घर जन्तु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ; जो मभी सौतो की आँखों के लिए दूज के चाँद के समान था ।।५७-५८।।

किसी समय घुटनों के बल रेंगते हुए उस बालक की जाँघ में एक चीटी ने काट लिया । फलतः बच्चा चिल्लाकर व्याकुल हो गया ।॥५९॥

इतने में ही रनिवास में कोलाहल मच गया। राजा भी 'पुत्र-पुत्र' कहते हुए साधारण व्यक्तियों के समान रोने लगा ।।६०।।

कुछ समय के उपरान्त चीटी को ह्या देने और बालक को चुप करा देने पर राजा एक-पुत्रता की निन्दा करने लगा। एक पुत्र का होना दुःख का कारण होता है। क्या कोई ऐसा भी उपाय है कि मेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हो जायें, सन्ताप के कारण राजा ने पुनः ब्राह्मणों को बुलाकर इस प्रकार पूछा ।।६१।।

ब्राह्मणो ने उसमें कहा- 'हाँ, एक उपाय है। वह यह कि तुम्हारे इस लड़के को मारकर उसके मास से हवन किया जाय। उस हवन-धूम की गन्ध को पाकर तुम्हारी सभी रानियाँ गर्भवती हो जायेंगी और तुम्हे अपनी रानियो की संख्या के बराबर पुत्र उत्पन्न होगे।' ब्राह्मणो की यह बात सुनकर गजा ने उनके कथनानुसार कार्य करना स्वीकार किया और तदनुरूप सारी व्यवस्था की। ब्राह्मणो ने पुत्र-साधना के लिए दक्षिणा का निश्चय करके यज्ञ किया और उससे गुहसेन नामक बालक उत्पन्न हुआ ।।६२-६६।।

बड़े होने पर उसके पिता ने उसके विवाह के लिए स्त्री ढूंढना प्रारम्भ किया ।। ६७।। इसी प्रसंग मे व्यापार के बहाने धनदत्त उसे लेकर पुत्रवधू लाने के लिए दूसरे द्वीप में चला गया ।।६८।।

दूसरे द्वीप में जाकर उसने धर्मगुप्त नामक बनिये से उसकी देवस्मिता नाम की कन्या को अपने पुत्र गृहसेन के लिए माँगा ।। ६९।।

कन्या के अत्यन्त प्रिय होने के कारण और ताम्रलिप्ति को बहुत दूर समझकर धर्मगुप्त ने अपनी कन्या उसे नही दी ॥७०॥

किन्तु उसकी कन्या देवस्मिता, गुहसेन को देखकर उसके गुणों से आकृष्ट होकर और अपने परिवारवालो को त्याग कर उसके साथ जाने के लिए तैयार हो गई ॥७१।।

किसी सहेली के द्वारा गुहसेन से गुप्त निश्चय करके देवस्मिता, गुहसेन और उसके पिता के साथ, रात के समय, ताम्रलिप्ति चली आई ॥७२॥

ताम्रलिप्ति पहुँचकर उन दोनों का विवाह-सम्बन्ध हो जाने पर उन दोनों का मन परस्पर प्रेमपाश में दृढ़तापूर्वक बंध गया ।॥७३॥

कुछ समय के अनन्तर पिता की मृत्यु हो जाने पर गुहसेन को साथियों ने कटाह-द्वीप जाने की प्रेरणा दी ।।७४।।

किन्तु उसकी पत्नी देवस्मिता ने अन्य स्त्रियों के समागम के भय से उसे जाने की अनुमति नहीं दी ॥७५॥

एक ओर पत्नी के रोकने से और दूसरी ओर बन्धुओं की प्रेरणा से गुहसेन अपने कर्तव्य के प्रति विमूढ़ हो गया कि वह क्या करे, जाय या न जाय ।।७६।।

तब गुहसेन ने देवमन्दिर मे जाकर निराहार व्रत करना प्रारम्भ किया कि देवता मुझे जो उपाय बतावेगे, वही करूँगा ।। ७७।।

उसके व्रत को देखकर देवस्मिता ने भी उसके साथ ही व्रत करना प्रारम्भ किया। व्रत से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दम्पति को स्वप्न में दर्शन दिया ॥७८।।

