5602. || दूसरा कहानी || कलिंगसेना के जन्म की कथा; सात राजकुमारियों की कथा; एक विरक्त राजकुमार की कथा; एक तपस्वी और राजा की कथा; राजा सुषेण और सुलोचना की कथा; कलिगसेना के पास सोमप्रभा का आगमन; एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा; पिशाच और बाह्मण की कथा

5602. || दूसरा कहानी || कलिंगसेना के जन्म की कथा; सात राजकुमारियों की कथा; एक विरक्त राजकुमार की कथा; एक तपस्वी और राजा की कथा; राजा सुषेण और सुलोचना की कथा; कलिगसेना के पास सोमप्रभा का आगमन; एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा; पिशाच और बाह्मण की कथा

दूसरा तरंग

कलिंगसेना के जन्म की कथा

तदनन्तर तक्षशिला नगरी में गजा कलिंगदत्त की रानी तारादत्ता गर्भ-भार से धीरे-धीरे अलसाने लगी ।॥ १॥

प्रसव-काल के समीप आने पर पीले मुखवाली और चंचल नेत्र-तारों (पुतलियों) से आकर्षक रानी, उदीयमान चन्द्रलेखावाली पूर्व दिशा का अनुकरण करने लगी ॥२॥

कुछ ही दिनों के पश्चात् उससे असाधारण मुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जो समस्त सौन्दर्य-सृष्टि के मिश्रण के समान थी ।॥ ३॥

ऐसा पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न हुआ ? मानो इसी सोच में प्रसूति गृह के सभी रक्षादीप मलिन कान्तिवाले हो गये ।।४।।

इतनी अलौकिक सुन्दरी कन्या के उत्पन्न होने पर भी पिता कलिगदत्त, उसी रूप के पुत्र की आशा के विफल होने के कारण खिन्न हो गया ।।५।।

पुत्र का इच्छुक राजा, उस कन्या को दिव्य समझकर भी खिन्न ही रहा। सच है, वहाँ शोकमूलक कन्या और कहाँ मृत्तिमान् आनन्द पुत्र ? ।।६।।

तब मनोविनोद के लिए राजा, जिनों की अनेक मूत्तियोंवाले विहार में चला गया ।॥७॥

उस बिहार (बौद्धमठ) में एक ओर जनता के मध्य बैठे हुए धर्मोपदेशक भिक्षु द्वारा कहे जाते हुए ये वचन उसने सुने - ॥८॥

संसार में घन देना ही सबसे महान् तप है। अर्थ देनवाला प्राणदाता कहा जाता है; क्योंकि प्राण घन में कीलित हैं ।॥९॥

करुणा से व्याकुलचित्त बुद्ध ने अपनी आत्मा को भी तृण के समान दे डाला। तब किचन धन की क्या कथा ।।१०।।

ऐसे धेयंयुक्त तप से निरीह बुद्ध ने दिव्य ज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व लाभ किया ॥११॥ इसलिए सभी प्रिय पदार्थों से आशा को हटाकर बुद्धिमान् व्यक्ति को भलीभाँति ज्ञान की प्राप्ति के लिए आजीवन, प्राणियों का हित करना चाहिए' ॥१२॥

सात राजकुमारियों की कथा

पूर्व समय मे कृत नाम के किसी राजा की क्रम से अति सुन्दरी सात कन्याएँ उत्पन्न हुई ॥१३॥

बालकाल में ही वे कन्याएँ वैराग्य से पिता का घर छोड़कर श्मशान का सेवन करने लगी और अपने कुटुम्बियों से कहने लगी- ।।१४।।

'यह सारा विश्व असार है। उसमें भी यह तुच्छ शरीर सर्वथा असार है, उसमें भी अपनी प्रिय वस्तुओं या प्राणियों का मिलना स्वप्न का-सा भ्रम है॥१५॥

ऐसे असार संमार में दूसरों का हित करना ही एक मात्र सार है। इसलिए हमलोग इस शरीर से भी परहित कर रही हैं ।।१६।।

इस जीते हुए सुन्दर शरीर को हम श्मशान में फेंक देती हैं, जिससे यह मांस खानेवाले पशु-पक्षियों के उपयोग में आ सके। अन्यथा इस सुन्दर शरीर का क्या उपयोग है?" ॥ १७॥

एक विरक्त राजकुमार की कथा

और भी सुनो। पूर्वकाल में एक राजपुत्र था। वह सुन्दर युवा होने पर भी परिब्राजक बन गया ॥ १८॥

वह भिक्षु, किसी वैश्य के घर कभी भिक्षा लेने के लिए गया। कमलपत्र के समान बड़े-बड़े नेत्रवाले उस भिक्षुक को उस वैश्य की युवती स्त्री ने देखा और वह उसके आँखों के लावण्य पर आसक्त होकर बोली- 'ऐसे सुन्दर तुमने यह कष्टकर व्रत क्यों धारण किया ।।१९-२०।।

वह स्त्री धन्य है; जो तुम्हारे इन नयनों से देखी जाती है।' उसके इस प्रकार कहने पर भिक्षु ने अपनी आँखें फोड़ दीं ।¹ ॥२१॥

