5503. || तृतीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान; शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन; बिन्दुमती की कथा; देवदत्त ब्राह्मण की कथा; शक्तिदेव द्वारा विद्याबरतत्र की प्राप्ति; शक्तिदेव का विद्यावरियों के साथ विवाह
5503. || तृतीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान; शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन; बिन्दुमती की कथा; देवदत्त ब्राह्मण की कथा; शक्तिदेव द्वारा विद्याबरतत्र की प्राप्ति; शक्तिदेव का विद्यावरियों के साथ विवाह
तृतीय तरंग
शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान
तदनन्तर उस उत्स्थल द्वीप के मठ में ठहरे हुए शक्तिदेव के समीप नाविकों का सरदार सत्यव्रत आया ।।१।।
उसने पहले ही शक्तिदेव से कनकपुरी का पता लगाने की प्रतिज्ञा की थी। इसीलिए उसने आकर शक्तिदेव से कहा- है ब्राह्मणदेव, मैंने तुम्हारी इष्ट-सिद्धि का एक उपाय सोचा है ।॥२॥
समुद्र के मध्य रत्नकूट नाम का एक-द्वीप है। उसमें समुद्र ने भगवान् विष्णु की स्थापना की है।॥३॥
आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को वहाँ यात्रा का मेला लगता है। उस अवसर पर भगवान् विष्णु के पूजन के लिए सभी द्वीपों से यात्री आते हैं ।॥४॥
वहाँ जाने पर सम्भव है कि किसी यात्री से उस कनकपुरी का पता लग सके। इसलिए चलो, वहीं चलें। वह तिथि (द्वादशी) भी समीप ही है ॥५॥
सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव 'ठीक है' ऐसा कहकर चलने को उद्यत हुआ और विष्णुदत्त द्वारा बनाया गया पाथेय उसने साथ ले लिया ॥६॥
गया ।।७।। तदनन्तर वह सत्यव्रत के बताये हुए जहाज से उसी के साथ शीघ्र ही समुद्री मार्ग से चला
टापुओं के समान बड़े-बड़े मत्स्यों से भरे हुए और आश्चयों के भवन उस समुद्र में जाते हुए उसने नाव को ले जाते हुए सत्यव्रत से पूछा कि यहाँ से दूर पर सहसा निकले हुए पक्ष-सहित पर्वत के समान वह क्या दीख रहा है ? ॥८-९।।
यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा- वह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनेवाले आवर्त (भँवर) को वड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुंह बताते हैं। इसीलिए नाववाले उस स्थान को छोड़कर चलते हैं; क्योंकि उस भँवर मे पड़े हुए लोग फिर लौटते नही ॥१०-११॥
जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था, इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ।।१२।।
यह देखकर सत्यव्रत ने शक्तिदेव से फिर कहा- 'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है ! ॥१३।।
क्योंकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ।।१४।।
हम लोग मृत्यु-मुख के समान इस गहरे भंवर में पड़ गये है। हमे बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमे ढकेल दिया है ।।१५।।
मुझे मृत्यु का दृ'ख नही है, किसका शरीर अमर रहा है? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य में सफलता न मिली ॥ १६॥
मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही इस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ।।१७।।
तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है, तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ तरंगों को कौन जान सकता है' ।॥१८॥
धैर्यशाली सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने विना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक मोटी शाखा पकड़ ली ।।१९-२०।।
किन्तु सत्यव्रत, परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से बड़वानल के मुख मे चला गया ।॥२१॥
शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो, सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नही देखी और ऐसे अवसर पर भीबरराज सत्यव्रत को भी खो दिया। सभी के शिर पर पैर रखकर खड़ी भवितव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ।।२२-२४।।
उस ब्राह्मण युवक के इस प्रकार समयानुसार सोचते हुए वह सारा दिन समाप्त हो गया ।।२५।।
सायकाल होते ही उसने उस वृक्ष पर अपने शब्दों से दिशाओं को मुखरित करनेवाले बड़े-बड़े पक्षियों को देखा ।।२६।।
बड़े-बड़े पंखों की वायु से समुद्र में लहर-सी उठाते हुए गीधों को उसने लेखा, जो मानों परिचय और प्रेम के कारण उसे लेने के लिए आये हो ।॥ २७॥
तदनन्तर उसने पत्रों की झुरमुट में छिपे हुए और शाखाओ में चिपके हुए एवं मनुष्यों की वाणी में होनेवाले वार्तालापो को सुना ॥२८॥
जहाँ जो उस दिन चरने गये थे उनमें से कोई किसी नवीन द्वीप का, कोई पक्षी किमी पर्वत का और कोई किसी दिशा का वर्णन कर रहा था ॥२९॥
उनमें से एक वृद्ध पक्षी ने कहा- 'आज मैं चरने के लिए कनकपुरी गया कल था। प्रातःकाल फिर वही मुख मे चरने के लिए जाऊँगा। व्यर्य थकावट देनेवाले दूरदेश में जाने से क्या लाभ?' ॥३०-३१।।
इस प्रकार सहसा अमृत के सार के समान उस पक्षी के वचन से शक्तिदेव का हृदय शान्त हुआ और वह सोचने लगा ।॥ ३२॥
भाग्य से कनकपुरी का पता तो लगा; किन्तु उसे प्राप्त करने के साधन-स्वरूप अब इस पक्षी को वाहन बनाना है।॥३३॥
वह ऐसा सोचकर और घोरे-धीरे चलकर सोये हुए उस वृद्ध पक्षी के पास पहुँचा और उसके पखों के अन्दर जाकर चिपक गया ॥ ३४।।