और दोनो को दो कमल के पुष्प दे कर कहा कि 'एक-एक पुष्प, तुम लोग अपने-अपने हाथ में रखो। दूर रहकर भी तुम दोनो में से यदि एक कोई भी सदाचार का त्याग करेगा, तो दूसरे के हाथ का कमल मुरझा जायगा, अन्यथा दोनों ही विकसित रहेगे ॥७९-८०।।

सोकर उठने पर वैश्य-दम्पती ने अपने-अपने हाथों में एक-एक लाल कमल देखा। वे कमल, मानों दोनों के हृदय, प्रत्यक्ष रूप से दोनों के हाथों में थे ।॥८१॥

इस घटना के उपरान्त हाथ में कमल लिये हुए उस गुहसन ने व्यापार के लिए कटाह-द्वीप की ओर प्रस्थान किया; किन्तु देवस्मिता घर पर ही कमल पर आँखें गड़ाई हुई रहने लगी ॥८२॥

कटाह द्वीप में पहुँचने पर गृहसेन ने रत्नों की खरीद-बेच प्रारम्भ की ॥८३॥

उसके हाथ में सदा खिले हुए कमल को देखकर चार वैश्यपुत्रों को बहुत आश्चर्य हुआ ।।८४।।

वे किसी उपाय से उसे अपने घर ले गये और उसे खूब मद्य पिलाकर पद्म के सम्बन्ध में उससे पूछा। उस मदोन्मत्त गुहसेन ने भी सारा वृत्तान्त उन्हे कह सुनाया उन चारों ने गुहसेन की पत्नी का चरित्र नष्ट करने की कल्पना से गुप्त रूप से ताम्रलिप्ति की ओर प्रस्थान किया ।।८५-८७।।

वहां पहुँचकर दुराचार के लिए उपाय सोचते हुए वे चारों दुष्ट, किसी जैन-मन्दिर में रहनेवाली योग-करंडिका नाम की परिव्राजिका (साबूनी) के पास गये ॥८८॥

और उससे कहने लगे हे देवि, यदि तुम हमारा कार्य सिद्ध कर दोगी, तो तुम्हें हम बहुत-सा बन देंगे' ।।८९।।

वह स्त्री बोली- 'यदि तुम लोग किसी स्त्री को चाहते हो, तो कहो। मैं तुम्हारा कार्य करा दूंगी। मुझे धन का लालच नहीं है ।: ९०।।

सिद्धिकरी नाम की मेरी एक बुद्धिमती शिष्या है। उसकी कृपा से मैंने असंख्य धन प्राप्त किया है' ।।९१।।

सिद्धि की कथा

'तुमने शिष्या की कृपा से अनन्त धन कैसे प्राप्त किया' ? वैश्यपुत्रों द्वारा इस प्रकार पूछने पर संन्यासिनी बोली- ॥९२॥

बेटे ! यदि तुम्हें सुनने की इच्छा है तो सुनो, कहती हूँ। एक बार उत्तरापथ से कोई बनिया यहां आया था ।॥९३॥

मेरी शिष्या किसी उपाय से उसके घर जाकर टिक गई। उसने अपना रूप बिगाडकर सेविका (मजदूरनी) का रूप धारण किया ॥९४॥

धीरे-धीरे वह उस बनिये पर विश्वास जमाकर उसके घर में रखे हुए ममस्त स्वर्ण-भांडार को लेकर अत्यन्त प्रातःकाल में छिपकर निकल गई ।। ९५।।

नगर से बाहर पकडे जाने के भय से शीघ्रतापूर्वक भागती हुई उसे देखकर मार्ग मे एक डोम¹ उसका धन छीनने के लिए उसका पीछा करने लगा ।।९६।।

धूर्त्ता सिद्धिकरी ने समझ लिया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे पहुँचकर उसने बडी ही दीनता के साथ उस डोम से कहा- 'आज मैं अपने पति के साथ कलह करके मरने के लिए घर से भाग आई हैं। इसलिए हे भले आदमी ! तुम मेरे लिए फाँसी का फन्दा बाँध दो'। 'यह फाँसी के फन्दे से स्वयं ही मर जाय, मै स्त्री-हत्या क्यो करूँ'- यह सोचकर उसने वृक्ष में फाँसी का फन्दा लटका दिया ।।९७-९९।।