और, उन आँखों को हथेली में रखकर कहा- देखो माता, यह ऐसी हैं। यह घृणित रक्त और मांस है। यदि अच्छा लगता है, तो इसे ले लो ॥२२॥

इसी प्रकार की दूसरी भी आँख है। बताओ, इनमें कौन अधिक सुन्दर है। मिक्षु के इस प्रकार कहने पर वैश्यवधू खिन्न हो गई ।।२३।।

और कहने लगी, 'हाय, हाय, अभागिन मैंने यह क्या पाप कर डाला! मैं तुम्हारी आँखों के उखाड़ने का कारण बनी ! '॥ २४।।

यह सुनकर भिक्षक बोला- 'माता, तुम्हें कष्ट न होना चाहिए। तुमने मेरा उपकार किया है। इस प्रसंग में उदाहरण मुनो ॥ २५॥

एक तपस्वी और राजा की कथा

प्राचीन समय में गंगा के किसी तट पर स्थित एक सुन्दर उपवन में वैराग्य के कारण सब कुछ त्यागने की इच्छा से एक यति रहता था ॥२६॥

उसके तपस्या करते हुए कोई राजा अपने रनिवास की रानियों के साथ घूमने के लिए वहाँ आया ।। २७।।

विहार करने के पश्चात् मद्यपान करके सोए हुए उस राजा के पास से उठकर चंचल रानियाँ उद्यान में चारों ओर घूमने लगीं ।॥ २८॥

उस उद्यान के एक ओर समाधि में बैठे हुए मुनि को देखकर 'यह क्या है,' इस प्रकार के कौतुक से वे उसे घेर कर बैठ गई ॥२९॥

विलम्ब हो जाने के कारण जागने पर राजा ने उन्हें देखने के लिए चारों ओर चक्कर लगाना प्रारम्भ किया ॥ ३०।।

ढूंढ़ते हुए उसने जब मुनि को घेरकर बैठी हुई रानियों को देखा, तब राजा ने डाह से जलती हुई तलवार निकालकर उससे मुनि पर प्रहार कर दिया ॥३१॥

ऐश्वर्य, डाह, निर्दयता, मदोन्मत्तता और विवेक-शून्यता, इनमें एक ही क्या अनर्थ नहीं कर डालता ? यदि पाँचों अग्नियाँ एकत्र हों, तो क्या कहना ॥ ३२॥

राजा के चले जाने पर कटे हुए अंगोंवाले क्रोध-रहित मुनि के सामने प्रकट होकर किसी देवी ने कहा- ॥३३॥

'हे महात्मन् ! जिस पापी ने क्रोध से तुम्हारे प्रति यह अत्याचार किया है; उसे मैं अपनी शक्ति से मार देती हूँ, यदि तुम चाहो तो' ।॥३४।॥
यह सुनकर वह ऋषि बोला- 'देवि, ऐसा न करो। वह राजा मेरे धर्म में सहायक है, विरोधी नहीं ॥ ३५॥

हे भगवति, उसकी कृपा से मुझे क्षमा-धर्म मिला। यदि वह ऐसा न करे, तो किस पर क्षमा की जाय ॥३६॥

मनस्वी जन, इस नश्वर शरीर के लिए कोप नहीं करते। मित्र और शत्रु पर समान रूप से क्षमा करना ही ब्राह्मण का घर्म है' ॥३७॥

इस प्रकार मुनि से कही गई और उसकी तपस्या से सन्तुष्ट वह देवी यति के अंगों को अक्षत (पूर्ण) करके अन्तर्धान हो गई ॥ ३८।।

'अत. जैसे वह राजा उस ऋषि का उपकारी बना, उसी प्रकार आँखें उखाड़ लेने के कारण मेरे तप को बढ़ाकर हे माता, तुमने अभी उपकार किया है' ।॥३९॥

ऐसा कहकर वह वशी भिक्ष प्रणाम करती हुई उस वैश्य-वधू के नम्र होने पर अपने सुन्दर शरीर का भी ध्यान न देकर मिद्धि के लिए चला गया ।॥४०॥

यह कथा सुनकर राजकन्याएँ बोली- इसलिए बाल और सुन्दर होने पर भी नष्ट होने-वाले शरीर पर क्या आग्रह ? इसलिए प्राणिमात्र के प्रति उपकार करना ही एक मात्र बुद्धिमान् के लिए प्रशंसनीय कार्य है।॥४१॥

इसलिए हम सातों कन्याएँ स्वाभाविक सुख के घर इम श्मशान में प्राणियों के उपकार के लिए क्षुद्र शरीर को दे रही है।॥४२॥

अपने परिवारवालों को इस प्रकार कहकर उन मानों राजकुमारियों ने ऐसा ही किया और उससे परमसिद्धि प्राप्त की ॥४३॥

बुद्धिमानों को अपने शरीर पर भी ममता नहीं होती। पुत्र-दारा आदि घास-फूस की तो बात ही क्या ।॥४४॥

उस राजा ने बिहार में धर्मोपदेशक से यह सब बाते सुनकर दिन व्यतीत किया और सायंकाल अपने भवन में आकर फिर भी कन्या जन्म के शोक में मग्न हो गया। इतने पर घर के किसी बूढ़े ब्राह्मण ने आकर राजा से कहा- 'हे राजन् ! कन्यारत्न के जन्म से क्यों इतना संतप्त हो रहे हो। कन्याएँ तो पुत्र से भी उत्तम होती है और इहलोक तथा परलोक में भी कल्याण देनेवाली होती हैं ।॥४५-४७।।

राज्य के लोभी पुत्रों में राजाओं का कैसा प्रेम, जो बन्दरों के समान पिता को नोच खाते है ॥४८॥

कुन्तिभोज आदि राजा, कुन्ती आदि कन्याओं के कारण ही दु.सह दुर्वासा आदि के क्रोध से बच गये ॥४९॥

कन्यादान से परलोक में जो सुख मिलता है, वह पुत्रों से कहाँ मिल सकता है ?

