5601. || प्रथम कहानी || मदनमंचुका नामक छठा लम्बक; नरवाहनदत्त को युवावस्था; राजा कलिङ्गवस की कथा; सुरभिदत्ता अप्सरा की कया; राजा धर्मदत्त की कथा; सात ब्राह्मणों की कथा; एक ब्राह्मण और चाण्डाल की कथा; राजा विक्रर्मासह और वो ब्राह्मणों की कथा; धष्ठ लम्बक
5601. || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त को युवावस्था; राजा कलिङ्गवस की कथा; सुरभिदत्ता अप्सरा की कया; राजा धर्मदत्त की कथा; सात ब्राह्मणों की कथा; एक ब्राह्मण और चाण्डाल की कथा; राजा विक्रर्मासह और वो ब्राह्मणों की कथा; धष्ठ लम्बक
मदनमंचुका नामक छठा लम्बक
प्रथम तरंग
ऊपर उठते और नीचे झुकते हुए मस्तक से विघ्नों के समूह को मानों दूर करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ।॥१॥
उस कामदेव को नमस्कार है, जिसके बाणों के प्रहार से, पार्वती द्वारा निरन्तर आलिगित रहने पर भी शिवजी का शरीर सदा रोमांचित रहता है।॥२॥
विद्याधरों का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त करके अपने को एक तटस्थ व्यक्ति बनाकर नर-वाहनदत्त ने वार्तालाप के प्रसंग में सपत्नीक महर्षियों के पूछने पर प्रारम्भ से लेकर जिस प्रकार अपना चरित्र वर्णन किया, अब उसे सुनो ॥३॥
पिता वत्सराज द्वारा पालन-पोषण करते हुए नरवाहनदत्त ने अपनी बाल्यावस्था के आठ वर्ष व्यतीत किये ॥४॥
नरवाहनदत्त को युवावस्था
उस समय वह राजकुमार नरवाहनदत्त, मन्त्रियों के पुत्रों के साथ, विद्याओं की शिक्षा ग्रहण करता हुआ और उद्यानों में खेलता हुआ समय व्यतीत कर रहा था ।।५।।
रानी वासवदत्ता और रानी पद्मावती दोनों समान स्नेह से रात-दिन उसकी देखभाल करती रहती थीं ॥६॥
वह राजकुमार, आत्मा में प्राप्त होते हुए गुणों से नम्र, उच्च कुल में जन्म लेने के कारण तदनुरूप गौरवान्वित और धीरे-धीरे शरीर से, तथा (धनुष-पक्ष में) चढ़ाई हुई प्रत्यंचा (गुण) से नम्र अच्छ बाँस से निर्मित और धीरे-धीरे चढ़ाये जाते हुए धनुष से, शोभित होने लगा ।।७-८।।
कुमार का पिता वत्सराज उदयन भी, शीघ्र ही फल देने के कारण मनोहर और आकर्षक उसके विवाह आदि मनोरथों से अपना समय व्यतीत कर रहा था ॥९॥
राजा कलिङ्गवस की कथा
इसी बीच कथा की सन्धि में जो कुछ हुआ, उसे सुनो। वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे तक्षशिला नाम की नगरी थी। उस नगरी के भवनों की छाया वितस्ता के जल में प्रति-बिम्बित होती थी ॥१०॥
उस प्रतिबिम्ब से ऐसा प्रतीत होता था कि मानों तक्षशिला पुरी की शोभा निरखने के लिए पातालपुरी ऊपर उठकर आ रही हो ॥११॥
उस नगरी मे मुगत (बुद्ध) का परम भक्त कलिगदत्त नाम का राजा था, जिसकी सारी प्रजा जिनभक्त (जैन) थी ॥१२॥
वह नगरी, ऊँचे-ऊँचे अनेक विहारों से ऐमी प्रतीत होती थी, मानों ऊँचे शृंगों से यह घोषणा कर रही हो कि मेरे ममान दूसरी नगरी संसार में नहीं है ॥१३॥
राजा कलिगदत्त, पिता के समान प्रजा का केवल पालन ही नहीं करता था, प्रत्युत गुरू के समान स्वय ज्ञान का उपदेश भी करता था ।।१४।॥
उस नगरी में बौद्ध भिक्षुओं की पूजा में तत्पर वितस्तादत्त नाम का एक धनी वैश्य रहता था। उसका रत्नदत्त नामक एक युवा पुत्र था; जो अपने पिता को पापी कहकर उमसे चिढ़ता रहता था ।।१५-१६।।
'बेटा, मेरी निन्दा क्यों करते हों- इम प्रकार पिता के पूछने पर पुत्र उस पर आक्षेप करता हुआ बोला- ।।१७।।
'पिता, तुम वैदिक धर्म को छोड़कर अधर्म का सेवन करते हो। ब्राह्मणों को छोड़कर भिक्षुओं की सदा पूजा किया करते हो ॥१८॥
स्नान, शौच आदि से हीन और अपने समय पर भोजन के लोभी, शिखा और केशों को मुड़वाकर केवल कौपीन पहिननेवाले तथा विहारों (मठों) में स्थान मिलने के लोभ से सभी नीच जाति के व्यक्ति जिस बौद्धधर्म का ग्रहण करते है, उससे हमारा क्या प्रयोजन ? ॥१९-२०॥
यह सुनकर वह कहने लगा- बेटा! धर्म का एक ही रूप नहीं है। सार्वलौकिक धर्म पृथक है और पारलौकिक धर्म पृथक् ॥२१॥