तब वह सिद्धिकरी अनजान और भोली-भाली सी बनकर उसमे बोली- 'इस फंदे को गले मे कैसे फंसाया जाता है, जरा मुझे फंसाकर दिखाओ ।॥१००।।

तब उस मूर्ख डोम ने पैरों के नीचे ढोल रखकर फन्दे को गले में डालकर फांसी का प्रदर्शन किया ॥१०१॥

इतने ही में सिद्धिकरी ने उस ढोलक को लात मारकर तोड दिया और उसके टूटते ही डोम स्वय फाँसी के फन्दे में लटककर मर गया ।॥१०२॥

उसी समय सिद्धिकरी को ढूंढते-ढूंढते बनिया उधर आया और उसने दूर से वृक्ष के नीचे सिद्धिकरी को नही देखा ॥ १०३॥

सिद्धिकरी भी उसे देखकर वृक्ष पर चढ़ गई और घने पत्तों में अपने को छिपाकर बैठ गई ।।१०४।।

नौकर के साथ उस बनिये ने आकर देखा, तो केवल डोम फाँसी के फन्दे में झूल रहा है। उसने सिद्धिकरी को कही नही देखा। 'वह कही वृक्ष पर न चढ़ी हो', ऐसा सोचकर बनिये का नौकर वृक्ष पर चढ गया। उसे पेड़ पर चढकर समीप आया हुआ देखकर सिद्धिकरी बोली- 'हे सुन्दर, मैं सचमुच तुम पर आसक्त हूँ। आओ, यह वन भी लो और मेरे शरीर का भोग भी करो।' ऐसा कहकर उसने उस भृत्य का आलिंगन करके चुम्बन लेते हुए उसकी जीभ को दाँतों से काट दिया ॥१०५-१०८١١

वेदना से पीडित और मुंह से रक्त बहाता हुआ बनिये का वह नौकर उस वृक्ष से नीचे गिग और ल, ल, ल, करता हुआ अस्पष्ट भाषण करने लगा ।॥ १०९।।

उगे देखकर बनिया डग कि इसपर भूत सवार हो गया है और बचे हुए नौकरों को लेकर शीघ्रता से घर की ओर भागा ।। ११०।।

उमके भागते ही वह तपस्विनी सिद्धिकरी वृक्ष से नीचे उतरी और घन की गठरी लेकर अपने घर पहुँची ।।। १११।।

हे बेटे ! इस प्रकार मेरी शिष्या अति प्रतिभाशालिनी है और उसी की कृपा से मैंने बहुत-सा धन प्राप्त किया है।॥ ११२॥

ऐसा कह‌कर उस परिव्राजिका ने उसी समय आई हुई अपनी शिष्या को उन्हें दिखाया और उसका परिचय उनसे कराया ।।११३।।

इसके पश्चात् उनसे बोली- 'वेटे ! अब तुम अपना कार्य बताओ। किस स्त्री को तुमलोग चाहते हो। मैं उसे अभी सिद्ध करती हूँ' ।॥११४॥

उसकी बातें सुनकर वैश्यपुत्र बोले- 'गुसेन व्यापारी की देवस्मिता नाम की जो स्त्री है, उसमे हम लोगो का संगम कराओ' ॥ ११५॥

उनकी बात सुनकर परिव्राजिका ने कार्य साधने की प्रतिज्ञा की और उन वैश्यपुत्रों के ठहरने का प्रबन्ध अपने ही घर में कर दिया ॥ ११६॥

उनके वहाँ ठहरने पर उन्हें भोजन आदि सत्कार से प्रसन्न करके वह कुट्टनी अपनी तपस्विनी शिष्या के साथ गुहसेन के घर गई ।। ११७।।

जब वह देवस्मिता के द्वार पर पहुंची, तब जंजीर में बंधी हुई कुतिया ने भुंकते हुए अन्दर जाने से रोका ॥११८॥

