5.403. || तृतीय कहानी || वासवदत्ता का स्वप्न; सिंहविक्रम और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा; मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति; नरवाहनदल का जन्म।

5.403. || तृतीय कहानी || वासवदत्ता का स्वप्न; सिंहविक्रम और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा; मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति; नरवाहनदल का जन्म।

तृतीय तरंग

वासवदत्ता का स्वप्न

कुछ समय के अनन्तर एक दिन वासवदत्ता मन्त्रियो के साथ बैठे हुए वत्सराज से एकान्त में इस प्रकार कहने लगी- ।।१।।

'हे आर्यपुत्र ! जबसे मैंने इस गर्भ को धारण किया है, तब से मुझे इसकी रक्षा के लिए हृदय में अत्यधिक व्याकुलता बढ़ रही है ।॥२॥

इसी प्रकार की चिन्ता करती हुई मैं आज रात किसी प्रकार सोई। नींद आने पर मैंने स्वप्न में एक पुरुष को देखा ।। ३।।

उस पुरुष की मूत्ति भस्म के अंगराग से श्वेत थी और मस्तक पर चन्द्रमा था। उसकी लम्बी-लम्बी और पीले रंग की जटाएँ थीं और हाथ में त्रिशूल था ।।४।।

उसने मेरे पास आकर मानों दयार्द्र होकर कहा- 'बेटी! तुम्हें अपने गर्भ के सम्बन्ध में कोई भी चिन्ता नही करनी चाहिए ।।५।।।

मैं तेरे गर्भ की रक्षा करता हूँ और मैंने ही तुझे यह गर्भ दिया है। तुम्हारे विश्वास के लिए एक बात और बता दूं, सुनो ।।६।।

प्रातःकाल कोई एक स्त्री अपने पति को पकड़कर डाँटती-डपटती और उसे खीचती हुई कुछ निवेदन करने के लिए तुमलोगो के पास आवेगी ।।७।।

वह स्त्री दुराचारिणी है और अपने बन्धुओं के बलपर पति को मारना चाहती है। वह मिथ्या भाषण करती है ।।८।।

यह बात सुनकर वत्सराज उदयन को पहले ही बता देना, जिससे वह सज्जन पति उम दुष्टा मे छूट जाय' ।।९।।

इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा देने पर और उनके सहसा अदृश्य हो जाने पर मैं एकाएक जागी, तो देखा कि रात भी बीत चुकी और प्रातःकाल हो गया ।।१०।।

रानी का यह स्वप्न-समाचार सुनकर शिवजी की कृपा का वर्णन करते हुए उस स्त्री के आने की प्रतीक्षा करते हुए सभी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो रहे थे ।।११।।

उसी क्षण प्रधान द्वारपाल ने आकर दीनो पर दयालु वत्सराज से एकाएक निवेदन किया-॥१२।।

'महाराज ! अपने बान्धवों के साथ पाँच पुत्रों को लिये हुए और विवश पति को डाँटती-फटकारती हुई कोई स्त्री महाराज से निवेदन करने के लिए द्वार पर आई है' ।।१३।।

रानी के स्वप्न-समाचार से आश्चर्यचकित राजा ने यह सुनते ही 'उसे यहीं लाओ' -इस प्रकार की आज्ञा द्वारपाल को दी ।।१४।।

स्वप्न की सत्यता से उत्तम पुत्र की प्राप्ति का पूर्व विश्वाम हो जाने के कारण रानी वासवदत्ता ने परम प्रसन्नता प्राप्त की ।।१५।।

तदनन्तर बड़े ही कौतुक के साथ द्वार की ओर देखते हुए सभी उपस्थित व्यक्तियो के सामने पति से युक्त वह स्त्री द्वारपाल की आजा से सम्मुख आई ॥१६।।

आते ही दीनतापूर्ण मुख बनाकर और क्रमशः सभी उपस्थित व्यक्तियों का अभिवादन करके रानी के साथ बैठे हुए राजा से उसने निवेदन किया- ।।१७।।