ब्राह्मण-धर्म भी यही है कि रागद्वेषहीनता, सत्य, प्राणिमात्र पर दया करना और जाति-पाँति के झूठे झगड़ों से वह रहित हो ।। २२।।
सभी जीवों पर अभय प्रदान करनेवाले इस बौद्ध सिद्धान्त को तुम किसी एक पुरुष के दोष से दूषित नहीं कर सकते ॥ २३॥
उपकार करना धर्म है, इसमें किसी का मतभेद नहीं है। प्राणियों को अभय प्रदान करने के अतिरिक्त और दूसरा कोई उपकार नहीं है, यह मेरा अपना विचार है॥२४॥
इसलिए अहिंसा-प्रधान, मोक्षदायक इस सिद्धान्त में मेरा प्रेम है, तो यह कौन-सा अधर्म है' ॥२५॥
पिता के इस प्रकार कहने पर भी वैश्यपुत्र ने उसे स्वीकार नहीं किया। प्रत्युत अधिक निन्दा करने लगा ॥ २६॥
तब उसके पिता ने खिन्न होकर धर्म का उपदेश करनेवाले राजा के सामने सारी बातें कह दीं ॥ २७।।
राजा ने भी किसी समय नुक्ति से उस वैश्यपुत्र को सभा गे बुलाकर झूठा क्रोध प्रदर्शित करते हुए आदेश दिया कि 'मैंने सुना है, यह बनिये का बालक, पापी और अति कुकर्मी है। इस-
लिए इस देशद्रोही को विना विचारे ही आज मार डालो' ॥ २८-२९॥
ऐसा कहते हुए राजा से उसके पिता ने प्राणदान की प्रार्थना की और राजा ने दो मास तक उसे धर्माचरण के लिए निश्चित करके कहा कि 'इसके पश्चात् इसे फिर मेरे सम्मुख लाना', ऐसा कहकर उसके पिता को सौंप दिया ।। ३०-३१॥
पिता से घर में लाया गया वह वैश्यपुत्र, प्राणों के भय से सोचने लगा कि 'मैंने राजा का कौन-सा अपराध किया है, जो वह मुझे दो महीनों बाद फाँसी का दंड देगा।' वह रात-दिन इसी सोच में नींद और भूख को भूलकर कुछ ही दिनों में अत्यन्त दुर्बल हो गया। दो महीने बीतने पर अत्यन्त दुर्बल और पीले पड़े हुए पुत्र को लेकर पिता, राजा के पास गया ।।३२-३४।।
राजा ने इस प्रकार पीड़ित और दुर्बल वैश्यपुत्र को देखकर कहा- 'तू इतना दुर्बल क्यों हो गया ? मैंने तेरा भोजन तो बन्द नहीं किया था' ॥३५।।
वैश्यपुत्र कहने लगा- 'प्रभो ! आप द्वारा दी गई प्राणदंड की आज्ञा के समय से ही मैं भय के कारण अपनी आत्मा को भी भूल गया, भोजन की तो बात ही क्या ? प्रतिक्षण सिर पर मॅडराती हुई मृत्यु को ही देखता हूँ ।॥३६-३७।।
ऐसा कहते हुए वैश्यपुत्र से राजा ने कहा- 'बेटा, मैंने प्राणदंड का भय देकर तुझे युक्ति पूर्वक ज्ञान कराया ॥३८॥
इसी प्रकार समस्त प्राणियों को मृत्यु का भय होता है। उसकी रक्षा के लिए उपकार से बढ़कर और धर्म क्या है ? ॥३९॥
मैंने तुझे धर्म और युक्ति का यही तत्त्व समझाने के लिए यह उपाय किया था; क्योंकि मृत्यु से डरा हुआ बुद्धिमान् व्यक्ति, मुक्ति के लिए यत्न करता है।॥४०॥
इसलिए इसी प्रकार का धर्म करनेवाले अपने पिता की तुम निन्दा न करना।' राजा की यह बात सुनकर नम्र वैश्यपुत्र ने कहा- ॥४१॥
'आपने धर्म का उपदेश देकर मुझे कृतार्थ किया। अब मेरी इच्छा मुक्ति के लिए हो रही है। अत, हे स्वामिन् उसका भी उपदेश दें ॥४२॥
यह सुनकर राजा ने उत्सव (मेले) के दिनों में वैश्यपुत्र के हाथ में तेल से भरा एक बरतन देकर कहा- ॥४३॥
'इस पात्र को लेकर तुम मेले के दिनों में मारी नगरी का भ्रमण करके आओ। लेकिन बेटा, इस बात का ध्यान रखना कि तेल की एक बूंद भी न गिरने पावे ॥४४॥
यदि इसमे से एक बूंद भी तेल गिरा, तो मेरे ये सिपाही तुम्हे मार डालेंगे' ।॥४५॥
ऐसा कहकर गजा ने उसे नगरी का चक्कर लगाने के लिए छोड़ दिया और उसके पीछे नंगी तलवार लिये हुए सिपाही नियुक्त कर दिये ॥४६॥
वह वैश्यपुत्र भयपूर्वक अत्यन्त सावधानी से तेल की रक्षा करता हुआ बड़े ही कष्ट से सारी नगरी की प्रदक्षिणा करके लौट आया ॥४७॥
राजा ने भी विना एक बूंद तेल गिराये, तेलपात्र लेकर आये हुए वैश्यपुत्र से कहा-'क्या तुमने नगर में भ्रमण करते हुए किसी व्यक्ति या वस्तु को देखा ?' ॥४८॥
यह सुनकर वैश्यपुत्र ने हाय जोड़कर कर कहा- 'महाराज ! यह सच है कि भ्रमण करते हुए मैंने न किसी को देखा और न कुछ सुना ॥४९॥