देवस्मिता ने अपनी परिचारिका (सेविका) को भेजकर स्वयं उसे अपने घर पर बुलाया और शंकित हुई कि 'यह यहाँ क्यों आई है' ।।११९।।

दुष्टा परिव्राजिका ने भीतर जाकर उसे आशीर्वाद दिया और कपटपूर्ण आदर दिखलाती हुई देवस्मिता से वह पापिन बोली- 'तुम्हें देखने की इच्छा मुझे सदा वनी रहती है। आज मैंने तुम्हे स्वप्न मे दुःखी चित्त देखा है, इसीलिए उत्कंठा के साथ मिलने आई हैं। पति के विना रहती हुई तुम्हारा प्रियतम के उपभोग से रहित रूप और यौवन दोनों ही व्यर्थ है। इस प्रकार की बनावटी बातों से देवम्मिता को धैर्य आदि देकर वह देर तक बैठी रही और फिर उससे पूछकर अपने घर लौट आई ।।१२०-१२३।।

दूसरे दिन मिर्च के चूर्ण से भरे हुए मांस के टुकडे को लेकर वह फिर देवस्मिता के घर पर गई। द्वार पर बंधी हुई कुतिया को मास का टुकडा देकर वह घर में प्रविष्ट हुई और कुतिया भी मिर्च मिले हुए उस टुकड़े को खाने लगी ॥ १२८-१२५॥

मिर्च के कारण उस कुतिया की आंखो में अविरल आँसुओं की धारा बहने लगी और नाक से पानी भी वहने लगा। वह धूर्ता परिव्राजिका भी उसी समय घर मे जा देवस्मिता के सम्मुख रोने लगी। देवस्मिता द्वारा रोने का कारण पूछने पर वह बोली- 'बेटी ! बाहर जाकर रोती हुई कुतिया को तो देखो' ।॥१२७-१२८॥

उसे रोनी हुई देखकर मेरी आंखो से भी आँसू निकल आये ।। १२९॥

यह सुनकर देवस्मिता ने बाहर आकर रोती हुई कुतिया को देखा और यह क्या आश्चर्य है, ऐसा सोचती हुई खड़ी रह गई ।।१३०।।

करते हुए मैंने अपनी इन्द्रियो जाया करता था। को उपभोगो से और इन्द्रियों का दमन न करना ही परम धर्म है। तदनन्तर वह परिव्राजिका बोली- 'बेटी! पूर्वजन्म मे यह कुतिया और मैं दोनो किसी एक ब्राह्मण की पत्नियों थी। हमारा वह पति राजा का नौकर होने के कारण राजा की आज्ञा से इधर-उधर दूर देशो को उसके प्रमव-काल में यथेच्छ परपुरुष-संगम कभी वंचित नहीं किया। शरीर के भूतों इसी पुण्य कार्य के कारण मै इस जन्म में भी पूर्व-जन्म का स्मरण करती हूँ। मेरी यह सौत अपने अज्ञान के कारण अपने चरित्र की ही रक्षा करती रही। इसी कारण अब यह कुत्ते की योनि मे उत्पन्न हुई है; किन्तु पूर्वजन्म का इसे भी स्मरण है ।।१३१-१३५॥

भला, यह भी कोई धर्म है' कुट्टिनी ने, मेरे साथ यह धूर्तता की चाल चली है। ऐसा सोचकर बुद्धिमती देवस्मिता परिव्राजिका से बोली- 'भगवति ! इतने दिनों तक मैं इस धर्म को नही जानती थी, किन्तु आज जान गई। इसलिए तुम किसी सुन्दर पुरुष के साथ मेरा संगम कराओ' ।। १३६-१३७।।

तब परिव्राजिका कहने लगी कि दूसरे द्वीप से कुछ वैश्य-पुत्र आये हैं। यही ठहरे हैं। अतः मैं उन्हें तुम्हारे लिए लाती हूँ ॥ १३८॥