प्रातःकाल होते ही अन्य पक्षियों के इधर-उधर उड़ जाने पर दैव के समान पक्षपात करता हुआ वह पक्षी भी, कन्धे पर छिपे हुए शक्तिदेव को लेकर चरने के लिए क्षणभर में कनकपुरी पहुँचा ।। ३५-३६।।
कनकपुरी के एक उद्यान में उतरकर उस पक्षी के बैठ जाने पर शक्तिदेव धीरे-से उसकी पीठ से नीचे उतर आया ।। ३७।।
तत्पश्चात् वह उससे दूर हटकर उस उद्यान में घूमने लगा। घूमते हुए उसने पुष्प-चयन में लगी हुई दो स्त्रियों को देखा ॥३८॥
शक्तिदेव को देखकर चकित हुई उन स्त्रियों के समीप जाकर उसने पूछा, 'यह कौन स्थान है और तुम दोनों कौन हो ?' ॥३९।।
उत्तर में वे बोलीं- 'यह कनकपुरी नाम की नगरी, विद्याधरों का स्थान है। यहाँ चन्द्र-प्रभा नाम की विद्याधरी है। हमें उसी की उद्यानपालिका (मालिन) समझो। यह पुष्प हम उसी के लिए चुन रही हैं' ।।४०-४१।।
तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि 'तुमलोग ऐसा यत्न करो कि जिससे मैं तुम्हारी स्वामिनी को देख सकूं ॥४२।।
ऐसा सुनकर और उसे स्वीकार कर वे दोनों उस युवक को नगरी के अन्दर स्थित राजभवन में ले गई ॥४३॥
राजभवन में जाकर उसने माणिक्य के स्तम्भों और सोने की दीवारों से चमकते हुए लक्ष्मी के भवन के समान उस भवन को सम्पत्तियों का निवास स्थान समझा ।।४४।।
भवन में आये हुए उसे देखकर चन्द्रप्रभा की सभी सेविकाओं ने जाकर अपनी स्वामिनी से मनुष्य के आश्चर्यमय आगमन की सूचना दी ।॥४५।।
चन्द्रप्रभा ने भी अपने प्रतीहार को आज्ञा देकर शीघ्र ही उसे भवन के भीतर अपने निकट बुला लिया ।।४६।।
अन्दर आये हुए उस शक्तिदेव ने आँखों को आनन्द-देनेवाली और विधाता के आश्चर्यमय निर्माण की मूत्तिमती सीमा के समान उस चन्द्रप्रभा को देखा ।।४७।।
वह चन्द्रप्रभा उसे देखकर सुन्दर रत्नों के पलंग से उठकर उसका स्वागत करने के लिए आदर के साथ आगे बढ़ी ॥४८।।
शक्तिदेव के प्रथम दर्शन-मात्र से ही उसके वश में हुई चन्द्रप्रभा उसके बैठने पर कहने लगी- 'हे कल्याणमय ! मनुष्यों के लिए अगम्य इस भूमि मे तुम कैसे आ गये ?' चन्द्रप्रभा द्वारा उत्सुकता से इस प्रकार पूछे जाने पर शक्तिदेव ने अपना देश, अपनी जाति और नाम बताकर यह बताया कि कनकपुरी देखने की प्रतिज्ञा पर राजकुमारी कनकरेखा को प्राप्त करने के लिए यहाँ आया हूँ। इस प्रसंग का समस्त वृत्तान्त उसने चन्द्रप्रभा को सुना दिया ।।४९-५१।।
यह सब सुनकर, कुछ सोचकर तथा लम्बी साँस लेकर चन्द्रप्रभा ने एकान्त में शक्तिदेव से कहा- सुनो, मैं तुमसे यह कहती हूँ। इस भूमि पर शशिधर नाम का विद्याधर राज्य करता है। उसकी क्रमशः हम चार कन्याएँ हैं। सबसे बड़ी चन्द्रप्रभा में हूँ, दूसरी चन्द्ररेखा है ।।५२-५४।।
तीसरी शशिरेखा है और चौथी शशिप्रभा है। हम चारों पिता के घर में बड़ी हुई। एक बार मुझसे छोटी वे तीनों बहिनें साथ ही गंगा-स्नान के लिए गई ।।५५-५६।।
वे तीनों यौवन-मद में मस्त होकर जलक्रीड़ा करती हुई उग्रतपा नामक ऋषि को पानी से सींचने लगी ।।५७।।
ऋषि के बार-बार मना करने पर भी जब वह न मानीं, तब क्रुद्ध होकर उसने शाप दिया कि तुम तीनो दुष्ट कन्याएँ मत्र्यलोक में उत्पन्न होओ ।। ५८।।
इस शाप का समाचार सुनकर हमारे पिता ने ऋषि को अनुनय-विनय करके प्रसन्न किया, तो ऋषि उनके शाप का अन्त पृथक् पृथक् रूप में किया, किन्तु दिव्य ज्ञान से बढ़े हुए पूर्वजन्म के स्मरण को मानव-जन्म में भी बने रहने का आदेश दिया ।।५९-६०।।
तब उन तीनों के अपने-अपने विद्याधर-शरीर को छोड़कर मर्यलोक में चले जाने पर मेरे पिता, यह नगरी मुझे देकर वन को चले गये ॥६१॥
तदनन्तर यहाँ रहती हुई मुझे स्वप्न में माता पार्वती ने यह आदेश दिया कि 'बेटी, तेरा पति मनुष्य होगा' ।। ६२।।
गई ॥६३। इसी कारण विद्याधर जाति के अनेक वीरों को छोड़कर मैं अभी तक कन्या ही रह
इस समय तुम्हारे इस आश्चर्यमय आगमन ने और तुम्हारे सुन्दर शरीर ने मुझे अपने वश में कर लिया। फलतः, तुम्हारे इन मब आकर्षणो ने ही मुझे अपने को तुम्हारे लिए अर्पण करने को बाध्य कर दिया है।॥६४॥
इसलिए आगामी चतुर्दशी के दिन, तुम्हारे इस प्रसग को पिता को सूचित करने, मैं ऋषभ नामक पर्वत पर जाऊँगी ।॥ ६५॥
वहाँ प्रतिवर्ष उम अवसर पर शिवपूजन के लिए मेला लगता है और सभी दिशाओं से बड़े-बड़े विद्याधर आते है ।।६६।।
वही मेरे पिता भी आते हैं। अतः वहाँ जाकर उनसे आज्ञा लेकर मैं शीघ्र ही आती हूँ, तत्पश्चात् तुम मुझसे विवाह कर लो ।।६७।।
तबतक यहीं ठहरो-ऐसा कहकर उसने विद्याधरों के अनुरूप विविध उपचारों से शक्तिदेव का स्वागत सत्कार किया ।।६८।।
वहाँ रहकर उन दिव्य भोगों का उपभोग करते हुए उसे ऐसा सुख प्राप्त हुआ, जैसे दावानल से दग्ध (झुलसे हुए) व्यक्ति को अमृत-सरोवर में स्नान करने से होता है।॥६९॥
कुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा, शक्तिदेव से कहने लगी- 'आज मैं तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जावेंगे। इन दो दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१।।
इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मंजिल में कभी न जाना' ।॥७२॥
उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार
उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ।॥७३॥
वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ, मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ।।७४।।
उस विद्याषर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मजिल में) जाना क्यों वारित किया, इस प्रकार के कुतूहल से वह उसी मजिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत ही चलती है ।।७५।।
ऊपर चढ़कर उसने गुप्त रूप से सुरक्षित तीन मंडपों को देखा ॥ ७६।।
उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नो के पलग पर दुपट्टा भोड़ने से डॅके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ।। ७७-७८।।
जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा, तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या कनक-रेखा दिखाई पड़ी ।।७९।।
उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा- 'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था (बेहोशी) में सोई है या मुझे ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥
जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई, वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ।।८१।।
इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण-वश मेरे लिए अवश्य ही यह इन्द्रजाल रचा है।॥८२॥
ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥
उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े¹ को देखा ॥८४॥
उसे देखकर बह बीच की मंजिल से उतरकर कौतुक के साथ उस घोड़े के समीप आया ।।८५।।
वहाँ एकान्त देखकर उसने घोडे पर चढ़ने की इच्छा प्रकट की। ज्यों ही उसने उस पर चढ़ने का प्रयत्न किया; त्यों ही घोड़े ने लात मारकर उसे पासवाली बावली में गिरा दिया। बावली में गिरा हुआ बह शक्तिदेव अकस्मात् ही वर्षमान नगर-स्थित अपने घर के उद्यान की बावली में जा निकला ।॥८६-८७।।
और उसने बावली के जल में खड़े हुए अपने को, चन्द्रप्रभा के विना मुरझाए हुए कुमुद के समान, अपनी जन्मभूमि में पाया ॥८८॥
शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन
वह सोचने लगा, कहाँ यह वर्धमान नगर और कहाँ वह विद्याधरों की कनकपुरी नगरी ! यह क्या आश्चयं है। क्या मायाजाल है? दुख है कि किसी ने मुझ अभागे को ठग लिया है। या यह कौन जानता है कि आगे क्या होनेवाला है।॥८९-९०।।
इन सब बातों को सोचता हुआ वह चकित शक्तिदेव बावली से निकला और अपने पिता के घर गया ।।९१।।
वहाँ पर वह राजा की घोषणा के अनुसार कनकपुरी का भ्रमण वृत्तान्त किसी को न बताकर, और इधर-उधर की झूठी बातें बनाकर पिता द्वारा प्यार किया गया वह शक्तिदेव, उसके आने की प्रसन्नता मनाते हुए घर के व्यक्तियों के साथ घर में ही रह गया ।। ९२।।
दूसरे दिन, घर से बाहर निकलकर उसने उसी ढिढोरे को फिर से सुना, जो उस नगर में पीटा जा रहा था ।॥९३॥
'कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय-युवक, जिसने कनकपुरी देखी हो, वह कहे और राजकन्या तथा युवराज-पद प्राप्त करें' ।॥९४।।
यह सुनकर वह सफल शक्तिदेव ढिंढोरा पीटनेवालों के पास गया और बोला- 'मैंने वह नगरी देखी है' ॥९५॥
उन लोगों ने उसे शीघ्रता से राजा के पास ले जाकर खड़ा कर दिया और राजा ने भी उसे पहिचानकर पहले के समान झूठ बोलनेवाला समझा ॥९६॥
तब वह शक्तिदेव कहने लगा- 'यदि मैं झूठ बोल रहा हूँ कि वह नगरी मैंने नहीं देखी है, तो मुझे प्राणदंड दिया जाय ।॥९७॥
'आज वह राजपुत्री मुझसे (शक्ति देत्र से) उस नगरी के सम्बन्ध में पूछे, ऐसा कहकर राजा ने अपने सेवकों से राजकुमारी को वहीं बुलवा लिया ।।९८।। ७२
राजकन्या, पहले ही देखे हुए उस ब्राह्मण-युवक को देखकर बोली, 'पिताजी, यह फिर भी कुछ इधर-उधर की मनमानी झूठ बोलेगा' ।॥९९॥
तब शक्तिदेव ने राजकुमारी से कहा- 'मैं सच हूँ या झूठ, लेकिन राजकुमारी, तू मेरे एक कौतुक को दूर कर, मैं कहता हूँ, मैंने कनकपुरी में तुझे पलंग पर मरी हुई पड़ी देखा है। यहाँ यह बात नहीं देख रहा हूँ, तू कैसे जी रही है, यह रहस्य मुझे बता ॥१००-१०१।।
शक्तिदेव द्वारा सच्ची जानकारी के साथ इस प्रकार कहने पर वह राजकन्या कनकरेखा पिता के सामने बोली- ॥१०२॥
पिताजी, इसने सचमुच वह नगरी देखी है। अतः यह शीघ्र ही कनकपुरी में जाने पर मेरा पति होगा ॥ १०३॥
वहाँ पर मेरी और भी तीन बहिनों को ब्याहेगा और नगरी में विद्याधरों पर राज्य करेगा ।।१०४।।
अब आज ही मुझे अपनी नगरी और अपने पूर्व कलेवर में प्रवेश करना चाहिए। मुनि के शाप से मैं तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई थी ॥१०५॥
शाप देने के पश्चात् मुनि ने शाप का अन्त इस प्रकार कहकर किया था कि जब कोई मनुष्य कनकपुरी में तेरा मृत शरीर देखकर मनुष्य-शरीर धारण करनेवाली तेरा रहस्य प्रकट करेगा, तब तेरी शाप से मुक्ति होगी और वह मनुष्य तेरा पति होगा।।१०६-१०७।।
मानव-शरीर पाकर भी मैं पूर्वजन्म का स्मरण करती थी और मुझे सब ज्ञान था। तो अब मैं अपनी सिद्धि के लिए अपने विद्याधर-स्थान को जाती हैं ।॥१०८।।
इतना कहकर राजपुत्री अपना गरीर त्यागकर अन्र्ताहत हो गई और राज-भवन में जोर से रोना-चिल्लाना मच गया ।।१०९।।
दोनों ओर से मारा गया शक्तिदेव, उन-उन कष्टों को प्राप्त करके भी उन दोनों (चन्द्र-प्रभा और कनकरेखा) प्रेयसियों में से एक को भी न पाकर स्तब्ध-सा रह गया ।। ११०।।