भ्रमण करते समय में एकाग्र वित्त से गले पर तलवार गिरने के भय से तेल की ओर दृष्टि लगाये हुए उसे बचाने में तल्लीन था' ।॥५०॥
वैश्यपुत्र के ऐसा कहने पर राजा ने कहा- 'जिस प्रकार दीखते हुए भी, तेल पर दृष्टि गड़ाये हुए तुमने सारे भ्रमण में कुछ नही देखा, उसी प्रकार की तल्लीनता से तुम आत्मा के ध्यान में लग जाओ। आत्मा को एकाग्र वृत्ति से देखनेवाला व्यक्ति बाहरी वृत्तियों से हटकर आन्तरिक तत्त्व को देखता है ।।५१-५२।।
जिसे तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, वह फिर कर्मजाल के बन्धन में नहीं बँधता। यह मैंने तुझे संक्षेप में मोक्ष का उपदेश कर दिया' ॥५३॥
इस प्रकार राजा से उपदेश पाकर और उसके चरणों में गिरकर, प्रसन्नचित्त वह वैश्यपुत्र, अपने घर गया ।।५४।।
इस प्रकार स्नेह से प्रजा का पालन करनेवाले उस गजा की तारादत्ता नाम की कुलीन रानी थी ।॥५५॥
सच्चरित्रा और सुन्दरी उस रानी से अनेक दृष्टान्तों का रसिक वह राजा इस प्रकार शोभित होता था, जिस प्रकार सुकवि भारती से शोभित होता है॥५६॥
प्रकट होते हुए गुणों से सराहनीय वह रानी, अमृतमय उस राजा से उसी प्रकार अभिन्न थी, जैसे अमृतमय चन्द्रमा से चाँदनी अभिन्न होती है।॥५७॥
उस महारानी के साथ मुखपूर्वक रहते हुए उस राजा के दिन, इन्द्राणी के साथ रहते हुए इन्द्र के समान, व्यतीत होने लगे ॥५८॥
सुरभिदत्ता अप्सरा की कया
इसी कथा की सन्धि मे, स्वर्ग में इन्द्र के यहाँ एक महोत्सव हुआ। उस महोत्सव में वेश्याओं के सभी वर्गों के सम्मिलित होने पर भी, सुरभिदत्ता नाम की वेश्या वहां नहीं दीख पड़ी ॥५९-६०।।
इन्द्र ने योगबल द्वारा उसे किसी विद्याधर के साथ नन्दन-वन में क्रीड़ा करते हुए देखा ।।६ १।।
यह देखकर मन में क्रुद्ध इन्द्र ने सोचा कि ये दोनों कामान्ध दुराचारी है। एक अप्सरा तो हमें भूलकर उदंडता कर रही है, दूसरा यह विद्याधर भी इस देवभूमि में आकर यह जो अविनय कर रहा है, यह आश्चर्य है ।। ६२-६३।।
अथवा इस नेचारे विद्याधर का क्या दोष है? इसे तो यही वेश्या अपने रूपजाल में फंसाकर ले आई है।॥६४॥
उभरे हुए स्तनरूपी तटोंबाली एव लावण्य-जल से भरपूर रमणी-नदी से बहाया हुआ कौन व्यक्ति, अपने नियन्त्रण में रह सकता है ? ॥६५॥
क्या, पूर्व समय में तिलोत्तमा को देखकर शिवजी क्षुब्ध नहीं हो गये थे, जिसे विधाता ने सभी सुन्दर वस्तुओं के कण-कण एकत्र करके निर्मित किया था ? ॥६६॥
क्या, मेनका को देखकर विश्वामित्र ने तप करना नहीं छोड़ दिया था ? क्या, शर्मिष्ठा के रूप के लोभ से ययाति ने वृद्धावस्था नहीं प्राप्त की थी ? ॥ ६७।।
इसलिए यहाँ, इस विषय में यह विद्याधर युवक अपराधी नहीं है; क्योंकि अप्सरा ने अपने तीनों लोकों को वश में करनेवाले रूप से इसे मोहित कर लिया ॥६८॥
हीन जाति में आसक्त यह स्वर्गीया रमणी पापिनी है, जिसने देवताओं का त्याग कर इस नन्दन-वन में प्रविष्ट किया ॥ ६९॥
ऐसा सोचने के पश्चात् विद्याधर-युवक को छोड़कर अहल्या के प्रेमी' (जार) इन्द्र ने उस अप्सरा को शाप दिया ।।७०।।
'पापिन् ! तू माष्य-योनि में जाकर, उसमें अयोनिजा कन्या को प्राप्त करके, दिव्य कत्र्तव्य करने के पश्चात् फिर स्वर्ग में आवेगी' ॥७१॥
इसी समय, तक्षशिला के राजा कलिगदत्त की रानी तारादत्ता ऋतुमती हुई। उसी रानी के गर्भ में इन्द्र के शाप से पतित सुरभिदत्ता स्वर्गांगना ने प्रवेश और निवास किया ।।७२-७३।
उस समय रानो तारादत्ता ने स्वप्न में देखा कि आकाश से एक ज्वाला उसके पेट में प्रवेश कर रही है।॥७८॥
प्रात. काल रानी ने आश्चर्य के साथ पति को स्वप्न की घटना सुनाई, सुनने पर राजा ने प्रसन्न होकर कहा ।।७५।।
'देवि, दिव्यलोक-वासी, शाप के कारण मनुष्यलोक में गिरते है। इसीलिए मैं समझता हूँ कि कोई देवजातीय प्राणी तुम्हारे गर्भ में आया है।॥७६॥