ऐसा कहकर प्रसन्न होती हुई कुट्टिनी अपने घर गई और इधर बुद्धिमती देवस्मिता ने, अपनी सेविकाओं से निःशंक होकर कहा- मेरे पति के हाथ में सदा खिले हुए कमल-पुष्प को देखकर और उस मद्यप से सारा वृत्तान्त पूछकर दूसरे द्वीप से कुछ दुष्ट वैश्यपुत्र मेरा सतीत्व-विनाश करने के लिए यहाँ आये है। उन्होंने ही इस कुट्टनी, दुष्टा तपस्विनी को सिद्ध किया है। इसलिए तुमलोग धतूरा मिला हुआ मद्य शीघ्रता से लाओ और बाजार में जाकर कुत्ते के लोहे के पैर बनवा लाओ ।॥ १३९-१४२॥

देवस्मिता के आज्ञानुसार सेविकाओ ने ऐसा ही किया और एक सेविका ने उसके आज्ञा-नुसार देवस्मिता का रूप धारण किया ।।१४३॥

उधर परिव्राजिका भी 'पहले मैं, पहले मैं' करते हुए उन चारो में से एक को अपनी शिष्या के वेप में छिपाकर गुप्त रूप से देवम्मिता के घर पर आई ।।१४४।।

इस प्रकार सायंकाल ही उसे देवस्मिता के घर में प्रविष्ट कराकर वह धीरे-से गुप्त रूप से लौट गई। वैश्यपुत्र के घर आने पर देवस्मिना के रूप में बैठी हुई दासी ने उसे धतूरा मिला हुआ पर्याप्त मद्य-पान कराया। मद्य के नशे में उन्मत्त वैश्यपुत्र के शरीर के सारे वस्त्र और आभूषण उतरवाकर दासियों ने उसे नंगा कर दिया। फिर उन्ही दासियों ने कुत्ते के लोहे के पैरों को आग मे लाल करके उससे उसका मस्तक दग्ध (दाग) करके उसे रात्रि के अन्धकार मे किसी मल के कुंड (संडास) मे फेंक दिया। उसी कुंड में पड़े हुए उस वैश्य-पुत्र ने ब्राह्म मुहूत्र्त्ततं में नशा उतरने पर अपने को देखा कि वह अपने पापों के परिणाम स्वरूप मल-कुंड में पड़ा है।।१४५- १४९।।

किसी प्रकार उस गढ़े से निकलकर और स्नान करके मस्तक के दागों पर हाथ फेरता हुआ वह नंगा ही परिव्राजिका के घर पहुँचा। 'अकेला मैं ही हास्य का पात्र (बेवकूफ) न बनूं'- मह सोचकर उसने कहा कि रात को उसके घर से आते हुए मुझे चोरों ने लूट लिया और मेरी यह दशा कर दी ।। १५०-१५१।।

'रात्रि के जागरण और अति मद्यपान से मेरे सिर में वेदना हो रही है' ऐसा कहकर वह कपड़े के टुकड़े से मस्तक को बाँधकर सो गया ।। १५२।।

इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा वैश्यपुत्र गया। उसने भी उसी प्रकार दुर्दशा भोगी ॥ १५३।।

वह नंगा ही कुट्टिनी के घर पहुँचकर बोला कि चोरों ने मेरी यह दुर्दशा की है ।।१५४।।

वह भी सिर-दर्द का बहाना करके सिर में कपड़ा लपेटकर सो गया ।। १५५।।

इस प्रकार क्रमशः वे चारों वैश्यपुत्र दंडित और अपमानित हुए; किन्तु एक दूसरे से अपनी दशा छिपाता ही रहा ।। १५६।।

वे इस प्रकार दुर्गति और धन-नाश होने से अत्यन्त लज्जित थे। उन्होंने उस कुट्टिनी परित्राजिका से भी यह बात प्रकाशित नहीं की और उसके घर से अपने घर चले गये ।। १५७।।

उनके चले जाने पर वह परिव्राजिका कुट्टिनी भी मफल-मनोरथ होने के कारण अपनी घूर्त शिष्या सिद्धिकरी के साथ अभिनन्दन करने के लिए देवस्मिता के घर पर गई ॥ १५८॥

देवस्मिता ने भी उसका भलीभांति स्वागत करके मानों प्रसन्नता और सन्तोष प्रकट करने के लिए धतूरे के चूर्ण से मिला हुआ वही मद्य खूब पिलवाया ।।१५९।।

