5.203. || तीसरी कहानी || राजा उदयन की कथा
5.203. || तीसरी कहानी || राजा उदयन की कथा
तृतीय तरंग
राजा उदयन की कथा
महस्रानीक के महाप्रस्थान के लिए हिमालय की ओर चले जाने पर, राजा उदयन, वत्स-प्रदेश का शासन प्राप्त करके, राजधानी कौशाम्बी में रहकर सुखपूर्वक प्रजा का शासन करने लगा ।। १।।
राजा उदयन यौगन्धरायण, रुमण्वान आदि मन्त्रियो पर शासन-भार छोडकर एकमात्र आनन्द लेने में तल्लीन हो गया ।।२।।
राजा के सुख-साधनों मे वासुकि द्वारा बाल्यकाल में दी हुई घोपवती वीणा ही प्रमुख माधन के रूप में थी, जिसे वह दिनरात बजाया करना था ।॥३॥
राजा उदयन, वीणा के तारों के मधुर स्वर-रूपी मोहन-मन्त्र से, मदोन्मत्त जंगली हाथियो को वश में कर और वांधकर ले आता था, यही उसका एक विनोद था ॥४॥
वह वत्मगज उदयन, वेश्याओ की मुखचन्द्र की प्रतिमाओं से सुशोभित मदिरा और मन्त्रियो की मुखकान्ति को साथ-साथ पान करता था ।।५।।
गजा उदयन को केबल एकमात्र यही चिन्ता थी कि मेरे वय के अनुमार उच्च वंश की कन्या कही नहीं दीखती, केवल वासवदत्ता नाम की एक प्रसिद्ध कन्या मुनी जाती है ॥६॥
'वह कैसे मिले'- बस यही एक मात्र चिन्ता उगके मन में थी। पिता उज्जैन के राजा चडमहासेन को भी यह चिन्ता सता रही थी ।।७।। उधर वासवदत्ता के
कि मेरी अनुपम सुन्दरी और गुणवती कन्या के योग्य वर संसार में मिलेगा नही। केवल एक योग्य वर उदयन है, किन्तु वह मेरा मदा का विरोधी है ।॥८॥
उसके लिये एक उपाय हो कि जिससे वह मेरे वश में आ जाय और मेरा जामाता भी वन जाय। उदयन प्राय अकेला ही जगलों मे वीणा बजाकर हाथियों को पकडता फिरता है ।।९।।
वह शिकार का व्यसनी है, अतः अवसर ढूंढ़कर किसी युक्ति से उसे जंगल से पकड़वाकर वश में किया जाय और यहां लाया जाय ।।१०।।
वह संगीत-शास्त्र का विशेषज्ञ है। अत. अपनी कन्या वासवदत्ता को उसकी सगीत-शिष्या बना दूंगा। इस प्रकार, वासवदत्ता को देखकर वह निस्सन्देह उसका अनुरागी बन जायगा। फलतः, वह मेरा वशीभूत और जामाता बन जायगा ।।११-१२।।
ऐसा सोचकर चंडमहासेन, उस कार्य की सिद्धि के लिए चंडिका के मन्दिर में गया और वहाँ उसने पूजा तथा स्तुति करके मन्नत मानी ॥१३॥
चंडिका-मन्दिर मे राजा ने आकाशवाणी सुनी कि 'हे राजन् ! तुम्हारी यह अभिलाषा पूर्ण होगी' ।।१४।।
प्रसन्नचित्त राजा ने चडिका-मन्दिर से लौटकर बुद्धदत्त नामक मंत्री से इस विषय पर विचार-विमर्श किया ।। १५॥
राजा ने कहा- 'राजा उदयन, उग्र आत्माभिमानी, निर्लोभ, अनुरक्त अनुचरोंवाला और महाबल (सेना) वान् है ! वह साम, दाम, भेद, दंड आदि नीतियों के वश में आनेवाला नही है, उसे शान्ति से ही वश में लाना चाहिए ।।१६।।
मन्त्री के साथ इस प्रकार विचार करके राजा ने एक दूत को राजा उदयन के पास भेजा और वह सन्देश दिया कि तुम मेरे कथनानुमार वत्सराज के पास जाकर यह कहो कि 'मेरी पुत्री तुममे सगीत-विद्या सीखना चाहती है। यदि तुम्हें हमारे प्रति स्नेह है, तो तुम उमे यहाँ आकर शिक्षा दो ॥१७-१८।।