राजा सुषेण और सुलोचना की कथा

मैं इस सम्बन्ध में सुलोचना की कथा कहता हूँ, सुनो ॥५०॥

चित्रकूट² पर्वत पर सुषेण नाम का एक युवा राजा था। उसे ब्रह्मा ने मानों शिवजी को ईर्ष्या से नवीन कामदेव के समान निर्मित किया था। उस राजा ने उस विशाल पर्वत की तलहटी में एक सुन्दर उद्यान बनवाया, जो देवताओं के नन्दन वन के विहार में विरसता उत्पन्न करता था। अर्थात् उसने अपनी सुन्दरता से नन्दन वन को भी तिरस्कृत कर दिया था ।।५१-५२॥

उस उद्यान के मध्य उस राजा ने विकसित कमलों वाली एक सुन्दर वावली बनवाई थी, जो मानों लक्ष्मी के लीला कमलों के लिए नये खजाने के समान थी ।॥५३॥

अच्छे रत्नों से जड़ी हुई सीढ़ियोंवाली उस बावली के किनारे पत्नियों के अभाव में वह अकेला ही बैठा रहता था। एक बार उसी के आकाशमार्ग से जाती हुई रम्भा, इन्द्र-भवन से अकस्मात् वहाँ आ गई ।॥५४-५५॥

रम्भा ने उद्यान में बैठे हुए राजा को इस प्रकार देखा, मानों प्रफुल्ल पुष्प-वन में मूत्ति-मान् वसन्त विराजमान हो ।।५६।।

उसे देखकर रम्भा सोचने लगी, बावली के है?? अथवा साक्षात् चन्द्रमा है? क्या यह इसकी स्वयं ही पुष्प-चयन करने यहाँ उपस्थित हुआ है। रति यहाँ कहाँ है। उत्सुकता के कारण इस प्रकार रूप में राजा के समीप आई ॥५७-५९॥ कमलों पर गिरी हुई क्या यह स्वर्ग की लक्ष्मी स्थायी शोभा है अथवा पुष्पधन्वा कामदेव, किन्तु यदि वह है, तो उसकी सहचारिणी तर्क-वितर्क करती हुई रम्भा, मनुष्य के

समीप आई हुई उसे देखकर राजा सोचने लगा कि यह असम्भव शरीरवाली कौन स्त्री है ? यह मानुषी तो नहीं है; क्योंकि इसके चरण भूमिस्पर्श नहीं करते और आँखें भी अपलक है। अतः यह अवश्य ही कोई दिव्या, स्त्री है ॥६०-६१॥

पूछने पर कदाचित् यह भाग न जाय, इसलिए इससे पूछना नहीं चाहिए। कारण से संगत दिव्य स्त्रियाँ प्राय. रति का भेद (रहस्य खुलना) सहन नहीं करती ॥६२॥

ऐसा सोचते हुए उस राजा ने उससे बाते करते हुए क्रमशः उसी समय उसे गले से लगा लिया ॥ ६३।।

तदनन्तर वह राजा चिरकाल तक इस उद्यान में उस अप्सरा के साथ क्रीड़ा करता रहा। रम्भा भी स्वर्ग को भूल गई। सच है, प्रेम प्यारा होता है, जन्मभूमि नहीं ॥६४॥

जैसे आकाश सुमेरु के स्वर्ण-शृंगों से भर जाता है, उसी प्रकार रम्भा की सखी यक्षिणी ने राजा की वह मूमि सोने को वर्षा से भर दी ।॥६५॥

कुछ समय पश्चात् सुवेण के समागम से, गर्भवती रम्भा ने असाधारण सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ।।६६।।

कन्या प्रसव करते ही रम्भा राजा से बोली- 'राजन्, मुझे इतने दिनों का ऐसा शाप था। अब वह क्षोण हो गया। मैं रम्भा नाम की स्वर्णाङ्गना हूँ। तुम्हें देखने पर प्रेम से आकृष्ट हो गई थी। तदुपरान्त गर्भ हो जाने पर उसे यहीं छोड़कर अभी ही जा रही हूँ ॥ ६७-६८।।

हमारी मर्यादा ही ऐमी है। तुम इस कन्या की रक्षा करना। इसके विवाह से स्वर्ग में हम दोनों का पुनः समागम होगा' ।॥६९।।

ऐगा कहकर वह विवश रम्भा अन्तर्धान हो गई। उसके वियोग-दुःख से राजा प्राण देने के लिए तैयार हो गया ।॥७०॥