'हे महाराज ! मुझ निरपराधिन का पति होकर भी यह व्यक्ति मुझ अनाथिनी को भोजन-वस्त्र नही देता' ॥१८॥

पत्नी के ऐसा कहने पर उसके पति ने कहा- 'महाराज ! अपने भाई-बन्धुओं के साथ मुझे मार डालना चाहती हुई यह स्त्री झूठ बोलती है। एक बर्ष पर्यन्त मैंने इसे भोजन-वस्त्र आदि सब कुछ दिया है। इसके सभी भाई-बन्धु तथा और भी निष्पक्षपात व्यक्ति इस बात के साक्षी हैं' ।।१९-२०।।

इस प्रकार, उससे निवेदित राजा स्वयं बोला- 'इस बात का साक्ष्य रानी के स्वप्न में भगवान् शिवजी ने स्वयं किया है; तो अब और दूसरे साक्षियों की क्या आवश्यकता है। अतः इस दुष्टा स्त्री को बन्धु-बान्धुवो सहित पकड़कर कैद कर लेना चाहिए ।॥२१॥

राजा के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा- ॥२२॥

'महाराज ! यह तो ठीक है। फिर भी नियमानुसार माक्षियो की बातो पर ही यथो-चित दड दिया जाना चाहिए; क्योंकि जनता स्वप्न की बात को न जानती हुई इस समुचित न्याय पर कैसे विश्वास करेगी ।। २२-२३।।

यह सुनकर और यौगन्धरायण की सम्मति को उचित मानकर राजा ने साक्षियों को बुला-कर माक्षी ली। मभी ने उम स्त्री को झूठी बताया ॥२४।।

तब राजा ने उस स्त्री के लिए बन्धुओं के साथ सज्जन पति के द्रोह का अपराध लगाकर पुत्रो और बन्धुओं के माथ देगनिकाले का दड दिया ।।२५।।

और, उसके सज्जन पति को छोड़कर दयालु राजा ने उसका दूसरा विवाह करने के लिए स्वय प्रचुर द्रव्य भी उसे दिया ।।२६।।

सच है, क्रूर और कुलटा स्त्रियाँ, दुर्दशाग्रस्त एव व्याकुल पतियों को जीते-ही-जीते कौवियों के ममान नोच खाती हैं ।॥२७।।

वृक्ष की छाया के ममान स्नेहपूर्ण, कुलीन, उदारहृदया, दुःखहारिणी और सन्मार्ग स्थित पत्नी किसी को ही यड़े पुण्यों से प्राप्त होती है ॥ २८॥

इस प्रकार कहते हुए राजा के समीप बैठा हुआ कथा कहने में निपुण विदूषक वसन्तक बोला- ॥२९।।

'महाराज ! एक बात और भी है कि मनुष्य में परस्पर स्नेह या विरोष प्रायः पूर्व जन्म के संस्कारो से ही होता है ॥ ३०॥

मैं इस सम्बन्ध में एक कथा या कहानी सुनाता हूँ, उसे सुनो ॥३१॥ 

सिंहविक्रम और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा

किसी समय वाराणसी नगरी में विक्रमचंड नाम का एक राजा था। उसका सिंह-विक्रम नाम का एक प्यारा सेवक था; जो युद्ध में और जुआ खेलने में अति निपुण था ।॥३१-३२॥

उसकी कलहकारिणी नाम की पत्नी यथार्थ नामवाली थी, जो शरीर और हृदय दोनों से कुटिल थी ।। ३३।।

वह धैर्यशाली सिंहविक्रम नौकरी से और जुए से भी प्राप्त सभी धन उस पत्नी को अर्पण कर देता था ।। ३४।।

तीन पुत्रोंवाली वह दुष्टा स्त्री एक क्षण भी विना कलह किये नही रह सकती थी ।। ३५।।

वह अपने पति से कहा करती थी कि 'तुम बाहर ही खाते-पीते हो, मुझे कुछ नही देते हो'। इस प्रकार वह उसे प्रतिदिन सन्ताप देती थी ॥ ३६॥