इस प्रकार उस सन्देश के माथ भेजे हुए दूत ने कौशाम्बी नगरी में जाकर अपने स्वामी का सन्देश वत्सराज उदयन में कह मुनाया ।। १९।। उदयन ने दून से उज्जयिनी-नरेश के इस अनुचिन सन्देश को सुनकर एकान्त मे मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२०॥
'इम चंडसेन ने मुझे यह कैसा साभिमान सन्देश भेजा है। ऐसा सन्देश देते हुए उस दुष्ट का क्या अभिप्राय हैं। बन्सराज के ऐसा कहने पर स्वामी के हित में सुदृढ और सतर्क यौगन्धरायण मन्त्री ने राजा से कहा ।। २१-२२।।
'महाराज ! संमार में तुम्हारे अतिव्यसनी होने की प्रसिद्धि, जो लता के समान फैली है; उमी लता के ये कडए और कसैले फल है। वह तुम्हें प्रेमी-हृदय समझकर अपनी सुन्दरी कन्या के प्रलोभन में फंसाकर ओर बन्दी बनाकर जामाता बनाना चाहता है। इसलिए महाराज ! अव तुम हाथियों के शिकार का यह युग व्यसन छोड़ दो। जिस प्रकार गड्ढों में हाथी फँमाये जाते है, उसी प्रकार व्यसनी गजा, शत्रुओं द्वारा व्यसनो के गड्डो में फंसाये जाते है' ॥२३-२५।।
मन्त्री की यह बात सुनकर धैर्यशाली राजा ने चंडमहासेन के प्रति अपनी ओर से दूत भेजा ॥ २६॥
और उसके द्वारा यह मन्देश भेजा कि 'यदि तुम्हारी इच्छा अपनी पुत्री को मेरी शिष्या बनाने की है, तो उसे यही मेरे पास भेज दो' ।॥ २७॥
इस प्रकार सन्देश भेजकर राजा उदयन ने मन्त्रियों से कहा- 'मैं अभी जाता हूँ और चंडमहासेन को बाँधकर लाता हूँ' ।॥ २८॥
राजा के विचार सुनकर मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण बोला- 'ऐसा करना न तो सम्भव है और न उचित ही है। वह राजा प्रभावशाली है और उसे तुम्हें अपनाना भी चाहिए। इसके सम्बन्ध में विस्तार से कहता हूँ, सुनो' ।॥२०-३०।।
राजा चंडमहासेन की कथा
इस भूलोक में उज्जयिनी नाम की नगरी है, जो भूलोक का भूषण है, और सुधा-धवल प्रासाद-पंक्तियो से वह इन्द्रपुरी अमरावती को मानों हँसती है ।।३ १।।
जिम नगरी में महाकाल भगवान् शिव कैलाम का निवास छोड़कर रहा करते है ।। ३२।।
उस नगरी में राजाओं मे श्रेष्ठ महेन्द्रवर्मा नाम का राजा था और जयमेन नामक, उसी के ममान, उसका पुत्र हुआ ।। ३३।।
उम जयमेन का अनुपम बलशाली पुत्र महासेन हुआ ।। ३४।।
उस महामेन ने, बहुत दिनो तक शामन करते हुए सोचा कि न तो मेरे पाम मेरे योग्य खड्ग है और न उच्चकुलप्रसूत पत्नी ही है ॥ ३५॥
ऐम। मोचकर वह राजा महासेन, चंडिका के मन्दिर में गया और निराहार रहकर चिरकाल तक उसकी (चडिका की) आराधना करने लगा ।।३६।।
अपना मांस काटकर जब उसने देवी के लिए हवन किया, तब देवी ने प्रसन्न होकर कहा--'पुत्र ! मैं तेरी आराधना में प्रसन्न हूँ। यह उत्तम खड्ग लो, इसके प्रभाव से शत्रु तुम्हें जीत न सकेंगे। तुम उनके लिए अजेय हो जाओगे और अंगारकासुर की अंगारवती नाम की कन्या है, जो त्रैलोक्य में एकमात्र मुन्दरी है, वह शीघ्र ही तुम्हारी पत्नी बनेगी। तुमने अपना मांग काटकर बलि देते हुए अत्यन्त चंड (उग्र) कार्य किया है, अत. तुम्हारा नाम चंडमहासेन होगा।' इतना कहकर और खड्ग को देकर देवी अन्तर्धान हो गई और राजा भी मानसिक संकल्प की सफलता से हर्ष का अनुभव करने लगा ।।३७-४१।।