इन तीनों लोकों में अच्छे और बुरे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणी अपने कर्मों के अनुसार शुभ और अशुभ फल प्राप्त करने के लिए चलते रहते हैं¹ ॥७७॥
राजा के इस प्रकार कहने पर रानी ने प्रसंगतः कहा- 'क्या यह सत्य है कि शुभ या अशुभ का भोग देनेवाला कर्म ही है' ॥ ७८।।
इस विषय की भूमिका के रूप में रानी ने राजा से कहा, मैं इस प्रसंग की सुनी हुई एक कहानी तुम्हें सुनाती हूँ, सुनो-
राजा धर्मदत्त की कथा
कोशल-देश का एक राजा था। उसका नाम धर्मदत्त था। उसकी नागश्री नाम की पति-व्रता रानी थी। सतियों के भार को रोके हुए भी (रुन्धती) वह पृथ्वी पर अरुन्धती नाम से विख्यात हुई। कुछ समय के उपरान्त उस रानी के गर्भ से उस राजा की मैं पुत्री उत्पन्न हुई ॥७९-८१॥
एक बार जब मैं वहुत छोटी थी, तब मेरी माता ने अकस्मात् अपने पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करके अपने पति से कहा- ।।८२।।
'राजन् ! मैंने आज अकस्मात् ही पूर्वजन्म का स्मरण किया है। यदि मैं उसे आपसे न कहूँ, तो प्रेम के विरुद्ध है और यदि कहूँ, तो मेरी मृत्यू होती है।॥८३॥
कहते है कि यदि पूर्वजन्म की स्मृति विना किसी शंका के हो जाय, तो उसका कहना मृत्यु के लिए होता है। इमलिए मुझे बहुत खेद है' ॥८४॥
पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये हुए राजा ने उससे कहा- 'प्रिये! मैने भी तुम्हारे ही समान सहमा अपना पूर्वजन्म स्मरण कर लिया है। इसलिए, तू मुझसे कह दे और मैं भी तुझसे कह देता हूँ। जो होना होगा, होगा। भवितव्यता को कौन लौटा सकता है।॥८५-८६।।
इस प्रकार पति से प्रेरित होकर रानी ने कहा- 'राजन् ! सुनो, कहती हूँ- पूर्वजन्म में इसी (कोशल) देश में, मैं माधव नामक किसी ब्राह्मण की सदाचारिणी दासी थी। देवदास नाम का मेरा पति था। वह सज्जन किसी वैश्य के घर में नौकर था ।।८७-८९॥
इस प्रकार हम दोनों, अपने अनुरूप घर बनाकर, अपने-अपने स्वामियों (मालिकों) के घरों से लाये हुए पक्वान्नों से जीवन-निर्वाह किया करते थे ॥९०॥
पानी का एक मटका (घड़ा), झाडू, चारपाई, मैं और मेरा पति- ये तीन जोड़ियाँ हमारे घर में थीं ।॥९१॥
कलह-रहित होकर इस घर में हम दोनों अत्यन्त सुखी थे और देवता, पित्तर तथा अतिथि को देकर बचे हुए परिमित अन्न को हम लोग खाया करते थे ॥९२॥
हम दोनों की आवश्यकता से अधिक भोजन-आच्छादन आदि जो भी होता था; उसे हम किसी दीन-दुःखी को दे देते थे ॥९३॥
कुछ समय के अनन्तर उस देश में एक बार अकाल पड़ गया। इस कारण हम दोनों को मिलनेवाला भोजन अब कम मात्रा में मिलने लगा ।।९४।।
तब भूख-प्यास से व्याकुल और अन्न की कमी से कष्ट पाते हुए हम लोगों के भोजन के समय कोई थका हुआ ब्राह्मण अतिथि घर में आ गया ।॥९५।।
फलतः इस भीषण प्राण-संकट के समय में भी हम दोनों ने अपना सारा भोजन उसे दे दिया ।।९६।।
उस अतिथि के खाकर चले जाने पर प्राणों ने मेरे पति को इसलिए छोड़ दिया, मानो 'उसका अतिथि के प्रति विशेष आदर था, मेरे प्रति नहीं' अर्थात् मेग पति क्षुधा से पीड़ित होकर परलोक सिधार गया ।॥९७।।
तब मैं पति की चिता लगाकर सती होने के लिए उस पर चढ गई और मेरी विपत्ति का भार उतर गया ।।९८।।
तदनन्तर में इस जन्म में राजा के घर महागनी होकर तुम्हारी पत्नी बनी। पुण्य का वृक्ष, तुरन्त ही अचिन्तनीय फल प्रदान करता है।॥९९।।
रानी के इस प्रकार कहने पर राजा ने कहा- 'आओ प्रिये! मैं वही तुम्हारे पूर्वजन्म का पति देवदास हूँ। मैंने भी आज ही अपना पूर्वजन्म स्मरण किया है ॥१००-१०१॥
ऐसा कहकर और अपने पूर्वजन्म के संस्मरण उसे बताकर प्राणहीन राजा उस देवी के साथ ही स्वर्ग को चला गया ।। १०२।।
इस प्रकार मेरे माता-पिता द्वारा दूसरे लोक में चले जाने पर मेरी माता की बहन, मौसी मेरा पालन-पोषण करने के लिए मुझे अपने घर ले गई ॥ १०३॥
जब मैं कुमारी अवस्था में ही थी, तब वहाँ एक मुनि अतिथि के रूप में आया और मेरी मौसी ने मुझे उसकी सेवा के लिए आदेश दिया ॥१०४॥