असफल मनोरथवाला वह खिन्नता से अपनी निन्दा करता हुआ उसी समय राजभवन से निकलकर सोचने लगा ।।१११।।
'कनकरेखा ने कहा है, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ही, तब क्यों व्यर्थ दुःखी होऊँ सिद्धियाँ मनोबल के अधीन होती हैं ।। ११२॥
तो मैं फिर उसी मार्ग से कनकपुरी को जाऊँ। भाग्य फिर भी अवश्य मेरी सहायता करेगा।' ऐसा सोचकर शक्तिदेव वर्धमान नगर से चल पड़ा। सच है, उद्यमी धीर जन, विना सफलता प्राप्त किये प्रयत्न से हटते नहीं ।। ११३-११४॥
चलते-चलते वह बहुत विलंब से समुद्र तट पर स्थित उस विटंकपुर नगर में फिर पहुँचा ॥११५॥
विटंकपुर में उसने सामने आये हुए उस बनिये को देखा, जिसके साथ पहली बार जाने पर समुद्र में जहाज टूट गया था। यह तो वही समुद्रदत्त है, जो समुद्र में गिरकर भी बाहर कैसे निकल आया, यह आश्चर्य है ! अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या? मैं ही इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ। ऐसा सोचकर उस ब्राह्मण ने बनिये के पास आते ही उसे अपना परिचय दिया। बनिये ने उसे गले लगाकर हर्ष प्रकट किया और उसे अपने घर लेजाकर स्वागत-सत्कार करने के पश्चात् पूछा कि नाव के टूटने पर तुम समुद्र से कैसे पार हुए। उत्तर में शक्तिदेव ने अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया जैसे कि मत्स्य के निगले जाने पर उत्स्थल-द्वीप में वह पहुंचा था ।। ११६-१२०।।
अपना समाचार सुनाकर शक्तिदेव ने भी उस वैश्य से पूछा कि 'तुम कैसे समुद्र से बच्च निकले, सुनाओ ।॥ १२१।।
बनिये ने अपना वृत्तान्त सुनाते हुए उससे कहा "उस समय समुद्र में गिर जाने पर मैं एक काष्ठपट्ट (तख्ते) के सहारे तीन दिनों तक समुद्र में ही चक्कर काटता रह गया ॥ १२२॥
तीसरे दिन, उसी मार्ग से एक नाव आई। उसमें बैठे हुए लोगों ने मुझे चिल्लाते हुए देखकर उस पर चढ़ा लिया ।॥ १२३॥
उस पर चढ़कर मैंने उसमें अपने पिता को बैठा हुआ पाया, जो बहुत दिनों से गये हुए थे और किसी दूसरे द्वीप से आ रहे थे ।। १२४।।
मेरे पिता ने मुझे देखकर और गले लगाकर रोते हुए मेरा वृत्तान्त पूछा और मैंने सब बताया ।। १२५।।
मैंने उनसे कहा, पिताजी, बहुत दिन व्यतीत होने पर और आपके न लौटने पर मैं अपना कर्तव्य समझ कर व्यापार में लग गया ।। १२६।।
इसी प्रसंग में दूसरे द्वीप को जाते हुए, नाव के टूट जाने से मैं समुद्र में गिरा और आप लोगों ने आकर मेरा उद्धार किया ॥ १२७।।
तब मेरे पिता ने मुझसे कहा- 'मेरे रहते हुए तुम ऐसे जीवन के सन्देह में पड़ जानेवाले कार्यों में क्यों लगते हो ? देखो, मैं इस जहाज को सोने से भरा हुआ लाया हूँ', ऐसा कहकर धैर्य देते हुए वे मुझे घर ले आये" ॥ १२८-१३०॥
वैश्य का समाचार सुनकर शक्तिदेव ने रात को वहीं विश्राम किया और दूसरे दिन उससे कहा- 'हे व्यापारी, मुझे पुनः उत्स्थल-द्वीप जाना है। तो बताओ, मुझे कैसे जाना चाहिए' ॥ १३१-१३२।।
वैश्य ने कहा, 'आज ही मेरे व्यवहारी वैश्य, वहाँ जाने के लिए तैयार हैं, तुम उन्हीं के जहाज पर चढ़कर वहाँ जाओ' ।॥ १३३॥
इस प्रकार उस वैश्य द्वारा वहाँ जाने की सारी व्यवस्था कर देने पर, शक्तिदेव, उन्हीं के साथ उत्स्थल-द्वीप को गया ।॥ १३४।।
वहाँ जाकर उसने निश्चय किया कि यहाँ जो मेरा भाई विष्णुदत्त रहता है, वह अत्यन्त उदार है, पहले उसी के मठ में निवास के लिए जाना चाहिए ॥ १३५॥
ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण बाजार के बीच से वहाँ जाने लगा ।।१३६।।
इसी बीच दैवयोग से सत्यव्रत नामक निषादराज के पुत्रों ने उसे देखा और पहिचान कर इस प्रकार पूछा- ।। १३७।।
'हे ब्राह्मण, तुम तो कनकपुरी को ढूंढ़ते हुए मेरे पिता के साथ यहाँ से गये थे। अब तुम अकेले कैसे आ गये?' ॥१३८॥
तब शक्तिदेव ने कहा- 'वह तुम्हारा पिता समुद्री भँवर द्वारा नाव को अपनी ओर खींच लेने पर बडवानल के मुँह में जा गिरा' ।। १३९॥
यह सुनकर धीवर के पुत्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने सेवकों से कहा- 'इस दुष्ट को बाँध लो। इसने हमारे पिता को मार डाला है ।।१४०।।
अन्यथा एक ही नाव पर एक साथ यात्रा करते हुए कैसे एक व्यक्ति वड़वानल में गिर गया और एक बच गया ।।१४१।।
इसलिए अपने पिता के इस हत्यारे को हम कल प्रातःकाल चंडिका देवी के सामने पशु की तरह इसका बलिदान करेंगे' ।॥१४२।।
इस प्रकार कहकर धीवर-पुत्रों ने नौकरों से उसे बंधवाकर चंडिका के मन्दिर में पहुंचा दिया ॥ १४३॥
वह चंडिका-मन्दिर, निरन्तर प्राणियों को निगलनेवाला, विशाल उदरबाला और लटकते हुए घंटे-रूपी दाँतोंवाला मानों मौत का प्रत्यक्ष मुंह था ।॥ १४४॥
वहाँ बाँधकर रखा गया शक्तिदेव, अपने जीवन में संशय करता हुए चंडिका की स्तुति करने लगा- ॥१४५।।
"हे भगवति, भरपेट पिये हुए दैत्य के रुधिर से मानों उदय होते हुए सूर्य-बिम्ब के समान वर्णवाली अपनी मूत्ति से तुमने संसार की रक्षा की है। इसलिए निरन्तर प्रणाम करते हुए, बिना कारण हो पागलों के हाथों में पड़े हुए और प्रेमी जनों की प्राप्ति के लिए दूर देश से आये हुए मेरी रक्षा करो" ।। १४६-१४७।।
शक्तिदेव, इस प्रकार देवी की स्तुति करके सो गया। उसने स्वप्न में देखा कि उस मन्दिर के गर्भगृह से एक दिव्य स्त्री निकली और उस पर मानों दया करती हुई कहने लगी-"हे शक्तिदेव, तेरा अनिष्ट नहीं होगा ।।१४८-१४९।।