'इसी प्रकार शकुन्तला को उत्पन्न करके ही स्वर्ग चली गई। मेनका के लिए क्या विश्वा-मित्र ने प्राण दे दिये थे?" मन्त्रियों की इस प्रकार की बातों से धीरज दिलाया गया वह राजा किसी प्रकार धोरे-धीरे धीरज रख सका और उस रम्भा से पुनर्मिलन की आशा के कारण उसने कन्या को ग्रहण किया ।।७१-७२।।

उन सर्वाङ्गमुन्दरी कन्या का, राजा ने एकाग्रचित्त से पालन प्रारम्भ किया, और उसके लोचनों के अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उसका नाम सुलोचना रखा ॥७३॥

क्रमशः यौवन में आई हुई और उद्यान में विचरण करती हुई उसे अकस्मात् कश्यप ऋषि के पुत्र वत्स ने देखा ॥ ७४॥

तपोराशि होने पर भी वत्म मनि, उस कन्या को देखकर प्रेमरस (ज्ञाता) रसिक होकर सोचने लगा ॥७५।।

ओह ! इस बालिका का कैसा अद्भुत रूप है! यदि इसे पत्नी के रूप में प्राप्त न कर मकूं, तो मेरे तप का और दूसरा फल ही क्या होगा ।।७६।।

इस प्रकार सोचते हुए उस मुनि युवक को सुलोचना ने जलती हुई ज्वालावाले निघूम अग्नि के समान देखा ॥७७॥

उस मुनि को देखकर प्रेममयी वह कन्या भी स्फटिक माला और कमंडलु लिये हुए शान्त और सुन्दर यह युवक कौन है? इस प्रकार सोचने लगी ॥७८॥

बरण करने के लिए ही मानों नेत्रकमलों की माला उसके शरीर पर डालती हुई कन्या सुलोचना ने उसे प्रणाम किया ॥७९॥

सुर और असुरों के लिए भी असह्य कामदेव की आज्ञा से वश किये गये उसने भी पति को प्राप्त करो ऐसे आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन किया ॥८०॥

मुनि के असाधारण सौन्दर्य में लुटी हुई अतएव लज्जा के कारण मुँह नीचे की हुई उस कन्या ने मुनि से इन प्रकार कहा- देव यदि यह आपकी सच्ची इच्छा है, हंमी या विनोद की बात नहीं है, तो आप मेरे दाता पिता से मुझे माँगो ॥८१॥

इसके पश्चात् उसका कुरु, गोत्र परिचय आदि पूछकर उम मुनि ने जाकर उसके पिता सुषेग से उसे माँगा ।॥८२॥

उन राजा ने भो गरीर और तप से अत्यन्त उच्चकोटि पर पहुँचे हुए उस मुनिकुमार को देखकर उसका आतिथ्य सत्कार करके कहा ।।८३।।

'भगवन् ! यह मेरी कन्या, रम्भा नामक अप्मरा से उत्पन्न हुई है। इसके विवाह से स्वर्ग में मेरा और रम्भा का पुनः ममागम होगा ॥८४॥

स्वर्ग जाती हुई रम्भा ने ऐसा मुझसे कहा है- यह कैसे सम्भव हो, इस पर आप विचार कीजिए' ।॥८५॥

यह सुनकर मुनि क्षण-भर के लिए विचारमग्न हो गया और सोचने लगा। क्या पहले समय में मेनका से उत्पन्न अप्सरा प्रमद्वरा जब साँप के काटने से मर गई, तब रुरु ऋषि ने अपने आयुष्य का आधा भाग देकर उसे जीवित नहीं कर दिया था ? क्या विश्वामित्र ने चांडाल त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग में नहीं पहुँचा दिया था ? तो क्या मैं अपने तप के कुछ भाग का व्यय करके यह कार्य नहीं कर सकता? ऐसा मोचकर मुनि ने राजा से कहा- 'यह कोई बड़ा भार नही है' ।॥८६-८९।।

'हे देवगण, यह राजा मेरे तप के अंश से रम्भा के साथ सम्भोग प्राप्त करने के लिए सशरीर स्वर्ग को जाय' ।॥९०॥

उम मुनि के ऐसा कहने पर और सारी सभा के सुनते रहने पर आकाशवाणी हुई-'ऐसा ही हो' ॥९१॥

तब वह राजा उस सुलोचना नाम की कन्या को मुनि वत्स के लिए देकर स्वर्ग चला गया ।।९२।।

वहाँ देवत्व प्राप्त करके इन्द्र द्वारा नियुक्त की गई प्रभावशालिनी रम्भा के साथ वह रमण करने लगा ।।९३।।

इसी प्रकार ये दिव्य रमणियाँ तुम्हारे समान पुरुषों के घरों में 'हे देव, सुषेण इसी प्रकार कन्या के कारण ही सफल हुआ। पुरुषों के यहाँ ऐसी ही कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। अतः यह कन्या भी शापच्युत होकर तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है। इसलिए हे स्वामी! अवतार लेती हैं ।॥९४।। आपके समान उच्च महा-कोई दिव्य स्त्री है, जो चिन्ता न करो ॥९५॥

इस प्रकार घर के वृद्ध ब्राह्मग द्वारा कही गई कथा को सुनकर राजा कलिंगदत्त चिन्ता छोड़कर प्रसन्न हुआ ।॥९६॥