कुन्ती द्वारा दुर्वासा के समान मेरे द्वारा यत्न से सेवा करने पर, प्रसन्न मुनि के वर प्रदान से मैंने तुम्हारे ऐसे धार्मिक पति को प्राप्त किया ॥१०५॥
इस प्रकार धर्म का आदर करने से ऐसे शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसीलिए मैंने माता-पिता के साथ राज्य प्राप्त करके पूर्वजन्म का भी स्मरण किया ।।१०६।।
इस प्रकार रानी तारादत्ता की बातें सुनकर धर्मप्राण राजा कलिंगदत्त ने कहा, 'यह सच है। भलीभांति किया गया थोड़ा भी धर्म महान् फल देनेवाला होता है। इस सम्बन्ध में सात ब्राह्मणों की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो ॥१०७-१०८॥
सात ब्राह्मणों की कथा
कुंडिनपुर नामक नगर में किमी उपाध्याय (अध्यापक) ब्राह्मण के सात ब्राह्मणपुत्र शिष्य थे ।।१०९॥
एक बार, दुभिक्ष पड़ने पर, उस अध्यापक ने उन सातों शिष्यों को अनेक गायोंवाले अपने श्वशुर से एक गाय माँगने के लिए अपनी ससुराल भेजा ॥११०।।
दुभिक्ष से सूखे पेटवाले उन सातों शिष्यों ने गुरु के कथनानुसार उसके श्वशुर से जाकर गाय मांगी ॥ १११॥
उम कृपण और बुभुक्षित श्वगुर ने अपनी जीविका की आधारभूत उस एक गाय को उन्हे दे दिया; किन्तु उन्हे भोजन के लिए नहीं पूछा ॥ ११२॥
वे सातों शिष्य, गाय को लेकर आते हुए मार्ग में भूख की गहरी वेदना से थककर भूमि पर गिर गये ॥ ११३।।
और, यह सोचने लगे 'गुरुजी का घर दूर है, इधर हमलोग गम्भीर विपत्ति से विवश है। अन्न सभी ओर दुर्लभ है। अतः, अब हमारे प्राण गये ॥११४॥
'इस प्रकार यह अकेली गाय विना घास-पानी और मनुष्य के इस जंगल में मरती है। इसके मरने से गुरुजी का छोटा-सा कार्य भी सिद्ध न हो सकेगा ॥११५।।
इसलिए इस गाय के मास से अपने प्राणों को बचाकर बचे हुए मांस से गुरुजी की भी प्राण-रक्षा की जाय; क्योंकि यह आपत्ति-काल है ।।११६।।
ऐसा सोचकर उन सातों सहपाठियों ने शास्त्रविधि के अनुसार गाय को पशु बनाकर मार खाया और बचा हुआ मांस लेकर गुरुजी के समीप गये ॥ ११७-११८।।
गुरुजी को प्रणाम करके उन्होंने मार्ग का सारा समाचार सुनाया। अपराध करके भी सत्य बोलने के कारण गुरुजी ने उन्हें क्षमा प्रदान की ॥११९॥
कुछ दिनों में अकाल के कारण वे सातों शिष्य मर गये, किन्तु सत्य-भाषण के प्रभाव से वे पूर्वजन्म का स्मरण करते थे ।॥१२०॥
इसी प्रकार किसानों के समान, पुण्यात्माओं का छोटा-सा बीज भी, शुद्ध संकल्प के जल-से सींचा जाकर अच्छा फल देता है ॥ १२१॥
बही दुष्ट-भावना से दूषित होकर अनिष्ट फल देता है। इस प्रसंग में एक कथा सुनो ॥ १२२॥
एक ब्राह्मण और चाण्डाल की कथा
प्राचीन समय, माघ के महीने में एक ब्राह्मण और एक चाडाल एक साथ अनशन करके तपस्या कर रहे थे। एकवार भूखे ब्राह्मण ने गंगातट पर मछलियाँ पकडकर खाते हुए धीवरों को देखकर सोचा कि ये दुष्ट धोवर संसार में धन्य है; जो प्रतिदिन ताजी-ताजी मंलियाँ निकालकर यथेष्ट भोजन करते है ॥१२३-१२५॥
दूसरे चांडाल ने, उन्हीं धीवरों को देखकर मोचा कि इन माँसाहारी प्राणिहिंसक धीवरों को धिक्कार है। इसलिए ऐसे दुष्टों का मुँह देखने से क्या लाभ ? ऐसा सोचकर और आँखें बन्द करके वह आत्म-चिन्तन करने लगा ।। १२६-१२७॥
अनशन के कारण क्रमश. वे दोनों ब्राह्मण और चाडाल गलकर मर गये। उनमें ब्राह्मण को तो कुत्ते खा गये और वह चांडाल गंगाजल में ही मर गया ॥ १२८॥
मरने पर, दुष्ट भावना के कारण वह अमफल ब्राह्मण, धीवरों के कुल में ही उत्पन्न हुआ । किन्तु तप के प्रभाव से उसे पूर्वजन्म का स्मरण रहा ।। १२९॥
धैर्यशाली तत्त्वज्ञानी चाडाल, राजा के घर में जन्म लेकर जातिस्मर रहा। अर्थात् उसे अपनी पूर्वजन्म की जाति का भी स्मरण रहा ।।१३०।।
इस प्रकार पूर्वजन्म को स्मरण करते हुए उन दोनों में एक दास (घोवर) होकर अत्यन्त दुःखी और दूसरा राजा होकर अत्यन्त प्रमन्न हुआ ॥१३१॥