महाराज ! वह खड्ग और नडागिरि नाम का हाथी- ये दो उस राजा के उसी प्रकार के अमूल्य रत्न है, जिस प्रकार इन्द्र के पास वज्ज्र और ऐरावत हाथी। इन दोनो के प्रभाव से अत्यन्त सुखी राजा चडमहासेन एक बार शिकार खेलने के लिए घोर जंगल में गया। वहाँ उसने सहसा बहुत लम्बे-चौड़े एक भीषण शूकर को देखा, जो दिन में सिमटे हुए रात के अंधकार के गोले के समान प्रतीत हो रहा था ।।४२-४८।
वह शूकर, राजा के तीक्ष्ण बाणो से विद्ध होकर भी आहत न हुआ और राजा के रथ को टक्कर मारकर एक बिल में जा घुसा ।। ४५।।
राजा क्रोध से भरकर और रथ को छोडकर उसका पीछा करते हुए धनुष के साथ उसी बिल में चला गया ।।४६।।
बिल में दूर तक जाकर राजा ने एक सुन्दर मजा हुआ नगर देखा। थका हुआ राजा, विश्राम के लिए वहां एक बावली के तट पर जा बैठा। राजा ने उस वापी में अनेक सहेलियो के साथ स्नान करती हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा, जो धैर्य को नष्ट कर देनेवाले कामदेव के एक बाण के समान थी ।।४७-८८।।
वह सुन्दरी, अपनी दृष्टि से प्रेम-रंग बरसाकर मानो राजा को स्नान कराती हुई और रोती हुई राजा के पास आई और बोली- हे सोभाग्यशालिन् ! तुम कौन हो? और इस समय यहाँ किर्मालए आये हो ?' यह सुनकर राजा ने उससे मारी मच्ची बात कह दी। राजा की बातें सुनकर, उस मुन्दरी ने. आआंग्बो से अविरल अनु-धाग और हृदय से धैर्य को एक साथ ही छोड़ दिया। 'तुम कौन हो और क्यों रो रही हो?' राजा के इस प्रकार पूछने पर कामदेव से प्रेरित वह बाला बोली-'जो शूकर इस बिल में घुमा है, वह अंगारकासुर नाम का देत्य है और मैं अगारवती नाम की उसकी कन्या हूँ। यह अंगारकासुर, वज्ज्र के तत्त्व से बना हुआ अत्यन्त बलवान् है। जिन राजकुमारियो को तुम यहाँ देख रहे हो, इन्हें यह दैत्य, राजाओं के महलो से बलपूर्वक छीनकर लाया है। इन्ही से इसने मेरा परिवार बनाया है ।।४९-५४।॥
यह असुर, शाप के कारण राक्षस बन गया है। शाप के कारण ही प्यासा और थका हुआ इसने तुम्हें पाकर भी छोड दिया है। इस समय वह शूकर-रूप को त्याग कर सो रहा है।¹ सोकर उठते ही वह अवश्य तुम्हे मार डालेगा ।।५५-५६॥
इसी कारण आँखों से ये आँसू तुम्हारा कल्याण न देखकर शरीर से प्राणों के समान निकल रहे हैं' ।॥ ५७।।
राजा अंगारवती की बात सुनकर उससे बोला- "यदि तुम्हें मुझ पर स्नेह है, तो तुम मेरी एक बात मानो ॥५८॥
वह यह कि जव अगारकासुर मोकर उठे, तब तुम उस अपने पिता के सामने खूब रोओ, तब वह अवश्य ही तुम्हारे रोने का कारण पूछेगा ।।५९।।
तव तुम उससे कहना, मुझे यह दुख हो रहा है कि 'यदि तुम्हें कोई मार डाले, तो मेरी वया गति होगी? यही दुख मेरे रोने का कारण है' ॥ ६०।।
तुम्हारे ऐसा करने पर मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा।" राजा से यह सुनकर अगारवती ने उमी प्रकार करना स्वीकार कर लिया ॥६१॥
अगारवती ने पिता के भय से राजा को पास ही कही छिपा दिया और स्वयं सोये हुए पिता के निकट चली गई ।।६२।।
वह दैत्य जब जागा, तब कन्या रोने लगी। तब दैत्य ने पूछा- 'बेटी ! क्यों रो रही हो ? तव अगारवती ने कहा- पिता यदि तुम्हें कोई मार डाले, तो मेरी क्या गति होगी। इसी वेदना से मे रो रही हूँ।' उसके ऐसा कहने पर वह दैत्य हँसकर कहने लगा- ॥६३-६४।।