इन धीवर-पुत्रों की बिन्दुमती नाम की बहिन है। वह अभी कुमारी है। प्रातःकाल तुझे देखकर अपना पति बनाने के लिए तुमसे प्रार्थना करेगी ॥ १५०॥
तुम उसे स्वीकार कर लेना, वही तुम्हें छुड़वा देगी। वह निषाद जाति की कन्या नहीं है, प्रत्युत शाप के प्रभाव से पतित दिव्य-स्त्री है" ।॥१५१।।
यह सुनकर शक्तिदेव के जागने पर प्रात काल ही आँखों में अमृत वर्षा करनेवाली धीवर-कन्या उन देवी मन्दिर में आई ॥ १५२॥
वह धीवर-कन्या, शक्तिदेव के समीप आकर और अपना परिचय देकर उत्सुकता के साथ कहने लगी- 'मैं तुम्हें छुड़वा दूंगी; पर प्रतिज्ञा करो कि तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे'। मेरे विवाह के लिए मेरे भाइयों द्वारा सम्मत और लाये गये सभी वरों को मैंने अस्वीकृत कर दिया है, किन्तु तुम्हे देखकर मुझे तुम पर प्रेम हो गया है, इसलिए मुझे स्वीकार करो' ।।१५३-१५४।।
धोवर-राज की कन्या बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर अपने स्वप्न को स्मरण करते हुए शक्तिदेव ने, उसके प्रस्ताव को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया। और, इसी प्रतिज्ञा पर छुड़ाये गये उसने बिन्दुमती से विवाह भी कर लिया; क्योकि स्वप्न में चंडिका का आदेश पाकर उसके भाई बहिन की इच्छा से सम्मत हो गये थे ॥ १५५-१५६।।
पुण्य से प्राप्त की हुई सिद्धि के समान दूसरा रूप धारण की हुई उस दिव्य रमणी बिन्दु-मती के साथ वह वहीं रहने लगा। एक बार भवन की छत पर उसी के साथ बैठे हुए शक्तिदेव ने सिर पर गोमांस का बोझ उठाये हुए और मार्ग पर चलते हुए एक चांडाल को देखकर अपनी पत्नी से पूछा- ॥१५७-१५८॥
'हे कृशोदरि, जो गाय तीनों लोकों के लिए वन्दनीय है, उसका मांस यह पापी कैसे खाता है ?'।॥ १५९।।
यह सुनकर बिन्दुभती अपने पति से कहने लगी- 'आर्यपुत्र, गोमांस-भक्षण का पाप तो अचिन्त्य है, इस विषय में यहाँ क्या कहा जा सकता है। मैं गायों के ही थोड़े से अपराध के कारण धीवरों के कुल में जन्मी। अब इससे कैसे उद्धार होगा, यह पता नहीं' ।। १६०-१६१।।
ऐसा कहता हुआ पत्नी से शक्तिदेव बोला- 'आश्चर्य है प्रिये ! तुम कौन हो और इस धीवर के कुल में तुम्हारा जन्म कैसे हुआ?' ॥१६२॥
इस प्रकार अत्यन्त आग्रह के माय पूछते हुए शक्तिदेव से उसने कह। - 'यह अत्यन्त गोपनीय बात है। यदि तुम मेरी बात मानो, तो मैं तुमसे कहती हूँ' ।॥ १६३॥
तब शक्तिदेव के शपथ खाकर उसे गुप्त रखने की प्रतिज्ञा करने पर, उस बिन्दुमती ने प्रारम्भ से इस प्रकार उसे बताया ॥ १६४।।
बिन्दुमती की कथा
'इस द्वीप में तुम्हारी एक दूसरी पत्नी भी होगी और वह शीघ्र ही गर्भवती हो जायगी ।। १६५।।
गर्भ के आठवें महीने में तुम्हें उनका पेट फाड़कर उस गर्भ को निकालना पड़ेगा और इस कार्य में तुम्हें घृणा न करनी होगी' ।॥१६६।।
धीवर-कन्या के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव अत्यन्त आश्चर्य चकित हुआ और घृणा प्रकट करने लगा। यह देखकर धोवर-कन्या ने फिर उससे कहा- 'यह कार्य किसी गुप्त कारण से तुम्हें करना ही पड़ेगा। अब सुनो, मैं कौन हूँ और धीवर जाति में मेरा जन्म कैसे हुआ ?' ॥१६७-१६८।।
"में पहले जन्म में विद्याधरी थी। इस समय शाप से पतित होकर मर्त्यलोक में मेरा जन्म हुआ है ।।१६९।।
विद्याधर-जन्म में मैंने वीणा के तारों को दाँतों में तोड़कर जोड़ा था, इसी से धीवर-कुल में मेरा जन्म हुआ ।। १७०।।
इस प्रकार गाय के सूखे चमड़े को दाँतों से छूने पर जब मेरी इस प्रकार अधोगति हुई, तब मांस-भक्षण की तो बात ही क्या कही जा सकती है ।। १७१॥
उसके ऐसा कहते हुए मध्य में ही उसका एक भाई आकर शक्तिदेव से बोला- 'उठो, देखो, यह सूअर उठकर अनेक मनुष्यों को मारता हुआ इधर ही सामने आ गया है' ॥ १७२-१७३।।
यह सुनकर वह शक्तिदेव, अपने भवन से उतरकर, घोड़े पर सवार होकर और हाथ में शक्ति (शस्त्र) लिये हुए सूअर की ओर दौड़ा ।। १७४।।
उसने भागते हुए सूअर पर प्रहार किया। आहत सूअर भी भागकर अपने बिल में चला गया ।। १७५।।
उसे ढूंढ़ता हुआ वह शक्तिदेव भी बिल में घुसा और अन्दर जाकर क्षण-भर में उसने सुन्दर बने हुए निवास-गृहवाले एक घने उद्यान को देखा ।।१७६॥
वहाँ जाकर उसने अद्भुत स्वरूपवाली और घबराई हुई एक कन्या को प्रेम से स्वागत के लिए आई हुई, साक्षात् वनदेवी के समान देखा ।।१७७॥
और उससे पूछा- 'कल्याणमयी, तू कौन है? और तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है ?' यह सुनकर वह सुन्दरी उससे इस प्रकार कहने लगी-॥१७८॥
'हे सुन्दर ! दक्षिण-देश मे चंडविक्रम नाम का एक राजा है। मैं उसी की कन्या हूँ। मेरा नाम बिन्दुरेखा है। यह पापी दैत्य छलकर मुझे पिता के घर से हरण करके यहाँ ले आया है।।१७९-१८०।।
वह दैत्य मास-भक्षण के लिए सूअर का रूप धारण करके बाहर गया। किसी से शक्ति द्वारा आहत होने पर वह भूखा यहाँ आकर मर गया। इसीलिए मैं भी घर से बाहर निकलकर भाग आई हैं, किन्तु मेरी कुमारावस्था को उसने दूषित (नष्ट) नहीं किया है' ॥१८१-१८२॥
यह सुनकर शक्तिदेव ने उससे कहा- 'तब चिन्ता की क्या बात है ? हे राजपुत्रि मैंने ही शक्ति से इस सूअर को मारा है' ।॥ १८३॥
तब वह कन्या कहने लगी कि 'तुम कौन हो, यह बताओ।' उत्तर में उसने कहा-'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण हूँ' ॥१८४॥