उस राजा ने चन्द्रकला के समान आंखों को आनन्द देनेवाली उस कन्या का नाम कलिंगसेना रखा ॥९७ ॥

वह राजकुमारी कलिंगसेना अपनी सखियों के साथ क्रमशः बड़ी होने लगी ॥९८॥ क्रीड़ा करते बाल्यसमुद्र की लहरी के समान वह कन्या पिता के गृह में, भवन में, घरों में और उद्यानों में विहार करती थी ।॥९९॥

कलिगसेना के पास सोमप्रभा का आगमन

एक बार वह कलिंगसेना राजभवन की छत पर खेल रही थी। उसी समय आकाश-पथ से जाती हुई मायासुर की बेटी सोमप्रभा ने उसे उड़ते-उड़ते देखा और दूर से देखते ही उससे उसका प्रेम हो गया ।।१००-१०१।।

सोमप्रभा उसे देखकर सोचने लगी, 'क्या यह इतनी कान्ति कहाँ ! यदि यह रति है, तो काम कहाँ है? ऐसा समझती हूँ ॥१०२॥ चन्द्रकला है? किन्तु दिन में उसकी अतः, यह अवश्य ही अभी कुमारी है,

सम्भव है कि कोई दिव्य स्त्री, शाप से पतित होकर राजघराने में उत्पन्न हुई हो। मैं समझती हूँ कि पूर्वजन्म में इसकी और मेरी मित्रता रही है।॥ १०३॥

क्योंकि अत्यन्त स्नेह से व्याकुल मेरा मन, बरबस इसकी ओर खिंच रहा है। तो अब यह उचित है कि मैं इससे स्वयं मिलकर सखी के रूप में इसका वरण करूँ ।।१०४॥

सोमप्रभा, यह सोचकर कि बालिका भयभीत न हो, अप्रत्यक्ष रूप से नीचे उतर आई ॥१०५॥

उसके विश्वास के लिए वह मनुष्य-कन्या का रूप बनाकर धीरे-धीरे कलिगसेना के पास पहुंची ॥१०६।।

'दैवयोग से यह कोई अ‌द्भुत रूपवाली राजकुमारी मेरे पास आ रही है, यह मेरी सखी होने के योग्य है' ऐसा सोचकर उसे देखते हो वह कलिंगसेना भी उठकर उससे लिपट गई ॥१०७-१०८।।

तदनन्तर उसे अपने पास बैठाकर उससे उसका कुल और नाम आदि पूछने लगी। उत्तर में सोमप्रभा ने कहा, 'सब कहती हूँ, ठहरो। एवंक्रमेण उन दोनों की बात ही बात में मित्रता हो गई। यह मित्रता दोनों ने परस्पर हाथ से हाथ मिलाकर की ॥१०९-११०।।

तब सोमप्रभा ने कहा- 'सखि, तुम तो राजकुमारी हो। राजसन्तानों के साथ मित्रता करना कठिन कार्य है। वे लोग छोटे-से ही अपराध से अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं। इस विषय में राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा कहती हूँ, सुनो ॥ १११-११२॥

एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा

पुष्करावती नगरी में गूढ़सेन नाम का राजा था। उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह घमंडी राजकुमार, जो भी भला या बुरा करता था, राजा उसे सहन करता था; क्योंकि वह उसका एकमात्र बालक था ।। ११३।।

किसी समय उद्यान में भ्रमण करते हुए राजकुमार ने अपने ही समान रूप और धनवाले उसे दत्त नामक बनिये के पुत्र को देखा। उमे देखते ही राजकुमार ने स्वयं वरण किया हुआ मित्र बना लिया तभी से राजपुत्र और वैश्यपुत्र दोनों एकरूप (अभिन्न मित्र) हो गये ॥११४-११६।।

उन दोनों मे, एक, दूसरे को, देखे विना नही रह सकता था। पूर्व जन्म का संचित प्रेम, शीघ्र ही बाँध लेता है ॥११७॥

राजपुत्र ऐसी किसी भी वस्तु का उपभोग नही करता था, जिसके कि एक भाग को वैश्य-पुत्र के लिए नहीं रख लेता था ॥११८॥

एक बार उस मित्र का विवाह पहले ही निश्चित करके वह राजकुमार अपने विवाह के लिए अहिच्छत्रा नगरी को चला ।। ११९।।

उस मित्र के साथ हाथी पर सवार सैनिकों से युक्त राजकुमार, यात्रा करते हुए सायंकाल इक्षुमती नदी के तट पर ठहर गया ।।१२०।।

वहाँ चन्द्रोदय होने पर मद्यपान करके शय्या पर लेटा हुआ राजकुमार, अपनी सेविका से प्रार्थना किये जाने पर कहानी सुनाने लगा ।।१२१।।

नशे से आक्रान्त राजकुमार कहानी प्रारम्भ करते ही निद्रामग्न हो गया। किन्तु सेविका और बह वैश्यपुत्र दोनों स्नेह के कारण जागते रह गये ॥१२२॥

तदनन्तर सब के सो जाने पर वैश्यपुत्र जागता रह गया, और उसने आकाश में स्त्रियों की-सी बातें सुनीं ।॥१२३।।