'बेटी, मुझे कौन मारेगा। मेग सारा शरीर, वज्र में बना है। केवल बाई हथेलो मे एक छिद्र (दुर्बलता) है, उसकी रक्षा धनुष से हो जाती है।' इस प्रकार देत्य ने पुत्री को धीरज बंधाया और यह सब पास ही छिपे हुए राजा ने सुन लिया ।।६५-६६।।
तदनन्तर कुछ ही समय बाद वह दानव उठा और स्नान करके शिवजी की पूजा-स्तुति करने लगा ।।६७।।
राजा ने भी उस समय प्रकट होकर दानव को युद्ध के लिए ललकारा ॥६८॥
मौन मुद्रा में बैठा हुआ वह दैत्य. वायें हाथ को ऊपर उठाकर 'जरा ठहरो', इस प्रकार राजा से संकेत करने लगा। राजा वाण-विद्या में सिद्धहस्त तो था ही, उसी समय उसने एक बाण दैत्य के मर्मस्थान (बाईं हथेली पर मारा। वह दैत्य मर्मस्थान पर आघात होने के कारण भीषण चीत्कार के साथ प्राणों को त्यागता हुआ बोला- ।।६९-७१।।
'मुझ प्यासे को जिसने मारा है, वह यदि प्रतिवर्ष पानी से मेरा तर्पण न करेगा, तो उसके पाँच मन्त्री मर जायेंगे' ।॥७२॥
इस प्रकार कहते हुए अंगारकासुर ने प्राण छोड़ दिये और राजा भी उसकी पुत्री अंगारवती को लेकर उज्जैन चला गया ।।७३।।
उज्जैन में जाकर उम अंगारवती से विवाह करने पर चंडमहासेन राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए, एक गोपालक और दूसरा पालक ! राजा ने दोनों का जन्मोत्सव खूब धूमधाम के साथ मनाया ।।७४-७५।।
एक बार सोये हुए राजा को स्वप्न में इन्द्र ने कहा- 'राजन् ! तुम मेरी कृपा से अपूर्व सुन्दरी कन्या प्राप्त करोगे' ।॥७६॥
इस प्रकार इन्द्र की कृपा से राजा को नवीन चन्द्रमा के समान सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। उसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि इस कन्या के गर्भ से कामदेव का अवतार होगा, जो सब विद्याधरो का चक्रवर्ती होगा ।।७७-७८।।
राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम इसीलिए वासवदत्ता रखा कि उसे वह वासव, अर्थात् इन्द्र के प्रमाद से प्राप्त हुई थी ॥ ७९।।
वह कन्या, इस समय राजा के भवन में उसी प्रकार निवास कर रही है, जिस प्रकार मन्थन से पहले समुद्र-गर्भ में लक्ष्मी निवास करती थी ।।८०।।
यौगन्धरायण ने कहा- 'महाराज! वह उज्जैन का महाराजा चंडमहासेन इस प्रकार सुदृढ़ दुर्ग में स्थित महाबलवान् है। वह सहज में ही नही जीता जा सकता। साथ ही राजन् ! वह स्वयं ही तुम्हें कन्या देना चाहता है, किन्तु अत्यन्त आत्माभिमानी होने के कारण अपने पक्ष को ऊँचा रखना भी चाहता है ।।८१-८२॥
इसलिए उस वासवदत्ता से तुम्हे अवश्य ही विवाह करना चाहिए।' राजा उदयन मन्त्री यौगन्धरायण की बातें सुनकर वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त आकृष्ट होकर आत्मविस्मृत-सा हो गया ।।८३।।
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त
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1. कृत्रिम रूपवाले निद्रावस्था में अपने वास्तविक रूप में हो जाते हैं। यह प्राकृतिक नियम है। - अनु०
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