कन्या ने कहा- 'तब तू ही मेरा स्वामी है।' उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव उसे लेकर बिल-मार्ग से बाहर निकल आया ॥ १८५॥
तदनन्तर उस कन्या को ले जाकर अपनी पत्नी बिन्दुमती को सौंप दिया। और, पत्नी के विश्वास दिलाने पर शक्तिदेव ने उस कन्या से पाणिग्रहण कर लिया ॥१८६।।
तत्पश्चात् दो पत्नियोंवाले शक्तिदेव के वहाँ रहते हुए एक पत्नी गर्भवती हो गई इस गर्भ का अष्टम मास निकट आने पर शक्तिदेव की पहली पत्नी बिन्दुमती उसके पास जाकर धीरे-से कहने लगी- 'बीर, उस बात का स्मरण करो, जो तुमने पहले मुझसे प्रतिज्ञा की थी। तुम्हारी दूसरी भार्या को आठ महीने का गर्म हो गया है ।।१८७-१८९॥
इसलिए अब तुम उसके पास जाकर उसका पेट फाड़कर लाओ। अब तुम्हें अपनी कही हुई सत्य बात से विचलित न होना चाहिए' ।॥ १९०॥
पत्नी के द्वारा इस प्रकार कहा गया शक्तिदेव, प्रेम और दया से व्याकुल तथा प्रतिज्ञा से पराधीन होकर कुछ देर चुप रहा ।।१९१॥
कुछ क्षण आवेश में आकर और वहाँ से निकलकर वह बिन्दुरेखा के पास गया। बिन्दु-रेखा ने उसे दुःखी और चिन्तित होकर अपने पास आते हुए देखकर कहा- 'आर्यपुत्र, आज दुःखी क्यों हो? यह मैं जानती हूँ कि तुम्हे बिन्दुमती ने मेरा गर्भ फाडने के लिए कहा है। यह कार्य तुम्हे अवश्य करना चाहिए। उससे कुछ काम बनेगा, इसमें कुछ भी क्रूरता नहीं है। इसलिए घृणा न करो' ।॥१९२-१९४।।
देवदत्त ब्राह्मण की कथा
'हे नाथ, इस सम्बन्ध में मैं तुम्हे देवदत्त की कथा कहती हूँ, सुनो'- प्राचीन समय में कम्बुक नामक नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उस धनी ब्राह्मण का देवदत्त नामक एक पुत्र हुआ, जो बाल्यावस्था में ही विद्वान् होकर भी युवावस्था में जूए का व्यसनी हो गया था ।।१९५-१९६।।
एक बार जुए मे अपने कपडे तक हार जाने के कारण वह अपने पिता के घर न जा सका और लज्जित होकर वह एक देवमन्दिर में जाकर ठहरा ।। १९७।।
वहाँ मन्दिर में अकेले उसने अनेक सामग्रियों को एकत्र करके एकान्त में जप करते हुए महाव्रती जालपाद नामक तपस्वी को देखा ॥१९८॥
देवदत्त, धीरे से उसके पास जाकर प्रणाम करके बैठा। जालपाद ने भी मौन त्यागकर उसका प्रेमपूर्ण वचनों से स्वागत किया ।। १९९।।
कुछ समय बैठने के पश्चात् व्रती जालपाद ने उसकी चिन्ता और दुर्दशा का कारण पूछा । उसके पूछने पर देवदत्त ने अपनी दुर्दशा का कारण जूए के व्यसन में धन का नष्ट हो जाना बताया ।।२००
तब महातपस्वी जालपाद ने कहा- 'बेटा, व्यसनियों के लिए पृथ्वी में पूरा धन ही नहीं है' ॥२०१॥
यदि तुम मेरी बात मानो, तो मेरी इच्छा तुम्हारा कष्ट दूर करने की है। मैंने अपनी साधना से जैसे विद्याधरत्व प्राप्त किया है और सिद्धि प्राप्त की है, उसे तुम भी मेरे साथ प्राप्त करो; किन्तु मेरी आज्ञा का पालन करना होगा। तुम्हारी सब विपत्तियाँ दूर हो जावेंगी' ।।२०२-२०३।।
तपस्वी साधक द्वारा इस प्रकार कहे गये देवदत्त ने, उसकी बात स्वीकार कर ली और तब से उसी के पास रहने लगा ।। २०४।।
महाव्रती जालपाद ने दूसरी रात्रि में श्मशान के पास जाकर वटवृक्ष के नीचे पूजा करके, खीर और नैवेद्य चढ़ाकर दिशाओं को बलि फेंकते हुए पूजा की और साथ में बैठे हुए देवदत्त से कहा- ।।२०५-२०६।।
'देवदत्त, तुम्हें भी प्रतिदिन इसी प्रकार पूजन करना चाहिए और पूजा करके कहना चाहिए, विद्युत्प्रभे ! इस पूजा को ग्रहण करो ॥ २०७॥
इसमे आगे मैं नहीं जानता। किन्तु हम दोनों को सिद्धि अवश्य मिलेगी।' इतना कहकर वह तपस्वी उसको साथ लेकर अपने घर लौट आया ।॥ २०८।।
वह ब्राह्मण देवदत्त भी प्रतिदिन उस वटवृक्ष के नीचे जाकर उसी विधि से पूजन करने लगा ।।२०९।।
एक दिन देवदत्त के पूजा कर लेने के उपरान्त उस वृक्ष के तने को बीच से फाड़कर सहसा एक दिव्य स्त्री निकली ।। २१०॥
वह कहने लगी- 'हे भले आदमी ! मेरी स्वामिनी तुम्हें बुलाती है।' इस प्रकार कहकर उसे वह वृक्ष के अन्दर ले गई ॥ २११॥
देवदत्त ने अन्दर जाकर मणियों से निर्मित एक सुन्दर भवन देखा और उसके भीतर पलंग पर बैठी हुई एक सुन्दरी स्त्री देखी। उसे देखकर देवदत्त सोचने लगा, सम्भव है, यही हमारी मूत्तिमती सिद्धि हो। जबतक वह ऐसा मोचता है, तबतक वह सुन्दरी रमणी, उसका आतिथ्य करके शब्दायमान आभूषणों से सुशोभित अगों से उसका स्वागत करती हुई कहने लगी-'मैं रत्नवर्ष नामक यक्ष की पुत्री विद्युत्प्रभा हूँ। इस महाव्रती जालपाद ने मेरी आराधना की है, उसको मैं अष्टसिद्धि देनेवाली हूँ। किन्तु तुम तो मेरे प्राणों के भी स्वामी हो ।। २१२-२१६।।
इसलिए देखने मात्र से प्रेम करनेवाली मुझसे तुम पाणिग्रहण कर लो। उसके इस प्रकार कहने पर देवदत्त ने उससे विवाह कर लिया ।।२१७।।
और कुछ समय तक उसके गर्भागार में रहकर फिर अपने गुरु उस महातपस्वी के पास लौट आया और आकर उसने डरते-डरते वह सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया। यह सब सुनकर महातपस्वी बोला-॥२१८-२१९।।
'भद्र ! तुमने जो कुछ किया, अच्छा किया। किन्तु अब जाकर उस यक्षिणी का पेट फाड़कर शीघ्र ही उसके गर्भ को ले आओ ।॥२२०॥
ऐसा कहकर और उस पूर्व प्रतिज्ञा को स्मरण कराकर साधक ने देवदत्त को फिर वहाँ भेजा, और देवदत्त उस प्रेयसी के पास गया ।। २२१।।