इस प्रकार धर्मवृक्ष का मूल- मन, जिसका शुद्ध है या अशुद्ध है, उसको उसी प्रकार का फल मिलता है॥१३२॥
राजा कलिंगदत्त इस प्रकार रानी तारादत्ता को कथा सुनाकर इसी प्रसंग में और भी इस प्रकार कहने लगा-॥१३३।।
देवि, और भी बात है। जो काम जिस प्रकार के आत्मबल से युक्त होता है, उसका फल भी उसी के अनुसार होता है; क्योंकि सम्पत्तियाँ सत्त्व (मनोबल) का अनुसरण करती हैं ।।१३४।।
इस सम्बन्ध में तुमको एक अद्भुत कथा सुनाता हूँ।
राजा विक्रर्मासह और वो ब्राह्मणों की कथा
इस देश में संसार-प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की एक नगरी है।॥१३५॥
वह नगरी, महाकाल की निवासभूमि है। जिसमें मानों शिवजी की सेवा के लिए आये हुए कैलाश-शिखरों के समान ऊँचे-ऊँचे श्वेत भवन सुशोभित हैं।॥ १३६॥
समुद्र के समान गम्भीर उस नगरी का विस्तार चक्रवर्ती-रूपी जल से भरा रहता है। सेना-रूपी सैकड़ों नदियाँ उसमें सदा बहती रहती है। अपने पक्षवाले महीधरों (पर्वतों और राजाओं) का वह आश्रय-स्थान है। उसी नगरी में विक्रर्मामह नाम का यथार्थ नामवाला राजा राज्य करता था। उसके सम्मुख कहीं भी शत्रु-रूपी मृग नहीं थे ॥१३७-१३८॥
शत्रुओं के अभाव के कारण उसे कभी युद्ध-उत्सव का अवसर नहीं मिला था। इसलिए अस्त्र और बाहुयुद्ध में उसकी आस्था न थी। इस कारण वह मन-ही-मन दुखी रहता था ।। १३९।।
एकबार वार्तालाप के प्रक्षग में राजा के मनोभाव जानने के विचार से उसके मन्त्री अमरगुप्त ने उससे कहा ॥१४०।।
महाराज ! अपनी भुजाओं के बल के घमंड से और शस्त्र-विद्या की जानकारी के मद से शत्रुओं की प्रशंसा करनेवाले राजाओं को दोष दुर्लभ नही कहा जा सकता, अर्थात् विपत्ति आ सकती है। जिस प्रकार बाणासुर ने अपनी हजार भुजाओं के घमंड से, शिवजी की आराधना करके उनसे युद्ध करने योग्य शत्रु का वर मांगा था ॥१४१-१४२।।
फलतः, उसी प्रकार का वर न पाकर उसने शत्रु के रूप में विष्णु को प्राप्त किया और विष्णु ने युद्ध में उसकी सभी भुजाओं को काट डाला ।।१४३॥
इसलिए तुम्हें भी युद्ध के विना असन्तोष नहीं करना चाहिए। अनिष्टकारी प्रबल शत्रु की आकांक्षा भी न करनी चाहिए ।।१४४।।
यदि तुम्हें युद्ध-विद्या और शस्त्र-चातुरी दिखानी हो, तो उसके योग्य भूमि-वन में शिकार पर दिखाओ ।। १४५।।
इसीलिए व्यायाम, लक्ष्यवेध (निशानेबाजी) और शस्त्रों के अभ्यास आदि के लिए ही राजाओं के लिए शिकार का विधान किया गया है। विना अभ्यास के राजा लोग युद्ध में सफल नहीं होते ॥१४६॥
जंगली हिंस्र जन्तु, पृथ्वी को प्राणियों से सूनी कर देना चाहते हैं। इसलिए वे राजाओं द्वारा मारे जाने योग्य है। इसलिए भी शिकार करना आवश्यक होता है।॥ १४७॥
हाँ, आखेट का अधिक सेवन भी हानिकारक होता है। इसके अधिक सेवन या व्यसन से ही पांडु आदि पूर्व राजाओं का विनाश हुआ है।॥१४८॥
इस प्रकार बुद्धिमान् मन्त्री अमरगुप्त द्वारा कहे गये राजा विक्रमसिह ने उसे स्वीकार किया ॥ १४९॥
दूसरे दिन ही वह राजा पृथ्त्री को घुड़सवार, पैदल सिपाही और शिकारी कुत्तों से दिशाओं को विचित्र जालों और मचानों से एवं आकाश को प्रसन्नचित्त बहेलियों के शब्दों से भरता हुआ, शिकार के लिए नगरी (उज्जयिनी) से बाहर निकला ॥१५०-१५१॥
हाथी पर बैठकर जाते हुए उस राजा ने, नगर के बाहर सूने शिवालय में एक साथ एकान्त में खड़े दो मनुष्यों को देखा ॥१५२॥
वे दोनों आपन मे कुछ मन्त्रणा करते हुए-से खड़े थे। उन पर दूर से ही सन्देह करता हुआ राजा आखेट-वन (शिकारगाह) में गया ॥१५३॥
वहाँ जाकर राजा ने तलवार से काटे हुए बूढ़े बाघों तथा सिहों के गर्जनों से पूरित जंगली स्थानों और पहाड़ों में सन्तोष प्रकट किया ॥ १५४।।
राजा ने हाथियों को मारनेवाले सिहों के नखों से गिरे हुए पराक्रम के बीजों के समान मोतियों से सारी जंगली भूमि भर दी ।। १५५।।