भोजन, वस्त्र और आभूषण आदि से सदा उसको प्रसन्न रखने की चेष्टा करते रहने पर भी वह अनन्त भोग-तृष्णा के समान सदा जलती ही रहती थी ।। ३७।।

इस प्रकार, उसके दुःख से दुःखी सिविक्रम उस घर को छोड़कर विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करने के लिए चला गया ।। ३८।।

वहाँ जाकर उसके निराहार धरना देने पर प्रसन्न देवी ने स्वप्न में उससे कहा- 'बेटा ! उठो उसी वाराणसी नगरी को जाओ ।॥३९।।

वहाँ एक बहुत विशाल वटवृक्ष है, उसकी जड खोदने पर तुम बहुत बड़ा खजाना पाओगे। उसके भीतर तुम मानो आकाश से गिरा हुआ और तलवार-सा चमकता हुआ एक मणिमय पात्र पाओगे। उसके भीतर देखने से सभी प्राणियों के पूर्वजन्म तुम देख सकोगे। उससे तुम अपनी पत्नी तथा अपने पूर्व जन्म की जाति को जानकर सफल, सुखी और शोकरहित हो जाओगे' ।।४०-४३।।

देवी से इस प्रकार आदिष्ट वह सिंहविक्रम प्रातःकाल उठकर और व्रत का पारण (समाप्ति) करके वाराणसी को गया ।॥४४।।

वहाँ जाकर उसने वटवृक्ष की जड़ से खजाना प्राप्त किया और वह पात्र भी उसे मिल गया ।।४५।।

उस पात्र में उसने अपनी पत्नी को पूर्वजन्म में भीषण भालू (मादा) के रूप में और अपने को सिंह के रूप में देखा। अतः उसने पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण अपना और पत्नी का घोर मतभेद समझकर दुःख और मोह छोड़ दिया ॥४६-४७।।

उसके पश्चात् उसने पात्र के प्रभाव से अनेक कन्याओं के पूर्वजन्म को देखा और पूर्वजन्म की भिन्न-भिन्न जातीय उन कन्याओं को छोड़कर अपने पूर्व जाति के समान सिह जाति की एक कन्या से उसने विवाह किया। उस स्त्री का नाम सिहश्री था ।।४८-४९।।

उस कलहकारिणी स्त्री को केवल भोजन मात्र देकर, खजाना मिलने से सुखी सिंहविक्रम नवीन वधू के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ।।५०।।

इस कथा को सुनाकर वसन्तक ने कहा- महाराज। इस प्रकार पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण भी स्त्री, पुत्र, मित्र आदि इस जन्म में स्नेही या विरोधी हो जाते है ।।५१।।

वत्सराज उदयन वसन्तक के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।।५२।।

इस प्रकार गर्भवती रानी के मुखचन्द्र को निरन्तर देखते हुए राजा के दिन व्यतीत होने लगे ।।५३।।

मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति

इन्ही दिनो राजा के सभी मन्त्रियों के यहाँ शुभ लक्षणोंवाले पुत्र उत्पन्न हुए, जो भविष्य के लिए कल्याण-प्राप्ति की सूचना देनेवाले थे ।॥५४।।

सबसे पहले यौगन्धरायण का मरुभूति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।।५५।।

तब सेनापति रुमण्वान् का हरिशिख नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और नर्मसचिव वसन्तक का भी तपन्तक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।।५६।।

तब नित्योदित नाम के द्वारपालाध्यक्ष के, जिसका दूसरा नाम 'इत्यक' था, गोमुख नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ।।५७।।

ये सभी बालक विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती एव वैरियों के वंश का नाश करनेवाले वत्सराज के कुमार के भावी मन्त्री होंगे ॥५८॥

इन बालकों के उत्पन्न होने पर जब महोत्सव मनाये जा रहे थे, तब उस समय वहाँ पर आकाश से देववाणी हुई ।।५९।।

'कुछ ही और दिनों के व्यतीत होने पर वत्सराज की रानी वासवदत्ता का प्रसवकाल भी सन्निकट होगा' ।।६०।।