'यह दुष्ट राजपुत्र, कहानी कहे विना ही सो गया। अतः मैं इसे शाप देती हूँ कि यह प्रातःकाल एक हार देखेगा; उसे देखकर यदि ले लेगा, तो गले में डालते ही इसकी मृत्यु हो जायगी।' इतना कहकर एक स्त्री चुप हो गई और दूसरी कहने लगी ।।१२४-१२५।।

'इससे भी यदि बच जाय, तो आगे जाकर आम के एक वृक्ष को देखेगा, यदि उसके फल तोड़ेगा, तो इसके प्राण निकल जायेंगे ।' ॥१२६।॥

ऐसा कहकर जब दूसरी स्त्री चुप हो गई तब तीसरी ने कहना प्रारम्भ किया- 'यदि इससे भी बच जाय, तो जब यह विवाह के लिए घर में प्रवेश करेगा, तब घर गिर जायगा और यह दब-कर मर जायगा ।' तीसरी के इस प्रकार कहने पर चौथी बोली--।।१२७-१२८।।

'यदि इससे भी बच गया तो रात को शयनागार में जाकर यह सौ बार छीकेगा। उतनी ही बार हर छीक पर यदि कोई व्यक्ति 'जीओ' नही कहेगा, तो यह मर जायगा। और, जिसने हमारी ये बातें सुनी हों तथा जो उसकी रक्षा के लिए उससे कह देगा, उसकी भी मृत्यु हो जायगी।' इतना कह लेने पर वह भी चुप हो गई ।।१२९-१३१॥

बनिये के पुत्र ने वज्रपात के समान भीषण ये बातें सुनी और राजकुमार के स्नेह से व्याकुल होकर वह सोचने लगा ।।१३२॥

प्रारम्भ की गई और पूरी न कही गई ऐसी कहानी को धिक्कार है, जिसे सुनने के लिए देवियाँ भी आई और शाप देती हैं ।।१३३।।

तो मुझे इस राजपुत्र के मर जाने पर इन प्राणो से क्या प्रयोजन ? इसलिए किसी भी उपाय से प्राणों के समान इस मित्र की रक्षा करनी चाहिए ॥१३४।।

उसे यह समाचार भी नहीं कहना है कि जिससे मेरी ही मृत्यु हो जाय। ऐसा सोचते-सोचते वैश्यपुत्र ने रात्रि व्यतीत की ॥ १३५।।

राजपुत्र भी प्रातःकाल उठकर उसके साथ मार्ग में चला। उसने सामने पड़े हुए हार को देखा और उसे लेने की इच्छा की ।। १३६।।

तब वैश्यपुत्र बोला- 'मित्र, इसे मत लो। यह केवल मायाजाल है। नहीं तो इसे ये सैनिक क्यों नहीं देखते ?' ॥१३७॥

यह सुनकर आगे जाने पर उसने आम का वृक्ष देखा, और उसके फल खाने की इच्छा प्रकट की। वैश्यपुत्र ने पहले के ही समान उसे रोका। उससे मन-ही-मन खिन्न हुआ राजकुमार धीरे-धीरे श्वशुर-गृह में पहुँचा। वहाँ पर विवाह के लिए निर्मित गृह में प्रवेश करते हुए राजकुमार को वैश्यपुत्र ने रोक दिया। उसके रोकते ही वह मकान गिर गया ।।१३८-१४०।।

वहाँ से किसी प्रकार बचकर निकला और कुछ विश्वस्त हुआ राजपुत्र, रात को पत्नी के साथ दूसरे घर में गया। वहाँ भी वह वैश्यपुत्र छिपकर जा बैठा। राजकुमार पलंग पर बैठते ही छींकने लगा और सौ बार पलंग के नीचे छिपा हुआ वैश्यपुत्र, सौ बार 'जीओ, जीओ' कहता रहा। इम प्रकार अपना कार्य समाप्त कर के प्रसन्न वह वैश्यपुत्र धीरे से बाहर निकला ।।१४१-१४३।।

बाहर जाते हुए उसे, वधू के साथ राजपुत्र ने देख लिया। फलतः ईर्ष्या से स्नेह को भुला कर क्रोधवेश में उसने द्वारपालों में कहा ।।१४४।।

'यह पापी एकान्त मे मेरे शयनागार में घुस आया। इसलिए इसे रात भर बाँधकर रखो। प्रात. काल इसे फाँसी दी जायगी' ।।१४५।।

यह सुनकर पहरेदारों द्वारा बाँधे हुए उस वैश्यपुत्र ने रात व्यतीत की। प्रात काल फाँमी पर ले जाये जाते हुए उसने सिपाहियों से कहा ।।१४६।।

'पहले मुझे उस राजपुत्र के समीप ले चलो, मै उसे कुछ कारण बताऊंगा, तब मेरा वध करना' ।।१४७।।

उससे इस प्रकार कहे गये सिपाहियों, मन्त्रियों एवं अन्य लोगो द्वारा समझाये जाने पर राजपुत्र ने उसे लाने की आज्ञा दी ।।१४८॥

वहाँ लाये गये बनिये के पुत्र ने, राजकुमार से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। विवाहवाले घर के गिर जाने की घटना से विश्वास करके राजपुत्र ने उसकी बात सच मान ली ।।१४९।।