जब वह इस कर्म को करने में दुखी होकर विद्युत्प्रभा के पास खड़ा हुआ, तब वह स्वयं उसमे कहने लगी- 'आयंपुत्र, तुम जिस लिए चिन्तित हो, मुझे विदित है। तुम्हें जालपाद ने मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ लाने के लिए कहा है। इसलिए तुम इस गर्भ को मेरा पेट फाड़कर खीच लो। नहीं तो, मैं स्वयं यह कार्य करती हूँ। इसमें कुछ रहस्य है' ।। २२२-२२४।।
विद्युत्प्रभा के ऐसा कहने पर भी जब वह ब्राह्मण शक्तिदेव उसका पेट फाड़ने के लिए उद्यत न हुआ, तब उसने स्वयं अपना पेट फाड़कर फाड़ गर्भ को पेट से बाहर खीच लिया ।। २२५।।
निकाले हुए गर्भ को आगे रखकर वह देवदत्त से कहने लगी- 'इसे खानेवाले को विद्याधर बनाने के लिए इसे ले लो। मैं विद्याधरी होकर भी शाप से यक्षी बन गई थी। बस, यही और इसी प्रकार मेरे शाप का अन्त था। मैं पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करती हूँ ॥ २२६-२२७।।
अब मैं अपने स्थान को जाती हूँ और हम दोनों का फिर वही समागम होगा।' इतना कहकर विद्युत्प्रभा अन्तर्वान हो गई ॥ २२८॥
व्यथितहृदय देवदत्त भी उस गर्भ को लेकर उस साधक जालपाद के पास आया। आकर उसने उस गर्भ को उसे भेंट कर दिया ।।२२९।।
सज्जन लोग कठिनाई में भी केवल अपना पेट भरना ही नही जानते ॥ २३०॥
उस महासाधक ने उसका मांस पकाकर उसका कुछ अंश भैरव को देने के लिए शक्तिदेव को जंगल में भेज दिया ।। २३१॥
वन से बलि देकर लौटने पर जब शक्तिदेव ने देखा, तब जालपाद उस सारे मांस को खा गया था ।। २३२।।
'तुमने अकेले ही सारा मांस क्यों खा लिया, मेरे लिए क्यों नहीं रखा ?' - शक्तिदेव के इस प्रकार कहते हुए ही वह कुटिल जालपाद विद्याधर बनकर आकाश में उड़ गया ।। २३३।।
आकाश के समान नीले रंग की तलवार लिये हुए और हार, केयूर से सुशोभित जालपाद के उड़ जाने पर देवदत्त सोचने लगा ॥२३४॥
दुःख है कि उस दुष्ट बुद्धि ने मुझे ठगा। सच है, अत्यन्त मरलता किसे अपमानित नही करती ? ॥ २३५॥
तो अब उसके इस अपकार का बदला मैं कैसे लूं। विद्याधर बने हुए भी इसे किस प्रकार पकड़ लूं ॥२३६॥
अब इसके लिए वेताल-मावना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है, यह सोचकर वह रात को व्मशान में गया ।। २३७।।
वहाँ पर एक वृक्ष की जड़ में जाकर मनुष्य के मुर्दे में नरमांस की बलि तथा तर्पण आदि करके उसने वेताल का आवाहन किया ॥ २३८॥
उममे भी वेताल को तृप्त होने न देखकर उसकी तृप्ति के लिए वह अपना मास काटने लगा। तब वेताल उस महान् आत्मावाले देवदत्त में कहने लगा- 'मै तुम्हारे इतने ही साहस से प्रसन्न हूँ, अव अधिक साहस न करो। तुम अपना अभीष्ट कार्य बताओ, मैं उसे तुम्हारे लिए सिद्ध करूँ'। वेताल के ऐसा कहने पर वह वीर देवदत्त बोला- 'विश्वासी व्यक्ति को ठगनेवाला साधक जालपाद जहाँ भी हो, उम विद्याधरों के निवाम-स्थान में उसे मारने के लिए मुझे ले चलो' ।॥२३९-२४२।।
देवदत्त के ऐसा कहने पर वह वेताल उसी क्षण उसे कन्धे पर चढ़ाकर आकाश-मार्ग से विद्याधरों के लोक को ले गया ॥ २४३।।
विद्याधर-लोक के राजभवन में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए, विद्याधरी पद को प्राप्त करके अभिमान में अन्धे एवं विद्याधरी पद को प्राप्त यक्षी विद्युत्प्रभा को, उसके न चाहत हुए भी, विक प्रकार की बातों से उसे पत्नी बनाने की चेष्टा करते हुए, उसने जालपाद को देखा ॥२४४-२४५॥
उसे देखते ही मदमाते विद्युत्प्रभा के नेत्र-चकोरों के लिए चन्द्रमा के समान वह युवक देवदत्त, वेताल के सहित जालपाद की ओर दौड़ पड़ा। जालपाद ने भी उसे अकस्मात् आये हुए देखकर, भय और व्याकुलता के कारण उसके हाथ से तलवार के गिर जाने पर वह सिंहासन से भूमि पर गिर पड़ा ।॥ २४६-२४७।।
देवदत्त ने उसकी गिरी हुई तलवार को पाकर भी उसे मारा नहीं, उदार पुरुष डरे हुए शत्रुओं पर भी दयालु होते हैं ।॥ २४८॥
जालपाद को मारते हुए वेताल को भी उसने रोक कर कहा- 'इस बेचारे पाखंडी को मोरने से क्या लाभ ? इसे पृथ्वी पर ले जाकर इसी के घर में रख दो। यह पापी फिर वहाँ कापालिक-व्रत करता रहे, तो ठीक है ॥ २४९-२५०।।
इस प्रकार की घटना होने पर उमी क्षण देवी पार्वती स्वर्ग से उतरकर आई और देवदत्त से प्रेमपूर्वक कहने लगी- 'बेटा, तेरे इस असाधारण आत्मोत्कर्ष से मैं प्रसन्न हूँ। इसलिए अब मैं तुझे स्वयं विद्याधरराज-पद और विद्याप्रदान करती हूँ' ।॥२५१-२५२॥
इतना कहकर और देवदत्त को विद्या प्रदान कर देवी अन्तर्धान हो गई ॥ २५३।।
जालपाद को वेताल ने लाकर भूमि पर पटक दिया और उसकी सिद्धि भ्रष्ट हो गई। मच है, अधर्म की मम्पत्ति चिरकाल तक नहीं रह सकती ॥ २५४।।
तदनन्तर देवदत्त, विद्युत्प्रभा के साथ विद्याधर-राज्य प्राप्त करके सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा और उन्नति करने लगा ॥ २५५।।
मधुरभाषिणी बिन्दुरेखा इस प्रकार अपने पति शक्तिदेव को कथा सुनाकर फिर बोली-'ये कार्य इस प्रकार के होते है। इसलिए, तुम भी बिन्दुमती के कहने के अनुसार मेरे गर्भ को पेट फाड़कर निकाल लो' ॥२५६-२५७॥
शक्तिदेव द्वारा विद्याबरतत्र की प्राप्ति
बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर भी पाप की शंका करते हुए शक्तिदेव ने आकाशवाणी सुनी- 'हे शक्तिदेव ! तुम विना किसी शंका के गर्भ को निकाल लो। उस गर्भ के शिशु की गर्दन को मुट्ठी से पकड़ोगे, तो वह खड्ग बन जायगा' ॥२५८-२५९॥
इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा ।।२६०।।
बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान, तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव ने जाकर अपनी दूसरी पत्नी घीवर कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी- 'हे स्वामिन् ! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं; जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं ।॥ २६१-२६४।।
एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई; जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं देखा। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। अब मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित है।॥ २६५-२६७।।
हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ ।॥२६८॥
तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और वनवासी हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करोगे ।। २६९॥
इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया ।॥ २७०।।
उसने पहली बार उस राजभवन में तीनों मंडपों के भीतर पलंगों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे, अब वहाँ पहुँचने पर, उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उसने प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा ॥ २७१-२७२॥
तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से मंगल-रचना करके देख रही थी ॥ २७३॥
अपनी-अपनी ओर से चन्द्रप्रभा की सेवा में लगी हुई उसकी सेविकाओं द्वारा शक्तिदेव के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट किये जाने के पश्चात् वह शक्तिदेव चन्द्रप्रभा के साथ उसके शयनागार में गया। वहाँ जाकर चन्द्रप्रभा ने उससे इस प्रकार कहा- 'हे सौभाग्यशालिन् ! तुमने वर्धमान नगर में कनकरेखा नाम की जो राजकुमारी देखी थी, वह चन्द्ररेखा नाम की मेरी बहिन है।॥ २७४-२७५।।
उत्स्थल द्वीप में तुमने जिस घीवर-कन्या बिन्दुमती से विवाह किया था, वह मेरी शशि-रेखा नाम की बहिन है ॥ २७६॥
उसके पश्चात् दानव द्वारा ले जाई गई बिन्दुरेखा नाम की जिस कन्या से तुमने विवाह किया था, वह मेरी शशिप्रभा नाम की चौथी और छोटी बहिन है।। २७७॥
शक्तिदेव का विद्यावरियों के साथ विवाह
अब तुम हम लोगों के साथ हमारे पिताजी के पास चलो और उनसे दी हुई हम चारों का विवाह अपने साथ कर लो ॥ २७८॥
इस प्रकार कामदेव की आज्ञा के समान गम्भीरतापूर्वक चन्द्रप्रभा के कहने पर उन चारों प्रियतमाओं के साथ वह शक्तिदेव शीघ्र ही वन के मध्य में स्थित उनके पिता के पास गया ।। २७९।।
उनके पिता ने, चरणों पर प्रणाम करती हुई उन चारों कन्याओं द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर, एक साथ ही चारों कन्याओं को शक्तिदेव के लिए दे दिया ॥ २८०॥
तदुपरान्त विद्यावरों के उस राजा ने कनकपुरी में सम्पन्न अपने राज्य को और अपनी सभी विद्याओं को भी उसे देकर, उस सफल वीर शक्तिदेव को अपना शक्तिवेग नाम भी देकर अपनी विद्याधर-जाति में समुचित स्थान प्रदान किया ॥ २८१॥
और कहा- 'तुम्हारा इतना अधिक प्रभाव होगा कि तुम्हें कोई जीत न सकेगा। वत्स-राज उदयन से नरवाहनदत्त नाम का जो पुत्र होगा, वह तुम विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। वह तुम्हारा भावी स्वामी है। इसलिए तुम उसे प्रणाम करना' ॥२८२॥
ऐसा कहकर उस महाप्रभावशाली शशिखंड नामक विद्याधरों के अधिपति ने, शक्तिवेग (शक्तिदेव) का सत्कार करके, उसकी चारों पत्नियों के साथ, उस जामाता को तपोवन से बिदा करके राजधानी कनकपुरी को भेज दिया ॥ २८३॥
वह शक्तिवेग भी अब राजा बनकर अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्याधर-लोक की पताका के समान कनकपुरी में आ गया ॥ २८४॥
विद्याषराधिप वह शक्तिवेग, मानों अत्यन्त ऊँची होने से सीधी गिरती हुई सूर्य-किरणों के समान, सोने की रचना से चमचमाती हुई प्रासाद-श्रृंखलाओंवाली कनकपुरी में उन चारों प्रियतमाओं के साथ, रत्नजड़ित सीढ़ियोंवाली उद्यान-बावलियों में, अत्यन्त सुख और आनन्द लेने लगा ।। २८५॥
वाक्पटु शक्तिवेग, इस प्रकार अपना विचित्र चरित्र वत्सराज को सुनाकर फिर बोला-।।२८६।।
'हे चन्द्रवंश-भूषण वत्सराज, तुम मुझे उसी शक्तिवेग को उत्पन्न हुए अपने नये चक्रवर्ती पुत्र के चरणकमलों के दर्शन का अभिलाषी समझो ॥ २८७॥
इस प्रकार मनुष्य होकर भी मैंने शिवजी की कृपा से विद्याधरों की प्रभुता प्राप्त की है। अब मैं अपने स्थान को जाता हूँ। अपने स्वामी का दर्शन कर लिया। आपका सर्वदा मंगल हो ।॥ २८८॥
इस प्रकार प्रणाम कर जाने की आज्ञा प्राप्त करके चन्द्रमा के समान तेजस्वी शक्तिवेग के आकाश में उड़ जाने पर, महारानियों, मन्त्रियों और शिशु के साथ वत्सराज ने अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया ॥ २८९॥
तृतीय तरंग समाप्त
चतुर्दारिका नामक पचम लम्बक समाप्त
1. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजयोगियों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल वेखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन भी है। अनु०
Comments
Post a Comment