नरवाहनदल का जन्म

अब वह रानी आक और शमी के पत्तों से ढँकी हुई खिड़‌कियोंवाले, रत्न-दीपकों की किरणों और शस्त्रास्त्रों की चमक-दमक से आलोकित एवं पुत्रवती सुहागिनों से भरे हुए प्रसूति-गृह में रहने लगी ॥६१।।

वह प्रसूति गृह, मन्त्रियों द्वारा अनेक मन्त्र-तन्त्रों से सुरक्षित किया गया, मानों मृगों की रक्षा के लिए और कष्टों के लिए दुर्गम दुर्ग बन गया हो। उस प्रसूति गृह में रानी ने समय आने पर सुन्दर और दर्शनीय पुत्र को इस प्रकार जन्म दिया, जिस प्रकार आकाश स्वच्छ और अमृतमय चन्द्रमा को जन्म देता है ।।६२-६४।।

इम कुमार के जन्म लेने से केवल प्रसूति गृह ही आलोकित नही हुआ, प्रत्युत माता का हृदय-मन्दिर भी शोक-रहित हो, प्रसन्नता से आलोकित हो उठा ।।६५।।

पुत्र-जन्म से, सारे रनिवास में, प्रसन्नता की लहर उठ गई और रनिवास के व्यक्ति से ही राजा उदयन ने यह शुभ समाचार सुना ।।६६।।

पुत्र-जन्म का समाचार सुनानेवाले दूत को प्रसन्न राजा ने, अपना राज्य लालचवश नहीं दिया, यह नही, प्रत्युत अनुचित समझकर ही नहीं दिया ।। ६७।।

इस प्रकार, चिरकाल के पश्चात् सफल मनोरथवाले महाराजा ने अत्यन्त उत्सुक हृदय से प्रसूति गृह में आकर बालक को देखा ॥६८॥

उस बालक का मुख लाल और चौड़े अधरोंवाला, ऊन के रेशों के समान सिर के कोमल बालोवाला और साम्राज्य लक्ष्मी के लीला-कमल के समान शोभित हो रहा था ।।६९।।

अन्य राजाओं की राज्य लक्ष्मी ने मानों भय से उसके कोमल चरणों को पहले से ही छत्र और चामर से चिह्नित कर दिया था ।। ७०।।

पुत्र का मुख देखने पर हर्ष की अधिकता से फैली हुई और हर्षाश्रु-धारा बहाती हुई आँखों से प्रतीत होता था कि राजा की पुत्र-स्नेह-धारा मानों बह निकली ॥७१।।

उस अवसर पर राजा के परम हितैषी यौगन्धरायण बादि भी अति प्रसन्न हो रहे थे। उसी समय आकाश से इस प्रकार की वाणी हुई- 'राजन् तुम्हारा यह पुत्र कामदेव का अवतार है, इसका नाम नरवाहनदत्त होगा। यह वीर एक दिव्य युग तक विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा रहेगा' ।॥७२-७४।।

ऐसा कहकर वाणी बन्द हो गई। आकाश से पुष्पवर्षा हुई और शहनाइयों के संगीत फैलने लगे ॥७५।।

देवताओं द्वारा मनाये गये उत्सव से अत्यन्त उत्साहित और प्रसन होकर राजा ने अपने विस्तृत राज्य में व्यापक पुत्रजन्म-महोत्सव मनाया ॥७६।।

वाद्यों के शब्द घरों से निकलकर आकाश में फैलने लगे, मानों समस्त विद्याधरों को नवीन राजा के जन्म लेने की सूचना दे रहे हों ।। ७७।।

ऊँचे-ऊँचे महलों पर फहाती हुई लाल रंग की पताकाएँ मानों प्रसन्नता से आपस में गुलाल उड़ा रही हों- ऐसी प्रतीत होती थीं ॥७८॥

घर-घर में प्रसन्नता से वेश्याओं के नाच-गान चल रहे थे। ऐसा लगता था, मानों स्वर्ग की सुन्दरियाँ प्रसन्नता से भूमि पर उतर आई हों ।॥७९।।