उसके पश्चान् मद्यपान से उन्मत्त उस कुट्टिनी और उसकी शिष्या के भी नाक-कान कटवा-कर उन्हें उसी मल-कुंड में फेंकवा दिया, जिसमे वैश्यपुत्रों को फेंका गया था ।।१६०।।

देवस्मिता ने, इस भय से कि 'ये लज्जित और अपमानित वैश्यपुत्र अपने देश जाकर बदला लेने के लिए मेरे पति को मार न डाले' इसलिए उसने यह सारा वृत्तान्त, अपनी सास को मुना दिया ॥१६१।।

तब सास ने कहा- 'बेटी! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया। किन्तु इस कांड से मेरे पुत्र (तुम्हारे पति) को हानि हो सकती है' ॥ १६२॥

तत्र देवस्मिता ने कहा- "जैसे पहले समय में शक्तिमती ने अपने पति की रक्षा की थी; उसी प्रकार मैं भी 'उनकी' रक्षा करती हूँ" ।॥१६३।।

सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा

'बेटी, शक्तिमती ने, कैसे अपने पति की रक्षा की थी? सास के इस प्रकार प्रश्न करने पर देवस्मिता ने कहा- 'हमारे देश में नगर के भीतर मणिभद्र नाम के एक महायक्ष की मूत्ति, एक मन्दिर में प्रतिष्ठित है। नगर निवासी अपनी-अपनी कार्यसिद्धि के लिए उस मणिभद्र-मन्दिर मे जाकर मन्नतें मानते है, और अपने-अपने कार्य के अनुसार वहाँ उपहार चढ़ाते हैं। जो व्यक्ति, उस मन्दिर में दूसरी स्त्री के साथ पाया जाता था, उसे रात में मन्दिर के भीतरी भाग में बन्द कर दिया जाता था। वह प्रात. काल उनी स्त्री के साथ राजसभा मे ले जाया जाता था। वहाँ उसका वृत्तान्त प्रकट करके उसे मार डालने का दण्ड दिया जाता था। ऐसी व्यवस्था वहाँ थी ।। १६८-१६८।।

एक बार उस मन्दिर में गत के समय दूसरी स्त्री के साथ समुद्रदत्त नामक बनिये को नगर-रक्षक (कोतवाल) ने पकडा और उसे मन्दिर के भीतर उस स्त्री के साथ बन्द करके सुदृढ़ सौकल लगवा दिये ।।१६९-१७०।।

उसी समय समुद्रदत्त की अत्यन्त बुद्धिमनी और पतिव्रता पत्नी ने यह समाचार सुना। और साथियो के साथ पूजा सामग्री आदि उपहार लेकर वह मन्दिर मे गई ।। १७१-१७२।।

मन्दिर के पुजारी ने लम्बी दक्षिणा के लोभ से कोतवाल को कहकर मन्दिर का द्वार खुलवा दिया ।। १७३।।

उसने मन्दिर के भीतर जाकर किसी स्त्री के साथ अपने पति को देखा और अपने कपड़े उस स्त्री को पहिनाकर कहा- 'तुम जाओ' ॥१७४।॥

वह स्त्री शक्तिमती के वेष मे बाहर निकल गई और शक्तिमनी उस स्त्री के वेष में पति के पास रह गई ॥ १७५।।

प्रात काल राजा के अधिकारियो ने जब आकर देखा तो वह बनिया अपनी स्त्री के साथ पाया गया ।। १७६।।

यह वृत्तान्त जानकर राजा ने मृत्यु-मुख से उसे मुक्त कर दिया और प्रमाद करने के कारण कोतवाल को दंड दिया ।। १७७।।

समुद्रवत्त की कथा क्रনহা:

जिस प्रकार पूर्वकाल में शक्तिमती ने बुद्धि से अपने पति की रक्षा की थी, उसी प्रकार मैं भी उपाय करके अपने पति की रक्षा करूँगी ।। १७८।।

अपनी सास से एकान्त में इस प्रकार बातें करके देवस्मिता ने अपनी सहेलियों के साथ व्यापारी बनियों का-सा वेष बनाया। और व्यापार करने के बहाने से जहाज पर चढ़कर कटाह-द्वीप मे पहुँची, जहाँ उसका पति ठहरा था। कटाह-द्वीप के जौहरी-बाजार में व्यापारियों के मध्य बैठे हुए उसने मूत्तिमान् धैर्य के समान अपने पति को देखा ।।१७९-१८०।।