तब वध से मुक्त उस वैश्यपुत्र के साथ राजपुत्र अपनी पत्नी सहित प्रसन्न चित्त से अपनी नगरी को लौट आया। वहाँ आकर वैश्यपुत्र भी विवाह करके सभी जनों से प्रशंसा किया जाता हुआ सुखपूर्वक रहने लगा ।।१५०-१५१।।

इसी प्रकार राजपुत्र मदोन्मत्त हाथी के समान अपने नियन्ता (महावत) की बातें न मान-कर उसे भी मार डालते हैं और अपना हित नहीं समझते ॥१५२॥

उन बैतालों के साथ क्या मित्रता, जो हँसते-हँसते प्राण ले लेते हैं। इसलिए हे राजपुत्री, मेरी मित्रता में ऐसा विघ्न न करना ।। १५३।।

भवन की छत पर सोमप्रभा से इस प्रकार की कथा सुनकर कलिंगसेना, स्नेह के साथ सखी से कहने लगी ।। १५४।॥

सखि, ये राजपुत्र पिशाच हैं, राजपुत्र नहीं। इनको वश में रखना कठिन कार्य है। पिशाच को कठिनता से वश में रखने की एक कथा मैं तुम्हें सुनाती हूँ, सुनो ॥ १५५॥

पिशाच और बाह्मण की कथा

पूर्वकाल में यज्ञस्थल नामक ग्राम में एक ब्राह्मण रहता था। वह कभी दुर्दशाग्रस्त होकर लकड़ियाँ लेने जंगल में गया ।। १५६।।

वहाँ पर दैववश कुल्हाड़े से फाड़ी जाती हुई लकडी का एक टुकड़ा उसकी जाँघ के भीतर घुस गया। रक्त निकल जाने के कारण बेहोश पड़े हुए उसे किमी परिचित व्यक्ति ने उठाकर घर पर लाकर रख दिया ।। १५७-१५८॥

घर पर घबराई हुई उसकी पत्नी ने उसका रक्त धोकर उसकी जाँघ पर पट्टी बाँध दी। उसकी निरन्तर चिकित्सा करने पर भी वह घाव दिनों दिन बढ़ता ही गया और वह नाड़ी-व्रण (नासूर) बन गया ।।१५९-१६०।।

नाड़ीव्रण हो जाने के कारण खिन्न वह दरिद्र ब्राह्मण मरने को तैयार हो गया। तब उसके किसी मित्र ब्राह्मण ने आकर एकान्त में उनसे कहा- 'यज्ञदत्त नामक मेरा मित्र अत्यन्त निर्धन होकर भी पिशाच की साधना से धन प्राप्त करके मुखी हो गया। इस साधना को उसने मुझे भी बताया है।' अतः, तुम भी पिशाच की साधना करो, वह तुम्हारे इस व्रण को भर देगा ।।१६१-१६३॥

ऐसा कहकर उसने उसे मन्त्र बता दिया और उसकी साधना-क्रिया भी इस प्रकार बताई-'रात के पिछले पहर में उठकर, केशों को खोलकर, नंगे होकर, विना स्तान किये ही, दो मुट्ठी चावल दोनों हाथों में लेकर मन्त्र का जप करते हुए चौराहे पर जाना। वहाँ पर दो मुट्ठी चावल रखकर मौन होकर लौट आना और लौटते हुए पीछे नही देखना ।।१६४- १६६।।

जबतक पिशाच प्रकट होकर स्वयं यह न कहे कि मैं तुम्हारे घाव को अच्छा कर देता हूँ, तबतक बोलना नहीं। उसके कहने पर उसका अभिनन्दन करना वह तुम्हारा रोग अच्छा कर देगा'। मित्र के कहने पर उस ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। फलत. वह पिशाच सिद्ध हो गया। तदनन्तर उसने हिमाचल से औषधि लाकर उसके उस नाड़ीव्रण (नासूर) को अच्छा कर दिया। घाव के अच्छे हो जाने पर ग्रह के समान लगा हुआ वह पिशाच कहने लगा, 'मुझे दूसरा धाव दो, तो मैं उसे अच्छा करूँ ।। १६७-१६९।।

अन्यथा मैं कोई अनर्थ कर डालूंगा या तुम्हें मार डालूंगा'। यह सुनकर उस भयभीत ब्राह्मण ने शीघ्र ही पीछा छुड़ाने के लिए कहा- 'मैं सात दिनों में तुम्हें दूसरा घाव दूंगा'। इस प्रकार पिशाच से मुक्त वह ब्राह्मण जीवन के प्रति निराग हो गया ।।१७०-१७२।।

इतना कहकर कलिग्मेना मध्य में ही अश्लील कथा आने के कारण लज्जा से चुप हो गई और सोमप्रभा से फिर कहने लगी ॥ १७३।।

दूसरा व्रण (घाव) मिलने से अत्यन्त पीड़ित अपने पिता को देखकर ब्राह्मण की चतुर और विधवा कन्या सब समाचार जानकर उससे बोली- 'मैं उस पिशाच को ठग लूंगी। तुम उससे जाकर कह दो कि मेरी कन्या को नाड़ीव्रण (नासूर) है, उसे भर दो' ।।१७४-१७५।।

यह सुनकर प्रसन्न ब्राह्मण, पिशाच से जाकर उसी प्रकार बोला और उसे अपनी कन्या के पास ले आया ॥ १७६।।