उत्सव के उपलक्ष में राजा द्वारा बाँटे गये एक समान वस्त्रों और आभूषणों से सारी नगरी एक समान वैभवशाली मालूम होती थी ।।८०।।

जब राजा ने उत्सव के उपलक्ष में अपने सेवकों को धन लुटाना प्रारंभ किया, तब खजाने के अतिरिक्त और कोई भी खाली न रहा ॥८१॥

पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी मंगलगान करती हुई, रीति-रिवाजों को जाननेवाली, नाचती-गाती और विविध प्रकार के उपहार हाँथों में ली हुई अपने रक्षकों के साथ-साथ रनिवास में एकत्र हुई, तो ऐसा लगता था, मानों स्वर्ग की स्त्रियाँ प्रसन्नता से राजभवन में उत्तर आई हों ।॥८२-८३॥

उस समय सभी की चेष्टाएँ नृत्यमयी, सभी के वचन पूर्णपात्रमय, सभी का व्यवहार त्यागमय और सभी का स्वर वाद्यमय हो रहा था ।।८४।।

आनन्दमयी उस नगरी में सभी जन अबीर-गुलालमय और सारी भूमि वन्दियों से भरी हुई थी ॥८५॥

इस प्रकार अनेक दिनों तक चलता हुआ यह उत्सव नागरिकों के मनोरथ के समान पूर्ण हुआ ।।८६।॥

आकाशवाणी के आज्ञानुसार पिता द्वारा दिये गये नरवाहनदत्त नामवाला वह राजकुमार कुछ दिनों में ही प्रतिपदा के चन्द्रमा के समान क्रमशः बड़ा हुआ ।।८७।।

चमकते, चिकने और सुन्दर नखों की कान्तिवाले, दो-चार निकले हुए आगे के सुन्दर दाँतों-बाले उस राजकुमार के मुँह से निकलते हुए कुछ अस्पष्ट और तुतले बोलों तथा लीलापूर्वक दो-चार डग भरने की उसकी चालों को देखकर उसका पिता मन ही मन अत्यन्त प्रसन्नता अनुभव करता था ।।८८।।

इस प्रकार, उसके कुछ बड़े होने पर सभी मन्त्रियों ने हृदयों को आनन्द देनेवाले अपने-अपने बालकों को लाकर खेलने के लिए राजकुमार को सौंप दिया ॥८९॥

सबसे पहले यौगन्धरायण ने अपने पुत्र मरुभूति को, इसी प्रकार क्रमशः रुमण्वान् ने हरि-शिख को, इत्यक (नित्योदित) ने गोमुख को, वसन्तक ने तपन्तक को और पुरोहित शान्तिकर ने अपने दोनों जुड़वाँ भतीजे शान्तिसोम और वैश्वानर नामक पिंगलिका के पुत्रों को लाकर समर्पित कर दिया ।।९०-९१।।

उम समय सुन्दर मंगलवाद्यों के साथ आकाश से दिव्य पुष्पों की वृष्टि हुई और राजा तथा रानी नवीन मन्त्रिमडल का सत्कार करके अत्यन्त आनन्दित हुए ॥९२॥

बाल्यकाल में उन छह अनन्य प्रेमी मन्त्रिपुत्रो के साथ युक्त वह राजकुमार नरवाहनदत्त, अभ्युदय के कारणभूत गुणों के समान शोभित हो रहा था ।।९३॥

अपनी विविध और सुन्दर बाल-लीलाओ से प्रेमपूर्ण हृदयोंवाले राजाओं की एक गोद से दूसरी गोद में जाते हुए, एव मुस्कराते हुए उस राजकुमार के मुखकमल को देखते हुए वत्सराज के दिन आनन्दपूर्वक व्यतीत होने लगे ॥९४।।

तृतीय तरंग समाप्त

महाकवि सोमदेवभट्ट-रचित कथासरित्सागर का नरवाहन दत्त-जनन नामक चतुर्थ लम्बक समाप्त


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