टेढे-टेढ़े उछलनेवाले मृग, उससे तिरछे भाग रहे थे। किन्तु राजा विना टेढ़ा हुए ही उन्हे शीघ्रता से बींधता हुआ अपनी शस्त्रविद्या पर हर्ष प्रकट करता था ।॥१५६॥
बहुत समय तक आखेट करके श्रान्त सेवकों के साथ, डोरी उतारे डाले गये धनुष को लेकर वह राजा उज्जयिनी को लौटा ॥ १५७॥
लौटते हुए उसने उसी देवमन्दिर में इतने समय तक उसी प्रकार खड़े-खड़े बातें करते हुए उन दोनों मनुष्यों को फिर से देखा, जिन्हें जाते समय देखा था ।। १५८॥
ये दोनों कौन है और इतने समय तक क्या मन्त्रणा कर रहे है, इतनी लम्बी और गुप्त मन्त्रणा करनेवाले ये अवश्य ही कोई गुप्तचर होंगे ।। १५९।।
ऐसा सोचकर और द्वारपाल को भेजकर राजा ने दोनों को पकड़वाकर बंधवा दिया। तदनन्तर दूसरे दिन उन्हें दरबार में बुलाकर पूछा- 'तुम कौन हो। और इतने लम्बे समय तक वहाँ क्या मन्त्रणा करते रहे ?' ।।१६०-१६१॥
उन दोनों के अभय प्रार्थना करने पर एक युवक इस प्रकार कहने लगा- 'सुनो, महा-राज ! आपकी इसी नगरी में करभक नाम का एक ब्राह्मण रहता था ।।१६२-१६३।।
उसने एक महावीर पुत्र की प्राप्ति के लिए अग्नि-देवता की आराधना की उसी बेदविद्या-विशारद ब्राह्मण का मैं पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १६४।।
पत्नी के साथ मेरे पिता के स्वर्ग चले जाने पर शिशु-काल में ही मैंने विद्याध्ययन तो किया, किन्तु अनाथ होने के कारण अपना मार्ग त्याग दिया ॥१६५॥
मैं द्यूत और शस्त्र-विद्या का अभ्यास करने लगा। सच है, गुरुजनों के शासन से रहित किसकी बाल्यावस्था उच्छृंखल नहीं हो जाती ।।१६६॥
क्रमशः बाल्यावस्था बीतने पर युवावस्था में भुजबल के मद से मत्त होकर बाणों को छोड़ने के लिए मैं एकवार जंगल में गया ॥ १६७॥
उस समय रथ पर बैठी हुई और बहुत-से बरातियों से घिरी हुई एक नई वधू नगरी से निकली ॥ १६८॥
इतने में ही मैंने देखा, एकाएक बिगड़ा हुआ एक हाथी, सीकड़ तोड़कर कही से आकर उम वधू पर आक्रमण करने लगा। हाथी के डर से उसके सभी पुरुषार्थ-हीन साथी उसके पति के साथ इधर-उधर भाग गये ।। १६९-१७०।।
यह देखकर घबराये हुए मैने सोचा 'ओह, इन कायरों ने इस वधू को कैसे सर्वथा असहाय और अकेले ही छोड दिया ॥ १७१।।
तो मैं अब इम हाथी से इस अशरणा को रक्षा करता हूँ। विपद्मस्त की रक्षा से हीन प्राणों से या पराक्रम से लाभ ही क्या है ।।१७२॥
ऐसा सोचकर मैंने हाथी को ललकारा! हाथी भी उस स्त्री को छोड़कर मेरी ओर भागता हुआ आया ।। १७३।।
उस डरी हुई वधू से देखा जाता हुआ और शब्द करता हुआ मैं हाथी को दूर तक दौड़ाता हुआ ले गया ।।१७४।।
इस प्रकार दौड़ते हुए मुझे मार्ग में घने पत्तोंवाली टूटी हुई एक वृक्ष की शास्त्रा मिली। मैंने अपने को उसी में छिपा लिया और धीरे-धीरे छिपकर वृक्षों और पत्तों के झुरमुट में चला गया ।। १७५।।
उस शाखा को तिरछी करके मैंने पेड़ के आगे रख दिया और मैं भाग गया। पीछे से दौड़कर आते हुए हाथी ने उस शाखा को क्रोध से रौंद डाला ॥१७६॥
तब हाथी के चले जाने पर मैं उस स्त्री के पास आया और भयभीत उससे मैंने उसके शरीर का कुशल पूछा ॥१७७॥
वह मझे देखकर दु.खित और हर्षित दोनों भाव प्रकट करती हुई बोली- 'क्या कुशल पूछते हो ? मुझे ऐसे एक कायर मानव को दिया गया, जो मुझे ऐसे प्राण-संकट में छोड़कर कहीं भाग गया। कुशल यही है कि तुम्हें मैंने विना किसी क्षत (घाव) के पुनः देखा ।।१७८-१७९॥
इसलिए वह मेरा पति नहीं हो सकता है। अब तुम्हीं मेरे भर्त्ता हो; जिसने अपने जीवन की चिन्ता न करके मुझे मृत्यु-मुख से निकाला ।।१८०।।
वह मेरा पति नौकरों के साथ आ रहा है। अब तुम भी हमारे पीछे धीरे-धीरे आओ। अवसर मिलने पर जहाँ कहीं भी चले जायेंगे।' उसके इस प्रस्ताव को मैंने स्वीकार कर लिया ॥१८१-१८२॥
'वह सुन्दरी है और मुझे आत्म-समर्पण कर चुकी है। फिर भी उस परकीया स्त्री से क्या प्रयोजन ?'- यह तो धैर्य का मार्ग है, यौवन का नही ॥ १८३।।
कुछ ही देर में आकर पति द्वारा आश्वस्त की गई वह बाला उसके और उसके भृत्यों के साथ आगे-आगे चलने लगी ।। १८४।।