गुप्तसेन ने भी पुरुष के वेष में अपनी पत्नी देवस्मिता को भलीभाँति पहिचाना तो नही, किन्तु 'यह उसी के समान कौन है?' देखकर इस चिन्ता में निमग्न हो गया ।। १८१-१८२।।

देवस्मिता ने, कटाह-द्वीप के राजा के पास जाकर प्रार्थनापूर्वक निवेदन किया कि आप अपने नगर की सारी जनता को एकत्र करें ।॥१८३॥

उसकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा ने सभी नागरिकों को कौतूहल के साथ एकत्र किया और बनिये के वेप में स्थित देवस्मिता से कहा- 'नागरिक एकत्र है, तुम अपनी प्रार्थना सुनाओ' ॥ १८४॥

उत्तर मे देवस्मिता ने कहा- 'यहाँ मेरे चार दास भागकर आये है। महाराज ! उन्हें मुझे सौंप दें ।॥ १८५।।

तब राजा ने उससे कहा कि ये सभी नागरिक यहाँ उपस्थित हैं। इनमें से तुम अपने चारो दामो को पहचानकर पकड़ो ।।१८६॥

तब देवस्मिता ने अपने घर में दंडित. अतएव, अपने-अपने माथे पर दुपट्टा बाँधे हुए उन चारो वैश्यपुत्रों को पहचानकर पकड लिया ॥१८७॥

उनके पकडे जाने पर वहाँ एकत्र सभी बनिये क्रोध से बोले- 'ये तो जहाजी व्यापारियों के पुत्र है। तुम्हारे दाम कैसे हो सकते है?' तब उसने उन्हें प्रत्युत्तर दिया कि 'यदि आपलोगो को विश्वास नहीं है, तो इनके मस्तको को देखें। मैने कुत्ते के पर्दाचह्नों से इन्हे दाग दिया है' ।।१८८-१८९।।

तब सभी ने उसकी बात सुनकर दुपट्टे हटाकर देखा कि उनके मस्तकों पर कुत्ते के पैर दागे गये थे ।।१९०।।

इस स्थिति से वैश्य, लज्जित हो गये और राजा को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ।।१९१॥

इसके पश्चात् राजा ने स्वयं देवस्मिता से पूछा कि 'यह क्या बात है ?' ॥१९२॥

राजा के पूछने पर देवस्मिता ने सारा और सत्य वृत्तान्त सबको सुना दिया, जिसे सुनकर जनता हँसने लगी और तब राजा ने कहा कि 'न्यायत. ये तेरे दास हैं; तब वहाँ के वैश्यों ने धन-संग्रह करके देवस्मिता को दिया और उन चारों को दासता से मुक्ति दिलाई। राजा ने भी उस पतिव्रता को पर्याप्त धन और वैश्यपुत्रों को दंड दिया ।।१९३॥

इस प्रकार समस्त जनता से प्रशंसित वह पतिव्रता देवस्मिता घन और पति को साथ लेकर अपनी नगरी ताम्रलिप्ति को लौट आई और फिर कभी उसे पति-वियोग नही हुआ ।। १९४।।

हे देवि ! इस प्रकार अच्छे कुल में उत्पन्न ऐसे धीर और उदार चरितवाली होती है; जो अनन्य मन से पतिपरायण होती है; क्योकि पति ही सती स्त्रियों का परम देवता है ।। १९५।।

वसन्तक के मुख से इस प्रकार की कथा को सुनकर वासवदत्ता ने तुरन्त छोडे हुए पिता के घर को लज्जा-गृह बनकर वत्सेश्वर के प्रति प्रौढ़ प्रेम में पगे हुए मन को भक्ति-प्रवण बना दिया ।। १९६।।

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुख लम्बक का पचम तरंग समाप्त ।

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1. चाण्माल का कर्म करनेवाली नीच जाति का पुरुष, जिसे डोम कहते हैं।- अनु०

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