उस कन्या ने उस पिशाच को एकान्त में अपना गुप्तांग (जननेन्द्रिय) दिखाते हुए कहा, इसे भर दो ॥१७७।।

उस मूर्ख पिशाच ने, उसके गुप्तांग पर औषधि लेप आदि अनेक प्रयोग किये; किन्तु वह उसे बन्द न कर पाया ॥१७८॥

कुछ दिनों के पश्चात् तंग आकर उसने उस कन्या के दोनों पैर कन्धे पर रखकर उसे भली भाँति देखना चाहा था कि यह क्यों नहीं भर रहा है, इतने में ही उसे उसका दूसरा व्रण (मलद्वार) दिखाई पड़ा। उसे देखकर घबराया हुआ मूर्ख पिशाच सोचने लगा ॥ १७९-१८०।।

अभी तक एक घाव तो भरा नहीं, तबतक यह दूसरा घाव उत्पन्न हो गया। यह कहावत सच है कि छिद्रों में अधिक अनर्थ होते हैं। जिस संमार-मार्ग से लोग आते हैं और नष्ट होते हैं, भला, उस संमार-मार्ग को कौन बन्द कर सकता है। ऐमा सोचकर और उल्टा अपराध चढ़ने और पकड़े जाने की शंका से वह मूर्ख पिशाच भागकर अन्तर्वान हो गया ।।१८१-१८३।।

इस प्रकार, कन्या द्वारा ठगकर उस पिशाच से छुड़ाया हुआ वह नीरोग ब्राह्मण सुख-पूर्वक रहने लगा ॥१८४।।

पिशाच ऐसे होते है। इसी प्रकार बालक राजपुत्र भी होते हैं। वे सिद्ध होकर भी अनर्थकारी होते है। उनसे बचने के लिए बुद्धि द्वारा अपनी रक्षा करनी चाहिए। किन्तु कुलीन राजपुत्रियाँ ऐसी कही सुनी नहीं गई। इसलिए हे सखि, मेरी संगति (मंत्री) के सम्बन्ध में तुम ऐसी कुछ विरुद्ध बान न समझना ॥ १८५--१८६॥

कलिगमेना के मुँह से हास्य. अद्भुत और मधुर रस से पूर्ण इस प्रकार की कहानी सुनकर सोमप्रभा प्रसन्न हुई ॥१८७॥

और कहने लगी, 'मखि। मेग घर यहाँ से साठ योजन (२४० कोश) पर है। दिन छिप रहा है। वहुत देर तक यहाँ रुक गई। अत अब जाती हूँ' ॥१८८॥

धीरे-धीरे सूर्य के अम्ताचल पर्वत शिखर की ओर जाने पर, फिर आने की उत्कंठा रखती हुई सखी कलिगसेना को पूछकर क्षण-भर के लिए चक्ति करती हुई वह सोमप्रभा अपने घर को चली गई ॥१८९॥

इधर वह कलिगसेना भी घर के कमरे में जाकर सोमप्रभा के आश्चयं और विविध कौतुक-पूर्ण सम्वन्ध में सोचने लगी कि मालूम नहीं, यह मेर। सखी सोमप्रभा क्या कोई सिद्ध नारी है या अप्मरा है अथवा विद्याधरी है ॥१९०।।

आकाश में संचरण करनेवाली यह अवश्य ही कोई दिव्य स्त्री है। दिव्य स्त्रियाँ भी मानव-स्त्रियों के साथ असाधारण स्नेह और मित्रता रखती है। क्या पूर्व समय में राजा पृथु की वन्या के साथ दिव्य अरुन्धती की मित्रता नहीं थी, उसी के प्रेम से राजा पृथु कामधेनु गौ को पृथ्वी पर नहीं लाया ? ॥१९१॥

उस कामवेनु का दूध पीने से ही क्या पृथु राजा भ्रष्ट होने पर भी फिर स्वर्ग नहीं गया ? तब से लेकर पृथ्वी पर निरन्तर गायों की सृष्टि नहीं हुई? इसलिए मैं भी धन्य हूँ। किसी भावी शुभ फल के लिए ही यह दिव्य कन्या मेरी सखी बनी है। अब प्रात. काल उसके आने पर भली-भाँति उसके कुल, नाम आदि का पता मालूम करूँगी ॥१९२।।

वह राजकुमारी कलिंगसेना, इस प्रकार की विविध बातें मोचती-सोचती कठिनाई से रात व्यतीत कर सकी। उधर सोमप्रभा ने भी राजकुमारी के पुनर्दर्शन की लालसा में उत्कंठित रहकर रात बिताई ।। १९३।।

मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त

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1. ऐसी ही दन्तकथा महाभक्त कवि सूरदास के सम्बन्ध में प्रचलित है। आयर-लेंड के आरजी बीजीट के सम्बन्ध में भी ऐसी बन्तकथा प्रचलित है।- अनु०

2. किसी-किसी पुस्तक में त्रिकूटाचल पर्वत का नाम आया है। यह हिमालय का एक भाग है, जिसके शिखर, सोने, चान्दी, और लोहे के बने हुए हैं। श्रीमद्भागवत के आठवें स्कन्ध में इसका वर्णन है।

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