उस स्त्री द्वारा गुप्त रूप से दिये गये मार्ग-भोजन को लिया हुआ मैं भी उसके पीछे छिप-छिपकर दूर तक चला गया ।।१८५॥
उम स्त्री ने हाथी के भय से भागने पर टूटे हुए शरीर की पीडा के बहाने मार्ग में उम पति को अपने शरीर पर हाथ भी नहीं रखने दिया ।।१८६।।
मच है. अनुरक्त और आकृष्ट, गाढ़ी अन्तर्वेदना के दुःख से दुःसह और बिगड़ी हुई स्त्री मर्पिणी के समान किसका अपकार किये बिना रह सकती है ? ॥१८७७॥
क्रमश. चलते हुए हम लोग लोहनगर नामक पुर में पहुँचे, जहाँ पर व्यापार से जीविका करनेवाले उस स्त्री के पति का घर था ।। १८८॥
उस दिन हमलोग नगर के बाहर एक देव-मन्दिर में ठहर गये। वहीं पर मुझे यह दूसरा मित्र ब्राह्मण मिला ।। १८९।।
हमलोगों की उम नवीन और प्रथम परिचय में ही परस्पर परम विश्वास और प्रेम उत्पन्न हो गया। सच है, प्राणियों का चित्त पूर्वजन्म के संचित प्रेम को भलीभाँति समझ लेता है ॥१९०॥
तब मैंने अपना सारा रहस्य इसे बता दिया। यह सब सुन लेने के पश्चात् इसने मुझे वीरे से कहा- 'जुप रहो। जिस लिए तुम यहाँ आये हो, उसका उपाय है। इस बनिये की स्त्री के भाई की बहिन यहाँ है। वह धन लेकर मेरे साथ यहाँ से भागनेवाली है। उसीकी सहायता से तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा ॥१९१-१९२॥
ऐसा कहकर यह ब्राह्मण मुझे ले गया और बनिये की स्त्री की ननद, अर्थात् उसकी बहिन को इसने सब सच्चा समाचार सुना दिया ।।१९३।।
दूसरे दिन, सम्मति करके बनिये की उस बहिन ने अपनी भाभी (नव वधू) के साथ एक देव-मन्दिर में प्रवेश किया। मन्दिर के भीतर पहले ही से प्रविष्ट हम दोनों में से उसने मेरे मित्र को भाभी का वेष धारण कराया और उसी वेष में उसे भाई के घर ले गई। मैं उस पुरुष-वेष में स्थित वणिक की वधू के साथ मन्दिर से निकलकर क्रमशः उज्जैन आ गया ।। १९४-१९८।।
उसकी ननद भी घर में विवाहोत्सव के कारण लोगों के मद्यपान करके सो जाने पर इसके साथ रात में निकल भागी और यहाँ आने पर हम दोनों मिले ॥१९९-२००۱
इस प्रकार हम दोनों ने, नवयौवना और स्वयं प्रेम से आसक्त ननद-भाभी को प्राप्त किया ॥२०१।।
महाराज, अब हम दोनों निवास के लिए प्रत्येक स्थान पर शंका कर रहे हैं। ऐसा गुप्त साहस करने पर भला किसका चित्त शान्त रह सकता है ? ॥२०२-२०३॥
अत. रहने के स्थान और धन कमाने के उपाय सोचते हुए हम दोनों को दूर से आपने देखा ॥२०४॥
तदनन्तर गुप्तचर के सन्देह से आपने हम दोनों को पकड़वाकर बंधवा दिया। आज आपके पूछने पर सारा समाचार हमने स्पष्ट रूप से आपसे कह दिया। अब महाराज की जो इच्छा हो। ऐसा कहने पर राजा विक्रमसिंह ने दोनों से कहा- 'मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। भय मत करो। इसी नगर में रहो। मैं ही तुमको पर्याप्त धन दूंगा' ।।२०५-२०६।।
ऐसा कहकर राजा ने उनको पर्याप्त जीविका दे दी। तदनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥२०७॥
इस प्रकार उच्च महात्माओं से बहिष्कृत एवंविध क्रियाओं में भी पुरुषों को सफलता प्राप्त होती है। और, साहस करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषों पर प्रसन्न होकर राजा इस प्रकार दानी हो सकता है।॥२०८॥
धष्ठ लम्बक
इस जन्म या पूर्वजन्म के किये हुए अपने ही अच्छे-बुरे कर्मों के प्रभाव से सुरों और असुरों-सहित समस्त संसार कर्मानुसार विचित्र भोगों का भोग करता है।।२०९॥
अतः तुमने स्वप्न में आकाश से गिरती हुई ज्वाला को जो पेट में प्रवेश करती हुई देखा है, हे रानी ! वह निस्सन्देह कोई देव-जाति का प्राणी अपने कर्मवश कहीं से प्राप्त हुआ है।॥२१०।।
अपने पति राजा कलिंगदत्त से यह सुनकर रानी तारादत्ता परम हर्षित हुई ।।२११।।
प्रथम तरंग समाप्त
1. अहल्या के प्रेमी यह विशेषण इन्द्र के लिए व्यंग्य है। 77
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